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	<title>hindi-education &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/hindi-education/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-education"</description>
	<pubDate>Fri, 01 Jan 2010 06:07:02 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[योगासन के बाद प्राणायाम जरूर करें-चिंतन आलेख (yog aur pranayam-chintan alekh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/07/hindi-article-on-yogsadhna/</link>
<pubDate>Sat, 07 Nov 2009 05:27:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/07/hindi-article-on-yogsadhna/</guid>
<description><![CDATA[अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं। योगा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।<br />
<b>योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</b>योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।<br />
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर।  अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें।  इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायम की विधियां दी गयी हैं।   योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।<br />
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया।  अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं।  कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।<br />
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली  क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं।  धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें  अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी  ढीला छोड़ना जरूरी है।<br />
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं।  इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है।  अगर कुछ आसन कर प्राणायम करें तो बहुत अच्छा रहेगा।  प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की  चलाई जाती है।  अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें।  अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें।  अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें।  इन क्रियायों को आराम से करें।  शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें।  सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है।  योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना।  शेष फिर कभी<br />
<b>लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://anant-shabd.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b></p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरदास के दोहे-अपनी तारीफ और दूसरे की बुराई न करें (kabir ke dohe-apne tarif aur doosre ke burai na karen)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/25/burai-aur-tarif-kabir-vani/</link>
<pubDate>Sun, 25 Oct 2009 09:42:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/25/burai-aur-tarif-kabir-vani/</guid>
<description><![CDATA[आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय। चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।। संत शिरोमणि कबीरदास ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।<br />
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।<br />
<strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।<br />
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-जागरुक लोग अपनी बेइज्जती नहीं सहते (jagruk aur apmaan-hindi sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/22/jagruk-log-aur-ijjat/</link>
<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 13:59:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/22/jagruk-log-aur-ijjat/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211; यद चेतनोऽपिपादै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<strong>यद चेतनोऽपिपादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः।<br />
तत्तेजस्वी पुरुषः परकृत निकृतिंक कथं सहते ।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>सूर्य की रश्मियों के ताप से जब जड़ सूर्यकांन्त मणि ही जल जाती है तो चेतन और जागरुक पुरुष दूसरे के द्वारा किये अपमान को कैसे सह सकता है।</p>
<p><strong>लांगल चालनमधश्चरणावपातं भू मौ निपत्य बदनोदर दर्शनं च।<br />
श्चा पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीरं विलोकपति चाटुशतैश्चय भुंवते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>श्वान भोजने देने वाले के आगे पूंछ हिलाते हुए पैरों में गिरकर पेट मूंह और पेट दिखाते हुए अपनी दीनता का प्रदर्शन करता है जबकि हाथी भोजन प्रदान करने वालो को गहरी नजर से देखने के बाद  उसके द्वारा आग्रह करने पर ही भोजन ग्रहण करता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>भले ही आदमी के पास अन्न और धन की कमी हो पर  मनुष्य को स्वाभिमानी होना चाहिए नहीं तो अधिक धनवान, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोग उसे गुलाम बनाये रखने के लिये हमेशा तत्पर रहते हैं।  आजकल सुख सुविधाओं ने अधिकतर लोगों को शारीरिक और मानसिक तौर से सुस्त बना दिया है इसलिये वह उन्हें बनाये रखने के लिये अपने से अधिक शक्तिशाली लोगों की चाटुकारिता में लगना अपने लिये निज गौरव समझते हैं। यही कारण है कि निजी क्षेत्र में स्त्रियों और पुरुषों का शोषण बढ़ रहा है। हमारे यहां की शिक्षा कोई उद्यमी नहीं पैदा करती बल्कि नौकरी के लिये गुलामों की भीड़ बढ़ा रही है। कितनी विचित्र बात है कि आजकल हर आदमी अपने बच्चे को इसलिये पढ़ाता है कि वह कोई नौकरी कर अपने जीवन में अधिकतम सुख सुविधा जुटा सके।  ऐसे में बच्चों के अंदर वैसे भी स्वाभिमान मर जाता है। उनका अपने माता पिता और गुरुजनों से अच्छा गुलाम बनने की प्रेरणा ही मिलती है। </p>
<p>ऐसी स्थिति में हम अपने देश और समाज के प्रति कथित रूप से जो स्वाभिमान दिखाते हैं पर काल्पनिक और मिथ्या लगता है।  स्वाभिमान की प्रवृत्ति तो ऐसा लगता है कि हम लोगों में रही नहीं है। ऐसे मेें यही लगता है कि हमें अब अपने प्राचीन साहित्य का अध्ययन भी करते रहना चाहिये ताकि पूरे देश में लुप्त हो चुका स्वाभिमान का भाव पुनः लाया जा सके।<br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http:/rajlekh.blogpot.com<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<blockquote><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
 </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति -अहिंसक मनुष्य शीघ्र अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है (ahinsa aur lakshya-manu smriti)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/12/hindu-adhyatm-sandesh/</link>
<pubDate>Mon, 12 Oct 2009 04:46:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/12/hindu-adhyatm-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्। न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।<br />
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।<br />
<strong>यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।<br />
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।</strong><br />
हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है वह अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य और परमार्थ और दूसरा असत्य और हिंसा।  यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है।  श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।<br />
वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है।  वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अखबार ने पाठ छापा पर नाम नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/11/my-post-in-news-paper-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 11 Oct 2009 05:24:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/11/my-post-in-news-paper-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[हिंदी की सेवा करने का दावा करने वाले बहुत हैं। इनके नाम भी आपने देखे होंगे। यह लोग हिंदी के नाम पर क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>हिंदी की सेवा करने का दावा करने वाले बहुत हैं। इनके नाम भी आपने देखे होंगे। यह लोग हिंदी के नाम पर कितना लिखते हैं यह अलग बात है पर जो हिंदी में लिखने वाले मौलिक तथा स्वतंत्र लेखक हैं उनसे यह अपीलें जरूर करते हैं कि हिंदी की सेवा करना तुम्हारा धर्म है। इनके आचरण पर अधिक क्या कहें? जहां धन देने की बात आती है तो यह धर्म की बात करते हैं कि ‘भई आपकी मातृभाषा  हिंदी है जिसकी सेवा करना आपका धर्म है। यह भी मान लिया पर जहां नाम देने की बात आती है तब इनकी सारी नैतिकता गायब हो जाती है।<br />
बहुत निराशा हुई यह देखकर कि यह लेखक तो निष्काम भाव से केवल अंतर्जाल पर इस भाव से लिख रहा है कि नई पीढ़ी को अपने अध्यात्मिक ज्ञान की वास्तविक अनुभूति हो क्योंकि लोग महापुरुषों के संदेशों की व्याख्या तो करते हैं पर उसकी वर्तमान संदर्भों में सही ढंग से प्रस्तुति नहीं कर पाते। इस लेखक का यह दावा नहीं है कि इसमें कोई सिद्धि प्राप्त है पर जिस तरह आज एक समाचार पत्र ने इसके अध्यात्मिक विषय लेख को एक दो शब्दों के संशोधन के साथ प्रकाशित किया उससे लगता है कि वाकई कुछ ऐसा है जो लोग अखबारों में नाम देने से डर रहे हैं।  लेख को कुछ शब्दों की हेरफेर के साथ प्रस्तुत किया पर इस ब्लाग के लेखक का नाम नहीं दिया। इससे एक बात साफ लग रही है कि हिंदी के नाम पर कथित रूप से स्वयंसेवा के लिये प्रेरित करने वाले लोग यहां के ब्लाग लेखकों की रचनाओं को अपने माध्यमों में बिना नाम के छापकर अपना हित साधना चाहते हैं।  प्रकाशन माध्यमों के इस व्यवहार का कारण यही समझ में आता है कि वह डर रहे हैं कि कही उनको ब्लाग लेखकों से चुनौती नहीं मिल जाये। उस अखबार का नाम देना ठीक नहीं है क्योंकि उससे उसका प्रचार होगा।  फिर यह काम करने वाले लोग अपने जैसे ही सामान्य रोजगार वाले होते हैं और किसी के रोजीरोटी पर वक्र दृष्टि डालना पाप है। हो सकता है उसने इस पर ध्यान नहीं दिया हो और उसे लगता हो कि अंतर्जाल पर हर सामग्री फ्री है। ऐसे में प्रकाशन माध्यमों से जुड़े लोगों से यह आग्रह है कि भई क्या इतनी मेहनत के बाद हम इस बात से भी गये कि नाम भी न दिया जाये।<br />
बहरहाल आपने आज अगर कहीं यह लेखक पढ़ा हो तो स्वयं ही देख सकते हैं।  इतना ही नहीं इस लेखक के अध्यात्म विषयों को नियमित पढ़ने वाले  लेखक मित्रों तथा पाठक मित्रों से यह भी आग्रह है कि वह कहीं भी अध्यात्म विषया पर लिखा हुआ देखें तो उस पर ध्यान करें तो देखेंगे कि अनेक समाचार पत्र पत्रिकाओं में कहीं पाठ तो कहीं विचार वहीं से लिये मिलेंगे।<br />
यह कोई शिकायत नहीं है बल्कि सूचना है कि अंतर्जाल पर लिखे गये विषयों की बाहर मांग हैं पर हिंदी लेखक को सम्मान देने के नाम पर शक्तिशाली वर्ग देखने, सुनने और कहने की प्रक्रिया से दूर हो जाता है ठीक गांधी जी के तीन वानरों की तरह।  इस लेख के माध्यम सें हम केवल यही बताना चाहते हैं कि हिंदी की सेवा सत्य करने का ढोंग किया जाता है। उसका सच्चे सेवक तो अल्पधनी, निष्काम भावी और मूल चिंतन वाले लेखक ही होते हैं।<br />
नीचे का यह लेख देखें जिसे संशोधित कर किसी समाचार पत्र में प्रकाशित किया गया है।<br />
<strong>कबीर के दोहे-प्रेम का वास्तविक रूप कोई नहीं समझता </strong><br />
<strong><br />
प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय<br />
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके। </p>
<p><strong>गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय<br />
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्सािहत करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम मेंें शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है। </p>
<p>वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर दर्शन-दूसरे की कमी देखकर हंसो नहीं (Sant Kabir Darshan - Seeing the lack of other not Laugh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/06/kabir-ke-dohe-doosre-par-hanso-nahin/</link>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 16:50:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/06/kabir-ke-dohe-doosre-par-hanso-nahin/</guid>
<description><![CDATA[आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय। चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।। संत शिरोमणि कबीरदास ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।<br />
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।<br />
<strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।<br />
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
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<title><![CDATA[प्रतिक्रियावादी लेखन-व्यंग्य आलेख (Reflective writing in hindi - satire article)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/14/pratikriyavadi-lekha-hindi-vyangya-lekh/</link>
<pubDate>Mon, 14 Sep 2009 16:21:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आजकल एक नारा बहुत कम सुनाई देता है‘प्रतिक्रियावादी ताकतों से बचें।’ आजकल यह नारा कम ही सुनाई देता है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आजकल एक नारा बहुत कम सुनाई देता है‘प्रतिक्रियावादी ताकतों से बचें।’ आजकल यह नारा कम ही सुनाई देता है इसका कारण यह है कि यहां तो अब प्रतिक्रियात्मक लेखन ही साहित्य हो गया है।  यह नारा पहले विकासवादियों ने लगाया था जिनको यह यकीन था कि वह अपने कार्य अपनी मौलिक सोच से कर रहे हैं और जो उनके विरोधी है वह केवल विरोध करते हैं जबकि उनका अपना कोई मूल सोच नहीं है। अब हालत यह है कि प्रतिक्रियात्मक लेखक ही सभी जगह छाये हुए हैं ऐसे में मौलिक विचारधाराओं को अब स्थान मिलना ही नहीं है। इसका कारण यह है कि अखबारों और टीवी चैनलों पर नाम केवल प्रतिक्रियात्मक लेखन से ही मिलता है और साहित्य लिखने वालों के लिये वहां कोई अधिक स्थान नहीं है दूसरा साहित्यकारों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वह अपने पैसे से किताबें छपवा सकें।<br />
जी हां, यह देश आजादी के समय से ही नारों और वाद पर चलता रहा है। हालत यह है कि आजादी तो मिल गयी पर गुलामी की मानसिकता यथावत है। इस देश का इतिहास सदियों पुराना है पर आजादी की जंग के इर्दगिर्द ही सारे विचारक घूम रहे हैं। कहते हैं कि यह देश दो हजार वर्ष तक गुलाम रहा पर जिस तरह देश की हालत है अब भी आजादी दूर की कौड़ी लगती है। अगर हम देश के बुद्धिजीवियों के विचार देखें तो तो उनके लिये आजादी का मतलब यही है कि दूसरे देश की बजाय अपने ही देश के लोग अपना शोषण करें।<br />
ऐसा नहीं है कि इस देश में चिंतक नहीं है और उनको पता नहीं कि प्रतिक्रियावादी क्या होते हैं पर चूंकि वह स्वयं ही भी उसी राह पर चल रहे हैं तो यह संभव नहीं है कि सोते हुए समाज को जगाकर बतायें कि प्रतिक्रियावाद किस बला का नाम है। आजादी का संघर्ष इस देश का इतिहास है पर सभी कुछ वह नहीं है।  आप भारतवर्ष की भौतिक  आजादी की बात कर रहे हैं वह अभी बहुत छोटा है। एक समय इस देश के राजाओं की सीमा तिब्बत तक फैली हुई थी और आज हम जिस चीनी ड्रैगन से डर रहे हैं इसी इतिहास से खौफ खाता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि यह आजादी एक सीमित उद्देश्य की पूर्ति करती है न किस इससे कोई बृहद लक्ष्य हासिल हुआ है। इसी आजादी के संघर्ष में कई योद्धा हुए जिनका आजादी के बाद इस देश को बनाने की अपनी एक योजना और विचार थे। इनमें कई शहीद हो गये तो कई आजादी के बाद विस्मृत हो गये। हम उनको नमन करते हैं पर अब जिस तरह उन शहीदों और योद्धाओं के नाम पर लोग अपने लिये उपयोग कर रहे हैं  चिंतन और मनन का विषय है।  मुख्य बात यह है कि जब किसी भी महापुरुष का जीवन सुनाया जाता है तो उसका महत्व और उसके विचारों का महत्व समान नहीं रहता।  महापुरुषों के चरित्र पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए पर विचारों में इसकी गुंजायश होती है।  हो सकता है कि हम किसी महापुरुष के जीवन से प्रभावित हों पर यह जरूरी नहीं है कि हम उसके विचारों का भी समर्थन करें खासतौर से जब आजादी के बाद का अनुभव उनके पास नहीं रहा हो। फिर यह सवाल यह है कि आजादी के योद्धाओें के मन में जो संघर्ष का भाव था मातृभूमि से प्रेम के कारण उपजा था पर उनके विचारों का स्त्रोत क्या था, यह भी देखने वाली बात होती है।<br />
अब हो यह रहा है कि अनेक लोग आजादी या आजादी के तत्काल बाद के महान विचारकों के प्रति सम्मान का भाव प्रदर्शन करते हुए उनके विचारों का भी बोझ उठा रहे हैं और यहीं से प्रारंभ हो जाता है प्रतिक्रियात्मक लेखन जो कि किसी भी दशा में साहित्य और भाषा की वृद्धि में सहायक नहीं होता।  प्रतिक्रियात्मक लेखन से आशय यह है कि समाज में घटित होने वाली घटनायें और  समाचारों पर ही अपनी टिप्पणी, कहानी, व्यंग्य या कविता लिखना। ऐसा लेखन समय के साथ अप्रासंगिक हो जाता है। इनके प्रासंगिक होने की केवल एक ही शर्त है कि पात्रों, वस्तुओं या स्थितियों में ऐसे तत्व अपनी सामग्री में शामिल करें जो कभी भी पुरानी न पड़ें।  मान लीजिये भाई ने भाई को धोखा दिया तो आप केवल उस घटना पर ही लिख रहे हैं जबकि उसमें ऐसी हालातों, दोनों के मानसिक उतार चढ़ाव और चरित्र को भी विस्तार दें क्योंकि उनमें दोहराव संभव है जबकि पात्रों का नहीं। मतलब यह है कि एक भाई दूसरे को धोखा फिर कहीं देगा उस समय आपका लिखा तभी याद किया जायेगा जब उसमें कुछ दोहराने लायक संदेश होगा।  प्रतिक्रियात्मक लेखन के मुकाबले संदेशात्मक लेखन बहुत उपयोगी होता है हालांकि उसके परिणाम दीर्घकाल में मिलते हैं।  प्रतिक्रियावादी ताकतों से बचाव का कोई उपाय नजर नहीं आ रहा क्योंकि उसे अब कोई ललकारता ही नहीं बल्कि टीवी और अखबार उनका उपयोग करते हुए उनको प्रचार दे रहे हैं।<br />
किसी घटना या समाचार पर लिखने वाले इतने हैं कि उनके बीच बैठकर मौलिक और स्वतंत्र लिखने वालों को असहजता अनुभव होती है।  एक बाद दूसरी भी है कि भारत में हर कोई अपने लिखे से समाज बदलना चाहता है।  समाज बदलना है इसलिये लिखते हैं। ऐसे प्रतितक्रियात्मक लेखन से कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि वह एक बार पढ़ते ही पुराना हो जाता है।  दूसरी बात यह है कि हमारे देश के अधिकतर लेखक विचाराधाराओं के जाल में फंसे हैं जो कि केवल नारों पर आधारित हैं। यह सभी विचाराधारायें पश्चिम से आई हैं। कहने को भले ही लोग कहें कि हमें अंग्रेजियत  से परहेज है पर उनकी लिखने और काम करने की शैली वही हैं जो अंग्रेजों की दी हुई हैं।  </p>
<p>हिंदी के महान रचनाकार प्रेमचंद का मुकाबला आज तक कोई भी नहीं कर सका क्योंकि उनका लेखन कभी प्रतिक्रियात्मकवाद नहीं रहा।  गुलाम देश में सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद उन्होंने सामाजिक संदर्भों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया। उनकी रचनाओं में देश की आजादी या गुलामी की चर्चा अधिक पढ़ने में नहीं आती। इसका सीधा आशय यह है कि वह हिंदी  साहित्य में सामाजिक संदर्भ देखना चाहते थे।  हालांकि इस लेखक ने प्रेमचंद की ढेर सारी रचनायें पढ़ी हैं पर यह नहीं जान पाया कि आजादी और उसके संघर्ष पर उनकी क्या राय थी?  जहां तक हमारी जानकारी है प्रेमचंद जी ने आजादी के संबंध में कोई बड़ी रचना नहीं लिखी। संभवतः वह जानते थे कि आजादी के बाद वह पुरानी पड़ जायेंगी। यह संभव नहीं है कि  इतने बड़े साहित्यकार ने आखिर इस आजादी और उसके संघर्ष के कुछ न सोचा हो पर उसकी चर्चा न होना इस बात का प्रमाण है कि एक साहित्यकार की दृष्टि से आजादी के विषय में उनके मायने इतने संक्षिप्त नहीं रहे होंगे जितने अन्य विद्वानों के दिखते हैं।<br />
सच बात तो यह है कि प्रतिक्रियात्मक लेखन के बिना चलना भी कठिन है।  साहित्य लिखने वाले दूसरों का लिखा साहित्य कम बल्कि प्रतिक्रियात्मक लेखन अधिक पढ़ते हैं क्योंकि उनमें ही उनके लिये नये विषय होते हैं। प्रतिक्रियात्मक लेखकों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह समाज को तत्काल अपने शब्दों से जागरुक करने को भ्रम पाल लेते हैं। ऐसा न होने पर झल्लाते हैं। इसके विपरीत साहित्य लिखने वाले इस बात से बेपरवाह होते हैं। वैसे देश के प्रतिक्रियात्मक लेखन करने वालों को यह समझ लेना चाहिये कि वह नारों और वाद की धारा में लिख रहे हैं और समाज को जागृत करने के लिये जिस अध्ययन और चिंतन-आज के दौर में गहन और गंभीर नहीं है बल्कि सूक्ष्म और संक्षिप्त भी चलेगा- की आवश्यकता है उसके बिना कोई भी शब्द सामग्री प्रभावी नहीं होती।  एक मुश्किल दूसरी भी है कि लोग सोच तो देशी लेते हैं पर कार्यशैली की वकालत विदेशी की करते हैं और यहीं से उनका तारतम्य बिगड़ जाता है।  हमें वही करना चाहिये जैसा कि वह-अंग्रेज और अन्य पश्चिमी जगत-कर रहें है यह सोच उनकी राह में भटकाव लाती है।<br />
आखिरी बात यह है कि अंग्रेजी और अंग्रेजियत से मोह रखने वाले यहां हर विषय पर कानून बनाने की मांग करते हैं पर उनको पता नहीं है कि अंग्रेज कभी भी लिखित कानून पर नहीं चलते। यह उनका आत्मविश्वास है। भारत के कुछ विचारक-जो वाकई धन्य है जो ऐसी बात कह गये-कहते हैं कि अंग्रेज तो क्रिश्नियिटी पर चलते हैं जो हमारी ही कृष्ण नीति है। शायद वह सच कहते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने सहज योग का संदेश दिया पर लगता है कि वह ंअंग्रेजों के पास पहुंच गया। इसलिये वह स्वयं हमेशा अलिखित संविधान के सहजता से चलते जा रहे हैं पर अपनी हरकतों से पूरे विश्व में असहजता फैला रखी है।  लोग उनको देखकर असहज हुए जाते हैं कि हम भी उनकी तरह हो जायें पर इस चक्कर में सभी असहज हुए जा रहे हैं। इसी असहजता का परिणाम यह है कि किसी घटना या समाचार में हर कोई अपने विचार तो रख लेता है ताकि उस पर जल्दी प्रतिक्रिया मिल जाये पर दीर्घकालीन स्थिति तक प्रभाव रहे ऐसा बहुत कम ही लोग लिख पाते हैं। अंग्रेज स्वयं कई खेल खेलते हैं जबकि भारत को क्रिकेट ही सौंप गये ताकि वह उसी पर उलझा रहे। शेष फिर कभी<br />
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<p><strong></strong></p>
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<item>
<title><![CDATA[वेद और मनुस्मृति के विषयों  पर  भ्रमित करने का प्रयास-आलेख (disscution on ved and manu smriti-hindi lekh]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/13/ved-aur-manu-smruti-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 04:37:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/13/ved-aur-manu-smruti-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का आधार कोई एक ग्रंथ या पुस्तक नहीं है। समय समय पर अनेक महापुरुषों, तपस्पियो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का आधार कोई एक ग्रंथ या पुस्तक नहीं है। समय समय पर अनेक महापुरुषों, तपस्पियों, ऋषियों तथा मुनियों ने अपने सतत प्रयासों से इस ज्ञान भंडार को भरा है।  इसकी शुरुआत वेदों से हुई पर अंत कहीं नहीं है।  भौतिक और व्यक्त जगत पर शोध तो अनेक देशों ने किया पर अध्यात्मिक और अव्यक्त जगत पर जितना ज्ञान भारत में है किसी के पास नहीं रहा।  हम यहां वेदों के साथ मनुस्मृति की भी बात करेंगे जिनको लेकर हिन्दुओं को भ्रमित किया गया-इसे यूं भी कहें कि हमारा समाज स्वयं भी इसको लेकर भ्रमित है।<br />
अक्सर हिन्दू धर्म के अन्य धार्मिक आलोचक (इसका आशय विदेशी विचारकों और प्रचारकों से है)<br />
इन्हीं वेदों और मनुस्मृति से श्लोक लेकर हमला करते हैं पर यह उनकी सोच नहीं है। अन्य धार्मिक विचाराधारओं के मानने वालों (विदेशी विचारकों और प्रचारकों) के पास इतनी चिंतन क्षमता हो ही नहीं सकती कि वह भारतीय वेदों, पुराणों और मनुस्मृति को पढ़कर आलोचना कर सकें बल्कि यह भारतीय समाज के अंदरूनी तत्वों द्वारा ही जानकारी प्रदान की जाती है।  इससे भी आगे हम यह कहें कि हमें गैर भारतीय विचारधर्मियों से कम अपने ही समाज के और बौद्धिक तत्वों से अधिक चुनौती  है जो विदेशी विचाराधाराओं के सहारे यहां वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। इसमें हम जनवादी प्रगतिवादी विचाराधारा के सभी नहीं तो कुछ तत्वों को शामिल पाते हैं जिनको इस देश के समाज को गरीब, मजदूर, स्त्री, बालक,बीमार और बदहाल जैसे वर्गों में बांटकर कल्याण करने का शौक है।  </p>
<p>यहां हमारा आशय हिन्दू धर्म और उसके ग्रंथों के आलोचकों को उत्तर देना नहीं वरन् समान विचारधार्मियों को यह समझाना है कि वह अपने तर्क ठोस ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पाते और परिणाम स्वरूप उत्तेजना या गुस्से में ऐसी अभिव्यक्ति करते हैं जो उनके लिये उचित नहीं है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति सदैव  नवनिर्माण, सौम्य विकास और वैचारिक प्रवाह की निरंतरता की पोषक है।  इस धरा की ऊर्जा मनुष्य में ज्ञान और विज्ञान  की धारा को प्रवाहित रखती है जिससे यहां अध्यात्मिक और भौतिक ज्ञान का सदैव भंडार रहता है।<br />
वेदों की रचना प्रारंम्भिक काल में हुई।  इसकी रचना का काल खंड कोई प्रमाणिक रूप से नहीं जानता क्योंकि इनमें ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों तथा महापुरुषों ने अपने अथक प्रयासों से इसमें अपना ज्ञान प्रस्तुत किया और वह इतने निष्कामी और निष्प्रयोजक दयालु थे कि आत्मप्रचार से बचने के लिये नाम भी नहीं लिखते थे।   हमारे देश में अध्यात्मिक ज्ञान के लिये निरंतर अन्वेषण होता रहा है इसलिये यह कहना कठिन है कि किसी एक महापुरुष ने इसकी रचना की होगी।  कहने वाले तो यह कहते हैं कि दुनियां में कहीं भी कही या लिखी गयी अच्छी और समाज हित की बात वेद का ही हिस्सा है या इसे यूं कहें कि वह वेदों में कही जा चुकी है। हम यहां वेदों का महत्व साबित नहीं करने जा रहे बल्कि हिन्दू धर्म समाज की उस सतत प्रवाहित वैचारिक धारा की चर्चा कर रहे जिससे अन्य धार्मिक समाज दूर रहते हैं।  वेद या मनुस्मृति की आलोचना या चर्चा कर हमारे समाज को रास्ते से हटाने का प्रयास सदियों से चल रहा है और इसे समझना होगा क्योंकि आज का समाज केवल इनके सहारे आगे नहीं बढ़ रहा। हम यहां बाल्मीकी रामायण, श्रीमद्भागवत, महाभारत और श्री मद्भागवत गीता जैसे वह ग्रंथ क्यों भूल जाते हैं जिनसे आज के समाज का सर्वाधिक प्रयोजन है।   वेदों या मनुस्मृति में अवर्ण जातियों तथा स्त्रियों के लिये जो बातें तत्कालीन संदर्भों में कही गयीं उनका संदर्भ हमें पता नहीं है पर उनको वर्तमान में कौन मानता है? जो मानते हैं उनको समाज के ज्ञानी लोग ही मूर्ख कहते हैं।  फिर समाज जैसे जैसे आगे बढ़ता गया अन्य रचनायें होती गयीं और वेदों से उचित ज्ञान उनमें समावेश किया गया।   आज केवल धर्म में विशिष्टता प्राप्त करने के जिज्ञासु ही इन धर्म ग्रंथों को पढ़ते हैं पर अन्य सामान्य व्यक्ति इनके बारे में अधिक नहीं समझता। </p>
<p>कहा जाता है कि वेदों में असंख्य श्लोक थे पर अब हजारों में उपलब्ध हैं? इसका मतलब यह नहीं है कि श्लोक कहीं खो गये बल्कि उनको कहीं न कहीं संजो कर रखा जाता रहा इसलिये वेदों के प्रति यह समाज उदासीन होता चला गया।  सच बात तो यह है कि वेदों में जो तत्व ज्ञान है उसे तो अनेक लोगों ने अपनी रचनाओं में स्थान दिया।   वेदों में भी दो तरह की ज्ञान ही हो सकता था-एक तो दैहिक-भौतिक तथा दूसरा अभौतिक-अध्यात्मिक।  इनमें दैहिक तथा भौतिक ज्ञान तो समय के साथ परिवर्तित होता है पर अभौतिक तथा अध्यात्मिक ज्ञान में परिवर्तन नहीं आता और यही मनुष्य मन के लिये लाभदायी होता है।  इसी अव्यक्त और अध्यात्मिक ज्ञान को संजोए रखने के लिये प्रयास हुए जिसके कारण समाज वेदों से उदासीन है।<br />
भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का मूल तत्व निष्काम कर्म और  निष्प्रयोजन दया जैसे अनेक संदेश हैं। वेदों से उदासीन होने का कारण भगवान श्री कृष्ण जी की गीता भी रही। चारों वेदों का सार उसमें आ गया-सच कहें तो श्रीकृष्ण ने अपनी  अलौकिक बुद्धि से  चारों वेदों का सार जिस तरह प्रस्तुत किया उससे तो उन्हें इस विश्व का प्रथम  संपादक कहकर मन गद्गद् कर उठता है।  उन्होंने न केवल वेदों के तत्व ज्ञान का इसमें समावेश किया बल्कि दैहिक एवं भौतिक संसार को समझने का विज्ञान भी दिया।<br />
उस दिन एक सज्जन ने कहा कि ‘भला बताईये, आयुर्वेद की कौनसी शिक्षा इसमें शामिल है।’<br />
इसका जवाब है कि ‘आयुर्वेद में बीमारियों की दवा से बचने के अलावा उनके इलाज की चर्चा है मगर भगवान श्रीकृष्ण जी ने उनसे बचने का उपाय भी बताया और इलाज भी। उन्होंने बीमारियों से बचने के लिये उचित खानपान का ज्ञान दिया तो इलाज के लिये प्राणायम का उपाय भी बताया।’<br />
यह दुनियां का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान और विज्ञान दोनों ही शामिल है।  इसमें शामिल  हिन्दूओं का समग्र ज्ञान है और वह भी संक्षिप्त रूप से। ऐसा कुशल संपादन कौन संपादक कर सकता था?<br />
आधुनिक काल के हिन्दी भाषी लेखकों ने अपनी कलम विचाराधाराओं के द्वंद्व पर अधिक चलाई पर वैश्विक काल-जीं हां, अंतर्जाल पर लिखने के साथ ही इसकी शुरुआत हुई क्योंकि वह रूढ़ हो चुके संस्थानों की पकड़ से बाहर निकली है-के हिन्दी लेखकों को वेदों के महत्व बताने की बजाय अपने संपूर्ण अध्यात्मिक ग्रंथ का प्रतीक श्रीगीता में ही आलोचकों के उत्तर ढूंढने चाहिये।  उससे अगर संतुष्ट न हों तो बाल्मीकी रामायण और श्रीमद्भागवत का अध्ययन करें।  वेदों और मनुस्मृति पर विवाद या (कु)चर्चा करने में समय बरबाद करना व्यर्थ है। हमारा समाज निरंतर चलता रहता है और कहीं एक जगह अटक कर रह जाना उसकी फितरत नहीं है।  यह अलग बात है कि श्रीगीता में जो ज्ञान दिया है वह हर युग की दृष्टि से स्थिर रहने वाला है और यही हमारी सबसे बड़ी  ताकत है।<br />
दरअसल भारत में एक बौद्धिक वर्ग है जिसे यह अध्यात्मिक ज्ञान नहीं सुहाता।  वह खुशहाल समाज नहीं देखना चाहता बल्कि समाज में व्याप्त आर्थिक गरीब, जातीय विवाद तथा सामाजिक रूढ़ियों के प्रतिवाद में अपनी जगह तलाशता है।  ऐसा नहीं है कि यह साठ या सत्तर साल पुरानी  बात है बल्कि यह कबीर जी के समय से ही चल रहा है।  भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के चरित्रों की कहानियां सुनाकर कुछ लोगों ने अपने अध्यात्मिक ज्ञानी होने का ढोंग रचाया जिसको दिखाकर हिन्दू धर्म के आलोचक अधिक बौखला जाते हैं। भले ही ऐसे लोग ढोंगी हैं पर धर्म प्रवाह में उनकी एक भूमिका है जो वह अनजाने में ही निभा जाते हैं।  हिन्दू धर्म के आलोचक उन जैसे नहीं बन सकते क्योंकि उन्होंने धर्म ग्रंथ पढ़े नहीं है पर उन जैसा पुजना चाहते हैं। इसलिये आप सुनते होंगे कि कुछ लोगों के नाम लगी उपाधियों-‘गरीबों के मसीहा, शोषितों के मसीहा, नारी कल्याण के प्रतीक।</p>
<p>कहने कहा तात्पर्य यह है कि समय के साथ ही हमारे महापुरुष, तपस्वी, ऋषि और मुनि वेदों से प्रदत्त ज्ञान को इस तरह लेकर आगे चले कि उनमें परिवर्तित होने वाला दैहिक तथा भौतिक ज्ञान जो अप्रासंगिक हो गया है उसे छोड़ दिया जाये। हां, जो तत्व ज्ञान है उसे किसी ने नहीं छोड़ा।   हमारी इस पावन धरा पर समय समय महापुरुष आते हैं यह उसका गुण है और उसी तरह समाज का भी यह गुण है कि वह उनके संदेशों के साथ अपना रास्ता बनाता जाता है।  किसी एक पुस्तक या महापुरुष से चिपक कर केवल उसे ही मान लेना मानसिक दृढ़ता का नहीं बल्कि वैचारिक संकीर्णता का प्रतीक है। फिर वैश्विक काल के हिन्दी लेखकों को यह नहीं भूलना चाहिये कि उनका असली संघर्ष गैर भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा मानने वालों से नहीं वरन् कथित रूप से अपनी विचाराधारा वाले लोगों से ही है।<br />
वह वेद की बात करें तो तुम उनको बाल्मीकी रामायण, श्रीमद्भागवत और श्रीगीता दिखाओ-उन्हें बताओ कि यह है हमारी ताकत।  वह तो वेद और मनुस्मृति पर चर्चा करेंगे क्योंकि उनको इन तीनों महांग्रथों से खौफ लगता है। श्रीगीता के बारे में तो कहना ही क्या? वह इसका नाम भी नहीं लेंगे क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने इसमें संदेश ही इस तरह दिया है कि पढ़ लिख चाहे जो भी ले पर जब तक वह हृदय से उनके प्रति श्रद्धा नहीं दिखायेगा वह समझेगा नहीं और जो उनको मानेगा ही नहीं तो उसकी जुबां से श्रीगीता का नाम निकलेगा ही नहीं और कान से सुनते ही उसकी नसों में भय दौड़ने लगेगा। याद रखो कि वेद और मनुस्मृति पर (कु) केवल विचलित करने के लिये की जाती है और  बाल्मीकी रामायण, श्रीमद्भागवत तथा श्रीगीता की बात करने का उन लोगों  में नहीं है। सच बात तो यह है कि वेदों और मनुस्मृति पर उनसे (कु)चर्चा कर उनके जाल में ही फंसना है। आखिर हम उनके ऐजेंडे पर ही बहस क्यों करें वह हमारे ऐजेंडे पर बहस क्यों नहीं करते? वह वेदों और मनुस्मृति को उठाते हैं पर श्रीगीता से उनकी परहेज क्या उनकी दुर्भावना का प्रतीक नहीं है?शेष फिर कभी<br />
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ मंदिर कहीं, गर्व और गौरव कहीं-चिंत्तन आलेख (Temple somewhere, anywhere pride and glory -hindi Articles) ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/05/manid-kahin-garva-kahin-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Sat, 05 Sep 2009 05:26:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/05/manid-kahin-garva-kahin-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[वह एक ब्राह्म्ण लेखक का पाठ था-ऐसा उन्होंने अपने पाठ में स्वयं ही बताया था। उसने बताया कि राजस्थान क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वह एक ब्राह्म्ण लेखक का पाठ था-ऐसा उन्होंने अपने पाठ में स्वयं ही बताया था।  उसने बताया कि राजस्थान के सीमावर्ती गांवों में विभाजन के समय आये सिंधी किस तरह अपनी संस्कृति को संजोये हुए हैं। एक सिंधी ने उससे कहा कि ‘आपमें और हममें बस इतना अंतर है कि हम अभी कुछ समय पहले वहां से आये हैं और आप तीन चार सौ साल पहले बाहर से आये हैं।’<br />
उस लेखक ने इसी आधार  पर अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा कि बाहर से कितने ही आक्रांता इस देश के लूटने आये पर यहां के लोगों ने उनके विचारों में नयापन होने के कारण स्वीकार किया। यहां नित नित नये समाज बने।   उस लेखक ने यह भी लिखा है कि इस समाज की यह खूबी है कि वह नये विचारों को ग्रहण करने को लालायित रहता है।<br />
उस लेखक और इस पाठ के लेखकों में विचारों की साम्यता लगी और ऐसा अनुभव हुआ कि इस देश के इतिहास में कई ऐसी सामग्री हैं जिनका विश्लेषण नये ढंग से किया जाना चाहिये।  हुआ यह है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति से शिक्षित इस देश बौद्धिक समाज दूसरे द्वारा थोपे गये विषयों पर विचार भी उनके ढंग से करता है।  पिछले तीस चालीस वर्ष के समाचार पत्र पत्रिकायें उठाकर देख लीजिये इतिहास की गिनी चुनी घटनाओं के इर्दगिर्द ही नये ढंग से विचार ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे नया हो।<br />
अधिकतर तो हम पिछले बासठ वर्ष के इतिहास पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं तो कभी कभी हजारों वर्ष पीछे चले जाते हैं।  इन सबमें हम अपना गौरव ढूंढने से अधिक कुछ नहीं करते।  इससे कभी निराशा का भाव आता है। दरअसल हमारी समस्या यह है कि हम यथास्थिति से आत्ममुग्ध हैं और उसमें अपना गौरव ढूंढना ही अधिक सुविधाजनक लगता है।<br />
इसमें एक गौरव पूर्ण बात कही जाती है कि हिन्दू धर्म कभी इतना विस्तृत था कि उसका विस्तार मध्य एशिया तक था। मध्य एशिया में बने हिन्दू मंदिरों को अपना गौरव बताने की यह प्रवृत्ति हमारे देश में बहुत है।  इसके पीछे वास्तविकता क्या है और नये संदर्भों में हम उसे कैसे देखें? यह विचार करने का साहस कोई विद्वान नहीं करता।  आईये हम कुछ इस पर प्रकाश डालें। </p>
<p>एक पश्चिमी विद्वान ने खोजकर बताया था कि मनुष्य की उत्पति दक्षिण अफ्रीका में हुई। वह वहां बिल्कुल बंदरों की तरह था।  उसके बाद वह भारत आया और वहां उसने ज्ञान प्राप्त किया फिर वह मध्य एशिया में गया जहां उसने सभ्यता का नया स्वरूप प्राप्त किया।  फिर वह भारत की तरफ लौटा और बौद्धिक रूप से परिष्कृत होकर उसके बाद अन्य स्थानों पर गया। हम इसे अगर सही माने तो आज भी कुछ नहीं बदला।  भारत आकर इंसान ने यहां की आबोहवा मेें राहत अनुभव की और अपने प्रयोग से उसने सत्य का ज्ञान प्राप्त किया। उसके प्रचार के लिये वह मध्य एशिया में गया जहां उसे सांसरिक और भौतिकता का ज्ञान भी मिला।  दोनों ही ज्ञानों में संपन्न होने के बाद वह पूरे विश्व में फैला।  इसमें एक बात निश्चित रही कि जिस तत्व ज्ञान की वजह से भारत विश्व में अध्यात्मिक गुरु है उसका आभास इसी धरती पर होता है। मुश्किल यह है कि तत्व ज्ञान अत्यंत सूक्ष्म और संक्षिप्त है और बाह्य रूप से उसका आकर्षण दिखता नहीं है। जब इंसान अपने अंदर की आंखों खोले तभी उसका महत्व उसे अनुभव हो सकता है। </p>
<p>भारत में हमेशा ही प्रकृति की कृपा रहने के साथ जनसंख्या का भी घनत्व हमेशा अधिक रहा है इसलिये यहां हमेशा आदमी खातापीता रहा हैं इसके विपरीत अन्य देशों में इतना प्राकृतिक कृपा नहीं है इसलिये यहां का भौतिक आकर्षण विदेशियों को हमेशा ही यहां खींच लाता है।  इनमें कुछ पर्यटक के रूप में आते हैं तो कोई आक्रांता के रूप में।<br />
विदेशों से यहां आवागमन हमेशा रहा है और तय बात है कि विदेशों से जो लोग आये उनकी सभ्यता भी यहां मिलती गयी। यही कारण है कि हम अनेक समाजों के कर्मकांडों में विविधता देखते हैं। इतिहासकारों के अनुसार भारत में मूर्तिपूजा का प्रवृत्ति मध्य एशिया से आयी है।   उनकी बात में दम इसलिये भी नजर आती है कि भारतीय धर्म ग्रंथों में यज्ञ हवन आदि की चर्चा तो होती है पर मूर्ति पूजा यहां के मूल धर्म का भाग हो ऐसा नहीं लगता।  रामायण काल में भी रावण द्वारा यज्ञों में विध्वंस पैदा करने की घटनाओं की चर्चा होती है पर मंदिर आदि पर हमला कहीं हुआ हो इसकी जानकारी नहीं मिलती।<br />
श्रीगीता में भी द्रव्य यज्ञ और ज्ञान यज्ञ की चर्चा होती है। द्रव्य यज्ञ से आशय वही यज्ञ हैं जिनमें धन का व्यय होता है और निश्चित रूप से उनका आशय उन यज्ञों से है जिनमें भौतिक सामग्री का प्रयोग होता है।<br />
इतिहास में इस बात की चर्चा होती है कि मध्य एशिया में किसी समय अनेक देवी देवताओं की पूजा होती थी और इस कारण वहां सामाजिक वैमनस्य भी बहुत था।  लोग अपने देवी देवताओं को श्रेष्ठ बताने के लिये आपस में युद्ध करते थे।  इन देवी देवताओं की संख्या भारत में वर्तमान में प्रचलित देवी देवताओं से कई गुना अधिक थी।<br />
इतिहासकारों के अनुसार वहां एक राजा हुआ जो सूर्य का उपासक था।  उसने सूर्य को छोड़कर अन्य देवी देवताओं  की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया।  दरअसल उसका मानना था कि सूर्य ही सृष्टि का आधार है और  वही पूज्यनीय है।  उसने अन्य देवी देवताओं के मंदिर और मूर्तियां तुड़वा दीं। इससे लोग नाराज हुए और उसे इतिहास का क्रूर राजा माना गया। बाद में उस राजा की हत्या हो गयी। इतिहासकार मानते हैं कि भले ही उसकी जनता उससे नाराज थी पर उसने यह सत्य स्थापित तो कर ही दिया कि इस सृष्टि का स्वामी एक परमात्मा है।<br />
कुछ इतिहासकार कहते हैं कि उस राजा के मरने के बाद फिर पुनः विभिन्न देवी देवताओं की पूजा होने लगी।  नतीजा फिर आपसी संघर्ष बढ़ने लगे और यह तब तक चला जब तक वहां एक ईश्वर का सिद्धांत ताकत के बल पर स्थापित नहीं हो गया।<br />
दरअसल हम इतिहास पर विचार करें तो मूर्ति पूजकों और उनके विरोधियों का संघर्ष वहीं से होता भारत तक आ पहुंचा।  भारत में इसे अधिक महत्व नहीं मिला क्योंकि यहां तत्व ज्ञान हमेशा ही अपना काम करता रहता है।  यह तत्वज्ञान श्रीगीता में पूरी तरह वर्णित है।  इसके अलावा एक अन्य बात यह भी है कि भारतीय समाज मानता है कि समय समय पर महापुरुष पैदा होकर समाज सुधार के लिये कुछ न कुछ करते रहते हैं और उनका यह विश्वास गलत नहीं है।  आधुनिक काल में कबीर, तुलसी, रहीम, मीरा, रैदास तथा अन्य संत कवियों ने अपनी रचनाओं ने केवल तत्व ज्ञान का प्रचार किया बल्कि भक्ति के ऐसे रस का निर्माण किया जिसके सेवन से यह समाज हमेशा ही तरोताजा रहता है।  इसके विपरीत जहां नवीन विचारों के आगमन पर रोक है वह समाज जड़ता को प्राप्त हो गये हैं।<br />
पूर्व में ऋषियों मुनियों और तपस्वियों द्वारा खोजे गये तत्व ज्ञान तथा आधुनिक काल के संत कवियों के भक्ति तत्व का प्रचार हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं।  अगर हम यह  कहते हैं कि मध्य एशिया में फैले मंदिर हमारे गौरव हैं तो यह भी याद रखिये वह मंदिर हमारे तत्वज्ञान और भक्ति भाव का प्रतीक नहीं है। इसके अलावा सूर्य मंदिरों का मध्य एशिया में होना तो कोई अजूबा नहीं है क्योंकि वहां कभी उनकी पूजा होती है।  हम उनके साथ अपनी संस्कृति और सभ्यता को नहीं जोड़ सकते क्योंकि उनके साथ आपसी खूनी संघर्षों का इतिहास भी जुड़ा है। कहने को तो भारत में भी विभिन्न धार्मिक मतों को लेकर विवाद होते रहे हैं पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि इसको लेकर किसी ने किसी पर हमला किया हो।<br />
हमारी वर्तमान सभ्यता, संस्कृति और धर्म अनेक तरह के प्रयोगों के दौर से होते हुए वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुआ है।  इसके आधार स्तंभ तत्व ज्ञान और भक्ति ही हमारी वास्तविक पहचान है।  एक बात याद रखिये इतिहासकार कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका से चलकर इंसान भारत में ज्ञानी हुआ और फिर प्रचार के लिये मध्य एशिया में गया जहां उसे अन्य ज्ञान मिला। वह उसे प्राप्त कर यहां लौटा फिर पूरी तरह से परिष्कृत होकर अन्य जगह पर गया।  इसका आशय यह है कि अतीत का गौरव जो हमारे देश में यहीं को लोगों की तपस्य और परिश्रम से निर्मित हुआ है  वही श्रेष्ठ है और उससे आगे की सीमा का  गौरव तो धूल धुसरित हो गया है।  यह वहां रहे लोगों को तलाशना है उस पर हमें गर्व करना बेकार है। इसलिये कहीं मध्य एशिया के पुराने मंदिर ही नहीं बल्कि पश्चिम देशों में बनने वाले मंदिरों में अपने धर्म का गौरव ढूंढना का प्रयास किसी को अच्छा लग सकता है पर अघ्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि यह केवल एक क्षणिक मानसिक सुख है और इसका उस ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है जिसकी वजह से यह देश विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है।<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
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</item>
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<title><![CDATA[विदुर दर्शन-अमीरों में खाने और पचाने कि शक्ति नहीं होती (hindi sandesh-amir aur garib ki bhookh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/03/dhani-aur-nirdhan-ka-bhojan-vidur-niti/</link>
<pubDate>Thu, 03 Sep 2009 04:00:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्र भुंजते सदा। क्षुत् स्वादुताँ जनयति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा।। हिंदी में भावार्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्र भुंजते सदा।<br />
क्षुत् स्वादुताँ जनयति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>निर्धन पुरुष सदा ही स्वादिष्ट भोजन करते हैं, क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद उत्पन्न करती है और ऐसी भूख धनियों के लिये दुर्लभ है।<br />
<strong>प्राषेण श्रीमतां भोक्तं शक्तिनं विद्यते।<br />
जीर्वन्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणां महीपते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>इस दुनियां में धनियों में भोजन करने की शक्ति नहीं होती जबकि गरीब तो लकड़ी भी पचा जाते हैं।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-</strong>यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि जितना शरीर को चलायेंगे उतना ही वह चलेगा।  वर्तमान समय में भौतिक सुख साधनों की अति उपलब्धता ने धनी लोगों को शारीरिक परिश्रम से परे कर दिया है और इसलिये उनको बीमारियां भी अधिक होती हैं।  अगर ध्यान से देखें तो पता लगेगा कि देश में अमीर लोगों की संख्या भी बढ़ी है- भले ही गरीबों की तुलना में वह कम है-उतनी ही बीमारों की संख्या भी बढ़ी है।  हर शहर में फाइव स्टार होटलों की तरह दिखने वाले अस्पताल बने दिख जायेंगे। मधुमेह, उच्चरक्तचाप, हृदय रोग तथा कब्जी जैसी बीमारियां राजयोग मानी जाती हैं और अधिकतर अस्पतालों में इन्हीं के इलाज करने वाले बोर्ड पढ़े जा सकते हैं। उनमें गरीबों को होने वाली बीमारियों की चर्चा कम ही होती है। </p>
<p>वैसे यह भी माया का खेल है कि जिनको भूख लगती है उनके लिये खाना मिलता नहीं क्योंकि वह गरीब परिश्रम से जीविका कमाते हैं और सभी जगह शारीरिक परिश्रम को हेय दृष्टि से देखते हुए उनको  कम धन ही दिया जाता है। इसके विपरीत दिमागी श्रम वालों को भुगतान अधिक किया जाता है पर फिर उनको भूख नहीं लगती।  शरीर का यह नियम है कि जितना अन्न जल ग्रहण करो उतना ही विसर्जन करो। इस नियम के विपरीत चलना अपने को बीमार बनाना है और इसका इलाज केवल परिश्रम या व्यायाम से ही हो सकता है। दवाईयों का सेवन तो अपने दिमाग को संतोष देने के लिये है। .<br />
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<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[योग साधकों के साथ पिकनिक-आलेख (yog sadhkon ke sath picnic-hindi lekh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/31/yogi-and-picnic-hindi-article/</link>
<pubDate>Mon, 31 Aug 2009 16:08:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[उस पिकनिक हम सब आम लोग ही थे पर दूसरों से कुछ अलग! हम सभी नियमित योग साधना करने वाले लोग थे। योगी कह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>उस पिकनिक हम सब आम लोग ही थे पर दूसरों से कुछ अलग! हम सभी नियमित योग साधना करने वाले लोग थे। योगी कहना कठिन है क्योंकि हम में से कोई गेहुंआ वस्त्रधारी नहीं था। इतना जरूर है कि सामान्य लोगों से अलग होने का अहसास इस तरह की पिकनिक में लगता है क्योंकि वहां केवल योग से संबंधित विषय पर ही आपस चर्चा होती है। </p>
<p>यह पिकनिक योग सीखने और सिखाने वाले शिक्षकों और साधकों को आपसी मेल मिलाप के लिये आयोजित की जाती है। कुछ अंतर इस पिकनिक अन्य के मुकाबले नजर आया।  पैंतालीस पैंतालीस मिनट के तीन सत्रों की चर्चा के दौरान कवितायें, विचार, चुटकुले और योग संबंधी चर्चायें हुईं। दूसरा खाना लेट होने या उससे परेशान होने की बात लोगों में नहीं दिखाई दी।  खाने खाते समय ऐसा नहीं लगा कि लोग उस पर टूट पड़े हों।  यह सिद्ध लोगों की बैठक नहीं थी-क्योंकि इसमें नौकरी और व्यापार के साथ अन्य व्यवसाय करने वाले लोग शामिल थे।  सबसे बड़ी बात यह है कि वहां कोई अपनी बीमारी की चर्चा कोई नहीं कर रहा था जो कि इसका प्रमाण था कि वहां योग साधक लोग ही आये थे।<br />
इसके आयोजक वह लोग थे जो निष्काम भाव से न केवल योग शिविरों में जाकर सिखाते हैं बल्कि उसके प्रचार के लिये भी कार्य करते हैं।  उनकी साधना का तेज उनकी बातों में देखा जा सकता है।<br />
एक महिला ने ध्यान करवाया और उसने शरीर के सात चक्रों पर अपना प्रकाश डाला। उसकी बातें सुनकर तो ऐसा लगा कि लोग पता नहीं क्यों अपनी बीमारियों के लिये चिकित्सकों के यहां चक्कर लगाते हैं जबकि उसको सही करने के साधन ही अपने अंदर मौजूद हैं।  एक महिला ने सूर्य नमस्कार पर प्रकाश डाला।  </p>
<p>इस पिकनिक में एक ऐसी महिला भी दिखाई दी जिसे हम बहुत पहले जानते थे। वह बहुत मोटी थी।  एक विवाह समारोह में वह मिली थी तो वह अन्य भद्र महिला से अपनी मधुमेह की बीमारी का जिक्र कर रही थी।  अब उसे शायद पांच वर्ष बाद देखा होगा।  वह हमें पहचान नहीं पायी पर हमें उसका चेहरा याद था।  अब वह उतनी मोटी नहीं दिख रही थी न उसके चेहरे पर निराशा का भाव दिख रहा था जो शादी में देखा था। उम्रदराज हैं पर पहले के मुकाबले अधिक ढंग से मजबूत दिख रही थी। कहने का तात्पर्य यह है कि नियमित योगसाधना का लाभ उनके चेहरे पर दिखाई दे रहा था।<br />
एक मित्र से चर्चा हुई। वह इस बात से निराशा थे कि वहां एक भी नवयुवक या नवयुवती नहीं दिखाई दे रही। उनका कहना था कि<br />
1.आजकल के लड़के लड़कियां योग का महत्व नहीं समझते। अगर कहो तो कहेंगे कि जिम जायें या हैल्थ क्ल्ब में शामिल हों। मतलब वह पैसे खर्च करने की बात करेंगे।<br />
2.उनको सुबह योग साधना के लिये बुलाना भी कठिन है क्योंकि वह शिक्षा के बोझ तले हैं। दिन में विद्यालय महाविद्यालय जाने के साथ उन पर चार चार जगह ट्यूशन जाने का भी बोझ है। बिचारे थक जाते हैं।’<br />
जब वह अपनी बात कह चुके तब हमने उनसे कहा कि<br />
1. ठीक है! यह जरूरी है क्या कि सभी योग शिविरों में  सुबह आयें।  लड़के लड़कियां तो वैसे भी हाथ पांव बहुत मारते हैं। इसलिये अगर वह योगसन और प्राणायम के लिये सुबह नहीं आते तो कोई बात नहीं।  जब बाहर से घर वापस आते हैं तो उनसे भृकुटि पर नजर रखते हुए ध्यान रखने के लिये कहो। उस समय वह शरीर को ढीला छोड़ दे तो विद्यालय महाविद्यालय और ट्यूशन के दौरान जो शारीरिक मानसिक थकवाट दूर हो जायेगी। वह उठते बैठते और चलते फिरते तनाव में जीने के इस कदर आदी है कि उनको पता ही नहीं कि विश्राम क्या होता है? जब ध्यान से विश्राम अनुभव होगा  तब उनको पता लगेगा कि योग साधना क्या चीज है और फिर वह योग शिविर में भी आयेंगे।  योग साधना का चरम ध्यान ही है और जो इस विद्या में पारंगत हो जायेगा उसका तो कहना ही क्या?<br />
2. उन्हें समझाओ कि जिम या हैल्थ क्लब दैहिक के लिये अस्थाई रूप से लाभ दायक हैं जबकि योगासन, प्राणायम और ध्यान से देह, मन और शरीर के विकार तो निकलते ही है बल्कि प्रभावपूर्ण वाणी और पवित्र व्यवहार से दूसरे पर भी प्रभाव पड़ता है और साथ ही चेहरे पर सुंदरता आती है जिसे आज की युवा पीढ़ी सबसे अधिक जरूरी मानती है।<br />
एक महिला ने कविता गायी। वह न केवल योग शिक्षिका है बल्कि बरसों से निष्काम भाव से कार्य करते रहने के कारण सभी उसका सम्मान भी करते हैं।  उसने  देश भक्ति और नारी स्वाभिमान से पूर्ण अपनी कविता में  एक जगह नारी के लिये सकारात्मक रूप से ‘रणचंडी’ शब्द का प्रयोग किया।<br />
सब कुछ ठीक था पर उसकी कविता समाप्त होते ही एक पुरुष सज्जन ने कहा कि ‘रणचंडी बने पर ऐसी नहीं कि जैसे वह&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;थी।  कार्यक्रम  का संचालन करने वाले ने कहा कि इस पर बहस होना चाहिये। उसने पुरुष सदस्य से कहा कि आप थोड़ा विस्तार से बात करें। उस पुरुष सदस्य से अपनी बात दोहराई और फिर दूसरी बात भी करने लगा।<br />
तब संचालक ने उस महिला से कहा कि ‘आप भी कुछ कहिये।  हम इस  विषय पर चर्चा  बढ़ाना चाहेंगे।’<br />
उस महिला ने कहा कि‘यह जिस तरह बात कर रहे हैं। मेरी बात  समझेंगे नहीं।’<br />
यह पता नहीं कि वह महिला और पुरुष एक दूसरे को पहले से जानते थे पर ऐसा लगा कि हम ब्लाग और कमेंट के खेल में फंस रहे हैं।  एक बार हमने सोचा कि  उठकर उस महिला से अपनी बात कहें पर लगा कि कहीं अर्थ का अनर्थ न हो जाये।  उस समय ब्लाग जगत की याद आ रही थी कि कमेंट दें कि नहीं।  सबसे बड़ी बात यह थी कि वह महिला योग साधना विषयक ज्ञान में हमसे अधिक प्रवीण थी इस बात ने हमें चुप रहने को विवश किया।  तमाम तरह की बातें हमने वहां सुनी और लगा कि संभव है कि कभी हमारे शिक्षक रहे सभी गुणीजन योग साधना में बहुत प्रवीण है पर वह ऐसे मार्ग पर खड़े हैं जहां से श्रीगीता का द्वार  खुलता है।  जब हम बोलने का मन बना रहे थे तब यह तय था कि हम श्रीगीता के संदेश के साथ ही अपनी बात कहते पर फिर खामोश रहे।<br />
खाने के समय वह भद्र महिला हमारे से कुछ ही दूर बैठी थी। सोचा अब कहें पर फिर चुप रहे।  हम कहना यही चाहते थे कि ‘आप कुशल योग शिक्षिका हैं और आपकी वाणी के साथ विचारों के तेज की अनुभूति तो  कविता से हो गयी थी।  मगर अब कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं चल रहा जिसमें रणचंडी या रणबांकुरे चाहिये बल्कि योग और योगिनियों की जरूरत है क्योंकि युद्ध कौशल और जीवन का तत्व  ज्ञान यह दोनों ही गुण उसमें हो सकते हैं।  इस समय देश मेें युद्ध नहीं बल्कि विवेक जगाने के लिये एक अभियान की आवश्यकता है जो काम उन जैसे लोग इतनी सहजता से कर सकते हैं कि हम जैसे आदमी को तो पसीना ही आ जाये। आप 1983 से योग साधना से जुड़ी हैं और इसका मतलब यह है कि आप में वह शक्ति है जो आम आदमी या स्त्री में नहीं हो सकती। मुख्य बात यह है कि हमें अपने विषय और लक्ष्य के स्वरूप को समझना होगा।’<br />
इस बार नहीं कहा पर जल्दी उनसे कहीं न कहीं मुलाकात होने की संभावना है तब यह बात कहेंगे।  बहरहाल हमें वहां एक बात लगी कि योग साधना, प्राणायम और ध्यान के बाद आदमी के लिये श्रीगीता का अध्ययन ही शेष रह जाता है जो किसी को पूर्ण योगी बनाता है और इसका मतलब सन्यासी होना कतई नहीं है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्री गीता अतुलनीय पुस्तक-हिन्दी आलेख Shri Geeta incredible book - Hindi article ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/27/shri-gita-and-other-holly-book-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Thu, 27 Aug 2009 15:07:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/27/shri-gita-and-other-holly-book-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[यह एक टिप्पणी जो उस ब्लाग पर नहीं रखी जा सकी जिसमें श्रीगीता के युद्ध की चर्चा करते हुए उस ब्लाग लेख]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>यह एक टिप्पणी जो उस ब्लाग पर नहीं रखी जा सकी जिसमें श्रीगीता के युद्ध की चर्चा करते हुए उस ब्लाग लेखक ने अपनी ही पवित्र पुस्तक में वर्णित युद्ध विषय से तुलना की थी। वह ब्लाग लेखक गैर हिन्दू धर्म-याद रहे यहां उसके लिये गैर हिन्दू शब्द उपयोग नहीं हो रहा-विचारधारा मानने वाला है। वह एक दिलचस्प आलेख था। लोग पूछेंगे कि आखिर यह टिप्पणी उस पर क्यों नहीं रखी गयी?<br />
इसका जवाब यह है कि यहां टिप्पणी लिखने पर लोग कुछ का कुछ अर्थ समझ लेते हैं। ऐसे में दूसरे के ब्लाग पर चर्चा के लिये बड़ी टिप्पणी लिखने का अपना खतरा होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरे के घर जाकर अपनी बात कहने से अच्छा है कि अपने घर में ही बात की जाये। फिर श्री गीता जैसे गंभीर विषय पर किसी से वाद विवाद करना भी एक तरह से मजाक लगता है। यह दुनियां का इकलौता ग्रंथ है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान है और इसकी तुलना किसी अन्य ग्रंथ से करना ठीक नहीं प्रतीत होता।<br />
यह रूढ़ता या अहंकार नहीं बल्कि श्रीकृष्ण जी का आदेश है कि उनके संदेश का प्रचार केवल अपने भक्तों में ही किया जाये। दूसरी बात यह है कि श्रीगीता के संदेश को पढ़ने, सुनने और समझने के लिये जिस धीरज की आवश्यकता है वह हरेक में नहीं होता। फिर जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के समक्ष जब अन्य विचारधारा को स्थापित करने के प्रयत्न कर रहे हों उनके सामने तो श्रीगीता के संदेश का प्रचार करना परेशानी का कारण भी बन जाता है।<br />
मुख्य बात यह है कि मनुष्य का मन और स्वभाव! जिन लोगों ने तय कर लिया है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में अप्रासंगिक संदेशों का नकारात्मक प्रचार करेंगे उनको समझाने से अच्छा है अपनी बात उनसे कही जाये जो ऐसे प्रचार से विचलित हो जाते हैं।<br />
श्रीगीता में मांसाहार तथा दूसरे की आजीविका छीनने का प्रयास तामसी माना गया है। इतना ही नहीं भगवान भक्ति के द्वारा स्वर्ग प्राप्त करने के मत का खंडन भी किया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीगीता में समग्र जीवन सहजता पूर्वक व्यतीत करने के लिये ज्ञान दिया गया है। अब लोगों को केवल युद्ध ही युद्ध दिख रहा है तो उनको समझाना मुश्किल है। श्रीगीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो मुझे जैसा भजता है वैसा ही फल उसे मिलता है। जिनको युद्ध ही युद्ध दिख रहा है उनके लिये फल भी युद्ध ही है। ऐसे में शांतिप्रिय मनुष्य के लिये यह आवश्यक है कि वह अपने सत्संगियों से ही ज्ञान चर्चा करे।</p>
<blockquote><p><strong><span style="color:#006600;"><span class="">आपका</span> लेख बहुत अच्छा लगा। आपके इस पाठ पर मैं आपके श्रीगीता संबंधी विषय का उत्तर दूंगा।<br />
पहली बात तो यह है कि श्रीगीता में युद्ध से संबंधित सैंकड़ों श्लोक नहीं है। दूसरी बात यह है कि श्रीगीता विश्व की इकलौता ऐसा ग्रंथ है जिसमें तत्व ज्ञान के साथ ऐसा विज्ञान भी है जिससे संसार को समझा जा सकता है। इसका एक सिद्धांत हैं-‘गुण ही गुण को बरतते हैं।<br />
श्रीकृष्ण जी जानते थे कि श्रीअर्जुन एक क्षत्रिय है और कभी न कभी अपने युद्ध कौशल के कारण यह युद्ध अवश्य करेंगे। श्रीकृष्ण यह नहीं चाहते थे कि यह युद्ध कौरवो के संपूर्ण सफाये के बिना समाप्त हो। अगर उस समय अर्जुन युद्ध नहीं करते तो वह बाद में भी इसके लिये आगे आते। वह क्षत्रिय थे और इससे दूर रहना संभव नहीं था पर श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति में वह कुछ कौरवों को छोड़ सकते थे। इससे पूर्व विराट नगर में हुए युद्ध में अकेले अर्जुन से कौरव पराजित होकर भाग निकले और श्रीकृष्ण अब ऐसा अवसर उनको महाभारत के युद्ध में नहीं देना चाहते थे-याद रहे उनकी अनन्य भक्त द्रोपदी ने उनसे कौरवों के सर्वनाश का वरदान मांगा था। यहां यह बता दें क्षत्रिय से आशय राज्य से मान्यता प्राप्त सैनिक से है न कि हर किसी हथियार पकड़ने वाले से। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दें कि आदमी अपने स्वाभाविक गुणों के आधार पर चले बिना रह नहीं सकता जैसे कि कुछ लोग भारतीय अध्यात्म में केवल जातिपाति और युद्ध ही ढूंढते हैं।<br />
महाभारत युद्ध में निहत्थों और युद्ध न कर रहे व्यक्ति पर प्रहार न करने के नियम का पालन किया गया था। अभिमन्यु के शहीद होने के बाद इस नियम में ढील आ गयी। युद्ध में छिपकर वार करना भी वर्जित था।<br />
बात नंबर दो। भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध का संदेश केवल अर्जुन को दिया था न कि आगे आने वाले हर भक्त को इसकी इजाजत दी या आव्हान किया। उन्होंने अर्जुन से कहा‘यह युद्ध तू मेरे लिये कर!’<br />
वह जानते थे कि युद्ध और हिंसा अपराध है और इसका प्रायश्चित भी उन्होंने किया। युद्ध के बाद उन्होंने गांधारी का शाप ग्रहण किया जिससे उनके स्वयं के पूरे वंश का नाश हो गया। उनके पुत्र तथा परिवार में अन्य सदस्य भी न बचे। धर्म के लिऐ ऐसा निर्मोही इतिहास में हुआ हो इसका ज्ञान हमें नहीं है। फिर महाभारत के युद्ध का पाप अपने ऊपर लेेते हुए बहेलिये का बाण अपने पांव पर लेकर परमधाम गमन किया। ऐसा भी विश्व इतिहास में ऐसा कोई नहीं हुआ जिससे हिंसा और युद्ध का परिणाम स्वयं ग्रहण किया हो। वह इस युद्ध के द्वारा अपना संदेश देना चाहते थे वह भी अपने भक्तों में प्रचार के लिये न कि जबरन दूसरे को सुनाने के लिये।<br />
उनके बाद का समाज उनके अहिंसा के संदेश के कारण ही हिंसा से दूर रहता है क्योंकि वह जानता है कि अब हिंसा के अपराध का दंड अपने ऊपर लेने के लिये कोई दूसरा नहीं है। इसके अलावा उन्होंने जो संदेश दिये उनके बारे में आपसे कहना क्या? तीन प्रकृत्ति के मनुष्य-सात्विक, राजस और तामस-इस धरती पर विचरेंगे। चार प्रकार के भक्त-आर्ती, अर्थार्थी,जिज्ञासु और ज्ञानी-भी होंगे। श्रीगीता हमारे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का आधार है और उसके अनुसार यह संभव नहीं है कि सभी लोग सात्विक और ज्ञानी बन जायें। ऐसी सुखद कल्पना सच्चे ज्ञानी नहीं करते। मनुष्य को ज्ञान ग्रहण कर स्वयं ही अपनी राह चलना चाहिये और दूसरे जिस प्रकार के हों उसके अनुरूप ही उनसे व्यवहार करना चाहिये न कि उनको अपने जैसा बनाने में अपनी जिंदगी बर्बाद करना चाहिये। अपनी भक्ति का अहंकार दिखाकर दूसरे को भी अपने जैसा दिखने के लिये प्रेरित या बाध्य करने वाले नष्ट हो जाते हैं।<br />
स्पष्टतः श्रीगीता में युद्ध शब्द क्षत्रियों-राज्य से मान्यता प्राप्त सैनिकों के लिये-के लिये स्वाभाविक कर्म तो अन्य के लिये सामान्य कर्म से है। श्रीकृष्ण जी योगेश्वर थे और इसलिये उन्होंने इस बात का ध्यान रखा था कि श्री अर्जुन को युद्ध का संदेश इस तरह दिया जाये कि आगे आने वाले भक्त कर्म के रूप में ही समझें क्योंकि अहिंसा के संदेश के साथ ही उन्होंने आगे ऐसे किसी युद्ध की संभानायें समाप्त कर दीं।</span></strong></p></blockquote>
<p>अंत में यह कहना भी जरूरी है कि उनका यह पाठ पढ़कर बिल्कुल गुस्सा नहीं आया। श्रीगीता के ज्ञान की थोड़ी समझ रखने वाला व्यक्ति भी न तो दूसरे द्वारा निंदा करने पर दुःखी होता है न प्रशंसा पर फूल कर कुप्पा होता है। हां, हम इतना जरूर कहते हैं कि भई सारी दुनियां के धर्म ग्रंथ पवित्र हैं। उनका खूब आदर करो। आप चाहे किसी भी धर्म के हों अपने पवित्र किताब का खूब प्रचार करो। हमारी श्रीगीता की आलोचना करो तो भी दुःख नहीं है। प्रशंसा करो तो आपकी मर्जी! मगर तुलना करने से पहले इसका पूरा अध्ययन करना जरूरी है। दरअसल श्रीगीता का असली संदेश तो श्री अर्जुन को युद्ध करने का इसलिये दिया गया था क्योंकि उनका यह स्वाभाविक कर्म था। इसका आशय यह है कि श्रीकृष्ण हर भक्त को अपना स्वाभाविक कर्म करते भगवान भक्ति के साथ जीवन व्यतीत करने संदेश दे रहे थे। वैसे मनुष्य का स्वभाव आसानी से नहीं बदलता। जिसका जैसा स्वभाव है वैसा ही वह इस दुनियां को देखेगा भी। हां, उसमें परिवर्तन के लिये एक ही प्रयास हो सकता है वह योगासन और प्राणायम! जो लोग भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परे हैं उनसे ऐसी अपेक्षा करना नहीं चाहिये कि वह हमारे धर्म ग्रंथों का सम्मान करें और जितना उनमें ज्ञान है उसके रहते हुए वह किसी के मोहताज भी नहीं है। श्रीगीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसके लिये प्रशंसात्मक शब्द कहने की बजाय उसका अध्ययन किया जाना चाहिये। इसका थोड़ा अंश भी समझ पायें तो समझिये भगवान की बहुत कृपा है। हम उस ब्लाग लेखक के भी आभारी हैं जिनकी वजह से यह पाठ लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस लेख का आशय यह कतई नहीं है कि उससे हमारा कोई विरोध है। श्रीगीता पर लिखने की प्रेरणा देने वाले व्यक्ति का आभार व्यक्त न करना कृतघ्नता होगी। शेष फिर कभी!<br />
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कौटिल्य का अर्थशास्त्र-गिरने का भय और गिरा देता है (girne ka bhay-kautilya ka arthshastra]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/12/girne-ka-bhay-aur-gira-deta-hai/</link>
<pubDate>Sun, 12 Jul 2009 09:46:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/12/girne-ka-bhay-aur-gira-deta-hai/</guid>
<description><![CDATA[कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211; प्रमाणश्चधिकश्याप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>कौटिल्य के  अर्थशास्त्र के अनुसार<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<strong>प्रमाणश्चधिकश्यापि महत्सत्वमधष्ठितः।<br />
पदं स दत्ते शिरसि करिणः केसरी यथा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>प्रमाणित योग्यता से अधिक पद की इच्छा करने वाला व्यक्ति भी उस महापद पर विराजमान हो जाता है उसी प्रकार जैसे सिंह हाथी पर अधिष्ठित हो जाता है।<br />
<strong>उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदन्यायच्छतै महान्।<br />
नवैनींचैस्तरां याति निपातभयशशकया।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने वाला व्यक्ति महान पद् पर तो विराजमान हो जाता है पर उससे नीचे गिरने की भय और आशंका से वह नैतिक आधार पर नीचे से नीचे गिरता जाता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>समाज के सभी क्षेत्रों में शिखर पर विराजमान पुरुषों से सामान्य पुरुष बहुत सारी अपेक्षायें करते हैं। वह उनसे अपेक्षा करते हैं कि आपात स्थिति में उनकी सहायता करें। ज्ञानी लोग ऐसी अपेक्षा नहीं करते क्योंकि वह जानते हैं कि शिखर पर आजकल कथित बड़े लोग कोई सत्य या योग्यता की सहायता से नहीं पहुंचते वरन कुछ तो तिकड़म से पहुंचते हैं तो कुछ धन शक्ति का उपयोग करते हुए। ऐसे लोग स्वयं ही इस चिंता से दीन अवस्था में रहते हैं कि पता नहीं कब उनको उस शिखर से नीचे ढकेल दिया जाये।  चूंकि उच्च पद पर होते हैं इसलिये समाज कल्याण का ढकोसला करना उनको जरूरी लगता है पर वह इस बात का ध्यान रखते हैं कि उससे समाज का कोई अन्य व्यक्ति ज्ञानी या शक्तिशाली न हो जाये जिससे वह शिखर पर आकर उनको चुनौती दे सके। उच्च पद या शिखर पर बैठे लोग डरे रहते हैं और डर हमेशा क्रूरता को जन्म देता है।  यही क्रूरता ऐसे शिखर पुरुषों को निम्न कोटि का बना देती है अतः उनमें दया या परोपकार का भाव ढूंढने का प्रयास नहीं करना चाहिए।<br />
यही हाल उन लोगों का भी है जिनको योग्यता से अधिक सम्मान या पद मिल जाता है। मायावी चक्र में सम्मान और पद के भूखे लोगों से ज्ञानी होने की आशा करना व्यर्थ है। उनको तो बस यही दिखाना है कि वह जिस पद पर हैं वह अपनी योग्यता के दम पर हैं और इसलिये वह बंदरों वाली हरकतें करते हैं। अपनी अयोग्यता और अक्षमता उनको बहुत सताती है इसलिये वह बाहर  कभी मूर्खतापूर्ण  तो कभी क्रूरता पूर्ण हरकतें कर समाज को यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वह योग्य व्यक्ति हैं। ऐसे लोगों की योग्यता को अगर कोई चुनौती दे तो वह उसे अपने पद की शक्ति दिखाने लगते हैं। अपनी योग्यता से अधिक उपलब्धि पाने वाले ऐसे लोग समाज के विद्वानों, ज्ञानियों और सज्जन पुरुषों को त्रास देकर शक्ति का प्रदर्शन करते हैं।  वह अपने मन में अपनी अयोग्यता और अक्षमता से उपजी कुंठा इसी तरह बाहर निकालते हैं। अतः जितना हो सके ऐसे लोगों से दूर रहा जाये। कहा भी जाता है कि घोड़े के पीछे और राजा के आगे नहीं चलना चाहिये।<br />
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<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति-तनाव से नारी की सुन्दरता और पुरूष की शक्ति क्षय होती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/07/tanav-kamjor-karta-hai-vidur-niti/</link>
<pubDate>Tue, 07 Jul 2009 03:46:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/07/tanav-kamjor-karta-hai-vidur-niti/</guid>
<description><![CDATA[संतापाद् भश्यते रूपं संतापाद् भश्यते बलम्। संतापाद् भश्यते ज्ञानं संतापाद् व्याधिमृच्छति।। हिंदी में]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>संतापाद् भश्यते रूपं संतापाद् भश्यते बलम्।<br />
संतापाद् भश्यते ज्ञानं संतापाद् व्याधिमृच्छति।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>संताप से स्त्री का सौंर्दय और पुरुष का बल नष्ट होता है। संताप से ज्ञान नष्ट होता है और संताप से रोग प्राप्त होता है।<br />
<strong>अर्चयेदेव मित्राणि सति वासति वा धने।<br />
नानर्थयन् प्रजानाति मित्राणां सारफल्गुनताम्<br />
हिंदी में भावार्थ- </strong>मित्र धनवान हो या नहीं उसका सत्कार अवश्य करें। अपने किसी भी मित्र से कुछ न मांगें और न ही कभी उनके आचरण की परीक्षा लेने का प्रयास करें।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>यह मानवीय स्वभाव है कि वह स्वार्थ की वजह से संपर्क बनाता है पर मित्रता स्वाभाविक रूप से हो जाती है।   इसके बावजूद मित्रता का निर्वाह सभी नहीं कर पाते बल्कि अपना समय और स्वार्थ निकलते ही मित्र से नाता तोड़ लेते हैं। ऐसे स्वार्थी लोग अपने मित्र बनाते और बिगाड़ते हैं पर कभी विपत्ति में उनको कोई सहायता नहीं करता। मित्र विपत्ति में काम आते हैं इसलिये वह धनी हो या गरीब उनका सत्कार हमेशा करना चाहिए। </p>
<p>आजकल जीवन बहुत संघर्षमय हो गया है इसलिये तनाव स्वाभाविक रूप से होता है। यह तनाव स्त्री का सौंदर्य और पुरुष का बल नष्ट करता है।  अपनी देह, मन और वैचारिक शक्ति बनाये रखने के लिये योगासन और प्राणायम करते रहना चाहिए।  अधिक तनाव से अपना ज्ञान तो नष्ट होता ही है बल्कि तमाम तरह के रोग भी होते हैं।  अनेक मनोचिकित्सक यह कहते हैं कि मधुमेह, रक्तचाप तथा अन्य बीमारियों की उत्पति का कारण ही मानसिक तनाव होता है।  इसलिये योग साधना करने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान में भी रुचि लेना चाहिये जिससे मानसिक तनाव कम रहे।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपराध और पाप में भी लिंगभेद-आलेख (hindi article)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/30/ling-bhedhindi-vichar-lekh/</link>
<pubDate>Tue, 30 Jun 2009 14:27:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/30/ling-bhedhindi-vichar-lekh/</guid>
<description><![CDATA[भारतीय समाज की भी बड़ी अजीब हालत है। अच्छाई या बुराई में भी वह जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्र के भेद करन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>भारतीय समाज की भी बड़ी अजीब हालत है। अच्छाई या बुराई में भी वह जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्र के भेद करने से बाज नहीं आता।  अनेक तरह के वाद विवादों में तमाम तरह के भेद ढूंढते बुद्धिजीवियों ने शायद उन दो घटनाओं को मिलाने का शायद ही प्रयास किया हो जो सदियों पुराने लिंग भेद का एक ऐसा उदाहरण जिससे पता लगता है कि गल्तियों और अपराधों में भी किस तरह हमारे यहां भेद चलता है।<br />
दोनों किस्से  टीवी पर ही देखने को मिले थे। एक किस्सा यह था कि कहीं किसी सुनसान सड़क से पुलिस वाले अपनी गाड़ी में बैठकर निकल रहे थे।  रास्ते में एक स्थान पर एक मंदिर पड़ा। जब वह उसके पास से गुजरे तो उन्हें अंदर से एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी।  वह जगह सुनसान थी और इस तरह आवाज सुनाई देना उनको संदेहास्पद लगा। तब वह पूरी टीम अंदर गयी। वहां उनको एक बच्चा अच्छी चादर में लिपटा मिला।  उन्होंने उसको उठाया और इधर उधर देखा पर कोई नहीं दिखाई दिया।  पुलिस वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि उस बच्चे को कोई छोड़ गया है।<br />
अब पुलिस वालों के लिये समस्या यह थी कि उस बच्चे की असली मां को ढूंढे पर उससे पहले बच्चे की सुरक्षा करना जरूरी था। वह उसको अस्पताल ले गये। डाक्टरों ने बताया कि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है। मगर पुलिस वालों को समस्या यही खत्म होने वाली नहीं थी।  वह सब पुरुष थे और उस बच्चे के लिये उनको एक अस्थाई मां चाहिये थी।  वह भी ढूंढ निकाली और उसे बच्चा संभालने के लिये दिया और फिर शुरु हुआ उनके अन्वेषण का दौर।  वह उसकी असली मां को ढूंढना चाहते थे।  तय बात है कि इसके लिये उनको उन हालतों पर निगाह डालना जरूरी था जिसमें वह बच्चा मिला।  ऐसी स्थिति में पुलिस वाले भी आम इंसानों जैसा सोचें तो कोई आश्चर्य नहीं होता। उन्होंने बच्चा उठाया था कोई अपराधी नहीं पकड़ा था जिससे पूछकर पता लगाते।<br />
पुलिस का समाज से केवल इतना ही सरोकार नहीं होता कि वह इसका हिस्सा है बल्कि उसके लिये उनको समाज के आम इंसान आदतों, प्रवृत्तियों और ख्यालों को भी देखना होता है।<br />
एक पुलिस वाले का बयान हृदयस्पर्शी लगा। उसने कहा कि -‘‘बच्चा किसी अच्छे घर का है शायद अविवाहित माता के गर्भ से पैदा हुआ है इसलिये उसे छोड़ा गया है।  वरना लड़का कोई भला ऐसे कैसे छोड़ सकता है?  लड़के को बहुत अच्छी चादर में रखा गया है। उसे अच्छे कपड़े पहनाये गये हैं।’;<br />
एक जिम्मेदार पुलिस वाले के लिये यह संभव नहीं है कि वह कोई ऐसी बात कैमरे के सामने कहे जो लोगों को नागवार गुजरे। उनकी आंखों से बच्चे के भविष्य को लेकर  चिंतायें साफतौर से दिखाई दे रही थी। ऐसी स्थिति में पुलिस वालों ने बच्चे की सहायता करते हुए ऐसे व्यक्तिगत प्रयास भी किये होंगे जो उनके कर्तव्य का हिस्सा नहीं होंगे। उनकी बातों से बच्चे के प्रति प्रेम साफ झलक रहा था।<br />
पुलिस अधिकारी  यह शब्द हमें मर्मस्पर्शी लगे ‘वरना लड़का कौन ऐसे छोड़ता है’। ऐसे लगा कि इन शब्दों के पीछे पूरे समाज का जो अंतद्वद्व हैं वह झलक रहा हो जिसे वह व्यक्त करना चाहते हों।<br />
लगभग कुछ ही देर बाद एक ऐसी ही घटना दूसरे चैनल पर देखने को  मिली। वहां एक नवजात लड़की का शव एक कूड़ेदान में मिला। वहां भी पुलिस वालों का कहना था कि ‘संभव है यह लड़की अविवाहित माता के गर्भ से उत्पन्न हुई  हो या फिर लड़की होने के कारण उसे यहां फैंक दिया हो।’</p>
<p>इन दोनों घटनाओं के पुलिस क्या कर रही है या क्या करेगी-यह उनकी अपनी जिम्मेदारी है। इसके बारे में अधिक पढ़ने या सुनने को नहीं मिला। जो लड़का जीवित मिला उसके लिये वह आगे भी ठीक रहे इसके निंरतर सक्रिय रहेंगे ऐसा उनकी बातों से लग रहा था। यहां हम इन दोनों घटनाओं में समाज में व्याप्त  लिंग भेद की धारणा पर दृष्टिपात करें तो तो सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि लोग गल्तियां करने पर भी लिंग भेद करते हैं।<br />
एक मां ने अपना लड़का इसलिये ही मंदिर में छोड़ा कि वह उसके काम नहीं आया तो किसी दूसरे के काम आ जायेगा-मंदिर है तो वहां कोई न कोई धर्मप्रिय आयेगा और उस लड़के को बचा लेगा।  क्या उसने अच्छी चादर में लपेटकर इसलिये मंदिर में छोड़ा कि जो उसे उठाये उसके सामने बच्चे की रक्षा के लिये तात्कालिक रूप से ढकने के लिये कपड़े की आवश्यकता न हो। क्या उसके मन में यह ख्याल था कि आखिर लड़का है किसी के काम तो आयेगा? कोई तो लड़का पाकर खुश होगा? कोई तो लड़का मिलने पर जश्न मनायेगा?<br />
लड़की को फैंकने वाले परिवारजनों ने क्या यह सोचकर  कूड़ेदान में फैंका कि लड़की भला किस काम की? हम अपना त्रास दूसरे पर क्यों डालकर अपने ऊपर पाप लें? क्या उन्होंने सोचा कि लड़की उनके लिये संकट है इसलिये उसे ऐसी जगह फैंके जहां वह बचे ही नहीं ताकि कोई उसकी मां को ढूंढने का प्रयास न करे।<br />
कभी कभी तो लगता है कि बच्चों को गोद लेने और देने की लोगों को व्यक्तिगत आधार पर छूट देना चाहिये। जिनको बच्चा न हो उन्हें ऐसे बच्चों को गोद लेने की छूट देना चाहिये जिनसे उनके माता या पिता छुटकारा पाना चाहते हैं।  दरअसल निःसंतान दंपत्ति बच्चे गोद लेना चाहते हैं पर इसके लिये जो संस्थान और कानून है उनसे जूझना भी उनको एक समस्या लगती है।  ऐसे में अगर कोई उनको अपना बच्चा देना चाहे तो उनके लिये किसी प्रकार की बाध्यता नहीं होना चाहिये।  कहीं अगर किसी नागरिक को बच्चा पड़ा हुआ मिल जाये तो उसे कानून के सहारे वह बच्चा रखने की अनुमति मिलना चाहिये न कि उससे बच्चा लेकर कोई अन्य कार्रवाई हो। पता नहीं ऐसा क्यों लगता है कि बिना विवाह के बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति तो रोकी नहीं जा सकती पर ऐसे बच्चों को निसंतान दंपत्ति को लेने के लिये अधिक कष्टदायी नियम नहीं होना चाहिये।  इन दोनों घटनाओं ने लेखक को ऐसी बातें सोचने के लिये मजबूर कर दिया जो आमतौर से लोग सोचते हैं पर कहते नहीं। बहरहाल लड़के और लड़की के परिवारजनों ने लिंग भेद के आधार पर ऐसा किया या परिस्थितियों वश-यह कहना कठिन है पर समाज में जो धारणायें व्याप्त हैं उससे इन घटनाओं में देखने का प्रयास हो सकता है क्योंकि यह कोई अच्छी बात नहीं है कि कोई अपने बच्चे इस तरह पैदा कर छोड़े। खासतौर से जब लड़का मंदिर में और लड़की कुड़ेदान में छोड़ी जायेगी तब इस तरह की बातें भी उठ सकती हैं।<br />
पश्चिमी चकाचैंध ने इस देश की आंखों को चमत्कृत तो किया है पर दिमाग के विचारों की  संकीर्णता से मुक्त नहीं किया। पश्चिम में अनेक लड़कियां विवाह पूर्व गर्भ धारण कर लेती हैं पर अपना गर्भ गिरा देती हैं या फिर बच्चा पैदा करती हैं। उनका समाज उन पर कोई आक्षेप नहीं करता इसलिये ही वहां इस तरह बच्चों को फैंकने की घटनायें होने के समाचार कभी भी सुनने को नहीं मिलते।<br />
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ आपरेशन तो आसान  है -हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/06/29/opretion-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Mon, 29 Jun 2009 16:50:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/06/29/opretion-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[सरकारी अस्पताल में एक सफाई कर्मचारी ने एक तीन साल के बच्चे के गले का आपरेशन कर दिया। उस बच्चे के गले]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सरकारी अस्पताल में एक सफाई कर्मचारी ने एक तीन साल के बच्चे के गले का आपरेशन कर दिया। उस बच्चे के गले में फोड़ा था और उसके परिवारजन डाक्टर के पास गये। वहां खड़े सफाई कर्मचारी ने उसका आपरेशन कर दिया। टीवी पर दिखी इस खबर पर यकीन करें तो समस्या यह नहीं है कि आपरेशन असफल हुआ बल्कि परिवारजन चिंतित इस बात से हैं कि कहीं बच्चे को कोई दूसरी बीमारी न हो जाये।<br />
स्पष्टतः यह नियम विरोधी कार्य है। बावेला इसी बात पर मचा है। अधिकृत चिकित्सक का कहना है कि ‘मैंने तो सफाई कर्मचारी से कहा था कि बच्चा आपरेशन थियेटर में ले जाओ। उसने तो आपरेशन ही कर दिया।’<br />
सफाई कर्मचारी ने कहा कि ‘डाक्टर साहब ने कहा तो मैंने आपरेशन कर दिया।’<br />
संवाददाता ने पूछा कि ‘क्या ऐसे आपरेशन पहले भी किये हैं?’<br />
सफाई कर्मचारी खामोश रहा। उसकी आंखें और उसका काम इस बात का बयान कर रहे थे कि उसने जो काम किया उसमें संभवतः वह सिद्ध हस्त हो गया होगा। यकीनन वह बहुत समय तक चिकित्सकों की ंसंगत में यह काम करते हुए इतना सक्षम हो गया होगा कि वह स्वयं आपरेशन कर सके। वरना क्या किसी में हिम्मत है कि कोई वेतनभोगी कर्मचारी अपने हाथ से बच्चे की गर्दन पर कैंची चलाये।   बच्चे के परिवारजन काफी नाराज थे पर उन्होंने ऐसी चर्चा नहीं कि उस आपरेशन से उनका बच्चा कोई अस्वस्थ हुआ हो या उसे आराम नहीं है। बावेला इस बात पर मचा है कि आखिर एक सफाई कर्मचारी ने ऐसा क्यों किया?<br />
इसका कानूनी या नैतिक पहलू जो भी हो  उससे परे हटकर हम तो इसमें कुछ अन्य ही विचार उठता देख रहे हैं।  क्या पश्चिमी चिकित्सा पद्धति इतनी आसान है कि कोई भी सीख सकता है? फिर यह इतने सारे विश्वविद्यालय और चिकित्सालय के बड़े बड़े प्रोफेसर विशेषज्ञ सीना तानकर दिखाते हैं वह सब छलावा है?<br />
अपने यहां कहते हैं कि ‘करत करत अभ्यास, मूरख भये सुजान’। जहां तक काम करने और सीखने का सवाल है अपने लोग हमेशा ही सुजान रहे हैं।  सच कहें तो उस सफाई कर्मचारी ने पूरी पश्चिमी चिकित्सा पद्धति की सफाई कर रखी दी हो ऐसा लग रहा है।  इतनी ढेर सारी किताबों में सिर खपाते हुए और व्यवहारिक प्रयोगों में जान लगाने वाले आधुनिक चिकित्सक कठिनाई से बनते हैं पर उनको अगर सीधे ही अभ्यास कराया जाये तो शायद वह अधिक अच्छे बन जायें।  इससे एक लाभ हो सकता है कि बहुत पैसा खर्च बने चिकित्सक और सर्जन अपनी पूंजी वसूल करने के लिये निर्मम हो जाते हैं। इस तरह जो अभ्यास से चिकित्सक बनेंगे वह निश्चित रूप से अधिक मानवीय व्यवहार करेंगे-हमारा यह आशय नहीं है कि किताबों से ऊंची पदवियां प्राप्त सभी चिकित्सक या सर्जन बुरा व्यवहार करते हैं पर कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने इसे बदनाम किया है।<br />
पश्चिम विज्ञान से परिपूर्ण कुछ लोग ऐसे व्यवहार करते हैं गोया कि वह कोई भारी विद्वान हों। हमारे देश में लगभग आधी से अधिक जनसंख्या तो स्वयं ही अपना देशी इलाज करती है इसलिये इस मामले में बहस तो हो ही नहीं सकती कि यहां सुजान नहीं है। कहते हैं कि सारा विज्ञान अंग्रेजी में है इसलिये उसका ज्ञान होना जरूरी है। क्या खाक विज्ञान है?<br />
अरे भई, किसी को को जुकाम हो गया तो उससे कहते हैं कि तुलसी का पत्ते चाय में डालकर पी लो ठीक हो जायेगा। ठीक हो भी जाता है। अब इससे क्या मतलब कि तुंलसी में कौनसा विटामिन होता है और चाय में कौनसा?  अगर हम जुकाम से मुक्ति पा सकते हैं तो फिर हमें उसमें शामिल तत्वों के ज्ञान से क्या मतलब? अंग्रेजी की किताबों में क्या होता होगा? बीमारियां ऐसी होती है या इस कारण होती हैं। उनके अंग्रेजी नाम बता दिये जाते होंगे। फिर दवाईयों में कौनसा तत्व ऐसा होता है जो उनको ठीक कर देता है-इसकी जानकारी होगी।  इस अभ्यास में पढ़ने वाले का वक्त कितना खराब होता होगा। फिर सर्जन बनने के लिये तो पता नहीं चिकित्सा छात्र कितनी मेहनत करते होंगे? उस सफाई कर्मचारी ने अपना काम जिस तरह किया है उससे तो लगता है कि देखकर कोई भी प्रतिभाशाली आदमी  ध्यानपूर्वक काम करते हुए ही चिकित्सक या सर्जन  बन सकता है।<br />
चिकित्सा शिक्षा का पता नहीं पर इस कंप्यूटर विधा में हम  कुछ पांरगत हो गये हैं उतना तो वह छात्र भी नहीं लगते जो विधिवत सीखे हैं। वजह यह है कि हमें कंप्यूटर और इंटरनेट पर काम करने का जितना अभ्यास है वह केवल अपने समकक्ष ब्लाग लेखकों में ही दिखाई देता है।  संभव है कि हम कभी उन धुरंधर ब्लाग लेखकों से मिलें तो वह चक्करघिन्नी हो जायें और सोचें कि इसने कहीं विधिवत शिक्षा पाई होगी।  अनेक छात्र कंप्यूटर सीखते हैं। उनको एक साल से अधिक लग जाता है। कंप्यूटर वह ऐसे सीखते हैं जैसे कि भारी काम कर रहे हों।  हां, यह सही है कि उनकी कंप्यूटर की भाषा में कई ऐसे शब्द हैं जिनका उच्चारण भी हमसे कठिन होता है पर जब वह हमें काम करते देखते हैं तो वह हतप्रभ रह जाते हैं।<br />
हमने आज तक कंप्यूटर की कोई किताब नहीं पढ़ी।  हम तो कंप्यूटर पर आते ही नहीं पर यह शुरु से चिपका तो फिर खींचता ही रहा।  सबसे पहले एक अखबार में फोटो कंपोजिंग में रूप में काम किया। उस समय पता नहीं था कि यह अभ्यास आगे क्या गुल खिलायेगा।<br />
चिकित्सा विज्ञान की बात हम नहीं कह सकते पर जिस तरह कंप्यूटर लोग सीखते हुए या उसके बाद जिस तरह सीना तानते हैं उससे तो यही लगता है कि उनका ज्ञान भी एक छलावा है।  अधिकतर कंप्यूटर सीखने वालों से मैं पूछता हूं कि तुम्हें हिंदी या अंग्रेजी टाईप करना आता है।<br />
सभी ना में सिर हिला देते हैं। मैं उनसे कहता हूं कि ‘कंप्यूटर का ज्ञान तुम्हारे लिये तभी आसान होगा जब तुम्हें दोनों प्रकार की टाईप आती होगी।  कंप्यूटर पर तुम तभी आत्मविश्वास से कर पाओगे जब की बोर्ड से आंखें हटा लोगे।’<br />
वह सुनते हैं पर उन पर प्रभाव नहीं नजर आता। वह कंप्यूटर का कितना ज्ञान रखते हैं पता नहीं? शायद लोग माउस से अधिक काम करते हैं इसलिये उन्हें पता ही नहीं कि इसका कोई रचनात्मक कार्य भी हो सकता है।  यह आत्मप्रवंचना करना इसलिये भी जरूरी था कि आपरेशन करने वाले उस सफाई कर्मचारी के चेहरे में हमें अपना अक्स दिखाई देगा।<br />
हमें याद उस अखबार में काम करना। वहां दिल्ली से आये कर्मचारियों ने तय किया कि हमें कंप्यूटर नहीं सिखायेंगे। मगर हमने तय किया सीखेंगे।  दोनों प्रकार की टाईप हमें आती थी। हम उनको काम करते देखते थे। उनकी उंगलियों की गतिविधियां  देखते थे। जब वह भोजनावकाश को जाते हम कंप्यूटर पर काम करते थे क्योंकि प्रबंधकों अपनी सक्रियता दिखाना जरूरी था।  एक दिन हमने अपनी एक कविता टाईप कर दी। वह छप भी गयी। हमारे गुरु को हैरानी हुई। उसने कहा-‘तुम बहुत आत्मविश्वासी हो। कंप्यूटर में बहुत तरक्की करोगे।’<br />
उस समय कंप्यूटर पर बड़े शहरों में ही काम मिलता था और छोटे शहरों में इसकी संभावना नगण्य थी।  कुछ दिन बाद कंप्यूटर से हाथ छूट गया। जब दोबारा आये तो विंडो आ चुका था। दोबारा सीखना पड़ा।  सिखाने वाला अपने से आयु में बहुत छोटा था। उसने जब देखा कि हम इसका उपयोग बड़े आत्मविश्वास से कर रहे हैं तब उसने पूछा कि ‘आपने पहले भी काम किया है।’<br />
हमने कहा-‘तब विंडो नहीं था।’<br />
कंप्यूटर एक पश्चिम में सृजित विज्ञान है। जब उसका साहित्य पढ़े बिना ही हम इतना सीख गये तो फिर क्या चिकित्सा विज्ञान में यह संभव नहीं है। पश्चिम का विज्ञान जरूरी है पर जरूरी नहीं है कि सीखने का वह तरीका अपनायें जो वह बताते हैं।  खाली पीली डिग्रियां बनाने की बजाय तो छोटी आयु के बच्चों को चिकित्सा, विज्ञान, इंजीनियरिंग तथा कंप्यूटर सिखाने और बताने वाले छोटे केंद्र बनाये जाना चाहिये।  अधिक से अधिक व्यवहारिक शिक्षा पर जोर देना चाहिये।  हमारे देश में ‘आर्यभट्ट’ जैसे विद्वान हुए हैं पर यह पता नहीं कि उन्होंने कौनसे कालिज में शिक्षा प्राप्त की थी। इतने सारे ऋषि, मुनि और तपस्वियों ने वनों में तपस्या करते हुए अंतरिक्ष, विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र में सिद्धि प्राप्त की।  पहले यकीन नहीं होता था पर अब लगता है कि इस देश में उड़ने वाले पुष्पक जैसे विमान, दूर तक मार करने वाले आग्नेयास्त्र और चक्र रहे होंगे। बहरहाल उस घटना के बारे में अधिक नहीं पता पर इससे हमें एक बात तो लगी कि पश्चिम विज्ञान हो या देशी सच बात तो यह है कि उनका सैद्धांतिक पक्ष से अधिक व्यवहारिक पक्ष है। कोई भी रचनाकर्म अंततः अपने हाथों से ही पूर्ण करना होता है। अतः अगर दूसरे को काम करते कोई प्रतिभाशाली अपने सामने देखे तो वह भी सीख सकता है जरूरी नहीं है कि उसके पास कोई उपाधि हो। वैसे भी हम देख चुके हैं कि उपाधियों से अधिक आदमी की कार्यदक्षता ही उसे सम्मान दिलाती है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<strong>नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक तथा इसका किसी व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है और किसी से इसका विषय मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।</strong></p>
<blockquote><blockquote><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
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<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति-अपराधी की संगत करने पर भी सजा मिल जाती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/07/vidur-niti-dusht-ke-sangat-se-saja-miltee-hai/</link>
<pubDate>Sun, 07 Jun 2009 07:15:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[नीति विशारद विदुर महाराज कहते है कि अस्तयागात् पापकृतामापापांस्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात्। शुष]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><blockquote><p><strong>नीति विशारद विदुर महाराज कहते है कि</strong></p></blockquote>
<p><strong>अस्तयागात् पापकृतामापापांस्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात्।<br />
शुष्केणार्द दह्याते मिश्रभावात् तस्मात् पापैः सहसंधि न कुर्यात्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong> दुर्जन व्यक्ति का  साथ न छोडने पर निरपराध सज्जन को भी उनके सम्मान ही दण्ड प्राप्त होता है। जैसे सूखी लकड़े के साथ मिल जाने पर गीली  भी जल जाती है। इसलिये दुष्ट लोगों की संगत से बचना चाहिये।<br />
<strong>दृश्यनते हि महात्मानो वध्यमानाः स्वकर्मभिः।<br />
इद्रियाणामनीशत्वाद राजानो राज्यविभ्रमैः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>बड़े बड़े राजा और साधु भी इंद्रियों के वश होकर भोग विलास में डूब जाते हैं।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या</strong>-इंद्रियों पर नियंत्रण करने का उपदेश देना बहुत सरल है पर स्वयं ऐसा कर पाना एक कठिन कार्य है। कहने को भूमि का राजा कितना भी विशाल हृदय और दृढ़ चरित्र का लगता हो पर इंद्रियों का गुलाम तो वह भी होता है। उसी तरह प्रतिदिन अपने भक्तों को निष्काम भाव का संदेश देने वाले साधु भी इंद्रियों के आगे लाचार हो जाते हैं।  कहीं सत्संग के लिये पैसे मांगने के लिये सौदेबाजी करते हैं तो कहीं स्वर्ग दिलाने के लिये दान मांगते हैं।  इंद्रियों पर राज्य वही कर सकता है जिसके पास तत्व ज्ञान है। केवल यही नहीं वह उसको हमेशा धारण किये रहता है न कि कहीं केवल बधारने के लिये उसका प्रयोग करता है।</p>
<p>कोयले की दलाली में हाथ काले-यह कहावत तो सभी ने सुनी होगी। यही स्थिति पूरे जीवन में ही रहती है। दुष्टों की संगत में रहते हुए अपने सामने संकट आने की आशंका हमेशा रहती है।  अतः प्रयास करना चाहिये कि उनकी संगत से दूर रहा जाये।  आदमी स्वयं भले ही सचरित्र हो पर अगर वह दुष्टों के साथ रहता है तो उसकी छबि भी उन जैसी बनती है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति-गाली के उत्तर में गाली न दें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/05/manu-smruti-gali-ke-badnle-gali-nahin/</link>
<pubDate>Fri, 05 Jun 2009 04:51:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् न क्रुद्धयंन्तं प्रतिक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन<br />
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्<br />
न क्रुद्धयंन्तं  प्रतिक्रुध्येदाक्रृष्टः कुशलं वदेत्<br />
सप्तद्वाराऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>दूसरे के कड़वे वचनों को सहना करना चाहिये। अपशब्दों (गाली)का उत्तर कभी वैसा ही नहीं देना चाहिये। न ही किसी का अपमान करना चाहिये। यह शरीर तो नश्वर है इसके लिये किसी से शत्रुता करना ठीक नहीं माना जा सकता।<br />
<strong>अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः<br />
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह </strong><br />
<strong></strong><strong>हिंदी में भावार्थ</strong>-अध्यात्म विषयों में अपनी रुचि रखते हुए  सभी वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति निरपेक्ष भाव रखना चाहिये। इसके साथ ही शाकाहारी तथा  इद्रियों से संबंधित विषयो में निर्लिप्त भाव रखते हुए अपने अध्यात्म उत्थान के लिये अपने प्रयास करते रहना चाहिये। इससे मनुष्य सुखपूर्वक इस दुनियां में विचरण कर सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>खानपान और रहन सहन में आई आधुनिकता ने लोगों की सहनशीलता को कम कर दिया है।  लोग जरा जरा सी बात पर उत्तेजित होकर झगड़ा करने पर आमादा है।  स्वयं के पास कितना भी बड़ा पद,धन और वैभव हो पर दूसरे का सुख सहन नहीं कर पाते। गाली का जवाब गाली से देना के लिये सभी तत्पर हैं।  अध्यात्म विषय के बारे में लोगों का कहना है कि उसमें तो वृद्धावस्था में ही जाकर दिलचस्पी रखना चाहिये।  इस अज्ञानता का परिणामस्वरूप  आदमी वृद्धावस्था में अधिक दुखी होता हैं। अगर बचपन से ही अध्यात्म में रुचि रखी जाये तो फिर बुढ़ापे में आदमी को अकेलापन नहीं सताता।  जिसकी रुचि अध्यात्म में नहीं रही वह आदमी वृद्धावस्था में चिढ़चिढ़ा हो जाता है।  ऐसे अनेक वृद्ध लोग हैं जो अपना जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत करते हैं क्योंकि वह बचपन से मंदिर आदि में जाकर अपने मन की शुद्धि कर लेते हैंं और अध्यात्म विषयों पर चिंतन और मनन भी करते हैं।  </p>
<p>बदले की भावना इंसान को पशु बना देती हैं और वह तमाम तरह के ऐसे अपराध करने लगता है जिससे समाज में उसे बदनामी मिलती है।  कई लोग ऐसे हैं जो गाली के जवाब में गाली देकर अपने लिये शत्रुता बढ़ा लेते है। कुछ लोग ऐसे हैं जिनको अभद्र शब्द बोलने और लिखने में मजा आता है जबकि यह अंततः अपने लिये ही दुःखदायी होता है। अपने मस्तिष्क में अच्छी बात सोचने से रक्त में भी वैसे ही कीटाणु फैलते हैं और खराब सोचने से खराब। यह संसार वैसा ही जैसा हमारा संकल्प होता है। अतः अपनी वाणी और विचारों में शुद्धता रखना चाहिये। दूसरे के व्यवहार या शब्दों से प्रभावित होकर उनमें अशुद्धता लाना अपने आपको ही कष्ट देना है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[श्री गुरूवाणी-ढोंगी साधुओं की भूख कभी नहीं मिटती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/30/shri-guruvani-kapati-sadhuon-ki-bhookh/</link>
<pubDate>Sat, 30 May 2009 03:20:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/30/shri-guruvani-kapati-sadhuon-ki-bhookh/</guid>
<description><![CDATA[‘हिरदै जिनके कपटु बाहरहु संत कहाहि। तृस्ना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि।। हिंदी में भावार्थ-ऐसे संत ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>‘हिरदै जिनके कपटु बाहरहु संत कहाहि।<br />
तृस्ना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>ऐसे संत जो कि बाहर ने अपने आपको धार्मिक प्रवृत्ति का प्रदर्शित करते हैं पर उनके हृदय में कपट और पाप होता है उनकी तृष्णा ओर कामनाऐं कभी शांत नहीं होती। अंत में उनको बहुत पछताना पड़ता है। </p>
<p><strong>‘जिना अंतरि कपटु विकार है तिना रोइ किआ कीजै।’<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार जिनके मन में कपट और विकार हैं उनकी विपत्तियां देखकर उनके साथ सहानुभूति दिखाना व्यर्थ है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>श्री गुरुनानक देव जी ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर ही प्रहार नहीं किये बल्कि समाज को मार्गदर्शन करने वाले कथित धार्मिक संतों-जो केवल आजीविका के लिये धार्मिक प्रतीक धारण करते हुए चोला पहन लेते हैं-की नाटकबाजी की भी आलोचना की।<br />
यह सच है कि आम इंसान में लोभ और लालच की प्रवृत्ति होती है पर वह उसकी पूर्ति के लिये अपनी सीमा में नैतिक आधार पर कर्म करता है। इतना ही नहीं अगर उसकी इच्छाऐं और कामनायें पूरी न हों तो वह एक बार उनकी पूर्ति करने का इरादा छोड़ भी देता है क्योंकि वह अकेले होने के कारण अपने उद्ददेश्य की लिये लंबे समय तक संघर्ष नहीं कर सकता।  जबकि कथित लोभी और लालची साधु की कभी तृष्णायें शांत नहीं होती फिर उनको अपनी पूज्यता, सम्मान और शक्ति का भ्रम इस कदर ढीठ बना देता है कि वह अपनी इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिये किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। उसके लिये उनको अपने ही जैसे लोभी और लालची शिष्यों का भी समर्थन मिलता है।  श्री गुरुग्रंथ साहिब की वाणियों से यही संदेश मिलता है किं ऐसे ही कथित ढोंगी और लालची साधुओं से सतर्क रहना चाहिये जो कि इच्छा और तृष्णा की पूर्ति न होने पर एक आम आदमी से अधिक खतरनाक हो जाते हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.. </p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-थोड़ी जमीन पाकर इतराते हैं बेवकूफ इंसान]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/28/zamin-aur-insan-niti-shatak/</link>
<pubDate>Thu, 28 May 2009 03:11:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/28/zamin-aur-insan-niti-shatak/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;- अभुक्तायां यस्यां क्षणमपि न ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong>अभुक्तायां यस्यां क्षणमपि न यातं नुपशर्तर्भुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभुजाम्।<br />
तदंशस्याष्यंशे तदवयलेशेऽपि पतयो विषादे कत्र्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम्।।</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>इस प्रथ्वी को अनेक राजाओं ने भोगा पर फिर भी इसे पाने वाले नये राजा अभिमान करते रहे।   इसके छोटे से छोटे अंश को पाकर भी मूर्ख लोग अपनी अकड़ दिखाने लगते हैं।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>वैसे खाने पीने का विषय हो तो लोग झूठा खाने को तैयार नहीं होते। ऐसा करना वह अपनी शान के खिलाफ मानते हैं मगर यह प्रथ्वी जो सदियों से अपनी धुरी पर घूम रही है और इसे अनेक राजा भोग चुके हैं पर इसका एक अंश मिल जाने पर भी उसका नया मालिक इतराने लगता है।  तब उसे यह विचार नहीं आता कि यह प्रथ्वी पहले किसी अन्य के स्वामित्व में थी और अब यह उसे झूठन के रूपें मिली है फिर इस पर इतराना नहीं चाहिये।  भले ही जमीन के अंश पर नयी इमारत बने पर वह है तो किसी की झूठन ही न! क्या लोग दूसरे की झूठन किसी नयी थाली में मिलने पर स्वीकार करते हैं? कतई नहीं! इसलिये ज्ञानी लोग नया मकान या भूखंड मिलने पर अपने स्वामित्व का अहंकार नहीं पालते पर मूर्ख लोग ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वह जमीन का वह टुकड़ा आसमान से उतार कर स्वयं लाये हैं।<br />
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अहंकार मनुष्य को अज्ञानी बना देता है और वह अपनी भौतिक उपलब्धियों पर ऐसे इतराता है जैसे उसने पर ससंार ही स्वयं बनाया हो। इसके विपरीत ज्ञानी मनुष्य इस बात को जानते हैं कि आज जो उसके पास है वह पहले किसी अन्य के पास था और उसके बाद किसी अन्य के पास होगा।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि शतकः खामोश रहने से होते  ढेर सारे लाभ ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/16/khamoshi-se-labh-bhartrihari-shatak/</link>
<pubDate>Sat, 16 May 2009 05:01:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/16/khamoshi-se-labh-bhartrihari-shatak/</guid>
<description><![CDATA[स्वायत्तेमेकांतगुणं विधात्रा विनिर्मितम् छादनमज्ञतायाः। विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितना]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>स्वायत्तेमेकांतगुणं विधात्रा विनिर्मितम् छादनमज्ञतायाः।<br />
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितनाम्।।</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>विधाता ने स्वयं को एकांत में मौन रहने का गुण बनाया है उसके लिये किसी के सामने याचना करने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य चाहे जब एकांत में बैठकर मौन रह सकता है। समाज में रहते हुए मौन रहने की शक्ति किन्हीं किन्हीं विद्वानों में होती है और वह समाज का अलंकरण मानत जाते हैं।<br />
<strong>वर्तमान संपादकीय व्याख्या-</strong>परमात्मा ने वाणी दी है पर सभी लोग उससे अपनी बात कहना चाहते हैं।  परमात्मा ने कान दिये हैं पर कोई किसी की सुनना उनसे नहीं चाहता। भगवान ने आंखें दी है और इंसान देखता है पर सोचने समझने के लिये  बुद्धि भी दी है वह उससे हर दृश्य का विश्लेषण का करते हुए उसके अच्छे और बुरे का विचार नहीं करता।<br />
समाज में जिसे देखों ज्ञान चर्चा कर रहा है पर उसे धारण कोई नहीं करता। स्थिति यह है कि किसी से कोई बात कही जाये तो उसने सुनी कि नहीं इसका यकीन नहीं होता। अगर सुनी तो उसे समझा कि नहीं इसका आभास भी नहीं होता। कई बार एकांत में बैठकर यह विचार हमारे दिमाग में आता है कि हम क्यों अपने दुःख दर्द दूसरों को सुनाते हैं जबकि सभी उसी में फंसे है।<br />
लोगों ने शोर का प्रत्युतर शोर ही बना लिया है जबकि उसका प्रतिकार मौन से ही किया जा सकता है।  दूसरों को अपनी समस्यायें और दुःख दर्द सुनाने की बजाय एकांत में मौन रहकर उन पर विचार करें तो कोई मार्ग बन सकता है।  लोगों के बीच अपनी बात कहते हुए अपनी हंसी का पात्र बनने से अच्छा है कि हम एकांत में उस पर योजना बनाये। भगवान ने आदमी को आजाद बनाया है और उसे एकांत में बैठकर मौन रहने का गुण भी दिया है तब उसका उपयोग किया जाय तो क्या बुराई है?<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
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<title><![CDATA[संत कबीर दास  वाणीः हृदय की बात स्वत: जाने वही है सच्चा प्रेम ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/06/dil-ki-bat-aur-pyar-kabir-vani/</link>
<pubDate>Wed, 06 May 2009 03:49:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात अपने जिय से जानिये, मेरे जिय की बात संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात<br />
अपने जिय से जानिये, मेरे जिय की बात</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब प्रेम का भाव हृदय में उत्पन्न होता है तो दोनों प्रेमी आपस में इस तरह मिले हुए लगते हैं जैसे कि वह एक तत्व हों। वह दोनों अपने मुख से कहे बगैर एक दूसरे के हृदय की बात जान लेते हैं।<br />
<strong>प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकासय<br />
राजा परजा जो रुचै, शीश देव ले जाये</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम की फसल किसी खेत में नहीं होती और न ही वह किसी हाट या बाजार में बिकता है। प्रेम तो वह भाव है कि अगर किसी व्यक्ति के प्रति मन में आ जाये तो भले ही वह सिर काटकर ले जाये। यह भाव राजा और प्रजा दोनों में समान रूप से विद्यमान होता है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>आजकल तो हर जगह प्रेम प्रेम शब्द का उच्चारण होता है। खासतौर से आजकल के बाजार युग में प्रेम को केवल युवक युवतियों के आपसी संपर्क तक ही सीमित हो गया है। इसमें केवल तत्कालिक शारीरिक आकर्षण में बंधना ही प्रेम का पर्याय बन गया है।  सच बात तो यह है कि प्रेम तो किसी से भी किया जा सकता है। भारतीय अध्यात्म में प्रेम का तो व्यापक अर्थ है और उसमें केवल निरंकार परमात्मा के प्रति ही किया गया प्रेम सच्चा माना जाता है।  संसार में विचरण कर रहे जीवन से प्रेम करना तो एक  तरह से अपनी आवश्यकताओं से उपजा भाव है। हां, अगर उनसे भी अगर निष्काम प्रेम किया जाये तो उससे सच्चे प्रेम का पर्याय माना जाता है। </p>
<p>सच्चा प्रेम तो वही है जिसमेंे कोई प्रेमी दूसरे से किसी प्रकार की आकांक्षा न करे जहां आकांक्षा हो वहां तो वह  प्रेम सच्चा नहीं रह जाता। प्रेम का भाव तो स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है और वह बाह्य रूप नहीं बल्कि किसी व्यक्ति के आंतरिक गुणों से ही जाग्रत होता है।  अतः जो निच्छल मन, उच्च विचार, और त्यागी भाव के होते हैं उनके प्रति सभी लोगों में मन में प्रेम का भाव उत्पन्न होता है।<br />
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<p><strong>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
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<p><strong></strong></p>
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<title><![CDATA[रहीम दास के दोहे -पत्थर पानी में रहते हुए भी गीला नहीं होता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/05/patthar-aur-pani-rahim-ke-dohe/</link>
<pubDate>Tue, 05 May 2009 03:37:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[रहिमन बहरी बाज, गगर चढ़ै फिर क्यों तिरै। पेट अधम के काज, फेरि आय बंधन परै।। कविवर रहीम कहते हैं कि जि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>रहिमन बहरी बाज, गगर चढ़ै फिर क्यों तिरै।<br />
पेट अधम के काज, फेरि आय बंधन परै।।</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह बहरा बाज आसमान में उड़ता है फिर भी उसे मुक्ति नहीं मिलती क्योंकि वह अपने पापी पेट के लिये बार बार इस धरती के बंधन में फंस जाता है।<br />
<strong>रहिमन नीर पखान, बूड़ै पै सीझै नहीं।<br />
तैसे मूरख ज्ञान, बूझै पै सूझै नहीं।।</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि पत्थर पानी में डूब जाता है पर फिर भी गीला नहीं होता। यही स्थिति मूर्ख लोगों की है जो ज्ञान की खोज में रहते हैं पर उसे धारण नहीं करते और उनकी स्थिति जस की तस ही रहती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> इस विश्व में ज्ञानियों का झूंड हर जगह मिलेगा जो सामान्य लोगों को ज्ञान देता फिरता है।  लोग उनको सुनते हैं और वाह वाह करने के बाद उनके संदेशों का सार भूल जाते हैं। कथित ज्ञानी भी कैसे हैं? किसी को पैसे की भूख है तो किसी को राज्य की और कोई प्रतिष्ठा की चाहत रखता है।  हर ज्ञानी अपनी विचाराधारा के अनुसार तय रंगों के वस्त्र पहनता है जो कि इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं उसकी सोच दायरों में बंधी है।  पूरे विश्व को स्वतंत्र और मौलिक सोच का संदेश देने वाले यह कथित ज्ञानी स्वयं ही मन के ऐसे बंधनों में बंधे रहते हैं जिनसे कभी उनकी स्वयं की मुक्ति नहीं होती।</p>
<p>भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान ही इस बात की पुष्टि करता है कि मनुष्य का मन ही उस पर सवारी  करता है और भ्रम उसे स्वयं की सवार होने का होता है। अपनी दैहिक आवश्यकताओं की पूति के लिये मनुष्य उससे अधिक प्रयास करता है। अर्थ संचय की उसकी क्षुधा उमर भर शांत नहीं होती पर इधर अंदर स्थित अध्यात्मिक शक्तियां भी अपने लिये कार्य करने के लिये प्रेरित करती हैं और वह इसके लिये इन कथित ज्ञानियों के यहां मत्था टेकता है पर जब वापस आता है तो फिर इसी दुनियां के जाल में फंस जाता है।  तत्वज्ञान के बिना मनुष्य की स्थिति उस बाज की तरह होती है जो आकाश में उड़ता है पर फिर अपनी पेट की भूख के लिये इस धरती पर आता है और वह उस गीले पत्थर की तरह हो जाता है जो पानी में रहते हुए भी गीला नहीं होता।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मजदूर दिवस: श्री गीता के अनुसार अकुशल श्रम को हेय न समझें-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/01/mazdoor-divas-aur-shri-gita/</link>
<pubDate>Fri, 01 May 2009 17:22:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/01/mazdoor-divas-aur-shri-gita/</guid>
<description><![CDATA[आज मजदूर दिवस है और कई जगह मजदूरों के झुंड एकत्रित कर रैलियाँ निकालीं जायेंगी। ऐसा नहीं है कि हमारे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज मजदूर दिवस है और कई जगह मजदूरों के झुंड एकत्रित कर रैलियाँ निकालीं जायेंगी। ऐसा नहीं है कि हमारे दर्शन में मजदूरों के लिए कोई सन्देश नहीं है पर उसमें मनुष्य में वर्गवाद के वह मन्त्र नहीं है जो समाज में संघर्ष को प्रेरित करते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन  द्वारा प्रवर्तित  जीवनशैली पर दृष्टिपात करें तो   उसमें पूंजीपति मजदूर और गरीब अमीर को  आपस में सामंजस्य स्थापित करने का सन्देश है।   भारत में एक समय संगठित और अनुशासित समाज था जो कालांतर में बिखर गया। इस समाज में अमीर और गरीब में कोई सामाजिक तौर से कोई अन्तर नहीं था।<br />
<strong>न द्वेष्टयकुशर्ल कर्म कुशले नातुषज्जजते।<br />
त्यागी सत्तसमाष्टिी मेघावी छिन्नसंशयः।।<br />
&#8220;जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्वगुण से युक्त पुरुष संशय रहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।&#8221;</strong><br />
श्रीमदभागवत गीता के १८वे अध्याय के दसवें श्लोक में उस असली समाजवादी विचारधारा की ओर संकेत किया गया है जो हमारे देश के लिए उपयुक्त है । जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारे इस ज्ञान सहित विज्ञानं से सुसज्जित ग्रंथ में कोई भी संदेश विस्तार से नहीं दिया क्योंकि ज्ञान के मूल तत्व सूक्ष्म होते हैं और उन पर विस्तार करने पर भ्रम की स्थिति निमित हो जाती है, जैसा कि अन्य विचारधाराओं के साथ होता है। श्री मद्भागवत गीता में अनेक जगह हेतु रहित दया का भी संदेश दिया गया है जिसमें अपने अधीनस्थ और निकटस्थ व्यक्तियों की सदैव सहायता करने के प्रेरित किया गया है।<br />
<strong>स्वै स्वै कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।<br />
सव्कर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।<br />
अपने अपने स्वाभाविक कार्ये में तत्परता से लगा मनुष्य भक्ति प्राप्त करते हुए उसमें सिद्धि प्राप्त लेता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि प्राप्त करता है उस विधि को सुन।</strong><br />
<strong>यतः प्रवृत्तिभूंतानां वेन सर्वमिद्र ततम्।<br />
स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।<br />
जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्तपति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।</strong><br />
 श्रीमदभागवत गीता में ऊपर लिखे श्लोक को देखें तो यह साफ लगता है अकुशल श्रम से आशय मजदूर के कार्य से ही है । आशय साफ है कि अगर आप शरीर से श्रम करे हैं तो उसे छोटा न समझें और अगर कोई कर रहा है तो उसे भी सम्मान दे। यह मजदूरों के लिए संदेश भी है तो पूंजीपतियों के लिए भी है ।<br />
श्री गीता में ही  हेतु रहित दया का सन्देश  तो स्पष्ट रुप से धनिक वर्ग के लोगों के लिए ही कहा गया है-ताकि समाज में समरसता का भाव बना रहे।  कार्ल मार्क्स एक बहुत बडे अर्थशास्त्री  माने जाते है जिन के विचारों पर गरीबों  और शोषितों के लिए अनेक विचारधाराओं का निर्माण हुआ और जिनका नारा था &#8220;दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ&#8221;।<br />
शुरू में नये नारों के चलते लोग इसमें बह गये पर अब लोगों को लगने लगा है कि अमीर आदमी भी कोई ग़ैर नहीं वह भी इस समाज का हिस्सा है-और जो उनके खिलाफ उकसाते हैं वही उसने हाथ भी मिलाते हैं । जब आप किसी व्यक्ति या उनके समूह को किसी विशेष संज्ञा से पुकारते हैं तो उसे बाकी लोगों से अलग करते हैं तो कहीं न कहीं समाज में विघटन के बीज बोते हैं।<br />
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रीगीता में अपने स्वाभाविक कर्मों में अरुचि न दिखाने का संदेश दिया गया है। सीधा आशय यह है कि कोई भी काम छोटा नहीं है और न तो अपने काम को छोटा और  न किसी भी छोटा काम करने वाले व्यक्ति को हेय समझना चाहिये। ऐसा करना बुद्धिमान व्यक्ति का काम नहीं करना चाहियैं। कई बार एसा होता है कि अनेक धनी लोग किसी गरीब व्यक्ति को हेय समझ कर उसकी उपेक्षा करते हैं-यह तामस प्रवृत्ति है। उसी तरह किसी की मजदूरी कम देना या उसका अपमान केवल इसलिये करना कि वह गरीब है, अपराध और पाप है। हमेशा दूसरे के गुणों और व्यवहार के आधार पर उसकी कोटि तय करना चाहिये।<br />
भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके गुणों, कर्म और व्यक्तित्व के आधार पर तय होती है  उसके व्यवसाय और आर्थिक शक्ति  पर नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो संत शिरोमणि श्री कबीरदास, श्री रैदास तथा अन्य अनेक ऎसी विभूतियाँ हैं जिनके पास कोई आर्थिक आधार नहीं था पर  वे आज हिंदू विचारधारा के आधार स्तम्भ माने जाते हैं।<br />
 कुल मिलाकर हमारे देश में अपनी विचारधाराएँ और व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने इस समाज को एकजुट रखने में अपना योगदान दिया है और इसीलिये वर्गसंघर्ष के भाव को यहां कभी भी लोगों के मन में स्थान नहीं मिल पाया-जो गरीबो और शोषितों के उद्धार के लिए बनी विचारधाराओं का मूल तत्व है। परिश्रम करने वालों ने रूखी सूखी खाकर भगवान का भजन कर अपना जीवन गुजारा तो सेठ लोगों ने स्वयं चिकनी चुपडी खाई तो घी और सोने के दान किये और धार्मिक स्थानों पर धर्म शालाएं बनवाईं । मतलब समाज कल्याण को कोई अलग विषय न मानकर एक सामान्य दायित्व माना गया-बल्कि इसे मनुष्य समुदाय के लिए एक धर्म माना गया  वह अपने से कमजोर व्यक्ति की सहायता करे। आज के दिन अकुशल काम करने वाले मजदूरों के लिए एक ही संदेश मैं देना चाहता हूँ कि अपने को हेय न समझो । सेठ साहूकारों और पूंजीपतियों के लिए भी यह कहने में कोइ संकोच नहीं है अपने साथ जुडे मजदूरों और कर्मचारियों पर हेतु रहित दया करें ।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति  शतकः जमीन का छोटा टुकड़ा  पाकर मूर्ख लोग ही घमंड दिखाते  है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/04/28/thotha-chana-baje-ghana-bhartrihari/</link>
<pubDate>Tue, 28 Apr 2009 03:13:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/04/28/thotha-chana-baje-ghana-bhartrihari/</guid>
<description><![CDATA[अभुक्तायां यस्यां क्षणमपि न यातं नुपशर्तर्भुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभुजाम्। तदंशस्याष्यंशे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>अभुक्तायां यस्यां क्षणमपि न यातं नुपशर्तर्भुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभुजाम्।<br />
तदंशस्याष्यंशे तदवयलेशेऽपि पतयो विषादे कत्र्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम्।।</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>इस प्रथ्वी को अनेक राजाओं ने भोगा पर फिर भी इसे पाने वाले नये राजा अभिमान करते रहे।   इसके छोटे से छोटे अंश को पाकर भी मूर्ख लोग अपनी अकड़ दिखाने लगते हैं।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>वैसे खाने पीने का विषय हो तो लोग झूठा खाने को तैयार नहीं होते। ऐसा करना वह अपनी शान के खिलाफ मानते हैं मगर यह प्रथ्वी जो सदियों से अपनी धुरी पर घूम रही है और इसे अनेक राजा भोग चुके हैं पर इसका एक अंश मिल जाने पर भी उसका नया मालिक इतराने लगता है।  तब उसे यह विचार नहीं आता कि यह प्रथ्वी पहले किसी अन्य के स्वामित्व में थी और अब यह उसे झूठन के रूपें मिली है फिर इस पर इतराना नहीं चाहिये।  भले ही जमीन के अंश पर नयी इमारत बने पर वह है तो किसी की झूठन ही न! क्या लोग दूसरे की झूठन किसी नयी थाली में मिलने पर स्वीकार करते हैं? कतई नहीं! इसलिये ज्ञानी लोग नया मकान या भूखंड मिलने पर अपने स्वामित्व का अहंकार नहीं पालते पर मूर्ख लोग ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वह जमीन का वह टुकड़ा आसमान से उतार कर स्वयं लाये हैं।<br />
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अहंकार मनुष्य को अज्ञानी बना देता है और वह अपनी भौतिक उपलब्धियों पर ऐसे इतराता है जैसे उसने पर ससंार ही स्वयं बनाया हो। इसके विपरीत ज्ञानी मनुष्य इस बात को जानते हैं कि आज जो उसके पास है वह पहले किसी अन्य के पास था और उसके बाद किसी अन्य के पास होगा।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
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