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	<title>charitraheen &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/charitraheen/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "charitraheen"</description>
	<pubDate>Sun, 27 Dec 2009 13:28:01 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[ चरित्रहीन - The call girl]]></title>
<link>http://apurn.wordpress.com/2008/05/26/charitraheen-the-call-girl/</link>
<pubDate>Mon, 26 May 2008 06:43:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>Shubhashish Pandey</dc:creator>
<guid>http://apurn.wordpress.com/2008/05/26/charitraheen-the-call-girl/</guid>
<description><![CDATA[यौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो जाने को आज चला था पैसो से मैं यौवन का सुख पाने को दिल की धड़क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/ladyback.jpg"><img class="size-full wp-image-172 alignright" style="float:right;" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/ladyback.jpg" alt="" width="158" height="272" /></a></p>
<p>यौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो जाने को<br />
आज चला था पैसो से मैं यौवन का सुख पाने को</p>
<p>दिल की धड़कन भी थिरक रही थी यौवन के मोहक बाजे पे<br />
अरमानों के साथ मैं पंहुचा उस तड़ीता के दरवाजे पे</p>
<p>अंदर पंहुचा तो मानो हया ने भी मुँह फेर लिया<br />
चारो तरफ से मुझको यूँ रुपसियों ने था घेर लिया</p>
<p>हर कोई अपने यौवन के श्रृंगार से सुसज्जित था<br />
पर अब जाने क्यों मेरा मॅन थोडा सा लज्जित था</p>
<p>आहत होता था हृदय बहुत उन संबोधन के तीरों से<br />
पर अभी भी मॅन था बंधा हुआ संवेगों की जंजीरों से</p>
<p>तभी एक रूपसी पर अटकी मेरी दृष्टि थी<br />
लगता था मानो स्वयं वही सुन्दरता की सृष्टि थी</p>
<p>व्यग्र हुआ मॅन साथ में उसके स्वयं चरम सुख पाने को<br />
उस कनकलता को लिए चला अपनी कामाग्नि बुझाने को</p>
<p>जून के उष्ण महीने में बसंती सी हो गयी थी रुत<br />
कुछ ऐसे अपने तन को उसने मेरे समुख किया प्रस्तुत</p>
<p>खुला निमंत्रण था सपनो को आलिंगन में भरने का<br />
पर नहीं समझ पा रहा था कारण अपने अंतस के डरने का</p>
<p>अंतस को अनदेखा कर के प्रथम स्पर्श किया तन को<br />
उस मद से ज्यादा मद-मादित अब तक कुछ नहीं लगा मॅन को</p>
<p>खुद अंग ही इतने सुंदर थे लज्जा आ जाये गहनों को<br />
पर सहसा सहम गया देख उस मृग-नयनी के नयनो को</p>
<p style="text-align:left;">आँखों में कोई चमक नहीं चेहरे पे कोई भाव नहीं<br />
सपने कोई छीन गया जैसे जीने कोई चाह नहीं</p>
<p style="text-align:left;">प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों ने सारा मद तोड़ दिया पल में<br />
व्याकुल था अंतस जानने को क्या है इसके हृदयातल में</p>
<p style="text-align:left;">उसे देख अवस्था में ऐसी जब रहा नहीं गया मुझसे<br />
जो उबल रहा था अंतस में वो सब कुछ बोल दिया उससे</p>
<p style="text-align:left;">आँखे सूना चेहरा सूना क्यों सूना तेरा जीवन है<br />
इच्छाओं के संसार में क्यों अब लगता नहीं तेरा मॅन है</p>
<p style="text-align:left;">सिर्फ तन का मूल्य दिया हूँ मैं, मॅन पर मेरा अधिकार नहीं<br />
पर इतना तो बता ऐ कनकलता क्या तुझको मैं स्वीकार्य नहीं</p>
<p style="text-align:left;">हे कामप्रिया!,हे मृगनयनी! ऐसी क्या विवशता है तुझको<br />
जो मॅन से मेरे साथ नहीं फिर तन क्यों सौप दिया मुझको</p>
<p style="text-align:left;">शांत भाव से बोली वो यहाँ मॅन को कौन समझता है<br />
एक लड़की के लिए गरीबी ही उसकी सबसे बड़ी विवशता है</p>
<p style="text-align:left;">इतना कह के फिर शांत हो गयी कुछ समझ नहीं आया मुझको<br />
प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों से फिर मैंने झक-झोर दिया उसको</p>
<p style="text-align:left;">लड़ना ही जीवन है चाहे मुश्किल कितनी भी ज्यादा हो<br />
फिर नारी हो के क्यों तोड़ दिया तुमने अपनी मर्यादा को</p>
<p style="text-align:left;">कमी नहीं दुनिया में काम की पैसे इज्जत से कमाने को<br />
फिर क्यों बेच दिया खुद को बस अपनी क्षुधा मिटाने को ?</p>
<p style="text-align:left;">तड़प उठी वो मेरे ऐसे प्रश्नों के आघातों से<br />
मुझसे बोली क्या समझाना चाहते हो इन बातों से</p>
<p style="text-align:left;">शौक नहीं था वेश्या बन बाज़ारों में बिक जाने का<br />
अपने ही हाथों से खुद अपना आस्तित्व मिटाने का</p>
<p style="text-align:left;">पर आँखों के सारे सपने एक रोज बह गए पानी में<br />
जब माँ-बाप,घर-आँगन सब खो गए सुनामी में</p>
<p style="text-align:left;">फिर एक ही रात में बदल गयी मेरी दुनिया की तस्वीर यहाँ<br />
कठपुतली बना के बहुत नचाई मुझको मेरी तक़दीर यहाँ</p>
<p style="text-align:left;">दिन अच्छे हो जाते हैं राते भी अच्छी लगती हैं<br />
भरे पेट को सिद्धांत की हर बातें अच्छी लगती हैं</p>
<p style="text-align:left;">पर मई-जून की गर्मी से जब देह झुलसने लगती है<br />
रोटी के टुकड़े खोज रही आँखे कुछ थकने लगती हैं</p>
<p style="text-align:left;">भूख की आग में तड़प-तड़प मुश्किल से दिन कट पाते हैं<br />
अपनी बेबसी में घुट-घुट कर सपनों को जलाती रातें है</p>
<p style="text-align:left;">जब नीली छत के सिवा सर पर कोई और छत नहीं होती है<br />
कपडो के छेदों से झाँक रही मजबूरी खुद पे रोती है</p>
<p style="text-align:left;">गिद्धदृष्टि से देहांश देखता जब कोई चीर-सुराखों से<br />
तब मॅन छलनी हो जाता है तीर विष बुझे लाखों से</p>
<p style="text-align:left;">जब इन हालातों से लड़ लड़ कर जवानी थकने लगती है<br />
तब मर्यादा और सम्मान की ये बातें बेमानी लगने लगतीं है</p>
<p style="text-align:left;">लोगो ने जाने कितनी बार मन को निर्वस्त्र कर डाला था<br />
पर फिर भी किसी तरह मैंने अपना तन संभाला था</p>
<p style="text-align:left;">पर एक दिन कुचल गयी कली कुछ मदमाते क़दमों से<br />
कुछ और नहीं अब बाकी था इन किस्मत के पन्नों में</p>
<p style="text-align:left;">खुद को ख़त्म कर लेने का निश्चय कर लिया मेरे मॅन ने<br />
पर लाख चाहने पर भी दिल का साथ नहीं दिया हिम्मत ने</p>
<p style="text-align:left;">पर जीने का मतलब मेरे लिए हर मोड़ पर एक समझौता था<br />
फिर इस जगह से ज्यादा गया गुजरा मेरे लिए क्या हो सकता था</p>
<p style="text-align:left;">इतना गिर गयी हूँ मैं कैसे ये सवाल हमेशा डसता था<br />
लेकिन मेरे पास भी इसके सिवा अब और कहाँ कोई रस्ता था</p>
<p style="text-align:left;">उस वक़्त बहुत मैं रोई थी हद से ज्यादा चिल्लाई थी<br />
दूसरों के हाथ आस्तित्वहीन हा जब खुद को मैं पाई थी</p>
<p style="text-align:left;">पर रो-रो के सारे आंसू एक रोज़ बहा डाला मैंने<br />
हर अरमान का गला घोंट कफ़न ओढा डाला मैंने</p>
<p style="text-align:left;">पर अब पेट भर जाने पर भी जब नीद नहीं आती रातों को<br />
नहीं सँभाल पता है ये दिल तब इन बिखरे जज्बातों को</p>
<p style="text-align:left;">क्यों नहीं सजा सकती हूँ मैं दुल्हन बन किसी आँगन को<br />
क्यों प्रेयसी बनने का अधिकार नहीं मिला मुझ अभागन को</p>
<p style="text-align:left;">काश कि मैं भी किसी को प्राणों से प्यारा कह पाती<br />
काश कि मैं भी किसी के हृदयातल में रह पाती</p>
<p style="text-align:left;">काश कि मेरे आँचल में भी एक अंश मेरा अपना होता<br />
ममता से पागल हो जाती एक बार जो मुझको माँ कहता</p>
<p style="text-align:left;">इतना कहते कहते ही उसकी आँखे भर आई थी<br />
मैं भी था खामोश वहाँ बस एक उदासी छाई थी</p>
<p style="text-align:left;">फिर मुझमे हिम्मत ही नहीं थी उससे कुछ कह पाने को<br />
धीमे क़दमों से लौट गया वापस गंतव्य पे जाने को</p>
<p style="text-align:left;">सोचता रहा ये रास्ते भर होके मानववृत्ति के अधीन<br />
वो चरित्रहीन थी या फिर दुनिया ही है चरित्रहीन</p>
<p style="text-align:left;">&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.  Shubhashish(2006)</p>
<p>In printable format<br />
<a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/chtf1_0.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-173" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/chtf1_0.jpg?w=74" alt="" width="74" height="96" /></a> <br />
<a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/cht2f_0.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-174" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/cht2f_0.jpg?w=74" alt="" width="74" height="96" /></a><br />
<a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/chtf3.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-175" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/chtf3.jpg?w=74" alt="" width="74" height="96" /></a><br />
<a href="http://apurn.files.wordpress.com/2008/05/chtf4.jpg"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-176" src="http://apurn.wordpress.com/files/2008/05/chtf4.jpg?w=74" alt="" width="74" height="95" /></a></p>
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