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	<title>editoriyal &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/editoriyal/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "editoriyal"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Dec 2009 00:40:52 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[विदुर नीति-अर्थ प्राप्ति के लिए धर्म का पालन करें (arth aur dharm-hindu adhyamik sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/11/29/money-and-religion-hindu-dharm-sandesh/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 06:31:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/11/29/money-and-religion-hindu-dharm-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः। तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।। हिंदी में भ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।<br />
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।</p>
<p><strong>अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।<br />
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक  पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>यह कहना गलत है धर्म के मार्ग पर अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्म-ईमानदारी, सहजता, परमार्थ, और अपने कर्तव्य से प्रतिबद्धता-का परिणाम ही अर्थ की प्राप्ति ही है।  यह अलग बात है कि जल्दी अमीर बनने या आवश्यकता से अधिक धनार्जन के के लिये लोग अपने जीवन में आक्रामक और बेईमानी की प्रवृत्ति अपना लेते हैं।  इस संसार में ऐसे लोग भी है जो बेईमानी से धन कमाकर कथित रूप से प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का आकर्षण समाज के युवाओं को आकर्षित करता है पर उनको यह समझ लेना चाहिये कि बेईमान और भ्रष्ट लोगों को धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की शक्ति की वजह से सामने कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे सभी लोग उनके प्रति घृणा का भाव दिखाने से नहीं चूकते।  फिर भ्रष्ट और बेईमान लोग का धन जिस तरह बर्बाद होता है उसे भी देखना चाहिये। </p>
<p>नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जिस व्यक्ति ने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह इस संसार में व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थितियों की प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह समझ जाते हैं। इस ज्ञान से वह विकृतियों से परे रहने में सफल रहते हैं और प्रकृतियां उनका स्वतः ही मार्ग प्रशस्त करती हैं। अत: जितना हो सके योग साधना तथा अन्य उपायों द्वारा अपनी बुद्धि को शुद्ध रखने का प्रयास करना चाहिए।<br />
<b>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://anant-shabd.blogspot.com</b></p>
<p>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति  शतक-धन की ऊष्मा से रहित मनुष्य क्या रह जाता है (heat of money-hindu sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/10/29/hindi-religion-messege-on-money/</link>
<pubDate>Thu, 29 Oct 2009 05:22:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/10/29/hindi-religion-messege-on-money/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि&nbsp; &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong></strong><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि&#160;</strong><br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong></p>
<p><strong></strong><strong>तानींद्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव।<br />
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षपोन सोऽष्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>मनुष्य की इंद्रिया नाम,बुद्धि तथा अन्य सभी गुण वही होते हैं पर धन की उष्मा से रहित हो जाने पर पुरुष क्षणमात्र में क्या रह जाता है? धन की महिमा विचित्र है।<br />
<strong></strong><strong>वर्तमान&#160;सन्दर्भ&#160;&#160;में संपादकीय व्याख्या-</strong> इस सृष्टि को परमात्मा ने बनाया है पर माया की भी अपनी लीला है जिस पर शायद किसी का भी बस नहीं है। माया या धन के पीछे सामान्य मनुष्य हमेशा पड़ा रहता है। चाहे कितना भी किसी के पास आध्यत्मिक ज्ञान या कोई दूसरा कौशल हो पर पंच तत्वों से बनी इस देह को पालने के लिये रोटी कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है। अब तो वैसे ही वस्तु विनिमय का समय नहीं रहा। सारा लेनदेन धन के रूप में ही होता है इसलिये साधु हो या गृहस्थ दोनों को ही धन तो चाहिये वरना किसी का काम नहीं चल सकता। हालांकि आदमी का गुणों की वजह से सम्मान होता है पर तब तक ही जब तक वह किसी से उसकी कीमत नहीं मांगता। वह सम्मान भी उसको तब तक ही मिलता है जब तक उसके पास अपनी रोजी रोटी होती है वरना अगर वह किसी से अपना पेट भरने के लिये धन भिक्षा या उधार के रूप में मांगे तो फिर वह समाप्त हो जाता है।<br />
वैसे भी सामान्य लोग धनी आदमी का ही सम्मान करते है। कुछ धनी लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने गुणों की वजह से पुज रहे हैं। इसी चक्कर में कुछ लोग दान और धर्म का दिखावा भी करते हैं। अगर धनी आदमी हो तो उसकी कला,लेखन तथा आध्यात्मिक ज्ञान-भले ही वह केवल सुनाने के लिये हो-की प्रशंसा सभी करते हैं। मगर जैसे ही उनके पास से धन चला जाये उनका सम्मान खत्म होते होते क्षीण हो जाता है। </p>
<p>इसके बावजूद यह नहीं समझना चाहिये कि धन ही सभी कुछ है। अगर अपने पास धन अल्प मात्रा में है तो अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये। बस मन में शांति होना चाहिये। दूसरे लोगों का समाज में सम्मान देखकर अपने अंदर कोई कुंठा नहीं पालना चाहिये। यह स्वीकार करना चाहिये कि यह धन की महिमा है कि दूसरे को सम्मान मिल रहा है उसके गुणों के कारण नहीं। इसलिये अपने गुणों का संरक्षण करना चाहिये। वैसे यह सच है कि धन का कोई महत्व नहीं है पर वह इंसान में आत्मविश्वास बनाये रखने वाला एक बहुत बड़ा स्त्रोत है। सच<br />
&#160;तो यह है कि खेलती माया है हम सोचते हैं कि हम खेल रहे हैं।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;&#160;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
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<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[स्त्रियों  की कम संख्या उनके प्रति बढ़ते अपराधों के लिये जिम्मेदार-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/06/27/nari-ki-khilaf-badhte-apraadh-hindi-alekh/</link>
<pubDate>Sat, 27 Jun 2009 12:07:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/06/27/nari-ki-khilaf-badhte-apraadh-hindi-alekh/</guid>
<description><![CDATA[देश में प्रतिदिन ही महिलाओं के प्रति किये गये अपराध समाचारों की सुर्खियां बन रहे हैं। हालत यह हो गयी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>देश में प्रतिदिन ही महिलाओं के प्रति किये गये अपराध समाचारों की  सुर्खियां बन रहे हैं।  हालत यह हो गयी है कि एक दिन में पांच पांच समाचार आते हैं और जब अपराधी पकड़े जाते हैं तो यह याद रखना कठिन हो जाता है कि आखिर वह किस घटना के लिये पकड़े गये हैं।  इस पर तमाम तरह के आलेख और रिपोर्ताज पढ़ने और सुनने के बाद यह नहीं लगता कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग इसे कन्या भ्रुण हत्याओं से जोड़कर देख पा रहा हो।<br />
जो नियमित रूप से समाचार पत्र पत्रिकायें पढ़ते हैं उनको अच्छी तरह याद होगा जब आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व कन्याओं की भ्रुण हत्या का दौर शुरु हुआ था तब सामाजिक विशेषज्ञों ने स्पष्टतः आज के दृश्य की कल्पना कर बता दी थी।  एक लंबे समय तक यह दौर चला फिर इसके लिये कानून भी बना पर सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कन्याओं की भ्रुण हत्याओं का दौर बंद हुआ। हालत यह है कि एक समय तक पहली संतान के रूप में  कन्या होना भी ठीक  मानने वाले इस समाज में अब ऐसे भी लोग हैं जो पहली संतान के रूप में भी बेटा चाहते हैं और जरूरत पड़े तो कन्या भ्रुण हत्या करा देते हैं। ऐसी जानकारियां समाचार पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर आती रहती हैं।</p>
<p>महिलाओं पर तेजाब फैंकने या उनके साथ जोर जबरदस्ती की घटनाओं पर विश्लेषण करने वाले अल्पज्ञानी बुद्धिजीवी हर घटना में अपराधी और पीड़िता की स्थितियों के आंकलन में लग जाते हैं। कुछ इसे गिरती कानूनी व्यवस्था ं तो कुछ इसे पहनावे और लड़कियों की आजादी को मानते हैं।  इधर इंटरनेट पर ऐसी बहसें देखने को मिलती हैं जिससे लगता है कि वाद और नारों की राह पर चले लेखक और बुद्धिजीवी अपने चिंतन से कम अपने गुरुओं की सोच पर अधिक चलते हैं।<br />
एक कहता है कि<br />
<strong>1.लड़कियां उकसावे वाले कपड़े पहनती हैं।<br />
2.वह एक नहीं अनेक लड़के मित्र बनाती हैं जिससे आपस में कभी न कभी तनाव बनता है।<br />
3.माता पिता अपनी व्यस्तताओं के चलते लड़कियों की निगाहबानी नहीं कर पाते जिससे वह अपने युवावस्था के कारण ऐसी गलतियां कर बैठती हैं जो अततः उनके लिये घातक होती है।</strong><br />
दूसरा कहता है कि<br />
<strong>1.समाज अभी भी असभ्य है उसका लड़की के प्रति नजरिया नहीं बदला।<br />
2.जैसे जैसे धन की प्रचुरता बढ़ रही है लड़कियों के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं।<br />
3. कानून व्यवस्था की स्थिति खराब है और अपराधियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही नहीं हो रही। पुरुष समुदाय इसके लिये पूरी तरह से जिम्मेदार है। </strong><br />
हो सकता है कि ये सभी  लेखक और बुद्धिजीवी सही हों पर वह इन घटनाओं के दृश्यव्य रूप पर ही अपना ध्यान केंद्रित करने से समस्या का हल नहीं हो सकता।<br />
25 वर्ष पूर्व ही सामाजिक विशेषज्ञों ने कहा था कि जिस दहेज समस्या से पीड़ित होकर समाज कन्या भ्रुण हत्याओं के दौर को स्वीकार कर रहा है वह तो हल नहीं होगी बल्कि इससे उनके प्रति जो अपराध होंगे वह अधिक भयानक होंगे।<br />
उनका कहना था कि<br />
<strong>1.अभी लड़कियां पर्याप्त मात्रा में हैं इसलिये लड़के इधर उधर नजरें मारकर काम चलाते हैं। एक नहीं तो दूसरी नहंीं तो तीसरी। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके संपर्क में अधिक लड़कियां आती हैं और वह उनको देखते हैं इसलिये उनमें आक्रामकता नहीं आती। जब यह संख्या कम हो जायेगी तक एक लड़की पर अनेक लड़कों की नजर होगी। इससे आकर्षण में तीव्रता आयेगी और ऐसे में अगर लड़की की तरफ से उनको निराशा हाथ लगती है तो वह उस पर आक्रमण करेंगे।<br />
2.रास्ते पर अनेक लड़कियों को होने से भी लड़के व्यस्त रहते हैं पर जब उनकी संख्या सीमित होगी तो वह चलते फिरते आक्रमण करेंगे।<br />
3.दहेज प्रथा बिल्कुल हल नहीं होगी। उल्टे लड़कियां कम होने से उनके माता पिता अधिक अच्छा वर चाहेंगे। भारत में  धन के असमान वितरण से वैसे ही समस्यायें बढ़ रही है। इधर जो अच्छे वर और घर होंगे वह अधिक दहेज की मांग करेंगे। इससे उल्टे इससे बेमेल विवाहों को प्रोत्साहन मिलेगा क्योंकि जिसके पास अधिक धन होगा वह अधिक धन और सुंदर लड़की की मांग करेगा इससे लड़कों की आयु बढ़ेगी और ऐसे में उनको छोटी आयु की लड़कियां भी ब्याह करने को मिल जायेंगी। </strong><br />
सामाजिक विशेषज्ञों की चेतावनी के लिये शब्द कुछ भी रहे हों पर उनका आशय यही था कि कम लड़कियां होने से एक ऐसा संकट आयेगा जिससे बचना कोई आसान काम नहीं होगा। हम यहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को ध्यान में रखते हुए एक बार अपने को दृष्टा और अपनी देह को पंच तत्वों से बनी एक वस्तु मान लें। अर्थात हम मान लें कि स्त्री पुरुष देह भी एक वस्तु हैं-नारीवादी लेखक इस बात तो ध्यान दें यहां यह बात आत्मा को दृष्टा मानकर कही जा रही है-तो भी मांग पूर्ति का नियम लागू होता है।  पुरुष अधिक होंगे तो उनकी कम और स्त्री संख्या में कम है तो उसकी मांग अधिक होगी।  आप अपने देश में जलस्त्रोतों पर पानी के लिये और सड़कों पर वाहन टकराने पर होने वाले हिंसक संघषों पर ध्यान दें तो पानी कम नहीं है बल्कि मांग बढ़ गयी है पर आपूर्ति उस ढंग से नहीं हो पाती। उसी तरह सड़कों पर वाहन अधिक हो गये हैं पर वह चौडी नहीं हुई उसी तरह  आपको लगेगा कि स्त्री पुरुषों की संख्या में अनुपातिक अंतर ही इस संकट के लिये जिम्मेदार हैं। परिवार नियोजन रखना अच्छी बात है पर बच्चे की भ्रुण हत्या एक ऐसा अपराध है जिसका परिणाम तत्काल नहीं पता लगता पर आज समाज जिन हालतों में गुजर रहा है उससे हम समझ सकते हैं कि आखिर वह इस हालत में क्यों आया?<br />
जब हर मनुष्य के दृष्टा होने की बात की है तो एक घटना याद आ रही है-नारीवादियों को शायद यह बुरी लगे पर वह इस लेखक के साथ वैचारिक धरातल पर खड़े हों तो सहमत होंगे। खासतौर से नारीवादी लेखिकाओं से अपेक्षा तो है कि वह इस घटना में आयु और उसकी प्रासंगिकता पर विचार करेंगी।<br />
उस दिन एक सड़क पर यह लेखक अपने रात को नौ बजे स्कूटर पर आ रहा था कि एक जगह गड्ढा आ गया। वह बड़ा था और उससे दूर हटकर निकलने के लिये लेखक को रुकना पड़ा।  सड़क पर कोई खास भीड़ नहीं थी। एक आदमी उसी गडढे के पास से गुजर रहा था।  उसने इस लेखक से कहा-‘अच्छा हुआ यह गडढ़ा आपको दिख गया वरना इसमें कई गिर चुके हैं।’<br />
यह लेखक जवाब में केवल हंस पड़ा। उसी समय दो लड़कियां वहां से गाड़ी पर निकली। तब वह सज्जन फिर बोले-‘पता नहीं आजकल माता पिता कैसे हैं। आप बताईये क्या इस तरह रात को लड़कियों को बाहर जाने की इजाजत दी जानी चाहिये?  अरे, करोड़ो रुपये आदमी संभाल कर रखता है पर देखिये उससे कही अधिक कीमती इस तरह बिटियायें बाहर घूमने के लिये छोड़ देता है।’<br />
लेखक ने पूछा-‘आप उनको जानते हैं?’<br />
उन सज्जन ने कहा-‘नहीं! जिस तरह आजकल की घटनायें हो रही हैं उनको देखते हुए यह बात कह रहा हूं। अरे भई, आप ही बताईये जवान लड़कियों की रक्षा का उपाय उनके घरवालों को नहीं करना चाहिये?’<br />
यह सही है कि युवा विवाहिताओं के प्रति भी अपराध होते हैं पर अविवाहित युवतियों के प्रति अपराध हमेशा ही भारी संकट का कारण बनता है।<br />
आप अगर लेखक हैं तो सड़क पर खड़े होकर बहस नहीं कर सकते।  कन्या भ्रुण हत्याओं के बारे में विशेषज्ञों की चेतावनी को अनदेखा करते हुए यह समाज जिस तरह आगे बढ़ता गया यह घटनायें उनका परिणाम है। इन घटनाओं की कोई भी वजह हो सकती है पर यह उसका नहीं बल्कि बरसों पहले चले इस रिवाज-हां, समाज में एक तरह से कन्या भ्रुण हत्या रिवाज ही बन गया है-का ही परिणाम है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://anantraj.blogspot.com">‘अनंत शब्दयोग’</a>पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।<br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">1.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका</a><br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-जो विद्या काम की न आये उसे पाना व्यर्थ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/06/02/chankya-niti-jo-vidhya-kam-n-aaye/</link>
<pubDate>Tue, 02 Jun 2009 03:11:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/06/02/chankya-niti-jo-vidhya-kam-n-aaye/</guid>
<description><![CDATA[नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;- हर्त ज्ञार्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>नीति विशारद चाणक्य कहते हैं  कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</strong><br />
<strong>हर्त ज्ञार्न क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नर।<br />
हर्त निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष ह्यभर्तृकाः ।।</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> जिस ज्ञान को आचरण में प्रयोग न किया जाये वह व्यर्थ है।  अज्ञानी पुरुष हमेशा ही संकट में रहता हुआ ऐसे ही शीघ्र नष्ट हो जाता है जैसे सेनापति से रहित सेना युद्ध में स्वामीविहीन स्त्री जीवन में परास्त हो जाती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> मनुष्य का सेनापित उसका ज्ञान होता है।  उसके बिना वह किसी का गुलाम बन जाता है या फिर पशुओं की तरह जीवन जीता है।  ज्ञान वह होता है जो जीवन के आचरण में लाया जाये।  खालीपीली ज्ञान होने का भी कोई लाभ नहीं है जब तक उसको प्रयोग में न लाया जाये। हमारे देश में ज्ञानोपदेश करने वाले ढेर सारे लोग है जो ‘दान, तत्वज्ञान, तपस्या, धर्म, अहिंसा, प्रेम, और भक्ति की महिमा’ का बखान करते हैं पर उनका जीवन उसके विपरीत विलासिता, धन संग्रह, और अपने बड़े होने के अभिमान में व्यतीत होता है।  देखा जाये तो उनके लिये ज्ञान विक्रय और उनके अनुयायियों के लिये क्रय की वस्तु होती है।  उसके आचरण से न तो गुरु का और न ही शिष्य का लेना देना होता है। </p>
<p>यही कारण है कि हमारा समाज जितना धार्मिक माना जाता है उतना ही व्यवसायिक भी।  भारतीय प्राचीन ग्रथों का तत्वज्ञान का मूल सभी जानते हैं पर उसके भाव को कोई नहंीं जानता। अनेक गुरु ज्ञानोपदेश करते हुए बीच में ही यह बताने लगते हैं कि ‘धर्म के प्रचार के लिये धन की आवश्यकता है’। वह अपने भक्तों में दान और त्याग का भाव पैदा कर अपने लिये धन जुटाते है। भक्त भी अपने मन में स्थित दान भाव की शांति के लिये उनकी बातों में आकर अपनी जेब ढीली कर देते हैं।  कथित गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान के पथ पर लाकर उनका भौतिक दोहन कर फिर उनको अज्ञान के पथ पर ढकेल देते हैं।  यही कारण है कि अध्यात्मिक गुरु कहलाने वाला अपना देश भौतिकता के ऐसे जंजाल में फंस कर रह गया है जहां विकास केवला एक नारा है जिसकी अंतिम मंजिल विनाश है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">3.अनंत शब्द योग</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य का अर्थशास्त्र-घमंड से शुरू काम की नाकामी से व्यर्थ का तनाव होता है ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/05/30/ghaman-ka-kam-kautilya-ka-artshastra/</link>
<pubDate>Sat, 30 May 2009 03:26:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/05/30/ghaman-ka-kam-kautilya-ka-artshastra/</guid>
<description><![CDATA[प्रारब्धानि यथाशास्त्रं कार्याण्यासनबुद्धिभिः। बनानीय मनोहारि प्रयच्छन्त्यचिसत्फलम्।। हिंदी में भावा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>प्रारब्धानि यथाशास्त्रं कार्याण्यासनबुद्धिभिः।<br />
बनानीय मनोहारि प्रयच्छन्त्यचिसत्फलम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>जिस कार्य को शास्त्रों के अनुसार बुद्धिपूर्वक संपन्न करने का प्रयास किया जाता है वह शीघ्र फल दिलाने वाले होते हैं।<br />
<strong>सम्यगारभ्यमानं हि कार्ये यद्यपि निष्फलम्।<br />
न तत्तथा तापयपि यथा मोहसनीहितम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>भली प्रकार प्रारंभ किया कोई काम या अभियान निष्फल भी हो जाये तो उससे मन को कष्ट नहीं होता जैसा कि मोह या अभिमान के वशीभूत होकर करने से होता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-</strong>अपने जीवन में कोई उद्देश्य निर्धारित करने से पहले उसका सही स्वरूप, अपने सामथ्र्य तथा उससे प्राप्त होने वाले फल  पर विचार कर लेना चाहिए।  कोई व्यक्तिगत कार्य बिना किसी उद्देश्य के केवल इसलिये नहीं प्रारंभ करना चाहिए कि उसके न करने से अपने परिवार, रिश्तेदार या मित्र समूह में प्रतिष्ठा खराब होगी। यह भ्रम हैं। अगर हमें कार नहीं चलाना आता तो केवल इसलिये दिखाने के लिये उसे चलाने का प्रयास नहीं करना चाहिए कि किसी व्यक्ति ने हमको चुनौती दी है या किसी के सामने अपनी कला का अनावश्यक प्रदर्शन करना है। अगर आप देश में दुर्घटनाओं का अवलोकन करें तो पायेंगे कि उसमें अधिकतर शिकार लोग अपने सामथ्र्य से अधिक कार्य करने के लिये प्रेरित होने के कारण कष्ट में आये। </p>
<p>तात्पर्य यह है कि अपना दिमागी संतुलन बनाये रखना चाहिए।  किसी छोटे या बड़े काम को पूरी तरह से विचार कर प्रारंभ करना चाहिए। ऐसे काम में नाकाम होने पर भी दुःख नहीं होता। तब हमें इस बात का अफसोस नहीं होता कि हमने अपने कर्म में कोई कमी की। अगर बिना विचारे काम प्रारंभ किये जाते हैं तो उनमें शक्ति भी अधिक खर्च होती है और उनमें नाकामी मन को बहुत परेशान भी कर देती है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[मनुस्मृतिः हिंसा से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं होता  ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/05/10/hinsa-se-uddeshya-poora-nahin-hota-manu/</link>
<pubDate>Sun, 10 May 2009 06:26:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्। न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।<br />
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये। </p>
<p><strong>यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।<br />
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।</strong><br />
हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है वह अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य और परमार्थ और दूसरा असत्य और हिंसा।  यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है।  श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।<br />
वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है।  वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आम ब्लाग लेखक के लिये कमाई अभी दूर की कौड़ी-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/04/26/incom-in-hindi-blog-line-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 26 Apr 2009 06:43:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/04/26/incom-in-hindi-blog-line-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[उस दिन चिट्ठकार चर्चा का नियमित ईमेल पढ़ा-यह ईमेल इसके सदस्यों को नियमित भेजा जाता है-जिसमें तमिल बच]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>उस दिन चिट्ठकार चर्चा का नियमित ईमेल पढ़ा-यह ईमेल इसके सदस्यों को नियमित भेजा जाता है-जिसमें तमिल बच्चों द्वारा हिंदी सीखने की बात कही गयी थी।  यह कोई नई खबर नहीं है क्योंकि अब कई ऐसे तमिल भाषी है जो हिंदी में लिखते और पढ़ते हैं-शायद इस ईमेल का आशय यह   हो सकता है कि अब अधिक दिलचस्पी से  तमिल भाषी बच्चे इसे पढ़ने लगें हों।   इस प्रसंग का उल्लेख इसलिये करना ठीक लगा क्योंकि ईमेल पढ़ते हुए ही एक घटना इस लेखक के जेहन में आयी थी और वह कोई अधिक पुरानी नहीं थी। उस पर लिखने का दिल था पर इस ईमेल को देखकर यह प्रबल विचार उठा कि उस पर लिखा जाये।  </p>
<p>एक मित्र सज्जन ने कुछ इस तरह एक घटना सुनाई। एक महिला के दो लड़के हैं एक अमेरिका में दूसरा मध्यप्रदेश में रहता है। मध्यप्रदेश में रहने वाला लड़का अपनी मां को अमेरिका में छोटे बेटे की तरफ रवाना करने के लिये चेन्नई गया।  उसने विमानतल से अपनी मां को वायुयान में बिठाकर रवाना किया पर उसे अपनी मां को लेकर एक चिंता थी जो शायद नई थी। इससे पहले भी वह कई बार अमेरिका अकेले जा चुकी है पर इस बार कोई अन्य साथ जाने वाला यात्री नहीं था दूसरा उस महिला को हीथ्रो हवाई अड्डे पर टर्मिनल बदलना था जिसमें भाषा आड़े आने वाली थी। तमिल भाषी महिला को अंग्रेजी कम ही आती है पर हिंदी का ठीकठाक ज्ञान है।<br />
उस महिला के बड़े पुत्र को इस टर्मिनल बदलने के दौरान ही मां के लिये चिंतायें थीं। इन टर्मिनलों पर यात्रियों की सहायता के लिये बहुभाषी होते हैं पर समस्या उनसे संपर्क की थी। </p>
<p>बहरहाल वह भद्र महिला हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरी कोई दुभाषिया ढूंढने लगी क्योंकि उसको दूसरे टर्मिलन पर जाने के लिये बस का पता पूछना था।  एक दुभाषिया उससे मिला तो उसने उससे कहा कि‘आधे घंटे में आता हूंं।’<br />
महिला बेबस खड़ी रह गयी। फिर उसने वहां खड़ी एक कर्मचारी से टूटी फूटी अंग्रेजी में उस बस का पता पूछा तो उस लड़की ने बता दिया।  वह उस बस में चढ़कर दूसरे टर्मिनल पर पहुंची।  वहां फिर वह कोई दुभाषिया ढूंढने लगी। वहां तमाम कर्मचारी थे जो चेहरे से ही विभिन्न देशों के लग रहे थे।  वहां एक दुभाषिया उस महिला के पास आया और अंग्रेजी में पूछा कि ‘क्या आप भारत से आईं हैं।’<br />
महिला ने कहा-‘हां!’<br />
वह दुभाषिया उस समय औपचारिक रूप से पेश आ रहा था। फिर उसने महिला से हिंदी  में पूछा-क्या आपको हिंदी आती है।’<br />
उस भद्र की महिला की बाछें खिल उठीं और बोली-हां, आती है।’<br />
वह दुभाषिया औपचारिकता की बजाय आत्मीयता से बोला-आपने अपने कागजों में व्हील चेयर की मांग की है। मैं अभी मंगवाता हूं।  अच्छा आपने शाकाहारी भोजन की मांग की है यह बात मैं वायुयान के कर्मचारियों को बता दूंगा। अभी आप आराम से उधर बैठ जाईये। आप बेफिक्र होकर अपनी यात्रा जारी रखिये।’<br />
महिला जब तक वहां से रवाना नहीं हुई तब तक उसकी वहां अनेक कर्मचारियों से हिंदी में बातचीत हुई।  वह बहुत खुश थी। निर्धारित समय पर वायुयान से वह अमेरिका से रवाना हो गयी।  वहां पहुंचकर उसने अपने बड़े बेटे को  अपनी पूरी यात्रा का वृतांत फोन पर सुनाया और कहा-‘जब उस लड़के ने हिंदी मेेंं बात की तो मुझे बहुत अच्छा लगा। उससे पहले तो बहुत अकेलापन लग रहा था। उसके मूंह से निकल हिंदी शब्द अमृत की तरह लगे थे।’<br />
हिंदी के विकास को लेकर निराशाजनक बातें करने वालों का निहितार्थ क्या होता है यह समझ में नहीं आता।  जहां तक हिंदी के संपर्क भाषा का प्रश्न है तो वह निरंतर बढ़ रही है-यहां अपवादों की चर्चा करना व्यर्थ होगा। सच बात तो यह है कि हिंदी अब भारत में उन क्षेत्रों में पहुंच रही है जहां उसे पहले जाना तक नहीं जाता था।  हम जब हिंदी के सम्मान की बात करते हैं तो सवाल यह उठता है कि हम उसे किस रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं? क्या यह चाहते हैं कि सारा विश्व ही हिंदी बोलने लगे।  यह अतिश्योक्ति होगी। फिर हिंदी का आधुनिक स्वरूप बरकरार रहना चाहिये, अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग इसमें नियमित रूप से नहीं होना चाहिये, और अंग्रेजी की क्रियायें स्वीकार्य नहीं है जैसी बातों पर सहमति होने के बावजूद रूढि़वादिता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।<br />
आजकल  अंतर्जाल की हिंदी के वेबसाईटों और ब्लाग को भविष्य में  एक समानांतर प्रचार माध्यम के रूप में स्थापित होने की बात कहीं जा रही है पर इधर यह भी दिखाई दे रहा है कि हमारे कुछ ब्लाग लेखक मित्र-जिनका चिंतन और हिंदी ज्ञान वाकई गजब का है-ऐसी रूढि़वादी बातें करते हैं कि लगता है कि उनको समझाना कठिन है।  पिछले दो वर्षों से मेरे संपर्क में रहे कुछ मित्र हिंदी लिखने वाले टूलों से जुड़े हैं और सच बात तो यह है कि इस लेखक को आत्मविश्वास से हिंदी में लिखने का आत्मविश्वास भी उन्हीं से मिला है पर उनकी कुछ बातें हैरान कर देती हैं। </p>
<p>यहां विकिपीडिया के हिंदी टूल की बात करना जरूरी रहेगा जो मेरे डेस्कटाप पर है पर उसका उपयोग करने मेंे मुझे असहजता लगती है।  यह तो गनीमत है कि गूगल का इंडिक टूल और फिर बाद में कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिल गया जो अंतर्जाल पर नियमित लिखना संभव हो पाया। हिंदी के विकिपीडिया का करीब पंद्रह दिन तक उपयोग किया पर बाद में जब उसका संशोधित टूल उपयोग किया तो उससे असहजता लगने लगी। एक मित्र ने कुछ गजब की बातें लिखीं जो हिंदी टाईप राइटर को लेकर थीं<br />
उनकार कहना था कि पता नहीं किसने यह टाईपराईटर बनाया जिसमे ‘ ि’ की मात्र पहले लगती है जबकि इसे बाद में टाईप करना चाहिये क्योंकि इसे पढ़ा भी बाद में जाता है। तक यह था कि हिंदी जैसी बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है तो वैसी टाईप भी हो।<br />
इसके बाद विकिपीडिया में यह परिवर्तन दिखाई दिया। इससे हुआ यह कि उस टूल पर टाईप करते हुए अपना लिखा ही पढ़ने मेें नहीं आता।  इंडिक टूल से किसी शब्द के साथ आई लगाने से भी दी पी ही हो जाता है पर अगर इस विचार से विकिपीडिया पर टाईप किया जाये तो दि पि हि नि  रहेगा। चलिये यह भी मान लें पर जब ‘’ि’ की मात्रा जब ल ि  प ि जैसी दिखती हैं तो समझ में नहीं आता। पहले विकिपीडिया के आफलाईन टूल में हिंदी में ज्ञ शब्द आसानी से बन जाता था पर बाद में वह भी संभव नहीं रहा।  हालत यह है कि कभी जल्दी में टिप्पणी लिखने लायक भी यह टूल नहीं रहा।  यह कोई शिकायत नहीं है बल्कि कहना यही है कि अधिक रूढ़ता से आगे बढ़ेंगे तो शायद हम हिंदी के साथ न्याय नहीं कर पायेंगे।</p>
<p>अंतर्जाल पर दिखता सब कुछ है पर वैसा ही है जैसा दिख रहा है कहना  कठिन है। गूगल के अनुवाद टूल से हिंदी के पाठ अन्य भाषाओं में पढ़े जा रहे हैं यह तो दिख रहा है पर वह वाकई उसी भाषा के लोग पढ़ रहे हैं जिसमें पढ़ा गया यह कहना कठिन है।<br />
आखिर हिंदी को लेकर आशावादी क्यों होना चाहिये? दरअसल हिंदी को लेकर जब हम बात करते हैं तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि हमारे देश की पहचान जिन रचनाओं से है वह मूल रूप से आधुनिक हिंदी में नहीं हैंं। अन्य की बात तो छोडि़ये हिंदी भाषी लोग जो अपनी पहचान वाली रचनायें पढ़ते हैं वह मूल रूप से संस्कृत या  क्षेत्रीय भाषाओं में है।  आधुनिक हिंदी के शुरुआती दौर में मौलिक रूप से अच्छा लिखा गया पर बाद में तात्कालिक रूप से सम्मान और धन पाने के लिये अनेक समसामयिक विषयों पर लिखकर वाहवाही बटोरने में लग गये। इसलिये हमेशा ही प्रासंगिक रहने वाले विषयों पर बहुत कम ही मौलिक रूप से लिखा गया। यही कारण है कि हिंदी भाषा साहित्य समृद्ध होते हुए भी अप्रासंगिक होता चला जाता है। हास्य कवितायें और व्यंग्य लिखने वाले बहुत मिल जायेंगे पर उनका व्यंग्य सन् 2040 में पढ़ कर समझा जाये यह जरूरी नहीं है-यह  इसलिये लिखा गया है क्योंकि इस लेखक के एक मित्र ब्लाग ने उसी सन् में जीवन पर्यंत हिंदी सम्मान देने की बात लिखी है। बहरहाल यह हालत हम आज के संदर्भ में लिख रहे हैं और वह भी अंतर्जाल से पूर्व के हिंदी साहित्य की-जो कि आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक दबावों से कभी उबर ही नहीं पाया। </p>
<blockquote><p><strong>मध्य में एक सूक्ष्म पाठ<br />
			&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
हालांकि यह एक सच्चाई है कि किसी भी अभियान को बिना धन के मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता यही स्थिति हिंदी ब्लाग जगत की है। यहां केवल अपने लिखने के दम पर कमाना संभव नहीं है। हालंाकि कुछ ब्लाग लेखक कमा रहे हैं पर उनकी कमाई का आधार केवल उनका लिखा हुआ नहीं है। हां, यह संभव है कि जो ब्लाग लेखक  बेहतर प्रबंधन और संबंध बनाने की क्षमता रखते हैं उनको अतिशीघ्र यहां आय अर्जित हो सकती है।  अनेक प्रचार माध्यमों में  यह प्रचार जरूर किया जा रहा है कि हिंदी ब्लाग से लोग कमा रहे हैं पर दो वर्षों में इस लेखक को एक पैसा भी इससे नहीं मिला है।  इसके बावजूद यह एक सच है कि भविष्य में बेहतर लिखने वालों के लिये यह धन कमाने का एक जरिया बन सकता है। </strong></p></blockquote>
<p>अंतर्जाल पर भी इसे दबाव में रखने के प्रयास तो होंगे पर जिन लोगों को उस दबाव से लड़ने की ताकत है और जो मौलिक और स्वतंत्र रूप से लिखने के अभ्यस्त होंगे वह अपना अस्तित्व स्वयं ही बनायेंगे।  जब वेबसाइटों या ब्लाग की बात करते हैं तो वह केवल हिंदी में लिखने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि  रिपोर्ताज, समाचारों और घटनाओं के सीधे प्रसारण की संभावना भी वेबसाईटों पर हो सकती है।  जैसे हम आजकल समाचार या साहित्यक पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों का स्वरूप देखते हैं ऐसा यहां होने की संभावना नहीं है। एक अखबार अनेक समाचारों और आलेखों के साथ पाठक के पास पहुंचता है पर ब्लाग या वेबसाईटें अगर लोकप्रिय हुई तो उन्हें जरूरी नहीं है कि वह सभी एकदम प्रस्तुत करें। दिन में पचास से पांच सों तक  वह अपने पाठ जारी कर सकती हैं।  कई ब्लाग बनाकर वह उसे चलायमान रख सकती हैं। ऐसे ही साहित्यक पत्रिकाओं के साथ भी है।  यह जरूरी नहीं कि सप्ताह या दिन में एक ही बार सब प्रस्तुत किया जाये। प्रतिदिन अनेक रचनायें एक एक कर प्रस्तुत की जा सकती हैं।  यही वीडियो और आडियो प्रसारणों के साथ भी हो सकता है। </p>
<p>कहने का तात्पर्य यह है कि अंतर्जाल पर हिंदी एक नये स्वरूप के साथ सामने आयेगी। हिंदी का बाजार बहुत बड़ा है तो दूसरा सच यह भी है कि हिंदी के अब सार्थक लेखन की अपेक्षायें बढ़ रही है पर हिंदी को दोहन करने वाला बाजार नये और मौलिक लेखकों को संरक्षण देने के  लिये  उत्सुक नहीं है। वह चाहता है कि उसे लिखने वाले  गुलाम मिलें पर हिंदी को अंतर्जाल पर ले जाने का एक ही उपाय है कि मौलिक और स्वतंत्र रूप से लिखा जाये तभी नवीनता आयेगी।  अभी अंतर्जाल पर हिंदी में लिखने की विधा शैशवकाल में हैं पर जैसे जैसे विस्तार रूप लेगी नये परिवर्तन आयेंगे। अभी तो यह भी एक ही समस्या है कि गूगल के इंडिक  और कृतिदेव यूनिकोड टूल के अलावा कोई अन्य प्रमाणिक और सरल  टूल ही लिखने के लिये उपलब्ध नहीं है। गूगल के इंडिक टूल और कृतिदेव यूनिकोड टूल का भी इतना प्रचार अभी लोगों में नहीं है। जब इस बारे में पांच छह वर्ष पहले से इंटरनेट  पर काम करने वाले लोगों को बताया जाता है तो हैरान रह जाते हैं-उनको यह जानकारी नवीनतम लगती है।   एक ब्लाग लेखक ने लिखा था कि हिंदी नयी भाषा है इसलिये उसका विस्तार प्राकृतिक कारणों से तय है। यह सच भी लगता है अगर इस बात को मान लिया जाये कि हिंदी में सार्थक और दीर्घाकलीन तक प्रभावी लेखन<br />
भविष्य में अंतर्जाल पर होगा।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.. </p>
<p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://anant-sindhu.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका ’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंतर्जाल पर लिखते समय भाषा  मर्यादित होना चाहिये-आलेख]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/2009/03/31/hindi-writing-should-good-hindi-alekh/</link>
<pubDate>Mon, 30 Mar 2009 14:49:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.wordpress.com/2009/03/31/hindi-writing-should-good-hindi-alekh/</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल पर जैसे जैसे आप लिखते जायेंगे वैसे वैसे नित नये अनुभव होंगे। एक बात लगने लगी है कि यहां पर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अंतर्जाल पर जैसे जैसे आप लिखते जायेंगे वैसे वैसे नित नये अनुभव होंगे। एक बात लगने लगी है कि यहां पर हिंदी साहित्य तो लिखा जायेगा पर शायद वैसे नहीं जैसे प्रकाशन माध्यमों में लिखा जाता है।  कहानियां केवल कल्पना और सत्य का मिश्रण नहीं बल्कि अनुभूति से घटी घटनायें भी कहानी की शक्ल में प्रस्तुत होंगी।  हिंदी ब्लाग अभी शैशवास्था में हैं पर इसके विकास की पूरी संभावना है। अभी तक जो ब्लाग लेखक हैं वह सामान्य लोग हैं और उनका प्रयास यही है कि किसी भी तरह वह न केवल अपने लिये पाठक जुटायें बल्कि दूसरे के पास अपने पाठक भेज सकें तो भी अच्छी बात है।  ऐसी कोशिश इस ब्लाग लेखक ने कई बार की है पर अभी हाल ही में एक दिलचस्प अनुभव सामने आया।</p>
<p>हुआ यूं कि एक अध्यात्मिक ब्लाग पर एक ज्योतिष विद् महिला ने अपनी टिप्पणी लिखी। उनके अनुसार वह ज्योतिष की जानकार हैं और जिस तरह उसके नाम पर भले लोगों का ठगा जा रहा है उसके खिलाफ वह जागरुकता लाने का प्रयास कर रही हैं। इस मामले में वह ब्लाग/पत्रिका लेखक से सहायता की आशा भी उन्होंने की।<br />
अगर कोई इस तरह का प्रयास कर रहा है तो उसमें कोई बुराई नहीं।  तब उसे लेखक ने अपने उत्तर में बताया कि हिंदी ब्लाग जगत में भी एक  महिला लेखिका हैं जो इस विषय पर लिखती हैं।  उन महिला टिप्पणीकार को यह भी बताया वह ब्लाग लेखिका न केवल ज्योतिष की जानकारी हैं बल्कि अन्य विषयों पर भी लिखती है। साथ में उनके ‘जागरुकता अभियान’ को पूरा समर्थन देने का वादा भी किया।<br />
उन्होंने फिर आभार जताते हुए ईमेल से जवाब दिया।  तभी हिंदी फोरमों पर  लेखक  की नजर में  आया कि हिंदी ब्लाग जगत की उन प्रसिद्ध महिला ब्लाग लेखिका का एक पाठ इसी विषय पर लिखा गया है जिसमें ज्योतिष के नाम पर अंधविश्वास फैलाने का विरोध किया गया है।  तक इस लेखक ने उस महिला को उस पाठ का लिंक भेजते हुए लिखा कि वह इसे पढ़ें।<br />
उस समय लेखक यह आशा कर रहा था कि ज्योतिष की जानकार दो प्रतिष्ठत लेखिकाओं-उन टिप्पणीकार महिला ने एक किताब भी लिखी  है- के आपसी संपर्क होंगे और यह देखना दिलचस्प होगा कि वह आगे किस तरह अपने अभियान को बढ़ाती हैं। यह लेखक ज्योतिष के मामले में कोरा है पर उसमें दिलचस्पी अवश्य है और इसी की वजह से दोनों महिलाओं के आपसी संपर्क हों इस उम्मीद में यह सब किया। </p>
<p>बाद में उस टिप्पणीकार का जवाब आया कि वह उस महिला ब्लाग लेखक की ज्योतिष संबंधी विषयों पर लिखे गये विचारों ं से सहमत नहीं है। अब आगे करने क्या किया जाये? उनकी बात से यह नहीं लगा कि वह उन महिला ब्लाग लेखिका से आगे संपर्क रखने के मूड में हैं। फिलहाल यह मामला विचाराधीन रख दिया। आप किसी से सहमत हों इसलिये ही संपर्क करना इस लेखक को जरूरी नहीं लगता। अगर आप असहमत हैं तब भी अपने हमख्याल व्यक्ति से संपर्क करना चाहिये ताकि उस विषय पर अपना ज्ञान बढ़ सके और हम जान सकें कि हमारे विचारों से भी कोई असहमत हो सकता है? मगर हरेक का अलग अलग विचार है। किसी पर कोई आक्षेप करना ठीक नहीं। </p>
<p>मन में आया कि उन महिला टिप्पणीकार से कहें कि आप भी अपना ब्लाग लिखें पर लगा कि वह तो किताब लिख चुकी हैं और यहां ब्लाग लेखक अपनी किताबें  प्रकाशित होने के आमंत्रण की प्रतीक्षा कर रहे हैं ऐसे में उनको यह सुझाव देना अपनी अज्ञानता प्रदर्शित करना होगा।  इसके अलावा उनकी बातों से लगा कि वह अपने जागरुकता अभियान के प्रति गंभीर है।  वह हमारे अध्यात्मिक ब्लाग/पत्रिकाओं में दिलचस्पी संभवतः इसलिये लेती लगती हैं क्योंकि उनके लगता है कि उसमें लिखे गये पाठ उनके ही विचारों का प्रतिबिंब हैं। आगे जब संपर्क बढ़ेगा तो यह आग्रह अवश्य करेंगे कि वह भी अपना ब्लाग बनायें। अध्ययनशील, मननशील और कर्मशील स्वतंत्र लोग जब आगे आकर हिंदी में ब्लाग लिखेंगे तभी चेतना का संचार देश में होगा। जिस तरह लोग हिंदी ब्लाग जगत में रुचि ले रहे हैं उससे यही आभास मिलता है। </p>
<p>बहरहाल ज्योतिष का विषय हमेशा ही इस देश में विवादास्पद रहा है। कुछ लोग सहमत होते हैं तो कुछ नहीं। यह लेखक इस विषय पर विश्वास और अविश्वास दोनों से परे रहा है। एक प्रश्न जो हमेशा दिमाग में आता रहा है कि क्या खगोल शास्त्र और ज्योतिष में क्या कोई अंतर नहीं है। हमारे पंचागों में सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण का समय और दिन कैसे निकाला जाता है? यह हमें भी पता नहीं पर इतना तय है कि इसके पीछे कोई न कोई विद्या है और उसे जानने वाले विद्वान हमारे देश में हैं जिनको उसके लिये पश्चिम से किसी प्रकार का ज्ञान उधार लेने की जरूरत नहीं पड़ती। फिर उसमें तमाम राशियों के लिये भविष्यफल भी होता है।  हमने यह भी देखा कि कुछ भविष्यवाणियां सत्य भी निकलती हैं तो कुछ नहीं भी।  सबसे बड़ी चीज है कि हमारे यहां गर्मी, सदी और बरसात के लिये जो माह निर्धारित हैं उन्हीं महीनों में होती है।  इस विद्या को किससे जोड़ा जाना चाहिये-खगोल शास्त्र से ज्योतिष शास्त्र से।<br />
इधर कोई ब्लाग लेखकों का महासम्मेलन हो रहा है। उसमें इस लेखक को भी आमंत्रण भेजा गया। वहां जाना नहीं हो पायेगा पर वहां शामिल होने वाले लोगों के लिये शुभकामनायें।  हां, एक महिला ब्लाग लेखिका ने अपने ब्लाग पर लिखे पाठ में शिकायत की उसने उस ब्लाग पर अपनी सहमति जताते हुए टिप्पणी लिखी थी जिसमें उस महासम्मेलन के लिये सभी को आमंत्रित किया गया पर उसकी टिप्पणी को उड़ा कर ईमेल भेजा गया और कहा गया कि ‘आपको तथा आपकी सहेलियों को आमंत्रण नहीं है।’<br />
दोनों प्रसंग एक ही दिन सामने थे। हमने सोचा कि ज्योतिषविर्द ब्लाग लेखिका और टिप्पणीकार के बीच संपर्क कायम हो जाये फिर इन ब्लाग लेखकों और लेखिकाओं के बीच समझौते के लिये आग्रह करते हैं। आज जब ज्योतिषविद् महिला टिप्पणीकार से यह उत्साहहीन जवाब मिला तो फिर हमने दूसरा कार्यक्रम भी स्थगित कर दिया।<br />
यह सब अजीब लगता है। ब्लाग लेखकों और टिप्पणीकारों के बीच एक ऐसा रिश्ता है जिसकी अनुभूति बाहर नहीं की जा सकती। मैं उन ज्योतिषविद् महिला टिप्पणीकार और प्रसिद्ध ब्लाग लेखिका के बीच संपर्क होते देखना चाहता था पर नहीं हुआ। सभी यहीं खत्म नहीं होने वाला है। जैसे जैसे हिंदी ब्लाग जगत आगे बढ़ता जायेगा वैसे वैसे ही इस तरह की छोटी छोटी घटनायें भी जब पाठों में आयेंगी तो लोग रुचि से पढ़ेंगे और शायद कुछ लोगों को मजा नहीं आये। हां, वैसे इनका मजा तभी तक है जब तक मर्यादा के साथ उन पर पाठा लिखा जाये। अश्लीलता या अपमान से भरे शब्द न केवल पाठ का मूलस्वरूप नष्ट करते हैं बल्कि पाठक पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं।<br />
इधर ब्लाग पर नियंत्रण को लेकर अनेक तरह के भय व्यक्त किये जा रहे हैं पर यह भ्रम है। दरअसल उन्ही ब्लाग लेखकों पर परेशानी आ रही है जो दूसरों के लिये अपशब्द लिखते हैं।   सच बात तो यह है कि आप किसी की वैचारिक, रणनीतिक, या कार्यप्रणाली को लेकर आलोचना कर सकते हैं पर अपशब्द के प्रयोग की आलोचना कानून नहीं देता भले ही ब्लाग के लिये अलग से कानून नहीं बना हो।  भंडास निकलने के लिये क्या साहित्यक भाषा नहीं है जो अपशब्दों का प्रयोग किया जाये। इसलिये अंतर्जाल पर लिखने वाले लेखकों इस बात से विचलित नहीं होना चाहिये। इसकी बजाय किसी की आलोचना या विरोधी के लिये शालीन भाषा के शब्दों का प्रयोग करना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अन्धविश्वास  ने धर्म के प्रति विश्वास को  कमजोर किया है-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/03/05/andhvishvas-aur-dharm-hindi-article/</link>
<pubDate>Thu, 05 Mar 2009 13:42:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/03/05/andhvishvas-aur-dharm-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[एक मित्र ब्लाग लेखक सुरेश चिपलूनकर ने कल कुछ फोटो बनारस शहर और गंगा नदी के भेजे। वह हिंदी ब्लागजगत क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>एक मित्र ब्लाग  लेखक सुरेश चिपलूनकर ने कल कुछ फोटो बनारस शहर और गंगा नदी के भेजे। वह हिंदी ब्लागजगत  के सक्रिय लेखक होने के साथ दूसरों से सतत संपर्क रखने की कला में भी सिद्ध हस्त हैं और अक्सर ऐसे फोटो और वेबसाईटें ईमेल पर भेजते रहते हैं जो वैचारिक और चिंतन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती है।  कल उनके फोटो के साथ इस बात का भी जिक्र था कि हिंदू धर्म के पवित्र माने जाने वाले बनारस और गंगा नदी में कितना कचड़ा दिखाई देता है। मेरा कभी बनारस जाना नहीं हुआ पर उसके बारे मेंे  सुनता रहता हूं। अनेक लोग भी इस बात की चर्चा करते हैं कि वहां गंगा में अब प्रदूषण बहुत है। कहने को इसके लिये लोग अनेक कारण बतायेंगे पर सच बात तो यह है कि इसके लिये अंध श्रद्धालू भी कम जिम्मेदार नहीं है।  हिंदू अध्यात्म विश्व का सबसे श्रेष्ठ ज्ञान है पर यह भी उतना ही सच है कि सर्वाधिक अज्ञानी और अंधविश्वासी भारत में ही हैं और इसी कारण भारत के अधिकतर शहर और नदियों की पवित्रता पर विष की चादर बिछ गयी है। देखा जाये तो मंदिर केवल इसलिये बने ताकि लोग एक समूह में आकर वहां सत्संग और कीर्तन कर सकें पर अंधविश्वासों और अज्ञान की वजह से लोगों ने उनको वह कूंआं मान लिया जहां से पुण्य भरकर अपने साथ स्वर्ग ले जाया सके।  अपने दैहिक कचड़े को वहां छोड़कर वह यह मान लेते हैं कि वह पवित्र हो गये।  उनके उस कचड़े से दूसरे आने वाले श्रद्धालू उनको कितना कोसते हैं और उसका पाप उनके सिर ही आता है यह वह भूल जाते हैं।<br />
पहले उन फोटो की बात करें। उनमें दिखाया गया था कि बनारस की सड़कों पर भारी कचड़ा जमा था। गंगा नदी में लाशें तैर रहीं थीं। कई जगह रेत में तो हड्डियां बिखरी पड़ी थीं।  लाशें देखकर अच्छा खासा आदमी डर जाये। उनको कुत्ते खा रहे थे।  कई जगह कौवे उन पर बैठे थे।  कई लाशें जलने को तैयारी थी तो पास में लोग नहाते हुए दिख रहे थे। कटे हुए बालों के झुंड वहां जमा थे।  यह दृश्य देखकर हृदय से भक्ति करने वाले किसी भी आदमी का मन दुःखी हो सकता है। शरीर के बाल, पुराने जूते और कपड़े मंदिरों या तीर्थों पर जाकर फैंकना किस धर्म का हिस्सा है यह कहना कठिन है क्योंकि जिन ग्रंथों को हिंदू धर्म का आधार माना जाता है उनमें ऐसी कोई चर्चा नहीं है।<br />
यह समस्या केवल बनारस तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश के अनेक सिद्ध और प्रसिद्ध मंदिरों मेेंं ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं।  कुछ महीने पहले की बात है कि हम अपने एक मित्र के साथ स्कूटर पर अपने ही शहर से तीस तीस किलोमीटर दूर एक प्रसिद्ध मंदिर गया।  वह भी पवित्र दिन था और मित्र ने आग्रह इस तरह किया कि हमने सोचा चलो हम भी हो आते हैं। वहां जाकर अपना ध्यान भी लगायेंगे और घूमना भी हो जायेगा।  </p>
<p>मंदिर पहाड़ी पर था और रास्ते में खेत खलिहान और तालाब देखकर बहुत अच्छा लगा। शहर से दूर ताजी हवा वैसे भी मन को प्रभावित करती है।  जब उस मंदिर के निकट पहुंचे तो बहुत भीड़ थी। वैसे उस मंदिर पर भीड़ इतनी नहीं होती पर उस दिन खास दिन था इसलिये आवाजाही अधिक थी। हमने मंदिर से दो किलामीटर स्कूटर रखा-उसको रखने के पांच रुपये दिये क्योंकि ऐसे मौके पर भी भक्तों के साथ कोई रियायत नहीं होती।  हम दोनों पैदल पहाड़ी पर चढ़ने लगे। वहां किनारे नाईयों के पास अपने बाल कटवाने वाले लोगों का झुंड लगा हुआ था। किनारे के दोनेां और पड़े बालो के झुंड किसी का मन खराब करने के लिये काफी थे।  हम चलते गये तो आगे देखा कि लोग पुरानी चप्पलें वहीं छोड़ गये थे जो कई बार हमारे पैरों में बाधा पैदा कर देती थी। मंदिर पहुंचे तो लंबी लाईन लगी थी।  हमने  अपने मित्र से कहा कि इस धूप में इतनी देर लाईन में खड़े होना हमारे लिये संभव नहीं हैं।  हम  तो कभी दोबारा आकर दर्शन कर लेंगे।’<br />
 मित्र भी निराश हो गया था पर चलते चलते वह पता नहीं मंदिर से पचास मीटर पहले ही लाईन के बीच में लग गया हम उससे उस समय थोड़ा दूर थे।  तब हम मंदिर के पास ही एक टैंट के में अपने बैठने की जगह तलाशने लगे।  वह एक मैदान था। वहां बालों, पुराने कपड़ों और चप्पलों के बीच खड़ा होकर हम सोचने लगे कि ‘भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान’ में आखिर ऐसा कहां संदेश मिलता है कि धार्मिक स्थानों को अपने अंधविश्वासों से अपवित्र बनाया जाये। एक तो गर्मी फिर वहां के इस दृश्य ने हमें नरक के दर्शन कराकर  पीड़ा  ही दी और जब तक  मित्र बाहर नहीं आया उससे झेलते रहे। एक बार तो गुस्सा आया कि लोगों से कहैं कि ‘यह कौनसा भक्ति करने का तरीका है।’ पर फिर सोचा कि जिस अध्यात्मिक ज्ञान की बात हम करेंगे उसके बारे में यह अधिक बतायेंगे।  यहां कई ऐसे ज्ञानी हैं जिनको कबीर,तुलसी और सूर के दोहे जुबानी याद हैं पर अंधविश्वास की धारा में वही सभी से अधिक बहते हैं।<br />
अगर पूरे बाल कटवा दिये जायें तो दिमाग को तरावट होती है। नये कपड़े या जूते पहने से भी देह को सुखद अनुभूति होती है। अगर किसी पवित्र स्थान पर जाकर ऐसी अनुभूति की तो कोई चमत्कार  नहीं है पर उसको सिद्धि से जोड़ना भ्रम है।  मंदिर निर्माण का मुख्य उद्देश्य मनुष्य में सामुदायिकता की भावना का विकास करना है और  उसमें सिद्धि और प्रसिद्धि को विचार  तो केवल प्रचार या विज्ञापन ही है।  जो लोग वहां अपनी गंदगी का त्याग करते हैं वह कहां जायेगी? इस पर कोई नहीं सोचता। अनेक लोग मंदिरों में केवल मत्था टेकने जाते हैं उनके लिये इस प्रकार की गंदगी वहां नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करती है।</p>
<p>चिपलूनकर जी ने  ईमेल के ऊपर ही लिख दिया था कि अंधभक्ति और कमजोर दिलवाले इसे नहीं देखें। बहरहाल हमने फोटो देखे और इस बात को समझ गये कि वह कहना क्या चाहते हैं? उन फोटो को यहां दिखाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह एक व्यापक विषय है कि हम अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर अंधविश्वासों का बोझ कम तक ढोते रहेंगे? अक्सर देश की संस्कृति और संस्कार बचाने की बात करने वाले आखिर इस अंधविश्वास से आंखें बंद कर क्यों अपने अभियान चलाते  हैं? आम पाठक शायद न समझें पर ब्लाग जगत पर सक्रिय ब्लाग लेखक यही कहना चाहेंगे  कि यह सवाल तो सुरेश चिपलूनकर जी से ही किया जाना चाहिये। अधिकतर लोगों को यह लगता है कि सुरेश चिपलूनकर जी परंपरावादी लेखकों के समूह के सदस्य हैं पर हम ऐसा नहीं मानते।  उनकी उग्र लेखनी से निकले आलेखों पर सभी लाजवाब हो जाते हैं और जो विरोध करते हैं तो भी उनके तर्क कमजोर दिखते हैं।  सच बात तो यह है कि सुरेश चिपलूनकर न केवल अंध विश्वासों के विरोधी है बल्कि उनके कई पाठ धर्म के नाम पर पाखंड के विरुद्ध लिखे गये हैं। उन्होंने अपने ही उज्जैन शहर के मंदिर पर हो रहे पाखंड और भ्रष्टाचार का उल्लेख अपने पाठ में लिया था।  उनके इन प्रहारात्मक लेखों से लोग इसलिये भी प्रभावित होते हैं।  उन्हें परंपरावादी लेखक तो हम नहीं मानते बल्कि आधुनिक विचाराधारा के परिपक्व श्रेणी के लेखकों में गिनती करते हैं।<br />
प्रसंगवश परंपरपादी और प्रगतिशील लेखकों की बात भी कर लें।  दोनों में कोई अधिक अंतर नहीं है। प्रगतिशील भारत के अंधविश्वासों को निशाना बनाते हुए यहां के समग्र चरित्र पर प्रहार करते हुए विदेशी विचारधाराओं की बात करते हैं जबकि परंपरावादी लेखक अपने पुराने ज्ञान को ही प्रमाणिक मानते हैं और अपने अंधविश्वास और पाखंड से बचते हैं।  प्रगतिशील और परंपरावादियों से अलग ऐसे  आधुनिक लेखक भी हैं जो अपने पुराने अध्यात्म को प्रमाणिक मानते हुए अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार करने का अवसर नहीं चूकते और यही कारण है कि यह तीसरा वर्ग ही भारत में परिवर्तन के लिये जूझता दिखता है।  सच बात तो यह है कि कर्मकांडों का आधार स्थानीय होता है और उनका धर्म से संबंध केवल इसलिये दिखता है क्योंकि देश के अधिकतर लोगों के धार्मिक इष्ट एक ही है।  कई जगह एक त्यौहार जिस तरह से मनाया जाता है तो दूसरी जगह दूसरे ढंग से।  उसी तरह जाति से भी त्यौहार मनाने के तरीके से भिन्नता का आभास होता है।  अगर हम कुल निष्कर्ष निकालें तो केवल अध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर ही सभी एक हैं कर्मकांडों में विरोधाभास है और वह धर्म का आधार कतई नहीं लगते। यह अलग बात है कि पहले पुराने और अब आधुनिक बाजार ने अपनी कमाई के लिये कर्मकांडों को ही धार्मिक आधार बना दिया है। सच बात तो यह है कि अंधविश्वासों की वजह से धर्म बदनाम ही हुआ है और पराये क्या अपने ही लोग उनका मजाक उड़ाते हैं।  भारत के अनेक महापुरुषों में पाखंड और अंधविश्वास से दूर रहने का संदेश दिया है और उनके कृतित्व का ही नतीजा है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है। शेष फिर कभी<br />
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<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अंतर्जाल पर अंग्रेजी से नहीं बल्कि हिन्दी से ही बदलाव हो सकता है=आलेख ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/02/24/inglish-aur-hindi-editorial/</link>
<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 15:52:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/02/24/inglish-aur-hindi-editorial/</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल के ब्लाग पर सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयास कोई अब नयी बात नहीं है। कुछ लोगों ने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अंतर्जाल के ब्लाग पर सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयास कोई अब नयी बात नहीं है।  कुछ लोगों ने अभी हाल ही में वेलंटाईन डे के पहले तक इंटरनेट पर चले विवाद पर लिखे गये पाठों को देखकर यही निष्कर्ष निकाला है कि आने वाले समय में  भारत के 4.2   करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता सड़क पर जाकर नारेबाजी करते हुए लाठी झेलने की बजाय अपने घरों पर कंप्यूटर और लैपटाप पर आंदोलन करना ठीक समझ रहे हैं।  यह दिलचस्प है।  ऐसे में एक प्रश्न जरूर उठता है कि आखिर इस देश में कौनसी भाषा के ब्लाग पर हम ऐसी आशा कर रहे हैं? यकीनन वह हिंदी नहीं है बल्कि अंग्रेजी है और जब देश में सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयासों की आवश्यकता है तो उसके लिये  सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हिंदी के ब्लाग की होना चाहिये-बिना उनके यह कल्पना करना कठिन है।<br />
अभी समाचार पत्र पत्रिकायें जिन ब्लाग का नाम अखबारों के दे रहे हैं वह अंग्रेजी के हैं। विवादास्पद विषय पर अखबार में नाम आने से उनको खोलकर पढ़ने वाले बहुत आते हैं-सामान्य रूप से आने पर ब्लाग में कोई दिलचस्पी नहीं लेता।  समाचार पत्र पत्रिकाओं में नाम आने से वैलंटाईन डे से पूर्व तक चले विवाद पर जो पाठ अंग्रेजी ब्लाग पर लिखे गये उनको पाठक मिलना स्वाभाविक था पर हिंदी के ब्लाग के बिना किसी भी आंदोलन या जागरुकता के प्रयास में सफलता नहीं मिल सकती। </p>
<p>इस विवाद  पर हिंदी के ब्लाग पर भी जमकर लिखा गया।  हिंदी ब्लाग लेखकों ने उन अंग्रंेजी ब्लाग के लिंक दिये और इसमें संदेह नहीं कि उनको पाठक दिलवाने में योगदान दिया।  नारी स्वातंत्र्य पर एक फोरम अंतर्जाल पर बनाया जिस पर 14 फरवरी वैलंटाईन डे पर दस हजार से अधिक सदस्य शामिल हुए। कुछ वेबसाईट भी जबरदस्त हिट ले रहीं थी पर यह सभी अंग्रेजी भाषा से सुसज्जित समाज का ही हिस्सा था।  आम भारतीय जिसकी भाषा हिंदी है उसका न तो वैंलंटाईन डे से लेना देना था न नारी स्वातंत्र्य पर चल रही सतही बहस से।  फिर भी समाचार पत्र पत्रिकाओं ने उस विवाद को महत्वपूर्ण  स्थान दिया। ऐसे में हिंदी ब्लाग पर चल रही बहस का कहीं जिक्र नहीं आया जो कि इस बात का प्रमाण है प्रचार माध्यम उसकी अनदेखी कर रहे हैं।  हालांकि हिंदी ब्लाग लेखकों के दोनों पक्षों  ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा पर कुछ ब्लाग लेखकों के निजी आक्षेपों ने उनके पाठ को कमजोर बना दिया।<br />
हमारा यहां उद्देश्य वैलंटाईन डे पर हुई बहस के निष्कर्षों पर विचार करना नहीं है बल्कि सामाजिक आंदोलन और जागरुकता में हिंदी ब्लाग के संभावित योगदान का आंकलन करना है।  यह बात  इस लेखक द्वारा हिंदी क्षेत्र के होने के कारण नहीं लिखी जा रही कि भारत में हिंदी ब्लाग की ही किसी सामाजिक परिवर्तन में भूमिका हो सकती है। अगर अंग्रेजी ब्लाग की भूमिका हुई तो वह हिंदी समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनके पाठों के स्थान मिलने का कारण होगी न कि अपने कारण।  यह हैरानी की बात है कि ब्लाग का प्रचार तो सभी कर रहे हैं पर इस सत्य से मूंह छिपा रहे हैं कि वह अंग्रेजी भाषा के ब्लाग के बारे में लिख रहे हैं न कि हिंदी के बारे में।   कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के मोह के कारण प्रचार चाहने वाले प्रतिष्ठित लोग  अंग्रेजी के  ब्लाग पर ही अपना नाम देखना चाहते हैं जैसे कि बी.बी.सी. लंंदन के समाचारों में देखते हैं।  जहां तक हिट का प्रश्न है तो अभी अंतर्जाल पर कई तरह के भ्रम हैं कि क्या वाकई अंग्रंजी ब्लाग लेखकों के उतने पाठक हैं जितने  कि वह दावा करते हैं।  अंग्रेजी के एक ब्लाग लेखक ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा था कि अंग्रेजी में वही ब्लाग हिट ले रहे हैं जो प्रायोजित हैं पर जो सामान्य लोगों के ब्लाग हैं उनकी कमोबेश स्थिति हिंदी जैसी है। सच क्या है कोई नहीं जानता। वैसे भी किसी एक के दावे पर यकीन करना ठीक नहीं है। </p>
<p>फिर यह ंअंतर्जाल है। अंग्रेजी का परचम फहरा रहा है यह सही है पर भारतीय विषयों पर हिंदी में लिखा गया है तो उसे पाठक नहीं मिलेंगे यह भी भ्रम है।  हां, इतना अवश्य है कि उच्च स्तर पर अंग्रेजी भाषा के लोगों का वर्चस्व है और वह अपने ब्लाग हिट बना लेते हैं पर इसके लिये उनकी तकनीकी कौशल या चतुर प्रबंधन को ही श्रेय दिया जा सकता है न कि पाठों को।  यह हैरान करने वाली बात है कि अगर अंग्रेजी ब्लाग के मुकाबले हिंदी ब्लाग के लेखक अधिक भावनात्मक ढंग से अपनी बात रखते हैं और उनके पाठक भी उनको ऐसे ही पढ़ते हैं।  </p>
<p>एक बात तय रही कि अंग्रेजी के ब्लाग पढ़ने वाले बहुत मिल जायेंगे क्योंकि उनको हिंदी ब्लाग के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। दूसरा कारण यह है कि हिंदी के प्रचार माध्यम केवल चुनींदा हिंदी ब्लाग लेखकोें पर ही प्रकाश डालते हैं क्योंकि सभी की पहुंच उनके कार्यालयों तक नहीं है।  जब किसी विषय के साथ ब्लाग का नाम देना होता है तो अंग्रेजी के ब्लाग का नाम तो दिया जाता है पर हिंदी के ब्लाग को एक समूह के नाम से संबोधित कर निपटा दिया जाता है।  कभी कभी झल्लाहट आती है पर फिर सोचते हैं कि अगर कहीं इन्होंने हिंदी के ब्लाग के नाम अपने प्रचार में दिये तो फिर उनको ही तो चुनौती मिलेगी-भला कौन व्यवसायी अपने सामने प्रतिस्पर्धी खड़ा करना चाहेगा।  हिंदी के ब्लाग लेखकों के पास साधन सीमित है। मध्यवर्गीय परिवारों के लोग किस तरह अपने ब्लाग चला रहे हैं यह तो वही जानते हैं।  फिर जो ब्लाग लेखक हैं उनमें से अधिकतर शांति से रहकर काम करने वाले हैं।  किसी प्रकार का दूराव छिपाव नहीं करते इसलिये ही तो अंग्रजी ब्लाग का भी लिंक देते हैं पर अंग्रेजी के ब्लाग ऐसा कहां करने वाले हैं?</p>
<p>लब्बोलुवाब यह है कि बातेंे बड़ी करने से काम नहीं चलेगा।  तमाम लोग जो सामजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये ब्लाग की भूमिका चाहते हैं उनको यह समझना चाहिये कि यह केवल हिंदी में ही संभव है।  ऐसे में वह इसी बात का प्रयास करें कि हिंदी ब्लाग जगत का ही प्रचार करें।  हालांकि इसके आसार कम ही हैं क्योंकि वैलंटाईन डे पर नारी स्वातंत्र्य की समर्थक जिन वेबसाईटों का प्रचार हो रहा है उनके सामने प्रतिवाद प्रस्तुत करने वाला कौन था? यकीनन कोई नहीं। हां, हिंदी ब्लाग जगत में बहुत सारे पाठ थे जो नारी स्वातंत्र्य के रूप में पब के प्रचार के विरुद्ध जोरदार ढंग से लिखे गये तो परंपरा के नाम पर स्त्रियों पर अनाचार के विरुद्ध भी बहुत कुछ प्रभावी ढंग से कहा गया। तीसरे पक्ष भी था जिसमें ब्लाग  पर ऐसे भी पाठ लिखे गये जो इस मुद्दे को ही प्रायोजित मानते हुए समर्थन या विरोध करने की बजाय उसका मजाक उड़ा रहे थे।  देश का बहुत बड़ा पाठक वर्ग उससे पढ़ने से वंचित रह गया जो शायद अंग्रेजी में लिखे गये पाठों से बहुत अच्छा था।  वैसे एक बात भी लगती है कि वैलंटाईन पर एकतरफा बहस शायद अंग्रेजी में ही संभव थी क्योंकि उनके पाठ एकदम सतही थे। हिंदी वाले तो बहुत गहराई में उतरकर लिखते हैं और एक बार कोई अच्छा ब्लाग पढ़ ले तो पाठक्  उनको पढ़ने पर ही आमादा हो जाते हैं।  अंग्रेजी में जो ब्लाग इस दौरान हिट हुए  वह भला अब रोज  थोड़े ही हिट रहने वाले हैं।  अगर इस बात से सीखा जाये तो भी यही निष्कर्ष निकलता है कि समाज में स्थाई परिवर्तन केवल हिंदी भाषा के ब्लाग से ही संभव है। अंग्रेजी में क्षणिक प्रचार ही संभव है स्थाई परिवर्तन नहीं।<br />
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<blockquote><p><strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://amrut-sandesh.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वैलंटाईन डे का एक दिन में  शोर थमा (हास्य-व्यग्य) ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/02/15/vailantain-day-ka-din-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 15 Feb 2009 15:57:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/02/15/vailantain-day-ka-din-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[कल वैलंटाईन डे बीत गया। पिछले प्रदंह दिन से उसका प्रचार जोरदार ढंग से हुआ। आज अनेक खबरें इस बारे में]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>कल वैलंटाईन डे बीत गया।  पिछले प्रदंह दिन से उसका प्रचार जोरदार ढंग से हुआ।  आज अनेक खबरें इस बारे में समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में छायी हुईं हैं। अधिकतर लोगोंं का ध्यान सड़कों, पार्कों, होटलों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर हुए अच्छे बुरे दृश्यों के विश्लेषण पर केंद्रित हैं पर कुछ लोग हैं जिनका ध्यान बाजार समाचार पर है।  टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं की इस बात के लिये भी प्रशंसा करनी चाहिये कि उन्होंने इस बात को छिपाया नही कि मंदी से जूझ रहे बाजार को कल एक दिन के लिये संजीवनी मिल गयी-यह कितने दिन काम करेगी यह तो बाद में ही पता चलेगा।<br />
इन्हीं समाचारों से पता चला कि इस बार कथित प्रेमियों ने सोने या उससे संबंद्ध उपहार अपने प्रेमियों को दिये-यह भी बताया है कि ऐसी सलाह प्रेमियों को बाजार विशेषज्ञों ने ही दी थी।   इस बार मंदी के कारण विदेशी गुलाब फूलों की बिक्री के कारण कम बिकने की आशंका थी पर वह गलत निकली।  उपहारों के सामान और ग्रीटिंग कार्ड खूब बिके। निष्कर्ष यह है कि मंदी का वैलंटाईन डे पर बुरा प्रभाव नहीं हुआ पर भविष्य में ऐसी आशंका से इंकार भी नहीं किया जा सकता। </p>
<p>प्रचार और विज्ञापन से पहले आदमी का असहज किया जाता है ताकि वह बाजार के लिये एक ग्राहक के रूप में तैयार हो सके।  विदेशी या पाश्चात्य सभ्यता पर आधारित हो कथित दिवस यहां प्रचलन में आये हैं वह एक दिन में नहीं आये बल्कि उसके लिये बकायदा योजना बनायी गयी। यह योजना भले ही संगठित रूप से न बनी हो पर धीरे धीरे वह बृहद रूप लेती गयी।<br />
हमारे देश में किसी भी फैशन की शुरुआत फिल्मों से ही होती थी।  अब टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाओं ने भी इसमें योगदान देना प्रारंभ कर दिया है। भले ही उनको प्रत्यक्ष रूप से लाभ नहीं होता पर उनके प्रायोजक और विज्ञापनदाता उनसे ऐसी आशा करते हैंे कि वह अपने पाठकों और दर्शकों उनके उत्पादों और वस्तुओं की तरफ आकर्षित कर सकें।<br />
हर बार की तरह एक बहुत बड़ा वर्ग इससे दूर ही रहा। यह अलग बात है कि वैलंटाईन डे पर बाजार को संजीवनी देने के लिये पूरे विश्व में प्रयास हुए और भारत में तो ऐसा लगता है कि इसकी भूमिका एक माह पहले ही तैयार की गयी।  एक बड़े शहर में पब पर हुए आक्रमण में विरोध स्वरूप कुछ लोगों ने उसे वैलंटाईन डे से जोड़ दिया।  देखा जाये तो दो ऐसे प्रसंग हुए जिनको बाजार के लिये प्रचार प्रबंधकों ने खूब पकाया।<br />
अगर आप लेखक या पत्रकार हैं तो यह जरूरी नहीं है कि हर घटना पर अपनी सहमति या असहमति जतायें।  अगर आप परंपरावादी होने का दावा करते हुए पाश्चात्य सभ्यता का विरोध करते हैं तो यह याद रखना चाहिये कि अपने धर्मग्रंथों में उपेक्षासन भी एक विधि जिससे प्रतिद्वंद्वी को परास्त किया जा सकता है। यह अलग बात है कि इस आसन के लिये आपको सहज होना पड़ता है, मगर जब आप विरोध करने के लिये तत्पर होते हैं तब  अपने अंदर उस असहज भाव को प्रवेश होने देतें हैं तो इसका मतलब यह है कि आज बाजार की सहायता कर रहे हैं जिसकी कीमत प्रचार प्रबंधक वसूल कर ही लेते हैं।<br />
एक दृष्टा की तरह अनेक लोग बाजार के इस खेल को देख रहे थे। टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओंं से इसका पता नहीं चलता पर अंतर्जाल पर हिंदी ब्लाग पढ़ने से पता लगता है कि अधिकतर लोग विवाद बढ़ाने वाली घटनाओं में बाजार की योजना और हाथ होने का अनुभव कर रहे थे।  भले ही विवाद करने वालों का आशय पैसा कमाने से अधिक प्रचार पाना हो पर अनजाने में वह व्यवसायिक  प्रचारकों की सहायता कर रहे थे।<br />
मामूली  घटनाओं में नारी स्वातंत्र्य और सांस्कृतिक मूल्यों की तलाश करने वाले आपस में बहस कर रहे थे जबकि बाजार का मतलब केवल अपने लिये पैसा कमाने का था। शराब महिला पिये या पुरुष यह उसका निजी मामला है पर अगर कोई उन पर आक्रमण करता है तो उससे निपटने की जिम्मेदारी कानून की है और वह उसे भी निभा रहा है पर बहस करने वालों को विषय चाहिये था। नारी स्वातंत्र्य के समर्थक इसमें सदियों पुरानी परंपराओं के विरुद्ध आव्हान करते हैंं तो परंपरावादी लोग अपने सांस्कृतिक मूल्यों के लिये फिक्रमंद दिखते हैं।  अगर आप उनके लिखे हुए पाठ या दिखाये जा रहे दृश्य देखें तो आपको लगेगा कि यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है पर अगर आप सड़क पर निकल जाईये तो इस बहस से अनजान लाखों लोगों को अपने लक्ष्य की ओर आते जाते देखा जा सकता है। बाजार को उनकी उपेक्षा बुरी लगती है इसलिये वह हर जगह अपने उत्पाद और वस्तुओं का प्रचार देखना चाहता है।   ऐसे में जहां प्रचार की संभावना है वहां बाजार अपना दांव खेलता है और प्रचार प्रबंधक भी यह सोचकर उसमें जुट जाते हैं कि उससे उनके प्रयोजकों और विज्ञापनदाताओं को लाभ हो।<br />
इधर अंतर्जाल पर अनेक पाठ देखकर अच्छा लगा।  सच बात तो यह है कि समाचार पत्र पत्रिकाओें और टीवी चैनलों की सीमायें हैं। वह अपनी तरफ से कोई बात नहीं कह पाते बल्कि उनको आवश्यकता होती है उसके लिये किसी मुख की जिसके नाम से वह कुछ लिख सकें। अगर विवाद हो तो उसे दो मुखों की आवश्यकता होती है-एक समर्थन के लिये दूसरा विरोध के लिये।  तय बात है कि जिन्हें प्रचार चाहिये वह इधर या उधर से होकर बोलते हैं ताकि उनके मुख चमक सकें।  अंतर्जाल पर हिंदी ब्लाग में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।  पाठ लिखने वाले ने लिखा तो असहमत होने वालों ने  उस पर समर्थन या विरोध में  टिप्पणी की  वह भी कम पढ़ने लायक नहीं होती।  प्रतिवाद में पाठ तक लिख जाते हैं और फिर अधिक गुस्सा हो तो सामने वाले ब्लाग लेखक का नाम ही शीर्षक मेंे दिया जाता है।<br />
यहां भी दोनों पक्षंों के ब्लाग लेखक हैं।  पिछले दो वर्षों में यह पहला ऐसा अवसर था जब वैलंटाईन डे पर ऐसे पाठ ब्लागों पर पढ़ने को मिले जो बहुत दिलचस्प लगे।  आम जीवन की तरह इस विषय पर  उपेक्षासन कर रहे ब्लाग लेखक ही अधिक थे पर वैलंटाईन डे के पक्ष और विपक्ष ब्लाग पर   लिखे गये  पाठ पढ़ने से भला कौन चूक सकता था?  उनको हिट मिलना स्वाभाविक था क्योंकि द्वंद्व हर इंसान को देखने में मजा आता है-अगर वह खुद उसके पात्र न हों। जो स्वयं बहस में लिप्त नहीं होते वही उन बहसों का निष्कर्ष निकाल सकते हैं पर अगर पूरी तरह उपेक्षासन करने वाले हों तो फिर हंस तो सकते ही हैं।  सच बात तो यह है कि अगली बार वैलंटाईन डे पर जिन आम लोगोंे को समय हो तो वह बजाय कहीं अन्यत्र जाने के हिंदी ब्लाग जगत पर अधिक सक्रिय रहें इसके लिये जरूरी है कि वह अभी से ही सक्रिय हो जायें क्योंकि उनको जो संतोष यहां मिल सकता है वह किसी अन्य प्रचार माध्यम पर नहीं मिल सकता।<br />
प्रसंगवश हमारे मित्र ब्लाग लेखकों की इसमें जोरदार भूमिका थी और उनका सामना भी  ऐसी महिला ब्लाग लेखिकाओं से हुआ जिनके प्रति हमारे मन में आत्मीय भाव है।  अब यह छिपाना बेकार है कि ब्लाग के पाठों पर चले रहे इन द्वंद्वों के प्रति हमने उपेक्षासन किया होगा।  चूंकि इस विषय पर हमने केवल बाजार की दृष्टि से ही विचार किया इसलिये किसी  सिद्धंात या आदर्श की बात करना हमें स्वयं स्वीकार नहीं था।<br />
एक बात तय कि अपनी बात किसी से जबरन मनवाने की बजाय उसे अपने विचार या व्यवहार से प्रभावति करना चाहिये और यही सभ्य समाज का तकादा है। बहसें होना चाहिये पर मर्यादा के पार नहीं जाना चाहिये।  मतभेद हों पर मनभेद नहीं होना चाहिये।  बजार और प्रचार का यह खेल कभी थमने वाला नहीं है।  अभी तो उनके पास 365 दिनों में केवल 20 से 25 दिन प्रचार के लिये हैं।  हो सकता है कल वह पूर्व और उत्तर से कोई दिन निकालें और उसका यहां प्रचार करने लगें। उनको तो 365 दिन ही बाजार में ग्राहक चाहिये।<br />
आदमी जो कपड़े पहनने या सोने के लिये उपयोग करता है उसके पूरी तरह गल जाने पर ही दूसरा खरीदता है-बहुत कम लोग हैं जो नये वस्त्र खरीद सकते हैं। फिर खुद खरीदने से कहां खुशी होती है जितना दूसरे को उपहार देने से। शायद इसलिये प्रचार माध्यम उपहार की बात अधिक करते हैं।  आदमी अपने चीज पुरानी या नष्ट होने पर आये, बाजार इतनी देर प्रतीक्षा नहीं कर सकता। इसलिये ग्रीटिंग कार्ड और अन्य उपहार जो उपयोग में अधिक नहीं होते पर बाजार को पैसा देते हैं उनको बेचने का मार्ग यही एक मार्ग है। बहरहाल शोर थम गया है और ऐसा शांति लग  रही है जैसे धुलेड़ी में दो बजे के बाद बाजार में लगती है।  जिस तरह के दृश्य सामने आये उससे तो लगता है जैसे कि यह होली का पर्व हो।  अंतर बस इतना ही है कि उस समय गंदगी और रंगों के विषैले होने के भय से लोग बाहर नहीं निकलते पर वैलंटाईन डे  के दिन यह खतरा उन युवाओं के लिये ही है जो जोड़े बनाकर घूमते हैं।<br />
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<p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
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<title><![CDATA[मंदी का दौर:नया उपभोक्ता वर्ग कहां से आयेगा-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/02/06/mandi-ka-daur-aur-naya-upbhokta-hindi-article/</link>
<pubDate>Fri, 06 Feb 2009 14:52:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अमेरिका के उद्योगपति बिल गेट्स ने कहा है कि वर्तमान मंदी अगले चार साल तक चल सकती है। बिल गेट्स विश्व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अमेरिका के उद्योगपति बिल गेट्स ने कहा है कि वर्तमान मंदी अगले चार साल तक चल सकती है। बिल गेट्स  विश्व में प्रसिद्ध उद्योगपति हैं  और नये लोगों को उनसे प्रेरणा लेने को कहा जाता है।  वैसे उन्होंने जो अनुमान लगाया है उसके जो आधार होंगे वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के बाजार को दृष्टिगत  बनाये गये होंगे।  वैसे तो भारत में भी मंदी का दौर चल रहा है पर आज तक यह कोई नहंी बता पा रहा है कि आखिर यह मंदी आई कैसे?</p>
<p>जिन लोगों ने दृष्टा की तरह इस बाजार को देखा होगा वह कभी न कभी इस आशंकित मंदी पर विचार अवश्य करते रहे होंगे। नित प्रतिदिन नवीन उत्पादों की चर्चा आये दिन प्रचार माध्यमों में आती है  पर यह बात याद रखने लायक है कि वह  पुराने प्रचलित उत्पादों को बाहर अधिक करते हैं बनिस्बत नये ग्राहक बनाने के।  अभी  में भारत में एक सस्ती कार के निर्माण और बाजार में और  की चर्चा है इस कार को देखने के बाद-एक टीवी में एक मेले में इसका माडल दिखाया गया था-कोई भी कह सकता है कि वह लोगों  में कम दाम  से अधिक अपनी डिजाइन के कारण लोकप्रिय होगी। जिन लोगों के पास महंगी और आकर्षक कारें हैं वह भी इसका उपयोग स्थानापन्न रूप से कर सकते हैं या पुरानी बेचकर वही लेना चाहेंगे।  इस कार को नये उपभोक्ता खरीदेंगे पर उनकी संख्या कम होगी।  अब यह संभव है कि अनेक महंगी और बड़ी गाडि़यों की बिक्री में कमी उसकी वजह से हो सकती है।  कहने का तात्पर्य है कि जो तेजी बाजार में चल रही थी-कम से कम भारत में-वह सीमित वर्ग के धन के व्यय पर चल रही थी।  यही वर्ग बदल बदल कर आ रहे उत्पादों को खरीद रहा था।  हां शुरुआताी दौर में फ्रिज,टीवी,कूलर,कार,मोटर साइकिल तथा अन्य औद्योगिक उत्पादों को  नये होने के कारण भारत में बहुत बड़ा बाजार मिला पर जैसे ही मध्यम वर्ग के सभी लोगों से इसे प्राप्त कर लिया तो उसके बाद फिर वही वर्ग नये उत्पादों को खरीद रहा जिसके पास अपने मूल स्त्रोत से अलग भी आय है-या फिर कहा जाये कि उनके पास एक से अधिक आय के स्त्रोत हैं।  इसके अलावा निजी क्षेत्र में ं नयी और आकर्षक नौकरी के कारण भी एक वर्ग नये उत्पादों को खरीदता रहा।  देश में उदारीकरण के प्रारंम्भिक दौर में उस समय अनेक उद्योगों और व्यवसायों को अपना मूल ढांचा खड़ा करने के लिये लोग चाहिये थे और उन्होंने इसलिये अपने यहां बड़े पैमाने पर नौकरियां दीं।   इनमे आप टेलिफोन कंपनियों का नाम ले सकते हैं। उनकेा नये कनेक्शन और ग्राहक जुटाने थे इसलिये उन्होंने अपना संगठन बढ़ाया।   अब वह स्थापित हो गये हैं। शहरों में उन्होंने अपना नेटवर्क स्थापित कर लिया है और नई लाईनें डालने और ग्राहक बनाने का उनका दायरा अब उतना नहीं है जितना दो या तीन वर्ष पूर्व था।  तय बात है कि उनको  अपने यहां नौकरियां ओर कर्मचारी कम करना पड़ सकते हैं। इसका असर उन लोगों की क्रय क्षमता पर पड़ना है जो वहां से हटाये जायें या कहीं ऐसी जगह रखें जायें जहां उनका स्वयं का व्यय ही अधिक हो जाये।   फिर मंदी के दौर के चलते जहां अनेक लोग नौकरियां गंवा रहे हैं या उनके वेतन में कमी हो रही है इससे भी एक उपभोक्ता के रूप में उनकी क्रय क्षमता का हृास हो रहा है। </p>
<p>दरअसल इस मंदी का मुख्य कारण यह है कि कंपनियों ने अपने विनिवेशकों  को खुश करने के लिये अधिक लाभांश या ब्याज दिया। यह अलग बात है कि कंपनी के उच्चाधिकारियों के पास भी अधिक मात्रा में शेयर होते हैं और उनको स्वयं भी लाभ मिलता है।  इतना ही नहीं कितनी भी मंदी हो कंपनियों के उच्चाधिकारियों के लाभों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह अपना उच्च स्तर बनाये रखते हैं-कई जगह  वेतन के साथ वह कमीशन भी प्राप्त करते हैं-उनके व्यय में कमी नहीं आती।   अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने अपने देश की कंपनियों को इस बात के लिये लताड़ा भी था कि उनके उच्चाधिकारी न केवल ठाठ से रह रहे हैं बल्कि बोनस भी ले रहे हैं जबकि उनकी कंपनियां मंदी का संकट झेलते हुए सरकार से मदद की गुहार लगा रही हैं।  </p>
<p>भारत में तो वैसे भी कर्मचारियों और मजदूरों का शोषण होता रहा है और कंपनियां भी इससे पीछे नहीं हैं। मुख्य बात यह है कि उन छोटे कर्मचारियों का सभी जगह शोषण होता है जो मजदूरी या लिपिकीय कार्य करते हैं।  इनके वेतन बहुत कम रखे जाते हैं यह सोचकर कि उनका कोई महत्वपूर्ण  नहीं है या उन जैसे बहुत मिल जायेंगे।  कंपनियां यह भूल जाती हैं कि उनके कर्मचारी किसी के उपभोक्ता होते हैं जैसे कि अन्य जगह कार्यरत कर्मचारी उनके भी उपभोक्ता होते है।  एक टेलीफोन कंपनी मेंं कार्यरत टीवी और फ्रिज भी खरीदता है तो टीवी कंपनी के लिये कार्य करने वाला अपने यहां टेलीफोन भी लगवाता है।  अगर हम इस चक्र को देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अधिकतर कंपनियां या उद्योगपति समाज के दोहन में लगे रहते हैं और उपभोक्ता के रूप मेंं दूसरे की जेब से पैसा निकालने के लिये तत्पर होते हैं पर जब उसे भरने की बात आती है तो उनको अपने लाभ की चिंता सताती है। इन उद्योगतियों और कंपनियों के उच्चाधिकारियों का बहुत सारा यकीनन बैंकों में सड़ता होगा और वह बैठकर इस मंदी का लुत्फ उठाते हैं और प्रचार माध्यमों  में मंदी का रोना रोते हैं। </p>
<p>भारत में जो नवीन उपभोक्ता वर्ग गुणात्मक रूप से बढ़ रहा था उसमें अब घनात्मक वृद्धि ही संभव है इसलिये नवीन उत्पाद किसी पुराने उत्पाद को या तो रीसेल के लिये भेजेंगे या कबाड़ में डाल देंगे।  इससे बाजार उठने वाला नहीं है।   वैसे भी आदमी कितना कबाड़ घर में रखेगा?  घर भी आखिर भरने लगता है। यह मंदी का दौर कब तक चलेगा कोई नहीं जानता क्योंकि सभी जगह समस्या यही रहने वाली है कि नया उपभोक्ता वर्ग कहां से आयेगा या उसकी जेब कैसे भरेगी। आखिर आदमी भी कब तक कबाड़ में चीजें रखेगा।<br />
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<p><strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://amrut-sandesh.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<title><![CDATA[मानव सभ्यता पर वाद-विवाद-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/01/17/manav-sabhyata-hindi-article-and-discussion/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 12:34:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/01/17/manav-sabhyata-hindi-article-and-discussion/</guid>
<description><![CDATA[आज एक समाचार में एक इतिहासकार द्वारा इतिहास में अयथार्थ से भरे तथ्यों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से हटा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज एक समाचार में एक इतिहासकार द्वारा इतिहास में अयथार्थ से भरे तथ्यों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से हटाने की मांग की गयी है।  उन्होंने आर्यों से संबंधित कुछ तथ्यों का प्रतिवाद किया।<br />
एक तो यह कि आर्य कभी आक्रामक नहीं रहे और उनके द्वारा कभी भी कहीं सामूहिक नरसंहार नहीं किया गया-यह पश्चिमी अवधारणा केवल उनको बदनाम करने के लिये बनायी गयी।<br />
दूसरे यह है कि वेद ईसा पूर्व 1200 वर्ष पहले ही रचे गये जबकि वास्तविकता यह है कि उनके रचने का कोई एक कार्यकाल नहीं है और वह कई चरणों मेंे रचे गये।<br />
भारतीय इतिहास हमेशा ही विश्व के लिये एक आकर्षण का विषय रहा है। खासतौर से पश्चिम के विद्वान इसमें इसलिये दिलचस्पी लेते हैं क्योंकि उनका यह भ्रम यहां के इतिहास से टूट जाता है कि विश्व में आधुनिक सभ्यता का विस्तार पश्चिम से पूर्व की तरफ  हुआ है।<br />
इतिहास को लेकर कई बातें मजाक भी लगती है जैसे हमारे इतिहास में  पढ़ाया जाता है कि भारत की खोज वास्कोडिगामा ने की थी।  दूसरा यह भी पढ़ाया जाता है कि कोलम्बोस ने अमेरिका की खोज की थी। भारत में कोलम्बोस की चर्चा इस तरह होती है जैसे कि उनके बाद ही अमेरिका में मानव सभ्यता का विस्तार हुआ जबकि सच यह है कि वहां पहले से भी वह विद्यमान थी। वहां रह रहे काले लोग अमेरिका के मूल निवासी माने जाते है। संभवतः वास्कोडिगामा को लेकर पश्चिम में भी यह भ्रम होगा कि उनके वहां पहुंचने के बाद ही मानव सभ्यता का विस्तार भारत में हुआ होगा। </p>
<p>वास्कोडिगामा से पहले भी भारत और चीन के लोगों का पश्चिम आना जाना होता था। यहां से उस तरफ व्यापार होने के कुछ एतिहासिक तथ्य हैं जो अक्सर पढ़ने और सुनने को मिलते हैं। बहरहाल आर्य जाति को  लेकर जो इतिहास सुनाया जाता है वह एक अलग विषय है पर उनकी जाति के स्वभावगतः विश्लेषणों का शायद अध्ययन ठीक नहीं किया गया।  दरअसल इतिहासकार एतिहासिक घटनाओं का समय तो निर्धारित करने की योग्यता तो रखते हैं पर उनके विश्लेषण मेें वह अपने विवेक का जिस तरह उपयोग करते हैं उससे सभी का सहमत होना संभव नहंी हो पाता। </p>
<p>कुछ एतिहासिक घटनायें ऐसी हैं जिनको आपस में मिलाना आवश्यक लगता है और यह इतिहासकार नहीं करते।  यहां हम आर्यों की चर्चा करें तो उनकी कुछ नियमित आदतें दृष्टिगोचर होती हैं।</p>
<p>1.वह लोग व्यवसाय और कृषि में दक्ष थे। वह इसके लिये नयी तकनीकी का अविष्कार और उपयोग करते थे।<br />
2.उनके रहने के भवन पक्के थे और आधुनिक शैली से मिलते जुलते थे।<br />
2.धनार्जन में दक्ष होने के कारण मनोरंजन और धाार्मिक कार्यों में उनकी बहुत दिलचस्पी थी।<br />
3.उनकी स्त्रियों भी कभी आधुनिक थीं और नृत्य और गायन कला में उनका प्रवीणता थी।<br />
4.वह संभवतः मूर्तिपूजक थे और सामूहिक धर्म स्थान बनाकर आपस में तारतम्य रखते थे।<br />
अगर हम देखें तो आर्य लोेग  कमाने,खाने और मनोरंजन मेें  मस्त  रहते थे। अगर हम यह कहें कि वह हिंसक थे तो  दूसरा सच यह है कि उनको भागते हुए पूर्व की तरफ नहीं आना पड़ता-जैसा कि दावा पश्चिमी इतिहासकार करते हैं।  एक बात जो हो सकती है वह यह कि चूंकि धन कमाने और खर्च करने में उनकी व्यस्तता के चलते वह अपने समाज के अलावा अन्य समाजों की उपेक्षा या तिरस्कार का भाव उनमें रहा होगा और इस कारण उनके प्रति जातियों या वर्ग के लोगों में  गुस्सा रहा होगा।<br />
हम यह कहते है कि आर्य विदेश से आये थे, थोड़ा अजीब लगता है। इसकी बजाय यह कहना ठीक लगता है कि  आर्य एक आधुनिक सभ्यता का प्रतीक हैं जो धीरे धीरे पूर्व तक फैलती गयी।  व्यवसाय,कृषि और तकनीकी के क्षेत्र में नये नये तरीके ईजाद करते रहने के कारण उत्पादन अधिक होने से आर्य या सभ्य लोगों की  आय अधिक होती थी इसलिये दूसरे स्थानों पर पहुंचना उनके लिये सहज होता गया और धीरे धीरे उनके कुछ लोग विदेश में जाने लगे और फिर वहीं बसते भी गये ।  अन्य इलाकों के लोग भी उनसे नये नये गुर सीखते गये और फिर वह भी उन जैसे होते गये।  पहले कोई पासपोर्ट या वीजा तो होते नहीं थे पर लोगों का मन तो आज जैसा ही था।  पर्यटन और भ्रमण करना आदमी का स्वभाव है।  ऐसे में धन आने पर कथित आर्य अगर पूर्व की तरफ बढ़े तो कोई आश्चर्य नहीं है। फिर एक मत भूलिये कि जलवायु और खनिज संपदा की दृष्टि से जितना भारत संपन्न है उतना अन्य कोई राष्ट्र नहीं है।  तय बात है कि आर्य  क्योंकि जागरुक थे इसलिये भारत पर भी उनकी दृष्टि गयी होगी और उनमें से कुछ लोग यहां आये होंगे और यहीं के होकर रहे होंगे। भारत में अनेक देशों से अनेक जातियोेंं के लोग समय समय पर आये हैंं पर सभी को बाहर से आये  आर्य मान लेना ठीक नहीं होगा।  आर्य एक सभ्यता है न कि जाति क्योंकि आज की सभ्यता को देखें तो उनसे बहुत मेल खाती है पर सभी को आर्य जाति का तो नहीं मान लिया जाता।<br />
दरअसल आर्य अनार्य का भेद करना है तो आचरण के आधार पर ही करना ठीक लगता है। आर्य तो वह है तो जीवन में अपने कर्म के साथ अन्य सामाजिक गतिविधियों में रुचि लेते हैं। अनार्य वह हैं जो  अपने कार्य करने से विरक्त होकर दूसरे का वैभव देखकर अप्रसन्न होते हैं। उनको लगता है कि वह वैभव उससे छीना गया है। इसलिये वह काल्पनिक एतिहासिक और पुरानी कहानियां गढ़ते हैं जैसे कि वह वैभव उसके पूर्वजों से छीना गया है।  फिर उनका दुःख यह नहीं होता कि वह अमीर नहीं है बल्कि उनको यह बात परेशान करती है कि दूसरे के पास इतना वैभव और सामाजिक सम्मान क्यों है? कुल मिलाकर यह दो प्रकृतियां हैं जिनको जाति मानना ही गलत है। अगर आज हम अपने देश के वर्तमान अध्यात्मिक और सामाजिक विकास को देखें तो किसी एक समाज या जाति का प्रभाव उस पर नहीं है।  सभी जातियों से समय समय पर महापुरुष होकर इस समाज का मार्गदर्शन करते रहे हैं। </p>
<p>भारत के दक्षिण में रहने वालों को द्रविड कहा जाता था पर उनकी सभ्यता आर्यों जैसी हैं। देखा जाये तो भारतीय दर्शन,अध्यात्म और संस्कृति में दक्षिण का कोई कम योगदान नहीं है।  द्रविड़ सभ्यता भी विकसित रही है। भारत में धीरे धीरे सभ्यतायें आपस में मिलकर एक ही एक सूत्र में स्वतः आती  गयी जिसे अब भारतीय सभ्यता कहा जा सकता है।  ऐसा होने में सदियों का समय लगा होगा और एतिहासिक तथ्यों में जिस तरह भ्रांतियां हैं उससे तो नहीं लगता कि किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।<br />
भगवान श्रीराम और राक्षसराज रावण के बीच युद्ध को कुछ पश्चिमी विद्वान सभ्यताओं का संघर्ष मानते हैं।  कुछ लोग इसे आर्य-द्रविड़ संघर्ष मानते हैं तो कुछ रावण की आर्य सभ्यता का विस्तार रोकने का प्रयास मानते हैं हनुमान जी और सुग्रीव जो कि आर्य नहीं थे उनके भगवान  श्रीराम के सहयाग करने पर पर खामोश हो जाते हैं।   इस तरह के विचार केवल भ्रमित करने के लिये हैं। भारत में जातिगत संघर्ष बढ़ाने के लिये ऐसे तथ्य गढ़े गये हैं। चूंकि ऐसा करते हुए भी सदियां बीत गयी हैं इसलिये कई एतिहासिक तथ्य सत्य लगते हैं।  आर्य और द्रविड़ दोनों ही सभ्यतायें विकसित रही हैं इसलिये   दोनों के आपसी  समागम ही भारतीय सभ्यता का निर्माण हुआ। </p>
<p>एक मजे की बात यह है स्वतंत्रता के बाद कई ऐसे मुद्दे सामने आये जो शायद यहां विवाद खड़ा करने के लिये बनाये गये ताकि झगड़े होते रहें।  जहां तक आर्य अनार्य का प्रश्न है तो उसकी चर्चा आधुनिक इतिहासकार और विद्वान अधिक करते हैं जबकि प्राचीन साहित्य में इसकी चर्चा नहीं होती।<br />
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<p><strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://amrut-sandesh.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<item>
<title><![CDATA[अध्यात्म ज्ञान के बिना धर्म को समझना कठिन-चिंत्तन ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2008/12/14/adhyatm-aur-dharm-chintan/</link>
<pubDate>Sun, 14 Dec 2008 16:11:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2008/12/14/adhyatm-aur-dharm-chintan/</guid>
<description><![CDATA[धर्म क्या है यह समझे बिना उसकी आलोचना करना गलत है। किसी भी धार्मिक विद्वान् ने अपने विचार से धर्म की]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>धर्म क्या है यह समझे बिना उसकी आलोचना करना गलत है। किसी भी धार्मिक विद्वान् ने अपने  विचार से धर्म की  आज तक कोई एक परिभाषा तय नहीं की , इसका कारण यह है कि जिन लोगों ने बुद्धिमान  और शिक्षित होने का ठेका लिया है वह वादों-विवादों में इतना फंस  जाते हैं उन्हें पता ही नहीं रहता कि कोई निष्कर्ष क्या निकला? एक तरफ वह लोग हैं जिन्हें धर्म नहीं सुहाता और वह इसे भ्रम घोषित कर देते हैं तो दूसरी तरफ वह हैं जो धर्म के रक्षक और पोषक होने का दावा करते हैं और कर्मकांडों को ही उसका पर्याय घोषित कर देते हैं ।  यह लेखक कोई बहुत बड़ा   विद्धान है   या नहीं यह तो  पढने  वाले लोग ही तय करेंगे, पर यहाँ साफ करना जरूरी है  कि मेरे पास अपने धर्म के लिए कोई पदवी नहीं है फिर भी  अपने विचार व्यक्त करने से बाज नहीं आऊंगा क्योंकि धर्म के आलोचक और प्रशंसक दोनों के तर्कों से में प्रभावित नहीं हूँ ।<br />
             देश के वर्तमान हालत जो हैं उसकी वजह लोगों का अपने  धर्म से दूर होना ही है-यह लेखक की  स्पष्ट मान्यता है। धर्म को अगर हम कर्मकांडों से जोड़कर ही देखेंगे तो उसके स्वरूप में एक नहीं सेंकड़ों दोष दिखाई देंगे , और केवल अध्यात्म से जोड़ कर देखेंगे तो धर्म अंध समर्थक नहीं मानेंगे । जबकि लेखक  मानना है कि धर्म की सबसे बड़ी पहचान अध्यात्म ही है । आध्यात्मिक साधना एकांत में होती है और उसके लिए कोई शोर-शराबा नहीं  होता और जो लोग शोर-शराबा कर अपने धार्मिक होने का प्रमाण देते हैं वह दूसरे को कम अपने को ज्यादा धोखा देते हैं। अध्यात्म वह है जो इस शरीर में विद्यमान है और उससे साक्षात्कार किये बिना हम चल रहे हैं तो यह समझ लेना चाहिए कि अज्ञान के उस अँधेरे में हैं जहां हमें दोषों के अलावा कुछ और नहीं दिखाई देगा और उनको देखते हम अपनी पूरी ज़िन्दगी बिता देते हैं ।<br />
              आजादी के बाद  लार्ड मैकाले की द्वारा रची गयी शिक्षा पध्दति को ही जारी रखा गया जो केवल गुलाम पैदा करती है और नकारात्मक  सोच उत्पन्न करती है। हिंदू धर्म के आलोचक ग्रंथों के कुछ ऐसे हिस्सों को पढ़कर सुनते है जो वर्तमान समय में लोगों की दृष्टि में अप्रासगिक हो चुके और धर्मभीरू होने के बावजूद लोग उसे महत्व नहीं देते। इससे फायदा किसे हुआ? इस देश में एक ऐसा वर्ग हमेशा रहा है जो यहां के लोगों के बुद्धि   तत्व पर नियंत्रण कर उसका लाभ उठाना चाहते हैं -और इसने धर्म के आलोचक और प्रशंसक दोनों ही शामिल है । इन दोनों ने मिलकर समाज में ऐसे द्वन्द्वों को जन्म दिया जिससे न केवल  देश में नैतिक आचरण का पतन हुआ बल्कि समाज में सामाजिक समरसता के भाव का भी क्षरण हुआ। भगवान श्रीराम और श्री कृष्ण जी के चरित्रों को शैक्षिक  पाठ्यक्रमों में न रखने से दोनों वर्गों  को लाभ हुआ। धर्म के प्रशंसकों को अपने ढंग से व्याख्या कर धन और प्रतिष्ठा अर्जित करने का स्वर्णिम अवसर मिला तो आलोचकों को नये भगवान् गड़कर स्वयं को विद्धान साबित कराने का अवसर मिला। </p>
<p>                 अगर श्रीराम और श्री कृष्ण आज भी  देश के आराध्य होते तो बाल्मीकि, तुलसी और वेदव्यास का नाम होता और नये भगवानों को गढ़ने वाले को लेखक और विद्वान् होने का गौरव कहॉ मिलता? धर्म प्रशंसक भी कम नहीं है उन्होने भी नये भगवान् भले नहीं बनाए पर उनका नाम लेकर भक्तों को भ्रमित कम नहीं किया। कई संत और साधू तो ऐसे हैं कि अपने पीछे भगवन की तस्वीर रखकर आरती करवाते हैं जो भगवान् की भी लगे तो उनकी भी। यानी आलोचकों को यह न लगे कि वह अपनी आरती करवा रहे हैं तो भक्त को यह लगे के उनकी आरती हो रही हैं।<br />
             धर्म प्रचारक नहीं होने के बावजूद लेखक  इस बात को ख़ूब समझता है  कि धर्म और अध्यात्म एकांत साधना है और अंतर्मन की शुध्दी के लिए हमें यह करना भी चाहिए । लेखक   आधुनिक शिक्षा का विरोधी नहीं है  क्योंकि  अपने धर्म ग्रंथों के अध्ययन  से ही यह ज्ञान पाया है कि आदमी को विज्ञान के साथ  ज्ञान भी होना चाहिए। मैं यह पंक्तिया लिख रहा हूँ यह मेरी इसी शिक्षा का परिणाम है । हाँ जो मुझे अध्यात्म की शिक्षा अपने माता-पिता से मिली है उसकी चर्चा भी जरूर करना चाहूँगा जो अब बहुत कम लोगों को मिल रही है। अगर वह शिक्षा मेरे पास नहीं होती तो इतनी मेहनत से यह ब्लोग नहीं लिख रहा होता। कुछ काम ऐसे भी करना चाहिए जिससे लोगों को प्रसन्नता और ज्ञान मिले।  मैं इस ज्ञान चर्चा को सत्संग का हिस्सा मानता हूँ जिसे अंतर्मन में शुद्धता  और स्फूर्ति आती है, और कोई आपकी बुद्धि  का हरण कर आपको भटका नहीं सकता , जैसा कि आजकल लोगों के   साथ हो रहा है।  आपने देखा ही होगा कि किस तरह जाति, धर्म, पंथ, भाषा और वर्ग के नाम पर लोगों को बरगलाकर देश में हिंसा और अशांति का माहौल बनाया जा रहा है।  अगर लोगों के पास अपने धर्म और आध्यात्म की शिक्षा होती तो ऐस नहीं होता क्योंकि तब उनके पास अपना ज्ञान होता और किसी के बरगलाने में वह नहीं आते । शेष अगले अंक में (यह चर्चा इसी ब्लोग पर जारी रहेगी) </p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://anant-sindhu.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका ’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<p>अध्यात्म,  हिन्दू, धर्म, हिन्दी साहित्य,समाज,</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[आतंक के विरुद्ध कार्रवाई आवश्यक-आलेख]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2008/12/06/atank-ke-virudh-karrvaaee-hindi-article/</link>
<pubDate>Sat, 06 Dec 2008 07:01:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2008/12/06/atank-ke-virudh-karrvaaee-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की प्रत्यक्ष रूप से युद्ध की संभावना नहीं है पर इस बात से इंकार करना ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की प्रत्यक्ष रूप से युद्ध की संभावना नहीं है पर इस बात से इंकार करना भी कठिन है कि कोई सैन्य कार्यवाही नहीं होगी।  पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी ने स्पष्ट रूप से 20 आतंकवादी भारत को सौंपने से इंकार कर दिया पर उन्होंने यह नहीं कहा कि वह उनके यहां नहीं है।  स्पष्टतः उन्होंने दोनों पक्षों के बीच अपने आप को बचा लिया या कहें कि एकदम बेईमानी वाली बात नहीं की। हालांकि इससे यह आशा करना बेकार है कि वह कोई भारत के साथ तत्काल अपना दोस्ताना निभाने वाले हैं जिसकी चर्चा वह हमेशा कर रहे हैंं।  </p>
<p>जरदारी आतंकवादियों का वह दंश झेल चुके हैं जिसका दर्द वही जानते हैं।  अगर वह सोचते हैं कि  आतंकवादियों का कोई क्षेत्र या धर्म होता है तो गलती पर हैंं। भारत के आतंकवादी उनके मित्र हैं तो उन्हें यह भ्रम भी नहीं पालना चाहिये क्योंकि यही आतंकवादी उनके भी मित्र हैं जो पाकिस्तान के लिये आतंकवादी है। आशय यह है कि आतंकवादी उसी तरह की राजनीति भी कर रहे हैं जैसे कि सामान्य राजनीति करने वाले करते हैं।  राजनीति करने वाले लोग समाज को धर्म, जाति,भाषा, और क्षेत्र के नाम बांटते हैं और यही काम आतंकी अपराध करने वाले समूह सरकारो में बैठे लोगों के साथ कर रहे हैं।  वह उनको बांटकर यह भ्रम पैदा करते हैं कि वह तो सभी के मित्र हैं। अगर आम आदमी की तरह शीर्षस्थ वर्ग के लोग भी अगर इसी तरह आतंकी अपराध करने वाले समूहों की चाल में आ जायेंगे तो फिर फर्क ही क्या रह जायेगा?  आसिफ जरदारी किस तरह के नेता हैं पता नहीं? वह परिवक्व हैं या अपरिपक्व इस बात के प्रमाण अब मिल जायेंगे।  एक बात तय रही कि जब तक भारत का आतंकवाद समाप्त नहीं होगा तब तक पाकिस्तान में अमन चैन नहीं होगा यह बात जरदारी को समझ लेना चाहिये। </p>
<p>कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि बेनजीर के शासनकाल में ही भारत के विरुद्ध आतंकवाद की शुरुआत  हुई थी। अगर जरदारी अपनी स्वर्गीय पत्नी को सच में श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो वह चुपचाप इन आतंकवादियों को भारत को सौंप दें पर अगर वह अभी ऐसा करने में असमर्थ अनुभव करते हैं तो फिर उन्हें राजनीतिक चालें चलनी पड़ेंगी।  इसमें उनको अमेरिका और भारत से बौद्धिक सहायता की आवश्यकता है पर सवाल यह है कि क्या अमेरिका अभी भी ढुलमुल नीति अपनाएगा।  हालांकि उसके लिये अब ऐसा करना कठिन होगा क्योंकि रक्षा विशेषज्ञ उसे हमेशा चेताते हैं कि आतंकवादी भारत में अभ्यास कर फिर उसे अमेरिका में अजमाते हैं।  अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफ.बी.आई. ने ऐसे ही नहीं भारत में अपना पड़ाव डाला है।  भारत की खुफिया ऐजेंसियेां के उनके संपर्क पुराने हैं और जिसके तहत एक दूसरे को सूचनाओं का आदान प्रदान होता है-यह बात अनेक बार प्रचार माध्यमों में आ चुकी है। </p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के महासचिव वान कहते हैं कि यह अकेले भारत पर नहीं बल्कि पूरे विश्व पर हमला है। इजरायल भी स्वयं अपने पर यह हमला बताता है।  पाकिस्तान इस समय दुनियां में अकेला पड़ चुका है।  ऐसे में अगर वहां लोकतांत्रिक सरकार नहीं होती तो शायद उसे और मुश्किल होती पर इस पर भी विशेषज्ञ एक अन्य राय रखते हैं वह यह कि जब वहां लोकतांत्रिक सरकार होती है तब वहां की सेना दूसरे देशों में आतंकवाद फैलाने के लिये बड़ी वारदात करती है पर जब वहां सैन्य शासन होता है तब वह कम स्तर पर यह प्रयास करती है।  वह किसी तरह अपने लेाकतांत्रिक शासन का नकारा साबित कर अपना शासन स्थापित करना चाहती है।  </p>
<p>अनेक विदेश और र+क्षा मामलों में विशेषज्ञ वहां किसी तरह सीधे आक्रमण करने के प+क्ष में हैंं। यह कूटनीति के अलावा सैन्य कार्यवाही के भी पक्षधर हैं।  एक बात जो महत्वपूर्ण है। वह यह कि पाकिस्तान की सीमा अफगानिस्तान से लगी अपनी सीमा पर उन तालिबानों ने को तबाह करने में वहां की सेना  अक्षम साबित हुई है और इसलिये वहां से भागना चाहती है और अब भारत के तनाव के चलते ही वह भारतीय सीमा पर भागती आ रही है।  हो सकता है कि यह उसकी चाल हो। मुंबई में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. और सेना के हाथ होने के प्रमाण को विशेषज्ञ इसी बात का द्योतक मानते हैंं। </p>
<p>इस समय पाकिस्तान पूरे विश्व की नजरों में है और भारत जो भी कार्यवाही करेगा उसके लिये वह अन्य देशों को पहले विश्वास में लेगा तभी सफलता मिल पायेगी।  भारत अकेला युद्ध करेगा पर उसके लिये उसे विश्व का समर्थन चाहिये।  लोग सीधे कह रहे हैं कि अकेले ही तैश में आकर युद्ध करना ठीक नहीं होगा।  पाकिस्तान की सेना का वहां अभी पूरी तरह नियंत्रण है और फिलहाल वहां के लोकतांत्रिक नेताओं का उनकी पकड़ से बाहर तत्काल  निकलना संभव नहीं है।  ऐसे में कुटनीतिक चालों के बाद ही कोई कार्यवाही होगी तब ही कोई परिणाम निकल पायेगा।  अगर भारत ने कहीं विश्व की अनदेखी की तो उसके लिये भविष्य में परेशानी हो सकती है।  जिन्होंने 1971 का युद्ध देखा है वह यह बता सकते हैं कि युद्ध कितनी बड़ी परेशानी का कारण बनता है।  यही कारण है कि प्रबुद्ध वर्ग वैसी आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दे रहा जैसी कि प्रचार माध्यम चाहते हैं।  यह प्रचार माध्यम अपनी व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के चलते देश भक्ति के जो नारे लगा रहे हैं वह इस बात का जवाब नहीं दे सकता कि क्या उसे इससे कोई आय नहीं हो रही है। एस.एम..एस. करने पर जनता का खर्च तो आता ही है। </p>
<p>पाकिस्तान के प्रचार माध्यम भी भारत के प्रचार माध्यमों की राह पर चलते हुए अपने देश में कथित रूप से भारत के बारे में दुष्प्रचार कर रहे हैं पर वह उस तरह का सच अपने लोगों का नहीं बता रहे जैसा कि भारतीय प्रचार माध्यम करते हैं।  भले ही भारतीय प्रचार माध्यम अपने लिये ही कार्यक्रम बनाते हैं पर कभी कभार सच तो बता देते हैं पर पाकिस्तान के प्रचार माध्यम उससे अभी दूर हैंं।  उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि यह आंतकी अपराधी उनके देश के ही दुश्मन हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी और प्रधानमंत्री गिलानी मोहरे हैं पर उन पर यह जिम्मेदारी आन पड़ी है जिस पर पाकिस्ताने के भविष्य का इतिहास निर्भर है। भारत के दुष्प्रचार में लगे पाक मीडिया को ऐसा करने की बजाय ऐसी सामग्री का प्रकाशन करना चाहिये जिससे कि वहां की जनता के मन में भारत के प्रति वैमनस्य न पैदा हो।<br />
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<blockquote><p><strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
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</item>
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<title><![CDATA[पाकिस्तान को भी झेलना पड़ सकता है संकट-आलेख]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/2008/12/04/pakistan-ko-bhee-jhelnaa-padh-sakta-hai-sankat/</link>
<pubDate>Thu, 04 Dec 2008 12:32:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.wordpress.com/2008/12/04/pakistan-ko-bhee-jhelnaa-padh-sakta-hai-sankat/</guid>
<description><![CDATA[अगर संकेतों को साफ समझें तो आने वाले दिनों में भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ घटने वाला है। मुंबई में ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अगर संकेतों को साफ समझें तो आने वाले दिनों में भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ घटने वाला है।  मुंबई  में हुए आतंकी हमले में पाकिस्तान की जमीन उपयोग करने का प्रमाण साफ मिल गया है और जिस तरह हमले में विदेशी नागरिक मरे हैं उसका विश्वाव्यापी प्रभाव हुआ है और पूरी दुनियां भारत की तरफ देख रही है कि वह कार्यवाही करता है।<br />
राजनीति और सैन्य विशेषज्ञों की राय तो यही है कि पाकिस्तान के साथ जो इस समय राजनीतिक तौर पर सौहार्दपूर्ण संबंध हैं उसके चलते सीधी सैन्य कार्यवाही की धमकी देना ठीक नहीं है पर सीमित मात्रा में उसके आतंकी इलाकों पर हमला कर देना चाहिये।  यह राय जो विशेषज्ञ दे रहे हैं वह न केवल अनुभवी हैं बल्कि उनका सम्मान भी हर कोई करता है। </p>
<p>भारत पाकिस्तान के बीच कोई बड़ा युद्ध होगा इसकी संभावना अगर न ही लगती तो यह भी लगता है कि कुछ न कुछ होगा।  क्या होगा? इसका उत्तर देने से पहले पाकिस्तान की अंदरूनी स्थिति को समझना जरूरी है।  पाकिस्तान में इस समय लोकतंत्र है। मुंबई के आतंकी हमले को लेकर वहां के लोकतांत्रिक नेताओं पर सीधे कोई आरोप नहीं लगा रहा।  भारत भी नाराज बहुत है  फिर भी वहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के प्रतिकूल कोई टिप्पणी नहीं दिखाई दे रही।  दोनों नये हैं और लोकतांत्रिक नेता होने के नाते जानते हैं कि इस हमले से भारत ही नहीं बल्कि  विश्व के सभी लोग उससे नाराज हैं।  पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी तो भारत के साथ मित्रता के लिये अनेक बयान दे चुके हैं।  प्रधानमंत्री गिलानी भी कोई भारत के विरुद्ध कोई अनर्गल बात नहीं कहते। इन दोनों के साथ कठिनाई यह है कि सेना पर अभी तक इनका वर्चस्व स्थापित नहीं हो सका है।  दोनों साफ नहीं कहते पर यह सच है कि दोनों ही सेना से डरे हुए हैं और वह जानते हैं कि उनकी खुफिया ऐजेंसी आई.एस.आई. सेना और अपराधी शामिल  भारत में आतंकी गतिविधियों में  हैं पर कोई कार्यवाही कर पायेंगे इसमें संदेह है।</p>
<p>इन दोनों में भी एक अंतर है।  जरदारी सिंध  और गिलानी पंजाब प्रांत  के हैं । पाकिस्तान में चार प्रांत हैं-पंजाब,सिंध,सीमा प्रांत, और बलूचिस्तान।  आजादी के बाद पंजाब प्रांत का ही प्रभाव बाकी तीनों प्रांतों पर रहा है। सेना और प्रशासन पर उनका वर्चस्व रहा है पर बाकी तीनों प्रांतों में लोग आज भी पाकिस्तान का हृदय से अस्तित्व नहीं स्वीकार करते। भारत के विरुद्ध सबसे अधिक सक्रियता पंजाब प्रांत के लोग ही दिखाते हैं।  शुरु में कबायली लोगों ने कश्मीर पर कब्जा करने में पाकिस्तान की सहायता अवश्य की थी पर बाद वह भी वहां की सरकार से  असंतुष्ट हो गये।  गिलानी भले ही पीपुल्स पार्टी के हैं और उन पर आसिफ जरदारी का पूरा नियंत्रण लगता है पर उनका पंजाबी होना भी यह संदेह पैदा करता है कि वह शायद ही भारत के हितचिंतक हों।  जरदारी उस सिंध के हैं जो पाकिस्तान भक्ति से कोसों दूर हैं। बलूचिस्तान और सीमाप्रांत तो नाम के लिये ही पाकिस्तान का भाग हैं बाकी वहां के लोग अपना स्वायत्त जीवन जीते हैं।  </p>
<p>सबसे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने तो पहले स्वयं ही माना है कि मुंबई में हुए हमले में उनके देश के उन तत्वों का हाथ हो सकता है जो दोनों के बीच दुश्मनी कराना चाहते हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि ‘उनकी सजा हमें क्यों देते हो?’ हालांकि बाद में भारत द्वारा 20 आंतकवादी मांगने के बाद उन्होंने इस बात से इंकार कर दिया। इससे यह तो पता चलता है कि पाकिस्तान में पंजाब की लाबी बहुत प्रभावी है और उसकी सहमति के बिना वहां काम करना कठिन है।</p>
<p>पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार होने के कारण भारत भी फूंक फूंक कर कदम रख रहा है क्योंकि वह ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता कि वहां की लोकतांत्रिक सरकार वहां अलोकप्रिय हो।  ऐसे पाकिस्तान के अंदर सीमित कार्यवाही करने की संभावना बनती दिख रही है हालांकि पाकिस्तानी सेना की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी यह भी देखने वाली बात है। इस सीमित कार्यवाही में पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकी शिविरों पर हमला करना भी शामिल है।  वैसे अधिकतर विशेषज्ञ पाकिस्तान का बंटवारा करवाने के पक्ष में नहीं है पर कुछ लोग मानते हैं कि वहां की अदंरूनी राजनीति के गड़बड़झाले का लाभ उठाते हुए उसका विभाजन करना भी बुरा नहीं है।  </p>
<p>भारतीय रक्षा,राजनीति और विदेश नीति विशेषज्ञ भी मानते हैं कि काबुल में हुए भारतीय दूतावास और अब मुंबई पर हमले में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी,सेना और अपराधियों का हाथ तो है पर वहां के प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति और अन्य लोकतांत्रिक नेता उनसे जुड़े नहीं है।  ऐसे में आक्रमण की स्थिति होने पर वहां की लोकतांत्रिक सरकार भला कैसे चुप बैठ सकती है? आखिर कैसे वह भारत का समर्थन कर सकते है?’</p>
<p>पाकिस्तान का पूरा प्रशासन तंत्र अपराधियों के सहारे पर टिका है। वहां की सेना और खुफिया अधिकारियों के साथ वहां के अमीरों को दुनियां भर के आतंकियों से आर्थिक फायदे होते हैं।  एक तरह से वह उनके माईबाप हैं। यही कारण है कि भारत ने तो 20 आतंकी सौंपने के लिये सात दिन का समय दिया था पर उन्होंने एक दिन में ही कह दिया कि वह उनको नहीं सौंपेंगे।  वैसे देखा जाये तो काबुल दूतावास पर भारतीय दूतावास पर हमले पर भारत में उच्च स्तर पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी पर चूंकि आम जनता उससे सीधे जुड़ी नहीं थी इसलिये इसका भारतीय प्रचार माध्यमों ने प्रचार भी नहीं किया। वैसे भी प्रचार माध्यम इस समय भले ही पाकिस्तान के प्रति रोष दिखा रहे हैं पर यही अपने कार्यक्रमों और प्रकाशनों में वहां के लोगों को स्थान देने के लालायित रहते हैं।  भारतीय प्रचार माध्यम पाकिस्तान से आम आदमी के स्तर पर सपंर्क के नाम पर वहां के कुछ खास लोगों का यहां अपने व्यवसायिक उपयोग करते हैं। आज जब मुंबई पर हमला हुआ है तब उन्हें पाकिस्तान खलनायक नजर आ रहा है पर इस प्रचार में भी उनका व्यवसायिक भाव दिख रहा है-दिलचस्प बात यह है कि पाकिंस्तान से सभी प्रकार के संपर्क तोड़ने का नारा कोई नहीं लगा रहा है क्योंकि सभी अपने भविष्य की व्यवसायिक संभावनाओं को जीवित रखना चाहते हैं।  </p>
<p>बहरहाल आने दिनों वाले में क्या होगा? कुछ नहीं कहा जा सकता है पर इतना तय है कि भारत और पाकिस्तान में अंदरूनी राजनीतिक गतिविधियां तीव्र हो जायेंगी।  अगर आगे आतंकी घटनायें रोकनी हैं तो कुछ कठोर कदम तो उठाने ही होंगे। सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो फिर लोगों को समझाना कठिन होगा।  पाकिस्तान के खिलाफ एक बड़ा युद्ध न भी हो पर सीमित कार्यवाही  अवश्यंभावी प्रतीत होती  है क्योंकि इसके बिना भारत के शक्तिशाली होने का प्रमाण नहीं मिल सकता। अब यह देखने वाली बात होगी कि आगे क्या होता है? एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि जब तक भारत इस आतंकवाद का मूंहतोड़ जवाब नहीं देता तब तक लोग उसकी शक्ति पर यकीन नहीं करेंगे।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<blockquote><strong>यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://anantraj.blogspot.com">‘अनंत शब्दयोग’</a>पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कोई अपने गिरेबान में नहीं झांक रहा है-आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2008/12/04/apne-gireban-men-koyee-nahin-jhank-raha/</link>
<pubDate>Thu, 04 Dec 2008 12:17:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[इन पंक्तियों के लेखक की अखबार में प्रकाशित पहली कविता ही आतंक के विरुद्ध थी। यह कविता एक प्रतिष्ठत अ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>इन पंक्तियों के लेखक की अखबार में प्रकाशित पहली कविता ही आतंक के विरुद्ध थी। यह कविता एक प्रतिष्ठत अखबार  में आज से सत्ताईस वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई थी।  अगर देश में आतंकवाद के पनपने की बात करें तो वह तीस वर्ष से अधिक का हो चुका है।  इसमें हजारों जाने जा चुकी है और घर बरबाद हो चुुके हैं।  हां, तीस वर्ष से आतंकवाद का दर्द झेलने वाले लोग इसके बदलते चेहरों को भी जानते हैं और हर घटना पर उनका मन रोता है।  इन आतंकवादी घटनाओं में जिन लोगों ने अपने लोग खोये उनमें से फिर कितने बसे या फिर अभी तक बरबादी के दौर से गुजर रहे हैं इसका कोई हिसाब नहीं दे पाता।   देखा यह गया है कि अनेक प्रचार माध्यम इन घटनाओं को बढ़चढ़ कर छापते हैं। उनकी सामग्री में आतंकी और उनके आश्रय दाताओं का वर्णन निरंतर होता है पर जिन लोगों ने इन घटनाओं में हानि उठायी और फिर  उसकी वह भरपायी कर पाये कि नहीं इसकी चर्चा कहीं न होती।  फिल्मों में भी आतंकियों को प्रभामंडित किया गया पर पीडि़तों पर कोई फिल्म नहीं बनी।  सहित्य और पत्रकारिता के अनेक महानुभावों ने भी खूब लिखा पर आतंकियों पर ही,,पीडि़तों पर वह भी खामोश रहे। </p>
<p>आशय यह है कि इस देश के अनेक लोग हैं जिन्होंने यहां फैलते आतंकवाद का जन्म और उसका पालन पोषण होते देखा है।  नयी पीढ़ी के अनेक लोग तो केवल उन्हीं घटनाओं के बारे जानते होंगे जो जो उनके सामने हो रहीं हैं पर वह अपनी पूरानी पीढ़ी के लोगों से पूछे तो उनको कई हृदय विदारक घटनाओं की जानकारी मिल जायेगी। अब यह कहना बेकार है कि यह घटना बड़ी है या यह छोटी।  अगर कहीं किसी  गरीब, सामान्य श्रेणी या प्रसिद्धिहीन व्यक्ति की मौत को  छोटी और किसी अमीर,विशिष्ट श्रेणी या प्रसिद्ध व्यक्ति की मौत को बड़ी घटना कहा जायेगा तो उससे अनेक तरह के विवाद खड़े होंगे और कोई भी आंदोलन निरर्थक हो सकता है। उसी तरह छोटे और बड़े शहर का भेद भी कम परेशानी वाला नहीं है।<br />
आंतकवाद का दर्द देश हर वर्ग और प्रदेश के आदमी ने भोगा है।  घटना कहंी भी हो वहां मौजूद रहने वाला व्यक्ति उसी शहर या क्षेत्र का हो यह जरूरी नहीं है।  कई लोग अपने घर स परे दूसरे शहर में भी आतंकी हिंसा का शिकार होते हैं।<br />
जिन लोगों ने आतंकवाद से उपजी पीड़ा को निरंतर अनुभव किया है वह कोई भेद नहीं करते और यही कारण है प्रचार माध्यम किसी खास घटना को लेकर उस पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं तो ऐसे प्रबंुद्ध लोग उसे केवल व्यवसायिक भाव ही मानते हैं-इससे यह नहीं समझना चाहिये कि उनके द्वारा प्रचारित घटना के प्रति उनके मन में कोई पीड़ा नहीं है।  कहते हैं कि निरंतर झेलते हुए दर्द भी एक आदत बन जाती है और फिर आदमी उसकी शिकायत नहीं करते।  इस देश के प्रबुद्ध लोगों की हालत भी कुछ ऐसी हो गयी है और वह किसी एक घटना पर अपने दर्द की ऐसी अभिव्यक्ति नहीं कर पाते जैसे नये लोग कर जाते हैं। </p>
<p>नयी पीढ़ी के अनेक लोगों को आतंकवाद तो बस एक नारे की तरह लगता होगा जिसमें बेकसूरों की जान जाती है पर उसके प्रायोजकों के बारे में नहीं पता जिनसे प्रचार माध्यम स्वयं भी बचते हैं।  शायद नयी पीढ़ी के अनेक लोगों को यह सुनकर आश्चर्य होगा कि इस देश के अनेक हिस्सों में व्याप्त आतंकवादियों के आश्रयदाता इस देश में भी रहते हैं और गाहे बगाहे उनका जिक्र कुछ प्रचार माध्यम करते हैं पर उनका होता कुछ नहीं है।   आम आदमी उनका नाम पढ़कर भूल जाते हैं। कहते हैं कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है पर इस देश में पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े मूर्धन्य लोग भी इस बीमारी का शिकार है। इस लेखक को तो यही लगता है कि अनेक लोग सत्य लिखते नहीं है और अगर कोई और लिखे तो उससे मूंह फेर जाते है या फिर याद नहीं रखते। </p>
<p>हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि आतंकवाद अब सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया है क्योंकि आधुनिक विज्ञान ने अगर इंसान को शक्तिशाली बनाया है तो शैतान ने भी कोई कम ताकत नहीं पायी।<br />
हिंदी के ब्लाग जो लोग पढ़ रहे हैं वह इस बात को समझ सकते हैं कि  इस आतंकवाद पर इस देश के प्रबुद्ध वर्ग का क्या रवैया है?  यह एक कड़वा सच है कि आतंकवाद ने रूप बदले हैं पर कम नहीं हुआ।  उसमें निरंतर वृद्धि होती रही।  प्रचार माध्यम समय के अनुसार उसमें अपना नजरिया बदलते रहते हैंं-अगर कहा जाये तो वह अपने व्यवसाय के हिसाब से लोगों में जज्बात बनाते और बिगाड़ कर उनसे अपनी आय अर्जित करते हैं।<br />
भारत एक बृहद देश है और उसने अनेक युद्ध और आतंकी घटनायें झेली हैं।  अभी हाल ही में जब भारत ने चंद्रयान आकाश में भेजा था तो उससे कई अन्य देशोंं का मूंह सूख गया है और वह उसे एक कमजोर राष्ट्र प्रमाणित करना चाहते हैं। अपने देश  में अचानक आतंकी अपराधों में वृद्धि इस बात को दर्शाती है कि अनेक अन्य देशों की सरकारों, खुफिया ऐजेंसियों और अपराधियों के समूह ने इस देश के अस्थिर करने का मन बना लिया है।  दरअसल अभी भी उनकी मानसिक परेशानी  यही है कि उनके इतने आक्रमणों के बावजूद यह देश बिखरने की बजाय तरक्की क्यों करता जा रहा है?  ऐसे लोगों का प्रतिकार करने वाली सरकारें,खुफिया एजेंसी या अन्य संस्थाऐं अपनी गोपनीय प्रतिबद्धताओं के कारण कई बातें सरेआम कह नहीं पातीं इसलिये लोगों की उसकी तरफ नजर नहीं जाती और वह अपने विचार बनाने लगते हैं।  जबकि यह वास्तविकता है कि सभी संस्थायें सक्रिय रहती हैं।</p>
<p>प्रचार माध्यम अपना संयम खो रहे हैं। सच बात तो यह है कि वह जिस लोकतंत्र को चुनौती वह दे रहे हैं उसी के आधार पर उनका व्यापार टिका है।  तमाम लोग तरह तरह की बातें  कर रहे हैं पर कोई अपने गिरेबान में नहीं झांक रहा है।  ऐसा लगता है कि कुछ हस्तियां अब अवतार बनने की कोशिश कर रहीं हैं।  वह  आतंक के विरुद्ध जो अपना जोश और पीडि़तों के प्रति जो सहानुभूति दिखा रहे हैं उसमें कितना सच है और कितना दिखावा अभी इस पर बहस नहीं छिड़ी है और अगर अधिक हुआ तो इस पर भी चर्चा शुरू हो जायेगी।  ऐसी हस्तियों को यह सोच लेना चाहिये कि ऐसी आतंकी घटनायें कोई पहली बार नहीं हुई और जो पहले हुईं उसका दर्द भी देश ने भुला दिया। कभी न कभी उस घटना का भी असर कम होगा पर तब उनके जोश और सहानुभूति पर सवाल उठे तो उनके लिये भी जवाब देना कठिन हो जायेगा। बेहतर यही है कि आतंकी घटनाओं पर संयमित प्रतिक्रिया दी जाये क्योंकि जब लोग किसी एक जगह पर हुई घटना पर बहस करते हैं तब आतंकी दूसरी जगह करने की योजना बना रहे होते हैं। अगर असंयमित प्रतिक्रियाओं से कहीं आतंक से लड़ने वाली अधिकारिक संस्ंथाओं का ध्यान बंटा तो उसका लाभ आतंकियों को ही मिल सकता है।<br />
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<strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://amrut-sandesh.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[चंद्रयान-1 के अभियान से विश्व में भारत का सम्मान बढ़ेगा-आलेख]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/2008/10/24/chandrayaan-1-mission-in-the-world-will-increase-the-celebration-of-india-articles/</link>
<pubDate>Thu, 23 Oct 2008 13:59:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.wordpress.com/2008/10/24/chandrayaan-1-mission-in-the-world-will-increase-the-celebration-of-india-articles/</guid>
<description><![CDATA[श्री हरिकोटा से ‘चंद्रयान-1’ का प्रक्षेपण हमारे भारत देश के लिये विश्व के विज्ञान जगत में प्रतिष्ठा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>श्री हरिकोटा से ‘चंद्रयान-1’ का प्रक्षेपण हमारे भारत देश के लिये विश्व के विज्ञान जगत में प्रतिष्ठा के चार  चांद लगाने वाली बहुत बड़ी घटना है। यह आश्चर्य की बात है कि भारतीय समाचार चैनल इस घटना को प्रमुखता देने की बजाय देश में हो रही  हिंसक घटनाओं को अग्रता प्रदान कर रहे हैं।  कुछ खबर को विस्तार देने के लिये फिल्मों के चांद पर लिखे गये गानों को सुनाकर अपने कार्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे हैं। इस खबर का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव होगा उसका आंकलन करना आवश्यक है जो शायद कल कुछ समाचार पत्र के संपादक अपने संपादकीय लिख कर पूरा करेंगे।<br />
अभी तक भारतीय विज्ञान की प्रगति और तकनीकी के चर्चे बहुत थे पर चंद्रयान-1 का प्रक्षेपण  देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसे प्रमाणिक स्वरूप प्रदान करेगा इसमें संदेह नहीं है। सच तो यह है कि परमाणु विस्फोटों से जहां अन्य देशों के लोगों में भारत के लिये नकारात्मक संदेश गया था पर इससे सकारात्मक संदेश जायेगा। वह यह कि भारत विज्ञान की प्रगति केवल अपने सुरक्षा के लिये नहीं बल्कि विश्व कल्याण के लिये भी करना चाहता है।<br />
परमाणु बम भले ही घोषित रूप से कुछ ही देशों के पास है पर अघोषित रूप से कई अन्य के पास होने का भी संदेह है। फिर परमाणु बम अंततः मानव सभ्यता को कुछ नहीं देता जबकि चंद्रयान-1 के निष्कर्षों से पूरा विश्व लाभन्वित होगा। अमेरिका ने चंद्रमा पर अपना विमान पहले भेजकर ही अपनी शक्ति का लोहा मनवाया था।  वैसे उसने जापान पर परमाणु बम गिराकर अपनी शक्ति दिखाई थी पर उसे वास्विकता प्रतिष्ठा चंद्रमा पर यान भेजने के बाद ही प्राप्त हुई थी।<br />
हो सकता है कि इस पर आये खर्चे पर कुछ लोग यह कहकर आलोचना करें कि इससे देश की गरीबों में बांटा जा सकता था पर यह उनकी अज्ञानता का प्रमाण माना जायेगा।  इस पर आया खर्च एक तो बहुत कम है दूसरे एक सभ्य समाज और राष्ट्र को ‘विज्ञान के क्षेत्र’ मेंे प्रगति करना चाहिये ताकि उसके दायरे में  मौजूद प्रतिभाशाली लोगों को अवसर मिले। उनका आत्मविश्वास बना रहे इसलिये ऐसे वैज्ञानिक प्रयोग निरंतर करते रहना चाहिये। इससे समाज और राष्ट्र का अन्यत्र सम्मान बढ़ता है और प्रतिभाशाली लोगों के आत्मविश्वास से उसकी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा संभव है। </p>
<p>हालांकि इस यान में अन्य देशों की भी भूमिका है पर यह भारत के हरिकोटा से छोड़ा गया है और इसका आशय यह है कि इसरो ने अब नासा के समकक्ष अपनी भूमिका निभाने का प्रयास प्रारंभ कर दिया है। भारतीय वैज्ञानिक   अंतरिक्ष में अंतर्राष्ट्रीय जगत पर अपनी भूमिका निभाने के लिये अब बहुत तत्पर लगते हैं।  इसका कारण यह भी है कि अमेरिका से उपग्रह भेजना बहुत महंगा है और भारत इसके लिये अब एक सस्ता देश हो गया है। यही कारण है हमारे देश के वैज्ञानिक अपने उपग्रह अंतरिक्ष में भेज रहे हैं बल्कि दूसरों का भी सहयोग कर रहे हैं। संभव है कि किसी दिन रूस,अमेरिका,फ्रांस और ब्रिटेन किसी दिन अपने उपग्रह भारत ये भेजने का विचार करें।<br />
आमतौर से विज्ञान और व्यापार के विषय राजनीति से बाहर रखे जाते हैं पर भारत के पड़ौसी देशों में पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो भारत के साथ हर क्षेत्र में राजनीति जोड़ लेता है। वरना वहां के कई समझदार लोग सलाह देते हैं कि अंतरिक्ष, विज्ञान, स्वास्थ्य और व्यापार के मामले में भारत की मदद ली जाये। </p>
<p>चंद्रयान-1 प्रक्षेपण में अमेरिका भी जुड़ा हुआ है और यह इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान और अंतरिक्ष मामले में उसके और भारत के संबंध में कितनी गहराई है। शीतयुद्ध के समय भी भारत के इंसैट उपग्रहों की श्रृंखला का  अमेरिका से ही प्रक्षेपण  हुआ   और भारत के संचार  क्रांति मेंं उसकी भूमिका को आज भी पुराने लोग जानते हैं। हमेशा भारत के मित्र रहे सोवियत संघ ने भी विज्ञान में अमेरिका के समान ही प्रगति की पर उसकी भूमिका इस मामले में नगण्य ही रही। यही कारण है कि आज भी हमारे देश में सोवियत संघ को अमेरिका के मुकाबले समर्थन देने वाले कम हैं। आज वही अमेरिका श्रीहरिकोटा में च्रदंयान-1 अभियान से जुड़ा तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं है।  भारत की उपग्रह प्रक्षेपण प्रणाली के कारण अनेक देश भारत से जुड़ेंगे इसमें संदेह नहीं है और कोई बड़ी बात नहीं है कि आगे चीन भी कोई ऐसी पहल करे। विश्व के अनेक देश अपने यहां संचार व्यवस्था के विकास के लिये भारत से संपर्क बढ़ायेंगे इसमें संदेह नहीं है। सच तो यह है कि भारत के विश्व में सामरिक रूप से महाशक्ति के रूप में स्थापित होने की जो कल्पना की गयी थी उसकी तरफ यह बढ़ाया गया यह एक प्रमाणिक कदम है। </p>
<p>इधर कुछ आर्थिक विद्वान वैश्विक मंदी में भी अमेरिका सहित पश्चिम देशों की हालत देखकर कह रहे हैं कि हो सकता है कि भारत कहीं आर्थिक महाशक्ति न बन जाये।  जब तक मंदी नहीं थी तब तक तो कोई कुछ नहीं कह रहा था पर अब जो मंदी चल रही है उससे भारत में संकट है पर लोगों को उसकी तरफ कम अमेरिका पर अधिक ध्यान है। पहले तो दबे स्वर में कहा जाता था कि विश्व के गरीब देशों के शीर्षस्थ लोग अपना धन अमेरिका में निवेश कर उसे शक्ति प्रदान कर रहे हैं पर अब तो यह खुलेआम कहा जा रहा है कि अब अमेरिका में निवेश करने वाले लोग भारत में निवेश कर सकते हैं।  कुछ लोग तो इसमें अंतर्राट्रीय स्तर पर देशों के आपसी  समीकरण बदलने की संकेत भी ढूंढ रहे हैं।  उनका मानना है कि इस मंदी से अमेरिका का छुटकारा आसान नहीं है। अगर वह बचा भी तो उसे कम से कम पांच साल पुराने स्तर पर आने में लग जायेंगे। इधर सोवियत संघ भी चीन के साथ मिलकर भारत को इस क्षेत्र में अपनी भूमिका निभाने के लिये पे्ररित कर रहा है।<br />
जहां तक विश्व में महाशक्ति बनने या न बनने का सवाल है तो एक बात तय है कि अमेरिका तो कहता है कि उसकी विदेश नीति में उसके स्वयं के हित ही सर्वोपरि हैं पर इस राह पर तो सभी चलते हैं। विश्व में अमेरिका के विकल्प के रूप में कोई राष्ट्र नहीं है। सोवियत संघ और चीन ने अमेरिका की तरह भारत तरक्की की है पर अपने आंतरिक ढांचों की कार्यप्रणाली की संकीर्णताओं और शंकाओं के कारण वह उसके विकल्प नहीं बन पाये।  विश्व के कई देश भारत को उसके विकल्प के रूप में देखते हैं तो इसका कारण यह है कि यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है और धन के मामले में भी कोई गरीब नहीं हैं। यह अलग बात है कि बढ़ती आबादी के कारण यहां का आर्थिक विकास मंद नजर आता है। लोकतांत्रिक सरकारों की आलोचना बहुत आसान है क्योंकि वह अमूर्त रूप में हैं पर अपने सामाजिक ढांचे और सोच के संकीर्ण दायरों को ही इसके लिये वास्तविक जिम्मेदार माना जाता है। बहरहाल चंद्रयान-1 के प्रक्षेपण से भारत के सभ्य,शिक्षित और जागरुक लोगों को आत्मविश्वास बढ़ेगा इसमें कोई संदेह नहीं है। भारत के बाहर भी अनेक अप्रवासी हैं और वह इस उपलब्धि पर गर्व कर वहां रह रहे लोगों को बता सकते हैं कि उनका देश एक शक्तिशाली राष्ट्र है।  विदेशी भी इस सफलता पर आश्चर्य चकित तो होंगे और अगर इतने विकास के बावजूद जो भी भारत के प्रति संकीर्ण सोच रखते थे वह उसे बदलना चाहेंगे।  इस अवसर पर इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई इस आशा के साथ कि वह आगे इसी तरह अपना कार्य जारी रखकर अन्य उपलब्धियां हासिल करेंगे। यह बात निश्चित है कि विश्व के अनेक छोटे और बड़े राष्ट्र अब विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में भारत से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की आशा करेंगे।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी-अपनी सब कहैं-हास्य व्यंग्य कवितायें]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2008/10/12/apni-apni-sab-kahai-hindi-poem-and-shayri/</link>
<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 07:10:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/2008/10/12/apni-apni-sab-kahai-hindi-poem-and-shayri/</guid>
<description><![CDATA[किस्से कहें और क्या कहें सुनते सभी हैं पर गुनते नजर नहीं आते कान से सुनते सभी हैं पर मन के बहरे सभी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong></p>
<p>किस्से कहें और<br />
क्या कहें<br />
सुनते सभी हैं<br />
पर गुनते नजर नहीं आते<br />
कान से सुनते सभी हैं<br />
पर मन के बहरे सभी हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p>अपने मन की बात<br />
किसी से कहें तो क्या<br />
पहले तो कान न धरे<br />
और धरे तो बनाए मजाक<br />
कहें दीपक बापू<br />
कान से  बहरे  तो ठीक<br />
मन के बहरों के आगे<br />
क्या बीन बजाना<br />
दुसरे उडाएं<br />
इससे तो अपने पर ही<br />
हंस कर अपना उडायें मजाक<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<p>मस्तिष्क से विचारों और अंतर्द्वंद्वों<br />
बीच हाथों से रचे जाते शब्द<br />
मेरे मन की पीडा हर जाते हैं<br />
सोचता हूँ<br />
अब आराम से बैठ पाऊँगा<br />
पर ऐसा होता नहीं<br />
पीडाओं के झुंड अपने साथ शब्दों को लेकर<br />
एक-एक कर फिर मस्तिष्क में<br />
तेजी से चलते आते हैं</p>
<p>कई बार सोचता हूँ<br />
लिखना बंद कर दूं<br />
विचारों और अंतर्द्वंदों से<br />
किनारा कर लूं<br />
बोतल से निकलते जिन्न से<br />
फिर दोस्ती कर लूं<br />
मदहोशी में रहना सीख लूं<br />
पर जब गुजरे पल याद आते हैं<br />
पीडा और बढ़ा देते हैं<br />
फिर शब्दों के झुंड चले आते हैं<br />
मेरे हाथ जिन्न की बोतल से दूर<br />
फिर लिखने के लिए बढ जाते हैं</p>
<p>मैं जितना दूर जाना चाहूँ<br />
अपने शब्दों से<br />
उनके पढने वाले<br />
मुझे याद दिलाने चले आते हैं<br />
कहते हैं वह तुम्हारे शब्द<br />
हमारी पीडा हर जाते हैं<br />
क्योंकि वह सत्य के निकट<br />
नजर आते हैं</p>
<p>मैं नहीं जानता कि<br />
यह सच है या झूठ<br />
बस इतना पता है कि<br />
वह मेरी पीडा को हर ले जाते हैं<br />
जब तक नहीं निकलते<br />
मन को बहुत सताते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<p>लिखते बहुत हैं<br />
अपने लिखे शब्द से पूजते भी बहुत हैं<br />
अपनी नहीं बल्कि परपीडा पर<br />
निरर्थक और अपठनीय लिखकर<br />
स्तुति भी बहुत पाते हैं<br />
पर लेखक की खुद की<br />
पीडा से निकले शब्द<br />
मेरी दृष्टि में साफ नजर आते हैं</p>
<p>पढने को तरसता हैं मन मेरा<br />
पर सुन्दर कागज पर<br />
रंग-बिरंगी स्याही से सजे शब्द<br />
मेरे पठन-पाठन की क्षुधा को<br />
तृप्त नहीं कर पाते हैं<br />
सोचता हूँ कि<br />
क्या लोगों की पीडा कम हो गयी है<br />
पर देखता हूँ अपने आसपास तो<br />
लगता है कि अब लिखते अब वह हैं<br />
जिनके पास आज के युग के<br />
सारे साधन है और वह<br />
संवेंदनहीन होकर दूसरों की पीडा<br />
अपने शब्दों को सजाते हैं<br />
इसीलिये दिल को छू नहीं पाते हैं</p>
<p>हृदय में अच्छा न पढ़ पाने की पीडा<br />
लिखने से दूर कर देती है<br />
सोचता हूँ अपने शब्द-लेखन से<br />
कहीं दूर हो जाऊं<br />
बिना पढे मैं कब तक लिखता जाऊं<br />
पर शब्द और बोतल में बंद जिन्न के<br />
बीच मैं खङा होकर सोचता हूँ<br />
मुझे किसी एक रास्ते पर तो जाना होगा<br />
और शब्द हैं कि झुंड के झुंड<br />
पीडाओं को साथ लिए चले आते हैं<br />
मुझे अपने साथ खींच ले जाते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://razlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महापुरुषों की तपस्या से अर्जित ज्ञान का आज भी महत्त्व-संपादकीय ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/10/05/20-thousan-vews-editoriyal/</link>
<pubDate>Sun, 05 Oct 2008 15:59:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/10/05/20-thousan-vews-editoriyal/</guid>
<description><![CDATA[आज यह ब्लॉग/पत्रिका भी बीस हजार पाठक संख्या को पार गया. यह मेरा पांचवां ब्लॉग है जिसने यह संख्या पार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज यह ब्लॉग/पत्रिका भी बीस हजार पाठक संख्या को पार गया. यह मेरा पांचवां ब्लॉग है जिसने यह संख्या पार  की है.  यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है पर जो हालत हैं उसके हिसाब से इसका अपना महत्त्व है.<br />
विश्व में भारत के बाज़ार में प्रवेश के लिए हर देश लालायित है और हिन्दी उनके के लिए बहुत बड़ा महत्त्व है. एसा नहीं है की हिन्दी से लोग कमा नहीं रहे हैं पर एक आम लेखक के लिए पाठक  उससे अभी दूर है-खासतौर से नए और कम प्रसिद्ध लेखक के लिए अभी यहाँ नगण्य अवसर हैं.  इसका  कारण एक भाषा के रूप में हिन्दी का मूलभूत भौतिक  ढांचा न होना  है. देखा जाए तो हिन्दी एक तरह से नयी भाषा है पर उसको पढने वालों का एक व्यापक दायरा है. फिर नयी होने के कारण प्रारंभ में इसे अनुवाद के सहारे बढाया गया और लोग अनुवाद को भी स्वीकार करते गए क्योंकि मौलिक लेखन और लेखकों को प्रोत्साहन का अवसर देने के लिए कोई आगे नहीं आता. </p>
<p>हिन्दी के प्रकाशकों  ने कभी मौलिक लेखन को प्रोत्साहन देने का प्रयास नहीं किया और न पाठक इसके लिए अभी तैयार दिख रहा है. देश भर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अनुवाद की गयी सामग्री छप रही है या फिर उन लोगों को ही महत्व दिया जा रहा है जो आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक,प्रशासनिक,फ़िल्मी तथा पत्रकारिता जगत में अपना मुकाम बना चुके हैं. आशय यह है कि आप हिन्दी में कुछ लिखे तो आपका कुछ अलग से मुकाम होना चाहिए. यही कारण है कि हिन्दी में लिखा भी बहुत जा रहा है और पढा भी पर लोग संतुष्ट नहीं हैं. एक आम लेखक का लिखा हुआ पढने से पहले वह जानना चाहते हैं कि वह है क्या? जब उनको पता लगता है कि वह कुछ भी नहीं है तो उससे नकार देते हैं. </p>
<p>इतना ही  नहीं एक लेखक के समाज में भी लेखक के कारण सम्मान नहीं है. पहले देखा जाता है कि कमा क्या रहा है? ऐसे में प्रसिद्ध लोग अपने कुछ हकीकत तो कुछ काल्पनिक संस्मरण या अनुभव बेचकर अपना काम चला रहे हैं. आप किसी रेलवे या बस स्टेंड पर खड़े हो जाएँ तो वहां लगी किताबों में लगे कवर सारा बयान कर देते हैं. कुछ बड़े, सुन्दर,धनी और उच्च पदों पर बैठे लोगों के चेहरों से सजी किताबों के झुंड होंगे.  वहां अगर आप एक लेखक की तरह खड़े  होंगें तो अपने आप को हेय अनुभव करेंगे. फिर वहां ऐसी भी किताबों का भी झुंड मिल जायेगा-जिसमें  जासूसी और सामाजिक  कथानक वाले उपन्यास ही होते हैं-जो प्रकाशकों द्वारा कई लेखकों से लिखवाकर अपने या काल्पनिक नाम से प्रकाशित की जातीं हैं.</p>
<p>हाँ. वहां भी चाणक्य,कबीर,विदुर,रहीम,और भृतहरि की किताबों का संग्रह भी मिलते हैं. बिकते कम हैं पर लोगों के अंतर्मन को वहां भी उनके नाम  छू लेते हैं.  मेरा यह ब्लॉग/पत्रिका उन्हीं के संदेशों से भरा पडा है. देखा जाए तो यहाँ मेरी भूमिका एक टंकक से अधिक नहीं है पर फिर भी लोकप्रियता मिली है. सबसे अच्छी  बात मुझे यह लगती है कि अनेक महापुरुषों ने अपनी तपस्या से जो ज्ञान और जीवन रहस्य इस समाज को दे गए उसके बाद कुछ और बचा  ही नहीं है लिखने को. फिर हमारे देश के लोगों को कहीं न कहीं उनके बारे में पढने और सुनने का अवसर जरूर प्राप्त अवश्य होता है और इसी कारण भारत का आम आदमी थोडा बहुत दार्शनिक तो अवश्य होता है. उसकी  इसी प्रवृत्ति की कारण किसी आकर्षण में फंसने की संभावना कम ही होती है. यही कारण है कि व्यवसायी लोगों ने उनका ध्यान हटाने के लिए ऐसे तरीके ईजाद किये जिससे वह सच से दूर होकर भ्रम में पड़ा रहे ताकि उनके मायावी उत्पाद बिकते रहें. इसलिए अनेक धार्मिक अवसरों पर गाने बजाने   और नृत्य का शोर किया जाता है. फ़िल्मी संगीत के आधार पर भजनों को बनाया जाता है. युवा वर्ग इसके शिकंजे में फंसा रहता है  पर सच से उसका सामना होता है तो वह उसे स्वीकार भी करता है.<br />
अपने अध्यात्म ब्लॉग/पत्रिका से मैंने यही सीखा है. लोग बड़े आश्चर्य और भाव से मेरे इन ब्लॉग/पत्रिकाओं पर आते हैं. कई लोग तो यह लिख देते हैं कि आप तो संत हैं. मैं हैरान रह जाता हूँ. सच तो यह बात है कि मैं बचपन से ही अध्यात्म भाव वाला व्यक्ति रहा हूँ और कोई सिद्ध या ज्ञानी नहीं. अन्य विषयों पर लिखते रहने की बावजूद मुझे अध्यात्म पर लिखना सत्संग जैसा करना लगता है.  जब मैं लिखता हूँ तो मेरे  मन में कोई भाव नहीं रहता. कितने लोग पढेंगे या क्या सोचेंगे इस पर सोचता ही नहीं.  कुछ  लोगों ने बदतमीजियां भी की हैं पर मैंने उनकी परवाह नहीं की. मज़े की बात यह है कि किसी ने अन्य विषयों पर ऐसी बदतमीजी नहीं कि जितनी अध्यात्म पर की है.  तब मैं सोचता हूँ कि शायद कोई अदृश्य शक्ति मेरी परीक्षा ले रही है. शायद कुछ लोगों की आदत होती है कि वह अच्छी बातें केवल कथित संतों के मुहँ से ही सुनना कहते हैं और एक ऐसा लेखक जो आर्थिक,सामाजिक या पत्रकारिता जगत में कोई हैसियत न रखता हो उससे यह बातें सुनना नहीं चाहते.<br />
ब्लॉग जगत में एक सज्जन ने ही  मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी की थी कि हिन्दी एक नयी भाषा है इसलिए यह एक दिन पूरे विश्व में फैलेगी क्योंकि यह भाषा शास्त्र का नियम है. अगर उनकी बात सही है तो हम जैसे हिन्दी के लेखकों को अपनी मौलिकता के साथ आगे बढ़ना होगा. वरना वहां भी अनुवादक या नक़ल करने वाले आगी बढ़ जायेंगे.  वैसे मेरा मानना है कि अंतर्जाल पर मौलिक हिन्दी लेखकों का भविष्य उज्जवल है. बीस हजार की पाठक संख्या पार करने पर बस इतना ही शेष फिर कभी. </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[निरर्थक बहसों में उलझे देश के बुद्धिजीवी-चिंतन आलेख ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2008/10/05/nirarthak-bahas-aur-buddhijivi-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 05 Oct 2008 08:43:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2008/10/05/nirarthak-bahas-aur-buddhijivi-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[देश में आतंक के नाम पर निरंतर हिंसक वारदातें हो रहीं है पर आश्चर्य की बात यह है कि इसे धर्म,जाति,भाष]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>देश में आतंक के नाम पर  निरंतर हिंसक वारदातें हो रहीं है पर आश्चर्य की बात यह है कि इसे धर्म,जाति,भाषा और क्षेत्रों  से ना जोड़ने का आग्रह करने वाले ही इसे जोड़ते भी दिख रहे हैं. यह कैसे संभव है कि आप एक तरफ यह कहें के आतंकियों का कोई धर्म, भाषा और जाति  नहीं है दूसरी तरफ उसी उनके समूहों  की तरफ से सफाई भी देते फिरें. आश्चर्य की बात है कि अनेक बुद्धजीवी तो  भ्रमित हैं. उनके भ्रम  का निवारण करना तो बहुत कठिन है. </p>
<p>वैसे तो किसी भी प्रकार कि हिंसा को किसी धर्म,भाषा या जाति से जोड़ना ठीक नहीं पर कुछ लोग ऐसा कहते हुए बड़ी चालाकी से इनका आधार पर बने समूहों का वह प्रशस्ति गान करते हैं. तब फिर एक आम आदमी को यह कैसे समझाया जा सकता है कि इन अपराधिक घटनाओं को सहजता से ले. हालत तो और अधिक खराब होते जा रहे हैं पर कुछ बुद्धिजीवी अपनी बौद्धिक खुराक के लिए सतही विचारों को जिस तरह व्यक्त कर रहे हैं वह चिंताजनक है. उनके विचारों का उन लोगों पर और भे अधिक बुरा प्रभाव पडेगा जो पहले से ही भ्रमित है. </p>
<p>कुछ बुद्धिजीवी तो हद से आगे बाद रहे हैं. वह कथित रूप से सम्राज्यवाद के मुकाबले के लिए एस समुदाय विशेष को अधिक सक्षम मानते हैं. अपने आप में इतना हायास्पद तर्क  है जिसका कोई जवाब नहीं है. वैसे तो हम देख रहे है कि देश में बुद्धिजीवि वर्ग विचारधाराओं में बँटा  हुआ है और उनकी सोच सीमित दायरों में ही है. इधर अंतरजाल पर कुछ ऐसे लोग आ गए हैं जो स्वयं अपना मौलिक तो लिखते नहीं पर पुराने बुद्धिजीवियों के ऐसे विचार यहाँ लिख रहे हैं जिनका कोई आधार नहीं है. वैसे देखा जाए तो पहले प्रचार माध्यम इतने सशक्त नहीं थे तब कहीं भाषण सुनकर या किताब पढ़कर लोग अपनी राय कायम थे. अनेक लोग तब यही समझते थे कि अगर किसी विद्वान ने कहा है तो ठीक ही कहा होगा. अब समय बदल गया है. प्रचार माध्यम की ताकत  ने कई ऐसे रहस्यों से परदा उठा दिया है जिनकी जानकारी पहले नहीं होती थी. अब लोग सब कुछ सामने देखकर अपनी राय कायम करते हैं।  ऐसे में पुरानी विचारधाराओं के आधार पर उनको प्रभावित नहीं करती। </p>
<p>अमरीकी सम्राज्यवाद भी अपने आप में एक बहुत बड़ा भ्रम है और अब इस देश के लोग तो वैसे ही ऐसी बातों में नहीं आते।  अमेरिका कोई एक व्यक्ति, परिवार या समूह का शासन नहीं है।  वहां भी गरीबी और बेरोजगारी है-यह बात यहां का आदमी जानता है।  अमेरिका अगर आज जिन पर हमला कर रहा है तो वही देश या लोग हैं जो कभी उसके चरणों में समर्पित थे। अमेरिका के रणनीतिकारों ने पता नहीं जानबूझकर अपने दुश्मन बनाये हैं जो उनकी गलतियों से बने हैं यह अलग रूप से विचारा का विषय है पर उसके जिस सम्राज्य का जिक्र लोग यहां कर रहे हैं उन्हें यह बात समझना चाहिये कि वह हमारे  देश पर नियंत्रण न कर सका है न करने की ताकत है। अभी तक उसने उन्हीं देशों पर हमले किये हैं जो परमाणु बम से संपन्न नहीं है। उससे भारत की सीधी कोई दुश्मनी नहीं है। वह आज जिन लोगों के खिलाफ जंग लड़ रहा है पहले ही  उसके साथ रहकर मलाई बटोर रहे थे। अब अगर वह उनके खिलाफ आक्रामक हुआ है तो उसमें हम लोगों का क्या सरोकार है? </p>
<p>अमेरिकी सम्राज्य का भ्रम कई वर्षों तक इस देश में चला। अब अमेरिका ऐसे झंझटों में फंसा है जिससे वर्षों तक छुटकारा नहीं मिलने वाला। इराक और अफगानिस्तान से वह निकल नहीं पाया और ईरान में भी फंसने जा रहा है, मगर इससे इसे देश के लोगों का कोई सरोकार नहींं है। ऐसे में उससे लड़ रहे लोगों के समूहों का नाम लेकर व्यर्थ ही यह प्रयास करना है कि वह अमेरिकी सम्राज्यवाद के खिलाफ सक्षम हैं। देश में विस्फोट हों और उससे अपराध से अलग केवल आतंक से अलग विषय में देखना भी एक विचार का विषय है पर उनकी आड़ में ऐसी बहसे तो निरर्थक ही लगती हैं।  इन पंक्तियों का लेखक पहले भी अपने ब्लागों परी लिख चुका है कि इन घटनाओं पर अपराध शास्त्र के अनुसार इस विषय पर भी विचार करना चाहिये कि इनसे लाभ किनको हो रहा है।  लोग जबरदस्ती धर्म,जातियों और भाषाओं के समूहों का नाम लेकर इस अपराध को जो विशिष्ट स्वरूप दे रहा है उससे पैदा हुआ आकर्षण अन्य लोगों को भी ऐसा ही करने लिये प्रेरित कर सकता है। दरअसल कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आतंक के नाम फैलायी जा रही हिंसा कहीं व्यवसायिक रूप तो नहीं ले चुकी है। यह खौफ का व्यापार किनके लिये फायदेमंद है इसकी जांच होना भी जरूरी है पर इसकी आड़ में धर्म,भाषा और जातियों को लेकर बहस आम आदमी के लिये कोई अच्छा संदेश नहीं देती।<br />
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