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	<title>hasya-kahani &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/hasya-kahani/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hasya-kahani"</description>
	<pubDate>Fri, 25 Dec 2009 07:56:27 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[नापसंद लेखक, पसंदीदा आशिक-हिन्दी हास्य कविता (rejected writer-hindi hasya kavita)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/06/pasand-aur-napasand-hindi-comdey-satire/</link>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 14:36:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/06/pasand-aur-napasand-hindi-comdey-satire/</guid>
<description><![CDATA[आशिक ने अपनी माशुका को इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए अपने ब्लाग पर पसंद नापसंद का स्तंभ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आशिक ने अपनी माशुका को<br />
इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए<br />
अपने ब्लाग पर<br />
पसंद नापसंद का स्तंभ<br />
एक तरफ लगाया।<br />
पहले खुद ही पसंद पर किल्क कर<br />
पाठ को ऊपर चढ़ाता था<br />
पर हर पाठक मूंह फेर जाता था<br />
नापसंद के विकल्प को उसने लगाया।<br />
अपने पाठों पर फिर तो<br />
फिकरों की बरसात होती पाया<br />
पसंद से कोई नहीं पूछता था<br />
पहले जिन पाठों को<br />
नापसंद ने उनको भी ऊंचा पहुंचाया।<br />
उसने अपने ब्लाग का दर्शन<br />
अपनी माशुका को भी कराया।<br />
देखते ही वह बिफरी<br />
और बोली<br />
‘‘यह क्या बकवाद लिखते हो<br />
कवि कम फूहड़ अधिक दिखते हो<br />
शर्म आयेगी अगर अब<br />
मैंने यह ब्लाग अपनी सहेलियों को दिखाया।<br />
हटा दो यह सब<br />
नहीं तो भूल जाना अपने इश्क को<br />
दुबारा अगर इसे लगाया।’’</p>
<p>सुनकर आशिक बोला<br />
‘‘अरे, अपने कीबोर्ड पर<br />
घिसते घिसते जन्म गंवाया<br />
पर कभी इतना हिट नहीं पाया।<br />
खुद ही पसंद बटन पर<br />
उंगली पीट पीट कर<br />
अपने पाठ किसी तरह  चमकाये<br />
पर पाठक उसे देखने भी नहीं आये।<br />
इस नपसंद ने बिना कुछ किये<br />
इतने सारे पाठक जुटाये।<br />
तुम इस जमाने को नहीं जानती<br />
आज की जनता गुलाम है<br />
खास लोगों के चेहरे देखने<br />
और उनका लिखा पढ़ने के लिये<br />
आम आदमी को वह कुछ नहीं मानती<br />
आम कवि जब चमकता है<br />
दूसरा उसे देखकर बहकता है<br />
पसंद के नाम सभी मूंह फुलाते<br />
कोई नापसंद हो उस पर मुस्कराते<br />
पहरे में रहते बड़े बड़े लोग<br />
इसलिये कोई कुछ नहीं कर पाता<br />
अपने जैसा मिल जाये कोई कवि<br />
उस अपनी कुंठा हर कोई उतार जाता<br />
हिट देखकर सभी ने अनदेखा किया<br />
नापसंद देखकर उनको भी मजा आया।<br />
ज्यादा हिट मिलें इसलिये ही<br />
यह नापसंद चिपकाया।<br />
अरे, हमें क्या<br />
इंटरनेट पर हिट मिलने चाहिये<br />
नायक को मिलता है सब<br />
पर खलनायक भी नहीं होता खाली<br />
यह देखना चाहिये<br />
मैं पसंद से जो ना पा सका<br />
नापसंद से पाया।’’</p>
<p>इधर माशुका ने सोचा<br />
‘मुझे क्या करना<br />
आजकल तो करती हैं<br />
लड़कियां बदमाशों से इश्क<br />
मैंने नहीं लिया यह रिस्क<br />
इसे नापसंद देखकर<br />
दूसरी लड़कियां डोरे नहीं डालेंगी<br />
क्या हुआ यह नापसंद लेखक<br />
मेरा पसंदीदा आशिक है<br />
इसमें कुछ बुरा भी समझ में नहीं आया।’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-patrika.com/">‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</p></blockquote>
<p>हिंदी </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कल के बड़े और आज के बच्चे-हिंदी हास्य कवितायें( badi aur bachche-hindi haysa kavita ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/09/07/rahat-aur-rutva-hindi-comedy-satire-poem/</link>
<pubDate>Mon, 07 Sep 2009 16:33:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/09/07/rahat-aur-rutva-hindi-comedy-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[बेटे ने मां से कहा ‘‘मां, मुझे पैसा दो तो कार खरीद कर लाऊं कालिज उससे जाकर अपनी छबि बनाऊं पापा, नोटो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>बेटे ने मां से कहा<br />
‘‘मां, मुझे पैसा दो तो<br />
कार खरीद कर लाऊं<br />
कालिज उससे जाकर अपनी छबि बनाऊं<br />
पापा, नोटों की भरी पेटी रखकर<br />
दौरे पर गये हैं<br />
मुझे अपने दोस्तों में रुतवा दिखाना है<br />
क्योंकि सभी नये हैं<br />
पता नहीं पापा कब आयेंगे<br />
तब तक अपनी इस मोटर साइकिल पर जाऊंगा तो<br />
सभी मेरी हंसी उड़ायेंगे।’</p>
<p>सुनकर मां गद्गद्वाणी में बोली<br />
‘बेटा, तुम्हारे पापा समाज सेवक है<br />
सभी जानते हैं<br />
उनको इसलिये मानते हैं<br />
यह पेटी उन्हीं चंदे के नोटों से भरी है<br />
जो सूखा राहत बांटने के लिये यहां धरी है<br />
माल तो यह सभी अपना है<br />
सूखा पीड़ितों के लिये तो बस एक सपना है<br />
पर तुम्हारे पापा कागज पत्रक पूरे करने के लिये<br />
दौरे पर गये हैं<br />
उनका नया होना जरूरी है<br />
क्योंकि यह नोट भी नये हैं<br />
यह दौरा कर वह राहत बंटवा रहे हैं<br />
सच तो यह है कि<br />
बांट सकें जिनको<br />
उन मरे लोगों के नाम छंटवा रहे हैं<br />
अगर अभी पैसा खर्च कर ले आओगे<br />
अपने पापा पर शक की सुई घुमाओगे<br />
इसलिये आने दो उनको<br />
इस भरी पेटी से तुम्हारी कार का पैसा निकालकर<br />
तुम्हारे हाथों से इसका<br />
और तुम्हारी राहत का उद्घाटन करायेंगे।</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<strong>आज के बच्चे<br />
अपने माता पिता के बाल्यकाल से<br />
अधिक तीक्ष्ण बुद्धि के पाये जाते<br />
यह सच कहा जाता है।<br />
किस नायिका का किससे<br />
चल रहा है प्रेम प्रसंग<br />
अपने जन्मदिन पर नायक की<br />
किस दूसरे नायक से हुई जंग<br />
कौन गायक<br />
किस होटल में मंदिर गया<br />
कौन गीतकार आया नया<br />
कौनसा फिल्मी परिवार<br />
किस मंदिर में करने गया पूजा<br />
कहां जायेगा दूजा<br />
रेडियो और टीवी पर<br />
इतनी बार सुनाया जाता है।<br />
देश का हर बच्चा ज्ञान पा जाता है।</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;  </p>
<blockquote><p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ इन्सान और सर्वशक्तिमान-हास्य व्यंग्य (bhagvan aur insan-hindi hasya vyangya ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/08/27/man-and-god-hindi-satire/</link>
<pubDate>Thu, 27 Aug 2009 14:37:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/08/27/man-and-god-hindi-satire/</guid>
<description><![CDATA[सर्वशक्तिमान ने एक नया इंसान तैयार किया और उसे धकियाने से पहले उसके सभी अंगों का एक औपचारिक परीक्षण ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सर्वशक्तिमान ने एक नया इंसान तैयार किया और उसे धकियाने से पहले उसके सभी अंगों का एक औपचारिक परीक्षण किया। आवाज का परीक्षण करते समय वह इंसान बोल पड़ा-‘महाराज, नीचे सारे संसार का सारा ढर्रा बदल गया है और एक आप है कि पुराने तरीके से काम चला रहे हैं। अब आप इंसानों का भी पंख लगाना शुरु कर दीजिये ताकि कुछ गरीब लोग धनाभाव के कारण आकाश में उड़ सकें। अभी यह काम केवल पैसे वालों का ही रह गया।’<br />
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘पंख दूंगा तो गरीब क्या अमीर भी उड़ने लगेंगे। बिचारे एयरलाईन वाले अपना धंधा कैसे करेंगे? फिर पंख देना है तो तुम्हें इंसान की बजाय कबूतर ही बना देता हूं। मेरे लिये कौनसा मुश्किल काम है?<br />
वह इंसान बोला-‘नहीं! मैं इंसान अपने पुण्यों के कारण बना हूं इसलिये यह तो आपको अधिकार ही नहीं है। जहां तक पंख मिलने पर अमीरों के भी आसमान में उड़ने की बात है तो आपने सभी को चलने और दौड़ने के लिये पांव दिये हैं पर सभी नहीं चलते। नीचे जाकर आप देखें तो पायेंगे कि लोग अपने घर से दस मकान दूर पर स्थित दुकान से सामान खरीदने के लिये भी कार पर जाते हैं। ऐसे लोगों पर आपकी मेहरबानी बहुत है और पंख मिलने पर भी हवाई जहाज से आसमान में उड़ेंगे। मुद्दा तो हम गरीबों का है!’</p>
<p>सर्वशक्तिमान ने कहा-‘वैसे तुम ठीक कहते हो कि पांव देने पर भी इंसान अब उसका उपयोग कहां करता है पर फिर भी पंख देने से तुम पक्षियों का जीना हराम कर दोगे। अभी तो तुम उड़ते हुए पक्षी को ही गुलेल मारकर नीचे गिरा देते हो। फिर तो तुम चाहे जब आकाश में उड़ाकर पकड़ लोगे।’</p>
<p>उस इंसान ने कहा-‘ऐसा कर तो इंसान आप का ही काम हल्का करता है। वरना तो आपका यह प्रिय जीव इंसान हमेशा हीं संकट में रहेगा। इनकी संख्या इतनी बढ़ जायेगी कि इंसान भाग भाग कर आपके पास जल्दी आता रहेगा।’<br />
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अरे चुप! बड़ा आये मेरा काम हल्का करने वाले। वैसे ही तुम लोगों की वजह से  हर एक दो सदी में अहिंसा का संदेश देने वाला कोई खास इंसान जमीन पर भेजना पड़ता है।  वैसे तुम इंसानों ने वहां पर्यावरण इतना बिगाड़ दिया है कि नाम मात्र को पशु पक्षी भेजने पड़ते हैं। अधिक भेजे तो उनके लिये रहने की जगह नहीं बची है।  सच तो यह है मुझे सभी प्रकार के जीव एक जैसे प्रिय हैं इसलिये सोचता हूं कि कुछ पशु पक्षी वहां मेरा दायित्व निभाते रहें।  वह बिचारे भी मेरे नाम पर शहीद कर दिये जाते हैं इस कारण उनको अपने पास ही रखना पड़ता है। कभी सोचता हूं कि उनको दोबारा नीचे भेजूं पर फिर उन पर तरस आ जाता है। वैसे मैंने तुम इंसानों को इतनी अक्ल दी है कि बिना पंख आकाश में उड़ने के सामान बना सको।’<br />
वह इंसान बोला-‘वह सामान तो बहुत है पर वहां पेट्रोल की वजह से एयर लाईनों में किराये बढ़े गये हैं और उसमें अमीर ही उड़ सकते हैं या आपके ढोंगी भक्त! गरीब आदमी का क्या?’</p>
<p>सर्वशक्तिमान ने कहा-‘गरीब आदमी जिंदा तो है न! अगर उसे पंख लगा दिये तो भी उड़ नहीं सकेगा। अभी गरीब आदमी को कहीं बैल की तरह हल में जोता जाता है और कहीं उसे घोड़े की जगह जोतकर रिक्शा खिंचवाया जाता है। अगर पंख दिये तो उसे अपने कंधे पर अमीर लोग ढोकर ले जाने पड़ेंगे।  इंसान को इंसान पर अनाचार करने में मजा आता है और इस तरह तो गरीब पर अनाचार की कोई सीमा ही नहीं रहेगी। वैसे तुम क्यों फिक्र कर रहे हो।<br />
वह इंसान बोला-‘महाराज, मैं तो बस जिंदगी भर आकाश में उड़ना चाहता हूं।’<br />
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘अब तो बिल्कुल नहीं। तुम इंसानों को अक्ल का खजाना दिया है पर तुम उसका इस्तेमाल  पांव से चलने पर भी नहीं कर पाते तो उड़ते हुए तो वैसे ही वह अक्ल कम हो जाती है।  इतनी सारी दुर्घटनाओं के शिकार असमय ही यहां चले आते हैं और जब तक उनके दोबारा जन्म का समय न आये तब तक उनको भेजना कठिन है। उनसे पूरा पुराना अभिलेखागार भरा पड़ा है।  अगर तुमको आकाश में उड़ने के लिये पंख दिये तो फिर ऐसे अनेक पुराने अभिलेखागार बनाने होंगे। अब तुम जाओ बाबा यहां से! कुछ देर बाद कहोगे कि सांप की तरह विष वाले दांत दे दो। अमीर तो अपनी रक्षा कर लेता है गरीब कैसे करेगा? जबकि उससे अधिक विष अंदर रहता ही है भले दांत नहीं दिये पर उसने तुम इंसान कहां चूकते हो।’<br />
सर्वशक्तिमान ने उस जीव को नीचे ढकेल दिया।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-patrika.com">‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कविराज की ब्लाग पत्रिका का विमोचन-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/05/08/kaviraj-ki-patrika-hasya-vyangya-in-hindi/</link>
<pubDate>Fri, 08 May 2009 15:59:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/05/08/kaviraj-ki-patrika-hasya-vyangya-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[कविराज जल्दी जल्दी घर जा रहे थे और अपनी धुन में सामने आये आलोचक महाराज को देख नहीं सके और उनसे रास्त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>कविराज  जल्दी जल्दी घर जा रहे थे और अपनी धुन में सामने आये आलोचक महाराज को देख नहीं सके  और उनसे रास्ता काटकर आगे जाने लगे। आलोचक महाराज ने तुरंत हाथ पकड़ लिया और कहा-‘क्या बात है? कवितायें लिखना बंद कर दिया है! इधर आजकल न तो अखबार में छप रहे हो और न हमारे पास दिखाने के लिये कवितायें ला रहे हो। अच्छा है! कवितायें लिखना बंद कर दिया।’<br />
कविराज बोले-‘महाराज कैसी बात करते हो?  भला कोई कवि लिखने के बाद कवितायें लिखना बंद कर सकता है।  आपने मेरी कविताओं पर कभी आलोचना नहीं लिखी। कितनी बार कहा कि आप मेरी कविता पर हस्ताक्षर कर दीजिये तो कहीं बड़ी जगह छपने का अवसर मिल जाये पर आपने नहीं किया। सोचा चलो कुछ स्वयं ही प्रयास कर लें।’<br />
आलोचक महाराज ने अपनी बीड़ी नीचे फैंकी और उसे पांव से रगड़ा और गंभीरता से शुष्क आवाज में पूछा-‘क्या प्रयास कर रहे हो? और यह हाथ में क्या प्लास्टिक का चूहा पकड़ रखा है?’<br />
कविराज झैंपे और बोले-‘कौनसा चूहा? महाराज यह तो माउस है। अरे, हमने कंप्यूटर खरीदा है। उसका माउस खराब था तो यह बदलवा कर ले जा रहे हैं। पंद्रह दिन पहले ही इंटरनेट कनेक्शन लगवाया है। अब सोचा है कि इंटरनेट पर ब्लाग लिखकर थोड़ी किस्मत आजमा लें।’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘तुम्हें रहे ढेर के ढेर।  हमने चूहा क्या गलत कहा? तुम्हें मालुम है कि हमारे देश के एक अंग्रजीदां विद्वान को इस बात पर अफसोस था कि हिंदी में रैट और माउस के लिये अलग अलग शब्द नहीं है-बस एक ही है चूहा।  हिंदी में इसे चूहा ही कहेंगे। दूसरी बात यह है कि तुम कौनसी फिल्म में काम कर चुके हो कि यह ब्लाग बना रहे हो। इसे पढ़ेगा कौन?’<br />
कविराज ने कहा-‘अब यह तो हमें पता नहीं। हां, यह जरूर है कि न छपने के दुःख से तो बच जायेंगे।  कितने रुपये का डाक टिकट हमने बरबाद कर दिया। अब जाकर इंटरनेट पर अपनी पत्रिका बनायेंगे और जमकर लिखेंगे। हम जैसे आत्ममुग्ध कवियों और स्वयंभू संपादकों के लिये अब यही एक चारा बचा है।’<br />
‘हुं’-आलोचक महाराज ने कहा-‘अच्छा बताओ तुम्हारे उस ब्लाग या पत्रिका का लोकार्पण कौन करेगा? भई, कोई न मिले तो हमसे कहना तो विचार कर लेंगे। तुम्हारी कविता पर कभी आलोचना नहीं लिखी इस अपराध का प्रायश्चित इंटरनेट पर तुम्हारा ब्लाग या पत्रिका जो भी हो उसका  लोकार्पण कर लेंगे। हां, पर पहली कविता में हमारे नाम का जिक्र अच्छी तरह कर देना। इससे तुम्हारी भी इज्जत बढ़ेगी।’<br />
कविराज जल्दी में थे इसलिये बिना सोचे समझे बोल पड़े कि -‘ठीक है! आज शाम को आप पांच बजे मेरे घर आ जायें। पंडित जी ने यही मूहूर्त निकाला है। पांच से साढ़े पांच तक पूजा होगी और फिर पांच बजकर बत्तीस मिनट पर ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण होगा।’<br />
‘ऊंह’-आलोचक महाराज ने आंखें बंद की और फिर कुछ सोचते हुए कहा-‘उस समय तो मुझे एक संपादक से मिलने जाना था पर उससे बाद में मिल लूंगा। तुम्हारी उपेक्षा का प्रायश्चित करना जरूरी है। वैसे इस चक्कर में क्यों पड़े हो? अरे, वहां तुम्हें कौन जानता है। खाली पीली मेहनत बेकार जायेगी।’<br />
कविराज ने कहा-‘पर बुराई क्या है? क्या पता हिट हो जायें।’<br />
कविराज वहां से चल दिये। रास्ते में उनके एक मित्र कवि मिल गये। उन्होंने पूरा वाक्या उनको सुनाया तो वह बोले-‘अरे, आलोचक महाराज के चक्कर में मत पड़ो। आज तक उन्होंने जितने भी लोगो की किताबों का विमोचन या लोकर्पण किया है सभी फ्लाप हो गये।’<br />
कविराज ने अपने मित्र से आंखे नचाते हुए कहा-‘हमें पता है। तुम भी उनके एक शिकार हो। अपनी किताब के विमोचन के समय हमको नहीं बुलाया और आलोचक महाराज की खूब सेवा की। हाथ में कुछ नहीं आया तो अब उनको कोस रहे हो। वैसे हमारे ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण तो इस माउस के पहुंचते ही हो जायेगा। इन आलोचक महाराज ने भला कभी हमें मदद की जो हम इनसे अपने ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण करायेंगे?’<br />
मित्र ने पूछा-‘अगर वह आ गये तो क्या करोगे?’<br />
कविराज ने कहा-‘उस समय हमारे घर की लाईट नहीं होती। कह देंगे महाराज अब कभी फिर आ जाना।’<br />
कविराज यह कहकर आगे बढ़े पर फिर पीछे से उस मित्र को आवाज दी और  बोले-‘तुम कहां जा रहे हो?’<br />
मित्र ने कहा-‘आलोचक महाराज ने मेरी पत्रिका छपने से लेकर लोकार्पण तक का काम संभाला था। उस पर खर्च बहुत करवाया और फिर पांच हजार रुपये अपना मेहनताना यह कहकर लिया कि अगर मेरी किताब नहीं बिकी तो वापस कर देंगे। उन्होंने कहा था कि किताब जोरदार है जरूर बिक जायेगी। एक भी किताब नहीं बिकी। अपनी जमापूंजी खत्म कर दी। अब हालत यह है कि फटी चपलें पहनकर घूम रहा हूं। उनसे कई बार तगादा किया। बस आजकल करते रहते  हैं। अभी उनके पास ही जा रहा हूं। उनके घर के चक्कर लगाते हुए कितनी चप्पलें घिस गयी हैं?’</p>
<p>कविराज ने कहा-‘किसी अच्छी कंपनी की चपलें पहना करो।’<br />
मित्र ने कहा-‘डायलाग मार रहे हो। कोई किताब छपवा कर देखो। फिर पता लग जायेगा कि कैसे बड़ी कंपनी की चप्पल पहनी जाती है।’<br />
कविराज ने कहा-‘ठीक है। अगर उनके घर जा रहे हो तो बोल देना कि हमारे एक ज्ञानी आदमी ने कहा कि उनकी राशि के आदमी से ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण  करवाना ठीक नहीं होगा!’<br />
मित्र ने घूर कर पूछा-‘कौनसी राशि?’<br />
कविराज ने कहा-‘कोई भी बोल देना या पहले पूछ लेना!’<br />
मित्र ने कहा-‘एक बात सोच लो! झूठ बोलने में तुम दोनों ही उस्ताद हो। उनसे पूछा तो पहले कुछ और बतायेंगे और जब तुम्हारा संदेश दिया तो दूसरी बताकर चले आयेंगे। वह लोकार्पण किये बिना टलेंगे नहीं।’<br />
कविराज बोले-‘ठीक है बोल देना कि लोकार्पण का कार्यक्रम आज नहीं कल है।’<br />
मित्र ने फिर आंखों में आंखें डालकर पूछा-‘अगर वह कल आये तो?’<br />
कविराज ने कहा-‘कल मैं घर पर मिलूंगा नहीं। कह दूंगा कि हमारे ज्ञानी ने स्थान बदलकर ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण करने को कहा था आपको सूचना नहीं दे पाये।’<br />
मित्र ने कहा-‘अगर तुम मुझसे लोकर्पण कराओ तो एक आइडिया देता हूं जिससे वह आने से इंकार कर देंगे। वैसे तुम उस ब्लाग पर क्या लिखने वाले हो? कविता या कुछ और?’<br />
कविराज ने कहा-‘सच बात तो यह है कि आलोचक महाराज पर ही व्यंग्य लिखकर रखा था कि यह माउस खराब हो गया। मैंने इंजीनियर से फोन पर बात की। उसने ही ब्लाग बनवाया है। उसी के कहने से यह माउस बदलवाकर वापस जा रहा हूं।’<br />
मित्र ने कहा-‘यही तो मैं कहने वाला था! आलोचक महाराज व्यंग्य से बहुत कतराते हैं। इसलिये जब वह सुनेंगे कि तुम पहले ही पहल व्यंग्य लिख रहे हो तो परास्त योद्धा की तरह हथियार डाल देंगे। खैर अब तुम मुझसे ही ब्लाग पत्रिका का विमोचन करवाने का आश्वासन दोे। मैं जाकर उनसे यही बात कह देता हूं।’<br />
वह दोनों बातें कर रह रहे थे कि वह कंप्यूटर इंजीनियर उनके पास मोटर साइकिल पर सवार होकर आया और खड़ा हो गया और बोला-‘आपने इतनी देर लगा दी! मैं कितनी देर से आपके घर पर बैठा था। आप वहां कंप्यूटर खोलकर चले आये और उधर मैं आपके घर पहुंचा।  बहुत देर इंतजार किया और फिर मैं अपने साथ जो माउस लाया था वह लगाकर   प्रकाशित करने वाला बटन दबा दिया। बस हो गयी शुरुआत! अब चलिये मिठाई खिलाईये। इतनी देर आपने लगाई। गनीमत कि कंप्यूटर की दुकान इतने पास  है कहीं दूर होती तो आपका पता नहीं कब पास लौटते।’</p>
<p>कविराज ने अपने मित्र से कहा कि-’अब तो तुम्हारा और आलोचक महाराज दोनों का दावा खत्म हो गया। बोल देना कि इंजीनियर ने बिना पूछे ही लोकार्पण कर डाला।’<br />
मित्र चला गया तो इंजीनियर चैंकते हुए पूछा-‘यह लोकार्पण यानि क्या? जरा समझाईये तो। फिर तो मिठाई के पूरे डिब्बे का हक बनता है।’<br />
कविराज ने कहा-‘तुम नहीं समझोगे। जाओ! कल घर आना और अपना माउस लेकर यह वापस लगा जाना। तब मिठाई खिला दूंगा।’<br />
इंजीनियर ने कहा-‘वह तो ठीक है पर यह लोकार्पण यानि क्या?’<br />
कविराज ने कुछ नहीं कहा और वहां से एकदम अपने ब्लाग देखने के लिये तेजी से निकल पड़े। इस अफसोस के साथ कि अपने ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण वह स्वयं नहीं कर सके।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><blockquote><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप<br />
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<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रचार ही होता है प्रमाण पत्र-हास्य व्यंग्य कविताएँ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/03/23/add-and-certificate-hasya-hindi-kavita/</link>
<pubDate>Mon, 23 Mar 2009 13:40:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/03/23/add-and-certificate-hasya-hindi-kavita/</guid>
<description><![CDATA[रोगियों के लिये निशुल्क चिकित्सा शिविर बहुत प्रचार कर उन्होंने लगाया पंजीयन के लिये बस पचास रुपये का]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>रोगियों के लिये निशुल्क चिकित्सा शिविर<br />
बहुत  प्रचार कर उन्होंने लगाया<br />
पंजीयन के लिये बस<br />
पचास रुपये का नियम बनाया<br />
खूब आये मरीज<br />
इलाज में बाजार से खरीदने के लिये<br />
एक पर्चा सभी डाक्टर ने थमाया<br />
इस तरह अपने लिये उन्होंने<br />
अपने धर्मात्मा होने का प्रमाण पत्र जुटाया<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
ऊपर कमाई करने वालों ने<br />
अपने लेने और देने के दामों को बढ़ाया<br />
इसलिये भ्रष्टाचार विरोधी<br />
पखवाड़े में कोई मामला सामने नहीं आया<br />
धर्मात्मा हो गये हैं  सभी जगह<br />
लोगों ने  अपने को समझाया</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शराब पीकर पिटा तो हीरो हो जायेगा -व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/01/28/sharab-pikar-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Wed, 28 Jan 2009 17:11:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/01/28/sharab-pikar-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[पड़ौसन ने कहा उस औरत से ‘तुम्हारा आदमी रात को रोज शराब पीकर आता है पर तुम कुछ नहीं कहती वह आराम से स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong></strong><strong>पड़ौसन ने कहा उस औरत से<br />
‘तुम्हारा  आदमी रात को रोज<br />
शराब पीकर आता है<br />
पर तुम कुछ नहीं कहती<br />
वह आराम से सो जाता है<br />
अरे, उससे कुछ कहा कर<br />
ताकि चार लोग सुन सकें<br />
तो वह सुधर जायेगा<br />
इज्जत खराब होने के डर से<br />
वह शराब पीना भूल जायेगा’</p>
<p>औरत से जवाब दिया<br />
‘जानती हूं, तुम तमाशा देखना चाहती हो<br />
इसलिये उकसाती हो<br />
जब रात को वह पीकर आता है<br />
तो मैं कुछ नहीं कहती<br />
क्योंकि शराबी को अपने मान अपमान की<br />
परवाह नहीं होती<br />
पहले किराये के मकान में<br />
रोज तमाशा होता था<br />
सभी इसका समर्थन करते थे<br />
जब यह मुझसे पिटकर रोता था<br />
अपना इसलिये अब सुबह गुस्सा सुबह उठकर<br />
इसकी पिटाई लगाती हूंं<br />
दिन के उजाले में  आवाज नहीं आती<br />
इसलिये तुमको भी नहीं बताती<br />
सुबह इसे अपने अपमान का<br />
इसे कई बार भय सताता है<br />
इसलिये कई बार बिना पिये घर आता है<br />
अगर रात को मचाऊं कोहराम<br />
जमाने भर में हीरो के रूप में हो जायेगा इसका नाम<br />
पिटा हुआ शराबी भी क्यों न हो<br />
जमाने भर को उस पर तरस आता है<br />
क्यों करूं अपना खराब नाम<br />
जमाना तो जज्बात की पतली धारा में ही बह जाता है</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<p><strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://amrut-sandesh.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लागर सरकार पर एसा वैसा मत लिख देना-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/01/15/aisa-vaisa-mat-likhna-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Thu, 15 Jan 2009 14:14:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/01/15/aisa-vaisa-mat-likhna-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[सर्दी की सुबह चाय पीने के बाद ब्लागर कोहरे में घर से बाहर निकला। उसका शरीर ठंड से कांप रहा था पर चाय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सर्दी की सुबह चाय पीने के बाद ब्लागर कोहरे में घर से बाहर निकला। उसका शरीर ठंड से कांप रहा था पर चाय पीने से जो पेट मं गैस बनती है उससे निपटने का ब्लागर के पास यही एक नुस्खा था कि वह बाहर टहल आये।   वह थोड़ा दूर चला होगा तो उसे कालोनी के नोटिस बोर्ड पर एक पर्चा चिपका दिखाई दिया।  वह उसे देखकर कर अनेदखा कर निकल जाता पर उसे लगा कि कहीं ब्लागर शब्द लिखा हुआ है। वह सोच में पड़ गया कि यह आखों का वहम होगा।  भला यहां कौन जानता है ब्लागर के बारे में। फिर वह रुककर उस पर्चे के पास गया और उसे पढ़ने लगा। उस पर लिखा था कि</p>
<blockquote><p><strong>‘आज ब्लागर सरकार की दरबार  पर विशेष कार्यक्रम होगा। सभी इंटरनेट धार्मिक बंधुओं से निवेदन है कि वहां पहुंचकर लाभ उठावें  । इस अवसर पर ब्लागर सरकार की विशेष आरती होगी उसके बाद समस्त धार्मिक बंधुओं को ज्योतिष,विज्ञान,तकनीकी तथा वैवाहिक ब्लाग तथा वेबसाईटों की जानकारी दी जायेगी। ब्लागर सरकार की पूजा से अनेक लोगों ने इंटरनेट पर हिट पाये हैं और उनके प्रवचन भी इस अवसर पर आयोजित किये जायेंगे। स्थान-नीली छतरी, दो पुलों के बीच, घाटी के बगल में। निवेदक ब्लागर स्वामी। </strong></p></blockquote>
<p>ब्लागर का माथा ठनका। वह भागा हुआ घर लौटा। गृहस्वामिनी ने कहा-‘क्या बात है इतनी जल्दी लौट आये। क्या सर्दी सहन नहीं हुई। मैंने पहले ही कहा था कि बाहर मत जाओ।’<br />
ब्लागर ने कहा-‘यह बात नहीं हैं। मैं साइकिल पर जा रहा हूं थोड़ा दूर जाना होगा। वह जो दूसरा ब्लागर है न! उसने शायद कोई ब्लागर सरकार का दरबार के नाम से कुछ बनाया है। इतने दिन से आया नहीं हैं। मैं समझ गया था कि वह कुछ न कुछ करता होगा।<br />
गृहस्वामिनी ने कहा-‘वह क्यों ब्लागर सरकार का दरबार बनायेगा। उसके सामने तो वैसे ही सर्वशक्तिमान का पुराना बना बनाया दरबार है जहां उसकी महफिल जमती है।’<br />
ब्लागर ने कहा-‘पर ठिकाना वही है। जरूर वह कुछ गड़बड़ कर रहा है। मैं जाता हूं। यह दरबार उसी का होना चाहिये। उसने कोई नया बखेड़ा खड़ा किया होगा। वह बहुत दिनों से उस दरबार में भक्तों के जमावड़े और चढ़ावा बढ़ाने की योजनायें बन रहा है।<br />
गृहस्वामिनी ने कहा-‘तो फिर स्कूटर ले जाओ।’<br />
ब्लागर अपने पुराने स्कूटर की तरफ झपटा तो गृहस्वामिनी ने कहा-‘अब इस पुराने स्कूटर को मत ले जाओ।  नया स्कूटर ले जाओ। वैसे ही वहां भीड़ होगी और वह मजाक बनायेगा। उसके नये दरबार में अपनी भद्द मत पिटवाओ।<br />
ब्लागर ने अपना नया स्कूटर लिया। रास्ते में उसका कालोनी का एक मित्र टिप्पणी स्वामी मिल गया। उसे जब ब्लागर ने अपनी बात बताई तो वह भी उसके साथ हो लिया। स्कूटर पर बैठते हुए वह बोला-‘वैसे तो वह तुम और वह दोनों फालतू हो पर क्योंकि स्कूटर तुम्हारा है और पेट्रोल भी तो साथ चलता हूं।  मेरा घूमना फ्री में हो जायेगा इसलिये साथ चल रहा हूं।’<br />
दोनों स्कूटर पर सवाल होकर साढ़े तीन मिनट में-टिप्पणी स्वामी की वहां पहुंचते ही दी गयी टिप्पणी के अनुसार-वहां पहुंच गये। ब्लागर का  संदेह ठीक था। दूसरे ब्लागर ने अपने सामने बने पुराने दरबार पर पहले ही कब्जा कर रखा था और उसके आंगन में खाली पड़ी जमीन पर बना दिया था ‘ब्लागर सरकार का दरबार’।<br />
ब्लागर अपना स्कूटर सीधे अंदर ले गया। वहां एक आदमी तौलिया पहने दांतुन कर रहा था। उसने सिर से ठोढ़ी तक टोपा  तथा शरीर पर भारीभरकम पुराना स्वेटर पहनकर रखा था। मूंह में दातुन रखे ही उसने ब्लागर की तरफ उंगली उठाकर कहा-‘उधर रखो। इधर स्कूटर कहां रख रहे हो। यह ब्लागर सरकार का दरबार है।’<br />
ब्लागर उसे घूर कर देख रहा था। टिप्पणी स्वामी ने उससे कहा-‘अरे, भाई यह ब्लागर सरकार का दरबार है और हमारे यह मित्र ब्लागर हैं। इस दरबार का जो स्वामी है वह इनका खास मित्र है। जाओ उसे बुलाओ। ब्लागरों का स्कूटर भी खास होता है।’  </p>
<p>जानता हूं। जानता हूं। इसका नया स्कूटर तो क्या पुरानी साइकिल भी खास होती है।’ यह कहकर वह आदमी कुल्ला करने गया। इधर पहले ब्लागर ने टिप्पणी स्वामी से कहा-‘अरे, तुमने पहचाना नहीं यही है वह ब्लागर स्वामी। अब लौटते ही  शाब्दिक आक्रमण करेगा।’<br />
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘अरे, यार मैंने उसे एक बार ही देखा है। तुम तो अक्सर उससे मिलते हो।’</p>
<p>उधर से दूसरा ब्लागर लौटा और पहले ब्लागर से बोला-‘यह कौन कबूतर पकड़ लाये? जो मुझे बता रहा है कि तुम्हारा स्कूटर खास है?<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘यह टिप्पणी स्वामी है।  कभी कभार टिप्पणी देता है। हालांकि जबसे इसके मकान की उपरी मंजिल बनना शुरू हुई तब से इसकी पत्नी इसे इंटरनेट पर काम नहीं करने देती इसलिये वह भी अब बंद है।  बहरहाल यह ब्लागर सरकार के दरबार का क्या चक्कर है।’</p>
<p>दूसरे ब्लागर ने कहा-‘चक्कर क्या है? अधार्मिक कहीं के।  तुम अपनी टांग क्यों फंसाने आ गये? तुम तो अध्यात्मिक ज्ञान और धर्म को अलग अलग मानते हो न! क्या जानो धर्म के बारे में।  चक्कर नहीं है। यह मेरीे श्रद्धा और आस्था है। उस दिन रात को सपने में ब्लागर सरकार के दर्शन हुए और उन्होंने बताया कि उनकी स्थापना करूं!  आजकल इंटरनेट  के समय लोग सर्वशक्तिमान के सभी नाम और स्वरूपों को पुराना समझते हैं इसलिये उन्होंने मुझे इस नये स्वरूप की स्थापना का संदेश दिया। वैसे तुम यहां निकल लो क्योंकि तुम अपने ब्लाग पर मूर्तिपूजा के विरुद्ध लिखते रहते हो जबकि चाहे जिस दरबार में मूंह उठाये पहुंच जाते हो।  हमारा चरित्र तुम्हारी तरह दोहरा नहीं है।’<br />
टिप्पणी स्वामी ने पहले ब्लागर से कहा-‘यार, यह तो तुम्हें काटने दौड़ रहा है। इसे मालुम नहीं कि तुम अध्यात्म के विषय पर लिखते हो।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘कोई बात नहीं। इस बिचारे का दोष नहीं है। बहुत व्यस्त आदमी है इसलिये इसे पढ़ने का अवसर नहीं मिलता।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-वैसे तुम पढ़ने लायक लिखते क्या हो जिसे मैं  पढ़ूं। वैसे इस नये स्कूटर का मुहूर्त करने यहां आये हो क्या? यह केवल खाली हाथ मुझे दिखाकर क्या दिखाना चाहते होे। वैसे मैंने तुम्हें उस दिन नये स्कूटर पर  देख लिया था। अब बताओ यहां किसलिये आये हो।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम्हारे इस दरबार का पर्चा अपनी कालोनी में पढ़ा। मुझे लगा कि यह तुम्हारा कोई नया स्वांग है जिसे देखने चला आया।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘हां, तुमसे यही उम्मीद थी।  तुम मेरी धार्मिक भावनाओं को आहत कर रहे हो। वैसे तुम चाहे कितना भी लिखो जब तक ब्लाग स्वामी की कृपा नहीं होगी तब तक तुम हिट नहीं हो सकते।’<br />
पहला ब्लागर-‘ठीक है पहले तुम्हारे ब्लागर सरकार की मूर्ति अंदर चलकर  देख लें।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-नहीं। तुम जैसे नास्तिकों का अंदर प्रवेश वर्जित है।’<br />
टिप्पणीकार बोला-‘मैं तो अस्तिक हूं।  अंदर जाकर देख सकता हूं न!<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘नहीं! तुम इसके  साथी हो। नास्तिक का साथी भी नास्तिक ही होता है मेरे सामने तुम्हारा यह पाखंड नहीं चल सकता।’<br />
पहला ब्लागर बोला-‘ठीक है। अंदर क्या जाना? यहीं से पूरी तस्वीर दिख रही है। यह पत्थर की है न!<br />
दूसरा ब्लागर-‘नहीं प्लास्टिक की है। आर्डर देकर बनवाई है।<br />
पहला ब्लागर बोला-‘यार, फिर तुम मुझसे नाराज क्यों होते हो? मैंने तो कभी प्लास्टिक की मूर्तियों की पूजा करने से तो रोका  नहीं है।  वैसे यह डिजाइन तो ठीक है।’<br />
दूसरा ब्लागर-‘‘हां, डिजाइन पर अधिक पैसा खर्च हुआ है जो भक्तों के चंदे से मिले हैं। जैसे सपने में डिजाईन जैसी देखी थी वैसी ही बनवाई है।’<br />
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘यह डिजाईन तो शायद मैंने किसी पत्रिका में देखा था। फिर पैसे किस पर खर्च हुए। लगता है किसी ने ठग लिया।’<br />
दूसरा ब्लागर-टिप्पणी स्वामी! तुम अपनी बेतुकी टिप्पणियां करने बाज आओ। कहीं ब्लागर सरकार नाराज हो गये तो तुम्हारा इस दोस्त को एकाध टिप्पणी मिलती है उससे भी  तरस जायेगा। मकान बनने के बाद भी तुम्हारी पत्नी तुम्हें इंटरनेट पर काम करने नहंी देगी।<br />
दोनों मूर्तियां देखने लगे। कंप्युटर के उपर रखे कीबोर्ड पर अपने दोनों हाथों की उंगलियां रख ेएक चूहा बैठा मुस्कराने की मुस्कराने की मुद्रा में था। कंप्यूटर से जुड़ी हर सामग्री को वहां दिखाया गया था। कंप्यूटर की स्क्रीन पर लिखा था ब्लागर सरकार।</p>
<p>टिप्पणीकार ने धीरे से कहा-‘यह चूहा और कीबोर्ड कंप्यूटर  के ऊपर क्यों रखा हुआ है।’<br />
दूसरा ब्लागर चीखा-‘चूहा! अरे, यही तो हैं ब्लागर स्वामी! तुम कुछ तो सोचकर बोला करो। अपने इस दोस्त के चक्कर में तुम भी वैसी ही बेहूदा टिप्पणियां कर रहे हो जैसे यह पाठ लिखता है।’<br />
पहला ब्लागर अभी प्लास्टिक की मूर्ति को घूर रहा था। फिर बोला-‘मैंने अपनी कालोनी में एक पहचान वाले के यहां ऐसी ही मूर्ति देखी थी। वह बता रहे थे कि उन्होंने यह कबाडी को बेची थी।’<br />
दूसरा ब्लागर’-‘तुम क्या कहना चाहते हो कि मैंने यह कबाड़ी से खरीदी थी। अब तुम जाओ। यार, तुम मेरा समय खोटी कर रहे हो। अब यहां भक्तों के आने का समय हो गया है।  यहां पर मैंने लोगों को ज्योतिष,चैट,विवाह तथा नौकरी में मदद देने के लिये असली कंप्यूटर लगा रखे हैं। वह भक्त आते होंगे।<br />
पहले ब्लागर ने देखा कि टीन शेड से बने केबिन थे जहां कंप्यूटर रखे दिख रहे थे।  दूसरा ब्लागर बोला-‘जैसे जैसे भक्तों के कमेंट आते जायेंगे वैसे वैसे दरबार का विकास होता जायेगा।’<br />
ब्लागर और टिप्पणी स्वामी ने आश्चर्य से पूछा-‘कमेंट!<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘कमेंट यानि चढ़ावा। अरे, इतने दिन से ब्लागिंग कर रहे हो तुम्हें मालुम नहीं कि कमेंट भी चढ़ावे की तरह होता है और प्रसाद भी! वैसे तुम क्या समझोगे? तुम्हारे पाठ पढ़ता कौन है? जो कमेंट लगायेगा।’<br />
दूसरा ब्लागर मूर्ति तक गया और वहां से लड्ड्ओं की थाली ले आया। उस एक लड्ड् के दो भाग किये। एक भाग अपने मूंह में रख गया। फिर दूसरे भाग के दो भाग कर उसका एक भाग अपने मूंह में रख लिया और बाकी के दो भागों में एक पहले ब्लागर को दूसरा टिप्पणी स्वामी को देते हुए बोला-तुम दोनों तो हो नास्तिक। फिर भी यह थोड़ा थोड़ा प्रसाद खा लो। कल हमारे यहां एक लड़के को इंटरनेट पर चैट करते समय अपनी गर्लफ्रैंड का पहला ईमेल मिला तो उसने मन्नत पूरी होने पर यह लड्डूओं की कमेेंट चढ़ा गया।’<br />
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘इसकी क्या जरूरत थी। हम तो ब्लागर सरकार के दर्शन कर वैसे ही बहुत खुश हो गये।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘चुपचाप खालो टिप्पणी स्वामी! वरना इससे भी जाओगे।<br />
फिर उसने दूसरे ब्लागर से पूछा-‘वह तुम्हारा विशेष कार्यक्रम कब है?’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘परसों हो गया। क्या तुमने उस पर्चे में तारीख नहीं पढ़ी थी।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, जोश में होश नहीं रहा। अच्छा हम दोनों चलते हैं।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘बहुत मेहरबानी! अब मैं ब्लाग सरकार की विशेष आरती करूंगा। ब्लाग सरकार की मेहरबानी हो तो अच्छा अच्छे कमेंट आयेंगे तो तुम दोनों की शक्लें देखने से जो  बुरा टोटका हो गया उसको मिटाने के लिये यह जरूरी है। और हां! ब्लागर सरकार पर कुछ एैसा-वैसा मत लिख देना।’</p>
<p>पहला ब्लागर और टिप्पणी स्वामी स्कूटर से वापस लौटने लगे। टिप्पणी स्वामी ने पहले ब्लागर से पूछा-‘तुम इस पर कुछ लिखोगे।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, हास्य व्यंग्य!<br />
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘पर उसने मना किया था न! कहा था कि ब्लागर सरकार पर कुछ एैसा-वैसा मत लिख देना।’<br />
पहले ब्लागर ने स्कूटर रोक दिया और बोला-‘यार, उसने हास्य व्यंग्य लिखने से मना तो नहीं किया था!  चलो लौटकर  फिर भी पूछ लेते हैं।’<br />
टिप्पणीकार हैरान होकर उसकी तरफ देखने लगा। फिर पहले ब्लागर ने कहा-‘अगली बार पूछ लूंगा।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-patrika.com">‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कामेडी बनकर चमकेगा--हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/01/11/comedy-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sun, 11 Jan 2009 11:32:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/01/11/comedy-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[फंदेबाज लेकर अपने भतीजे को पहुंचा और बोला ‘‘दीपक बापू, मेरा यह भतीजा खूब लिखता है श्रृंगार रस से सरा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>फंदेबाज लेकर अपने भतीजे को<br />
पहुंचा और बोला<br />
‘‘दीपक बापू, मेरा यह भतीजा<br />
खूब लिखता है श्रृंगार रस से सराबोर कवितायें<br />
पर नहीं सुनते पुरुष और महिलायें<br />
आप तो इसे अब<br />
हंसी का कार्यक्रम बतायें<br />
ताकि हम लोग भी कुछ जमाने में इज्जत बनायें’’</p>
<p>उसके भतीजे को ऊपर से नीचे देखा<br />
फिर गला खंखार कर<br />
अपनी टोपी घुमाते बोले दीपक बापू<br />
’’कमबख्त जब भी घर आते हो<br />
साथ में होती बेहूदी समस्यायें<br />
जिनके बारे में हम नहीं जानते<br />
तुम्हें क्या बतायें<br />
रसहीन शब्द पहले सजाओ<br />
लोगों को सुनाते हुए कभी हाथ<br />
तो कभी अपनी कमर मटकाओ<br />
कर सको अभिनय तो मूंह भी बनाओ<br />
चुटकुला हो या कविता सब चलेगा<br />
जीवन के आचरण और चरित्र पर<br />
कहने से अच्छा होगा<br />
अपनी देह के विसर्जन करने वाले अंगों का<br />
इशारे में प्रदर्शन करना<br />
तभी हंसी का माहौन बनेगा<br />
कामेडी बनकर चमकेगा<br />
अपने साथ स्त्री रूप के मेकअप में<br />
कोई पुरुष भी साथ ले जाना<br />
उसकी सुंदरता के पर<br />
अश्लील टिप्पणी शालीनता से करना<br />
जिससे दर्शक बहक जायें<br />
वाह वाह करने के अलावा<br />
कुछ न बोल पायें<br />
किसी के समझ में आये या नहीं<br />
तुम तो अपनी बात कहते जाना<br />
यौवन से अधिक यौन का विषय रखना<br />
चुंबन का स्वाद न मीठा होता है न नमकीन<br />
पर लोगों को फिर भी पंसद है देखना<br />
हंसी की फुहार में भीगने का मन तो<br />
हमारा भी होता है<br />
दिल को नहला सकें हंसी से<br />
पर सूखे शब्द और निरर्थक अदाओं से<br />
कभी दिल खुश नहीं होता<br />
फ़िर भी  खुश दिखता है पता नहीं कैसे जमाना<br />
इससे अधिक तुम्हें हम और क्या बताये&#8221;</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
<strong>अपने दर्द का बयाँ किससे करें<br />
जबरन सब हँसते को तैयार हैं<br />
ढूंढ रहे हैं सभी अपनी असलियत से<br />
बचने के लिए रास्ते<br />
खोज में हैं सभी कि   मिल जाए<br />
अपना दर्द सुनाकर<br />
बन जाए कोई आदमी  एक चुटकुला<br />
दिल बहलाने के वास्ते<br />
करते हैं लोग<br />
ज़माने में उसका किस्सा सुनाकर<br />
अपने को खुश  दिखाने   की कोशिश<br />
इसलिए बेहतर है<br />
खामोशी से देखते जाएँ<br />
अपना दर्द सहते जाएँ<br />
कोई नहीं किसी का हमदर्द<br />
सभी यहाँ मतलब के यार हैं </strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p>अन्य ब्लाग<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आंखों से परे का आकर्षण-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/11/16/aakhon-se-pare-ka-akrshan-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 16 Nov 2008 15:01:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/11/16/aakhon-se-pare-ka-akrshan-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[पता नहीं कब कैसे इस देश में यह परंपरा शुरू हुई कि बाहर से जब तक आदमी प्रमाण पत्र नहीं मिले उसे घर मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>पता नहीं कब कैसे इस देश में यह परंपरा शुरू हुई कि बाहर से जब तक आदमी प्रमाण पत्र नहीं मिले उसे घर में भी सम्मान नहीं मिलता। यहाँ कुछ लोकोक्तियाँ  प्रचलित हैं जैसे-घर का ज्ञानी बैल सामान ,दूसरे गाँव का सिद्ध, और अपने घर में तो हर आदमी शेर होता है,आदि आदि। यह अपने देश के लोगों की मूल प्रवृतियों का परिचायक है। कितना भी अच्छा करो पर जब तक विदेश से कोई प्रमाणपत्र न मिले तब तक यहाँ किसी को सम्मानीय नहीं माना जा सकता।<br />
हालांकि लोगों  को समझाने के लिए यह भी कहा गया है कि दूर के ढोल सुहानी-यानी परे लगने वाली सभी शये आकर्षक लगती  हैं। आजकल तो कई शहरों में कचडे के रंग बिरंगे डिब्बे भी दिखते हैं। दूर से देखने पर ऐसे  दिखते हैं कि वहां कोई खानपान की दुकान होगी। पास जाने पर पता लगता है कि वह तो कचडे का डिब्बा है। बहरहाल  यह लोगों की आदत हो  गयी है कि कहीं भी जाकर अपने लिए ढोल बजवा लो तभी यहाँ आपको सम्मान मिलेगा। अपने देश के लोगों की आदत देखकर तो यही लगता है कि अगर दक्षिण  अफ्रीका में महात्मा गांधी जी अगर अंग्रेजों को खिलाफ विजय दर्ज नहीं की होती तो शायद ही इसे देश के लोग उनका लोहा मानते हुए उनके अनुयायी बनते। उनका जीवन सदैव  संघर्षमय रहा। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने संघर्ष अपनी आत्मा की आवाज पर शुरू किया था। उनकी कथनी और करनी में कभी कोई अंतर नहीं रहा पर लोगों ने उनसे कुछ और नहीं सीखा सिवाय इसके कि यहाँ लोकप्रिय होने के लिए विदेश में नाम कमाओ चाहे जिस तरह। उन्होंने अपने आन्दोलन के दौरान जो श्रम किया वह किसी के बूते  का नहीं है-खासतौर से इस सुविधाभोगी युग में तो कतई नहीं। पर हाँ उन जितना तो नहीं पर उनकी तरह नाम कमाने की ललक कई महानुभावों  में है।<br />
लोगों की मानसिकता शायद इसी तरह की है कि वह दूसरे देशों या समाजों से सम्मानित होने पर ही लोहा मानते हैं। यही  कारण है कि अधिकतर लब्ध प्रतिष्ठत लोग अपने लिए विदेश से कोई न कोई प्रमाण पत्र  जुटाते हैं। इसके अलावा जिन महानुभावों को लगता है कि यहाँ नाम करने के लिए मेहनत करने की जगह सीधे विदेश से कोई सम्मान प्राप्त कर लो और वह सफल भी होते हैं। वैसे तो पहले विदेशी यहाँ सौ फीसदी विश्वसनीय माने जाते थे पर जब से फिक्सिंग वगैरह की बात चली है तो ऐसा भी लगता है कि विदेशी भी जरूर अपने लोगों को यहाँ प्रतिष्ठत करने के लिए कोई पुरस्कार दे सकते हैं। कुछ लोग अब जाकर ऐसे संशय उठाते हैं कि क्योंकि कुछ प्रतिभाशाली लोगों का यहाँ नाम इसलिए हुआ है कि वह विदेश से सम्मानित हैं। इनमें कुछ लेखक और चित्रकार हैं जो पहले विदेश में सम्मानित हुए तब यहाँ ऐसे चर्चित हुए कि प्रचार माध्यम उनकी बातें प्रकाशित ऐसे करते हैं जैसे कि वह ब्रह्म वाक्य हो।<br />
अमेरिका की अनेक पत्रिकाएँ अपने यहाँ विश्व के प्रभावशाली,सैक्सी,धनी, विद्वान तथा अन्य अनेक तरह की सूचियां छपते हैं जिसमें स्त्री पुरुष दोनों के नाम होते हैं। इसमें अगर किसी भारतीय का नाम होता है तो अपने प्रचार मध्य उछाले लगते हैं। दूसरे से लेकर दसवें तक हो तो भी उछालते हैं और पहले पर हो तो कहना ही क्या? लगता है कि भारत की वजह से उन्होंने तमाम तरह की श्रेणियां भी बना दीं हैं। किसी की आँखें सेक्सी तो किसी की टांगें तो किसी की आवाज को सेक्सी घोषित कर देते हैं। अनेक लोग समाज सेवा और अपने प्रभाव की कारण भी चर्चित होते हैं।<br />
इनमें जो नाम होते हैं उनमें कई लोगों का नाम चचित भी नहीं होता क्योंकि  जन सामान्य  उनका  कोई सीधे सरोकार नहीं होता पर जो उनके &#8216;प्रभाव क्षेत्र&#8217; में होते हैं वह आम आदमी का ही नही बल्कि समाज और देश का भविष्य तय करते हैं। कई लोगों को गलतफ़हमी होती है कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशो के राज प्रमुख दुनिया से सबसे ताक़तवर और प्रभावशाली लोग हैं उन्हें ऎसी रिपोर्ट बडे ध्यान से पढ़ना चाहिए। आखिर वह अपने राष्ट्र प्रमुखों को प्रभावशाली क्यों नहीं मानते जबकि विश्व में उनको सबसे ताक़तवर माना जाता है। आजकल भारत पर उनको अधिक ही मेहरबानी हैं और यहाँ के अभिनेता और अभिनेत्रियों के नाम भी इन आलीशानों की सूची में शामिल करते हैं।  </p>
<p>हमारे देश में अगर आप किसी व्यक्ति से प्रभावशाली लोगों के बारे में सवाल करेंगे तो वह अपने विचार के अनुसार अलग-अलग तरह के प्रभाव के रुप बताएंगे। हाँ यहाँ उन लोगों को जरूर प्रभावशाली  माना जाता है जो घरेलू हितों के लिए सार्वजनिक काम में पहुँच बनाकर करा लाते हैं। आम आदमी की दृष्टि में प्रभाव का सीधा अर्थ है &#8216;पहुंच&#8217;।  लोगों के निजी  और  सार्वजानिक  कामों में कठिनाई और लंबी प्रक्रिया के चलते इस देश में उसी व्यक्ति को प्रभावशाली माना जाता रहा है जो अपनी पहुँच का उपयोग कर उसे करा ले आये।  इस कारण   दलाल टाईप के लोग भी &#8216;प्रभावशाली &#8216; जैसी छबि बना लेते हैं। अब जैसे-जैसे निजीकरण बढ़ रहा है वैसे ही उन लोगों की भी पूछ परख बढ़ रही है जो धनाढ्य लोगों के मूंह  लगे हैं, क्योंकि वह भी अपने यहाँ लोगों को नौकरी पर लगवाने और निकलवाने की ताक़त रखने लगे हैं। हर जगह तथाकथित रुप से प्रभावशाली लोगों का जमावड़ा है और तय बात है कि वहाँ चाटुकारिता भी है। इसके बावजूद उनको सम्मानीय नहीं माना जाता क्यों कि इसके लिए उनके पास विदेश से प्रमाण पत्र के रूप में कोई सम्मान नहीं होता। </p>
<p>प्रभावशीलता  और चाटुकारिता का चोली दामन का साथ है। सही मायने में वही व्यक्ति प्रभावशाली है जिसे आसपास चाटुकारों का जमावड़ा है-क्योंकि यही लोगों वह काम करके लाते हैं जो प्रभावी व्यक्ति स्वयं नहीं कर सकता है। वैसे भी हमारे देश में बचपन से ही अपने छोटे और बड़े  होने का अहसास इस तरह भर दिया जाता है कि आदमी उम्र भर इसके साथ जीता है और इसी कारण तो कई लोग इसलिये प्रभावशाली बन जाते हैं क्योंकि वह लोगों के ऐसे छोटे-मोटे कुछ  पैसे लेकर करवा देते हैं जो वह स्वयं ही करा सकते हैं-जिसे दलाल या एजेंट काम भी कहा जाता है और लोग उनका इसलिये भी डरकर सम्मान करते हैं कि पता नहीं कब इस आदमी में काम पड़ जाये।  मजे की बात यह है कि घर का आदमी ही बाहर का मुश्किल काम कराकर लाये तो उसे &#8220;पहुँच&#8221; वाला नहीं माना जाता जब तक बाहर सम्मानित न हो जाए।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
 लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p>
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<title><![CDATA[फ्री में विलेन बनाया-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/10/09/free-men-khalnayak-banaya-hindi-poem-and-shyari/</link>
<pubDate>Thu, 09 Oct 2008 16:03:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/10/09/free-men-khalnayak-banaya-hindi-poem-and-shyari/</guid>
<description><![CDATA[उदास होकर फंदेबाज घर आया और बोला ‘दीपक बापू, बहुत मुश्किल हो गयी है तुम्हारे भतीजे ने मेरे भानजे को ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong><br />
उदास होकर फंदेबाज घर आया<br />
और बोला<br />
‘दीपक बापू, बहुत मुश्किल हो गयी है<br />
तुम्हारे भतीजे ने मेरे भानजे को<br />
दी गालियां और घूंसा जमाया<br />
वह बिचारा तुम्हारी और मेरी दोस्ती का<br />
लिहाज कर पिटकर घर आया<br />
दुःखी था बहुत तब एक लड़की ने<br />
उसे अपनी कार से बिठाकर अपने घर पहुंचाया<br />
तुम अपने भतीजे को कभी समझा देना<br />
आइंदा ऐसा नहीं करे<br />
फिर मुझे यह न कहना कि<br />
पहले कुछ न बताया’</p>
<p>सुनकर क्रोध में उठ खड़े हुए<br />
और कंप्यूटर बंद कर<br />
अपनी टोपी को पहनने के लिये लहराया<br />
फिर बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘कभी क्या अभी जाते हैं<br />
अपने भाई के घर<br />
सुनाते हैं भतीजे को दस बीस गालियां<br />
भले ही लोग बजायें मुफ्त में तालियां<br />
उसने बिना लिये दिये कैसे तुम्हारे भानजे को दी<br />
गालियां और घूंसा बरसाया<br />
बदल में उसने क्या पाया<br />
वह तो रोज देखता है रीयल्टी शो<br />
कैसे गालियां और घूंसे खाने और<br />
लगाने के लिये लेते हैं रकम<br />
पब्लिक की मिल जाती है गालियां और<br />
घूसे खाने से सिम्पथी<br />
इसलिये पिटने को तैयार होते हैं<br />
छोटे पर्दे के कई महारथी<br />
तुम्हारा भानजा भी भला क्या कम चालाक है<br />
बरसों पढ़ाया है उसे<br />
सीदा क्या वह खाक है<br />
लड़की उसे अपनी कार में बैठाकर लाई<br />
जरूर उसने सलीके से शुरू की होगी लड़ाई<br />
सीदा तो मेरा भतीजा है<br />
जो मुफ्त में लड़की की नजरों में<br />
अपनी इमेज विलेन की बनाई<br />
तुम्हारे भानजे के प्यार की राह<br />
एकदम करीने से सजाई<br />
उस आवारा का हिला तो लग गया<br />
हमारे भतीजा तो अब शहर भर की<br />
लड़कियों के लिये विलेन हो गया<br />
दे रहे हो ताना जबकि<br />
लानी थी साथ मिठाई<br />
जमाना बदल गया है सारा<br />
पीटने वाले की नहीं पिटने वाले पर मरता है<br />
गालियां और घूंसा खाने के लिये आदमी<br />
दोस्त को ही दुश्मन बनने के लिये राजी करता है<br />
यह तो तुम्हारे खानदान ने<br />
हमारे खानदान पर एक तरह से विजय पाई<br />
हमारे भतीजे ने मुफ्त में स्वयं को खलनायक बनाया</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्द प्रकाश-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[हर जगह बैठा है सिद्ध की खाल में गिद्द-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/10/02/sab-jagah-sidd-kee-aad-men-gidd-hindi-poem/</link>
<pubDate>Thu, 02 Oct 2008 16:03:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/10/02/sab-jagah-sidd-kee-aad-men-gidd-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[हर जगह सर्वशक्तिमान के दरबार में बैठा कोई एक सिद्ध आरजू लिए कोई वहां उसे देखता है जैसे शिकार देखता ग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><div align="center"><strong>हर जगह सर्वशक्तिमान के दरबार में<br />
बैठा कोई एक सिद्ध</p>
<p>आरजू लिए कोई वहां<br />
उसे देखता है जैसे शिकार देखता गिद्द<br />
लगाते हैं नारा<br />
&#8220;आओ शरण में दरबार के<br />
अपने दु:ख दर्द से मुक्ति पाओ<br />
कुछ चढ़ावा चढ़ाओ<br />
मत्था न टेको भले ही सर्वशक्तिमान के आगे<br />
पर सिद्धों के गुणगान करते जाओ<br />
जो हैं सबके भला करने के लिए प्रसिद्ध</p>
<p>इस किनारे से उस किनारे तक<br />
सिद्धो के दरबार में लगते हैं मेले<br />
भीड़ लगती है लोगों की<br />
पर फिर भी अपना दर्द लिए होते सब अकेले<br />
कदम कदम पर बिकती है भलाई<br />
कहीं सिद्ध चाट जाते मलाई<br />
तो कहीं बटोरते माल उनके चेले<br />
फिर भी ख़त्म नहीं होते जमाने से दर्द के रेले<br />
नाम तो रखे हैं फरिश्तों के नाम पर<br />
फकीरी ओढे बैठे हैं गिद्द<br />
उनके आगे मत्था टेकने से<br />
अगर होता जमाने का दर्द दूर<br />
तो क्यों लगते वहां मेले<br />
ओ! अपने लिए चमत्कार ढूँढने वालों<br />
अपने अन्दर झाँक कर<br />
दिल में बसा लो सर्वशक्तिमान को<br />
बन जाओ अपने लिए खुद ही सिद्ध </strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
</div>
<blockquote><p align="center"><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</blockquote>
<div align="center"></div>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शेर ने कहा-‘हमें मारकर सनसनी फैलायेंगे’-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/22/sansani-par-hasya-kavita-and-shayri/</link>
<pubDate>Fri, 22 Aug 2008 15:34:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/22/sansani-par-hasya-kavita-and-shayri/</guid>
<description><![CDATA[शेरनी ने शेर से कहा ‘सुना है तू नरभक्षी हो गया है शर्म नहीं तुझे ऐसा करने में अब लोग झूंड बनाकर ढूंढ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>शेरनी ने शेर से कहा<br />
‘सुना है तू नरभक्षी हो गया है<br />
शर्म नहीं तुझे ऐसा करने में<br />
अब लोग झूंड बनाकर ढूंढ रहे है<br />
हथियार लेकर<br />
तुझे डर नहीं लगता मरने में<br />
अगर तू इंसान के हाथ से नहीं मरा<br />
तो भी उसका मांस खाकर<br />
बहुत बड़े पाप का भागी हो जायेगा<br />
उसके जहर से जल्दी मर जायेगा<br />
कई जन्म तक चूहे और बकरी<br />
जैसी पिटने वाली यौनियों में<br />
जन्म पायेगा<br />
इससे बहुत समय लगेगा तुझे उबरने में’</p>
<p>शेर ने कहा<br />
‘यह मुझे हमारे खानदान को मिटाने के लिये<br />
इंसानों का रचा गया प्रोपेगंडा<br />
जंगल के सभी  जानवरों को नष्ट करना<br />
उनका खास एजेंडा है<br />
इस समय टीवी चैनलों पर कोई<br />
खास प्रोग्राम नहीं है<br />
खबर बनाना है,ढूंढने का काम नहीं है<br />
निगाहें कहीं<br />
 निशाना और कहीं है<br />
पहले खलनायक बनाते हैं<br />
फिर नायक बताते है<br />
पर हम इंसान नहीं है<br />
जो उनकी भाषा बोल पायेंगे<br />
पहले वह हमें नरभक्षी बताकर<br />
सभी की सहानुभूति जुटायेंगे<br />
फिर आकर हमें मार जायेंगे<br />
खबर सुनाकर  सनसनी फैलायेंगे<br />
इसलिये यह जगह छोड़ कर चलते हैं अन्यत्र<br />
यहां का पानी की बूंदें पीने का<br />
अपना हो गया कोटा पूरा<br />
चलते है दूर यहां से<br />
पानी पियेंगे अब दूसरे झरने में</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">&#8216;दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले अपने दिल का ख्याल करने वाला होना चाहिए-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/19/pahle-apne-dil-ka-khya/</link>
<pubDate>Tue, 19 Aug 2008 15:44:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/19/pahle-apne-dil-ka-khya/</guid>
<description><![CDATA[यूं तो बिखरा पड़ा है चारों ओर कुदरत का खजाना बटोरने वाला चाहिए बेजान चीजों पर दिल लगाने को सब हो जात]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>यूं तो बिखरा पड़ा है चारों ओर<br />
कुदरत का खजाना<br />
बटोरने वाला चाहिए<br />
बेजान चीजों पर दिल लगाने<br />
को सब हो जाते हैं तैयार<br />
जानदार की परवाह<br />
करने वाले होना चाहिए<br />
इस जहां में दूसरों की कदर कौन करेगा<br />
पहले अपने दिल का ख्याल करने वाला<br />
दिमाग से सोचने वाला इंसान चाहिए<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<p>किसी के पास ज्ञान का<br />
किसी के पास विज्ञान का<br />
किसी की पास शिक्षा का है ठेका<br />
किसी ने लिया है<br />
इंडियन आइडियल बनाने का<br />
किसी के पास है विश्व चैंपियन<br />
बनाने का ठेका<br />
पालक अपने बालकों को<br />
उनसे पास भेजकर सोचते हैं<br />
सब काम अपने आप हो जायेंगे<br />
अब वह सिरमौर ही बनकर घर  आएंगे</p>
<p>जो सफल हो  जाते हैं वह<br />
गाते  हैं ठेकेदारों की महिमा<br />
जो असफल हौं वह अपनी<br />
किस्मत को दोष देकर रह जाते हैं<br />
हर तरह की गारंटी वाला<br />
सब जगह चल रहा है ठेका</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">&#8216;दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी जुबान से स्वयं को आजाद बताते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/08/hasya-hindi-poem/</link>
<pubDate>Fri, 08 Aug 2008 15:33:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/08/hasya-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[फंदेबाज लाया अखबार और बोला ‘बापू हम लोग बेकार में अपनी व्यवस्था का मजाक उड़ाते बिचारे अंग्रेज भी ऐसी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>फंदेबाज लाया अखबार और बोला<br />
‘बापू हम लोग बेकार में अपनी<br />
व्यवस्था का मजाक उड़ाते<br />
बिचारे अंग्रेज भी ऐसी ही<br />
व्यवस्था में अपनी सांस फंसी पाते<br />
देखो अखबार में लिखा<br />
वहां भी दफ्तरों में कागज पर<br />
अधिक होता काम<br />
जमीन पर लगता है जाम<br />
फाईलों अधिक चलती हैं<br />
व्यवस्था में लगे लोगों के कारण<br />
वहां भी जनता अपने हाथ मलती है<br />
तसल्ली हो गयी है<br />
जो दर्द हमें दे गये यहां पर अंग्रेज<br />
उसके अहसास में खुद भी जले जाते’</p>
<p>सुनकर पहले गुस्से में उसे देखा<br />
और फिर मुस्कराते हुए बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘फिर काहे आजादी का जश्न मनाते<br />
जब उनके पदचिन्हों पर ही चल कर खुश हो जाते<br />
यह आजादी कितना भ्रम है<br />
यह तुम्हें अब आया ज्ञान<br />
ज्ञानियों ने तो पहले ही लिया था मान<br />
अंग्रेज जाते जाते अपनी शिक्षा और संस्कृति<br />
यहां अपने अग्रजों को सौंप गये थे<br />
आजादी के नाम गुलामी का छुरा घौंप गये थे<br />
पूर्वजों की तरह जो चला रहे हैं व्यवस्था<br />
नहीं हैं उनके व्यवस्थापक होने की अवस्था<br />
कदम कदम पर अंग्रेजियत का बोलाबाला है<br />
हर घर में लगा अक्ल का ताला है<br />
बिना पढ़े लिखो<br />
साहब जैसा हमेशा दिखो<br />
जो लिखो कोई पढ़कर समझे नहीं<br />
समझे तो कुछ पूछने की हिमाकत करे नहीं<br />
अपने मतलब से नियम बनाओ<br />
खुद न चलो दूसरे को चलाओ<br />
अंग्रेजी पढ़कर रोटी मिलेगी<br />
इस पर चले हैं सब देश में<br />
फिर भी घूम रहे हैं बेरोजगार के वेश  में<br />
अंग्रेजों बिना किताब के नियम पर चलते हैं<br />
पर यहां चलने से पहले नियम बनते हैं<br />
कागजों में हो गयी आदमी की जिंदगी<br />
नौकर बनने के लिये कर रहे हैं<br />
बड़े बड़े लोगों की बंदगी<br />
आजादी एक नारा थी<br />
सच में मिली कहां<br />
शिखर पर बैठे पुतलों के चेहरे बदले<br />
जमीन में खड़ा आदमी तो अभी भी<br />
मुश्किलों में है वहां<br />
जिस पर है पद, पैसे और प्रतिष्ठा की शक्ति<br />
उसकी करते हैं सब गुलामों जैसी भक्ति<br />
बन गये हैं जो खास आदमी<br />
वह समझतें है जैसे गुलाम हैं सब उनके आम आदमी<br />
सच पर पहरे बहुत हैं<br />
जितना बाहर आने की करता हम छिपाते<br />
कोई हंसे नहीं इसलिये<br />
अपनी जुबान से स्वयं को आजाद बताते<br />
अंग्रेज जो अंग्रेजियत छोड़े गये<br />
उसके हम भी गुलाम है<br />
पर फिर भी आजादी की जंग कहां शुरू कर पाते<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">&#8216;दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[न्यायपति ने पूछा-‘यह ब्लागर कौन है-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/04/a-hindi-poem-4/</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 17:55:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/04/a-hindi-poem-4/</guid>
<description><![CDATA[नरक और स्वर्ग में मची थी उथल.पुथल सब कर्मचारी थे परेशान बढ़ता जा रहा था दिन-ब-दिन काम धरती पर बढते प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>नरक और स्वर्ग  में मची थी उथल.पुथल<br />
सब कर्मचारी थे परेशान<br />
बढ़ता जा रहा था दिन-ब-दिन काम<br />
धरती पर बढते पापों की वजह से<br />
बहुत अधिक लोग भोगने आ रहे थे<br />
अपने बुरे कर्मों का फल</p>
<p>आखिर सबने की न्यायपति से गुहार<br />
‘‘अब जगह बहुत कम<br />
धरती पर पुण्य नाम को नहीं बचा<br />
कौन अब स्वर्ग जाता है<br />
पूरा पडा खाली<br />
इसलिए वहां अपने लिये जगह बनवाओ<br />
खाली करा लो एक दो तल<br />
या फिर ब्लोग की तरह पापों की कुछ<br />
श्रेणियां बना दो<br />
और उनको पुण्य की श्रेणियों में रखवा दो<br />
ताकि कुछ भले लोग स्वर्ग में जाकर भोगें फल’’</p>
<p>न्यायपति ने बैठक की आहूत<br />
जिसमें पहुंचे धरती से भी<br />
नरक में जगह न मिलने की<br />
वजह से बेदखल भूत<br />
न्यायपति ने कहा<br />
पहले तो यह बताओ<br />
ब्लोगर कौनसा जीव है<br />
जिसका पहले कभी नाम सुना नहीं है<br />
नरक्.और स्वर्ग की लिस्ट मुझे जबानी याद है<br />
उसमें इसका नाम नहीं है<br />
उसका कर्म पाप है या पुण्य<br />
कहीं दंडसंहिता में उसका विधान नहीं है<br />
कैसे तय करें फल या कुफल’’<br />
धरती से आये एक भूत ने कहा<br />
‘‘महाराज मैं कई ब्लोगरों को जानता हूं<br />
दिन भर उनके ब्लोग पर विचरण करने जाता हूं<br />
कभी गुस्से में तो कभी प्रेम से<br />
पोस्ट लिखते हैं<br />
कभी प्रेम से कमेन्ट भी रखते हैं<br />
पाप और पुण्य में तो तब लिखोगे<br />
जब उनमें कामना होती<br />
वह तो निष्काम कर्म किये जा रहे हैं<br />
किसी को नहीं मिल रहा कोई फल<br />
पर श्रेणियां बना लेते हैं<br />
मैं पता करता हूं क्या<br />
कोई वह कोई पाप.पुण्य की<br />
श्रेणियां बनाने मे भी रहें है क्या सफल’’</p>
<p>न्यायपतिपति ने कहा<br />
‘‘ठीक है पता कर आओ<br />
पाप की श्रेणियों का<br />
फिर से तय करो मापदंड<br />
कुछ लोग स्वर्ग में जायें<br />
और कुछ लोग भोगें यहाँ दंड का फल<br />
जैसा तुमने सुनाया उससे तो<br />
अगर ब्लोगर निष्काम कर्म करते हैं तो<br />
स्वर्ग में हीं जाकर भोगेंगे फल’’</p>
<p>वह भूत चला गया तो<br />
दूसरा भूत बोला<br />
‘‘आप किस चक्कर में पड गये महाराज<br />
वह एक ब्लोगर था<br />
मैं आधी रात को उसके ब्लोग पर<br />
विचरण कर रहा था<br />
और वह सोते हुए भी वहां<br />
अपनी देह छोड़ यह देखने आ गया<br />
कि कोई कमेन्ट तो नहीं लगा गया<br />
इतने में आयी आपकी पुकार<br />
मैं निकला तो इसकी रूह भी लिंक हो गयी<br />
अब तो यह अपना काम कर गया<br />
आपने तो उसकी श्रेणी को स्वर्ग की बना दिया<br />
यह अब वहीं जायेगा<br />
आप का कहा तो ब्लोग पर<br />
लगाई कमेन्ट की तरह है<br />
जिसे वापस आप भी नहीं ले सकते<br />
और यह डीलीट करेगा नही<br />
बिना पाप श्रेणी का कर्म किये<br />
यहां का हाल देखने में रहा सफल<br />
अब लिखेगा पोस्ट<br />
हमें बना देगा भूत से घोस्ट<br />
इसका ब्लोग हिट होकर चल देगा कल’’ </p>
<p>न्यायपति  ने हैरान होकर कहा<br />
‘‘पहले क्यों नहीं बताया<br />
तुम्हारी वजह से ही<br />
हमें चलाने में वह रहा सफल’</p>
<p>भूत ने कहा<br />
‘‘आपकी मार्गदर्शिका में<br />
सबसे निपटने की तरीके हैं<br />
पर इस नये जीव ब्लोगर के बारे में<br />
कुछ नहीं कहा<br />
हम तो उतना ही चलें<br />
जितनी भरी चाबी अपने<br />
सब जीव तो धरती पर पैदा होते हैं<br />
पर लगता है यह अन्तरिक्ष से उतरा है<br />
आप इसके लिए कोई प्रोविजन करो<br />
वरना इतने सारे ब्लोगर होते जा रहें है<br />
धरती पर<br />
कि स्वर्ग का भी भर जायेगा हर तल’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p><strong>href=&#8221;http://deepak.raj.wordpress.com&#8221;&#62;‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[दूसरे की लड़की के भागने की फिक्र-लघुकथा ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/23/a-short-stor/</link>
<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 17:05:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/23/a-short-stor/</guid>
<description><![CDATA[‘अरी, सुनती हो 13 नंबर वालों की लड़की भाग गयी’ ‘किसके साथ’’ ‘अरे, भागी किसके साथ होगी? तुम्हारे अंदर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>‘अरी, सुनती हो 13 नंबर वालों की लड़की भाग गयी’<br />
‘किसके साथ’’<br />
‘अरे, भागी किसके साथ होगी? तुम्हारे अंदर इतनी अक्ल भी नहीं है। किसी लड़के के साथ भाग गयी। बहुत बनती थी न! मेरी लड़की कंप्यूटर सीख रही है। चित्रकारी सीख रही हैं। सब दिखावा था। अब तो उसका मूंह उतरा हुआ है।’<br />
‘अरे, सब दिखावे की बात है। मन ही मन खुश हो रही होगी कि बिना दहेज के लड़की से पीछा छूटा।’<br />
‘लड़की को बहुत छूट दे रखी थी!’<br />
मोहल्ले की औरतें इसी तरह की बातें कर रही थी। 13 नंबर वाली को कुछ पता ही नहीं। वह अपने काम में लगी रही । दो दिन तक वह बाहर नहीं निकली। अब तो कालोनी की उस लाईन के लोगों का सब्र टूट गया था। आखिर तीस नंबर वाली ताई ने सबका प्रतिनिधत्व करने का निर्णय करते हुए उसके पास जाने का निर्णय किया। बड़ी उमर के कारण उनको अपने मान-सम्मान पर किसी खतरे की आशंका नहीं थी।</p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a> की मूल रचना है। इसके कहीं अन्य प्रकाशन की अनुमति नहीं है। कहीं अन्यत्र प्रकाशन होने की सूचना इस <a href="http://dpkraj.wordpress.com"><strong>पते</strong></a> पर दें।<br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">दीपक भारतदीप, लेखक एवं संपादक</a> </strong></p></blockquote>
<p>वह 13 नंबर वाली के पास पहुंची। वह घर का काम कर थकी होने के कारण सो रही थी। 30 नंबर वाली ताई ने उससे कहा-‘बड़ी बुरा किया तुम्हारी लड़की ने। इस तरह माता पिता का अपमान कर घर से नहीं भागना चाहिये था। अरे, तुम क्या उसकी शादी में दहेज देने की हैसियत नहीं रखते क्या? उसने अपने जन्म देने वाले माता पिता की इज्जत का ख्याल नहीं किया।<br />
13 नंबर वाली ने पूछा-‘मेरी लड़की भाग गयी? कब? किसके साथ?<br />
30 नंबर वाली ने कहा-‘अब छिपाने से क्या फायदा? सबको पता चल गया है। पूरे शहर में हवा फैली है। उस दिन रात को 11 बजे तुम्हारी लड़की घर से अकेली सामान लेकर जाते हमने देखी है। भला कोई जवान लड़की अटैची लेकर रात को जाती है दौड़ती हुई घर से जाती है क्या? तुम भी घर से शर्म के मारे दो दिन से बाहर नहीं निकली।<br />
13 नंबर वाली बोली-अच्छा! अब मैं समझी। उस दिन मेरा भाई रात को दस बजे आया था। वह केवल एक घंटे के लिये इस शहर में आया और मेरी लड़की को साथ ले जाने के लिये यहां रुका था। 12 बजे की उसकी ट्रेन थी। इधर भानजी तैयार हो रही थी वह बाहर आटो कराने के लिये सामान सहित निकल गया। वहां उसने मोबाइन कर अपनी भानजी को कहा  कि आटो दूर सड़क पर खड़ा है जल्दी आओ। इसलिये वह सामान लेकर दौड़ती हुई गयी। लड़की ननिहाल में लड़का ताऊ के पास गया हुआ हैं घर में अकेली सारा काम कर रही हूं । पहले दोनों थोड़ हाथ बंटाते थे पर अब अकेले होने के कारण दो दिन से बाहर नहीं निकल रही और अब तो निकलूंगी भी नहीं। बच्चों के जाने पर अकेले में उदासी नहीं आयेगी तो क्या जश्न मनाऊंगी?</p>
<p>30 नंबर वाली ताई का चेहरा उतर गया। वह बोली-‘मुझे क्या पता? बीस नंबर वाली बुआ सबसे यही कह रही है।’<br />
13 नंबर वाली ने कहा-‘ बीस नंबर वाली के पास जाऊंगी तो वह कहेगी कि चालीस नंबर वाली चाची कह रही थी। यहां तो सब ऐसे ही हैं कि दूसरों की लड़की घर से भागे और उस पर चर्चा कर मजे लें। मैंने सबको देखा है और सबको इसलिये मना भी करती हूं कि वह समझ लें कि बच्चे सबके हैं ओर किसी में दोष देखने से अपने बच्चे में भी दोष आ सकता है। यहां तो लोग अपनी कम दूसरे की लड़की के लड़की के भागने की  फिक्र अधिक करते हैं।’<br />
30 नंबर वाली ताई अपना मूंह लेकर लौट गयी।  </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[टोपी के व्यापार का शुभारंभ-हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/12/launching-a-cap-of-trade-comic-satire/</link>
<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:25:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/12/launching-a-cap-of-trade-comic-satire/</guid>
<description><![CDATA[दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल रहे थे तो बा (गृहस्वामिनी) ने कहा-‘अभी बिजली नहीं आयी है इसलिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल रहे थे तो बा (गृहस्वामिनी) ने कहा-‘अभी बिजली नहीं आयी है इसलिये सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन करने जा रहे हो नहीं तो अभी तक कंप्यूटर पर अपनी आखें झौंक रहे थे।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘कैसी बात करती हो। लाईट चली गयी तो चली गयी। मैं तो पहले ही कंप्यूटर को पर्दा गिराने (शट डाउन) का संदेश भेज चुका था। अपने नियम का मैं पक्का हूं। सर्वशक्तिमान की कृपा है कि मैं ब्लाग लिख पा रहे हूं।<br />
बा ने कहा-‘फंदेबाज बताता रहता है कि तुम्हारे हिट होने के लिये वह कई जगह मन्नतें मांगता है। तुम्हारे फ्लाप शो से वह भी दुःखी रहता है।<br />
दीपक बापू ने कहा-‘तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गयी। न वह पढ़ने में न लिखने में। आ जाता है फालतू की बातें करने। हमने कभी अपने फ्लाप रहने की परवाह नहीं की जो वह करता है। जिनके दोस्त ऐसे ही हों वह भला हिट ब्लागर बन भी कैसे सकता है।’</p>
<p>इतने में फंदेबाज ने दरवाजे पर दस्तक दी। दीपक बापू ने कहा-‘और लो नाम शैतान का। अच्छा खासा सर्वतशक्तिमान के दरबार में जा रहा था और यह आ गया मेरा समय खराब करने। साथ में किसी को लाया भी है।’<br />
फंदेबाज उस आदमी को लेकर अंदर आया और बोला-‘दीपक बापू कहीं जा रहे थे क्या? लगता है घर में लाईट नहीं हैं वरना तुम इस तरह जाते नहीं।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘ अब तुम कोई फालतू बात तो करना नहीं क्योंकि हमारे पास समय कम ही है। बताओ कैसे आये? आज हमारा हास्य कविता लिखने का कोई विचार नहीं है।’<br />
फंदेबाज अपने साथ लाये आदमी की तरफ हाथ उठाते हुए बोला-‘ यह मेरा दोस्त टोपीबाज है। इसने कई धंधे किये पर हिट नहीं हो सका। आपको तो परवाह नहीं है कि हिट हैं कि फ्लाप पर हर आदमी फ्लाप होने का दर्द नहीं झेल सकता। इसे किसी तोते वाले ज्योतिषी ने बताया है कि टोपी के धंधे में इसे सफलता मिलेगी। इसलिये इसने झगड़ेबाज की जगह अपना नाम टोपीबाज कर लिया। यह धंधे के हिसाब से अपना नाम बदलता रहता है। यह बिचारा इतने धंधे कर चुका है कि अपना असली नाम तक भूल गया है। अब आप इसके धंधे का शुभारंभ करो। तोते वाले ज्योतिषी ने इसे बताया था कि किसी फ्लाप लेखक से ही उसका शुभारंभ करवाना। लोग उससे सहानुभूति रखते हैं इसलिये तुम्हें लाभ होगा।’</p>
<p>दीपक बापू ने उस टोपीबाज की तरफ दृष्टिपात किया और फिर अपनी टोपी पर दोनों हाथ लगाकर उसे घुमाया और हंसते हुए बोले-‘चलो! यह नेक काम तो हम कर ही देते हैं। वहां से कोई चार छहः टोपी खरीदनी है। इसकी दुकान से पहली टोपी हम खरीद लेंगे। वह भी नगद। वैसे तो हमने पिछली बार छहः टोपी बाजार से उधार खरीदी थी पर वह चुकायी नहीं। जब उस बाजार से निकलते हैं तो उस दुकान वाले रास्ते नहीं निकलते। कहीं उस दुकान वाले की नजर न पड़ जाये। अगर तुम्हारी दुकान वहीं है तो भैया हम फिर हम नहीं चलेंगे क्योंकि उस दुकानदार को देने के लिये हमारे पास पैसा नहीं है। वैसे सर्वशक्तिमान ने चाहा तो इसके यहां से टोपी खरीदी कहीं फलदायी हो गयी तो शायद कोई एकाध ब्लाग हिट हो जाये।<br />
फंदेबाज बोला-‘अरे, तुम समझे नहीं। यह किसी टोपी बेचने की दुकान नहीं खोल रहा बल्कि यह तो ‘इसकी टोपी उसके सिर’ वाली लाईन में जा रहा है। हां, शुभारंभ आपसे करना चाहता है। आप इसे सौ रुपये दीजिये आपको अंतर्जाल का हिट लेखक बना देगा। इसके लिये वह घर पर बैठ कर अंग्रेजी का मंत्र  जपेगा अब उसमें इसकी ऊर्जा तो खत्म होगी तो उसके लिये तो कुछ पैसा तो चाहिये न!<br />
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, ऐसे व्यापार करने से तो न करना अच्छा। यह तो धोखा है, हम तो कभी हिट लेखक नहीं बन सकते। कहीं ठगीबाजी में यह पकड़ लिया गया तो हम भी धर जिये जायेंगे कि इसके धंधे का शुभारंभ हमने किया था।<br />
फंदेबाज ने कहा-‘तुम्हें गलतफहमी हो गयी है कि इसे सौ रुपये देकर हिट लेखक बन जाओगे और यह कोई अंग्रेजी का मंत्र वंत्र नहीं जपने वाला। सौ रुपये नहीं यह तो करोड़ों के वारे न्यारे करने वाला है। यह तो आपसे शुरूआत है। इसलिये टोकन में सौ रुपये मांग रहा हूं।  ऐसे धंधे में कोई पकड़ा गया है आजतक। मंत्र का जाप तो यह करेगा। कुछ के काम बनेंेगे कुछ के नहीं। जिनके बनेंगे वह इसका गुण गायेंगे और जिनके नहीं बनेंगे वह कौन शिकायत लेकर जायेंगे?’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘क्या तुमने हमें बेवकूफ समझ रखा है। ठगी के धंधे का शुभारंभ भी हम करें क्योंकि एक फ्लाप लेखक हैं।’<br />
फंदेबाज ने कहा-‘तुम भी चिंता मत करो। कई जगह तुम्हारे हिट होने के  लिये मन्नतें मांगी हैं। जब हिट हो जाओगे तो तुमसे किसी और बड़े धंधे का शुभारंभ करायेंगे।’<br />
दीपक बापू ने आखें तरेर कर पूछा-‘तो क्या लूटपाट के किसी धंधे का शुभारंभ करवायेगा।’<br />
बा ने बीच में दखल दिया और बोली-‘अब दे भी दो इस बिचारे को सौ रुपये। हो सकता है इसका ध्ंाधा चल निकले। कम से कम फंदेबाज की दोस्ती का तो ख्याल करो। हो सकता है अंग्रेजी के मंत्रजाप करने से आप कंप्यूटर पर लिखते हुए हिट हो जाओ।’<br />
दीपक बापू ने सौ का नोट टोपीबाज की तरफ बढ़ा दिया तो वह हाथ जोड़ते हुए बोला-‘आपके लिये तो मैं सचमुच में अंग्रेजी में मंत्र का जाप करूंगा। आप देखना अब कैसे उसकी टोपी उसके सिर और इसकी टोपी उसके सिर पहनाने का काम शुरू करता हूं। घर घर जाकर अपने लिये ग्राहक तलाश करूंगा। कहीं न कहीं कोई समस्या तो होती है। सभी की समस्या सुनकर उनके लिये अंग्रेजी का मंत्र जपने का आश्वासन दूंगा जो अच्छी रकम देंगे उनके लिये वह जपूंगा और जो कम देंगे उनका फुरसत मे ही काम करूंगा।’<br />
बा ने कहा-‘महाराज, आप हमारे इनके लिये तो आप जरूर अंग्रेजी का मंत्र जाप  कर लेना। अगर हिट हो गये तो फिर आपकी और भी सेवा कर देंगे। आपका नाम अपने ब्लाग पर भी चापेंगे (छापेंगे)<br />
अपना काम निकलते ही फंदेबाज बोला-‘अच्छा दीपक बापू चलता हूं। आज कोई हास्य कविता का मसाला मिला नहीं। यह दुःखी जीव मिल गया। अपने धंधे के लिये किसी फ्लाप लेखक की तलाश में था। यह पुराना मित्र है मैंने सोचा तुमसे मिलकर इसका काम करा दूं।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, इतने करोड़ो के बजट वाला काम शुरू किया है और दो लड्डे भी नहीं ले आये।’<br />
फंदेबाज ने झुककर बापू के मूंह के पास अपना मूंह ले जाकर कहा-‘यह धंधा किस तरह है यह बताया था न! इसमेें लड्डू खाये जाते हैं खिलाये नहीं जाते।’<br />
वह दोनो चले गये तो बा ने दोनों हाथ उठाकर ऊपर की तरफ हाथ जोड़कर कहा-‘चलो इस दान ही समझ लो। हो सकता है उसके अंग्रेजी का मंत्र से हम पर कृपा हो जाये।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘यह दान नहीं है क्योंकि यह सुपात्र को नहीं दिया गया। दूसरा कृपा तो सर्वशक्तिमान ही करते हैं और उन्होंने कभी कमी नहीं की। हम तो उनकी कृपा से ब्लाग लिख रहे हैं उसी से हीं संतुष्ट हैं।  फ्लाप और हिट तो एक दृष्टिकोण है। कौन किसको किस दृष्टि से देखता है पता नहीं। फिर अंतर्जाल पर तो जिसका आभास भी नहीं हो सकता उसके लिये क्या किसी से याचना की जाये।’<br />
बा ने पूछा-‘पर यह मंत्र जाप की बात कर रहा था। फिर धंधे की बात कर रहा था समझ में नहीं आया।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘इसलिये तो मैंने उसे सौ रुपये दे दिये कि वह तुम्हारी समझ में आने से पहले निकल ले।  क्योंकि अगर तुम्हारे समझ में आ जाता तो तुम देने नहीं देती और बिना लिये वह जाता नहीं। समझ में आने पर तुम फंदेबाज से लड़ बैठतीं और वह पैसा लेकर भी वह अपना अपमान नहीं भूलता। फिर वह आना बंद कर देता तो यह कभी कभार हास्य कविताओं का मसाला दे जाता है उससे भी हाथ धो बैठते। यह तो सौ रुपये का मैंने दंड भुगता है।’<br />
इतने में लाइट आ गयी और बा ने कहा-‘लो आ गयी बिजली! अब बैठ जाओ। फंदेबाज ने कोई मसाला दिया हो तो लिख डालो हास्य कविता।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘अब तो जा रहे सर्वशक्तिमान के दरबार में। आज वह कोई मसाला नहीं दे गया बल्कि हमारी हास्य कविता बना गया जिसे दस को सुनायेगा। अभी तक हमने उसकी टोपी उड़ायी है आज वह उड़ायेगा।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सड़क पर बेकार चलने वालों का संरक्षण जरूरी-व्यंग्य</strong>]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/06/13/bakar-chalne-valon-ko-bachao/</link>
<pubDate>Fri, 13 Jun 2008 15:11:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/06/13/bakar-chalne-valon-ko-bachao/</guid>
<description><![CDATA[मैं बेकार हूं और आगे भी कार खरीदने की कोई संभावना नहीं है। इसलिये जिस तरह सड़को पर कारों की संख्या ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong><br />
मैं बेकार हूं और आगे भी कार खरीदने की कोई संभावना नहीं है। इसलिये जिस तरह सड़को पर कारों की संख्या बढ़ रही है मेरी चिंता भी बढ़ रही है। ऐसा कोई नहीं आता जिस दिन किसी साइकिल, मोटर साइकिल या स्कूटर सवार द्वारा कार या जीप को टक्कर मार देने पर उसके मालिक को गुस्से में दरवाजा खोलते हुए बाहर निकलकर लड़ते नहीं देखता हूं।</p>
<p>उस दिन एक गैस का सिलैंडर साफ करने वाला गरीब शख्स साइकिल पर जा रहा था तो एक जगह रेल का फाटक बंद होने के कारण रुक गया । उसी समय एक कार भी धीमी होती हुई रुक गयी। दोनों के बीच फासला बहुत कम था और पता नहीं कैसे साइकिल वाले की कैरियर से बंधा छोटा गैस सिलैंडर कार से टकरा गया। वह साइकिल से उतरा और इधर से एक सफेद चूड़ीदार पायजामा पहना  व्यक्ति नीचे उतरा और उस साइकिल वाले को पास बुलाया और उसे थप्पड़ दे मारा। उस समय मैं दूसरी तरफ था इससे पहले मै कुछ कहता फाटक खुल गया और वह गरीब अपने गाल पर हाथ रखकर मन मसोसता चला गया। </p>
<p>उस दिन मैं साइकिल पर जा रहा था। तभी एक कार मेरे पास से गुजरते हुए दाहिनी तरफ रुक गयी और मैंने संतुलित होते हुए भी अपने को बचा लिया। उसमें कार चालक और उसका साथी उतरा और अपनी गाड़ी से उतरे और ऐसे देखने लगे जैसे मैंने उनकी बेटी को छेड़ दिया हो।<br />
एक बोला‘-देखकर नहीं चलते।’</p>
<p>मैंने गुस्से में कहा-‘ तुम अचानक कैसे मुड़ जाते हो।’ </p>
<p>वह दोनों कार वाले एक दुकान की तरफ चला गये। उसी समय मेरी  जान पहचान वाले दो लोग वहां से निकले और मुझसे बोले-‘‘ठीक है, जाने दो आजकल किसी से लड़ने का समय नहीं है।’</p>
<p>मैं पसीने से नहाया हुआ था। बरसों से साइकिल पर सवार करते हुए मैंने कभी किसी को टक्कर नहीं मारी। स्वयं एक बार गिर कर अपनी पेंट फाड़ डाली थी पर उसके बाद इतना सतर्क रहता हूं कि कहीं भी थोड़ा संशय देखता हूं उतर कर चलता हूं। अब अगर इसी तरह की सतर्कता रखूं तो मुझे साइकिल ही पैदल घसीटकर अपने आपको यह विश्वास दिलाना पड़ेगा कि ‘साइकिल चलाते रहना सेहत के लिए स्वास्थ्यवद्र्धक है।’</p>
<p>उस दिन दिल्ली की घटना मैंने टीवी पर देखी थी। किसी लड़की के लड़कों ने कपड़े फाड़ डाले थे। उस समय उसकी मां भी उसके साथ थी। लड़के तो भाग गये पर उनके साथ एक लड़की वहीं घटना स्थल पर ही खड़ी रही। शायद उसने अपने दोस्तों को बचाने के लिये स्वयं को पकड़वाया था। वह बता रही थी कि यह लड़की ऐसे कार चला रही थी और वैसे चला रही थी। इसने ओवरटेक किया या टक्कर दी। हमने आवाज दी तो वह रुकी नहीं। वगैरह।वगैरह<br />
मतलब यह एक सामान्य मामला था, पर उसने उस कार चालक लड़की को भरे राह अपमानित कराया। मुझ पर इस घटना की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। वजह यह दो कार चालकों का मामला था और मैं तो बेकार हूं मेरे लिये तो दोनों एक ही जैसा संकट है।<br />
इस तरह की घटनाएं अनेक होती हैं। कल मै स्कूटर पर जा रहा था  तो मेरे आगे  एक बाइक पर सवार एक लड़की ने एक कार को टक्कर मार दी। कार  उसके दाहिने से होती हुई उसके बायें जाकर रुकने वाली थी और इसी कारण वह अपनी बाइक को नहीं रोक सकी। सो टक्कर हुई। दो धुरंधर लोग बाहर निकले। अपनी कार देखने लगे जैसे कोई चोर उनकी बालकनी में घुस आया हो। उस लड़की को देखा जो अपने चेहरे पर चुनरी को नकाव की तरह बांधे  हुए थी। लड़की बिना कुछ कहे अपने थोड़ी दूर पैट्रोल पंप पर चली गयी और वह दोनों लड़के शायद क्रोध का प्रदर्शन करना चाहते थे पर फिर रुक गये।  मैं सोच रहा था कि कोई दर्दनाक दृश्य प्रस्तुत होगा पर नहीं हुआ। मैंने अपने दिल को तसल्ली दी। </p>
<p>ऐसी घटनाएं एक नहीं अनेक हो रहीं हैं। जिनके पास कार है वह उनके दिमाग आसमान में है जैसे बाकी लोगों के लिये यह सड़क है ही नहीं। कम से कम बेकार लोगों के लिये तो सड़क पर चलना ऐसे ही जैसे गुलाम चल रहे हों। जिनके पास कार है उनमें कुछ लोगों की  मनस्थिति यह है कि‘हम अंदर कार में हैं तो बाहर  कुछ देख नहीं सकते और कार बाहर है पर वह स्वयं कुछ देख नहीं सकती। फिर हम इतनी सुंदर कार लेकर चल रहे हैं तो लोग हमें ही देखें। नहीं देखते और टक्कर मारते हैं तो इसका मतलब उपेक्षा कर रहे हैं।सो सिखाओ सबक!</p>
<p>आजकल कार एक पैमाना हो गयी है अमीरी के प्रदर्शन के लिये।  हालांकि लोग इसी कारण उच्च रक्तचाप, मधुमेह तथा राजरोगों का शिकार हो रहे हैं पर इससे क्या? जब मरेंगे तब मरेंगे पर तब तक तो अपनी कार से या तो किसी को रौंदेंगे या टक्कर मारने वाले के कपड़े फाड़ेंगे। उस दिन एक कार वाले ने मेरे एक मित्र जो स्कूटर चला रहा था उससे दो हजार रुपये झटक लिये। इधर सस्ती कारों का सिललिस शूरू होने वाला है ऐसे में मुझे चिंता हो रही है कि मुझ जैसे बेकार का क्या होगा? वैसे तो दुनियां भर के कानून बने हुए हैं पर लोगों को पता न होने  से कई कार वाले इसका लाभ उठाते हैं। किसी को गाली देना या थप्पड़ मारना कानूनन जुर्म है पर जिनके विरुद्ध यह अपराध किये जाते हैं वह निरीह होते है। ऐसे में भविष्य में बेकार लोगों के लिये सड़क पर घूमना कठिन हो जायेगा तब अपनी रक्षा के लिये लोग ऐसे कानूनों की जानकारी लेकर कार्रवाई करेंगे तभी कुछ बचाव हो पायेगा। </p>
<p>एक मुश्किल दूसरी भी है जिन लोगों के पास कार है वही अतिक्रमण कर सड़कों को छोटा किये हुए हैं। फिर दादागिरी इतनी कि जैसे उनको कार खरीदने के अलावा बाप ने सड़क भी बना कर दी है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिन्होंने शायद ही ड्राइविंग लाइसेंस लिया हो पर किसी कार वाले से लाइसेंस मांगने की हिमाकत कर भी कौन सकता है? कार चलाने के तरीके से भी ऐसा लगता है कि पहिया घुमाने की जानकारी तो कहीं से भी ली होगी पर सड़क पर चलाने का प्रशिक्षण लिया हो यह संभव नहीं लगता। मेरे विचार से तो ऐसे आधिकारिक केंद्र बनाये जाने चाहिए जहां से प्रशिक्षण प्राप्त कार चालकों को ही सड़क पर कार चलाने की अनुमति हो। केवल कार के पुर्जों की जानकारी लेकर चलाना ही काफी नहीं है। सड़क पर किस तरह चलें और लोगों से किस तरह का व्यवहार करें इसके लिये भी प्रशिक्षण होना आवश्यक है। सड़क पर बेकार चलने वालों के आत्मसम्मान की रक्षा के लिये यह आवश्यक है। </p>
<p></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जैसा कहते हैं वैसा लिख, जैसा समझाते हैं वैसा दिख -हास्य व्यंग्य ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/24/jaisa-kahte-hain-vaisaa-likh/</link>
<pubDate>Sat, 24 May 2008 17:29:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अंतर्जाल पर कुछ हिंदी ब्लाग लेखक एग्रीगेटरों पर हिट्स और टिप्पणियों के आगे कुछ सोच नहीं पाते और इनमे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अंतर्जाल पर कुछ हिंदी ब्लाग लेखक एग्रीगेटरों पर हिट्स और टिप्पणियों के आगे कुछ सोच नहीं पाते और इनमें वह लोग हैं जिनके बारे में कथित रूप से यह कहा जाता है कि वह बहुत बड़े पुरोधा हैं। दरअसल कुछ लोगों ने प्रारंभ में अपने ब्लाग बनाये तो उनको यह लगने लगा है कि उनका नाम अब इतिहास में दर्ज होना चाहिए। जब आदमी में यह भाव होता है तो वह हास्यजनक स्थिति से गुजरता है।</p>
<p>असल में एक ऐसा ब्लाग है जिसमें सब ब्लाग की चर्चा होती है। एग्रीगेटर वह जगह है जहां देश के करीब-करीब सभी ब्लाग एक जगह दिखाये जाते हैं और वहां त्वरित गति से वैसे ही पाठ प्रदर्शित होते हैं जैसे ही उसे कोई ब्लाग लेखक प्रकाशित करता है। सारे ब्लाग लेखक अपनी सुविधा के अनुसार यहां जाकर अपने ब्लाग देखते हैं और दूसरों के पढ़ते हैं। अपनी सुविधानुसार टिप्पणियां भी लिखते हैं। आम पाठक अगर इतनी त्वरित गति से किसी ब्लाग का पाठ पढ़ना चाहे तो उसके सामने दो ही मार्ग हैं या तो वह अपनी पसंद के ब्लाग को अपने यहां इस तरह कंप्यूटर पर सैट करे जिससे उसे हर समय उसे खोलने का अवसर मिले या वह इन एग्रीगेटरों-जिनकों मैं चैपाल भी कहता हूं-पर जाकर वहां देखे। कुछ लोग इन्हीं ब्लाग को लेकर चर्चा करते हैं और उसका लेखक अपने मित्रों को इससे प्रभावित करता है। </p>
<p>कुछ ब्लाग लेखकों को यहां बहुत जबरदस्त हिट और टिप्पणियां मिलतीं हैं। इनमें एक दो एग्रीगेटरों ने पसंद का भी प्रबंध किया है जहां अनेक ब्लाग लेखकों के ब्लाग चमकते है। यहीं से शुरू होता है ब्लाग लेखकों का भ्रम और  आपस में ही  विवाद। चारों चैपालों को देखा जाय तो इन पंक्तियों के लेखक के सारे ब्लाग एक तरह से फ्लाप हैं। कभी कभार किसी पाठ पर पच्चीस हिटस होते हैं पर पसंद के नाम पर जीरो। मतलब यह है कि उसके लिए भी कोई आदमी चाहिए जो वहां पसंद में शामिल कराये। इन पंक्तियों का लेखक ऐसा आग्रह कभी अपने मित्र ब्लाग लेखकों से नहीं कर सकता।  </p>
<p>सब ब्लाग की चर्चा करने के लिए किसी को फुरसत है और वह महाशय इसका संचालन करते हैं। किसी ब्लाग लेखक को ब्लाग जगत में साहित्यकारों की दुर्दशा-यानि हिट और टिप्पणियां  कम- नजर आयी और वह तमाम तरह से उन पर बरस रहा था। उसके ब्लाग पर 18 टिप्पणियां थीं और लोग उसमें पूछ रहे थे कि भाई उन साहित्यकारों के नाम भी बताओ। मतलब यह कि तुम्हारी भड़ास तो निकल गयी हमारी भी निकल जाती। उसमें मेरे मित्र भी थे और ऐसे थे जो वाकई मेहनत से लिखते हैं। यह अलग बात है कि उनमें सभी को पर्याप्त हिट और टिप्पणियां मिल जातीं है और उनको यह यकीन था कि वह उन फ्लाप साहित्यकारों में नहीं है। मुझे यह कहने में कदापि संकोच नहीं है कि हिंदी के कुछ लेखक बहुत भोले हैं वह इन चालाकियों को समझते नहीं है और शायद इसलिये अपने ही साथियों को हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा देते हैं। अगर मै कहूं कि उन अट्ठारह लोगों में सारे मित्र हैं तो मुझे अपनी यह सफाई भी देनी पड़ेगी कि आखिर उन मित्रों ने ऐसा क्यों किया? उनसे मांगना ठीक नहीं है क्योंकि यह हिट पोस्ट लिख उनको बताना चाहता हूं कि ऐसी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मत दो जिससे लिखने वाले हतोत्साहित हों।</p>
<p>ब्लाग लेखक ने तीन अन्य ब्लाग लेखकों की प्रशंसा में लिखा कि उनके पाठकों की कुल संख्या में बाकी कथित साहित्यकारों की पाठक् संख्या सिमट जाती है। इनमें तीनों ही मेरे मित्र हैं और उनके अच्छा लिखने की बात को मैं चुनौती नहीं दे सकता। मैंने तो अपने सारे हथियार ही डाल दिए हैं कि भाई इन एग्रीगेटरों पर हिट और टिप्पणियां की संख्या बढ़ा पाना मेरे बूते का नहीं है। मैं शायद यह पाठ नहीं लिखता अगर उस ब्लाग लेखक का पाठ मेरी दृष्टि में नहीं आता। मगर फुरसत में बैठे हमारे मित्र सीधा हमला करने की बजाय ऐसी टेढ़ी चालें चलते नजर आते हैं कि हम सोचते हैं कि चलो आज इनसे भी निपट लो वरना यह हिंदी ब्लाग जगत को हानि पहुंचाने से बाज नहीं आयेंगे। अपने कथित चर्चा में यह महाशय मेरे ब्लाग का पाठ जरूर दिखाते हैं।  उससे पहले अपने मित्रों को खुश करते हुए उनके नाम लिखते हैं फिर आखिर में पुंछल्ला में हमारा ब्लाग/पत्रिका भी लिंक करते है। तीन महीने पहले एक विवाद में वह भी सामने आ गये थे पर मैंने उन पर लिखी एक पोस्ट वापस ले ली। </p>
<p>साहित्यकारों की दुर्दशा पर आंसू बहाती उस पोस्ट पर उन्होंने प्रशंसा भरी नजरों से टिप्पणी की और अपनी चर्चा में सबसे पहले ब्लाग के रूप में लिंक किया जैसे वह उस दिन की सर्वश्रेष्ठ पोस्ट हो। फिर उसकी तारीफ में कसीदे पड़े। आजीवन हिंदी ब्लाग जगत के कथित सेवक फुरसत में बैठे साहब को अब यह समझाना जरूरी है कि ब्लाग जगत में बाहर से पाठक न मिलने का रोना सभी रो रहे हैं और साहित्यकारों के अलावा यह काम कोई और नहीं कर सकता। मेरे मित्र समीर लाल (उड़न तश्तरी)- जो उन तीन ब्लागरों में से है- कहते हैं कि शीर्षक लगाकर एक बार हिट मिल सकता है, पर काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। साहित्यकारों की दुर्दशा लिखकर एग्रीगेटरों पर हिट और टिप्पणियां ले ली मगर आगे उस पाठ का क्या होना है? फुरसत में बैठकर लोगों को सोचना चाहिए। मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर ब्लाग लेखकों के व्यूज केवल 10 से 12 प्रतिशत हैं। कल मेरा एक छह महीने पहले बना ब्लाग दस हजार पार करने वाला है और शायद अगले हफते उसके साथ बना ब्लाग भी पार करेगा। दो ब्लाग बीस हजार से पार कर चुके हैं और एक तीसरा इसी राह पर है। यह संख्या वर्डप्रेस के ब्लाग की है जबकि ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर मैंने मात्र छह  माह पहले-यानि ब्लाग बनाने के एक साल बाद- ही काउंटर लगाया है और वहां की कुल संख्या तीस हजार तो   दिखती है और पिछली भी माने तो पचास हजार से कम नहीं होगी। हम मोटा आंकड़ा 1 लाख बीस हजार मान  लें। </p>
<p>साहित्यकारों की रचनाएं कुछ ब्लाग लेखकों को उबाऊ लग सकतीं हैं और वह उनको पढ़ते नहीं है। पढ़ते होते तो हिट की संख्या से पता चल जाता। मैं ब्लाग देखकर ही बता देता हूं कि कौन पढ़कर लिखता है और कौन केवल हांकने के लिए लिखता है। इसका मतलब यह है कि ब्लाग लेखक ने साहित्यकारों को बिल्कुल नहीं पढ़ा और फुरसत वाले साहब ने उनका आंखें मूंदकर समर्थन कर दिया। लोगों ने वाहवाही कर दी। किसी हिट ब्लाग लेखक में इतना साहस नहीं है जो ऐसा लिख सके। मैं और मेरे ब्लाग तो फ्लाप हैं इसलिये लिख रहे हैं। क्या पता यह पाठ हिट हो जाये और कई दिन से चल रहा बनवास कुछ देर के लिए रुक जाये। क्या करेंगे? अब तो कभी ब्लाग देखकर लिंक कर लेते हैं जहां से कोई हिट आता नहीं अगली बार से  वह भी बंद। होने दो। पहले पंद्रह देखते थे अब पांच देखते हैं। यहां परवाह किसको है। अगर ब्लाग जगत के  मित्रों की परवाह है तो उनसे तो निबाह लेंगे और उनसे  तो आगे भी संपर्क रहना है और पाठकों की संख्या! अरे भाई इंतजार करो कल नहीं तो परसों बता देंगे कि दस हजार में कितने व्यूज   ब्लाग लेखकों से आये और कितने पाठकों से। ब्लाग लेखकों में भी उड़न तश्तरी की पाठों की संख्या से घटाकर यह भी देखेंगे कि उनके अलावा कितने और ब्लाग लेखकों की हैं। किसी भी ब्लाग  जगत को  एग्रेगेटरों के हिट पर इतना नहीं नाचना चाहिए  कि लगने लगे कि हिंदी ब्लाग जगत में तीर मार लिया। कोई कविता लिख रहा है या गध या पद्यनुमा-यही शब्द उस ब्लाग लेखक ने उपयोग किया था-तुम उनकी दुर्दशा पर मजाक उड़ा रहे हो और वह तुम्हारे हिट्स और टिप्पणियों पर हंसते है। वह लोग अपना पसीना बहाकर लिख रहे हैं और मै भी। मेरे पर कोई हंस ले पर अगर कोई मेरे या दूसरे के परिश्रम पर हंसता है तो मुझे ही अपनी हंसी उड़ाने का अवसर देता है और न चाहते हुए भी मेरी कलम चल पड़ती है। कभी हास्य व्यंग्य लिखने तो कभी हास्य कविता लिखने।</p>
<p>कहता है वह जैसा मैं कहता हूं वैसा लिख<br />
जैसा समझाता हूं वैसा दिख<br />
स्वयं है शब्द भंडार से खाली<br />
बन रहा है साहित्य का माली<br />
चंद शेर कभी कहे नहीं<br />
लिखता है ख्याल उधार लेकर  कहीं<br />
फिर भी मशहूर हो गया है<br />
इसलिये बेशंऊर हो गया है<br />
सिखाता है जमाने को लिखना<br />
अपने जैसा सबको दिखना<br />
आसमान में अपना नाम चमकने की चाह ने<br />
उसे बेजार बना दिया है<br />
झूठी वाहवाही ने बेकार बना दिया है<br />
लिखने के बातें तो खूब करता है<br />
पर वह पढ़ता है कि नहीं<br />
बस कहता यही है<br />
जैसा मैं कहता हूं वैसा लिख<br />
जैसा समझाता हूं वैसा दिख </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
अपने भ्रम में तुम जी लो<br />
हिट और टिप्पणियों को घोल पी लो<br />
मगर इतना न इतराओ<br />
कि फिर अपने पर ही शरमाओ<br />
हम तो फ्लाप ही ठीक है<br />
हमें यह संदेश नहीं देना कि<br />
जैसा हम कहते हैं वैसा लिख<br />
जैसा समझाते हैं वैसा दिख </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पास के विद्वान भी बैल बन जाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/21/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%88%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a4%a8-%e0%a4%9c%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 21 May 2008 16:31:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला ‘दीपक बापू मैं हीरो का ब्लाग पढ़कर आया हिंदी तो ढंग से पढ़ना नहीं आती पर उसका अं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><img class="alignright" src="//i20.tinypic.com/2rhb7g1.jpg[/IMG]" alt="" />आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू  मैं<br />
हीरो का ब्लाग पढ़कर आया<br />
हिंदी तो ढंग से पढ़ना नहीं आती<br />
पर उसका अंग्रेजी ब्लाग पर पढ़कर<br />
मैंने अपने भतीजे से टिप्पणी लिखवाई<br />
पहली बार अंतर्जाल पर  मौज मनाई<br />
सैंकड़ों लोगों के नाम लिखे थे नीचे<br />
मैंने  कर दिया सबको पीछे<br />
तुम इसलिये फ्लाप हो<br />
क्योंकि कुछ बनने से पहले ही अपना ब्लाग बनाया’</p>
<p>नाक पर चश्मा लटकाकर<br />
उसे घूरते हुए देखने लगे<br />
जैसे अभी खा जायेंगे<br />
फिर सोचकर बोले<br />
‘दोष तुम्हारा नहीं हमारा है<br />
बात करते हैं तुमसे इसलिये<br />
क्योंकि अकेला होना हमें नहीं गवारा है<br />
तुम्हारे लिये तो वही हिट है<br />
जिसको समझने में तुम्हारी बुद्धि अनफिट है<br />
दूर बैठा कितना भी ढोल है<br />
तुम्हें  सुहावना लगेगा<br />
बाहर से लगता है आकर्षक<br />
अंदर जिसमें पोल है<br />
वही तुमको फलता लगेगा<br />
दूर होते तुमसे तो<br />
कुछ हम भी तुमको ऊंचे नजर आते<br />
पास के विद्वान भी घर में बैल बन जाते<br />
जो दृश्य आंख से आगे न जाता हो<br />
जो स्वर कान से पार न पाता हो<br />
जिसका स्पर्श ही तुम्हारे लिए अंसभव<br />
वही तुमको भाता है<br />
मेरे  पास हो इसलिये तुम्हारे लिए<br />
अपना यह प्रपंच नहीं रचाया<br />
दुनियां भर में फैले गुणवान और विद्वानों से<br />
बन जायें संपर्क इसलिये यह ब्लाग बनाया<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुख अनुभूति की शक्ति भी होना चाहिए-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/16/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%8b/</link>
<pubDate>Fri, 16 May 2008 17:23:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[  सुख सभी चाहते हैं पर क्या उसकी कभी अनुभूति कोई कर पाता है? कर पाता है तो कितनी? यह प्रश्न अक्सर मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p> </p>
<p>सुख सभी चाहते हैं पर क्या उसकी कभी अनुभूति कोई कर पाता है? कर पाता है तो कितनी? यह प्रश्न अक्सर मेरे मस्तिष्क में आता है।<br />
सुबह सैर को निकले लोग आपस में बाते कर रहे हैं-‘वह मेरा किरायेदार बहुत बदमाश है। उसकी बीबी ढंग से मकान की सफाई नहीं करती।<br />
इस गर्मी में सुबह कुछ पल चलती ठंडी हवा का अहसास तक वह चारों लोग नहीं कर पा रहे। ताजी हवा  उनके अंदर जा रही है पर वह उसके आनंद की अनुभूति उनसे कोसों दूर है।</p>
<p>एक कह रहा है कि-‘‘यार, आजकल के किरायेदार होते ही ऐसे है। हम इतनी मेहनत के मकान बनवाते हैं और वह लोग थोड़ा पैसा क्या देते हैं जैसे अपने आपको मकान मालिक समझने लगते हैं’।</p>
<p>इस समय वह एक ऐसे पेड़ के पास से निकले जहां गुलाब के फूल लगे हैं।  मगर वह उसकी तरफ देख नहीं पाये। उनका मकान उनका पीछा करता हुआ चल रहा है। पक्षियों के चहचहाने की आवाज उनके कानों में जा रही है पर वह क्या उसे सुनकर उसका सुख क्या उठाते है?</p>
<p>सुबह के जो कीमती पल हैं जिसमें पूरे दिन के लिये अपने तन, मन और विचारों के लिऐ ऊर्जा ऐकत्रित की जा सकती है वह उसे गंवाते जा रहे है। सबके चेहरे बुझे हैं क्योंकि चिंताएं सुबह से ही उनके साथ हो गयी है।</p>
<p>वह पार्क में खड़ा है। मै भी खड़ा होकर सुबह की हवा का आनंद ले रहा हूं।  उससे थोड़ा परिचय है। मैं उसे देखकर मूंह फेरने का प्रयास करता हूं। मुझे वहां तालाब के किनारे शांति से घूमने की इच्छा है। वह मेरे पास आता है।</p>
<p>‘आप उधर ही रहते है’? उसने सवाल किया<br />
‘हां’-मैंने संक्षिप्त जवाब दिया।<br />
‘आप यहां घूमने रोज आते होंगे।’उसने फिर पूछा<br />
मैंने कहा-‘नहीं केवल छुट्टी के दिन आता हूं।’<br />
वह बोला-हां, अच्छा करते हैं। लोग कहते हैं कि सुबह घूमने से लाभ होता है, पर मुझे नहीं लगता। मैं रोज हवा खाने निकलता हूं पर मेरा मन नहीं लगता।’</p>
<p>मैंने कहा-‘‘मैं भी पहले रोज आता था। मुझे शांति मिलती थी। हां, अब योग साधना की वजह से देर हो जाती है और अब नहा धोकर मंदिर जाते हुए कभी कभी यहां आता हूं।’<br />
उसने उत्सुकता से पूछा-‘‘योग साधना से मन को शांति मिलती है।<br />
मैने कहा-‘नहीं! बिल्कुल नहीं।<br />
वह हैरान होकर मुझे देखने लगा। मैंने कहा-‘‘दरअसल मैं पूरे दिन शांति और अशांति और दुःख और सुख से परे हो जाता हूं। अपने काम करता रहता हूं। शांति का पता तो तब चले जब अशांति का अनुभव हो। सुख तो तब लगे जब दुःख ने छू लिया हो। मै तो तब भी विचलित नहीं होता जब बुखार मुझे घेर लेता है। मुझे पता है कि यह थोड़ी देर बाद अपने आप उतर जायेगा।</p>
<p>मै चल पड़ा। वह कहने लगा-‘आजकल गर्मी बहुत है। पानी की परेशानी है।’<br />
मैने उससे कहा-‘तुम गर्मी की चिंता इस समय मत करो। इंतजार करा,े सूर्य का ताप बढ़ने वाला है। अभी तो इस ठंडी हवा को अपने मन में आने की जगह दो।<br />
उसने पूछा-‘‘कैसे?’<br />
मैने कहा-‘कल सुबह साढ़े पांच बजे उधर पार्क में चले जाना। वहां लोग योग साधना करते हैं। वह तुम्हें सिखा देंगे। अगर तुम आना चाहो तो मैं भी कल आ जाऊंगा।’</p>
<p>उसने कहा-‘नहीं रात को हम देर से सोते हैं। हालांकि आठ बजे घर आ जाते हूं, पर आपस में बातें करते हुए रात का एक बज जाता है। सुबह सात बजे से पहले मै उठ नहीं पाता। अभी देखिये आठ बजने को हैं।’<br />
मैं उससे कहना चाहता हूं कि जब रात को इतना सुख उठा चुके हो तो फिर सुबह किस सुख की तलाश में यहां आये हो, पर नहीं कह पाता। सोचा बहस ख्वाख्वाह बढ़ जायेगी।<br />
मैं चलते चलते मंदिर की तरफ मुड़ जाता हूं। उससे और अधिक बात करना मुझे ऐसे  लगा जैसे कि वह मेरे को सुबह ही थका देगा। अपनी थकावट वह अपने साथ लेकर निकला है।</p>
<p>कभी फूलों के पास खड़े होकर खुशबू को सूंघ कर देखें। अगर वह नाक से होती हुई पूरे शरीर में घूमती अनुभव न हो, पक्षियों के चहचहाने की आवाज अगर कान से होकर मस्तिष्क के अंतिम छोर तक जाती न लगे और जब हरे-भरे पेड़ों का दृश्य अगर हृदय को प्रभावित न करता लगे तो समझ लो कि सुख तुम्हारी अनुभूति से परे है।</p>
<p>कई बार मन में आता है कि ‘मेरा अमुक काम हो जाये तो मन को शांति मिलेगी‘ या ‘मेरे को अमुक वस्तु मिल जाये तो जीवन सुखमय हो जायेगा‘। बेकार की सोच है। ऐसा होता तो इस समय धरती पर ही स्वर्ग होता। अगर तुम्हारे अंदर  सुख की अनुभूति शक्ति नहीं है तुम्हें कोई सुखी नहीं बना सकता। नाक से आगे सुंगध, आंख से आगे दृश्य और कान से आगे स्वर अगर नही बढ़ता तो इसका मतलब यह है कि आदमी में सुख अनुभव करने की शक्ति नहीं है। इन अंगों को सफाई करने की आवश्यकता है और प्राणायाम के अलावा कोई इस सुख की अनुभूति करने की शक्ति नहीं पा सकता है।</p>
<p>सुबह उठो और पद्मासन में बैठकर सांस को खींचो। अपनी दृष्टि (ध्यान) भृकुटि पर रखो और सांस धीरे-धीरे लेकर छोड़ते रहो। अनुभव करो कि तुम्हारे तन, मन और विचारों के विकास निकल रहे हैं। सुख की अनुभूति की शक्ति अर्जित करने का यही इकलौता साधन है। </p>
<p> </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मुनीम के ब्लाग कौन पढ़ता-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/15/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9/</link>
<pubDate>Thu, 15 May 2008 15:06:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/15/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9/</guid>
<description><![CDATA[(यह इस ब्लाग की 300 वीं पोस्ट है) आया फंदेबाज और बोला ‘दीपक बापू,  तुम्हें देखकर फ्लाप मेरा  कलेजा फ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><h2>(यह इस ब्लाग की 300 वीं पोस्ट है)</h2>
<h3 style="padding-left:30px;">
आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापू, <br />
तुम्हें देखकर फ्लाप मेरा  कलेजा फटता<br />
सोचता हूं  तो पढ़ना पसंद नहीं करता<br />
पर तुम्हें अन्य कोई क्यों नहीं पढ़ता<br />
हमारे भतीजे ने मांगा है<br />
फिल्मी अभिनेताओं के ब्लाग का पता<br />
किसी तरह पता कर हमें बता दो<br />
वह कुछ पढ़ना और सीखना चाहता है<br />
बहुत कहते हैं पर तुम्हारा लिख नहीं पढ़ता</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">सुनकर पहले टोपी उतारी<br />
और फिर सिर पर हाथ घुमाया<br />
और टोपी को सिर पर चढ़ाते हुए<br />
कहें दीपक बापू<br />
‘हमारे फ्लाप होने पर<br />
तुम क्यों शर्माते हो<br />
फिर अभिनेताओं  के ब्लाग का पता  पूछकर<br />
हमारे दिमाग को गरमाते हो<br />
इतने दिन हो गये हमारे पास बैठते<br />
यह  भी नहीं जान पाये कि<br />
अभिनेता के नाम या प्यारे नाम से ढूंढो<br />
सब सामने आ जायेगा<br />
सच भी यही है<br />
सब सीख रहे हैं अभिनेता और अभिनेत्रियों से<br />
तुम्हारा भतीजा भी सीख ले तो<br />
उससे हम पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता<br />
जो जमीन पर चमक रहे हैं<br />
अभिनेता, अभिनेत्री, संपादक और धनपति<br />
सितारे बनकर<br />
अंतर्जाल पर भी छायेंगे<br />
हमें चलाता है ब्लाग<br />
वह ब्लाग को चलायेंगे<br />
फिर भी सदैव जो शब्द बने रहें चमकदार<br />
हमारे ब्लाग पर आयेंगे<br />
हम मिट जायें पर वह चमक नहीं गंवायेंगे<br />
इसलिये हम भी लिख रहे है<br />
यह तो हम भी जानते हैं कि<br />
बड़े नाम वालों को ढूंढते हैं सभी<br />
हम जैसे मुनीम का ब्लाग कौन पढ़ता<br />
लिखते हैं इसलिये हम<br />
शब्दों की पालिश से<br />
दूर हो जाये मस्तिष्क से<br />
दो और दो चार से उपजी जड़ता<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</h3>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फिर कभी मोबाइल नहीं होगा खराब-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/14/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b2-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%96/</link>
<pubDate>Wed, 14 May 2008 15:12:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[सारा दिन कान से मोबाइल चिपका कर प्रेम की बातें करने वाले प्रेमी के कान हो गये  खराब कभी आवाज आती तो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><h3>सारा दिन कान से मोबाइल चिपका कर<br />
प्रेम की बातें करने वाले<br />
प्रेमी के कान हो गये  खराब<br />
कभी आवाज आती<br />
तो कभी बाहर ही रह जाती<br />
प्रेमिका  के कई<br />
सवालों के नहीं दे पाता जवाब</h3>
<h3>अपनी परेशानी को लेकर गया डाक्टर के पास<br />
अपनी बीमारी के इलाज की लेकर आस<br />
डाक्टर ने चेक करने के बाद<br />
दवा का पर्चा उसके हाथ में<br />
देकर कहा<br />
‘यह दवा खाते रहना<br />
जब तक ठीक न हो मोबाइल से दूर रहना<br />
नहीं तो उम्र भर<br />
कान की मशीने सहारे ही सुनोगे जनाब’</h3>
<h3>
प्रेम का दीवाना<br />
मोबाइल और पर्चा लेकर निकला<br />
पहुंचा मोबाइल की दुकान पर<br />
और मालिक को पर्चा थमाते बोला<br />
‘मोबाइल के लिये डाक्टर ने दवा लिख दी है<br />
वह जरा जल्दी इसमें डाल दो<br />
ताकि मैं अपने कानों से सुन सकूं<br />
और दे सकूं अपनी प्रेमिका के सवालों का जवाब’</h3>
<h3>दुकानदार ने कुछ सोचा<br />
फिर की जाकर अंदर फोन पर बात<br />
और बाहर आकर कहा<br />
’अभी नहीं है स्टाक में<br />
मंगवायी है गोदाम से<br />
अभी आती होगी जनाब’</h3>
<h3>
थोड़ी देर बाद मानसिक चिकित्सालय से<br />
आयी गाड़ी में से कुछ लोग<br />
उतरे और पकड़ कर उसे ले जाने लगे<br />
तो करने लगा विरोध तो<br />
दुकानदार ने समझाया<br />
‘आपका मोबाइल है बहुत खराब<br />
उसके लिये आपकी दवा और इलाज जरूरी है<br />
तभी वह सुधर पायेगा<br />
गलत डाक्टर से गलत पर्चा लिखवाया<br />
उसको भी तुम्हारा रोग समझ में नही आया<br />
अब सही जगह जा रहे हो<br />
जहां तुम्हारे इलाज से मोबाइल<br />
हमेशा के लिए ठीक हो जायेगा<br />
फिर कभी नहीं होगा खराब’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</h3>
<h3></h3>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अच्छा हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/04/%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 10:08:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[श्रीमतीजी ने रात को पूछा-‘‘क्या खाना खाओगे?’’ हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>श्रीमतीजी ने रात को पूछा-‘‘क्या खाना खाओगे?’’<br />
हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले आओ तो उसके साथ एक छोटा टोस्ट खाकर सो जायेंगे। वैसे तुमने यह पूछा क्यों?’<br />
कहने लगीं-‘तुम अभी कुछ खाने पर लिख रहे थे। मैने देखा तो सोचा कि शायद तुम्हें भूख लग जाये। जब रात को खाना नहीं खाते तो उस पर लिखते क्यों हो?’<br />
मैने कहा-‘अपने लिये तो लिखते नहीं है जो यह सोचें। पढ़ने वाले तो रात को खाते होंगे न! फिर कितनी गंभीर बात है कि अपने देश के लोगों पर अधिक खाने का आरोप लग रहा है तो यह समझाना जरूरी है कि ऐसी कोई बात नहीं है।’<br />
हमारी श्रीमती जी बोली-‘‘लगाने वाला भी तुम जैसा कोई आदमी रहा होगा। सारी दुनियां से कहते हो कि एक समय खाना खाता हूं पर तुम रात को घर आते ही चाय के साथ  दो से चार बिस्कुट  खाते हो और रात को दूध के कप के साथ एक दो टोस्ट उदरस्थ कर जाते हो। यह खाना नहीं तो और क्या है? और लोगों से कहते हो कि एक समय खाता हूं।’</p>
<p>हमने कहा-‘‘तो क्या लोगों का बताता फिरूं कि मैं यह खाता हूं और वह खाता हूं। यह तो तय बात है कि रात को हमारे घर पर खाना नहीं बनता।’’</p>
<p>हमारी श्रीमती जी चुप हो गयीं। सुबह ही एक सज्जन आये और बोले-‘‘देखो यार, अपने देश के  बाहर के लोग क्या कह रहे हैं  भारत के लोग अधिक खाते हैं इसलिये दुनियां में खाद्यान्न का संकट है। अब बताओ, इस देश के लोग गरीब थे तो झंडे और डंडे लेकर इस देश पर विचाराधाराओं के साथ हमला करते थे। सरकारीकरण खत्म करो उदारीकरण चलो। अब कह रहे हैं कि अधिक खाते हैं। अब क्या रोटी भी पेट भरकर  नहीं खायें?’</p>
<p>हमने कहा-‘‘भरपेट तो खाना नहीं चाहिए। जरूरत से एक रोटी कम खाना चाहिए।<br />
वह सज्जन बोले-‘‘यार तुम जैसा तो कोई हो नहीं सकता कि एक समय खाना खाये।’<br />
हमने कहा-‘‘हम आजकल शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं इसलिये कम खाते हैं।<br />
हमारी श्रीमती उनसे परिचित थीं और उनसे बोलीं-‘‘कहां एक समय खाते हैं? रात को आते ही चाय के साथ बिस्किट और रात को दूध के कप के साथ टोस्ट जरूर खाते हैं। वह क्या खाने से कम है?’</p>
<p>हमने सोचा झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है और हमने कहा-‘हम कम कहते हैं कि नहीं लेते?’<br />
वह सज्जन बोले-‘यह तो हम भी करते है पर फिर भी खाना खाते हैं। खाने के बाद दूध का ग्लास जरूर लेते हैं। हा, उसके साथ टोस्ट वगैरह नहीं लेते। भाभीजी, आप क्या समझ रही हो कि केवल आप लोग ही दूध पीते हैं। खाने के बाद हम दूध न पियें तो नींद ही नहीं आये।’<br />
हमने कहा-‘पर आप खाने को लेकर इतने परेशान क्यों हो रहे हैं? आपके लड़के की शादी में आयेंगे तो जरूर हम भी जमकर खायेंगे जैसे दूसरे। ऐसी कोई कसम नहीं खा रखी कि रात को कभी नहीं खायेंगे। हां, जबसे योग साधना शूरू की है तब से रात को खाने की चिंता से मुक्त हो गये हैं पर आपको कभी यह नहीं कहेंगे कि रात का भोजन लेना छोड़ दें। कहने वाला कुछ भी कहता रहे।’</p>
<p>वह बोले-‘मुद्दे की बात यह है कि क्या वाकई हम बहुत खाते हैं?’<br />
हमने कहा-‘‘अधिक मत सोचो? पहले ही तुम मधुमेह की शिकायत करते हो  और उसमें फायदा उन कंपनियों का ही होगा जो बाहर की हैं क्योंकि उनकी गोलियों से ही तुम खाना पचा पाते हो। हो सकता है कि योग साधना के प्रचार से  अब स्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही हो और उन पर ‘अधिक खाने’ के शगूफे से तनाव बढ़ाकर फिर उनको बीमार बनाया जाये यही इसके पीछे यही चाल हो सकती है।<br />
वह सज्जन बोले-‘‘पर तुमने यह अभी तक नहीं बताया कि क्या हम भारतीय अधिक खाते हैं?’<br />
हमने कहा-‘‘इस देश में एक सौ पांच करोड़ लोग रहते हैं। कहीं लोग गेंहूं अधिक खाते हैं तो कही चावल तो कहीं कुछ और। किसी के पास कोई पैमाना नहीं है। घर में चार एक आयु वर्ग के चार सदस्य होते हैं पर उनके खाने की मात्रा अलग-अलग होती है। अब कैसे कहें कि इस देश के लोग अधिक खाते हैं या कम।’<br />
वह सज्जल बोले-‘हम तो पिछले दस साल से देख रहे हैं कि अपने घर में जितना गेंहूं आता है उससे अधिक कभी लेते नहीं है। बल्कि बाहर के खाने से उसकी खपत कम होती जा रही है। छोटे बच्चे तो तमाम तरह की चिप्स वगैरह खाकर पेट भरते हैं, पीजा, बर्गर और पैट्रीज खाकर पेट भरेंगे तो फिर घर में कहां खायेंगे?’<br />
हमने कहा-‘फिर बाहर खाने से दूसरे लोगों को खाते दिखते हैं। पैसे की आवाजाही सड़क पर होने से बाहर के लोगों को दिख रही हैं इसलिये ऐसी बातें कर रहे हैं। उनको बाजार में खाने के स्थानों पर लोगों की भीड़ और पैसे का बहाव देखकर ऐसा  लगता है कि यह देश बहुत खाता है।’<br />
वह सज्जन चिंता में पड़े रहे तो आखिर हमारी श्रीमती जी ने कहा-‘भाई साहब, इतनी चिंता में आप पड़े क्यों हैं? इस देश के लोग खाते हैं तो किसी से छीनकर थोड़े ही खाते हैं। किसी के खाने में नजर तो नहीं डालते। किसी को सुखी देखकर उससे छीनते तो नहीं हैं? किसी के घर पर जाकर लूटपाट तो नहीं करते। आप यह बताईये हम आपके घर रात के खाने पर कब आयें? आप तो भाभीजी और बच्चों को लेकर कभी खाने पर लेकर  आते ही नहीं।’<br />
 <br />
वह सज्जन बोले-‘आप कमाल कर रही हो? इतनी बहस हो गयी खाने पर और आप फिर खाने की बात  लेकर बैठ गयीं। कभी आयेंगे चाय पीने पर आप खाने के जबरदस्ती करतीं हैं इसीलिये नहीं हम परिवार सहित आपके घर नहीं आते। हां, आप एक बार खाने पर आयें तो फिर सोचेंगे।’<br />
फिर हमने बातचीत का विषय बदला और वह चले गये तो श्रीमतीजी ने कहा-‘‘पर यह कहा किसने है कि भारत के लोग खाते अधिक हैं?’</p>
<p>हमने कहा-‘‘हमें पता है पर तुम जानने की कोशिश कर अपनी चिंता क्यों बढ़ा रही हो। अधिक चिंता शरीर को हानि पहुंचाती है।’<br />
वह बाहर जाते हुए बोलीं-हां यह तो बात है। वैसे आज अखबार में ऐसा कोई ऐसा शीर्षक तो देखा था पर खबर पूरी नहीं पढ़ी। अच्छा हुआ नहीं पढ़ी। बिना मतलब की खबर पढ़ने से क्या फायदा?’</p>
<blockquote><p><strong>The comic satire on </strong><a href="http://rajdpk1.wordpress.com"><strong>http://rajdpk1.wordpress.com</strong></a><strong> to be read in English</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/04/30/%e0%a4%aa%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 15:01:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/04/30/%e0%a4%aa%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95/</guid>
<description><![CDATA[बगल में अखबार दबाकर घर आया फंदेबाज और बोला ‘दीपक बापु तुमने पहले अखबारों  और अब ब्लाग पर क्रिकेट पर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong><span style="color:#003300;">बगल में अखबार दबाकर<br />
घर आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापु तुमने<br />
पहले अखबारों  और अब ब्लाग पर<br />
क्रिकेट पर ही लिखना शुरू किया<br />
फिर क्यों अब मूंह फेर लिया<br />
देखो क्रिकेट में फिल्म के एक्शन का<br />
मजा भी आ रहा है<br />
पहले पिटा  हीरो<br />
अब पीटकर बाहर जा रहा है<br />
क्यों नहीं तुम भी देखा करते<br />
बैट-बाल के खेल में<br />
मारधाड़ की भी मजा क्यों नहीं लिया करते<br />
ऐसे क्रिकेट से क्यों किनारा किया’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सुनकर पहले हैरान हुए फिर बोले<br />
‘‘हम फिल्म के वक्त फिल्म और<br />
क्रिकेट के वक्त क्रिकेट देख करते हैं<br />
यह टू-इन-वन मजा तुम ही लो<br />
हमें तो अब इससे दूर ही समझ लो<br />
हमने पहले भी कहा था<br />
क्रिकेट अब कम खेली जायेगी<br />
पर उससे पहले उसकी पटकथा लिखा जायेगी<br />
फिल्म वालों ने लिया है मोर्चा<br />
क्रिकेट को चमकान का<br />
तो उनकी कला यहां भी नजर आयेगी<br />
आस्ट्रेलिया में किया था जिसने हीरो को रोल<br />
उसे अब विलेन बनाकर पेश किया<br />
उस समय के विलेन को दे रहे थें जो गालियां<br />
अब बजा रहे उनके लिये तालियां<br />
यह हीरो-हीरोइन भला कब  डायरेक्टर के<br />
 हुक्म के बिना एक्शन के कब होते है<br />
जरूर लिखी होगी किसे ने पटकथा<br />
जो झगड़े की फोटो कैमरे से लेने में रोकते हैं<br />
झगड़ा करने वाले खिलाड़ी<br />
बाद में ऐसे होकर मिलते हैं<br />
जैसे कोई बढिया अभिनय किया<br />
कह तो रहे है सभी<br />
पर किसने देखा यह कि <br />
थप्पड़ मारने वाले ने अपना कितना नुक्सान किया<br />
हमने ने देखा न मैच न झगड़ा<br />
पर एक बात मानते हैं कि<br />
क्रिकेट मैच में एक्शन का सीन लिखकर<br />
पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</span></strong></p>
<p><strong><br />
</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
