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Ascend

Into the shadows cryptic stairs ascend,
Redemption awaits he who dares ascend.

Foreboding seeps in from the underground,
Mere proximity makes ones hairs ascend.

The despondent throw caution to the wind, 35 more words

Poetry

Sarfaroshi ki Tamanna

Sarfaroshi ki Tamanna is a patriotic poem written in Urdu by Ram Prasad Bismil, who was involved in the Indian Independence Movement during the British Raj period in India. 671 more words

Other Updates

क़तील शिफ़ाई | Qateel Shifai

एक एक पत्थर जोड़ के मैंने जो दीवार बनाई है
झाँकू उसके पीछे तो रुसवाई ही रुसवाई है

यूँ लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं
आँखें मेरी अपनी हैं पर उनमे नींद पराई है

देख रहे हैं सब हैरत से नीले नीले पानी को
पूछे कौन समंदर से तुझमें कितनी गहराई है

सब कहते हैं एक जन्नत उतरी है मेरी धरती पर
मैं दिल में सोचूं शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है

बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते बुझते जुगनू थे
हैरत है फिर घर के अंदर किसने आग लगाई है

Ghazal

Around - Ghazal

The rhythmic clinking of her bangles, rotis piling around
Nagarjun’s pink bangles, wheels spinning around

The smell of evening flowers lingers in the air… 210 more words

Story

વેદના :

લખવું છે પણ શબ્દો ખૂટે છે.

જીવવું છે પણ સમય ઘટે છે.

જમવું છે પણ ભૂખ મટે છે.

હસવું છે પણ સાલું, દર્દ નડે છે.

( મારા રણકાર માંથી )

Ghazal

क़ैसर उल जाफ़री | Qaiser Ul Jafri

हर शम्मा बुझी रफ़्ता रफ़्ता
हर ख्वाब लुटा धीरे धीरे
शीशा न सही पत्थर भी न था
दिल टूट गया धीरे धीरे

बरसों में मरासिम बनते हैं
लम्हों में भला क्या टूटेंगे
तू मुझसे बिछड़ना चाहे तो
दीवार उठा धीरे धीरे

एहसास हुआ बर्बादी का
जब सरे घर में धूल उड़ी
आई है हमारे आँगन में
पतझड़ की हवा धीरे धीरे

दिल कैसे जला किस वक़्त जला
हमको भी पता आखिर में चला
फैला है धुंआ चुपके चुपके
सुलगी है चिता धीरे धीरे

वो हाथ पराये हो भी गए
अब दूर का रिश्ता है ‘ क़ैसर ‘
आती है मेरी तन्हाई में
खुशबू-ऐ-हिना धीरे धीरे

Ghazal

बाक़ी सिद्दीक़ी | Baqi Siddqui

तुम कब थे क़रीब इतने मैं कब दूर रहा हूँ
छोड़ो न करो बात की मैं तुमसे ख़फ़ा हूँ

रहने दो कि अब तुम भी मुझे पढ़ न सकोगे
बरसात में काग़ज़ की तरह भीग गया हूँ

सौ बार गिरह दे के किसी आस ने जोड़ा
सौ बार मैं धागे की तरह टूट चूका हूँ

जाएगा जहाँ तू मेरी आवाज़ सुनेगा
मैं चोर की मानिंद तेरे दिल में छुपा हूँ

मंज़िल का पता जिसने दिया था मुझे बाक़ी
उस शख्स़ से रस्ते में कई बार मिला हूँ

Ghazal