<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><!-- generator="wordpress.com" -->
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>3665177 &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/3665177/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "3665177"</description>
	<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 16:57:58 +0000</pubDate>

	<generator>http://en.wordpress.com/tags/</generator>
	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:सुपात्र को दान देने वाला ही सच्चा वीर ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/03/24/chankya-nitisupatr-ko-daan-dene-valaa-hee-sachcha-vir/</link>
<pubDate>Mon, 24 Mar 2008 03:17:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/03/24/chankya-nitisupatr-ko-daan-dene-valaa-hee-sachcha-vir/</guid>
<description><![CDATA[१.अर्थ कार्यों का मूल होता है राज्यश्री ही राज्यशक्ति के कर्मों का मूल आधार होती है. लौकिक काम तो धन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>१.अर्थ कार्यों का मूल होता है </strong><br />
राज्यश्री ही राज्यशक्ति के कर्मों का मूल आधार होती  है. लौकिक काम तो धन-धान्य से संपन्न  होते हैं,जैसे पर्वत से नदियाँ निकलकर बहने  लगतीं हैं इसी प्रकार प्रवाहमान धन से समस्त काम होता है. जिस तरह रुका हुआ पानी गंदा हो जाता है वही   धन का भी होता है. इसलिए  धन का  प्रवाह कभी रोकना  नहीं चाहिऐ और उसका व्यय भी करते रहना चाहिए<br />
<strong>२.अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के पास सदभावना की वृति नहीं होती. </strong><br />
अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के मन में उथल-पुथल अधिक होती है और मानसिक अस्थिरता के  कारण  अच्छी   वृतियां  सक्रिय नहीं होतीं. भाग्य के भरोसे रहने वाला  मनुष्य जीवन के भौतिक साधनों का संग्रह करने से वंचित हो जाता है.<br />
<strong>३.दान में शूरता दिखाने वाले ही सच्चे वीर होते हैं.<br />
</strong>अपने पास जो संपति है उसमें से सुपात्र को दान देने वाले व्यक्ति ही वास्तविक वीर है. सच तो यह है कि हमारे पास संपत्ति या धन है वह किसी के पास जाना ही है. हम जो धन कमाते हैं उसे किसी न किसे रूप में कहीं खर्च अवश्य करते हैं, इस तरह जो धन है वह किसी की धरोहर होती है जो हम किसी को सौप्नते हैं. उसी तरह जो अचल संपतियाँ होती हैं वह भी हमारे बाद किसी न किसी को हस्तांरित होती हैं. आदमी अपने जीवन काल में धन और संपति को अपने सीने से चिपका कर रखना चाहता है, पर जो अपनी धन और संपति को किसी की धरोहर मानकर अपने जीवनकाल में ही सुपात्र को दान देता है उसे वीर ही कहा जाता है. </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:खुद पढ़कर समझें नहीं दूसरे को समझाएं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/24/sant-kabir-vani/</link>
<pubDate>Mon, 24 Dec 2007 01:31:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2007/12/24/sant-kabir-vani/</guid>
<description><![CDATA[पढी गुनी पाठक भये, समुझाया संसार आपन तो समुझै नहीं, वृथा गया अवतार संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>पढी गुनी पाठक भये, समुझाया संसार<br />
आपन तो समुझै नहीं, वृथा गया अवतार</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बहुत पढ़-लिखकर दूसरों को पढाने और उपदेश देने लगे पर अपने को नहीं समझा पाए तो कोई अर्थ नहीं है क्योंकि अपना खुद का जीवन तो व्यर्थ ही जा रहा है। </p>
<p>भावार्थ- आज के संदर्भ में भी उनके द्वारा यह सत्य हमें साफ दिखाई देता है, अपने देखा होगा कि दूसरों को त्याग और परोपकार का उपदेश देने वाले पाखंडी साधू अपने और अपने परिवार के लिए धन और संपत्ति का संग्रह करते हैं और अपनी गद्दी भी अपने किसी शिष्य को नहीं बल्कि अपने खून के रिश्ते में ही किसी को सौंपते हैं। ऐसे लोगों की शरण लेकर भी किसी का उद्धार नहीं हो सकता।</p>
<p>पढ़त गुनत रोगी भया, बडा बहुत अभिमान<br />
भीतर ताप जू जगत का, बड़ी न पड़ती सान<br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुछ लोग किताबें पढ़, सुन और गुनकर रोगी हो गये और उन्हें अभिमान हो जाता है। जगत को विषय-कामनाओं का ताप भीतर ताप रहा है, घड़ी भर के लिए शांति नहीं मिलती है।<br />
भावार्थ-आपने देखा होगा कि कुछ लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़कर दूसरों को समझाने लगते हैं। दरअसल उनको इस बात का अहंकार होता है कि हमें ज्ञान हो गया है जबकि वह केवल शाब्दिक अर्थ जानते हैं पर उसके भावार्थ को स्वयं अपने मन में उन्होने धारण नहीं किया होता है।<br />
<strong><br />
नोट- थके हारे ब्लोगर योग साधना शुरू करें-यह लेख अवश्य पढें उसका पता नीचे लिखा हुआ है ।</strong>http://dpkraj.blogspot.com</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
