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October 2010

(Budapest, October 2010)

They’ve changed me, Q, these past ten days have. They’ve made me question a lot about myself, as also the surroundings that I have chosen to be in right now. 812 more words

डा. आंबेडकर का मिशन राजकीय समाजवाद है - (कँवल भारती)

डा. आंबेडकर का मिशन ‘राजकीय समाजवाद’ था. मायावती जी के भक्त, जिन्होंने डा. आंबेडकर के साहित्य की ABC भी नहीं पढ़ी है, अगर चाहें तो उनकी एक किताब “राज्य और अल्पसंख्यक” जरूर पढ़ लें, वरना बहस में वे हमेशा मात खायेंगे. मैं यहाँ स्वयं कुछ न कह कर डा. तेज सिंह के शब्दों को प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिनका अभी कुछ दिनों पहले निधन हुआ है. यह उनके प्रति एक श्रद्धांजलि भी है.


“डा. आंबेडकर सर्वहारा की तानाशाही को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हैं और उसके स्थान पर ‘राजकीय समाजवाद’ की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं. उनकी ‘राजकीय समाजवाद’ की अवधारणा लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली के साथ मिल कर बनी है. आर्थिक शोषण को समाप्त करने के लिए मूल उद्योगों का स्वामित्व और प्रबंध, राज्य के हाथ में रहे और बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया जाये तथा कृषि क्षेत्रों में मालिकों, काश्तकारों आदि को मुआवजा देकर सरकार भूमि का अधिग्रहण करे और उस पर सामूहिक खेती कराये. डा. आंबेडकर ‘राजकीय समाजवाद’ द्वारा इस लक्ष्य को पाने का कार्यक्रम पेश कर रहे थे. इसलिए उन्होंने उद्योगों के निजीकरण का तीव्र विरोध किया, (क्योंकि) इससे सामाजिक विषमता बढ़ने का खतरा सामने था. निजीकरण की वजह से औद्योगिकीकरण तेजी से नहीं हो पायेगा. इसलिए उनका दृढ़ मत था कि भारत में तेजी से औद्योगिकीकरण करने के लिए राजकीय समाजवाद अनिवार्य है. भले ही डा. आंबेडकर समाजवादी क्रांति में आस्था न रखते हों, पर वे जनता की जनवादी क्रांति के लक्ष्य के काफी करीब पहुँच गये थे, वे सामंती व्यवस्था को ध्वस्त करके (राजकीय) पूंजीवादी-जनवादी क्रांति का पुरजोर समर्थन कर रहे थे. डा. आंबेडकर अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ में किये जा रहे संपत्ति, कृषि और उद्योगों के राष्ट्रीयकरण से पूरी तरह सहमत थे और मानते थे कि सभी को आवश्यक भूमि प्राप्त न होने की स्थिति में सोवियत संघ के ढंग पर सामूहिक कृषि करने के आलावा कोई विकल्प नहीं है. क्या कारण है कि इन सबके बावजूद डा आंबेडकर के प्रगतिशील, लोकतान्त्रिक और जनवादी विचारों का समर्थन नहीं लिया जा रहा था और आज भी नहीं किया जा रहा है.” (आज का दलित साहित्य, पृष्ठ 111)


मायावतीवादी दलित साथियों से आग्रह है कि वे बहिन जी से पूछें कि क्या उन्होंने डा आंबेडकर के इस मिशन को अपनी राजनीति में शामिल किया है? सच तो यह है कि उन्होंने यूपी में निजीकरण का खुला सामंती खेल खेला. सरकारी क्षेत्र की लाभ में चल रहीं औद्योगिक ईकाईयों को बेच डाला. स्कूलों का सबसे ज्यादा निजीकरण किया और सरकारी स्कूलों का सत्यानाश कर दिया.

Hillele.org

Land, Caste and Sexual Violence Against Dalit Girls and Women in Haryana - A report by WSS

“Speak! The Truth Is Still Alive” is an effort to expose and analyse the continuing onslaught of sexual violence against the Dalit girls and women in the state of Haryana in North India. 122 more words

Publications

The fiction of SC status for converts - Rakesh Sinha

“Is it not incomprehensible that  Dalit Christians/Muslims want to be delisted from the OBC list and included under the presidential order of 1950? Besides, no one has a convincing answer as to what should be  the cut-off date for SC converted to Christianity and Islam.  654 more words

India

Day 12- Hospitality and Glass Houses

Thursday July 10

Pharping Village

Dambar’s Silver Factory

Another early start saw us on the road to Pharping, a village just outside Kathmandu. The women in Pharping have set up their own organisation, the Women Empowered Society for Development. 552 more words

Nepal

Ambedkar and Gandhi

The seminal text Annihilation of Caste, self- published almost 78-years-ago by Dr Bhimrao Ramji Ambedkar was republished by Navayana Publishing Pvt Ltd earlier this year as an annotated version, with a hotly debated introduction by Booker-awardee Ms Arundhati Roy. 1,555 more words

Book Review