This is to inform the readers (if any) of this blog that none of the posts on it are about any individual. If you have been reading this blog, you would know that the one thing it is about is the indi… more →
अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavyaanileklavya wrote 7 months ago: This is to inform the readers (if any) of this blog that none of the posts on it are about any indiv … more →
anileklavya wrote 7 months ago: चलो बहुत हो गया कसाई और बकरे का झगड़ा अब हाथ मिला लेते हैं आज से हमारी-तुम्हारी दुश्मनी खत्म आगे वही … more →
anileklavya wrote 8 months ago: प्रतिक्षण प्रतीक्षा का प्रहार साहबों के गले में फूलों का हार बासी खिचड़ी और अधसड़ा अचार प्यास से गठब … more →
anileklavya wrote 9 months ago: मरने के बाद क्या होना? होना क्या? कुछ नहीं होना। मतलब रोना-धोना नहीं होना धोना तो बिल्कुल नहीं होना … more →
anileklavya wrote 9 months ago: बड़े का छोटे के लिए गोरे का काले के लिए भगवे का हरे के लिए ताक़तवर का कमज़ोर के लिए एक ही दिशा की बा … more →
anileklavya wrote 9 months ago: अगड़-मगड़ अगड़-मगड़ ज़ोर-ज़ोर से रगड़-रगड़ रगड़-रगड़ इतना करता शोर मगर शोर मगर लपड़-झपड़ लपड़-झपड़ क … more →
anileklavya wrote 9 months ago: ज्ञान-विज्ञान के विकास में लगे अति-विशेषज्ञ का काम है बाल की खाल निकालना इसके बहुत से लाभ हो सकते है … more →
anileklavya wrote 9 months ago: हमें गुमान कि बन सकते निराला मुक्तिबोध हम भी उनका कहना तुम बन सकते बहुत हुआ तो काका हाथरसी इस सोच से … more →
anileklavya wrote 9 months ago: झूठ जीना मुश्किल नहीं है बस आदत डल जाने दो कुछ साथी ढूंढ लो और मोहर लगवा लो [2009] … more →
anileklavya wrote 9 months ago: (1) प्रथम व्रत तो किया था मैंने ही रहे वही भी (2) नवजीवन पाने की आस चाहे क्षत-विक्षत (3) नवजीवन की ग … more →
anileklavya wrote 9 months ago: वात्स्यायन खजुराहो कोणार्क विजयनगर कालिदास शाकुन्तला रीति-काल नायिका-भेद तंत्र-तांत्रिक चरस-गांजा ना … more →
anileklavya wrote 10 months ago: कविता शब्दों की महकती चहकती दलदल है कविता सिर के ठीक ऊपर सम्मोहक चट्टान है कविता बहुत लगन से बुनी गई … more →
anileklavya wrote 10 months ago: कृत्रिम वंदन और अकृत्रिम कृंदन का भार उठा लिया जा सकता है माथे पर लगा कर तेजस्वी तिलक और स्पन्दित चं … more →
anileklavya wrote 10 months ago: शहर में सर्कस लगा था एक बच्चा अपनी छोटी बहन के साथ सर्कस देखने आया था दरवाज़े पर चौकीदार था बच्चा और … more →
anileklavya wrote 10 months ago: बापू को ले गए डाकू भगत सिंह को दुबारा फाँसी हो गई सुभाष के तो फूलों का ही ठीक नहीं और शांति का हो गय … more →
anileklavya wrote 10 months ago: शहीद दिवस पर हम करते हैं तमाम शहीदों को हार्दिक नमन बेशक बहुत शुभ रहा है हमारे लिए जितना उनका जीवन उ … more →
anileklavya wrote 10 months ago: रम-पपम रम-पपम रम पपम-पपम हम तो हैं महाशक्ति जो चाहे करेंगे हम घर में घुसेंगे तुम्हारे सब तोड़-फोड़ ड … more →
anileklavya wrote 10 months ago: हम तो पहले ही बता चुके थे तुम्हें चाँदी के चम्मच की चम-चम पारो के कंगन की खन-खन चंद्रमुखी के पायल की … more →
anileklavya wrote 10 months ago: करतब के बर्तन में बरकत है भूख की फिर भी ना खाए तो हरकत है मूर्ख की करता है बरगद साल-दर-साल कदमताल ये … more →