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	<title>hindi-darshan &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/hindi-darshan/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-darshan"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Dec 2009 01:14:32 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[लायकी से अधिक मिले तो घमंड आ ही जाता है-विदुर नीति-(yogyata aur ghamand-hindu sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/28/layiki-aur-ghamand-vidur-nigi/</link>
<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 05:14:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[कौटिल्य महाराज के अनुसार &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;- उच्चेरुच्च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><span style="font-size:small;"><strong>कौटिल्य महाराज के अनुसार </strong></span><br />
<span style="font-size:small;"><strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</strong></span><br />
<strong></strong><strong>उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदन्यायच्छतै महान्।<br />
नवैनींचैस्तरां याति निपातभयशशकया।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने वाला व्यक्ति महान पद् पर तो विराजमान हो जाता है पर उससे नीचे गिरने की भय और आशंका से वह नैतिक आधार पर नीचे से नीचे गिरता जाता है।<br />
<strong>प्रमाणश्चधिकश्यापि महत्सत्वमधष्ठितः।<br />
पदं स दत्ते शिरसि करिणः केसरी यथा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>प्रमाणित योग्यता से अधिक पद की इच्छा करने वाला व्यक्ति भी उस महापद पर विराजमान हो जाता है उसी प्रकार जैसे सिंह हाथी पर अधिष्ठित हो जाता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>समाज के सभी क्षेत्रों में शिखर पर विराजमान पुरुषों से सामान्य पुरुष बहुत सारी अपेक्षायें करते हैं। वह उनसे अपेक्षा करते हैं कि आपात स्थिति में उनकी सहायता करें। ज्ञानी लोग ऐसी अपेक्षा नहीं करते क्योंकि वह जानते हैं कि शिखर पर आजकल कथित बड़े लोग कोई सत्य या योग्यता की सहायता से नहीं पहुंचते वरन कुछ तो तिकड़म से पहुंचते हैं तो कुछ धन शक्ति का उपयोग करते हुए। ऐसे लोग स्वयं ही इस चिंता से दीन अवस्था में रहते हैं कि पता नहीं कब उनको उस शिखर से नीचे ढकेल दिया जाये। चूंकि उच्च पद पर होते हैं इसलिये समाज कल्याण का ढकोसला करना उनको जरूरी लगता है पर वह इस बात का ध्यान रखते हैं कि उससे समाज का कोई अन्य व्यक्ति ज्ञानी या शक्तिशाली न हो जाये जिससे वह शिखर पर आकर उनको चुनौती दे सके। उच्च पद या शिखर पर बैठे लोग डरे रहते हैं और डर हमेशा क्रूरता को जन्म देता है। यही क्रूरता ऐसे शिखर पुरुषों को निम्न कोटि का बना देती है अतः उनमें दया या परोपकार का भाव ढूंढने का प्रयास नहीं करना चाहिए।<br />
यही हाल उन लोगों का भी है जिनको योग्यता से अधिक सम्मान या पद मिल जाता है। मायावी चक्र में सम्मान और पद के भूखे लोगों से ज्ञानी होने की आशा करना व्यर्थ है। उनको तो बस यही दिखाना है कि वह जिस पद पर हैं वह अपनी योग्यता के दम पर हैं और इसलिये वह बंदरों वाली हरकतें करते हैं। अपनी अयोग्यता और अक्षमता उनको बहुत सताती है इसलिये वह बाहर कभी मूर्खतापूर्ण तो कभी क्रूरता पूर्ण हरकतें कर समाज को यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वह योग्य व्यक्ति हैं। ऐसे लोगों की योग्यता को अगर कोई चुनौती दे तो वह उसे अपने पद की शक्ति दिखाने लगते हैं। अपनी योग्यता से अधिक उपलब्धि पाने वाले ऐसे लोग समाज के विद्वानों, ज्ञानियों और सज्जन पुरुषों को त्रास देकर शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। वह अपने मन में अपनी अयोग्यता और अक्षमता से उपजी कुंठा इसी तरह बाहर निकालते हैं। अतः जितना हो सके ऐसे लोगों से दूर रहा जाये। कहा भी जाता है कि घोड़े के पीछे और राजा के आगे नहीं चलना चाहिये।<br />
आजकल हम जब किसी बड़े पदासीन व्यक्ति को देखते हैं तो यह भी नहीं समझना चाहिए कि वह कोई अधिक योग्य है क्योंकि अनेक ऐसे लोग जो अपनी योग्यता से अधिक का पद पाने&#160;&#160;की कामना कहते हैं वह येनकेन प्रकरेन उस पद पर पहुँच जाते है,या &#160;फिर दूसरे लोग मुखौटे की तरह उनको वहां बिठा देते हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#160; </p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आत्मप्रचार की भूख-चिंतन आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/11/atmapracha-ki-bhookh-chintan-lekh/</link>
<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 15:04:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/11/atmapracha-ki-bhookh-chintan-lekh/</guid>
<description><![CDATA[अगर सभी लोग जीवन सहज भाव से व्यतीत करें तो शायद उनके बीच कोई विवाद ही न हो। मगर यह संभव नहीं है क्यो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अगर सभी लोग जीवन सहज भाव से व्यतीत करें तो शायद उनके बीच कोई विवाद ही न हो। मगर यह संभव नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग बाह्यमुखी होते हैं और उनमें कुछ ऐसे होते हैं जो अपने व्यवसाय के हित के लिये शोर शराबा करते हुए लोगों का ध्यान अपनी ओर बनाये रखते हैं।  आज के आधुनिक युग में इंटरनेट, टीवी, एफ.एम. रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं में विज्ञापनों का भंडार है उनका लक्ष्य केवल एक ही है कि किसी तरह लोगों को उलझाये रखा जाये।  ऐसे में श्रीगीता में वर्णित सहज ज्ञान योग ही वह शक्ति है जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बनाकर दूसरों के जाल में फंसने से बचा सकती है।  यही कारण है कि जितनी उपभोग की प्रवृत्तियां के साथ स्वाभाविक रूप से  योग का प्रचार भी बढ़ रहा है।  दरअसल यही योग भी एक विक्रय योग्य वस्तु बन गया है यही कारण कि विश्व विख्यात योग शिक्षक भी लोगों के केंद्र बिन्दू में आ गये हैं और लोग उनको अपने कार्यक्रमों में देखकर एक सुख की अनुभूति करते हैं।  योग शिक्षक भारतीय धर्म के प्रतीक हैं और उन्होंने एक गैर हिन्दू कार्यक्रम में शामिल होकर यह सािबत भी किया कि<br />
उनके लिये पूरा विश्व एक परिवार है।   यहां योग गुरु को गलत ठहराना ठीक नहीं है पर कुछ सवाल ऐसे हैं उनके जवाब में हम ऐसे विचारों तक पहुंच सकते हैं जिनसे सहजयोग के सिद्धांत का विस्तार हो। </p>
<p>यह विश्व विख्यात योग शिक्षक कहने के लिये भले ही गैर हिन्दूओं के कार्यक्रम में गये हों पर वह सभी इसी देश  के  ही बाशिंदे हैं।  मुख्य बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रम में उनको बुलाकर आयोजक सिद्ध क्या करना चाहते हैं?<br />
अधिक चर्चा से पहले एक बात स्पष्ट करें कि आम भारतीय अपनी रोजमर्रा के संघर्ष में ही व्यस्त है।  किसी भी जाति, धर्म और भाषा समूह के आम आदमी के दिल में झांकिये वहां उसकी निज समस्यायें डेरा डाले बैठे रहती हैं।  इनमें से कुछ लोग टीवी तो कुछ समाचार पत्रों में समाचार पढ़कर ऐसे जातीय, भाषाई और धार्मिक समूहों के सम्मेलनों की जानकारी पढ़ते हैं।  अगर उनका भावनात्मक जुड़ाव होता है तो कुछ देर सोचकर भूल जाते हैं।  आम आदमी में इतना सामथ्र्य नहीं है कि वह ऐसे कार्यक्रमों के लिये धन और समय का अपव्यय करे।   मगर चूंकि उसकी सोच में जातीय, धार्मिक और भाषाई विभाजनों का बोध रहता है इसलिये उसका ध्यान आकर्षित करने  के लिये उनके शिखर पुरुष ऐसी बैठकें कर अपनी शक्ति का बाहरी समाजों के सामने प्रदर्शन करते हैं। हर समूह के शिखर पुरुष ऐसी गतिविधियों से अपनी कथित समाज सेवा का प्रदर्शन करते हैं। </p>
<p>जिन लोगों ने यह कार्यक्रम किया वह एक भारतीय योग शिक्षक को बुलाकर अपने और बाहरी समाज के सामने अपनी शक्ति के प्रदर्शन करने के साथ ही अपनी छबि भी बनाना चाहते थे।  वह जताना चाहते थे कि विश्व भर के प्रचार माध्यमों में छायी एक बड़ी हस्ती उनके कार्यक्रम में आयी।  योग शिक्षक ने उनको क्या सिखाया या वह क्या सीखे यह इसी बात से पता चलता है कि अपने इसी सम्मेलन में एक गीत के विरुद्ध अपना निर्णय सुनाया।   एक गीत से अपने समाज को डराने वाले यह लोग उस योग शिक्षक से क्या सीखे होंगे-यह आसानी से समझा जा सकता है।   1.10  अरब की इस आबादी में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं।  देश के एक प्रतिशत से भी कम लोग हैं जिनके पास धन अपार मात्रा में है।   अगर हम आम और खास आदमी का अंतर देखें तो इतनी दूरी दिखाई देगी जितनी चंद्रमा से इस धरती की।  आम आदमी के संघर्ष पर अधिक क्या लिखें? उसके दर्द का भी व्यापार होने लगा है। अगर हम जातीय, धार्मिक और भाषाई सम्मेलनों को देखें तो उसमें खास लोग और उनके अनुयायी शामिल होते हैं पर वह अपने समाज का सही  प्रतिनिधित्व नहीं करते हालांकि वह लोगा ऐसा  भ्रम वह पैदा करते हैं।  मुश्किल यह है कि यह मान लिया जाता है कि उनके पास ही समाज को नियंत्रित करने की शक्ति है इसलिये बाहरी समाज के शिखर पुरुष उनसे संबंध रखते हैं।  आम आदमी का कोई संगठन नहीं होता तो जो बनाते हैं वह बहुत जल्दी खास बन जाते हैं उनका लक्ष्य भी यही होता है कि आम आदमी को भीड़ में भेड़ की तरह हांके। </p>
<p>योग शिक्षक बाकायदा उस वैचारिक सम्मेलन में गये जिसे गैर हिन्दू धर्मी लोगों का भी कहा जा सकता ह-हालांकि इस युग में यह शब्द ही मूर्खतापूर्ण लगता है पर पढ़ने वालों को अपनी बात समझाने के लिये लिखना ही पड़ता है।   शायद योगाचार्य  यह दिखाने के लिये गये होंगे कि इससे शायद देश में एकता का आधार मजबूत होगा।  उन्होंने यह भी उम्मीद लगायी होगी कि इसमें वह  उस समाज को कोई संद्रेश दे पायेंगे।  उनका यह प्रयास एक सामान्य घटना बनकर रह गया क्योंकि वहां तो समाज के ऐसे शिखर पुरुषों का बाहुल्य था जो कि उनकी उपस्थिति को अपने कार्यक्रम का प्रभाव बढ़ाना चाहते थे।  किसी दूसरे समुदाय के धर्माचार्य का संदेश   ऐसे शिखर पुरुष कभी भी अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली का भाग नहीं बनाते। वह जानते हैं कि ऐसी जरा भी भी कोशिश उनका अपने समूह से नियंत्रण खत्म करेगी।  एक व्यक्ति हाथ से निकला नहीं कि सारा समाज ही हाथ से निकल जायेगा।  आखिर एक गीत से घबड़ाने वाले इतने साहसी हो भी कैसे सकते हैं।<br />
भारतीय योग में केवल योगासन और प्राणायाम ही नहीं आते बल्कि मंत्रोच्चार भी होता है।   मंत्रोच्चार में ऐसे शब्द है जिसमें देवी देवताओं की उपासना होती है-एक गीत से घबड़ाने वाले शिखर पुरुष भला दूसरे समूह के इष्टों का नाम अपने लोगों को कैसे लेने दे सकते हैं? कुल मिलाकर यह एक अर्थहीन प्रयास था।  योगशिक्षक की उपस्थिति से उनकोकोई अंतर नहीं पड़ा पर आयोजकों के शिखर पुरुष एक अंतर्राष्ट्रीय हस्ती के पास बैठकर अपना वजन बढ़ाने में सफल रहे।  </p>
<p>कहने का तात्पर्य यह है कि आम आदमी चाहे किसी भी जाति, भाषा  या धर्म का हो उसके समूह के शिखर पुरुष प्रचार माध्यमों में छाये लोगों को अपने यहां बुलाकर अपना वजन बढ़ाते हैं भले ही वह उनके समुदाय का न हो-प्रचार माध्यमों में अपनी छबि बनाने के अलावा उनका कोई उद्देश्य नहीं होता।  यह किसी एक समूह के साथ नहीं है बल्कि हर समूह में ऐसा हो रहा है।  इसका कारण यह है कि आज की महंगाई, बेकारी, पर्यावरण प्रदूषण तथा सामाजिक कटुता ने आम आदमी को असहज बना दिया है।  इसी असहजता को अधिक बढ़कार सभी समाजों को शिखर पुरुष उसे सांत्वना और साहस देने के नाम पर ऐसे सम्मेलन करते हैं पर उनका लक्ष्य केवल आत्म प्रचार करना होता है। जहां तक आदमी आदमी की जिंदगी का प्रश्न है तो वह कठिन से कठिन होती जा रही है और सभी समूहों  शिखर पुरुषों के केवल अपने सदस्यों की संख्या की चिंता रहती है।<br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य दर्शन-दुष्ट और कांटों को जूतों से कुचल दें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/09/chankya-niti-dusht-aur-kante/</link>
<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 15:04:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/09/chankya-niti-dusht-aur-kante/</guid>
<description><![CDATA[खलानां कपटकानां च द्विवेधैव प्रतिक्रिया। उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।। हिंदी में भावार्थ-दुष्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>खलानां कपटकानां च द्विवेधैव प्रतिक्रिया।<br />
उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</b>दुष्टों और कांटों को दूर करने के दो ही उपाय है या तो जूतों से उनका मुंह कुचल दिया जाये अथवा उन्हें दूर से ही त्याग दे।<br />
<b>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</b>सच बात तो यह है कि जिन लोगों की प्रवृत्ति दुष्ट है उनको दूर से त्याग देना चाहिए। आजकल के समय तो दुष्ट लोगों को न केवल समाज का उच्च वर्ग ही समर्थन देता है बल्कि सामान्य लोग भी उससे लड़ने में डरते हैं।  फिर आजकल नियम भी ऐसे है कि हिंसा करना परेशानी का कारण हो सकता है। इसलिये अच्छा यही है कि दुष्टों को दूर से ही नमस्कार कर चलते बने।  उनके साथ आत्मीय संबंध बनाकर अपनी सुरक्षा का विचार करना निहायत बेवकूफाना है।  </p>
<p>महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस को पूर्ण करने के लिये दुष्टों से भी प्रार्थना की थी। उनसे सबक यही निकलता है कि जहां तक हो सके दुष्ट लोगों से अपनी दूरी बना लें।   जहां तक उनको जूते मारने वाली बात है तो आजकल अर्थ के सारे स्त्रोत दुष्टों के घर भी वैसे हैं जैसे सज्जनों के पास।  यह जूता मारना दंडनीति का परिचायक है जिसका उपयेाग अपने से कमजोर व्यक्ति पर किया जाता है। चूंकि आजकल दुष्ट न केवल धनार्जन बड़ी मात्रा में कर लेते हैं बल्कि समाज भी उनको सम्मान देता है इसलिये उनसे दूर रहना भी अपनी सुरक्षा का सबसे बढ़िया उपाय है।  वैसे देखा जाये तो आजकल दुष्ट ही दुष्ट से लड़कर नष्ट भी हो जाते हैं।  इस पूरे विश्व की हालत ऐसी है कि सज्जन के पास इसके अलावा कोई उपाय नहीं है कि वह दुष्टों से दूर रहकर अहंकार वश होने वाले उनके संघर्षों को देखे।<br />
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
</b><br />
<blockquote>
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</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भीड़ में अपनी पहचान मत ढूंढो-व्यंग्य कविता (pahchan-vyangya kavita)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/04/apni-pahchan-hindi-poem/</link>
<pubDate>Wed, 04 Nov 2009 15:56:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/04/apni-pahchan-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[भीड़ में अपनी पहचान ढूंढते हुए क्यों अपना वक्त बर्बाद करते हो. भीड़ जुटाने वाले सौदागरों के लिए हर श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>भीड़ में अपनी पहचान ढूंढते हुए<br />
क्यों अपना वक्त बर्बाद करते हो.<br />
भीड़ जुटाने वाले सौदागरों  के लिए<br />
हर शख्स एक  बेजान शय है<br />
अपनी हालातों पर तुम<br />
क्यों लंबी गहरी साँसें भरते हो.<br />
सौदागरों के इशारे पर ही<br />
अपनी अदाएं  दिखाओ<br />
चंद सिक्के मिल सकते हैं खैरात में<br />
पर इज्जत की चाहत तुम क्यों करते हो.<br />
अपने हाथ से अपनी कामयाबी पर<br />
जश्न मनाने में देर लग सकती है,<br />
जल्दी जीतने की कोशिश में<br />
सौदागरों के हाथ में अपनी<br />
आजादी क्यों गिरवी रखते हो.</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://zeedipak.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
</b><br />
<b><a href="http://bharatdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</b></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विष की शुद्धि-त्रिपदम  (vish ki shuddhi-tripadam)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/23/vish-par-hindi-kavita/</link>
<pubDate>Fri, 23 Oct 2009 15:16:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/23/vish-par-hindi-kavita/</guid>
<description><![CDATA[मन में विष किसमें नहीं होता शुद्धि कहां है। सोच से जड़ हो गये ये इंसान बुद्धि कहां है। जले शब्द उगलते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>मन में विष<br />
किसमें नहीं होता<br />
शुद्धि कहां है।</p>
<p>सोच से जड़<br />
हो गये ये इंसान<br />
बुद्धि कहां है।</p>
<p>जले शब्द<br />
उगलते चूल्हे<br />
वाणी कहां है।</p>
<p>सभी भिखारी<br />
ढूंढ रहे हैं माल<br />
दानी कहां है।</p>
<p>लंगड़ी भाषा<br />
सिखाई गुरुओं ने<br />
बोध कहां है।</p>
<p>शिक्षित झुंड<br />
शहर में घूमता<br />
शोध कहां है।</p>
<p>दर्द की दवा<br />
मिलती कभी कभी<br />
रोज कहां है।</p>
<p>प्रश्न वन<br />
घना है चारों ओर<br />
खोज कहां है।</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-जागरुक लोग अपनी बेइज्जती नहीं सहते (jagruk aur apmaan-hindi sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/22/jagruk-log-aur-ijjat/</link>
<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 13:59:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/22/jagruk-log-aur-ijjat/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211; यद चेतनोऽपिपादै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<strong>यद चेतनोऽपिपादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः।<br />
तत्तेजस्वी पुरुषः परकृत निकृतिंक कथं सहते ।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>सूर्य की रश्मियों के ताप से जब जड़ सूर्यकांन्त मणि ही जल जाती है तो चेतन और जागरुक पुरुष दूसरे के द्वारा किये अपमान को कैसे सह सकता है।</p>
<p><strong>लांगल चालनमधश्चरणावपातं भू मौ निपत्य बदनोदर दर्शनं च।<br />
श्चा पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीरं विलोकपति चाटुशतैश्चय भुंवते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>श्वान भोजने देने वाले के आगे पूंछ हिलाते हुए पैरों में गिरकर पेट मूंह और पेट दिखाते हुए अपनी दीनता का प्रदर्शन करता है जबकि हाथी भोजन प्रदान करने वालो को गहरी नजर से देखने के बाद  उसके द्वारा आग्रह करने पर ही भोजन ग्रहण करता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>भले ही आदमी के पास अन्न और धन की कमी हो पर  मनुष्य को स्वाभिमानी होना चाहिए नहीं तो अधिक धनवान, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोग उसे गुलाम बनाये रखने के लिये हमेशा तत्पर रहते हैं।  आजकल सुख सुविधाओं ने अधिकतर लोगों को शारीरिक और मानसिक तौर से सुस्त बना दिया है इसलिये वह उन्हें बनाये रखने के लिये अपने से अधिक शक्तिशाली लोगों की चाटुकारिता में लगना अपने लिये निज गौरव समझते हैं। यही कारण है कि निजी क्षेत्र में स्त्रियों और पुरुषों का शोषण बढ़ रहा है। हमारे यहां की शिक्षा कोई उद्यमी नहीं पैदा करती बल्कि नौकरी के लिये गुलामों की भीड़ बढ़ा रही है। कितनी विचित्र बात है कि आजकल हर आदमी अपने बच्चे को इसलिये पढ़ाता है कि वह कोई नौकरी कर अपने जीवन में अधिकतम सुख सुविधा जुटा सके।  ऐसे में बच्चों के अंदर वैसे भी स्वाभिमान मर जाता है। उनका अपने माता पिता और गुरुजनों से अच्छा गुलाम बनने की प्रेरणा ही मिलती है। </p>
<p>ऐसी स्थिति में हम अपने देश और समाज के प्रति कथित रूप से जो स्वाभिमान दिखाते हैं पर काल्पनिक और मिथ्या लगता है।  स्वाभिमान की प्रवृत्ति तो ऐसा लगता है कि हम लोगों में रही नहीं है। ऐसे मेें यही लगता है कि हमें अब अपने प्राचीन साहित्य का अध्ययन भी करते रहना चाहिये ताकि पूरे देश में लुप्त हो चुका स्वाभिमान का भाव पुनः लाया जा सके।<br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http:/rajlekh.blogpot.com<br />
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 </strong></p></blockquote>
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<item>
<title><![CDATA[अखबार ने पाठ छापा पर नाम नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/11/my-post-in-news-paper-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 11 Oct 2009 05:24:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/11/my-post-in-news-paper-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[हिंदी की सेवा करने का दावा करने वाले बहुत हैं। इनके नाम भी आपने देखे होंगे। यह लोग हिंदी के नाम पर क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>हिंदी की सेवा करने का दावा करने वाले बहुत हैं। इनके नाम भी आपने देखे होंगे। यह लोग हिंदी के नाम पर कितना लिखते हैं यह अलग बात है पर जो हिंदी में लिखने वाले मौलिक तथा स्वतंत्र लेखक हैं उनसे यह अपीलें जरूर करते हैं कि हिंदी की सेवा करना तुम्हारा धर्म है। इनके आचरण पर अधिक क्या कहें? जहां धन देने की बात आती है तो यह धर्म की बात करते हैं कि ‘भई आपकी मातृभाषा  हिंदी है जिसकी सेवा करना आपका धर्म है। यह भी मान लिया पर जहां नाम देने की बात आती है तब इनकी सारी नैतिकता गायब हो जाती है।<br />
बहुत निराशा हुई यह देखकर कि यह लेखक तो निष्काम भाव से केवल अंतर्जाल पर इस भाव से लिख रहा है कि नई पीढ़ी को अपने अध्यात्मिक ज्ञान की वास्तविक अनुभूति हो क्योंकि लोग महापुरुषों के संदेशों की व्याख्या तो करते हैं पर उसकी वर्तमान संदर्भों में सही ढंग से प्रस्तुति नहीं कर पाते। इस लेखक का यह दावा नहीं है कि इसमें कोई सिद्धि प्राप्त है पर जिस तरह आज एक समाचार पत्र ने इसके अध्यात्मिक विषय लेख को एक दो शब्दों के संशोधन के साथ प्रकाशित किया उससे लगता है कि वाकई कुछ ऐसा है जो लोग अखबारों में नाम देने से डर रहे हैं।  लेख को कुछ शब्दों की हेरफेर के साथ प्रस्तुत किया पर इस ब्लाग के लेखक का नाम नहीं दिया। इससे एक बात साफ लग रही है कि हिंदी के नाम पर कथित रूप से स्वयंसेवा के लिये प्रेरित करने वाले लोग यहां के ब्लाग लेखकों की रचनाओं को अपने माध्यमों में बिना नाम के छापकर अपना हित साधना चाहते हैं।  प्रकाशन माध्यमों के इस व्यवहार का कारण यही समझ में आता है कि वह डर रहे हैं कि कही उनको ब्लाग लेखकों से चुनौती नहीं मिल जाये। उस अखबार का नाम देना ठीक नहीं है क्योंकि उससे उसका प्रचार होगा।  फिर यह काम करने वाले लोग अपने जैसे ही सामान्य रोजगार वाले होते हैं और किसी के रोजीरोटी पर वक्र दृष्टि डालना पाप है। हो सकता है उसने इस पर ध्यान नहीं दिया हो और उसे लगता हो कि अंतर्जाल पर हर सामग्री फ्री है। ऐसे में प्रकाशन माध्यमों से जुड़े लोगों से यह आग्रह है कि भई क्या इतनी मेहनत के बाद हम इस बात से भी गये कि नाम भी न दिया जाये।<br />
बहरहाल आपने आज अगर कहीं यह लेखक पढ़ा हो तो स्वयं ही देख सकते हैं।  इतना ही नहीं इस लेखक के अध्यात्म विषयों को नियमित पढ़ने वाले  लेखक मित्रों तथा पाठक मित्रों से यह भी आग्रह है कि वह कहीं भी अध्यात्म विषया पर लिखा हुआ देखें तो उस पर ध्यान करें तो देखेंगे कि अनेक समाचार पत्र पत्रिकाओं में कहीं पाठ तो कहीं विचार वहीं से लिये मिलेंगे।<br />
यह कोई शिकायत नहीं है बल्कि सूचना है कि अंतर्जाल पर लिखे गये विषयों की बाहर मांग हैं पर हिंदी लेखक को सम्मान देने के नाम पर शक्तिशाली वर्ग देखने, सुनने और कहने की प्रक्रिया से दूर हो जाता है ठीक गांधी जी के तीन वानरों की तरह।  इस लेख के माध्यम सें हम केवल यही बताना चाहते हैं कि हिंदी की सेवा सत्य करने का ढोंग किया जाता है। उसका सच्चे सेवक तो अल्पधनी, निष्काम भावी और मूल चिंतन वाले लेखक ही होते हैं।<br />
नीचे का यह लेख देखें जिसे संशोधित कर किसी समाचार पत्र में प्रकाशित किया गया है।<br />
<strong>कबीर के दोहे-प्रेम का वास्तविक रूप कोई नहीं समझता </strong><br />
<strong><br />
प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय<br />
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके। </p>
<p><strong>गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय<br />
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्सािहत करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम मेंें शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है। </p>
<p>वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-कविताओं से बहकाया जाता है (hindi santdesh-kavitavon se bharam]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/10/kavitaon-se-vaham-hindi-sandesh/</link>
<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 14:47:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/10/kavitaon-se-vaham-hindi-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;- सत्यत्वे न शशा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं  कि</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong></strong><strong>सत्यत्वे न शशांक एव बदनीभूतो न चेन्दोवर द्वंद्व लोनतां गतं  न कनकैरष्यंगयश्टिः कूता।<br />
किंतवेवं कविभि प्रतारितमनतत्वं विजनान्नपि त्वं मांसस्थ्मियं वयूर्मृगदृशां मंदो जनः सेवते।।</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> न तो चंद्रमा जमीन पर आकर किसी सुंदरी युवती के मुख पर सजा है और न ही कभी कमल ने किसी के नेत्र का स्थान लिया है और न ही किसी की देह सोने से बनी है पर फिर भी कविगणों के बहकावे में  सामान्य लोग आ जाते हैं और हाड़मांस के इस नश्वर को सर्वस्व मानते हुए भोगों में लिप्त हो जाते हैं।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>बरसो पूर्व कही गयी यह बात आज भी कितनी प्र्रासंगिक है।  हमारे यहां आजकल फिल्मों में सूफी तरीके से गीत लिखे जा रहे हैं जिसमेंे भगवान और प्रेमिका को एक ही गदद्ी पर बिठाया जाता है यानि उस गीत को  सोलह साल का लड़का अपनी प्रेयसी पर भी गा सकता है और कोई भक्त भगवान के लिये भी गा सकता है। सच तो यह है कि सच्चे भक्त के लिये तो किसी सुर संगीत की आवश्यकता तो होती नहीं इसलिये वह उनके दांव पर नहीं फंसते पर युवक युवतियां उन गीतों पर झूमते हैं और कभी कभार तो यह लगता है कि इस तरह देश को बहकाया जा रहा है। उनके दांव में कच्चे भक्त भी फंस जाते हैं और गीत सुनकर अपनी गर्दन हिलाने लगते हैं।<br />
भगवान की निष्काम भक्ति का सर्वश्रेष्ठ रूप एकांत में उनका ध्यान और स्मरण करना है जबकि सुर संगीत से उनका स्मरण करना एक तरह से सकाम भक्ति का प्रमाण है और जिस तरह प्यार प्यार की बात आती है उससे  तो ध्यान भटकता है और देह तथा मन को कोई लाभ भी हीं होता।<br />
इस तरह भगवान और प्रेयसी के प्रति एक साथ प्रेम पैदा करने वाले शब्द केवल बहकाते हैं और आजकल के व्यवसायिक युग में इसका प्रचलन बढ़ गया है। कभी कभी तो लगता है कि इस तरह के सूफी गीत भारत के युवाओं में मौजूद अध्यात्मिक की स्वाभाविक प्रवृति को अपने स्वार्थ को भुनाने के लिये लिखे गये हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर दर्शन-दूसरे की कमी देखकर हंसो नहीं (Sant Kabir Darshan - Seeing the lack of other not Laugh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/06/kabir-ke-dohe-doosre-par-hanso-nahin/</link>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 16:50:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/06/kabir-ke-dohe-doosre-par-hanso-nahin/</guid>
<description><![CDATA[आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय। चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।। संत शिरोमणि कबीरदास ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।<br />
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।<br />
<strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।<br />
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति-दूसरों के माल पर नजर न डालें (paraya mal apna na samjhen)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/03/manu-smriti-in-hindi/</link>
<pubDate>Sat, 03 Oct 2009 04:55:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/03/manu-smriti-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[मनु महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212; यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>मनु महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<p><strong>यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्रह्यणि च।<br />
अदत्तान्युपयु´्जानः एनसः स्वात्तुरीभाक्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>वाहन, शैय्या, आसन, कुआं, उद्यान और भवन आदि का उपभोग कुछ दान कर ही करना लाभदायक होता है।<br />
<strong>परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन।<br />
नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अन्य व्यक्तियों द्वारा बनवाये गये स्नान के लिये बनाये गये स्थानों-स्नानगृहों,सरोवरों और कुऐं आदि-पर नहाना नहीं चाहिए। वह स्नानगृह अगर पापों के धन से बनाये गये हैं तो उसमें नहाने वाला भी उसका भागी बनता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>आजकल की व्यस्त एवं दीर्घसूत्रीय जिंदगी में यह देखना कठिन काम है कि हम कहीं बाहर जाकर रुक रहे हैं तो वहां का स्थान किस प्रकार के धन से बनाया गया है। वैसे भी आजकल बिना काले धन के यह कैसे संभव है कि समाज का भौतिक विकास इतनी तीव्र गति से हो। ऐसे में भ्रष्ट और अनैतिक रूप से कमाये गये धन से बने आवास और स्नानगृहों में रहने और नहाने का प्रतिबंध स्वीकार करना संभव नहीं लगता। बड़े बड़े शहरों में बड़े और आलीशान होटल बन गये हैं जिनमें स्वीमिंग पूल भी होते हैं। अब यह कैसे कहा जा सकता है कि वह भ्रष्ट या अनैतिक धन से बने हैं या सात्विक धन से। वैसे तो आजकल धर्नाजन के कई ऐसे&#160;साधन&#160;&#160;पवित्र माने जाते हैं जिनको पहले अपवित्र माना जाता था। अतः इस बारे में अपने विवेक से विचार करना चाहिये। </p>
<p>मगर सच तो यह है कि जिस प्रकार हम अपने जीवन में जिस प्रकार के व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में आते हैं उसके पाप पुण्य का प्रभाव हम पर होता है। कहा जाता है कि ‘जैसे खायें अन्न वैसा हो मन’। इसका आशय यह तो है ही कि जिस प्रकार की वस्तु का हम उपभोग करेंगे वैसे ही प्रभाव हमारी देह के साथ ही हमारे मन और विचारों पर होगा। साथ ही यह भी कि उसके आने का सात्विक मार्ग है या असात्विक इस बात का प्रभाव भी उसके उपभोग करने वाले पर होता है। तात्पर्य यह है कि अगर हमें लगता है कि कोई व्यक्ति या वस्तु-जिसके बारे में यह यकीन हो कि वह असात्विक प्रकृत्ति की है तो उससे अपने आपको दूर रखना चाहिये। यह ठीक है कि आजकल की भागम भाग जिंदगी में यह कहना कठिन है कि किसका धन एक नंबर का है या दो नंबर का पर थोड़ा विवेक का इस्तेमाल करें तो सभी समझ में आ जाता है। दूसरा सच यह भी कि हम किसी बड़े शहर में जाकर अपने लिये सस्ता और अच्छा स्थान रहने के लिये ढूंढते हैं पर तब यह देखने का न तो समय होता है न जरूरत कि वह किस प्रकार के धन से बना है। हालांकि अनजान रहने पर किसी वस्तु का उपभोग करने पर उसके पाप का भागी नहीं बनते यह भी हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
&#160;&#160;&#160;<strong>&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://deepkraj.blogspot.com/">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-चाटुकारिता से फायदा नहीं होता (Brtrihri Policy century - butter would not benefit ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/30/chatukarita-se-labh-nahin-hindu-sandesh/</link>
<pubDate>Wed, 30 Sep 2009 03:55:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/30/chatukarita-se-labh-nahin-hindu-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः जरा देहं मृत्युरति दयितं ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं<br />
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः<br />
जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं<br />
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः</strong> </p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है। हमारी अभिलाषायें और आकांक्षायें की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में बड़ा पद पाने की लालसा है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और ताकते रहते हैं और उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगों को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देेते हैं तो केवल चाटुकारित के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर।</p>
<p>सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धर्म विषयक बहस पर तर्कवितर्क-आलेख (dharm vishay par bahas-hindi lekh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/28/religion-and-disscusion-hindi-article/</link>
<pubDate>Mon, 28 Sep 2009 06:26:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/28/religion-and-disscusion-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[अजीब लगता है धर्म विषयक उन बहसों से एक आम व्यक्ति के रूप में जुड़कर जो समय समय पर प्रचारतंत्र में सुन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अजीब लगता है धर्म विषयक उन बहसों से एक आम व्यक्ति के रूप में जुड़कर  जो समय समय पर प्रचारतंत्र में सुनने और देखने को मिलती है।  इन बहसों के निष्कर्ष हमेशा ही शून्य रहते हैं। धर्म का आधार ज्ञान होता है और ज्ञानी कभी बहस नहीं करते।  बहस तो वह करते हैं जो धार्मिक कर्मकांडों में ही धर्म का आधार ढूंढते हैं।   इसमें भी एक मजेदार बात यह है कि भारतीय धर्म ही एक मात्र ऐसे हैं जो ज्ञान के साथ विज्ञान में पूर्णता प्राप्त करने का संदेश देते हैं। किसी भी व्यक्ति में सभी गुण नहीं आ सकते पर अगर वह अपने ग्रंथ पढ़ कर कुछ ज्ञान धारण करे तो वह अपने अंदर के अवगुण देखकर उनसे बच सकता है।<br />
भारतीय धर्म  सबसे पुरातन है और अनेक प्रयोगों के दौर से गुजर कर इस रूप में आये हैं।  इन्हीं प्रयोगों के दौर में अनेक विश्लेषण भी आये होंगे जो तत्कालिक रूप से ठीक लगे और बाद में उनकी कमियां या विरोध सामने आया।  हमारा धार्मिक समुदाय दुनियां का सबसे प्रगतिशील है और वह स्वतः ही उन चीजों को नकार देता है जो समय के अनुसार उसे अतार्किक या अव्यवहारिक लगती है। फिर भी भारतीय धर्म के आलोचक  हैं जो  उन छोड़ी चीजों को सामने लाकर प्रस्तुत करते हैं। अब उन्हें यह समझाना कठिन है कि ‘भई, हम इन चीजों को छोड़ चुके।<br />
बहुत वर्षों से वेदों और मनुस्मृति को लेकर हमारे भारतीय समाज को लांछित किया जाता है।  भारतीय धर्म को रूढ़िवादी बताकर स्वयं को विकासवादी प्रमाणित करने वाले लोग हमेशा नारी तथा जाति प्रथा को लेकर ऐसे लांछन लगाते हैं जिनके बारे में वह स्वयं नहीं जानते कि यह वर्ण व्यवस्था बनी कैसे? दूसरा यह भी कि चाहे विज्ञान कितना भी आगे बढ़ जाये यह व्यवस्था खत्म नहीं हो सकती क्योंकि इसमें सांसरिक कर्म के तत्व निहित है।<br />
ठीक है अगर आप यह कहते हैं कि यह जातिवादी व्यवस्था समाप्त होना चाहिए।  मगर आधुनिक समाज में जो कंपनियां तथा बड़े औद्योगिक व्यवसायिक संस्थान हैं उनमें सलाहकार, पूंजीपति, प्रबंधक और लिपिक-मजदूर का भेद समाप्त कर सकते हैं क्या? क्या आधुनिक समाज में जो विभाजन पूंजी और श्रम के आधार पर हुआ है वह क्या पुराने विभाजन से अधिक बेहतर है। नये बन रहे इस समाज में  क्या बड़ी मछली छोटी मछली को नहीं खाती।  वर्तमान व्यवस्था ने चाटुकारों और गुलामों की फौज खड़ी हुई है उसका द्वंद्व कौन रोक पा रहा है?<br />
इधर एक बात जिसे भारतीय धर्म के आलोचक और प्रशंसक दोनों ही भूल जाते हैं कि अब भारतीय दर्शन का आधार श्रीगीता को माना जाता है।  चारों वेदों का सार उसमें समाहित हो गया है।  यह अलग बात है कि प्रसंग आने पर वेदों और मनुस्मृतियों में वर्णित सांसरिक विषयों के उद्धरण सुनाये जाते हैं पर वही जिनका आज के संदर्भ में महत्व है।   इस श्रीगीता में जीवन कलात्मक रूप से जीने का जो संदेश है उससे मायावी लोग घबड़ाते हैं।  वजह यह है कि अपना काम निष्काम भाव करने का अर्थ वह नहीं है जो लोग समझते हैं। अपनी देह के पालन के लिये किये कर्म के लिये धन त्यागना कोई कामना का त्याग नहीं है बल्कि उसे ही फल मान लेना अज्ञान है-यह गीता का संदेश है।   मतलब यह है कि आप मजदूर हैं तो अपना काम करिये और अपना पैसा लीजिये पर पूंजीपति या प्रबंधक को सर्वशक्तिमान न समझें। बात यही अटकती है। चाहे आधुनिक जातीय समाज हो या वर्तमान पूंजी समाज बड़े और ताकतवर लोग यह चाहते हैं कि वह पुजें।  इतना ही जो बू़़ढ़े हो जाते हैं वह भी सोचते हैं कि भले ही उन्होने जीवन में कोई सार्थक कार्य नहीं किया पर उनको देवता मना लिया जाये। कुछ लोग यह सब जानते हैं पर फिर भी श्रीगीता का संदेश सही नहीं बताना चाहते। वजह यह है कि निष्काम व्यक्ति अपने भगवान के अलावा किसी अन्य को भगवान नहीं मानता।  चाहे पुराना हो या नया समाज उसके शिखर पुरुष भगवान की तरह पुजने की अपनी चाहत के कारण इस श्रीगीता नाम के उस गं्रंथ से घबड़ाते हैं जो भारतीय धर्म का आधार है।<br />
इसके बाद आता है नंबर उनके इशारे पर चलने वाले प्रबुद्ध वर्ग का।   श्रीगीता के बाद ही रहीम, कबीर, तुलसी और रैदास जैसे महापुरुष इस धरती पर आये और उनकी रचनाओं का अब भी विश्व में कहीं सानी नहीं है बल्कि इन पर विदेशों में अनुसंधान चल रहा है।  विदेशियों ने ही यह बताया कि हमारी ताकत ध्यान में निहित है।   अगर राजनीति की बात करें तो चाणक्य का मुकाबला कौन कर सकता है।  राजनीति हर क्षेत्र में घुस आयी है-इसका रोना कई लोग रोते हैं पर चाणक्य के संदेश बताते हैं कि हर क्षेत्र में रणनीतिक कौशल आवश्यक है।  इससे भी समाज को दूर रखने का प्रयास यह प्रबुद्ध वर्ग करता है।  इसलिये बाहर के विचारों को यहां उठाकर यहां प्रस्तुत किया जाता है। चूंकि आधुनिक समय की दृष्टि से भी जो जीवन के मूल रहस्या हमारे दर्शन द्वारा खोज कर प्रस्तुत किये गये हैं और किसी नये की गुंजायश नहीं दिखती तो कुछ कथित प्रबुद्ध लोग इधर उधर से उठाकर नये सत्य प्रस्तुत करते हैं।<br />
इसके बाद भी यह देखकर प्रसन्नता हो रही है कि इधर अंतर्जाल पर कुछ ऐसे विद्वानों के लेख पढ़ने को मिले जो यह मानकर चलते हैं कि हमें नये पुराने विषयों और विचारों में सामंजस्य बिठाकर एक नया समाज बनाना चाहिये। उन लोगों से भी हम कहना चाहते हैं कि नये समाज बनाने का संदेश भी इसी श्रीगीता में है।  आज हम जिसे समाजवाद कहते हैं वह भी  श्रीगीता में है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘अकुशल श्रम को कभी हेय नहीं समझना चाहिये और हमेशा निष्प्रयोजन दया करना ही धर्म है।<br />
फिर भी आलोचकों से क्या कहा जाये। मनु स्मृति में कई ऐसी जानकारी हैं जो सांसरिक व्यवहार में महत्वपूर्ण है।  ऐसी कई घटनायें होती दिखती हैं जिसे देखकर लगता है कि अगर लोग उसमें लिखे गये कुछ संदेश आज के समय में देखें तो शायद उन संकटों से बच सकते थे जिन्होंने या तो उनका जीवन लील लिया या ऐसा दर्द दे दिया जिसे वह जिंदगी भर नहीं भुला सकते।  मुश्किल यह है कि जब आप उन संदेशों का उल्लेख करते हैं तो उन घटनाओं को नहीं लिख सकते क्योंकि इससे किसी पीड़ित व्यक्ति के अज्ञान का मजाक उड़ाना समझा जायेगा। बहरहाल आलोचकों का सामना करना कठिन होता है। वैसे भी धर्म चर्चा भले ही सार्वजनिक हो पर ज्ञान चर्चा तो एकांत में ही होती है।  इसका सीधा आशय यह है कि बहसों से किसी ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती बल्कि जो अपने पास है उसमें संशय पैदा हो जाता है। ऐसी बहसों में सभी अपनी बात रखते हैं पर किसी दूसरे की राय को स्वीकृति कोई नहीं देता।<br />
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<title><![CDATA[संत कबीर के दोहे-भक्त नारी से रानी भी बराबरी  नहीं कर सकती (kabir ke dohe-bhakt nari se rani)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/20/sant-kabir-vani-nari-aur-rani/</link>
<pubDate>Sun, 20 Sep 2009 05:08:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/20/sant-kabir-vani-nari-aur-rani/</guid>
<description><![CDATA[दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि संत शिरोमणि कबीर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि<br />
सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भूख के कष्ट के कारण दुखी आदमी मर रहा है तो  ढेर सारे सुख के कारण सुखी भी कष्ट उठा रहा है किंतु राम के भक्त तो हर हाल  में मजे से रहते हैं क्योंकि वह दुःख सुख के भाव से परे हो गये हैं। </p>
<p><strong>हैवर गैवर सघन धन, छन्नपती की नारि<br />
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान की भक्ति करने वाली  गरीब नारी की बराबरी  महलों में रहने वाली रानी भी नहीं कर सकती भले ही उसके राजा पति के पास हाथियों और घोड़ो का झुंड और बहुत सारी धन संपदा है।<br />
<strong></strong><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>दुनियां में तीन तरह के लोग होते हैं-दुःखी,सुखी और भक्त। अभाव और निराशा के कारण दुःखी आदमी हमेशा परेशान रहता है तो सुखी आदमी अपने सुख से उकता जाता है और वह हर ‘मन मांगे मोर’ की धारा में बहता रहता है। विश्व के संपन्न राष्ट्रों के देश भारत के अध्यात्मिक ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तो भारत के लोग उनकी भौतिक संपन्नता प्रभावित होते हैं।  पश्चिम में तनाव है तो पूर्व वाले भी सुखी नहीं।  कहने का तात्पर्य यह है कि लोेग इस मायावी संसार में केवल दैहिक सुख सुविधाओं के पीछे भागते हैं। जिसके भौतिक साधन नहीं है वह कर्ज वगैरह लेता है और फिर उसे चुकाते हुए तकलीफ उठाता है और अगर वह चीजें नहीं खरीदे तो परिवार के लोग उसका जीना हराम किये देता है। सुख सुविधा का सामान खरीद लिया तो फिर दैहिक श्रम से स्त्री पुरुष विरक्त हो जाते हैं और इस कारण स्वास्थ बिगड़ने लगता है।  </p>
<p>जिन लोगों ने अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह जीवन को दृष्टा की तरह जीते हैं और भौतिकता के प्रति उनका आकर्षण केवल उतना ही रहता है जिससे देह का पालन पोषण सामान्य ढंग से हो सके।  वह भौतिकता की चकाचैंध मेंे आकर अपना हृदय मलिन नहीं करते और किसी चीज के अभाव में उसकी चिंता नहीं करते।  ऐसे ही लोग वास्तविक राजा है। जीवन का सबसे बड़ा सुख मन की शांति हैं और किसी चीज का अभाव खलता है तो इसका आशय यह है कि हमारे मन में लालच का भाव है और कहीं अपने आलीशान महल में भी बैचेनी होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि हमारे अंदर ही खालीपन है। दुःख और सुख से परे आदमी तभी हो सकता है जब वह निष्काम भक्ति करे।<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
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</item>
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<title><![CDATA[वेद और मनुस्मृति के विषयों  पर  भ्रमित करने का प्रयास-आलेख (disscution on ved and manu smriti-hindi lekh]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/13/ved-aur-manu-smruti-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 04:37:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/13/ved-aur-manu-smruti-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का आधार कोई एक ग्रंथ या पुस्तक नहीं है। समय समय पर अनेक महापुरुषों, तपस्पियो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का आधार कोई एक ग्रंथ या पुस्तक नहीं है। समय समय पर अनेक महापुरुषों, तपस्पियों, ऋषियों तथा मुनियों ने अपने सतत प्रयासों से इस ज्ञान भंडार को भरा है।  इसकी शुरुआत वेदों से हुई पर अंत कहीं नहीं है।  भौतिक और व्यक्त जगत पर शोध तो अनेक देशों ने किया पर अध्यात्मिक और अव्यक्त जगत पर जितना ज्ञान भारत में है किसी के पास नहीं रहा।  हम यहां वेदों के साथ मनुस्मृति की भी बात करेंगे जिनको लेकर हिन्दुओं को भ्रमित किया गया-इसे यूं भी कहें कि हमारा समाज स्वयं भी इसको लेकर भ्रमित है।<br />
अक्सर हिन्दू धर्म के अन्य धार्मिक आलोचक (इसका आशय विदेशी विचारकों और प्रचारकों से है)<br />
इन्हीं वेदों और मनुस्मृति से श्लोक लेकर हमला करते हैं पर यह उनकी सोच नहीं है। अन्य धार्मिक विचाराधारओं के मानने वालों (विदेशी विचारकों और प्रचारकों) के पास इतनी चिंतन क्षमता हो ही नहीं सकती कि वह भारतीय वेदों, पुराणों और मनुस्मृति को पढ़कर आलोचना कर सकें बल्कि यह भारतीय समाज के अंदरूनी तत्वों द्वारा ही जानकारी प्रदान की जाती है।  इससे भी आगे हम यह कहें कि हमें गैर भारतीय विचारधर्मियों से कम अपने ही समाज के और बौद्धिक तत्वों से अधिक चुनौती  है जो विदेशी विचाराधाराओं के सहारे यहां वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। इसमें हम जनवादी प्रगतिवादी विचाराधारा के सभी नहीं तो कुछ तत्वों को शामिल पाते हैं जिनको इस देश के समाज को गरीब, मजदूर, स्त्री, बालक,बीमार और बदहाल जैसे वर्गों में बांटकर कल्याण करने का शौक है।  </p>
<p>यहां हमारा आशय हिन्दू धर्म और उसके ग्रंथों के आलोचकों को उत्तर देना नहीं वरन् समान विचारधार्मियों को यह समझाना है कि वह अपने तर्क ठोस ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पाते और परिणाम स्वरूप उत्तेजना या गुस्से में ऐसी अभिव्यक्ति करते हैं जो उनके लिये उचित नहीं है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति सदैव  नवनिर्माण, सौम्य विकास और वैचारिक प्रवाह की निरंतरता की पोषक है।  इस धरा की ऊर्जा मनुष्य में ज्ञान और विज्ञान  की धारा को प्रवाहित रखती है जिससे यहां अध्यात्मिक और भौतिक ज्ञान का सदैव भंडार रहता है।<br />
वेदों की रचना प्रारंम्भिक काल में हुई।  इसकी रचना का काल खंड कोई प्रमाणिक रूप से नहीं जानता क्योंकि इनमें ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों तथा महापुरुषों ने अपने अथक प्रयासों से इसमें अपना ज्ञान प्रस्तुत किया और वह इतने निष्कामी और निष्प्रयोजक दयालु थे कि आत्मप्रचार से बचने के लिये नाम भी नहीं लिखते थे।   हमारे देश में अध्यात्मिक ज्ञान के लिये निरंतर अन्वेषण होता रहा है इसलिये यह कहना कठिन है कि किसी एक महापुरुष ने इसकी रचना की होगी।  कहने वाले तो यह कहते हैं कि दुनियां में कहीं भी कही या लिखी गयी अच्छी और समाज हित की बात वेद का ही हिस्सा है या इसे यूं कहें कि वह वेदों में कही जा चुकी है। हम यहां वेदों का महत्व साबित नहीं करने जा रहे बल्कि हिन्दू धर्म समाज की उस सतत प्रवाहित वैचारिक धारा की चर्चा कर रहे जिससे अन्य धार्मिक समाज दूर रहते हैं।  वेद या मनुस्मृति की आलोचना या चर्चा कर हमारे समाज को रास्ते से हटाने का प्रयास सदियों से चल रहा है और इसे समझना होगा क्योंकि आज का समाज केवल इनके सहारे आगे नहीं बढ़ रहा। हम यहां बाल्मीकी रामायण, श्रीमद्भागवत, महाभारत और श्री मद्भागवत गीता जैसे वह ग्रंथ क्यों भूल जाते हैं जिनसे आज के समाज का सर्वाधिक प्रयोजन है।   वेदों या मनुस्मृति में अवर्ण जातियों तथा स्त्रियों के लिये जो बातें तत्कालीन संदर्भों में कही गयीं उनका संदर्भ हमें पता नहीं है पर उनको वर्तमान में कौन मानता है? जो मानते हैं उनको समाज के ज्ञानी लोग ही मूर्ख कहते हैं।  फिर समाज जैसे जैसे आगे बढ़ता गया अन्य रचनायें होती गयीं और वेदों से उचित ज्ञान उनमें समावेश किया गया।   आज केवल धर्म में विशिष्टता प्राप्त करने के जिज्ञासु ही इन धर्म ग्रंथों को पढ़ते हैं पर अन्य सामान्य व्यक्ति इनके बारे में अधिक नहीं समझता। </p>
<p>कहा जाता है कि वेदों में असंख्य श्लोक थे पर अब हजारों में उपलब्ध हैं? इसका मतलब यह नहीं है कि श्लोक कहीं खो गये बल्कि उनको कहीं न कहीं संजो कर रखा जाता रहा इसलिये वेदों के प्रति यह समाज उदासीन होता चला गया।  सच बात तो यह है कि वेदों में जो तत्व ज्ञान है उसे तो अनेक लोगों ने अपनी रचनाओं में स्थान दिया।   वेदों में भी दो तरह की ज्ञान ही हो सकता था-एक तो दैहिक-भौतिक तथा दूसरा अभौतिक-अध्यात्मिक।  इनमें दैहिक तथा भौतिक ज्ञान तो समय के साथ परिवर्तित होता है पर अभौतिक तथा अध्यात्मिक ज्ञान में परिवर्तन नहीं आता और यही मनुष्य मन के लिये लाभदायी होता है।  इसी अव्यक्त और अध्यात्मिक ज्ञान को संजोए रखने के लिये प्रयास हुए जिसके कारण समाज वेदों से उदासीन है।<br />
भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का मूल तत्व निष्काम कर्म और  निष्प्रयोजन दया जैसे अनेक संदेश हैं। वेदों से उदासीन होने का कारण भगवान श्री कृष्ण जी की गीता भी रही। चारों वेदों का सार उसमें आ गया-सच कहें तो श्रीकृष्ण ने अपनी  अलौकिक बुद्धि से  चारों वेदों का सार जिस तरह प्रस्तुत किया उससे तो उन्हें इस विश्व का प्रथम  संपादक कहकर मन गद्गद् कर उठता है।  उन्होंने न केवल वेदों के तत्व ज्ञान का इसमें समावेश किया बल्कि दैहिक एवं भौतिक संसार को समझने का विज्ञान भी दिया।<br />
उस दिन एक सज्जन ने कहा कि ‘भला बताईये, आयुर्वेद की कौनसी शिक्षा इसमें शामिल है।’<br />
इसका जवाब है कि ‘आयुर्वेद में बीमारियों की दवा से बचने के अलावा उनके इलाज की चर्चा है मगर भगवान श्रीकृष्ण जी ने उनसे बचने का उपाय भी बताया और इलाज भी। उन्होंने बीमारियों से बचने के लिये उचित खानपान का ज्ञान दिया तो इलाज के लिये प्राणायम का उपाय भी बताया।’<br />
यह दुनियां का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान और विज्ञान दोनों ही शामिल है।  इसमें शामिल  हिन्दूओं का समग्र ज्ञान है और वह भी संक्षिप्त रूप से। ऐसा कुशल संपादन कौन संपादक कर सकता था?<br />
आधुनिक काल के हिन्दी भाषी लेखकों ने अपनी कलम विचाराधाराओं के द्वंद्व पर अधिक चलाई पर वैश्विक काल-जीं हां, अंतर्जाल पर लिखने के साथ ही इसकी शुरुआत हुई क्योंकि वह रूढ़ हो चुके संस्थानों की पकड़ से बाहर निकली है-के हिन्दी लेखकों को वेदों के महत्व बताने की बजाय अपने संपूर्ण अध्यात्मिक ग्रंथ का प्रतीक श्रीगीता में ही आलोचकों के उत्तर ढूंढने चाहिये।  उससे अगर संतुष्ट न हों तो बाल्मीकी रामायण और श्रीमद्भागवत का अध्ययन करें।  वेदों और मनुस्मृति पर विवाद या (कु)चर्चा करने में समय बरबाद करना व्यर्थ है। हमारा समाज निरंतर चलता रहता है और कहीं एक जगह अटक कर रह जाना उसकी फितरत नहीं है।  यह अलग बात है कि श्रीगीता में जो ज्ञान दिया है वह हर युग की दृष्टि से स्थिर रहने वाला है और यही हमारी सबसे बड़ी  ताकत है।<br />
दरअसल भारत में एक बौद्धिक वर्ग है जिसे यह अध्यात्मिक ज्ञान नहीं सुहाता।  वह खुशहाल समाज नहीं देखना चाहता बल्कि समाज में व्याप्त आर्थिक गरीब, जातीय विवाद तथा सामाजिक रूढ़ियों के प्रतिवाद में अपनी जगह तलाशता है।  ऐसा नहीं है कि यह साठ या सत्तर साल पुरानी  बात है बल्कि यह कबीर जी के समय से ही चल रहा है।  भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के चरित्रों की कहानियां सुनाकर कुछ लोगों ने अपने अध्यात्मिक ज्ञानी होने का ढोंग रचाया जिसको दिखाकर हिन्दू धर्म के आलोचक अधिक बौखला जाते हैं। भले ही ऐसे लोग ढोंगी हैं पर धर्म प्रवाह में उनकी एक भूमिका है जो वह अनजाने में ही निभा जाते हैं।  हिन्दू धर्म के आलोचक उन जैसे नहीं बन सकते क्योंकि उन्होंने धर्म ग्रंथ पढ़े नहीं है पर उन जैसा पुजना चाहते हैं। इसलिये आप सुनते होंगे कि कुछ लोगों के नाम लगी उपाधियों-‘गरीबों के मसीहा, शोषितों के मसीहा, नारी कल्याण के प्रतीक।</p>
<p>कहने कहा तात्पर्य यह है कि समय के साथ ही हमारे महापुरुष, तपस्वी, ऋषि और मुनि वेदों से प्रदत्त ज्ञान को इस तरह लेकर आगे चले कि उनमें परिवर्तित होने वाला दैहिक तथा भौतिक ज्ञान जो अप्रासंगिक हो गया है उसे छोड़ दिया जाये। हां, जो तत्व ज्ञान है उसे किसी ने नहीं छोड़ा।   हमारी इस पावन धरा पर समय समय महापुरुष आते हैं यह उसका गुण है और उसी तरह समाज का भी यह गुण है कि वह उनके संदेशों के साथ अपना रास्ता बनाता जाता है।  किसी एक पुस्तक या महापुरुष से चिपक कर केवल उसे ही मान लेना मानसिक दृढ़ता का नहीं बल्कि वैचारिक संकीर्णता का प्रतीक है। फिर वैश्विक काल के हिन्दी लेखकों को यह नहीं भूलना चाहिये कि उनका असली संघर्ष गैर भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा मानने वालों से नहीं वरन् कथित रूप से अपनी विचाराधारा वाले लोगों से ही है।<br />
वह वेद की बात करें तो तुम उनको बाल्मीकी रामायण, श्रीमद्भागवत और श्रीगीता दिखाओ-उन्हें बताओ कि यह है हमारी ताकत।  वह तो वेद और मनुस्मृति पर चर्चा करेंगे क्योंकि उनको इन तीनों महांग्रथों से खौफ लगता है। श्रीगीता के बारे में तो कहना ही क्या? वह इसका नाम भी नहीं लेंगे क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने इसमें संदेश ही इस तरह दिया है कि पढ़ लिख चाहे जो भी ले पर जब तक वह हृदय से उनके प्रति श्रद्धा नहीं दिखायेगा वह समझेगा नहीं और जो उनको मानेगा ही नहीं तो उसकी जुबां से श्रीगीता का नाम निकलेगा ही नहीं और कान से सुनते ही उसकी नसों में भय दौड़ने लगेगा। याद रखो कि वेद और मनुस्मृति पर (कु) केवल विचलित करने के लिये की जाती है और  बाल्मीकी रामायण, श्रीमद्भागवत तथा श्रीगीता की बात करने का उन लोगों  में नहीं है। सच बात तो यह है कि वेदों और मनुस्मृति पर उनसे (कु)चर्चा कर उनके जाल में ही फंसना है। आखिर हम उनके ऐजेंडे पर ही बहस क्यों करें वह हमारे ऐजेंडे पर बहस क्यों नहीं करते? वह वेदों और मनुस्मृति को उठाते हैं पर श्रीगीता से उनकी परहेज क्या उनकी दुर्भावना का प्रतीक नहीं है?शेष फिर कभी<br />
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-मंदिरों में तोड़फोड़ करना वाले लोग गंदे (mandiron men todfod-chankya niti]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/12/todfor-galat-chankya-niti/</link>
<pubDate>Sat, 12 Sep 2009 06:44:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/12/todfor-galat-chankya-niti/</guid>
<description><![CDATA[परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः। छली द्वेषी मृदः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते।। हिंदी में भाव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः।<br />
छली द्वेषी मृदः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>जो मनुष्य दूसरे के कार्यों को बिगाड़ने वाला, पाखंडी, अपना मतलबी साधने वाला, छलिया, दूसरों की उन्नति देखकर जलने वाला तथा बाहर से कोमल और अंदर कपट भाव रखने वाला है वह भले ही विद्वान क्यों न हो पशु के समान है।<br />
<strong>चापी-कूप-तडागानामाराम-सुर-वेश्मनाम्।<br />
उच्छेद निरऽऽशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>जो मनुष्य बावड़ी, कुआं तालाब, बगीचे और धर्म स्थानों में तोड़फोड़ और उनको नष्ट करने से जो डरते नहीं है वह भले ही विद्वान हों म्लेच्छ कहलाता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या</strong>-सभी को अपने जीवन में अपना स्वयं के धर्म और कर्म केंद्रित करना चाहिये। कुछ ऐसे मनुष्य भी हैं जो केवल धर्म का दिखावा करते हैं पर उनका लक्ष्य उसकी आड़ में व्यवसाय या उसके सहारे अपना समाज पर वर्चस्व स्थापित करना है। ऐसे लोग धर्म के आधार पर निकृष्ट कर्म करते हैं जो केवल पाप की श्रेणी में आते हैं। हालांकि कहा जाता है अशिक्षित और गंवार लोग ही ऐसे हैं जो धर्म की आड़ में पाप काम करते हैं पर चाणक्य महाराज की बात को देखें तो यह काम पहले भी विद्वान और शिक्षित लोगों के द्वारा होता रहा है। बस अंतर इतना है कि अब यह काम केवल विद्वान आर शिक्षित लोग ही कर नजर आते हैं। कथित अशिक्षित और गंवार लोगों को तो अपनी रोजी रोटी कमाने से ही आजकल फुरसत कहां मिल पाती है?<br />
देश, प्रदेश, और शहर की संपत्ति और धार्मिक स्थानों पर तोड़फोड़ करने वाले भारी पाप करते हैं और उनको एक तरह से म्लेच्छ कहा जाता है। चाहे अपने धर्म का हो या दूसरे धर्म का उसमें तोड़फोड़ करने वाले महापापी हैं और उनका कभी समर्थन न करे। ऐसे लोग धर्म के नाम पर विवाद कर समाज का ध्यान अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर उसका लाभ उठाते हैं। अगर हम उनकी तरफ देखें तो भी समझ लेना चाहिये कि पाप हो गया।<br />
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<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
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</item>
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<title><![CDATA[संत कबीर वाणी-दूसरों को सिखाते पर खुद नहीं सीखते]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/09/dusron-ko-sikhate-khud-sikhte-nahin/</link>
<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 03:30:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[लिखना पढ़ना चातुरी, यह संसारी जेव जिस पढ़ने सों पाइये, पढ़ना किसी न सेव संत कबीरदास जी कहते हैं कि स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>लिखना पढ़ना चातुरी, यह संसारी जेव<br />
जिस पढ़ने सों पाइये, पढ़ना किसी न सेव</strong><br />
संत कबीरदास जी कहते हैं कि संसार में अपनी जीविका चलाने की शिक्षा तो हर कोई प्राप्त करता है। यह चतुराई तो हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से आती है।  जिससे पढ़ने से अध्यात्म ज्ञान प्राप्त होता है वह कोई भी स्वीकार नहीं करना चाहता।<br />
<strong>पढ़ी गुनी पाठक भये, समुझाया संसार<br />
आपन तो समुझै नहीं, वृथा गया अवतार</strong><br />
स्वयं शिक्षा प्राप्त की और फिर  अपने शिष्यों को भी ज्ञान देने लगे पर जिन लोगों ने अपने आपको नहीं समझा उनका जीवन तो व्यर्थ ही गया। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ संपादकीय व्याख्या-</strong>अक्सर  अनेक लोग शिकायत करते हुए मिल जाते हैं कि उनके बच्चे उनसे परे हो गये हैं या उनकी देखभाल नहीं करते। इसके दो कारण होते हैं एक तो यह कि नये सामाजिक परिवेश से तालमेल न बिठा पाने के कारण लोग अपने माता पिता को त्याग देते हैं या फिर वह व्यवसाय के सिलसिले में उनसे दूर हो जाते है।  दोनो ही स्थितियों का विश्लेषण करें तो यह अनुभव होगा कि सभी माता पिता अपने बच्चों से यह अपेक्षा करते हैं कि वह इस मायावी दुनियां में उच्च पद प्राप्त कर, अधिक धनार्जन कर,  और प्रतिष्ठा की दुनियां में चमककर  उनका नाम रोशन करें। लोग बच्चों की कामयाबी के सपने देखते हैं और केवल सांसरिक शिक्षा तक ही अपने बच्चों को सीमित रखते हैं। किसी तरह अपना पेट पालो यही सिखाते हुए वह ऐसा अनुभव करते हैं कि जैसे कि वह दुनियां का कोई विशेष ज्ञान दे रहे हैं। यह तो एक सामान्य चतुराई है जिसे सब जानते हैं।<br />
यह उनका एक भ्रम है। यह शिक्षा तो सभी स्वतः ही प्राप्त करते हैं पर जिन बच्चों को उनके माता पिता इसके साथ ही अध्यात्म ज्ञान, ईश्वर भक्ति और परोपकार करना  सिखाते हैं वह अधिक योग्य निकलते हैं। जब तक आदमी मन में अध्यात्म का ज्ञान नहीं होगा तब वह न तो स्वयं कभी प्रसन्न रह पाता है और न ही दूसरों को प्रसन्न करता है।<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[ मंदिर कहीं, गर्व और गौरव कहीं-चिंत्तन आलेख (Temple somewhere, anywhere pride and glory -hindi Articles) ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/05/manid-kahin-garva-kahin-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Sat, 05 Sep 2009 05:26:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[वह एक ब्राह्म्ण लेखक का पाठ था-ऐसा उन्होंने अपने पाठ में स्वयं ही बताया था। उसने बताया कि राजस्थान क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वह एक ब्राह्म्ण लेखक का पाठ था-ऐसा उन्होंने अपने पाठ में स्वयं ही बताया था।  उसने बताया कि राजस्थान के सीमावर्ती गांवों में विभाजन के समय आये सिंधी किस तरह अपनी संस्कृति को संजोये हुए हैं। एक सिंधी ने उससे कहा कि ‘आपमें और हममें बस इतना अंतर है कि हम अभी कुछ समय पहले वहां से आये हैं और आप तीन चार सौ साल पहले बाहर से आये हैं।’<br />
उस लेखक ने इसी आधार  पर अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा कि बाहर से कितने ही आक्रांता इस देश के लूटने आये पर यहां के लोगों ने उनके विचारों में नयापन होने के कारण स्वीकार किया। यहां नित नित नये समाज बने।   उस लेखक ने यह भी लिखा है कि इस समाज की यह खूबी है कि वह नये विचारों को ग्रहण करने को लालायित रहता है।<br />
उस लेखक और इस पाठ के लेखकों में विचारों की साम्यता लगी और ऐसा अनुभव हुआ कि इस देश के इतिहास में कई ऐसी सामग्री हैं जिनका विश्लेषण नये ढंग से किया जाना चाहिये।  हुआ यह है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति से शिक्षित इस देश बौद्धिक समाज दूसरे द्वारा थोपे गये विषयों पर विचार भी उनके ढंग से करता है।  पिछले तीस चालीस वर्ष के समाचार पत्र पत्रिकायें उठाकर देख लीजिये इतिहास की गिनी चुनी घटनाओं के इर्दगिर्द ही नये ढंग से विचार ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे नया हो।<br />
अधिकतर तो हम पिछले बासठ वर्ष के इतिहास पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं तो कभी कभी हजारों वर्ष पीछे चले जाते हैं।  इन सबमें हम अपना गौरव ढूंढने से अधिक कुछ नहीं करते।  इससे कभी निराशा का भाव आता है। दरअसल हमारी समस्या यह है कि हम यथास्थिति से आत्ममुग्ध हैं और उसमें अपना गौरव ढूंढना ही अधिक सुविधाजनक लगता है।<br />
इसमें एक गौरव पूर्ण बात कही जाती है कि हिन्दू धर्म कभी इतना विस्तृत था कि उसका विस्तार मध्य एशिया तक था। मध्य एशिया में बने हिन्दू मंदिरों को अपना गौरव बताने की यह प्रवृत्ति हमारे देश में बहुत है।  इसके पीछे वास्तविकता क्या है और नये संदर्भों में हम उसे कैसे देखें? यह विचार करने का साहस कोई विद्वान नहीं करता।  आईये हम कुछ इस पर प्रकाश डालें। </p>
<p>एक पश्चिमी विद्वान ने खोजकर बताया था कि मनुष्य की उत्पति दक्षिण अफ्रीका में हुई। वह वहां बिल्कुल बंदरों की तरह था।  उसके बाद वह भारत आया और वहां उसने ज्ञान प्राप्त किया फिर वह मध्य एशिया में गया जहां उसने सभ्यता का नया स्वरूप प्राप्त किया।  फिर वह भारत की तरफ लौटा और बौद्धिक रूप से परिष्कृत होकर उसके बाद अन्य स्थानों पर गया। हम इसे अगर सही माने तो आज भी कुछ नहीं बदला।  भारत आकर इंसान ने यहां की आबोहवा मेें राहत अनुभव की और अपने प्रयोग से उसने सत्य का ज्ञान प्राप्त किया। उसके प्रचार के लिये वह मध्य एशिया में गया जहां उसे सांसरिक और भौतिकता का ज्ञान भी मिला।  दोनों ही ज्ञानों में संपन्न होने के बाद वह पूरे विश्व में फैला।  इसमें एक बात निश्चित रही कि जिस तत्व ज्ञान की वजह से भारत विश्व में अध्यात्मिक गुरु है उसका आभास इसी धरती पर होता है। मुश्किल यह है कि तत्व ज्ञान अत्यंत सूक्ष्म और संक्षिप्त है और बाह्य रूप से उसका आकर्षण दिखता नहीं है। जब इंसान अपने अंदर की आंखों खोले तभी उसका महत्व उसे अनुभव हो सकता है। </p>
<p>भारत में हमेशा ही प्रकृति की कृपा रहने के साथ जनसंख्या का भी घनत्व हमेशा अधिक रहा है इसलिये यहां हमेशा आदमी खातापीता रहा हैं इसके विपरीत अन्य देशों में इतना प्राकृतिक कृपा नहीं है इसलिये यहां का भौतिक आकर्षण विदेशियों को हमेशा ही यहां खींच लाता है।  इनमें कुछ पर्यटक के रूप में आते हैं तो कोई आक्रांता के रूप में।<br />
विदेशों से यहां आवागमन हमेशा रहा है और तय बात है कि विदेशों से जो लोग आये उनकी सभ्यता भी यहां मिलती गयी। यही कारण है कि हम अनेक समाजों के कर्मकांडों में विविधता देखते हैं। इतिहासकारों के अनुसार भारत में मूर्तिपूजा का प्रवृत्ति मध्य एशिया से आयी है।   उनकी बात में दम इसलिये भी नजर आती है कि भारतीय धर्म ग्रंथों में यज्ञ हवन आदि की चर्चा तो होती है पर मूर्ति पूजा यहां के मूल धर्म का भाग हो ऐसा नहीं लगता।  रामायण काल में भी रावण द्वारा यज्ञों में विध्वंस पैदा करने की घटनाओं की चर्चा होती है पर मंदिर आदि पर हमला कहीं हुआ हो इसकी जानकारी नहीं मिलती।<br />
श्रीगीता में भी द्रव्य यज्ञ और ज्ञान यज्ञ की चर्चा होती है। द्रव्य यज्ञ से आशय वही यज्ञ हैं जिनमें धन का व्यय होता है और निश्चित रूप से उनका आशय उन यज्ञों से है जिनमें भौतिक सामग्री का प्रयोग होता है।<br />
इतिहास में इस बात की चर्चा होती है कि मध्य एशिया में किसी समय अनेक देवी देवताओं की पूजा होती थी और इस कारण वहां सामाजिक वैमनस्य भी बहुत था।  लोग अपने देवी देवताओं को श्रेष्ठ बताने के लिये आपस में युद्ध करते थे।  इन देवी देवताओं की संख्या भारत में वर्तमान में प्रचलित देवी देवताओं से कई गुना अधिक थी।<br />
इतिहासकारों के अनुसार वहां एक राजा हुआ जो सूर्य का उपासक था।  उसने सूर्य को छोड़कर अन्य देवी देवताओं  की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया।  दरअसल उसका मानना था कि सूर्य ही सृष्टि का आधार है और  वही पूज्यनीय है।  उसने अन्य देवी देवताओं के मंदिर और मूर्तियां तुड़वा दीं। इससे लोग नाराज हुए और उसे इतिहास का क्रूर राजा माना गया। बाद में उस राजा की हत्या हो गयी। इतिहासकार मानते हैं कि भले ही उसकी जनता उससे नाराज थी पर उसने यह सत्य स्थापित तो कर ही दिया कि इस सृष्टि का स्वामी एक परमात्मा है।<br />
कुछ इतिहासकार कहते हैं कि उस राजा के मरने के बाद फिर पुनः विभिन्न देवी देवताओं की पूजा होने लगी।  नतीजा फिर आपसी संघर्ष बढ़ने लगे और यह तब तक चला जब तक वहां एक ईश्वर का सिद्धांत ताकत के बल पर स्थापित नहीं हो गया।<br />
दरअसल हम इतिहास पर विचार करें तो मूर्ति पूजकों और उनके विरोधियों का संघर्ष वहीं से होता भारत तक आ पहुंचा।  भारत में इसे अधिक महत्व नहीं मिला क्योंकि यहां तत्व ज्ञान हमेशा ही अपना काम करता रहता है।  यह तत्वज्ञान श्रीगीता में पूरी तरह वर्णित है।  इसके अलावा एक अन्य बात यह भी है कि भारतीय समाज मानता है कि समय समय पर महापुरुष पैदा होकर समाज सुधार के लिये कुछ न कुछ करते रहते हैं और उनका यह विश्वास गलत नहीं है।  आधुनिक काल में कबीर, तुलसी, रहीम, मीरा, रैदास तथा अन्य संत कवियों ने अपनी रचनाओं ने केवल तत्व ज्ञान का प्रचार किया बल्कि भक्ति के ऐसे रस का निर्माण किया जिसके सेवन से यह समाज हमेशा ही तरोताजा रहता है।  इसके विपरीत जहां नवीन विचारों के आगमन पर रोक है वह समाज जड़ता को प्राप्त हो गये हैं।<br />
पूर्व में ऋषियों मुनियों और तपस्वियों द्वारा खोजे गये तत्व ज्ञान तथा आधुनिक काल के संत कवियों के भक्ति तत्व का प्रचार हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं।  अगर हम यह  कहते हैं कि मध्य एशिया में फैले मंदिर हमारे गौरव हैं तो यह भी याद रखिये वह मंदिर हमारे तत्वज्ञान और भक्ति भाव का प्रतीक नहीं है। इसके अलावा सूर्य मंदिरों का मध्य एशिया में होना तो कोई अजूबा नहीं है क्योंकि वहां कभी उनकी पूजा होती है।  हम उनके साथ अपनी संस्कृति और सभ्यता को नहीं जोड़ सकते क्योंकि उनके साथ आपसी खूनी संघर्षों का इतिहास भी जुड़ा है। कहने को तो भारत में भी विभिन्न धार्मिक मतों को लेकर विवाद होते रहे हैं पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि इसको लेकर किसी ने किसी पर हमला किया हो।<br />
हमारी वर्तमान सभ्यता, संस्कृति और धर्म अनेक तरह के प्रयोगों के दौर से होते हुए वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुआ है।  इसके आधार स्तंभ तत्व ज्ञान और भक्ति ही हमारी वास्तविक पहचान है।  एक बात याद रखिये इतिहासकार कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका से चलकर इंसान भारत में ज्ञानी हुआ और फिर प्रचार के लिये मध्य एशिया में गया जहां उसे अन्य ज्ञान मिला। वह उसे प्राप्त कर यहां लौटा फिर पूरी तरह से परिष्कृत होकर अन्य जगह पर गया।  इसका आशय यह है कि अतीत का गौरव जो हमारे देश में यहीं को लोगों की तपस्य और परिश्रम से निर्मित हुआ है  वही श्रेष्ठ है और उससे आगे की सीमा का  गौरव तो धूल धुसरित हो गया है।  यह वहां रहे लोगों को तलाशना है उस पर हमें गर्व करना बेकार है। इसलिये कहीं मध्य एशिया के पुराने मंदिर ही नहीं बल्कि पश्चिम देशों में बनने वाले मंदिरों में अपने धर्म का गौरव ढूंढना का प्रयास किसी को अच्छा लग सकता है पर अघ्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि यह केवल एक क्षणिक मानसिक सुख है और इसका उस ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है जिसकी वजह से यह देश विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है।<br />
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<title><![CDATA[धार्मिक भेदभाव की शिकायत बेमानी-आलेख Meaningless complain of religious discrimination - hindi articles]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/22/dharm-ke-adhar-par-bhedbhav-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Sat, 22 Aug 2009 15:48:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/22/dharm-ke-adhar-par-bhedbhav-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[जहां तक नस्ल, जाति, भाषा और धर्म के आधार पर भेदभाव का प्रश्न है तो यह एक विश्वव्यापी समस्या है। इसे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>जहां तक नस्ल, जाति, भाषा और धर्म के आधार पर भेदभाव का प्रश्न है तो यह एक विश्वव्यापी समस्या है।  इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि यह एक मानवीय स्वभाव है कि मनुष्य  समय पड़ने पर अपनी नस्ल, जाति, भाषा और धर्म से अलग व्यक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करता है और काम पड़े तो उससे निकलवाता भी है।  भारत के बाहर नस्लवाद एक बहुत गंभीर समस्या माना जाता है पर जाति, भाषा और धर्म के आधार पर यहां भेदभाव होता है-इससे इंकार नहीं किया जा सकता।  इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि किसी भी व्यक्ति के साथ यह भेदभाव सामयिक होता है और इसका शिकार कोई भी हो सकता है। मुश्किल यह है कि इस देश में अग्रेजों ने जो विभाजन के बीज बोये वह अब अधिक फलीभूत हो गये हैं।  फिर स्वतंत्रता के बाद भी जाति, धर्म और भाषा के नाम पर विवाद चलाये गये ताकि लोगों का ध्यान उनमें लगा रहे-यह इस लेखक के सोचने का अपना यह  तरीका हो सकता है। इसके साथ ही बुद्धिजीवियों का एक वर्ग विकास का पथिक तो दूसरा वर्ग परंपरारक्षक बन गया। दोनों वर्ग कभी गुलामी की मानसिकता से  उबर नहीं पाये और जमीन वास्तविकताओं से परे होकर केवल नारे और वाद के सहारे चलते रहे।  प्रचार माध्यमों में भी यही बुद्धिजीवी हैं जिनके पास जब कोई काम या खबर नहीं होता तो कुछ खबरें वह फिलर तत्वों से बनाते हैं। फिलर यानि जब कहीं अखबार में खबर न हो तो कोई फोटो या कार्टून  छाप दो।  इनमें एक जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव का भी है।<br />
अभी एक अभिनेता ने शिकायत की थी कि उसको धर्म के कारण मकान नहीं मिल पा रहा।  सच तो वही जाने पर उसकी बात पर शुरु से ही हंसी आयी।  यकीन नहीं था कि ऐसा हो सकता है-इसके बहुत सारे तर्क हैं पर उनकी चर्चा करना व्यर्थ है।<br />
आज से 22 वर्ष पूर्व जब हम अपना मकान छोड़कर किराये के मकान में गये तो यह सोचकर परेशान थे कि समय कैसे निकलेगा?  बहरहाल दो साल उस किराये के मकान में गुजारे। फिर एक दिन मकान मालिक से एक रात झगड़ा हुआ। हमने घोषणा कर दी कि परसों शाम तक मकान खाली कर देंगे।<br />
हमने यह घोषणा की थी झगड़ा टालने के लिये पर मकान मालिक ने कहा कि-‘ अगर नहीं किया तो&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..’’<br />
हमने मकान ढूंढ लिया। हम मकान देखने गये वहां मालकिन से बात  हुई।  जातिगत या कहें कि भाषाई दृष्टि से अलग होने के बावजूद एक समानता थी कि दोनों के पूर्वज विभाजन के समय इधर आये थे-भारत पाकिस्तान विभाजन पर हमारी राय कुछ अलग है उस पर फिर कभी। यह हमारी किस्मत कहें कि मकान मिल गया।  अगले दिन हम मकान खाली कर सामान गाड़ी से लेकर उस मकान में पहुंचे।  सामान उतारने से पहले हमने उस मकान का दरवाजा खटखटाया तो मकान मालिक बाहर निकले। हमने कहा-‘ हम सामान ले आयें हैं।’<br />
पीछे मकान मालकिन भी आ गयी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ लग रहा था। मकान मालिक ने कहा-‘भाई साहब हम आपको जानते नहीं है। इसलिये&#8230;..’’<br />
इसी बीच एक अन्य सज्जन भी बाहर आये और मुझे देखकर बोले-’’अरे, तुम यहां कैसे? अरे, भई यह तो बहुत बढ़िया लड़का है।’<br />
वह उस मकान मालिक के बहनोई थे और व्यापारिक रिश्तों की वजह से हमें जानते थे। यह अलग बात है कि तब हम व्यापार से अलग हो चुके थे।<br />
बहरहाल हम मकान के अंदर पहुंच गये।  माजरा कुछ समझ में नहीं आया।<br />
बाद में मकान मालिक ने बताया कि ‘आपको तो हमारे पति वापस भेजने वाले थे। वह तो हमारे ननदोई जी ने आपको अच्छी तरह पहचान लिया इसलिये इन्होंने नहीं रोका। यह आपके आने से चिंतित थे इसलिये अपने बहनोई को बुला लिया था कि किसी तरह आपको वापस भेज दें।  हमारे पति  कह रहे थे कि ‘उनकी जाति/भाषा वाले लोग झगड़ालू होते हैं।’<br />
हम उनके मकान में दो किश्तों में चार साल रहे।  पहले वह मकान खाली किया और फिर लौटकर आये। वह मकान मालिक मुझे आज भी अपना छोटा भाई समझते हैं। मान लीजिये उस दिन उनके बहनोई नहीं आते या पहचान के नहीं निकलते तो&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.हमें उस मकान से बाहर कर दिया जाता। तब हम कौनसे और क्या शिकायत करते।<br />
अपने मकान के बाद फिर अपने मकान पहुंचने में हमें बारह बरस लगे। चार मकान खाली किये। चार मकान देखे।  कुछ मकान मालिकों ने प्याज खाने की वजह से तो कुछ लोगों ने जाति की वजह से मकान देने से मना किया।  हर हाल में रहे हम लेखक ही। जानते थे कि यह सब झेलने वाले हम न पहले हैं न आखिरी!  हमारा जीवन संघर्ष हमारा है और वह हमें लड़ना है।<br />
हो सकता है कई लोग मेरी इस बात से नाराज हो जायें कि हमने बचपन से बकवास बहुत सुनी है जैसे  जनकल्याण, प्रगति, सामाजिक धार्मिक एकता, संस्कार और संस्कृति की रक्षा, समाज का विकास और भी बहुत से नारे जो सपनों की तरह बिकते हैं। इस देश में आम आदमी का संघर्ष हमेशा उसकी व्यक्तिगत आधार पर निर्भर होता है। अपने जीवन संघर्ष में हमने या तो अपनी भाषा और जाति से बाहर  के मित्रों से सहयोग पाया या फिर अपने दम पर युद्ध जीता।  एक जाति के आदमी ने सहयोग नहीं दिया पर उसी जाति के दूसरे आदमी ने किया।  सभी प्रकार की जातियों और अलग अलग प्रदेशों के लोगों से मित्रता है-इस लेखक जैसे इतने विविध संपर्क वाले लोग इस देश में ही बहुत कम लोग होंगे भले ही विविधता वाला यह देश है।   लेखक होने के नाते सभी से सम्मान पाया।  जिस तरह धर्म और भक्ति एकदम निजी विषय हैं वैसे ही किसी व्यक्ति का व्यवहार! आप एक व्यक्ति के व्यवहार के संदर्भ में पूरे समाज पर उंगली उठाते हैं तो  हमारी नजर में आप झूठ बोल रहे हैं या निराशा ने आपको भ्रमित कर दिया है।<br />
मुश्किल यही है कि बुद्धिजीवियों का एक तबका इसी भेदभाव को मिटाने की यात्रा पर निकलकर देश में प्रसिद्ध होता रहा है तो बाकी उनकी राह पर चलकर यही बात कहते जाते हैं।  इधर विश्व स्तर पर कुछ ऐसे लेखक पुरस्कृत हुए हैं तो फिर कहना ही क्या? आप ऐसे विषयों पर रखी बातें इस लेखक के सामने रख दीजिये तो बता देगा कि उसमें कितना झूठ है।  पांचों उंगलियां कभी बराबर नहीं होती। एक परिवार में नहीं होती तो समाज में कैसे हो जायेंगी? फिर एक बात है कि सामाजिक कार्य में निष्क्रिय लोगों की संख्या अधिक हो सकती है पर मूर्खों और दुर्जनों की नहीं। भेदभाव करने वाले इतने नहीं है जितना समभाव रखने वाले।<br />
अभी एक ब्लाग लेखक ने लिखा कि एक हिन्दू ने मूंह फेरा तो दूसरे ने मदद  की। अब उसका लिखना तो केवल मूंह फेरने वाले पर ही था। वह उसी परिप्रेक्ष्य में भेदभाव वाली बात कहता गया।  हम आखिर तक यही सोचते रहे कि उस मदद करने वाले की मदद कोई काम नहीं आयी। यह नकारात्मक सोच है जो कि  अधिकतर बुद्धिजीवियों में पायी जाती है। हमने सकारात्मक सोच अपनाया है इसलिये यही कहते हैं कि सभी एक जैसे नहीं है। हां, अगर लिखने से नाम मिलता है तो लिखे जाओ। हम भी तो अपनी बात लिख ही रहे हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीतिः ख़ुद की  मूल प्रवृत्ति   के विरुद्ध  कार्य न करें (mool pravrutti aur kam)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/09/vidur-niti-in-hindi/</link>
<pubDate>Sun, 09 Aug 2009 07:42:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/09/vidur-niti-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा। गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।। हिंदी में भावार्थ-न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।<br />
गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर जी कहते हैं कि जो अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करते हैं वह कभी नहीं शोभा पाते। गृहस्थ होकर अकर्मण्यता और सन्यासी होते हुए विषयासक्ति का प्रदर्शन करना ठीक नहीं है। </p>
<p><strong>द्वाविमौ कपटकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषिणी।<br />
यश्चाधनः कामयते पश्च कुप्यत्यनीश्वरः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अल्पमात्रा में  धन होते हुए भी  कीमती वस्तु को पाने की कामना और शक्तिहीन होते हुए भी क्रोध करना मनुष्य की देह के लिये कष्टदायक और कांटों के समान है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या </strong>-किसी भी कार्य को प्रारंभ करने पहले यह आत्ममंथन करना चाहिए कि हम उसके लिये या वह हमारे लिये उपयुक्त है कि नहीं।  अपनी शक्ति से अधिक का कार्य  और कोई वस्तु पाने की कामना करना स्वयं के लिये ही कष्टदायी होता है।<br />
न केवल अपनी शक्ति का बल्कि अपने स्वभाव का भी अवलोकन करना चाहिये। अनेक लोग क्रोध करने पर स्वतः ही कांपने लगते हैं तो अनेक लोग निराशा होने पर मानसिक संताप का शिकार होते हैं। अतः इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि हमारे जिस मानसिक भाव का  बोझ हमारी यह देह नहीं उठा पाती उसे अपने  मन में ही न आने दें।<br />
कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम कोई काम  या कामना करते हैं तो उस समय हमें अपनी आर्थिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति का भी अवलोकन करना चाहिये। कभी कभी गुस्से या प्रसन्नता के कारण हमारा रक्त प्रवाह तीव्र हो जाता है और हम अपने मूल स्वभाव के विपरीत कोई कार्य करने के लिये तैयार हो जाते हैं और जिसका हमें बाद में दुःख भी होता है। अतः इसलिये विशेष  अवसरों पर आत्ममुग्ध होने की बजाय आत्म चिंतन करते हुए कार्य करना चाहिए।<br />
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<p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अनंत शब्दयोग को विश्व में आठवीं वरीयता मिली-संपादकीय (top ranking 8 in world]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/14/editorial-on-anant-shabd-yog/</link>
<pubDate>Tue, 14 Jul 2009 16:33:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/14/editorial-on-anant-shabd-yog/</guid>
<description><![CDATA[यह एलेक्सा की चूक भी हो सकती है और सच भी कि इस लेखक के &#8216;अनंत शब्दयोग&#8217; ब्लाग को विश्व में]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>यह एलेक्सा की चूक भी हो सकती है और सच भी  कि इस लेखक के <a href="http://anantraj.blogspot.com">&#8216;अनंत शब्दयोग&#8217;</a> ब्लाग को विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त है। पिछले सप्ताह यह सातवें नंबर पर था। इस समय यह विकिपीडिया के पीछे है। इसके लेखक ने ऐलेक्सा की टाॅप साईटस देखी तो वहां blogger.com रहा  हैं और जब वहां क्लिक करते हैं तो ब्लाग खाता खोलने वाला ब्लाग सामने आ जाता है। एक बार इस लेखक ने टाप साईटस के लिये प्रयास किया तो एक जगह यह पता लगा कि भुगतान करने पर ही दसों साईटस का पता दिया जायेगा। इसका आशय यह है कि इन साईट में भी अन्य साईट छिपी हुई हैं।  वहां क्लिक करने के बाद एक ईमेल भी आया कि शायद आप प्रक्रिया पूरी नहीं कर सके इसलिये दोबारा कर सकते हैं इसका आशय यह है कि यह ‘अनंत शब्दयोग’ चूंकि ब्लागर काम के अंतर्गत हैं इसलिये उसे सीधे नहीं दिखा रहे हैं-क्योंकि इससे उनको कोई लाभ नहीं होगा।  </p>
<blockquote><p><strong><b>UrlTrends Quick Summary</b><br />
URL: <a href="http://www.urltrends.com/viewtrend.php?url=http%3A%2F%2Fanantraj.blogspot.com">http://anantraj.blogspot.com</a></p>
<p>Google PageRank: 3/10<br />
Alexa Traffic Rank: 8<br />
Incoming Google Links: 30<br />
Incoming Yahoo Links: 20,108<br />
Incoming MSN Links: 0<br />
Overall Incoming Links: 41,120 (Estimated 13,090 unique links)<br />
Outgoing Links: 11<br />
DMOZ Listed: No</p>
<p>Accurate as of: July 12th, 2009<br />
Source: <a href="http://www.urltrends.com/">UrlTrends</a><br />  </strong></p></blockquote>
<p>बहरहाल उन्होंने हमें अनंत शब्दयोग का लिंक  उठाने से नहीं रोका।  हम तो यही मानकर चल रहे हैं कि यह सही होगा अगर गलत भी हुआ तो परवाह किसे है पर यह तो इतिहास में दर्ज हो गया कि एक हिंदी ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’ को 12 जुलाई 2009 रविवार के दिन  विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त थी।  अभी तक अनेक लेखक किसी हिंदी ब्लाग के एक लाख से नीचे आने पर ही खुश हो जाते हैं ऐसे में सभी हिंदी ब्लाग लेखकों को यह सोचकर खुशी होना चाहिये कि उनके बीच में ही सक्रिय  ब्लाग विश्व की आठवीं वरीयता पा रहा है।  जो बात इतिहास में दर्ज हो गयी तो हो गयी। क्रिकेट के खेल में अंपायर की भूमिका सभी जानते हैं कि एक बार स्टंप के बाहर जाती हुई गेंद पर उसने बल्लेबाज को एल.बी.डब्लयू. दे दिया तो दे ही दिया। यह ब्लाग विकिपीडिया के बाद आठवें नंबर पर रहा तो इसे अब कोई बदल नहीं सकता।  अब यह ब्लाग हमेशा वहां बना रहेगा यह कहना कठिन है पर अब लेखक सोच रहा है कि क्यों न इस पर थोड़ा अधिक ध्यान दिया जाये और इसकी वरीयता ऊपर लायी जाये।  यहां यह भी याद रखें कि हमें यह जानकारी दूसरी वेबसाईट से मिली थी तब हमने प्रयास कर देखा तो पाया कि इसको आठवी वरीयता प्राप्त होने की बात सच थी।<br />
इस लेखक के बीस अन्य ब्लाग भी है-इसके अलावा दो जब्त हुए भी पड़े हैं-और उनमें सबसे अधिक वरीयता वर्डप्रेस के ब्लाग हिंदी पत्रिका को है जो कि 22 लाख के आसपास है।  बहरहाल इस ब्लाग का इतना ऊंचा पहुंचने से खुश होने की जरूरत नहीं है। कल को यह गिरा तो  अफसोस भी होगा।  वैसे हमने गंभीरता से इधर उधर देखा तो लगा कि इन रैक देने वाली वेबसाईटों मेें कुछ ऐसा है जो अभी तक भारत में कोई नहीं समझ सका।  फिर जो व्यूज बताने वाली वेबसाईटें हमने लगा रखी है वह सभी व्यूज बता पाती हैं यह भी दावे से नहीं कहा जा सकता। बहरहाल देखते हैं आगे क्या होता है?  वैसे कल हम एक लेख लिखकर यह आशा कर रहे थे कि कोई इसमें हमारी चूक बतायेगा पर यह नहीं हुआ। वैसे कोई हमें यह कहे कि हम गलती कर रहे हैं तो भी अफसोस नहीं खुशी होगी क्योंकि हमें अपना फ्लाप होना मंजूर है पर भ्रम में जीना नहीं।  हम तो स्वयं ही  धर्म, जाति, भाषा, और क्षेत्र के नाम पर समूह बनाकर भ्रम मेें जीते लोगों को यही संदेश देते हैं कि यह सब भ्रम है तब भला स्वयं कैसे यह मान सकते हैं कि सफलता के भ्रम में जियें।  अगर यह सच भी हो तो भी हम लिखते रहेंगे क्योंकि अपनी सफलता पर इतराना आगे नाकामी को दावत देना है। हां, यह सच है कि अगर सफल हो गये तो हमारी बात को आधिकारिक माना जायेगा। खैर, आगे आगे देखिये होता है क्या? अगर यह स्थिति अगले कुछ दिन तक रहती है और इस सफलता को प्रमाणिक मान लिया जाता है तो कुछ तथ्य ऐसे भी हैं जो इस ब्लाग को आठवी वरीयता प्राप्त होने को सच मानते हैं और हम इन पर तभी लिखेंगे जब स्वयं संतुष्ट हो जायेंगे। संतुष्ट नहीं है इसलिये तो किसी को धन्यवाद तक ज्ञापित नहीं कर रहे।  वैसे साईडबार में ऐलेक्सा से उठाया प्रमाणपत्र भी लगा दिया है। जिसे देखना हो देख ले। बस, यार कुछ उल्टा पुल्टा हो जाये तो हंसना नहीं क्योंकि हम तो वही लिख रहे हैं जो देख रहे हैं।<br />
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<blockquote><p><strong>यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://anantraj.blogspot.com">‘अनंत शब्दयोग’</a>पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।<br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर क दोहे-विषधर बहुत हैं, मणिधारी कम (sant kabir ke dohe)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/09/vishdhar-aur-manidhari-kabir-ke-dohe/</link>
<pubDate>Thu, 09 Jul 2009 15:40:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/09/vishdhar-aur-manidhari-kabir-ke-dohe/</guid>
<description><![CDATA[प्रीति कर सुख लेने को सुख गया हिराय जैसे पाइ छछुंदरी, पकडि सींप पछिताय संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>प्रीति कर सुख लेने को सुख गया हिराय<br />
जैसे पाइ छछुंदरी, पकडि सींप पछिताय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सुख प्राप्त करने के लिये लोग गलत संपर्क बना लेते हैं और फिर कष्ट उठाते हैं।  उस समय उनकी दशा ऐसी होती है जैसे सांप छछुंदर को पकड़ कर पछताता है</p>
<p><strong>कबीर विषधर बहु मिले, मणिधन मिला न कोय<br />
विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में विषधर सर्प बहुत मिलते हैं, पर मणि वाला सर्प नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाये तो विष भी अमृत बन जाये।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>संगति का प्रभाव आदमी पर अवश्य होता है। भले ही लोग स्वार्थ के लिये बुरे लोगों की संगति यह विचार कर करते हैं कि उसका कोई प्रभाव नहीं होगा पर यह उनका केवल विचार होता है। जब दुर्गुणी व्यक्ति की संगति की जाती है तो उसकी बातों का प्रभाव धीरे-धीरे पड़ता ही हैं और मन में कलुषिता का भाव आता ही है। इसके अलावा उसकी संगति से लोगों की दृष्टि में ही गिरते हैं और उसक द्वारा पापकर्म करने पर उसका सहभागी का संदेह भी किया जाता है। इससे अच्छा है कि दुष्ट और दुर्गुणी व्यक्ति के साथ संगति हीं नहीं की जाये। ऐसे लोगों के साथ ही अपना संपर्क बढ़ाया जाये जो भक्ति और ज्ञान रस के सेवन करने में दिलचस्पी लेते हों।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
<p>adhyatm, </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति-तनाव से नारी की सुन्दरता और पुरूष की शक्ति क्षय होती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/07/tanav-kamjor-karta-hai-vidur-niti/</link>
<pubDate>Tue, 07 Jul 2009 03:46:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/07/tanav-kamjor-karta-hai-vidur-niti/</guid>
<description><![CDATA[संतापाद् भश्यते रूपं संतापाद् भश्यते बलम्। संतापाद् भश्यते ज्ञानं संतापाद् व्याधिमृच्छति।। हिंदी में]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>संतापाद् भश्यते रूपं संतापाद् भश्यते बलम्।<br />
संतापाद् भश्यते ज्ञानं संतापाद् व्याधिमृच्छति।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>संताप से स्त्री का सौंर्दय और पुरुष का बल नष्ट होता है। संताप से ज्ञान नष्ट होता है और संताप से रोग प्राप्त होता है।<br />
<strong>अर्चयेदेव मित्राणि सति वासति वा धने।<br />
नानर्थयन् प्रजानाति मित्राणां सारफल्गुनताम्<br />
हिंदी में भावार्थ- </strong>मित्र धनवान हो या नहीं उसका सत्कार अवश्य करें। अपने किसी भी मित्र से कुछ न मांगें और न ही कभी उनके आचरण की परीक्षा लेने का प्रयास करें।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>यह मानवीय स्वभाव है कि वह स्वार्थ की वजह से संपर्क बनाता है पर मित्रता स्वाभाविक रूप से हो जाती है।   इसके बावजूद मित्रता का निर्वाह सभी नहीं कर पाते बल्कि अपना समय और स्वार्थ निकलते ही मित्र से नाता तोड़ लेते हैं। ऐसे स्वार्थी लोग अपने मित्र बनाते और बिगाड़ते हैं पर कभी विपत्ति में उनको कोई सहायता नहीं करता। मित्र विपत्ति में काम आते हैं इसलिये वह धनी हो या गरीब उनका सत्कार हमेशा करना चाहिए। </p>
<p>आजकल जीवन बहुत संघर्षमय हो गया है इसलिये तनाव स्वाभाविक रूप से होता है। यह तनाव स्त्री का सौंदर्य और पुरुष का बल नष्ट करता है।  अपनी देह, मन और वैचारिक शक्ति बनाये रखने के लिये योगासन और प्राणायम करते रहना चाहिए।  अधिक तनाव से अपना ज्ञान तो नष्ट होता ही है बल्कि तमाम तरह के रोग भी होते हैं।  अनेक मनोचिकित्सक यह कहते हैं कि मधुमेह, रक्तचाप तथा अन्य बीमारियों की उत्पति का कारण ही मानसिक तनाव होता है।  इसलिये योग साधना करने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान में भी रुचि लेना चाहिये जिससे मानसिक तनाव कम रहे।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भक्ति करते हुए शरीर के बारे में न सोचें-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/14/bhakti-aur-sharir-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Sun, 14 Jun 2009 01:27:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/14/bhakti-aur-sharir-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[स्नातो या यदि वाऽस्नातः शुचिवां यदि वाऽशुचि। विभूतिं विश्वरूपं च संस्मरन्सर्वदा शुचिः। हिंदी में भाव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>स्नातो या यदि वाऽस्नातः शुचिवां यदि वाऽशुचि।<br />
विभूतिं विश्वरूपं च संस्मरन्सर्वदा शुचिः।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>स्नान किया हो या न किया हो, देह पवित्र हो या अपवित्र पर जो मनुष्य  परमात्मा के विश्वरूप का स्मरण करता है वह सदा ही पवित्र है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>परमात्मा की सच्चे हृदय से भक्ति करने से ही मन और देह को शांति मिलती है।  अक्सर लोग यह कहते हैं कि स्नान आदि करके ही परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। इसके अलावा अनेक भक्त मूर्तियों पर फूल और जल चढ़ाकर उसे ही सच्ची भक्ति मान लेते हैं।  कई लोग तो केवल इसलिये भक्ति का वह तरीका अपना लेते हैं कि दूसरा भी ऐसा ही कर रहा है तो कुछ दूसरों को दिखाने के लिये कर्मकांड या हवन करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि  लोग कुछ अपने को तो कुछ दूसरों को दिखाने के लिये भक्ति करते हैं जबकि भक्ति, स्मरण और ध्यान हृदय से ही की जाना चाहिए। </p>
<p>आखिर यह कैसे पता चले कि हम भक्ति कर रहे हैं? जब हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान कर रहे हों तब किसी अन्य बात का विचार हमारे अंदर न आये तब यह समझना चाहिये कि हम हृदय से भक्ति कर रहे हैं। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जब हम जब परमात्मा के निरंकार स्वरूप का स्मरण प्रारंभ करते हैं तब उनका कोई स्वरूप हमारे मस्तिष्क में रहता है। उस पर ध्यान केंद्रित करते समय शुरुआत में हमारे अंदर तमाम तरह के विचार आते हैं। उन्हें आने दीजिये। उनके आने से अपना ध्यान लगाना बंद मत कीजिये। दरअसल वह विचार एक विकार के रूप में हमारे अंदर रहते हैं। ध्यान लगाते हुए हमारे अंदर जो ज्ञानाग्नि प्रज्जवलित होती है वही विकार उसमें पूर्णाहति की तरह  जलने आते हैं।   जब  दृढ़ता से अपने ध्यान में स्थिर रहेंगे तब धीरे धीरे अनुभव होगा कि हमारा ध्यान केवल भृकुटि पर ही केद्रित हो गया है और वहां हम आत्मिक रूप से केवल शून्य में स्थित हैं।  यह ध्यान की सबसे रोचक और चरम स्थिति है।<br />
स्मरण या ध्यान करने के बाद जब हम वापस लौटें तब हमें इस दुनियां में नवीनता का अनुभव हो तभी यह समझना चाहिए कि उसका लाभ हुआ है।  शुरुआत में शायद ऐसा न लगे पर हम ध्यान, भक्ति और स्मरण के तत्काल बाद यह  अनुभव करने का अभ्यास करें तो एसा  लगने लगेगा कि ध्यान के बाद प्रतिदिन एकदम नवीन  होता है।<br />
वैसे तो ध्यान या स्मरण दैहिक स्वच्छता के बाद करना चाहिए पर स्वास्थ्य खराब होने के कारण यह किसी अन्य वजह से नहाना न हो पाये तब भी उतने ही उत्साह से ही भक्ति, स्मरण और ध्यान करना चाहिए।  अगर अवकाश हो या समय मिल जाये तब चाहे जब ध्यान और स्मरण हो सकता है।  जैसे दोपहर के खाने के बाद ऐसा लगता है कि कुछ देर ध्यान करना  या कोई धार्मिक पुस्तक पुस्तक पढ़ना अच्छा रहेगा तो अपने विचार को इसलिये स्थगित न करें कि अस्वच्छ देह से ऐसा करना ठीक नहीं है।  तात्पर्य यह है कि भक्ति, स्मरण और ध्यान में दृढता पूर्वक अपन हृदय लगाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इससे मानसिक और वैचारिक तनाव कम होता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति-गाली के उत्तर में गाली न दें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/05/manu-smruti-gali-ke-badnle-gali-nahin/</link>
<pubDate>Fri, 05 Jun 2009 04:51:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/05/manu-smruti-gali-ke-badnle-gali-nahin/</guid>
<description><![CDATA[अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् न क्रुद्धयंन्तं प्रतिक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन<br />
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्<br />
न क्रुद्धयंन्तं  प्रतिक्रुध्येदाक्रृष्टः कुशलं वदेत्<br />
सप्तद्वाराऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>दूसरे के कड़वे वचनों को सहना करना चाहिये। अपशब्दों (गाली)का उत्तर कभी वैसा ही नहीं देना चाहिये। न ही किसी का अपमान करना चाहिये। यह शरीर तो नश्वर है इसके लिये किसी से शत्रुता करना ठीक नहीं माना जा सकता।<br />
<strong>अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः<br />
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह </strong><br />
<strong></strong><strong>हिंदी में भावार्थ</strong>-अध्यात्म विषयों में अपनी रुचि रखते हुए  सभी वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति निरपेक्ष भाव रखना चाहिये। इसके साथ ही शाकाहारी तथा  इद्रियों से संबंधित विषयो में निर्लिप्त भाव रखते हुए अपने अध्यात्म उत्थान के लिये अपने प्रयास करते रहना चाहिये। इससे मनुष्य सुखपूर्वक इस दुनियां में विचरण कर सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>खानपान और रहन सहन में आई आधुनिकता ने लोगों की सहनशीलता को कम कर दिया है।  लोग जरा जरा सी बात पर उत्तेजित होकर झगड़ा करने पर आमादा है।  स्वयं के पास कितना भी बड़ा पद,धन और वैभव हो पर दूसरे का सुख सहन नहीं कर पाते। गाली का जवाब गाली से देना के लिये सभी तत्पर हैं।  अध्यात्म विषय के बारे में लोगों का कहना है कि उसमें तो वृद्धावस्था में ही जाकर दिलचस्पी रखना चाहिये।  इस अज्ञानता का परिणामस्वरूप  आदमी वृद्धावस्था में अधिक दुखी होता हैं। अगर बचपन से ही अध्यात्म में रुचि रखी जाये तो फिर बुढ़ापे में आदमी को अकेलापन नहीं सताता।  जिसकी रुचि अध्यात्म में नहीं रही वह आदमी वृद्धावस्था में चिढ़चिढ़ा हो जाता है।  ऐसे अनेक वृद्ध लोग हैं जो अपना जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत करते हैं क्योंकि वह बचपन से मंदिर आदि में जाकर अपने मन की शुद्धि कर लेते हैंं और अध्यात्म विषयों पर चिंतन और मनन भी करते हैं।  </p>
<p>बदले की भावना इंसान को पशु बना देती हैं और वह तमाम तरह के ऐसे अपराध करने लगता है जिससे समाज में उसे बदनामी मिलती है।  कई लोग ऐसे हैं जो गाली के जवाब में गाली देकर अपने लिये शत्रुता बढ़ा लेते है। कुछ लोग ऐसे हैं जिनको अभद्र शब्द बोलने और लिखने में मजा आता है जबकि यह अंततः अपने लिये ही दुःखदायी होता है। अपने मस्तिष्क में अच्छी बात सोचने से रक्त में भी वैसे ही कीटाणु फैलते हैं और खराब सोचने से खराब। यह संसार वैसा ही जैसा हमारा संकल्प होता है। अतः अपनी वाणी और विचारों में शुद्धता रखना चाहिये। दूसरे के व्यवहार या शब्दों से प्रभावित होकर उनमें अशुद्धता लाना अपने आपको ही कष्ट देना है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.‘शब्दलेख सारथी’</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनु स्मृति-दूसरों के स्नानगृहों में नहाना नहीं चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/01/others-bathroom-and-washroom-manu-smruti/</link>
<pubDate>Mon, 01 Jun 2009 03:44:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/01/others-bathroom-and-washroom-manu-smruti/</guid>
<description><![CDATA[परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन। नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।। हिंदी में भावार्थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन।<br />
नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अन्य व्यक्तियों द्वारा बनवाये गये स्नान के लिये बनाये गये स्थानों-स्नानगृहों,सरोवरों और कुऐं आदि-पर नहाना नहीं चाहिए। वह स्नानगृह अगर पापों के धन से बनाये गये हैं तो उसमें नहाने वाला भी उसका भागी बनता है।<br />
<strong>यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्रह्यणि च।<br />
अदत्तान्युपयु´्जानः एनसः स्वात्तुरीभाक्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>वाहन, शैय्या, आसन, कुआं, उद्यान और भवन आदि का उपभोग  कुछ दान कर ही करना लाभदायक होता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>आजकल की व्यस्त एवं दीर्घसूत्रीय जिंदगी में यह देखना कठिन काम है कि हम कहीं बाहर जाकर रुक रहे हैं तो वहां का स्थान किस प्रकार के धन से बनाया गया है। वैसे भी आजकल बिना काले धन के यह कैसे संभव है कि समाज का भौतिक  विकास इतनी तीव्र गति से हो। ऐसे में भ्रष्ट और अनैतिक रूप से कमाये गये धन से बने आवास और स्नानगृहों में रहने और नहाने का प्रतिबंध स्वीकार करना संभव नहीं लगता।  बड़े बड़े शहरों में बड़े और आलीशान होटल बन गये हैं जिनमें स्वीमिंग पूल भी होते हैं।  अब यह कैसे कहा जा सकता है कि वह भ्रष्ट या अनैतिक धन से बने हैं या सात्विक धन से। वैसे तो आजकल धर्नाजन के कई ऐसे óात पवित्र माने जाते हैं जिनको पहले अपवित्र माना जाता था।  अतः इस बारे में अपने विवेक से विचार करना चाहिये।  </p>
<p>मगर सच तो यह है कि जिस प्रकार हम अपने जीवन में जिस प्रकार के व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में आते हैं उसके पाप पुण्य का प्रभाव हम पर होता है।  कहा जाता है कि ‘जैसे खायें अन्न वैसा हो मन’। इसका आशय यह तो है ही कि जिस प्रकार की वस्तु का हम उपभोग करेंगे वैसे ही प्रभाव हमारी देह के साथ ही हमारे मन और विचारों  पर होगा।  साथ ही  यह भी कि उसके आने का सात्विक मार्ग है या असात्विक इस बात का प्रभाव भी उसके उपभोग करने वाले पर होता है। तात्पर्य यह है कि अगर हमें लगता है कि कोई व्यक्ति या वस्तु-जिसके बारे में यह यकीन हो कि वह असात्विक प्रकृत्ति की है तो उससे अपने आपको दूर रखना चाहिये।  यह ठीक है कि आजकल की भागम भाग जिंदगी में यह कहना कठिन है कि किसका धन एक नंबर का है या दो नंबर का पर थोड़ा विवेक का इस्तेमाल करें तो सभी समझ में आ जाता है। दूसरा सच यह भी कि हम किसी बड़े शहर में जाकर अपने लिये सस्ता और अच्छा स्थान रहने के लिये ढूंढते हैं पर तब यह देखने का न तो समय होता है न जरूरत कि वह किस प्रकार के धन से बना है। हालांकि अनजान रहने पर किसी वस्तु का उपभोग करने पर उसके पाप का भागी नहीं बनते यह भी हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है।<br />
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<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
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