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	<title>haasy-kavita &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/haasy-kavita/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "haasy-kavita"</description>
	<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 09:19:32 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[न सतयुग, न कलियुग-हास्य कविता (satyug aur kaliyug-hasya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/29/n-satyug-hai-n-kaliyug-hindi-hasya/</link>
<pubDate>Tue, 29 Sep 2009 17:45:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[फंदेबाज मिला रास्ते में और बोला ‘चलो दीपक बापू तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें। वहां सर्वशक्तिमान के]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>फंदेबाज मिला रास्ते में<br />
और बोला<br />
‘चलो दीपक बापू<br />
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।<br />
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।<br />
हमारे दोस्त का आयोजन है<br />
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,<br />
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का<br />
इस जीवन को देने का कर्जा,<br />
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’</p>
<p>सुनकर पहले चौंके दीपक बापू<br />
फिर टोपी घुमाते हुए बोले<br />
‘कमबख्त,<br />
न यहां दुःख है न सुख है<br />
न सतयुग है न कलियुग है<br />
सब है अनूभूति का खेल<br />
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया<br />
रौशनी होगी तभी<br />
जब चिराग में होगी बाती और तेल,<br />
मार्ग दो ही हैं<br />
एक योग और दूसरा रोग का<br />
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,<br />
दृश्यव्य माया है<br />
सत्य है अदृश्य<br />
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी<br />
सत्य से भागता है<br />
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है<br />
इस पूर्ण ज्ञान को<br />
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये<br />
प्रकृति की कितनी कृपा है<br />
इस धरा पर यह भी समझा गये<br />
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान<br />
कोई नया अवतार<br />
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है<br />
वही हैं हमारे करतार<br />
अब तो जिनको धंधा चलाना है<br />
वही लाते इस देश में नया अवतार,<br />
कभी देश में ही रचते<br />
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते<br />
उनकी नीयत है तार तार,<br />
हम तो सभी से कहते हैं<br />
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है<br />
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।<br />
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में<br />
हम कैसे फंस जायें?<br />
यहां तो धर्म के नाम पर<br />
कदम कदम पर<br />
लोग किसी न किसी अवतार  का<br />
ऐसे ही जाल बिछायें।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नंबर वन बनने का नुस्खा-हास्य कविता (number one-hasya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/09/namber-one-ka-nuskha-hindi-comedy-satire-poem/</link>
<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 15:10:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/09/namber-one-ka-nuskha-hindi-comedy-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[चैनल के प्रमुख ने सभी कार्यकताओं को बुलाकर प्रतिस्पर्धात्मक स्तर में नंबर एक पर पहुंचने का नुस्खा बत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><span style="font-size:large;">चैनल के प्रमुख ने </span><br />
<span style="font-size:large;">सभी कार्यकताओं को बुलाकर</span><br />
<span style="font-size:large;">प्रतिस्पर्धात्मक स्तर में </span><br />
<span style="font-size:large;">नंबर एक पर पहुंचने का नुस्खा बताया।</span><br />
<span style="font-size:large;">और कहा-‘</span><br />
<span style="font-size:large;">‘‘अब आ रहा है त्यौहारों का मौसम </span><br />
<span style="font-size:large;">इसे मत करो जाया।</span><br />
<span style="font-size:large;">फिल्मी सितारों</span><br />
<span style="font-size:large;">क्रिकेट खिलाड़ियों</span><br />
<span style="font-size:large;">तथा सभी प्रसिद्धि हस्तियों के घर के द्वार पर</span><br />
<span style="font-size:large;">कर दो अपने कैमरों की छाया।</span><br />
<span style="font-size:large;">गणेश चतुर्थी और नवदुर्गा के अवसर पर कोई मूर्ति</span><br />
<span style="font-size:large;">बाहर से घर ले आयेगा</span><br />
<span style="font-size:large;">तो फिर कोई उसे छोड़ने जायेगा।</span><br />
<span style="font-size:large;">कोई दोनों ही काम न करे तो भी</span><br />
<span style="font-size:large;">मंदिर में जाकर दर्शन के बहाने प्रचार चाहेगा। </span><br />
<span style="font-size:large;">इधर चल रहा है रमजान का महीना</span><br />
<span style="font-size:large;">कोई इफ्तार की दावत से</span><br />
<span style="font-size:large;">और बाद में ईद से </span><br />
<span style="font-size:large;">अपना मेहमानखाना भी सजायेगा।</span><br />
<span style="font-size:large;">फिर आ रहा है दशहरा और दिवाली</span><br />
<span style="font-size:large;">नहीं जाना चाहिये कोई मौका खाली</span><br />
<span style="font-size:large;">इससे जुड़ी हर खबर</span><br />
<span style="font-size:large;">टूटी खबर (ब्रेकिंग न्यूज) बनानी है</span><br />
<span style="font-size:large;">किसी तरह अपने टीआरपी रैकिंग बढ़ानी है</span><br />
<span style="font-size:large;">अगर पूरी तरह सफल रहे तो</span><br />
<span style="font-size:large;">समझो अच्छा बोनस मिल जायेगा।</span><br />
<span style="font-size:large;">किसी दूसरे चैनल ने बाजी मारी तो</span><br />
<span style="font-size:large;">वेतन का भी टोटा पड़ जायेगा।</span><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
<a href="http://bharatdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप<strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सच का सामना और हास्य कवि-हास्य व्यंग्य कविता (face for trutu and hindi poet-hasya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/06/sach-ka-samna-and-hasya-kavi-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sun, 06 Sep 2009 11:54:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/06/sach-ka-samna-and-hasya-kavi-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[उन सज्जन ने सच की पहचान करने वाली मशीन की दुकान लगाई पर उसके उद्घाटन के लिये कोई तैयार नहीं हुआ भाई।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>उन सज्जन ने सच की पहचान करने वाली<br />
मशीन की दुकान लगाई<br />
पर उसके उद्घाटन के लिये<br />
कोई तैयार नहीं हुआ भाई।<br />
न नेता<br />
न अभिनेता<br />
न अधिकारी<br />
न व्यापारी<br />
उसे जो भी मिले सभी थे<br />
दिखाने के लिये सच के भक्त<br />
पर थे झूठे दरबारी<br />
तब उसे याद आया अपना<br />
भूला बिसरा दोस्त<br />
जो करता था हास्य कविताई।<br />
उसने हास्य कवि से आग्रह किया<br />
‘करो मेरी सच की मशीन का उद्घाटन<br />
तो करूं कमाई।<br />
कोई नहीं मिला<br />
इसलिये तुम्हारी याद आई।<br />
फ्लाप कवि हो तो क्या<br />
हिट है जों उनकी असलियत भी देख ली<br />
अब तुम दिखाओ अपना जलवा<br />
मत करना ना कर बेवफाई।’</p>
<p>सुनकर हास्य कवि बोला-<br />
‘मेरे भूले बिसरे जमाने के मित्र<br />
तुम्हें अब मेरी याद आई।<br />
तुम्हारे धोखे की वजह से<br />
करने लगा था मैं हास्य कविताई।<br />
वैसे भी तुम पहले नहीं थे<br />
न तुम आखिरी हो जिससे धोखा खाया<br />
फिर दाल रोटी के चक्कर में<br />
बहुत से सच सामने आते हैं<br />
उन्हें भुलाने के लिये शब्द भी चले आते हैं<br />
लिखते नहीं नाम किसी का<br />
इशारों में तो बहुत कुछ कह जाता हूं<br />
लोग भागते हैं<br />
पर मैं अपने सच से स्वयं लड़ता जाता हूं<br />
मुझे तो कोई डर नहीं है<br />
सच पहचाने वाली मशीन की<br />
गर्म कुर्सी पर बैठ जाऊंगा<br />
पर जो जेहन में हैं मेरे<br />
उन लोगों के नाम भी आ जायेंगे<br />
उनमें तुम्हारा भी होगा<br />
बोलो झेल सकोगे जगहंसाई।’</p>
<p>मित्र भाग निकला यह सुनकर<br />
फिर पीछे देखने की सोच भी उसमें न आई।</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इश्क में नहीं होता सच का सामना-हास्य कविता (ishq aur sach ka samana-hasya kavita)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/08/31/premi-premika-aur-sach-hindi-sakvita/</link>
<pubDate>Mon, 31 Aug 2009 16:01:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/08/31/premi-premika-aur-sach-hindi-sakvita/</guid>
<description><![CDATA[इश्क परवान चढ़ जाये माशुका बीवी बन साथ निभाये इसलिये आशिक ने कमाने के लिये सच की पहचान करने वाली मशीन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>इश्क परवान चढ़ जाये<br />
माशुका बीवी बन साथ निभाये<br />
इसलिये आशिक ने कमाने के लिये<br />
सच की पहचान करने वाली मशीन की<br />
दुकान लगाई<br />
और यह खबर माशुका को सुनाई।<br />
सुनकर वह हो गयी पसीना पसीना<br />
पूछने पर बोली<br />
‘’यह कैसी दुकान लगायी।<br />
अरे, तुमने सुना नहीं<br />
इसके चक्कर में अमेरिका में<br />
कितने घर बरबाद हुए हैं<br />
फिर अपने देश में भी हो चुकी<br />
कई लोगों की जगहंसाई।<br />
कोई और काम ढूंढो<br />
कहीं काम नहीं चला तो तुम<br />
कभी खुद गरम कुर्सी (हाट सीट) पर बैठोगे<br />
कभी मुझसे बैठने को कहोगे<br />
कहीं हो न जाये तुम्हारे और मेरे बीच लड़ाई।’’</p>
<p>सुनकर आशिक हंसा और बोला<br />
‘‘अरे, यह बात नहीं है<br />
यह एकदम नयी चीज है<br />
अपने देश का आदमी बस<br />
नयी चीज चाहता है<br />
अपने पुराने ज्ञान से भागता है<br />
अभी तो दुकान पर बोर्ड ही लगा है<br />
तब ढेर सारे लोग तो  आ रहे हैं<br />
अपनों का सच जानने उनको ला रहे हैं<br />
जानते हैं सब<br />
सच कड़वा होता है<br />
कभी कभी दुश्मनी का बीज भी बोता है<br />
फिर भी अंधे होकर<br />
फैशन की दौड़ में जा रहे हैं<br />
किसी का घर बिगड़े हमें क्या<br />
अपनी रोजी निकलनी चाहिये<br />
जहां तक तुम्हारे और मेरे बैठने की बात है<br />
भला कोई हलवाई अपनी मिठाई खाता है<br />
जो हम गरम कुर्सी पर बैठेंगे<br />
बहुत सोचकर समझकर ही मैंने यह योजना बनाई।&#8221;</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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hindi poem, shayri, vyangya kavita-sher, मनोरंजन, व्यंग्य कविता, शायरी, शेर, हिंदी साहित्य<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ऐसे में चेतना लायें तो किसमें-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2008/08/02/a-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 16:33:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2008/08/02/a-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[न खुशी पहचाने न गम बस कर लेते लोग आंखें नम दिल की गहराई में खाली है जगह अंदर की बजाय बाहर ताकते रहना]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>न खुशी पहचाने न गम<br />
बस कर लेते लोग आंखें नम<br />
दिल की गहराई में खाली है जगह<br />
अंदर की बजाय बाहर ताकते रहना ही है वजह<br />
रोने और हंसने के लिये ढूंढते बहाने<br />
दिखना चाहते सभी सयाने<br />
पढ़े लिखे लोग बहुत हो गये हैं<br />
पर उनके ज्ञान के चक्षु सो गये हैं<br />
ऐसे में चेतना लायें तो किसमें<br />
नाभि तक बात पहुंचे तो जिसमें<br />
यूं गूंज रहा है चारों तरफ छोर<br />
जैसे सब बने हैं दुनियां के उद्धार के लिये<br />
बातें बड़ी-बड़ी करते हैं  जंग की<br />
पर नहीं है किसी में लड़ने का दम<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</strong></p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रृंगार रस में आधुनिक कवितायें-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2008/04/28/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%83%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a4%b5/</link>
<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 15:56:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2008/04/28/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%83%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a4%b5/</guid>
<description><![CDATA[आया एक आशिक का ईमेल लिख था उसमें ‘‘दीपक बापू, जिसको मैं चाहता हूं वह पढ़ती है अंतर्जाल पर आपकी हास्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p style="padding-left:30px;text-align:left;"><strong>आया एक आशिक का ईमेल<br />
लिख था उसमें<br />
‘‘दीपक बापू, जिसको मैं चाहता हूं<br />
वह पढ़ती है अंतर्जाल पर आपकी हास्य कविताएं<br />
हम उसे ताकते हैं वह नहीं देखती हमारी तरफ<br />
उसके दम पर ही आप हिट पाएं<br />
हमारे सारे अंग उसे देखते हुए शिथिल हो जायें<br />
उसे प्रभावित कर सकूं<br />
ऐसी कोई हास्य कविता हमको भिजवायें’</strong></p>
<p style="padding-left:30px;text-align:left;"><strong>पढ़कर पहले चौंकें दीपकबापू<br />
फिर लड़खड़ाते हुए यह भेजा यह संदेश<br />
‘पहले तो हम तुम्हें यह समझायें<br />
हम तो हिट नहीं बल्कि  हैं फ्लाप<br />
लिख नहीं पाते कुछ और<br />
इसलिये रचते हास्य कविताएं<br />
तुम किस गफलत में हो<br />
नवयौवनाओं को भी भला कब हास्य रस से<br />
सराबोर कविताएं दिल को भाएं<br />
यह अलग बात हैं कि मजाक में<br />
कुछ देर के लिये हंस जाएं<br />
पर उससे कभी दिल न लगायें<br />
तुम तो जाओ<br />
किसी श्रृंगार रस के रचयिता के पास<br />
जो तुम्हें दे सकते हैं कुछ प्रेम कविताएं<br />
अरे, इश्क भी भला कभी बदलता है<br />
हमेशा एक जैसा ही रूप चलता है<br />
पर समय बदल गया है<br />
अब तुम किसी नवयौवना को<br />
ताजमहल जैसा नहीं<br />
किसी कार  की तरह सुंदर बोलना<br />
 चंचल और शोख बताते हुए किसी<br />
मोटर सायकल से उपमा जोड़ना<br />
वाणी को कोयल से नहीं<br />
किसी मोबाइल की ट्यून से तोलना<br />
चाहे कुछ भी हो जाये<br />
हास्य कविता भेजने की मत सोचना<br />
रच डालो श्रृंगार रस में आधुनिक कवितायें<br />
हो सकता है उसको भायें</strong></p>
<p style="padding-left:30px;text-align:left;"><strong><br />
</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुन्दर शब्द का सृजन, सबके नसीब नहीं होते]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2008/01/18/shabdon-ka-srujan-sabke-nasib-nahin-hote/</link>
<pubDate>Fri, 18 Jan 2008 12:31:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2008/01/18/shabdon-ka-srujan-sabke-nasib-nahin-hote/</guid>
<description><![CDATA[शब्द कभी स्वयं कभी बीभत्स नहीं होते डरा देते हैं उनके भाव, अगर कोई बोले रोते . जो ख्वाहिशों वास्ते क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>शब्द कभी स्वयं कभी   बीभत्स नहीं होते<br />
डरा देते हैं उनके भाव,  अगर कोई बोले रोते .<br />
जो ख्वाहिशों वास्ते कत्ल करते किसी की आह<br />
उनको  जिन्दगी में सुख के  पल  नसीब नहीं होते.<br />
किताबों में लिखा बहुत सच है, पर  पढे तो कोई<br />
पढ़कर अगर नहीं समझे तो शब्द भी व्यर्थ होते .<br />
 बेबस और कमजोर की बददुआ में होती है ताकत<br />
रूह से निकले शब्द कभी कमजोर नहीं होते .<br />
कभी भी हो सकता है, कमजोर और बेबस कोई<br />
उसमें  गरीब और अमीर के बहुत  भेद नहीं होते.<br />
 लिख सको कोई सुन्दर शब्द, बहुत बेहतर  होगा<br />
 सुन्दर शब्द का सृजन, सबके नसीब नहीं होते.<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211; </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब शब्दों की जंग होती है ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/12/18/jab-shabdon-ke-jang-hotee-hai/</link>
<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 17:37:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/12/18/jab-shabdon-ke-jang-hotee-hai/</guid>
<description><![CDATA[जब जंग शब्दों से होती है तब जीत अर्थों में होती हैं कटु वाक्य कर सकते हैं लोगों में सनसनी पैदा पर सा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>जब जंग  शब्दों से होती है<br />
तब जीत अर्थों में होती हैं<br />
कटु वाक्य कर सकते हैं<br />
लोगों में सनसनी पैदा<br />
पर सामग्री  बेसिरपैर की होती है </p>
<p>तलवार लोहे की हो या शब्दों  की<br />
काम नहीं करती जब<br />
भाषा के कमान से निकले<br />
तीक्ष्ण  शब्दों की मार होती है<br />
चिल्लाना, गुर्राना और मजाक<br />
उडाने से काम नहीं चलता<br />
जहाँ व्याकरण का दाव चलता है<br />
अलंकार से सजे और रस में नहाए शब्द<br />
का रुआब सब जगह चलता है </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
बिना पढे साहित्य<br />
लिखने वाले बहुत देखे<br />
पर पढ़कर जिन्होंने लिखा<br />
उनके शब्दों में सात्विक भाव देखे<br />
ए लिखने वालों कुछ पढ़ भी लिया करो<br />
बिना अध्ययन के लिखना ऐसे ही है<br />
जैस बिना गुरु के चेला चलता है<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
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<p><!-- End of StatCounter Code --></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मन को झूठ के सहारे कब तक बहलायें  ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/12/16/man-ko-jhooth-ke-sahare-kab-tak-bahlaaen/</link>
<pubDate>Sun, 16 Dec 2007 15:43:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/12/16/man-ko-jhooth-ke-sahare-kab-tak-bahlaaen/</guid>
<description><![CDATA[यूं ही कहीं देख लें बाग़ तो दिल मचल जाता है फोटो में ही क्यों न देख लूं वृक्ष शेर कहने का जजबात उमड़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>यूं ही कहीं देख लें बाग़<br />
तो दिल मचल जाता है<br />
फोटो में ही क्यों न देख लूं  वृक्ष<br />
शेर कहने का जजबात उमड़ आता है<br />
देखते हुए नकली दृश्य<br />
अब ऊबने लगा है मन<br />
जहाँ देखता है हरियाली को लहराते हुए<br />
वही ठहर जाता है<br />
घर में चीखता हुआ टीवी<br />
रास्ते में वाहनों की भयानक आवाजें<br />
जीवन का ऐसा हिस्सा बन गईं है<br />
कि धीमी चलती हवा में<br />
पेडों के हिलते पत्तो की मधुर आवाज<br />
कहीं सुन ले तो खुश हो जाता है<br />
पंच तत्वों से बने  शरीर में रहने वाले<br />
मन को कब तक<br />
झूठ के  सहारे बहलायें<br />
धरतीपुत्र पेडों से भला वह कब दूर रह पाता है<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-  </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भीड़ में अपना अस्तित्व ढूँढता आदमी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/12/15/bheed-men-apna-astitv-dhoondhtaa-admi/</link>
<pubDate>Sat, 15 Dec 2007 09:41:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/12/15/bheed-men-apna-astitv-dhoondhtaa-admi/</guid>
<description><![CDATA[अलग खडा नहीं रह सकता इसलिये भीड़ में शामिल हो जाता आदमी फिर वहीं तलाशता है अपनी पहचान आदमी भीड़ में ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अलग खडा नहीं रह सकता<br />
इसलिये भीड़ में शामिल<br />
हो जाता आदमी<br />
फिर वहीं तलाशता है<br />
अपनी पहचान आदमी<br />
भीड़ में सवाल-दर सवाल<br />
सोचता मन में<br />
पर किसी से पूछने का सहस नहीं जुटाता<br />
भीड़ में शामिल पर अलग सोचता आदमी</p>
<p>भीड़ में शामिल लोगों में<br />
अपने धर्म के रंग<br />
अपनी जाति का संग<br />
अपनी भाषा का अंग<br />
देखना और ढूंढना  चाहता आदमी<br />
अपनी टोपी जैसी सब पहने<br />
और उसके देवता को सब माने<br />
उसके सच को ही सर्वश्रेष्ठ जाने<br />
अपनी शर्तें भीड़ पर थोपता आदमी<br />
भीड़ में किसी की पहचान नहीं होती<br />
यह जानकर उसे कोसता आदमी</p>
<p>अपने अन्दर होते विचारों में छेद<br />
भीड़ में देखता सबके भेद<br />
अपनी सोच पर कभी नहीं होता खेद<br />
सबको अलग बताकर एकता की कोशिश<br />
दूसरे की नस्ल पर उंगुली उठाकर<br />
अपने को श्रेष्ठ साबित कराने का इरादा<br />
असफल होने पर सबको समान<br />
बताने का दावा<br />
आदमी देता है भीड़ को धोखा<br />
पर भीड़ का कोई रंग नहीं होता<br />
कोई देवता उसकी पहचान नहीं बनता<br />
कोई उसकी भाषा नहीं होती<br />
कहा-सुना सब बेकार<br />
तब हताश हो जाता है आदमी<br />
भीड़ में शामिल होना चाहता<br />
पर अपनी  शर्तें<br />
कभी नहीं भूलना चाहता आदमी<br />
अपने अंतर्द्वंदों से मुक्त नहीं हो पाता आदमी<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अगड़म-बगडम लिखते तो हिट हो जाते ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/16/%e0%a4%85%e0%a4%97%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%ae-%e0%a4%ac%e0%a4%97%e0%a4%a1%e0%a4%ae-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%9f-%e0%a4%b9%e0%a5%8b/</link>
<pubDate>Tue, 16 Oct 2007 16:06:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[पहले ब्लॉगर ने उसी मित्र से दूसरे ब्लॉगर का पता निकाला। उससे पता लगा कि वह उसके पास में स्थित गाँव म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>पहले ब्लॉगर ने उसी मित्र से दूसरे ब्लॉगर का पता निकाला। उससे पता लगा कि वह उसके पास में स्थित गाँव में ही रहता है। दरअसल पहले ब्लॉगर का घर भी शहर के बाहर कालोनी में था, और वह गाँव उससे बहुत ज्यादा दूर नहीं था। पहला ब्लॉगर कई बार उस गाँव में जा चुका था।</p>
<p>उसने साइकिल उठाई और वहां चल दिया। पक्की सड़क से होते हुए वह उस कच्ची सड़क की ओर मुड़ा जो उस गाँव की तरफ जाती थी । उसने मोड़ पर स्थित पहले मकान के बाहर मैदान पर घास खोद रहे व्यक्ति को देखा और साइकिल से उतरकर आवाज दीं । वह व्यक्ति उसके पास आया। बनियान और तहमद पहने उस व्यक्ति से उसने दूसरे ब्लॉगर का नाम बताते हुए उसके घर पूछा-‘क्या तुम उस जानते हो कहाँ रहता है।’</p>
<p>उस व्यक्ति ने कहा-&#8217;इस नाम का कोई आदमी यहाँ नहीं रहता।आप गलत गाँव में आ गये हैं’</p>
<p>पहला ब्लोगर सोच में पड़ गया। उसे लगा कि उसके मित्र ने उसे धोखा दिया है-पर फिर लगा कि हो सकता है यह आदमी ही उसे नहीं जानता हो क्योंकि वह दूसरा ब्लॉगर उस गाँव का नहीं था शहर से उधारी वालों से परेशान होकर ही वह गाँव के बाहर ही कहीं रह रहा था-ऐसा ही उसके मित्र ने बताया था। फिर उसने उस आदमी को घूर कर देखा और कहा-‘अच्छा तो तुम हमें ही चलाने लगे। क्या बात है आज तुम मुझे ही नहीं पहचान रहे।”</p>
<p>वह दूसरा ब्लॉगर था। उसने भी उसे नहीं पहचाना था फिर उसके समझ में आया और बोला-&#8217;अच्छा तो तुम हो यार, मैं डर गया था की कोई गलत आदमी मेरा पता पूछ रहा है क्योंकि मुझे यहाँ कोई इस नाम से नहीं जानता। यहाँ मेरा दूसरा नाम है।”<br />
पहले ब्लोगर ने कहा-&#8217;दूसरा कि तीसरा?&#8217;<br />
दूसरा बोला-&#8217;चौथा। मैं अपने नाम बदलकर काम करता हूँ।इतनी संख्या है कि मुझे खुद याद नहीं रहता और तुम्हारा भी भेजा फ्राई हो जाएगा।&#8217;<br />
पहला ब्लॉगर बोला-&#8217;अच्छा किया जो नाम बदल लिया हैं नहीं तो उधार माँगने वाले परेशान करते।&#8217;<br />
दूसरा ब्लॉगर-‘तुमसे किसने कहा?’’</p>
<p>पहला ब्लोगार-‘’किसी ने नहीं। मैने अनुमान किया।&#8217;</p>
<p>दूसरा ब्लॉगर-‘’कहो कैसे आना हुआ।&#8221;<br />
पहले ने कहा-&#8221;सोचा तुमसे मिल लूँ ।&#8221;<br />
दूसरा-&#8221;क्या घर पर कोई काम नहीं था।&#8221;<br />
पहला- &#8216;मैं अपने काम सुबह जल्दी निपटा देता हूँ। जो काम तुम कर रहे हो घास काटने का वह मैं अपने गार्डन में सुबह ही कर चुका हूँ। इस समय तुमसे उस रिपोर्ट के बारे में पूछने आया हूँ जो मैने लिखी थी तुमने देखी कि नहीं?”</p>
<p>दूसरा ब्लॉगर-”मैने देखी थी , बहुत अच्छी थी । अब तुम यहाँ से चले जाओ। बडे दिनों बाद घर में एन्ट्री मिली है अगर तुम यहाँ रहे और मेरे घर के लोगों ने देख लिया तो हालत खराब हो जायेगी।&#8221;</p>
<p>इतने में गृह स्वामिनी बाहर आई और उसने पहले ब्लॉगर को नमस्ते की और अपने पति से बोली-‘भाई साहब को बिठाओ मैं इनके लिये चाय बनाकर आती हू।”</p>
<p>वह अन्दर चली गयी , पहला ब्लॉगर खुश हो गया और बोला-‘’ अगर चाय पिलाना है तो ठीक हैं, अन्दर चलते हैं। यहाँ कुछ गर्मी है।”</p>
<p>दूसरा ब्लॉगर-‘नहीं, बाहर ही बैठो। मैं अन्दर से कुर्सी ले आता हूँ। वैसे तुम्हें साइकिल पर देखकर वह समझी कि तुम कोई लेनदार हो। इसलिये चाय की पूछ लिया और मैं भी यूं सोच कर चुप रह गया कि तुम्हारा नमक खाया है।”</p>
<p>वह अन्दर गया और दो कुर्सिया ले आया।</p>
<p>पहले ब्लॉगर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा-‘तुमने उस रिपोर्ट पर कमेंट नहीं दी ।’<br />
दूसरा-‘मैने उसे पढा ही नहीं।”</p>
<p>पहला-&#8217;पर तुमने अभी कहा था कि रिपोर्ट देखी थी।”<br />
दूसरा-‘हाँ पर मैने यह कब कहा की मैने उस पढा है।?”</p>
<p>पहला-“तुमने कब देखी थी?</p>
<p>दूसरा –‘’तुमसे मिलने के अगली रात दस बजे को।</p>
<p>पहला-“पर मैने तो उसे रात को एक बजे प्रकाशित किया था।&#8217;<br />
दूसरा-&#8221;अरे यार, तुम भी ऐसे ही हो। तभी मैं कहूं मुझे दिखाई क्यों नहीं दी। वैसे तुमने रात को एक बजे रिपोर्ट क्यों डाली, यह कोई टाइम है?”</p>
<p>पहला-&#8221;इसलिये कि घर में सब सो रहे थे।&#8217;</p>
<p>दूसरा-‘तुम यार इतना डरते हो?’<br />
पहला-&#8217;यह तुम कह रहे हो। मैं नहीं चाहता की मुझे तुम्हारी तरह कहीं ओर ठिकाने ढूंढने पडे।&#8217;</p>
<p>दूसरा-अच्छा छोड़ो, यह बताओ कि तुम्हारी रिपोर्ट हिट हुई या फ्लाप?<br />
पहला-&#8217;एकदम फ्लाप?&#8221;<br />
दूसरा-&#8217;तुमने रिपोर्ट् के बारे में अकडम्-बकडम लिखा कि नहीं? मैं अपनी भाषा में कहूं तो&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;तुम्हारी भाषा में ही कहता हूं कि अभद्र शब्द&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;लिखे कि नही&#8221;</p>
<p>पहला-&#8217;यह क्या होता है? यह कौनसी विधा है।&#8221;<br />
दूसरा-&#8217;जब यह नहीं जानते तो लिखा क्या होगा? खाक! इसलिये तो रिपोर्ट फ्लॉप हो गयी ।अकडम-बकडम लिखते तो हिट हो जाते. &#8216;</p>
<p>पहला&#8211;&#8217;यह करना जरूरी है।&#8217;</p>
<p>दूसरा-&#8217;यह फ़ैशन है।&#8221;<br />
पहला-&#8217;यह में नहीं कर सकता।&#8217;</p>
<p>दूसरा-इसलिये तो तुम्हारा लिखा मेरी समझ में नहीं आता और कमेंट नहीं देता और तुम फ्लॉप हो। मेरी भाषा में लिखो तो मैं खूब कमेंट दूं।&#8221;</p>
<p>पहला ब्लोगर-&#8217;तुम्हारी भाषा सीखने की मुझे जरूरत नहीं है, मैं तो तुम्हें यह बताने आया था कि भईया रिपोर्ट पढ लेना।&#8217;<br />
दूसरा-&#8217;अब क्या खाक पढ लेना। हो गयी पुरानी। वैसे किसी ने कमेंट दी।&#8217;<br />
पहला-&#8217;हां! जो मेरे दोस्त हैं उन्होने दी।&#8217;</p>
<p>दूसरा-&#8217;ब्लोगरों से दोस्ती। वहां भला कोयी है दोस्ती लायक!&#8217;<br />
पहला-&#8217;हां, तुम ठीक कह्ते हो। सब भले लोग हैं, तुमसे दोस्ती करने लायक तो नहीं हैं।&#8217;<br />
दूसरा-&#8217;क्या मैं बुरा हूं। देखो मेरे मोहल्ले में आकर यह बद्तमीजी नहीं चलेगी। यह ठेका तो हमने ले रखा है। ऐसी कमेंट लिख जाऊंगा कि छोडो यार&#8230;..&#8217;</p>
<p>पहला-&#8217;ऐसा सोचना भी नहीं। तुम्हें गलतफ़हमी है कि पहले की तुम्हारी तो गल्तिया माफ़ कर चुका हू, अभी तक तुमसे हिसाब बकाया है।&#8217;</p>
<p>दूसरा ब्लोगर गुस्से में उसे घूर रहा था फ़िर बोला-&#8217;वह तो तुम्हारे छ्द्म नाम का ब्लोग था।</p>
<p>&#8220;पहला-&#8221;वह सब ठीक है, पर तुम अपने कहे पर लिखी रिपोर्ट पर कमेंट तो देते।&#8221;<br />
दूसरा-&#8221;जब पढे ही नहीं तो क्या खाक देता?&#8221;<br />
पहला-&#8221;तो अब पढ कर देना।&#8217;<br />
दूसरा-पढ़ने के बाद तो मैं किसी को कमेंट नहीं देता।<br />
&#8216;पहला-&#8217;तो बिना पढे ही दे देना।&#8221;<br />
दूसरा-&#8217; यार तुम मेरे मुहल्ले में आकार मुझे तंग मत करो ,वरना ऐसे कमेंट दूंगा कि &#8230;&#8230;..छोडो यार।&#8217;<br />
पहला- &#8221;तुम्हारा मोहल्ला। गुरु तुम किस गलतफहमी में हो। हम दोनों का एक ही मोहल्ला है। इस गाँव में मैं कई बार आता हूँ और ज्यादा दूर नहीं है।&#8217;<br />
इतने में एक बच्चा अंदर से चाय के दो कप ले आया और रख कर चला गया।पहले ब्लोगर ने तत्काल एक् कप उठा लिया तो दूसरा बोला कि-&#8217;क्या यार घर से चाय पीकर नही चले थे क्या कि मेरे कहने से पहले ही कप उठा लिया।<br />
&#8216;पहला-&#8221;तुम उठाने के लिये कहते?&#8217;<br />
दूसरा-&#8221;नही!&#8221;</p>
<p>पहला-&#8221;मुझे मालुम था। वैसे चाय अच्छी बनी है।&#8221;</p>
<p>दूसरा-हमारी पत्नी ने तुम्हें शहर से आया लेनदार समझ लिया इसलिये ऐसी स्पेशल चाय पिलाई है-और मैं भी तुम्हारे घर पर नाश्ता कर आया हूं इसलिये झेल रहा हूं।&#8221;</p>
<p>चाय पीने के बाद पहला ब्लोगर जाने के लिये तैयार हुआ तब दूसरा ब्लोगर बोला-&#8217;यहां किसी को मत बताना कि मैं ब्लोग लिखता हूं। हम दोनों दोस्त हैं और एक ही मुह्ल्ले के हैं, यह भूलना नहीं।&#8221;<br />
पहला ब्लोगर हंसते हुए बोला-&#8217;पर तुम तो कह रहे थे कि ब्लोगर भला दोस्ती लायक होते हैं? साथ में मुह्ल्ला भी याद आने लगा। चलो कोयी बात नही, मैं उम्मीद करता हूं कि तुम जल्दी समझ जाओगे कि दोस्ती किसे कहते हैं?&#8217;</p>
<p>दूसरा-&#8217;इस मीटिंग पर कब रिपोर्ट कब लिख रहे हो?&#8217;<br />
पहला-कौंनसी मीटिंग&#8230;&#8230;&#8230;अच्छा यह। कल सुबह छः बजे।<br />
दूसरा-&#8217;इतनी सुबह क्यों?&#8221;<br />
पहला-&#8217;उस समय सब घर पर सोते हैं।&#8221;<br />
पहला ब्लोगर वहां से साइकिल पर उठाकर चल दिया। आधे रास्ते पर उसे याद आया कि यह तो उसने बताया ही नहीं कि हास्य कविता लिखनी है या नहीं। फ़िर उसने अपने सिर को झटका दिया कि चलो इस बार भी हास्य कविता नहीं लिखते। अगली मीटिंग में पूछ्कर लिख लेंगे।<br />
नोट-यह हास्य व्यंग्य है और इसके पात्र कल्पित हैं अगर किसी की खुराफात से मेल हो जाये तो लेखक जिम्मेदार नहीं है। इन पंक्तियों का लेखक कभी किसी दुसरे ब्लोगर से नहीं मिला है।</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/05/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9a%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Fri, 05 Oct 2007 16:16:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/05/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9a%e0%a4%b2/</guid>
<description><![CDATA[बीस के शेर पचास में ढ़ेर जीतते हैं तो फुलाते सीना हारें तो कहें&#8217;समय का फेर&#8217; समझाया था क्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>बीस के शेर<br />
पचास में ढ़ेर<br />
जीतते हैं तो फुलाते सीना<br />
हारें तो कहें&#8217;समय का फेर&#8217;<br />
समझाया था क्यों करते हो<br />
पचास का आयोजन<br />
जब है बीस का भोजन<br />
क्रिकेट कोई दाल होता तो<br />
पानी मिलाकर चला लेते<br />
कुछ खा लेते तो<br />
बाकी भूखे रह जाते माला फेर<br />
बीस ओवर के खेल पर<br />
बहुत खुश हुए थे कि<br />
दुनिया में जीते अपने शेर<br />
पचास ओवर के खेल में<br />
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
लोग पूछ रहें हैं<br />
&#8216;वह मधुर सपना था या<br />
खडा है सामने यह कटु सत्य&#8217;<br />
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर<br />
चर्चा करते हैं क्रिकेट की<br />
सांझ हो या भोर<br />
चौबीस साल पुरानी कहानी<br />
फिर सामने आ रही है<br />
जब विश्व विजेता हुए थे<br />
इसी तरह ढ़ेर<br />
अब इस कहानी पर<br />
अगले चौबीस महीने तक भी<br />
नहीं चलेगा खेल<br />
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती<br />
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती<br />
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा<br />
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा<br />
पोल खुल जायेगी देर-सबेर</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -साधू, शैतान और इन्टरनेट ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/04/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%82-%e0%a4%b6%e0%a5%88%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%9f/</link>
<pubDate>Thu, 04 Oct 2007 13:06:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/04/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%82-%e0%a4%b6%e0%a5%88%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%9f/</guid>
<description><![CDATA[शैतान ने दी साधू के आश्रम पर दस्तक और कहा &#8216;महाराज क्या ध्यान लगाते हो भगवान के दिए शरीर को क्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>शैतान ने दी साधू के आश्रम पर दस्तक<br />
और कहा<br />
&#8216;महाराज क्या ध्यान लगाते हो<br />
भगवान के दिए शरीर को क्यों सुखाते हो<br />
लो लाया हूँ टीवी मजे से देखो<br />
कभी गाने तो कभी नृत्य देखो<br />
इस दुनिया को भगवान् ने बनाया<br />
चलाता तो मैं हूँ<br />
इस सच से भला मुहँ क्यों छुपाते हो&#8217;</p>
<p>साधू ने नही सुना<br />
शैतान चला गया<br />
पर कभी फ्रिज तो कभी एसी ले आया<br />
साधू ने कभी उस पर अपना मन नहीं ललचाया<br />
एक दिन शैतान लाया कंप्यूटर<br />
और बोला<br />
&#8216;महाराज यह तो काम की चीज है<br />
इसे ही रख लो<br />
अपने ध्यान और योग का काम<br />
इसमें ही दर्ज कर लो<br />
लोगों के बहुत काम आयेगा<br />
आपको कुछ देने की मेरी<br />
इच्छा भी पूर्ण होगी<br />
आपका परोपकार का भी<br />
लक्ष्य पूरा हो जायेगा<br />
मेरा विचार सत्य है<br />
इसमें नहीं मेरी कोई माया&#8217;</p>
<p>साधू ने इनकार करते हुए कहा<br />
&#8216;मैं तुझे जानता हूँ<br />
कल तू इन्टरनेट कनेक्शन ले आयेगा<br />
और छद्म नाम की किसी सुन्दरी से<br />
चैट करने को उकसायेगा<br />
मैं जानता हूँ तेरी माया&#8217;</p>
<p>शैतान एकदम उनके पाँव में गिर गया और बोला<br />
&#8216;महाराज, वाकई आप ज्ञानी और<br />
ध्यानी हो<br />
मैं यही करने वाला था<br />
सबसे बड़ा इन्टरनेट तो आपके पास है<br />
मैं इसलिये आपको कभी नहीं जीत पाया&#8217;<br />
साधू उसकी बात सुनकर केवल मुस्कराया</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -समस्याओं के जंगल में आन्दोलन ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/27/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Thu, 27 Sep 2007 14:19:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[किसी के पास ज्ञान का किसी के पास विज्ञान का किसी की पास शिक्षा का है ठेका किसी ने लिया है इंडियन आइड]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>किसी के पास ज्ञान का<br />
किसी के पास विज्ञान का<br />
किसी की पास शिक्षा का है ठेका<br />
किसी ने लिया है<br />
इंडियन आइडियल बनाने का<br />
किसी के पास है विश्व चैंपियन<br />
बनाने का ठेका<br />
पालक अपने बालकों को<br />
उनसे पास भेजकर सोचते हैं<br />
सब काम अपने आप हो जायेंगे<br />
अब वह सिरमौर ही बनकर घर आएंगे<br />
जो सफल हो जाते हैं वह<br />
गाते हैं ठेकेदारों की महिमा<br />
जो असफल हौं वह अपनी<br />
किस्मत को दोष देकर रह जाते हैं<br />
हर तरह की गारंटी वाला<br />
सब जगह चल रहा है ठेका</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समझौता ग़मों से, दोस्ती नगमों से कर लो]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/20/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%9d%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Thu, 20 Sep 2007 16:16:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/20/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%9d%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%97/</guid>
<description><![CDATA[समझौता ग़मों से कर लो दोस्ती नगमों से कर लो महफ़िलों में जाकर इज्जत की उम्मीद छोड़ दो जहां सब सज-धज क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p align="left">समझौता ग़मों से कर लो</p>
<p align="left">दोस्ती नगमों से कर लो</p>
<p align="left">महफ़िलों में जाकर</p>
<p align="left">इज्जत की उम्मीद छोड़ दो</p>
<p align="left">जहां सब सज-धज के आएं</p>
<p align="left">वहां तुम्हें देखने की किसे फुर्सत है</p>
<p align="left">सभी बोलें कम अपने लबादे</p>
<p align="left">ज्यादा दिखाएँ</p>
<p align="left">सोचें कुछ और</p>
<p align="left">बोलें कुछ और</p>
<p align="left">सुनकर अनुसना कर सकें तो</p>
<p align="left">सबसे बतियाएं</p>
<p align="left">अगर कोई अपने शब्दों से</p>
<p align="left">घाव कर दे</p>
<p align="left">तो उसका इलाज अपनी</p>
<p align="left">तसल्ली और यकीन की</p>
<p align="left">मरहमों से कर लो</p>
<p align="left">कहैं दीपक बापू</p>
<p align="left">अपनी शान दिखाने के चक्कर</p>
<p align="left">तुम कभी न पडना</p>
<p align="left">दूसरों की चमक में</p>
<p align="left">अपने को अंधा न करना</p>
<p align="left">जिनके चेहरे पर जितनी रोशनी है</p>
<p align="left">उतना ही उनके मन में है अँधेरा</p>
<p align="left">तुम अपने यकीन और हिम्मत के</p>
<p align="left">साथ सबके सामने डटे रहो</p>
<p align="left">किसी और में कुछ भी न ढूँढो</p>
<p align="left">साथ अपने हमदमों को कर लो</p>
<p align="left">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p align="left"><strong>रिश्तों को नाम नहीं</strong> <strong> देना</strong> </p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<p>रिश्तों को नाम देना<br />
लगता है आसान<br />
तब निभाने का<br />
नहीं होता अनुमान<br />
जब दौर आता है<br />
मुसीबत का<br />
अपने ग़ैर हो जाते हैं<br />
ग़ैर फेर लेते हैं मुहँ<br />
रिश्ता कामयाब नहीं कर पाता<br />
अपनी वफ़ा का इम्तहान</p>
<p>कहना कितना आसान लगता है<br />
कि तुम दोस्त ऐसे<br />
मेरे भाई जैसे<br />
तुम सखी ऎसी<br />
बिल्कुल बहिन जैसी<br />
जब आती है घडी निभाने की<br />
तब न भाई का पता<br />
न भाई जैसे दोस्त का पता<br />
न बहिन का पता<br />
न बहिन जैसी का पता<br />
गलत निकलते हैं<br />
अपनेपन के अनुमान</p>
<p>जरा सी बात पर<br />
रिश्ते तैयार हो जाते हैं<br />
होने को बदनाम<br />
फिर भी अपनों से दूर<br />
तुम मत होना<br />
बेवफाई का बदला<br />
तुम वफ़ा से ही देना<br />
दुसरे करते हैं<br />
विश्वास से खिलवाड़<br />
तुम मत करना<br />
कोई कितना भी<br />
रिश्ते को बदनाम करे<br />
तुम निभाते रहना<br />
अपनी नीयत पर डटे रहना<br />
चाहे धरती डोले<br />
या गिरने वाला हो आसमान<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -विचारों का धंधा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/19/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a7%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 19 Sep 2007 02:43:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/19/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a7%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[एक विचारक पहुंचा दूसरे के पास और बोला &#8216;यार आजकल कोई अपने पास नहीं आता है हमसे पूछे बिना यह समा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://rajlekh.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://www.jitu.info/images/narad.jpg" alt="Hindi Blog Aggregator" /></a><a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>एक विचारक पहुंचा दूसरे के पास<br />
और बोला<br />
&#8216;यार आजकल कोई<br />
अपने पास नहीं आता है<br />
हमसे पूछे बिना यह समाज<br />
अपनी राह पर चला जाता है<br />
हम अपनी विचारधाराओं को<br />
लेकर करें जंग<br />
लोगों के दिमाग को करें तंग<br />
ताकि वह हमारी तरफ आकर्षित हौं<br />
और विद्वान की तरह सम्मान करें<br />
नहीं तो हमारी विचारधाराओं का<br />
हो जायेगा अस्तित्व ही खत्म<br />
उसे बचने का यही रास्ता नजर आता है&#8217;</p>
<p>दूसरा बोला<br />
&#8216;यार, पर हमारी विचारधारा क्या है<br />
यह मैं आज तक नहीं समझ पाया<br />
लोग तो मानते हैं विद्वान पर<br />
मैं अपने को नही मान पाया<br />
अगर ज्यादा सक्रियता दिखाई<br />
तो पोल खुल जायेगी<br />
नाम बना रहे लोगों में<br />
इसलिये कभी-कभी<br />
बयानबाजी कर देता हूँ<br />
इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं आता है&#8217;</p>
<p>विचारक बोला<br />
&#8216;कहाँ तुम चक्कर में पड़ गये<br />
विचारधाराओं में द्वंद में भला<br />
सोचना कहाँ आता है<br />
लड़कर अपनी इमेज पब्लिक में<br />
बनानी है<br />
बस यही होता है लक्ष्य<br />
किसी को मैं कहूं मोर<br />
तो तुम बोलना चोर<br />
मैं कहूं किसी से बुद्धिमान<br />
तुम बोलना उसे बैईमान<br />
मैं बजाऊँ किसी के लिए ताली<br />
तुम उसके लिए बोलना गाली<br />
बस इतने में ही लोगों का ध्यान<br />
अपने तरफ आकर्षित हो जाता है&#8217;</p>
<p>दूसरा खुश होकर उनके पाँव चूने लगा<br />
और बोला<br />
&#8216;धन्य जो आपने दिया ज्ञान<br />
अब मुझे अपना भविष्य अच्छा नजर आता है&#8217;</p>
<p>विचारक ने अपने पाँव<br />
हटा लिए और कहा<br />
&#8216;यह तो विचारों के धंधे का मामला है<br />
सबके सामने पाँव मत छुओ<br />
वरना लोग हमारी वैचारिक जंग पर<br />
यकीन नहीं करेंगे<br />
मुझे तो लोगों को भरमाने में ही<br />
अपना हित नजर आता है।</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -फ्लॉप ब्लोगर और हिट कवि ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/18/%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%aa-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Tue, 18 Sep 2007 14:21:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक कवि पहुंचा ब्लोगर के घर और बोला &#8216;यार, कवि सम्मेलनों में होने लगी है हुटिंग ज्यादा मुझे किसी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>एक कवि पहुंचा ब्लोगर के घर और बोला<br />
&#8216;यार, कवि सम्मेलनों में होने लगी है<br />
हुटिंग ज्यादा<br />
मुझे किसी ने अंतर्जाल पर जाकर<br />
अपनी कविता की दुकान सजाने का<br />
आइडिया सुझाया<br />
तो मुझे तुम्हारा नाम याद आया&#8217;</p>
<p>ब्लोगर बहुत खुश हुआ<br />
उसने सोचा अब तक मिलती थी<br />
उनचास टिप्पणियां<br />
अब पचास का जुगाड़ खुद मेरे पास आया<br />
तत्काल उसे कम्प्यूटर के सामने बिठाकर<br />
अंतर्जाल पर काम करने का<br />
पूरा आइडिया समझाते हुए<br />
उसका भी एक ब्लोग बनवाया<br />
जाते-जाते कवि गुरूदक्षिणा में<br />
कवि ने दिया ज्ञान<br />
&#8216;क्या यह अगड़म-बगडम लिखते हो<br />
कुछ कवितायेँ और कहानियां लिखा करो<br />
अपनी हिन्दी के ज्ञान का विस्तार करो<br />
जिसकी वजह से इतना तुमने नाम पाया&#8217;</p>
<p>ब्लोगर ने बाँध ली कवि की बात गाँठ बांधकर<br />
जुट गया साहित्य सृजन में<br />
पर होता गया फ्लॉप<br />
रचनाएं तो बहुत होने लगीं<br />
टिप्पणियां होती गईँ कम<br />
फिर भी वह लिखने से बाज नही आया<br />
एक दिन पहुँचा कवि के घर<br />
और बोला<br />
&#8216;बहुत दिन से न तुम्हें देखा<br />
न तुम्हारा ब्लोग<br />
जो तुमने मुझसे बनवाया &#8216;</p>
<p>कवि ने उसे अपना ब्लोग दिखाया<br />
और बोला<br />
&#8216;तुमसे बनाने के बाद मैंने<br />
ब्लोग को छद्म नाम से बनाया<br />
क्योंकि चुराई हुई कविताओं के लिए<br />
मैं तो पहले ही बदनाम था<br />
उससे बचने का यही रास्ता नजर आया<br />
देखो मेरे नाम पर पुरस्कार भी आया&#8217;<br />
ब्लोगर ने देखा कवि का ब्लोग<br />
उसमें कवि के कतरनों के नीचे<br />
उसकी कविताओं के ही अंश लगे थे<br />
जिनमें कवि ने जोडा था अपना नाम<br />
जिनमें पचास-पचास से<br />
ज्यादा कमेन्ट जड़े थे<br />
फिर कवि ने दिखाए<br />
दूसरे ब्लोग<br />
उनमें भी टिप्पणियों में<br />
ब्लोगर की कविताओं की छबि थी<br />
उसने कवि से कहा<br />
&#8216;यहाँ भी तुम बाज नहीं आये<br />
मेरी कतरन से हिट पाए<br />
तुम्हारे रास्ते पर चलाकर मैं<br />
तो हो गया फ्लॉप ब्लोगर<br />
तुमने मेरी रचनाओं से ही<br />
इतना बड़ा पुरस्कार पाया&#8217;</p>
<p>कवि घबडा गया और बोला<br />
&#8216;यार, मैं क्या करता<br />
मैंने तो अखबार की कतरनों और<br />
तुम्हारी कविताओं के अंशों से ही काम चलाया<br />
यही आइडिया मेरी समझ में आया<br />
अब तुम किसी और से मत कहना<br />
मेरी जिन्दगी में तो पहला<br />
पुरस्कार आया&#8217;</p>
<p>ब्लोग वहाँ से निकल बाहर आया<br />
और आसमान में देख कर बोला<br />
&#8216;अजब है दुनिया<br />
मैं कवितायेँ लिखकर हिट से<br />
फ्लॉप ब्लोगर हो गया<br />
और वह ब्लोग मेरी कवितायेँ लिखकर<br />
हिट कवि कहलाया&#8217;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -भूल गया अपना ज्ञान ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/16/252/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 09:01:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/16/252/</guid>
<description><![CDATA[एक बुद्धिमान गया अज्ञानियों के सम्मेलन में पाया बहुत सम्मान सब मिलकर बोले दो &#8216;हम को भी ज्ञान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>एक बुद्धिमान गया<br />
अज्ञानियों के सम्मेलन में<br />
पाया बहुत सम्मान<br />
सब मिलकर बोले दो &#8216;हम को भी ज्ञान&#8217;<br />
वह भी शुरू हो गया<br />
देने लगा अपना भाषण<br />
अपने विचारों का संपूर्णता से किया बखान<br />
उसका भाषण ख़त्म हुआ<br />
सबने बाजीं तालियाँ<br />
ऐक अज्ञानी बोला<br />
&#8216;आपने ख़ूब अपनी बात कही<br />
पर हमारी समझ से परे रही<br />
अपने समझने की विधि का<br />
नहीं दिया ज्ञान</p>
<p>कुछ दिनों बात वही बुद्धिमान गया<br />
बुद्धिजीवियों के सम्मेंलन में<br />
जैसे ही कार्यक्रम शूरू होने की घोषणा<br />
सब मंच की तरफ भागे<br />
बोलने के लिए सब दौडे<br />
जैसे बेलगाम घोड़े<br />
मच गयी वहाँ भगदड़<br />
माइक और कुर्सियां को किया तहस-नहस<br />
मारे एक दूसरे को लात और घूसे<br />
फाड़ दिए कपडे<br />
बिना शुरू हुए कार्यक्रम<br />
हो गया सत्रावसान<br />
नही बघारा जा सका एक भी<br />
शब्द का ज्ञान<br />
स्वनाम बुद्धिमान फटेहाल<br />
वहाँ से बाहर निकला<br />
इससे तो वह अज्ञानी भले थे<br />
भले ही अज्ञान तले<br />
समझने के विधि नहीं बताई<br />
इसलिये सिर के ऊपर से<br />
निकल गयी मेरी बात<br />
पर इन बुद्धिमानों के लफडे में तो<br />
भूल गया मैं अपना ज्ञान</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -कवि सम्मेलन में पहुंचा जब ब्लोगर ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac/</link>
<pubDate>Sat, 15 Sep 2007 17:39:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/15/%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%ac/</guid>
<description><![CDATA[एक कवि सम्मेलन में मंच पर पहुंच गया ब्लोगर लोगों ने समझा कोई नया कवि आया सबकी पुरानी कवितायेँ झेलते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>एक कवि सम्मेलन में मंच पर<br />
पहुंच गया ब्लोगर<br />
लोगों ने समझा कोई नया कवि आया<br />
सबकी पुरानी कवितायेँ झेलते हुए<br />
उसको सुनने के इन्तजार में बिताया<br />
आख़िर उसके मित्र कवि संचालक ने<br />
उसे भी कविता सुनाने के लिए बुलाया<br />
&#8216;और कहा कि आज हम सुनेंगे<br />
अंतर्जाल के महान कवि जो बहुत हिट हैं<br />
नए जमाने में पूरी तरह फ़िट हैं &#8216;<br />
ब्लोगर ने गला किया साफ और<br />
सुनाने लगा वहीं सुनाई गयी<br />
कविताओं के अंश<br />
साथ मे रखता &#8216;बहुत बढ़िया&#8217;<br />
और &#8216;बहुत सुन्दर&#8217; जैसे शब्द<br />
लोग चीखने और चिल्लाने लगे<br />
और पूछने लगे<br />
&#8216;कैसा है ब्लोगर यहीं की कवितायेँ<br />
फिर हमें सुनाता है और<br />
अपने दो शब्द चिपकाता है&#8217;</p>
<p>ब्लोगर बोला<br />
&#8216; यह ठीक समझो कि<br />
यहाँ कुछ पंक्तियां लेकर<br />
कमेंट लगा रहा हूँ जैसे<br />
वहां करता हूँ<br />
अगर पूरी की पूरी पोस्ट ही लिंक कर देता<br />
तो तुम्हारा क्या हाल होता<br />
सोचो तुम्हारा कितना समय बच जाता है &#8216;</p>
<p>लोग हल्ला मचाने लगे<br />
कवियों ने उसे किसी तरह वहाँ से हटाया<br />
वह अपने मित्र से बोला<br />
&#8216;कैसे लोग हैं ज़रा भी तमीज नहीं है<br />
कितना हिट हूँ मैं वहां<br />
यहाँ हूट कर दिया<br />
नहीं जानते कि कैसे<br />
ब्लोगर का सम्मान किया जाता है&#8217;</p>
<p>कवि मित्र बोला<br />
&#8216;इतनी जल्दी घबडा गये<br />
हमारे साथ रोज ही ऐसा हादसा पेश आता है<br />
तुम खुश किस्मत हो कि<br />
तुम्हारे कंप्यूटर से कोई बाहर नही आता है&#8217;<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -आदमी की पहचान ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/13/%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Thu, 13 Sep 2007 15:12:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं पर भला और बेजुबान जीव अपनी असलियत किसी से छिपाता नहीं ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>हाथी के दांत खाने के और<br />
दिखाने के और होते हैं<br />
पर भला और बेजुबान जीव<br />
अपनी असलियत किसी से छिपाता नहीं<br />
फ़िर क्यों उसके प्रवृतियों की<br />
चर्चा आदमी से करते हैं<br />
जिसकी नीयत के दांत तो<br />
सांप के जहर से भी ज्यादा<br />
विषैले होते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p>होती है कुछ लोगों को<br />
अपनी रचना पर गलतफ़हमी<br />
जो उन्होने रचा है वही<br />
सबसे है अच्छा<br />
खाते हैं ऐसे ही लोग<br />
कदम कदम पर गच्चा<br />
कोई तारीफ़ न करे तो<br />
जोर-जोर से चिल्लाते हैं<br />
और करे तो गरियाते हैं<br />
अपने अहंकार में खो देते हैं<br />
 मानसिक संतुलन<br />
पहचान नहीं पाते<br />
कौन झूठा कौन सच्चा<br />
ऐसे लोगों पर यकीन करना होता कठिन<br />
चरित्र होता है उनका कच्चा<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[हास्य कविता -अल्पज्ञानी और कौवा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/12/%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%b5%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 12 Sep 2007 10:58:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[तीन मित्र पहुंचे एक पहुंचे हुए सिद्ध के पास लेने ज्ञान और बोले &#8216;महाराज ज़िन्दगी से हैं हम परेशा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>तीन मित्र पहुंचे एक पहुंचे हुए<br />
सिद्ध के पास लेने ज्ञान<br />
और बोले<br />
&#8216;महाराज ज़िन्दगी से हैं हम परेशान<br />
तमाम तरह के तंत्र-मंत्र किये<br />
तमाम दरबारों पर मत्था टेका<br />
पर हुआ नही कल्याण<br />
हमारे मन को शांति मिले<br />
कृपा कर ऐसा दें ज्ञान&#8217;</p>
<p>सिद्ध पुरुष ने तीनों को देखा और कहा<br />
&#8216;मैं कोई चमत्कारों का सौदागर नहीं<br />
जो पल में कर दूं तुम्हारा कल्याण<br />
पहले लूंगा तुम्हारा इम्तहान<br />
फिर दूंगा जीवन का ज्ञान&#8217;</p>
<p>तीनों को दी कापी और पेन और कहा<br />
&#8216;इस पर कौवे पर निबंध लिखो<br />
इसमें तुम्हारा लिखा हुआ ही<br />
कराएगा परिचय दस मिनट में ही कि<br />
कौन कितना बुद्धिमान&#8217;</p>
<p>तीनों ने दस मिनट में कापी लिखकर<br />
दे दीं गुरू जीं के हाथ में<br />
करने लगे वह उसकी जांच<br />
एक ने लिखा<br />
&#8216;कौवे के बारे में मुझे कुछ भी<br />
लिखना नही आता<br />
मैं तो हूँ गंवार और अनजान &#8216;</p>
<p>दुसरे ने लिखा<br />
&#8216;कौवा है एसा पंछी<br />
जिसकी सबसे होती है तीक्ष्ण दृष्टी<br />
उस जैसा गुण पा ले<br />
कभी दुख्नी न हो इन्सान&#8217;</p>
<p>तीसरे ने लिखा<br />
&#8216;कौवा काला, काली उसकी नीयत<br />
सुबह उसकी आवाज सुन लें तो<br />
पूरा दिन होते परेशान&#8217;</p>
<p>सिद्ध पुरुष ने फैसला दिया<br />
&#8216;कौवे के बारे में जो नहीं जानता<br />
उस निरे अज्ञानी को और<br />
जो उसमें दूरदृष्टि देखता है<br />
उस परम बुद्धिमान को<br />
मैं अपना शिष्य बनाऊंगा<br />
जिसने कौवे में दोष देखे<br />
दिखा उसमें एक भी गुण<br />
उस अल्पज्ञानी को<br />
मैं नहीं दे पाऊँगा कोई ज्ञान&#8217;</p>
<p>तीनों चले गए तो गुरुजी के<br />
पुराने और प्रिय शिष्य ने पूछा&#8217;<br />
&#8216;उस निरे अज्ञानी से तो वह ठीक था<br />
कुछ लिखना-पढना तो जानता था<br />
उसे भी अपना शिष्य बना लेते<br />
कृतार्थ करते उसे देकर ज्ञान&#8217;</p>
<p>सिद्ध पुरुष ने कहा<br />
&#8216;उसे अपने अक्षर ज्ञान का था अहंकार<br />
सब विषय में पढा पर उसका था अभिमान<br />
इसलिये रह गया अल्पज्ञानी<br />
पर उस अपढ़ अज्ञानी को यह मालुम है कि<br />
नहीं है इसके पास नहीं कोई ज्ञान<br />
वह लगन से सीखेगा<br />
बुद्धिमान पर तो होगी थोडी मेहनत<br />
पर उस अल्पज्ञानी पर<br />
पूरी जिन्दगी गुजार देता<br />
फिर भी नहीं होता उसे ज्ञान<br />
सदैव अहंकार में डूबा रहता<br />
थोडा सीखता ज्यादा दिखाता<br />
दोष दूसरों में देखे<br />
नहीं होता कभी उसे अच्छाई का भान<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
</div>]]></content:encoded>
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