तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या तारक में छवि, प्राणों में स्मृति पलकों में नीरव पद की गति लघु उर में पुलकों की संसृति भर लाई हूँ तेरी चंचल और करूँ जग में संचय क्या! तेरा मुख सहास अरुणोदय परछाई रजनी व… more →
Gauravwrote 1 week ago: तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या तारक में छवि, प्राणों में स्मृति पलकों में नीरव पद की गति लघु उर मे … more →
wrote 1 month ago: …क्योंकि सपना है अभी भी इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल कोहरे डूबी दिशाएं कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, … more →
wrote 2 months ago: Jo Buddhe Khusat NETA hai unko gaddhe me jane do bs eka bar mujhko SARKAR banane do… mere bhas … more →
wrote 3 months ago: मुझे पुकार लो इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो! ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता, जहान देखकर मुझे … more →
wrote 4 months ago: स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे … more →
wrote 5 months ago: अब मै सूरज को नही डूबने दूंगा देखो मैने कंधे चौडे कर लिये हैं मुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैं और ढलान पर ए … more →
wrote 5 months ago: लीक पर वे चलें जिनके चरण दुर्बल और हारे हैं हमें तो जो हमारी यात्रा से बने ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे … more →
wrote 6 months ago: बहुत दिनों के बाद छिड़ी है वीणा की झंकार अभय बहुत दिनों के बाद समय ने गाया मेघ मल्हार अभय बहुत दिनों … more →
wrote 6 months ago: मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँ … more →
wrote 8 months ago: चिड़िया को लाख समझाओ कि पिंजड़े के बाहर धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है, वहॉं हवा में उन्हें अपने जिस् … more →
wrote 9 months ago: कैसी है पहिचान तुम्हारी राह भूलने पर मिलते हो ! पथरा चलीं पुतलियाँ, मैंने विविध धुनों में कितना गाया … more →
wrote 9 months ago: उठ महान ! तूने अपना स्वर यों क्यों बेंच दिया? प्रज्ञा दिग्वसना, कि प्राण् का पट क्यों खेंच दिया? वे … more →
wrote 9 months ago: छोड़ चले, ले तेरी कुटिया, यह लुटिया-डोरी ले अपनी, फिर वह पापड़ नहीं बेलने; फिर वह माल पडे न जपनी। यह … more →
wrote 9 months ago: अंजलि के फूल गिरे जाते हैं आये आवेश फिरे जाते हैं। चरण-ध्वनि पास-दूर कहीं नहीं साधें आराधनीय रही नही … more →
wrote 10 months ago: एक के नहीं, दो के नहीं, ढेर सारी नदियों के पानी का जादू: एक के नहीं, दो के नहीं, लाख-लाख कोटि-कोटि ह … more →
wrote 10 months ago: श्री गुरू चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि, बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥1॥ बुद्धिहीन तन … more →
wrote 10 months ago: दादू दीया है भला, दिया करो सब कोय। घर में धरा न पाइए, जो कर दिया न होय। दादू इस संसार मैं, ये द्वै र … more →
wrote 10 months ago: वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके … more →
wrote 10 months ago: जो नहीं हो सके पूर्ण–काम मैं उनको करता हूँ प्रणाम । कुछ कंठित औ’ कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट जिनके अभिमं … more →