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	<title>hindi-friends &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/hindi-friends/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-friends"</description>
	<pubDate>Wed, 10 Feb 2010 06:51:35 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[भाषा का लफड़ा-हिन्दी हास्य व्यंग्य (bhasha ka lafada-hindi commedy satire]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/15/bhasha-vivad-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 11:54:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/15/bhasha-vivad-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[शाम के समय दीपक बापू अपने घर से बाहर निकल एक निकट के उद्यान में हवा खाने पहुंचे। अंदर प्रवेश करने से]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>शाम के समय दीपक बापू अपने घर से बाहर निकल एक निकट के उद्यान में हवा खाने पहुंचे। अंदर प्रवेश करने से पहले ही द्वार पर खड़े होकर उन्होंने देखा कि आदमी को  देखा जिसकी पीठ उनकी तरफ थी। उसके बाल कंधे गर्दन तक लटके हुए थे। सिर और शरीर चैड़ा था। उसने चूड़ीदार पायजामा और चमकदार पीला कुर्ता पहने रखा था। दीपक बापू का अनुमान था कि वह आलोचक महाराज ही होंगे इसलिये वह अंदर जायें कि नहीं इस विचार में खड़े हो गये। वह नहीं चाहते थे कि आलोचक महाराज के कटु शब्द वहां घूम रहे अन्य लोगों के सामने सुनकर अपनी भद्द पिटवायें।<br />
इससे पहले वह कोई निर्णय करते उस आदमी ने अपना मुंह फेर कर उनकी तरफ किया।  दीपक बापू की घिग्घी बंध गयी।  वह आलोचक महाराज ही थे। दीपक बापू खीसें निपोड़ते हुए उनके पास पहुंच गये और हाथ जोड़कर बोले-नमस्ते महाराज, यह आप तफरी के लिये आये हैं! अच्छा है, इससे तंदुरस्ती बढ़ती है।’<br />
आलोचक महाराज ने बिना किसी भूमिका बांधे कहा-‘हम तो पहले ही तंदुरस्त हैं। देखो इतनी बड़ी देह के साथ ही  समाज में भी हमारी  इज्जत है! तुम्हारी तरह कीकड़ी कवि नहीं है कि अनजान होकर इधर बाग में टहलने आयें।  हमें पता था कि तुम शाम को यहां आते हो इसलिये ही तुम्हारा इंतजार कर रहे थे।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज, अभी तो हम तफरी के मूड में हैं फिर कभी बात करेंगे।’<br />
आलोचक महाराज बोले-‘वह फंदेबाज तुम्हारा दोस्त है न! उसे जरा समझा देना। अपने किये की माफी मांग ले वरना हम तुम्हारी कविताओं को अखबार में छपना बंद करवा देंगे।’<br />
दीपक बापू ने अपनी टोपी उतारी और सिर पर हाथ फेराने लगे। आलोचक महाराज बोले-डर गये न!’<br />
दीपक बापू बोले-‘नहीं डरे काहे को? हम तो यह सोच रहे हैं कि कहां आपने मुसीबत ले ली।  फंदेबाज हमारे गले में दोस्त की तरह फंसा है वरना हमारा उससे क्या वास्ता? उसकी बेवकूफियों की वजह से हम हास्य कवितायें लिखते हैं वरना तो जोरदार साहित्यकार होते!   आप उससे सुलह कर लीजिये वरना वह आपको परेशान करेगा। वैसे आपका झगड़ा हुआ किस बात पर था?’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘तुम्हारी बात को लेकर।  वह एक कार्यक्रम में पहुंच गया।  वहां हमने तुम्हारा उदाहरण देकर नये कवियों को समझाया कि देखो उस फ्लाप दीपक बापू को! कभी एक विषय पर ढंग से नहीं लिखता। योजनाबद्ध ढंग से नहीं लिखता। बस वह फंदेबाज मंच पर चढ़ आया और हमें लात घूंसे दिखाने लगा।  कुछ बुर्र बुर्र और हुर्र हुर्र बोल रहा था। हमने तो पहचान लिया क्योंकि उस लफंगे को कई बार तुम्हारे साथ साइकिल पर पीछे बैठे जाते देखा है।’<br />
दीपक बापू बोले-‘शर्मनाक! उसने आप जैसे महान आदमी को अपनी गूंगी मातृभाषा में इतनी भद्दी गालियां दी। हम तो यह गालियां अपनी जुबान से भी नहीं निकाल सकते।’<br />
आलोचक महाराज चैंके-‘वह गालियां दे रहा था! उसकी भाषा अपने समझ में नहीं आयी। हमने तो उसे कई बार अपनी भाषा में बोलते देखा है।’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज उसकी मात्ृभाषा गूंगी है।  उसी मेें वह आपको गालियां दे रहा था।<br />
आलोचक महाराज-‘यह कौनसी भाषा है?’<br />
दीपक बापू-‘हमें नहीं मालुम।’<br />
आलोचक महाराज-‘तो तुम्हें मालुम क्या है?’<br />
दीपक बापू-‘यही कि उसकी मातृभाषा गूंगी है। जब वह गुस्से में होता है तब यही भाषा बोलता है।’<br />
आलोचक महाराज बोले-‘उसका मोबाइल नंबर दो।  अभी उसको फोन करता हूं और जो शराब की बोतल के पैसे उसको दिये वापस मांगता हूं। मैंने यह सोचकर उस कार्यक्रम में उससे हंगामा फिक्स किया था कि वह तुम्हारा दोस्त है। इससे तुम्हें भी प्रचार मिल जायेगा  और तुम कहते हो कि दोस्त नहीं है तो अब देखो उसकी क्या हालत करता हूं? हमें गूंगी भाषा में गालियां देता है। देखो तुम अपनी भाषा वाले हो। हमारा साथ देना। उसके खिलाफ बयान अखबार में देना। यह गूंगी भाषा वाला समझता क्या है?<br />
दीपक बापू ने रुमाल आलोचक महाराज की तरफ बढ़ाते हुए कहा-‘लीजिये महाराज, आवेश में आपका पसीना निकल रहा है।  यह आपका हंगामा फिक्स था तो फिर हमेें काहे धमकाने आये।’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘उसने यह शर्त रखी थी कि उसकी तरफ से तुम्हारे प्रति वफादारी का प्रमाण पत्र पेश करूं।  मगर अब मामला भाषा का है। तुम हम एक हो जाते हैं।’<br />
दीपक बापू बोले-‘कतई नहीं महाराज! आपका झगड़ा हुआ है और इसमें हम कतई नहीं पड़ेंगे।  झगड़ा किसी बात पर और नाम जाति, भाषा और धर्म का लेकर लोगों को लड़ाने का प्रयास कम से कम हमारे साथ तो नहीं चलेगा। रहा अखबार में छपने का सवाल तो हम आपके पास नहीं लायेंगे अपनी रचना!<br />
आलोचक महाराज बोले-‘नहीं तुम लाना! पर हम नहीं छपवायेंगे अखबार में। जब लाओगे और नहीं छपेगा तभी तो हमारे गुस्से का पता चलेगा? अपनी भाषा में हमारी जो इज्जत है उसकी परवाह न करने का परिणाम कैसे चलेगा तुमको?’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज हमें पता है! आप हमारी कविताओं के विषय चुराकर दूसरों को सुनाकर उनसे दूसरी रचनायें लिखवाते हो। आपके पास विषय चिंतन तो  है ही नहीं।  एकाध बार साल में कहीं रचना छपवाकर एहसान हम पर करते हैं! नमस्कार हम चलते हैं! वैसे आप इस विषय को यहीं बंद कर दें क्योंकि आपने यह राज उजागर कर ही दिया है कि वह हंगामा फिक्स था!’<br />
दीपक बापू घर वापस चल पड़े। रात हो चली थी। इधर दारु की बोतल के साथ फंदेबाज भी उनको अपने ही घर के बाहर खड़ा मिला। उनको देखते ही बोला-‘आओ दीपक बापू। आज तुम्हारे लिये जोरदार खबर लाया हूं। आज मैंने आलोचक महाराज की क्या धुर उतारी है! तुम देखते तो वाह वाह कर उठते!  इसी खुशी में यह बोतल खरीद कर अपने घर ले जा रहा था। सोचा तुम्हें बताता चलूं।’<br />
दीपक बापू हंसकर बोले-‘हमें पता है! आलोचक महाराज ने गुस्से में बता दिया कि यह हंगामा फिक्स था! अब तुम अपनी सफाई मत देना।’<br />
फंदेबाज बोला-‘उसने ऐसा किया? अभी जाकर उसकी खबर लेता हूं।’<br />
दीपक बापू बोले-‘यह बोतल घर ले जाकर पीओ।  वरना यह भी छिन जायेगी।  वह बहुत गुस्से में हैं। वहां जो तुम बुर्र बुर्र और हुर्र हुर्र बोले रहे थे उसका मतलब उनके समझ में आ गया है।’<br />
फंदेबाज  बोला-‘पर वह तो मैं ऐसे ही कर रहा था1’<br />
दीपक बापू-‘हमने उनसे कह दिया कि वह अपनी मात्ृभाषा गूंगी में आपको गालियां दे रहा था। तुम कहते भी हो कि मेरी मातृभाषा गूंगी है!’<br />
फंदेबाज-‘वह तो इसलिये कि मेरी माताजी गूंगी है। यह कोई अलग से भाषा नहीं है। तुमने यह क्या आग लगाई।’<br />
दीपक बापू बोले-‘लगाई तो तुमने! हमने तो बुझाई।  दोनों ने हमारा नाम लेकर हंगामा किया और हमने दोनों की कराई लड़ाई।’<br />
दीपक बापू अंदर चले गये इधर फंदेबाज बुदबुदाया-‘अब इसका क्या नशा चढ़ेगा! इनको तो पता चल गया  कि यह हंगामा फिक्स था! फिर यह अपनी भाषा और गूंगी भाषा का मुद्दा चिपकाये आये हैं।  वह आलोचक महाराज पूरा खब्ती है। खबरों में छपने के लिये वह कुछ भी कर सकता है।  इससे पहले कि वह कुछ करे उसे समझाये आंऊ कि गूंगी कोई अलग से भाषा नहीं है। इस दीपक बापू का क्या? यह तो हास्य कविता लिखकर फारिग हो लेगा। मेरी शामत आयेगी। यह बोतल भी आलोचक महाराज को वापस कर आता हूं<br />
वह तुरंत वहां से चल पड़ा।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
<b>कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किताबों में लिखे शब्द दुनियां नहीं चलाते-व्यंग्य कविता (kitab,shabd aur duniya-vyangya kavita)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/12/shabda-ke-duniyan-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 15:37:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/12/shabda-ke-duniyan-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[किताबों में लिखे शब्द कभी दुनियां नहीं चलाते। इंसानी आदतें चलती अपने जज़्बातों के साथ कभी रोना कभी ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>किताबों में लिखे शब्द<br />
कभी दुनियां नहीं चलाते।<br />
इंसानी आदतें चलती<br />
अपने जज़्बातों के साथ<br />
कभी रोना कभी हंसना<br />
कभी उसमें बहना<br />
कोई फरिश्ते आकर नहीं बताते।</p>
<p>ओ किताब हाथ में थमाकर<br />
लोगों को बहलाने वालों!<br />
शब्द दुनियां को सजाते हैं<br />
पर खुद कुछ नहीं बनाते<br />
कभी खुशी और कभी गम<br />
कभी हंसी तो कभी गुस्सा आता<br />
यह कोई करना नहीं सिखाता<br />
मत फैलाओं अपनी  किताबों में<br />
लिखे शब्दों से जमाना सुधारने का वहम<br />
किताबों की कीमत से मतलब हैं तुम्हें<br />
उनके अर्थ जानते हो तुम भी कम<br />
शब्द समर्थ हैं खुद<br />
ढूंढ लेते हैं अपने पढ़ने वालों को<br />
गूंगे, बहरे और लाचारा नहीं है<br />
जो तुम उनका बोझा उठाकर<br />
अपने फरिश्ते होने का अहसास जताते।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
<b>कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[योगासन,  प्राणायाम, ध्यान और धारणा-हिन्दी लेख (hindi lekh on yogasan)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/10/yogasan-dhyam-aur-pranayam-hindi-article/</link>
<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 03:56:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/10/yogasan-dhyam-aur-pranayam-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[प्राचीन भारतीय योग साधना पद्धति की तरफ पूरे विश्व का रुझान बढ़ना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। आज से द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>प्राचीन भारतीय योग साधना पद्धति की तरफ पूरे विश्व का रुझान बढ़ना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। आज से दस वर्ष पूर्व तक अनेक लोग योगसाधना को अत्यंत गोपनीय या असाधारण बात समझते थे। ऐसी धारणा बनी हुई थी कि योग साधना सामान्य व्यक्ति के करने की चीज नहीं है। इसका कारण यह था कि शरीर के लिये विलासिता की वस्तुओं का उपभोग बहुत कम था और लोग शारीरिक श्रम के कारण बीमार कम पड़ते थे।<br />
आज की नयी पीढ़ी के लोगों जहां भी वाहन का स्टैंड देखते हैं वहां पर पैट्रोल चालित वाहनों को अधिक संख्या में देखते हैं  जबकि पुरानी पीढ़ी के लोगों के अनुभव इस बारे में अलग दिखाई देते हैं।   पहले इन्हीं स्टैंडों पर साइकिलें खड़ी मिलती थीं। सरकारी कार्यालय, बैंक, सिनेमाघर तथा उद्यानों के बाहर साइकिलों की संख्या अधिक दिखती थी।  फिर स्कूटरों की संख्या बढ़ी तो अब कारों के काफिले सभी जगह मिलते हैं।  पहले जहां रिक्शाओं, बैलगाड़ियों तथा तांगों की वजह से जाम लगा देखकर मन में क्लेश होता था वहीं अब कारें यह काम करने लगी हैं-यह अलग बात है कि गरीब वाहन चालकों को लोग इसके लिये झिड़क देते थे पर अब किसी की हिम्मत नहीं है कार वाले से कुछ कह सके। </p>
<p>योगसाधना की शिक्षा बड़े लोगों का शौक माना जाता था। यह सही भी लगता है क्योंकि परंपरागत वाहनों तथा साइकिल चलाने वालों का दिन भर व्यायाम चलता था।  उनकी थकान उनको रात को चैन की नींद का उपहार प्रदान करती थी।  उस समय ज्ञानी लोगों का इस तरफ ध्यान नहीं गया कि लोगों को योगासन से अलग प्राणायाम तथा ध्यान की तरफ प्रेरित किया जाये।  संभवतः योगासाधना के आठों अंगों में से पृथक पृथक सिखाने का विचार किसी ने नहीं किया। अब जबकि विलासिता पूर्ण जीवन शैली है तब योगसाधना की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव की जा रही है तो उसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए।  पहले जब लोग पैदल अधिक चलने के साथ ही परिश्रम करते थे इसलिये उनका स्वास्थ्य सदैव अच्छा रहता था । बाद में साइकिल युग के चलते भी लोगों के स्वास्थ्य में शुद्धता बनी रही।  फिर योग साधना को केवल राजाओं, ऋषियों और धनिकों के लिये आवश्यक इसलिये भी माना गया क्योंकि वह शारीरिक श्रम कम करते थे जबकि बदलते समय के साथ इसे जनसाधारण में प्रचारित किया जाना चाहिये था।  भले ही शारीरिक श्रम से लोगों का लाभ होता रहा है पर प्राणायाम  से जो मानसिक लाभ की कल्पना किसी ने नहीं की।  श्रमिक तथा गरीब वर्ग के लिये  योगासन के साथ प्राणायाम  और ध्यान का भी  महत्व अलग अलग रूप से प्रचारित किया जाना जरूरी लगता है।  यह बताना जरूरी है कि जो लोग शारीरिक श्रम के कारण रात की नींद आराम से लेते हैं उनको भी जीवन का आनंद उठाने के लिये प्राणायाम और ध्यान करना चाहिये। </p>
<p>अब योग साधना के आठ भाग देखकर तो यही लगता है कि उसके आठ अंगों को -यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-एक पूरा कार्यक्रम मानकर देखा गया। सच तो यह है कि जो लोग परिश्रम करते हैं या सुबह सैर करके आते हैं उनको नियम, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि जैसे अन्य सात अंगों का भी अध्ययन करना चाहिये।  योगासन या सुबह की सैर के बाद प्राणायम और ध्यान की आदत डालना श्रेयस्कर है। जो लोग गरीब, मजदूर तथा अन्य शारीरिक श्रम करते हैं उनके लिये भी प्राणायाम के साथ ध्यान बहुत लाभप्रद है। इस बात का प्रचार बहुत पहले ही होना चाहिये था इसलिये  अब इस पर भी इस पर काम होना चाहिये।<br />
प्राणायाम  से प्राणवायु तीव्र गति से अंदर जाकर शरीर और मन के विकारों को परे करती है।  उसी तरह ध्यान भी योगासन और प्राणायाम के बाद प्राप्त शुद्धि को पूरी देह और मन में वितरित करने की एक प्रक्रिया है।  जब कभी आप थक जायें और सोने की बजाय आंखें बंद कर केवल बैठें और अपने ध्यान को भृकुटि पर केंद्रित करके देखें।  शुरुआत में आराम नहीं मिलेगा पर पांच दस मिनट बाद आप को अपने शरीर और मन में शांति अनुभव होगी।  जैसे मान लीजिये आप किसी समस्या से परेशान हैं। वह उठते बैठते आपको परेशान करती है।  आप ध्यान लगा कर बैठें।  समस्या हल होना एक अलग मामला है पर ध्यान के बाद उससे उपजे तनाव से राहत अनुभव करेंगे।  सच बात तो यह है कि हम अपने दिमाग और शरीर को बहुत खींचते हैं और उसको बिना ध्यान के विराम नहीं मिल सकता।  यह को व्यायाम नहीं है एक तरह से पूर्णाहुति है उस यज्ञ की जो हम अपनी देह के लिये करते हैं। शेष फिर कभी। </b><br />
<b>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://terahdeep.blogspot.com</p>
<p></b>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://rajlekh.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दयोग सारथी-पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरदास के दोहे-अपनी तारीफ और दूसरे की बुराई न करें (kabir ke dohe-apne tarif aur doosre ke burai na karen)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/25/burai-aur-tarif-kabir-vani/</link>
<pubDate>Sun, 25 Oct 2009 09:42:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/25/burai-aur-tarif-kabir-vani/</guid>
<description><![CDATA[आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय। चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।। संत शिरोमणि कबीरदास ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।<br />
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।<br />
<strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।<br />
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सेल के रोग का इलाज नहीं-हास्य व्यंग्य कविता (sel rog ka ilaj-hasya vyangyakavita)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/23/sel-ki-bimari-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Fri, 23 Oct 2009 15:43:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/23/sel-ki-bimari-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[अपने साथ फंदेबाज एक पर्चा लेकर आया और हाथ में देते हुए बोला- ‘दीपक बापू, बूढ़े आदमियों के लिये तैयार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अपने साथ फंदेबाज  एक पर्चा लेकर आया<br />
और हाथ में देते हुए बोला-<br />
‘दीपक बापू,<br />
बूढ़े आदमियों के लिये<br />
तैयार कपड़ों की एक सेल लगी है<br />
चलो तुम्हें वहां से<br />
टोपी, कुर्ता धोती और स्वेटर दिलवायें<br />
बहुत पुराने लगते हैं तुम्हारी तरह<br />
तुम्हारें कपड़े भी सजायें।<br />
यह ठीक है अभी तक फ्लाप हो<br />
चिंता की बात नहीं<br />
पर कल हिट हो जाओगे<br />
तो कैसे सम्मेलनों में अपना चेहरा दिखाओगे<br />
सेल में एक चीज पर एक मुफ्त है<br />
एक रख लेना रोज पहनने के लिये<br />
दूसरा बाहर के लिये रख लेना<br />
चलो तो मौके का पूरा फायदा उठायें।’</p>
<p>सुनते ही भड़के फिर<br />
अपनी पुरानी टोपी की तरफ<br />
निहारते हुए बोले दीपक बापू<br />
‘कमबख्त, हमारे फ्लाप होने का ताना<br />
देने के लिये कोई बहाना ढूंढ जरूर लेना<br />
अरे, इस टोपी, धोती और स्वेटर के<br />
पुराने होने पर तुम्हें तरस आ रहा है<br />
पर कोई दूसरा तो नहीं गा रहा है<br />
एक के साथ एक फ्री ले आये थे<br />
पहले इसी इरादे से<br />
पर दोनों ही घिस गये<br />
अंतर्जाल पर टाईप करते<br />
पर हमारे ब्लाग अभी आहें भरते<br />
पैकिंग में धोती, कुर्ता, टोपी और स्वेटर<br />
बहुत अच्छे दिखे<br />
पर घर लाये तो सभी में छेद दिखे<br />
फिर तुम सभी जगह हमारे<br />
फ्लाप होने की कथा सुना रहे हो<br />
आपने हिट दोस्त होने का अच्छा साथ भुना रहे हो<br />
हम किस हाल में है<br />
भला कौन पाठक जानता है<br />
इतना ही ठीक है<br />
इस ‘एक के साथ एक फ्री’ में<br />
पगला गये हैं कई लोग<br />
जिसका इलाज नहीं है<br />
ऐसा बन गया है यह सेल का रोग<br />
हम तो मुफ्त में ब्लाग  लिखने  के साथ<br />
यह दूसरा फ्री का रोग नहीं पाल सकते<br />
रुपये भला कैसे लगायें।<br />
दो रोग पालना एक साथ मूर्खता है<br />
यह तुम्हें कैसे समझायें’’<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</b><br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप<br />
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</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विष की शुद्धि-त्रिपदम  (vish ki shuddhi-tripadam)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/23/vish-par-hindi-kavita/</link>
<pubDate>Fri, 23 Oct 2009 15:16:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/23/vish-par-hindi-kavita/</guid>
<description><![CDATA[मन में विष किसमें नहीं होता शुद्धि कहां है। सोच से जड़ हो गये ये इंसान बुद्धि कहां है। जले शब्द उगलते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>मन में विष<br />
किसमें नहीं होता<br />
शुद्धि कहां है।</p>
<p>सोच से जड़<br />
हो गये ये इंसान<br />
बुद्धि कहां है।</p>
<p>जले शब्द<br />
उगलते चूल्हे<br />
वाणी कहां है।</p>
<p>सभी भिखारी<br />
ढूंढ रहे हैं माल<br />
दानी कहां है।</p>
<p>लंगड़ी भाषा<br />
सिखाई गुरुओं ने<br />
बोध कहां है।</p>
<p>शिक्षित झुंड<br />
शहर में घूमता<br />
शोध कहां है।</p>
<p>दर्द की दवा<br />
मिलती कभी कभी<br />
रोज कहां है।</p>
<p>प्रश्न वन<br />
घना है चारों ओर<br />
खोज कहां है।</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
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<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब उनके पुतलों की पोल खुल जायेगी-हिंदी कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/21/putle-aur-insan-hindi-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Wed, 21 Oct 2009 15:51:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/21/putle-aur-insan-hindi-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[पर्दे के पीछे वह खेल रहे हैं सामने उनके पुतले डंड पेल रहे हैं। आत्ममुग्धता हैं जैसे जमाना जीत लिया स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>पर्दे के पीछे वह खेल रहे हैं<br />
सामने उनके पुतले डंड पेल रहे हैं।<br />
आत्ममुग्धता हैं जैसे जमाना जीत लिया<br />
समझते नहीं भीड़ के इशारे<br />
अपनी उंगलियों से पकड़ी रस्सी से<br />
मनचाहे दृश्य वह मंच पर ठेल रहे हैं।<br />
भीड़ में बैठे हैं उनके किराये के टट्टू<br />
जो वाह वाही करते हैं<br />
तमाम लोग तो बस झेल रहे हैं।<br />
खेल कभी लंबा नहीं होता<br />
कभी तो खत्म होगा<br />
सच्चाई तो सामने आयेगी<br />
जब उनके पुतलों की पोल खुल जायेगी<br />
तब जवाब मांगेंगे लोग<br />
हम भी यही सोचकर झेल रहे हैं।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[धर्म के नाम पर कुश्ती-हिंदी व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/16/dharm-kushti-hindi-vyangya-kahani/</link>
<pubDate>Fri, 16 Oct 2009 13:43:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/16/dharm-kushti-hindi-vyangya-kahani/</guid>
<description><![CDATA[वह डंडा लेकर उस मैदान में लड़ने पहुंचे। यह मैदान ‘धर्मकुश्ती’ के लिये विख्यात था। मैदान के मध्य में उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वह डंडा लेकर उस मैदान में लड़ने पहुंचे। यह मैदान ‘धर्मकुश्ती’ के लिये विख्यात था। मैदान के मध्य में उन दोनों ने अपने अपने धर्म का नाम लेकर लड़ाई शुरु की। पहले एक दूसरे पर डंडे से प्रहार करते-साथ में अपने धर्म की जय भी बोलते जाते। डंडे से डंडे टकराते। वह उनको चलाते चलाते थक गये तब वह डंडे फैंककर दोनों मल्लयुद्ध करने लगे। एक दूसरे पर घूंसे बरसाते जाते। काफी जमकर कुश्ती हुई। मगर कोई नहीं जीता। वह थककर वहीं बैठ गये। उनके हाथ पांव में घावों से रक्त भी बहता आ रहा था।<br />
उनको प्यास लगी। वहीं से कुछ दूर मैदान के किनारे बने चबूतरे पर एक ज्ञानी भी बैठा था जिसके साथ पानी पिलाने वाला एक शिष्य था। अपने उसी शिष्य से उस ज्ञानी से कहा कि‘जाओ उनको पानी पिलाओ। अब वह थककर चूर होकर बैठे हैं।<br />
वह पानी लेकर उनके पास पहुंचा और दोनों को ग्लास भरकर देने लगा। धर्मयोद्धाओं में से एक ने उससे पूछा-‘तुझे कैसे मालुम कि हमें पानी की प्यास लगी है।’<br />
उस शिष्य ने कहा-‘यह मैदान धर्मकुश्ती के लिये विख्यात है। यहां आप जैसे अनेक लोग आते हैं। हमारे ज्ञानी जी यहां रोज आकर बैठते हैं क्योंकि उनको मालुम है कि यहां आकर धर्म कुश्ती करने से कोई नतीजा नहीं निकलेगा पर प्यास तो योद्धाओं उनको लगेगी। वह परेशान न हों इसलिये मुझे भी साथ रखते हैं ताकि उनको पानी दे सकूं।’<br />
दूसरे ने पूछा-‘तेरा धर्म क्या है?’<br />
शिष्य ने जवाब दिया-‘पानी पिलाना।’<br />
पहले ने कहा-‘यह भी कोई धर्म है?’<br />
शिष्य ने कहा-‘हमारे गुरुजी कहते हैं कि आज के अक्षरज्ञानी विद्वानों ने कुश्ती प्रदर्शन के लिये धर्मों का नाम रख लिया है। मनुष्य का आचरण, व्यवहार, कर्म तथा विचार से ही पता लगता है कि वह धर्मी है या अधर्मी।<br />
पहले धर्म के नाम पर बांटकर लोगों पहले राज्य किया जाता है आज व्यापार भी किया जाता है। आप यहां कुश्ती करने आये कल यह खबर सभी जगह चमकेगी तो बताओ&#160;खबरफरोशों&#160;&#160;&#160;का धंधा हुआ कि नहीं।’<br />
उन दोनों ने पानी पिया और सुस्ताने लगे। उसी समय एक आदमी आया और बोला-‘शांति रखो! शांति रखो। सभी धर्म एक समान है। सभी धर्म शांति, अहिंसा और प्रेम का संदेश देते हैं।’<br />
इससे पहले वह महायोद्धा कुछ कहते वह चला गया। इस तरह चार लोग शांति संदेश देकर चले गये। एक महायोद्धा ने शिष्य से पूछा-‘यह लोग कौन हैं?’<br />
शिष्य ने कहा-‘‘ इनके नाम भी कल अपनी खबर के साथ देख लेना। यह पंच लोग हैं जो इस बात का इंतजार करते हैं कि कब यहां कुश्ती हो और शांति संदेश सुनाने पहुंच जायें। यह शांति सन्देश देकर अपना धर्म&#160;निभाते&#160;&#160;हैं।&#160;&#160;वैसे यह भी लोग नहीं जानते कि धर्म क्या है?’<br />
दूसरे महायोद्धा ने कहा-‘पर इनका शांति संदेश तो ठीक लगता है। तुम्हारे गुरु जी किस धर्म को मानते हैं’।’<br />
शिष्य ने कहा-‘वह ज्ञानी हैं और वह कहते हैं कि हमारे महापुरुषों तो अच्छे आचरण, व्यवहार, कर्म तथा सुविचार को ही धर्म मानते हैं और इसके विपरीत अधर्म। मेरा धर्म है प्यासे को पानी पिलाना और उनका धर्म है ज्ञान देना।’<br />
एक महायोद्धा ने कहा-‘हम उनसे ज्ञान लेना चाहते हैं।’<br />
शिष्य ने कहा-‘यह उनका ज्ञान देने का समय नहीं है। वह तो यहां इसलिये आते हैं ताकि ऐसी कुश्तियों से कुछ ज्ञान प्राप्त कर सकें। यहां आकर योद्धा आपस में मूंहवाद भी करते हैं। अपने अपने तर्क देते हैं उन्हें सुनकर वह अपना मंतव्य निर्धारित करते हैं। अब आप बाहर जाकर अपने जख्मों का इलाज कराओ। वहां भी एक चिकित्सक हैं जो सेवा भाव से धर्म कुश्ती में घायल होने वालों का इलाज करते हैं।’<br />
वह दोनों लड़खड़ाते हुए बाहर चल दिये। चलते चलते भी दोनों एक दूसरे को गालियां देते रहे।<br />
इधर यह शिष्य अपने गुरू के पास लौटा। गुरू ने उससे पूछा-‘उनको ठीक ढंग से पानी पिलाये आये?’<br />
‘हां, गुरुजी, मैंने अपना धर्म निभा दिया।’शिष्य ने कहा।<br />
गुरुजी अपने ध्यान में लीन हो गये। कुछ देर बाद उन्होंने आंखें खोली तो इधर अचानक शिष्य की नजर उन दो डंडों पर पड़ी जो दोनों योद्धा उस मैदान में छोड़ गये थे। वह बोला-‘गुरूजी! उनके डंडे छूट गये हैं। वह ले जाकर उनको वापस कर आता हूं। वह जरूर उसी डाक्टर के पास होंगे।’<br />
गुरुजी ने कहा-‘रहने दे! डंडे अब उनके किसी काम के नहीं है। वह दोनों शांत हो गये हैं। अगर डंडा हाथ में लेंगे तो कहीं उनकी आग फिर भड़क उठी तो गलत होगा। तेरा काम पानी पिलाना है न कि आग लगाना।’<br />
शिष्य ने कहा-‘नहीं गुरुजी, आपने कहा है कि हर किसी की मदद करना चाहिये। इन डंडों को वापस करना अच्छा होगा।’<br />
इससे पहले गुरुजी कुछ समझाते वह भाग कर चला गया। कुछ देर बाद शिष्य लौटा तो उसके बदन पर भी पट्टी बंधी हुई थी। गुरुजी के कारण पूछने पर वह बोला-‘वह दोनों अपने जख्मों पर पट्टी बंधवा चुके थे। जब मैंने जाकर उनको डंडे दिये तो दोनों ने यह कहते हुए मुझ पर डंडे बरसाये कि तू हमारी इजाजत के बगैर हमारी कुश्ती देख कैसे रहा था?’<br />
गुरुजी ने कहा-‘मैंने तुझसे कहा था कि तेरा धर्म पानी पिलाना पर तू आग लगाने पहुंच गया। यह धर्म परिवर्तन करना ही तेरे लिये घातक रहा। तेरे संस्कारों में डंडा चलाना नहीं लिखा तो तू चला भी नहीं सकता। इसलिये उसे हाथ लगाना भी तेरे लिये अपराध है। फिर तू उन लोगों की संगत करने गया जिनके संस्कार तेरे ठीक विपरीत हैं। तू धर्म ईमानदारी से निभाता है उन धर्मकुश्ती करने वाले योद्धाओं से पानी पिलाने तक ही तेरा संबंध ठीक था। इससे आगे तो यही होना था।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p>
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-गलत संपर्क से आदमी बर्बाद होता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/01/galat-sanpark-chankya-niti/</link>
<pubDate>Thu, 01 Oct 2009 04:24:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/01/galat-sanpark-chankya-niti/</guid>
<description><![CDATA[ग्रहीत्वां दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्। प्राप्तविद्यां गुरुं शिष्या दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा। हि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>ग्रहीत्वां दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।<br />
प्राप्तविद्यां गुरुं शिष्या दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान का घर छोड़ देते हैं। गुरु से शिक्षा प्राप्त कर शिष्य उसे दक्षिण देकर आश्रम से चले जाते हैं। उसी तरह जंगल जल जाने पर मृग उसका त्याग कर देते हैं।<br />
<strong>दुराचारी च दुर्दृष्टिराऽवासी च दुर्जनः।<br />
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति।।</strong><br />
<strong>हिन्दी में भावार्थ-</strong>दुराचारी, कुदृष्टि रखने और बुरे स्थान पर रहने वाले व्यक्ति से संबंध बनाने पर श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>संबंध बनाने में हमेशा सतर्कता बरतना चाहिये। देखा गया है कि आजकल के युवक युवतियां  अक्सर संबंध तात्कालिक आकर्षण में फंसकर मित्रता ऐसे लोगों से कर बैठते हैं जिनके स्वभाव और इतिहास का पता उनको नहीं होता। बाद में जब वह उनकी वजह से कहीं फंस जाते हैं तब उनको अपनी गलती की अनुभूति होती है मगर तब देर भी हो जाती है। ऐसी एक नहीं अनेक घटनायें घटित हो चुकी हैं जिसमें किसी भले युवक ने किसी गलत साथी का चुनाव किया और बाद में उसके अपराध के छींटे उस पर भी पड़े। उसी तरह युवतियों ने भी प्रारंम्भिक आकर्षण में आकर ऐसे लड़कों से प्रेम प्रसंग स्थापित किये जिसका परिणाम उनके लिये घातक रहा। कई बार तो वह ऐसे युवकों से विवाह भी कर बैठती हैं जो दिखाने के लिये अपने संस्कर अच्छे दिखाते हैं पर बाद में उनकी असलियत सामने आती है तो युवतियों को पछतावा होता है। अनेक युवतियां पहले अपने घरेलू संस्कारों को भुलाकर ऐसे लड़कों से विवाह कर बैठती हैं जिनके घरेलू संस्कार बिल्कुल विपरीत होते हैं। विवाह से पहले तो उनके घर से लड़कियों का संबंध नहीं होता पर बाद विवाह बाद जब उसके परिवार वाले अपने संस्कार अपनाने को विवश करते हैं तब लड़कियों को बहुत परेशानी आती है और इसी बात पर सबसे अधिक तनाव उनको ही झेलना पड़ता है क्योंकि पुरुष तो घर से बाहर रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लड़का हो या लड़की उसे अपने संबंध बनाने से पहले सामने वाले व्यक्ति की पूरी जांच करना चाहिये।</p>
<p>नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि जब कहीं से अपना उद्देश्य पूरा हो जाये तो उस स्थान पर अधिक नहीं ठहरना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि इस जीवन में अपने कार्य और उद्देश्य पूर्ति के लिये अनेक स्थानों पर जाने के साथ ही लोगों से संपर्क भी बनाने पड़ते हैं। उनमें अपनी लिप्तता उतनी ही रहना चाहिये जितनी अपने हित के लिये आवश्यक हो। अधिक लिप्तता कार्य और उद्देश्य पर बुरा प्रभाव डाल सकती है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी-दूसरों को सिखाते पर खुद नहीं सीखते]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/09/dusron-ko-sikhate-khud-sikhte-nahin/</link>
<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 03:30:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/09/dusron-ko-sikhate-khud-sikhte-nahin/</guid>
<description><![CDATA[लिखना पढ़ना चातुरी, यह संसारी जेव जिस पढ़ने सों पाइये, पढ़ना किसी न सेव संत कबीरदास जी कहते हैं कि स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>लिखना पढ़ना चातुरी, यह संसारी जेव<br />
जिस पढ़ने सों पाइये, पढ़ना किसी न सेव</strong><br />
संत कबीरदास जी कहते हैं कि संसार में अपनी जीविका चलाने की शिक्षा तो हर कोई प्राप्त करता है। यह चतुराई तो हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से आती है।  जिससे पढ़ने से अध्यात्म ज्ञान प्राप्त होता है वह कोई भी स्वीकार नहीं करना चाहता।<br />
<strong>पढ़ी गुनी पाठक भये, समुझाया संसार<br />
आपन तो समुझै नहीं, वृथा गया अवतार</strong><br />
स्वयं शिक्षा प्राप्त की और फिर  अपने शिष्यों को भी ज्ञान देने लगे पर जिन लोगों ने अपने आपको नहीं समझा उनका जीवन तो व्यर्थ ही गया। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ संपादकीय व्याख्या-</strong>अक्सर  अनेक लोग शिकायत करते हुए मिल जाते हैं कि उनके बच्चे उनसे परे हो गये हैं या उनकी देखभाल नहीं करते। इसके दो कारण होते हैं एक तो यह कि नये सामाजिक परिवेश से तालमेल न बिठा पाने के कारण लोग अपने माता पिता को त्याग देते हैं या फिर वह व्यवसाय के सिलसिले में उनसे दूर हो जाते है।  दोनो ही स्थितियों का विश्लेषण करें तो यह अनुभव होगा कि सभी माता पिता अपने बच्चों से यह अपेक्षा करते हैं कि वह इस मायावी दुनियां में उच्च पद प्राप्त कर, अधिक धनार्जन कर,  और प्रतिष्ठा की दुनियां में चमककर  उनका नाम रोशन करें। लोग बच्चों की कामयाबी के सपने देखते हैं और केवल सांसरिक शिक्षा तक ही अपने बच्चों को सीमित रखते हैं। किसी तरह अपना पेट पालो यही सिखाते हुए वह ऐसा अनुभव करते हैं कि जैसे कि वह दुनियां का कोई विशेष ज्ञान दे रहे हैं। यह तो एक सामान्य चतुराई है जिसे सब जानते हैं।<br />
यह उनका एक भ्रम है। यह शिक्षा तो सभी स्वतः ही प्राप्त करते हैं पर जिन बच्चों को उनके माता पिता इसके साथ ही अध्यात्म ज्ञान, ईश्वर भक्ति और परोपकार करना  सिखाते हैं वह अधिक योग्य निकलते हैं। जब तक आदमी मन में अध्यात्म का ज्ञान नहीं होगा तब वह न तो स्वयं कभी प्रसन्न रह पाता है और न ही दूसरों को प्रसन्न करता है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बरसात के साथ धार्मिक चालाकी-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/02/barsat-aur-chalaki-hindi-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Thu, 02 Jul 2009 16:59:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/02/barsat-aur-chalaki-hindi-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अध्यात्म  नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़ में कोई अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है तो कोई अपना व्यवसाय कर रहा है।  जब कहीं सार्वजनिक रूप से  प्रार्थनायें सभायें होती हैं तब यह लगता है कि लोग दिखावा अधिक कर रहे हैं। आज के संचार युग में तो यह कहना कठिन है कि धर्म का बाजार लग रहा है या बाजार ही धर्म बना रहा है।  ऐसा लगता है कि पहले लोगों के पास मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे इसलिये धार्मिक पात्रों की व्याख्या करना ही धर्म प्रचार मान लिया गया। इस आड़ में तमाम तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास सृजित किये गये ताकि उनकी आड़ में धरती पर उत्पन्न  अनावश्यक भौतिक साधान बिक सकें जिसके माध्यम से  आदमी की जेब से पैसा निकाला जाये।<br />
अब तो प्रचार युग आ गया है और लोग अध्यात्मिक  आधार पर इसलिये अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहते है ताकि सामाजिक, आर्थिक तथा वैचारिक संगठनों में अपनी छबि बनाकर पुजते रहें।  वह आधुनिक बाजार में आधुनिक अध्यात्मिक  व्यापारी बनकर चलना चाहते हैं पर उनकी दुकान सामान उनका बरसो पुराना ही है जिसमें केवल धार्मिक प्रतीक और कर्मकांड ही हैं। जब कहीं हिंसा हो तो वहां लोग शांति के लिये सामूहिक प्रार्थनायें करने के लिये एकत्रित होते हैं।  उनको प्रचार माध्यमों में बहुत दिखाया जाता है। जब यह कहना कठिन हो जाता है कि बाजार को ऐसी खबरें चाहिये इसलिये यह सब हो रहा है या सभी विचारधारा के ज्ञानियों  को प्रचार चाहिये इसलिये वह इस तरह की सामूहिक प्रार्थनायें करते हैं।<br />
हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि पूजा, भक्ति या साधना तो एकांत में ही परिणाम देने वाली होती है।’ इसलिये जब इस तरह के सामूहिक कार्यक्रम होते हैं तो वह दिखावा लगते हैं।  आजकल अनेक स्थानों पर बरसात बुलाने के लिये प्रार्थना सभायें हो रही हैं। हर तरह की धार्मिक विचाराधारा के स्वयंभू ज्ञानी लोगों से बरसात के लिये सामूहिक प्रार्थनाऐं आयोजित  कर रहे हैं। प्रचार भी उनको खूब मिल रहा है। हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर अपने जैसे लोगों से अपनी बात करने का एक अलग ही मजा है। कुछ लोग है जो इसमें हो रही चालाकियों को देखते हैं।<br />
हम जरा इस बरसात के मौसम पर विचार करें तो लगेगा कि उसका आना तय है। देश के कुछ इलाकों में उसका  प्रवेश हो चुका है और अन्य तरफ मानसून बढ़ रहा है।</p>
<p>उस दिन मई की एक शाम बाजार में तेज बरसात से बचने के लिये हम एक मंदिर में बैठ गये।  उस समय तेज अंाधी के साथ बरसात हो रही थी। हालांकि  गर्मी कम नहीं थी और बरसात से राहत मिली पर एक शंका मन में थी कि यह मानसून के लिये संकट का कारण बन सकता है। प्रकृत्ति का अपना खेल है और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है।  मनुष्य यह चाहता है कि प्रकृति उसके अनुरूप चले पर पर उसके साथ खिलवाड़ भी करता है।  मई में उस दिन हुई बरसात के अगले कुछ दिनों में ही अखबारों में हमने पढ़ा कि बरसात देर से आयेगी। विशेषज्ञों ने बरसात कम होने की भविष्यवाणी की है-औसत से सात प्रतिशत कम यानि 93 प्रतिशत होने का अनुमान है। </p>
<p>ऐसा नहीं है कि बरसात हमेशा समय पर आती हो-कभी विलंब से तो कभी जल्दी भी आती है-पिछली बार कीर्तिमान भंजक वर्षा हुई थी। बरसात जब तक नहीं आती तब आदमी व्यग्र रहता है।  ऐसे में उसके जज्बातों से खेलना बहुत सहज होता है। उसका ध्यान गर्मी पर है तो उसे भुनाओ।   कहने के लिये तो कह रहे हैं कि हम सर्वशक्तिमान को बरसात भेजने के लिये पुकार रहे हैं। पर उसका समय पर चर्चा नहीं करते।  जब बरसात आने के संकेत हो चुके हैं तब ऐसी प्रार्थनाओं के समाचार खूब आ रहे हैं।   वैसे तो फरवरी के आसपास भी ऐसे समाचार आ गये थे कि इस बार बरसात देर से आयेगी और कम होगी। तब ऐसी प्रार्थना सभायें क्यों नहीं की गयी। उस समय नहीं तो मई में ही कर लेते।<br />
सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के चेले चालाक हैं।  उस समय करते तो कौन लोग उनको याद रखते। जब एक दो दिन या सप्ताह में बरसात आने वाली तब ऐसी प्रार्थना सभायें इसलिये कर रहे हैं ताकि जब हों तो लोग माने कि उनके ‘ज्ञानियों’ को कितनी सिद्धि प्राप्त है।  बहरहाल हम देख रहे हैं कि बाजार के प्रबंधक और सर्वशक्तिमान के यह आधुनिक दूत एक जैसे चालाक हैं।  टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाऐं तो व्यवसायिक हैं पर सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के यह ज्ञानी चेले भी क्या व्यवसायी है? उनकी इस तरह की चालाकियों से तो यही लगता है?<br />
प्रसंगवश याद आया एक पाठक ने अपनी टिप्पणी में पूछा था कि ‘आपके लेखों से यह पता ही नहीं लगता कि आप किस धर्म या भगवान की बात कर रहे हैं?<br />
दरअसल इसका कारण यह है कि हम सभी तरह की विचारधाराओं पर अपने विचार रखते हैं। किसी एक का तयशुदा नाम लेने पर लोग कहते हैं कि तुम उनके नाम पर लिखो तो जाने।  जहां तक हमारी जानकारी सर्वशक्तिमान शब्द  किसी भी खास विचारधारा से नहीं जुड़ा  यही स्थिति उसके ठेकेदार शब्द ं की भी है। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता कि हमारी बात करते हो उनकी करके देखो तो जानो।<br />
अगर सभी विरोध करने लगें तो हम भी कह सकते हैं कि तुम सर्वशक्तिमान और ठेकेदार शब्द से अपने को क्यों जोड़ते हो? दरअसल हमने देखा कि यह समाजों के ठेकेदारो का काम ही चालाकी पर चल रहा है और लोगों को जज्बात से भड़काने और बहलाने के काम में यह सब सक्षम होते हैं। हम इसलिये अपनी बात व्यंजना विधा में कहते हैं। हां, बरसात की पहली बूंदों का इंतजार हमें भी है। अब यह गर्मी सहना कठिन हो गया है।  कभी कभी आकाश में बिना बरसते बादल देखते हैं तो भी गुस्सा आता है कि यह हमारी धरती की गर्मी नष्ट कर रहे हैं जो कि बरसात को खींचती है।<br />
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<blockquote><blockquote><strong>यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://teradipak.blogspot.com"><br />
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
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<title><![CDATA[मनु स्मृति-दूसरों के स्नानगृहों में नहाना नहीं चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/01/others-bathroom-and-washroom-manu-smruti/</link>
<pubDate>Mon, 01 Jun 2009 03:44:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/06/01/others-bathroom-and-washroom-manu-smruti/</guid>
<description><![CDATA[परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन। नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।। हिंदी में भावार्थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन।<br />
नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अन्य व्यक्तियों द्वारा बनवाये गये स्नान के लिये बनाये गये स्थानों-स्नानगृहों,सरोवरों और कुऐं आदि-पर नहाना नहीं चाहिए। वह स्नानगृह अगर पापों के धन से बनाये गये हैं तो उसमें नहाने वाला भी उसका भागी बनता है।<br />
<strong>यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्रह्यणि च।<br />
अदत्तान्युपयु´्जानः एनसः स्वात्तुरीभाक्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>वाहन, शैय्या, आसन, कुआं, उद्यान और भवन आदि का उपभोग  कुछ दान कर ही करना लाभदायक होता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>आजकल की व्यस्त एवं दीर्घसूत्रीय जिंदगी में यह देखना कठिन काम है कि हम कहीं बाहर जाकर रुक रहे हैं तो वहां का स्थान किस प्रकार के धन से बनाया गया है। वैसे भी आजकल बिना काले धन के यह कैसे संभव है कि समाज का भौतिक  विकास इतनी तीव्र गति से हो। ऐसे में भ्रष्ट और अनैतिक रूप से कमाये गये धन से बने आवास और स्नानगृहों में रहने और नहाने का प्रतिबंध स्वीकार करना संभव नहीं लगता।  बड़े बड़े शहरों में बड़े और आलीशान होटल बन गये हैं जिनमें स्वीमिंग पूल भी होते हैं।  अब यह कैसे कहा जा सकता है कि वह भ्रष्ट या अनैतिक धन से बने हैं या सात्विक धन से। वैसे तो आजकल धर्नाजन के कई ऐसे óात पवित्र माने जाते हैं जिनको पहले अपवित्र माना जाता था।  अतः इस बारे में अपने विवेक से विचार करना चाहिये।  </p>
<p>मगर सच तो यह है कि जिस प्रकार हम अपने जीवन में जिस प्रकार के व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में आते हैं उसके पाप पुण्य का प्रभाव हम पर होता है।  कहा जाता है कि ‘जैसे खायें अन्न वैसा हो मन’। इसका आशय यह तो है ही कि जिस प्रकार की वस्तु का हम उपभोग करेंगे वैसे ही प्रभाव हमारी देह के साथ ही हमारे मन और विचारों  पर होगा।  साथ ही  यह भी कि उसके आने का सात्विक मार्ग है या असात्विक इस बात का प्रभाव भी उसके उपभोग करने वाले पर होता है। तात्पर्य यह है कि अगर हमें लगता है कि कोई व्यक्ति या वस्तु-जिसके बारे में यह यकीन हो कि वह असात्विक प्रकृत्ति की है तो उससे अपने आपको दूर रखना चाहिये।  यह ठीक है कि आजकल की भागम भाग जिंदगी में यह कहना कठिन है कि किसका धन एक नंबर का है या दो नंबर का पर थोड़ा विवेक का इस्तेमाल करें तो सभी समझ में आ जाता है। दूसरा सच यह भी कि हम किसी बड़े शहर में जाकर अपने लिये सस्ता और अच्छा स्थान रहने के लिये ढूंढते हैं पर तब यह देखने का न तो समय होता है न जरूरत कि वह किस प्रकार के धन से बना है। हालांकि अनजान रहने पर किसी वस्तु का उपभोग करने पर उसके पाप का भागी नहीं बनते यह भी हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है।<br />
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<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
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<item>
<title><![CDATA[मुस्कराहट का मुखौटा-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/05/14/mukrahat-ka-mukhauta-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Thu, 14 May 2009 17:02:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/05/14/mukrahat-ka-mukhauta-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[बेकद्रों की महफिल में मत जाना बहस के नाम पर वहां बस कोहराम मचेगा पर कौन, किसकी कद्र करेगा। मुस्कराहट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>
<strong>बेकद्रों की महफिल में मत जाना<br />
बहस के नाम पर वहां बस कोहराम मचेगा<br />
पर कौन, किसकी  कद्र करेगा।<br />
मुस्कराहट का मुखौटा लगाये सभी<br />
हर शहर में घूम रहे हैं<br />
जो मिल नहीं पाती खुशी उसे<br />
ढूंढते हुए झूम रहे हैं<br />
दूसरे के पसीने में तलाश रहे हैं<br />
अपने लिये चैन की जिंदगी<br />
उनके लिये अपना खून अमृत है<br />
दूसरे का है गंदगी<br />
तुम बेकद्रों को दूर से देखते रहकर<br />
उनकी हंसी के पीछे के कड़वे सच को देखना<br />
दिल से टूटे बिखरे लोग<br />
अपने आपसे भागते नजर आते हैं<br />
शोर मचाकर उसे छिपाते हैं<br />
उनकी मजाक पर सहम मत जाना<br />
अपने शरीर से बहते पसीने को सहलाना<br />
दूसरा कोई इज्जत से उसकी कीमत<br />
कभी तय नहीं करेगा।</strong><br />
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<blockquote><p><strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[बाजार की आस्था या आस्था का बाजार-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/05/06/bazar-aur-astha-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Wed, 06 May 2009 15:20:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/05/06/bazar-aur-astha-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[कहीं न्यूजीलैंड में इस बात को लेकर लोग नाराज है कि ‘हनुमान जी पर कंप्यूटर गेम बना दिया गया है और बच्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>कहीं न्यूजीलैंड में इस बात को लेकर लोग नाराज है कि ‘हनुमान जी पर कंप्यूटर गेम बना दिया गया है और बच्चे उनकी गति को नियंत्रित करने का खेल कर रहे हैं।’ इससे उनकी धार्मिक आस्थायें आहत हो रही हैं। तमाम तरह के आक्षेप किये जा रहे हैं।<br />
एक बात समझ में नहीं आती कि लोग अपने धार्मिक प्रतीकों को लेकर इस तरह के विवाद खड़ा कर आखिर स्वयं प्रचार में आना चाहते हैं या उनका उद्देश्य कंपनियों के उत्पाद का प्रचार करना होता है। कहीं किसी अभिनेत्री ने माता का मेकअप कर किसी रैंप में प्रस्तुति दी तो उस पर भी बवाल बचा दिया। टीवी चैनलों ने अपने यहां उसे दिखाया तो अखबारों ने भी इस समाचार का छापा। प्रचार किसे मिला? निश्चित रूप से अभिनेत्री को प्रचार मिला। अगर कथित धार्मिक आस्थावान ऐसा नहीं करते तो शायद उस अभिनेत्री का नाम कोई इस देश में नहीं सुन सकता था।<br />
कई बार ऐसा हुआ कि अन्य धार्मिक विचाराधारा के लोगों ने अपने धार्मिक प्रतीकों के उपयोग पर बवाल मचाये हैं पर उनकी देखादेखी भारतीय आस्थाओं  के मानने वाले भी ऐसा करने लगे तो समझ से परे है।  कहने को भारतीय आस्थाओं  के समर्थक कहते हैं कि ‘जब दूसरे लोगों के प्रतीकों पर कुछ ऐसा वैसा बनने पर बवाल मचता है तो हम क्यों खामोश रहे?’<br />
यह तर्क समझ से परे है। इसका मतलब यह है कि भारतीय आस्थाओं  को मानने वाले अपने अध्यात्मिक दर्शन का मतलब बिल्कुल नहीं समझते।  नीति विशारद चाणक्य ने कहा है कि ‘हृदय में भक्ति हो तो पत्थर में भगवान हैं।’<br />
यानि अगर हृदय में नहीं है तो वह पत्थर ही है जिसे दुनियां को दिखाने के लिये पूज लो-वैसे अधिकतर लोग अपने दिल को तसल्ली देने के लिये पत्थर की पूजा करते हैं कि हमने कर ली और हमारा काम पूरा हो गया।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन स्पष्ट कहता है कि सर्वशक्तिमान परमात्मा का कोई रूप नहीं है।  उसके स्वरूप की कल्पना  दिमाग में स्थापित कर  उसका स्मरण करने का संदेश है पर अंततः निराकार में जाने का आदेश भी है।<br />
अब अगर कोई कंप्यूटर पर हनुमान जी पर गेम बनाता है या कोई अभिनेत्री माता का चेहरा बनाकर रैंप पर अपनी प्रस्तुति  देती है तो उसमें क्या आप सर्वशक्तिमान परमात्मा का रूप देख रहे हैं जो ऐसी आपत्ति करते हैं।  अनेक प्रकार की भौतिक चीजों से बना कंप्यूटर अगर खराब हो जाये तो उस कोई आकृति नहीं दिख सकती। मतलब यह आकृतियां तो पत्थर की मूर्ति से भी अधिक छलावा है।  उसमें अपनी अपने आस्थाओं की मजाक उड़ते देखने का अहसास ही सबसे बड़ा अज्ञान है-बल्कि कहा जाये कि उसे मजाक कहकर हम अपनी भद्द पिटवा रहे हैं। आस्था या भक्ति एक भाव है  जिनको भौतिक रूप से फुटबाल मैच की तरह नहीं खेला जाता कि वह हम पर गोल कर रहा है तो उसे हमें गोलकीपर बनकर रोकना होगा या दूसरे ने गोल कर दिया है तो वह हमें उसी तरह उतारना है।<br />
फिर आजकल यह मुद्दे ज्यादा ही आ रहे हैं। जहां तक मजाक का सवाल है तो अनेक ऐसी हिंदी फिल्में बन चुकी हैं जिसमें भारतीय संस्कृति से जुड़े अनेक पात्रों पर व्यंग्यात्मक प्रस्तुति हो चुकी है और उस पर किसी ने आपत्ति नहीं की। अब इसका एक मतलब यह है कि हम अपने धार्मिक प्रतीकों का सम्मान करना दूसरों से सीख रहे हैं।  यह एक भारी गलती है। होना तो यह चाहिये कि हम दूसरों को सिखायें कि इस तरह धार्मिक प्रतीकों पर जो कार्यक्रम बनते हैं या प्रस्तुतियां होती हैं उससे मूंह फेर कर उपेक्षासन करें क्योंकि सर्वशक्तिमान के स्वरूप का कोई आकार नहीं है। अगर हमारे हृदय में हमारी आस्था दृढ है तो उसका कोई मजाक उड़ा ही  नहीं सकता।  अगर धार्मिक भाव से आस्था दृढ़ नहीं होती और वह ऐसी जरा जरा सी बातों पर हिलने लगती हैं तो इसका मतलब यह है कि हमारे हृदय में स्वच्छता का अभाव है। धार्मिक आस्था अगर ज्ञान की जननी नहीं है तो फिर उसका कोई आधार नहीं है।  </p>
<p>दूसरा मतलब यह है कि उस कंप्यूटर गेम को शायद भारतीय बाजार में प्रचार दिलाने के लिये यह एक तरीका है।  इससे यह संदेह होता है कि विरोध करने वाले अपनी आस्था का दिखावा कर रहे हैं।  अब अगर कंप्यूटर पर कोई आकृति हनुमान जी की तरह बनी है तो हनुमान जी मान लेने का मतलब यह है कि वह आपके आंखों में ही बसते हैं, दिल में नहीं।  दिल में बसे होते तो चाहे कितने प्रकार की आकृतियां बनाओ आपको वह स्वीकार्य नहीं हो सकती।  बात इससे भी आगे कि अगर वह आपके इष्ट है तो आप भी उनके गेम को खेलिए-इससे वह रुष्ट नहीं हो जायेंगे। बस जरूरत है कि वह गेम भी आस्था और विश्वास से खेलें।  अगर अपने इष्ट के स्वरूप में हमारी  अटूट श्रद्धा है तो वह कभी इस तरह खेलने में नाराज नहीं होंगे और फिर हमसे परे भी कितना होंगे? जो पास होता है उसी के साथ तो खेला जाता है न!<br />
वाल्मीकी ऋषि का नाम तो सभी ने सुना होगा। ‘मरा’ ‘मरा’ कहते हुए राम को ऐसा पा गये कि उन पर इतना बड़ा ग्रंथ रच डाला कि  उनके समकक्ष हो गये। ऐसा कौन है जो भगवान श्रीराम को जाने पर वाल्मीकि को भूल जाये? आशय यह है कि आस्था और भक्ति दिखावे की चीज नहीं होती और न भौतिक रूप से इस जमीन पर बसती है कि वह टूटें और बिखरें।<br />
इस तरह जिनकी आस्था हिलती है या टूटती है उनके दिल लगता है कांच के कप की तरह ही होती है। एक कप टूट गया दूसरा ले आओ। एक इष्ट की मूर्ति से बात नहीं बनती दूसरे के पास जाओ।   उसके बाद भी बात नहीं बनती तो किसी सिद्ध के पास जाओ। इससे भी बात न बने तो अपनी भक्ति का शोर मचाओ ताकि लोग देखें कि भक्त परेशान है उसकी मदद करो। एक तरह से प्रचार की भूख के अलावा ऐसी घटनायें कुछ नहीं है। उनके लिये आस्था का हिलने का मतलब है सनसनी फैलाने का अवसर मिलना।<br />
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<blockquote><p><strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि शतकः राजाओं से अधिक तो ग्राम स्वामी इतराते हैं ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/04/22/raja-aur-gram-svami-adhyat/</link>
<pubDate>Wed, 22 Apr 2009 02:15:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/04/22/raja-aur-gram-svami-adhyat/</guid>
<description><![CDATA[राजा भर्तृहरि कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212; विपुलहृदयैरीशैतज्जगनतं प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong><br />
राजा भर्तृहरि कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong><br />
<strong>विपुलहृदयैरीशैतज्जगनतं पुरा विधृततमपरैर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा।<br />
इह हि भुवनान्यन्यै धीराश्चतुर्दशभुंजते कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मदज्वर:</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>अनेक  उदार हृदय के लोगों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया तो कुछ लोगों ने इसे जीतकर दूसरों को दान में दे दिया। आज भी कई शक्तिशाली लोग बड़े भूभाग के स्वामी है पर उनमें अहंकार का भाव तनिक भी नहीं दिखाई देता परंतु कुछ लोग ऐसे हैं जो कुछ ग्रामों (जमीन के लघु टुकड़े) के स्वामी होने के कारण उसके मद में लिप्त हो जाते हैं। </p>
<p><strong></strong><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>यह प्रथ्वी करोड़ों वर्षों से अपनी जगह पर स्थित है। अनेक महापुरुष यहां आये जिन्होंने इसका उपयोग किया। कुछ ने युद्ध में विजय प्राप्त कर जीती हुई जमीन दूसरों को दान में दी। अनेक धनी मानी लोगों ने बड़े बड़े दान किये और लोगों की सुविधा के लिये इमारतें बनवायीं। उन्होंने कभी भी अपने धन का अहंकार नहीं दिखाया पर आजकल जिसे थोड़ा भी धन आ जाता है वह अहंकार में लिप्त हो जाता है।  देखा जाये तो इसी अहंकार की प्रवृति ने समाज में गरीब और अमीर के बीच एक ऐसा तनाव पैदा किया है जिससे अपराध बढ़ रहे हैं।  दरअसल अल्प धनिकों में अपनी गरीबी के कारण क्रोध या निराशा नहीं आती बल्कि धनिकों की उपेक्षा और क्रूरता उनको विद्रोह के लिये प्रेरित करती है।</p>
<p>समाज के बुद्धिमान लोगों ने मान लिया है कि समाज का कल्याण केवल सरकार का जिम्मा है और इसलिये वह धनपतियों को समाज के गरीब, पिछड़े और असहाय तबके की सहायत के लिये प्रेरित नहीं करते। इसके अलावा जिनके पास धन शक्ति प्रचुर मात्रा है वह केवल उसके अस्तित्व से संतुष्ट नहीं है बल्कि दूसरे लोग उसकी शक्ति देखकर प्रभावित हों इसके लिये वह उसका प्रदर्शन करना चाहते हैं।  वह धन से विचार, संस्कार, आस्था और धर्म की शक्ति को कमतर साबित करना चाहते हैं।  सादा जीवन और उच्च विचार से परे होकर धनिक लोग-जिनमें नवधनाढ्य अधिक शामिल हैं-गरीब पर प्रतिकूल प्रयोग उसे अपनी शक्ति दिखाना चाहते हैं। परिणामतः गरीब और असहाय में विद्रोह की भावना बलवती होती है। </p>
<p>आज के सामाजिक तनाव की मुख्य वजह इसी धन का अहंकारपूर्ण उपयोग ही है। धन के असमान वितरण की खाई च ौड़ी हो गयी है इस कारण अमीर गरीब रिश्तेदार में भी बहुत अंतर है इसके कारण भावनात्मक लगाव में कमी होती जाती है। धन की शक्ति बहुत है पर सब कुछ नहीं है यह भाव धारण करने वाले ही लोग समाज में सम्मान पाते हैं और जो इससे परे होकर चलते हैं उनको कभी कभी न कभी विद्रोह का सामना करना पड़ता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि शतकः कामदेव करते हैं इस विश्व में अद्भुत लीला]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/03/21/kamdev-ki-adbhut-lila-bhartrihari-shatak/</link>
<pubDate>Sat, 21 Mar 2009 04:49:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/03/21/kamdev-ki-adbhut-lila-bhartrihari-shatak/</guid>
<description><![CDATA[कृशः काणः खञ्ज श्रवणरहितः पुच्छविकलो व्रणी पूयक्लिनः कृमिकुलशतैरावुततनु क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरककाप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><blockquote><strong>कृशः काणः खञ्ज श्रवणरहितः पुच्छविकलो<br />
व्रणी पूयक्लिनः कृमिकुलशतैरावुततनु<br />
क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरककापालार्पिततगलः<br />
शनीमन्वेति श्वा हतमपि निहन्त्येव मदनः</p>
<p>हिंदी में भावार्थ-देह से दुर्बल, खुजली वाला, बहरा काना, पुंछ विहीन, फोड़ों से भरा, पीव और  कीट कृमियों से लिपटा, भूख से व्याकुल, बूढ़ा मिट्टी के घड़े में फंसी हुई गर्दन वाला कुत्ता भी नई तथा युवा कुतिया के पीछे पीछे दुम हिलाता हुआ फिरता है। यह कामदेव की लीला है कि वह मरे हुए में भी  काम भावना लाकर उसे गहरी खाई में ढकेल कर मार देते हैं।<br />
संपादकीय व्याख्या-कामदेव की विचित्र लीला है। कोई भी कितना तपस्वी या ज्ञानी क्यों<br />
न हो उसे अपने मन में कभी अपने भाव लाकर विचलित कर ही देते हैं। ऐसा कोई जीव इस धरती पर नहीं है जो काम वासना के आधीन हैं होता हो। सच बात तो यह है की इस जीवन का आधार ही काम देव महाराज निर्मित करते हैं। मनुष्य हो या पशु अपनी जाति की नवयौवना को देखते उत्तेजित हो जाता है। यह अलग बात है की मनुष्यों में कुछ लोग कनखियों से देखकर आह भरते हैं पर प्रदर्शित  ऐसे करते हैं कि कि वह तो सामान्य दृष्टि से देख रहे है।<br />
 </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर के दोहे: कोई अपना कीमती सामान बोरी में नहीं भरता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/03/20/kabir-ke-dohe-kimti-saman-aur-bori/</link>
<pubDate>Fri, 20 Mar 2009 04:53:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात एक निस प्रेही निराधार का गाहक गोपीनाथ कबीरदास जी का कथन है कि चतु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p> <strong>चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात एक निस प्रेही निराधार का गाहक गोपीनाथ </strong>कबीरदास जी का कथन है कि चतुराई से परमात्मा को प्राप्त करने की बात तो व्यर्थ है। जो भक्त उनको निस्पृह और निराधार भाव से स्मरण करता है उसी को गोपीनाथ के दर्शन होते हैं। <strong>सिहों के लेहैंड नहीं, हंसों की नहीं पांत लालों की नहीं बोरियां, साथ चलै न जमात</strong> संत शिरोमणि कबीर दास जी के कथन के अनुसार सिंहों के झुंड बनाकर नहीं चलते और हंस कभी कतार में नहीं खड़े होते। हीरों को कोई कभी बोरी में नहीं भरता। उसी तरह जो सच्चे भक्त हैं वह कभी को समूह लेकर अपने साथ नहीं चलते। <strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>लोगों ने तीर्थ स्थानों को एक तरह से पर्यटन मान लिया है। प्रसिद्ध स्थानों पर लोग छुट्टियां बिताने जाते हैं और कहते हैं कि दर्शन करने जा रहे हैं। परिणाम यह है कि वहां पंक्तियां लग जाती हैंं। कई स्थानों ंपर तो पहले दर्शन कराने के लिये बाकायदा शुल्क तय है। दर्शन के नाम पर लोग समूह बनाकर घर से ऐसे निकलते हैं जैसे कहीं पार्टी में जा रहे हों। धर्म के नाम पर यह पाखंड हास्याप्रद है। जिनके हृदय में वास्तव में भक्ति का भाव है वह कभी इस तरह के दिखावे में नहीं पड़ते। वह न तो इस समूहों में जाते हैं और न कतारों के खड़े होना उनको पसंद होता है। जहां तहां वह भगवान के दर्शन कर लेते हैं क्योंकि उनके मन में तो उसके प्रति निष्काम भक्ति का भाव होता है। सच तो यह है कि मन में भक्ति भाव किसी को दिखाने का विषय नहीं हैं। हालत यह है कि प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों पर किसी सच्चे भक्त का मन जाने की इच्छा भी करे तो उसे इन समूहों में जाना या पंक्ति में खड़े होना पसंद नहीं होता। अनेक स्थानों पर पंक्ति के नाम पर पूर्व दर्शन कराने का जो प्रावधान हुआ है वह एक तरह से पाखंड है और जहां माया के सहारे भक्ति होती हो वहां तो जाना ही अपने आपको धोखा देना है। इस तरह के ढोंग ने ही धर्म को बदनाम किया है और लोग उसे स्वयं ही प्रश्रय दे रहे हैं। सच तो यह है कि निरंकार की निष्काम उपासना ही भक्ति का सच्चा स्वरूप है और उसी से ही परमात्मा के अस्तित्व का आभास किया जा सकता है। पैसा खर्च कर चतुराई से दर्शन करने वालों को कोई लाभ नहीं होता। &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग <a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a> <a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a> <a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a> संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक:आशंका और भय से मुक्त करता है वैराग्य भाव  ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/03/18/bharathari-shatak-vairgya-se-tanav-mukti/</link>
<pubDate>Wed, 18 Mar 2009 04:57:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भोग रोगभयं कुले च्यूतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं माने दैन्यभयं बले रिपुभर्य रूपे जरायाः भयम् शास्त्रे व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भोग रोगभयं कुले च्यूतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं<br />
माने दैन्यभयं बले रिपुभर्य रूपे जरायाः भयम्<br />
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं<br />
सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ- इस संसार में आने पर रोग का भय, ऊंचे कुल में पैदा हानेपर नीच कर्मों में लिप्त होने का भय, अधिक धन होने पर राज्य का भय, मौन रहने में दीनता का भय, शारीरिक रूप से बलवान होने पर शत्रु का भय, सुंदर होने पर बुढ़ापे का भय, ज्ञानी और शास्त्रों में पारंगत होने पर कहीं वाद विवाद में हार जाने का भय, शरीर रहने पर यमराज का भय रहता है। संसार में सभी जीवों के लिये सभी पदार्थ कहीं न कहीं पदार्थ भय से पीडि़त करने वाले हैं। इस भय से मन में वैराग्य भाव स्थापित कर ही बचा जा सकता है</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>हर आदमी कहीं न कहीं भय से पीडि़त होता है। अगर यह देह है तो अनेक प्रकार के ऐसे कार्य करने पड़ते हैं जिससे उसका पालन पोषण हो सके पर इसी कारण अनेक त्रुटियां भी होती हैं। इन्हीं त्रुटियों के परिणाम का भय मन को खाये जाता है। इसके अलावा जो वस्तु हमारे पास होती है उसके खो जाने का भय रहता है। इससे बचने का एक ही मार्ग है वह वैराग्य भाव। श्रीमद्भागवत गीता मेें इसे निष्काम भाव कहा गया है। वैराग्य भाव या निष्काम भाव का आशय यह कतई नहीं है कि जीवन में कोई कार्य न किया जाये बल्कि इससे आशय यह है कि हम जो कोई भी कार्य करें उसके परिणाम या फल में मोह न पालेंं। दरअसल यही मोह हमारे लिये भय का कारण बनकर हमारे दिन रात की शांति को हर लेता है। हमारे पास अगर नौकरी या व्यापार से जो धन प्राप्त होता है वह कोई फल नहीं है और उससे हम अन्य सांसरिक कार्य करते हैं-इस तरह अपने परिश्रम के बदल्र प्राप्त धन को फल मानने का कोई अर्थ ही नहीं है बल्कि यह तो कर्म का ही एक भाग है। हम अपने पास पैसा देखकर उसमें मोह पाल लेते हैं तो उसके चोरी होने का भय रहता है। अधिक धन हुआ तो राज्य से भय प्राप्त होता है क्योंकि कर आदि का भुगतान न करने पर दंड का भागी बनना पड़ता है।</p>
<p>इसी तरह ज्ञान हो जाने पर जब उसका अहंकार उत्पन्न होता है तब यह डर भी साथ में लग जाता है कि कहीं किसी के साथ वाद विवाद में हार न जायें। यह समझना चाहिये कि कोई सर्वज्ञ नहीं हो सकता है। भले ही एक विषय के अध्ययन या कार्य करने में पूरी जिंदगी लगा दी जाये पर सर्वज्ञ नहीं बना जा सकता है। समय के साथ विज्ञान के स्वरूप में बदलाव आता है और इसलिये नित नये तत्व उसमें शामिल होते हैं। जिस आदमी में ज्ञान होते हुए भी नयी बात को सीखने और समझने की जिज्ञासा होती है वही जीवन को समझ पाते हैं पर ज्ञानी होने का अहंकार उनको भी नहीं पालना चाहिये तब किसी हारने का भय नहीं रहता।</p>
<p>कुल मिलाकर सांसरिक कार्य करते हुए अपने अंदर निष्काम या वैराग्य भाव रखकर हम अपने अंदर व्याप्त भय के भाव से बच सकते हैं जहां मोह पाला वह अपने लिये मानसिक संताप का कारण बनता है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.‘शब्दलेख सारथी’</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक:आशंका और भय से मुक्त करता है वैराग्य भाव  ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/03/18/%e0%a4%ad%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%83%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%bf-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b6%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%86%e0%a4%b6%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%94/</link>
<pubDate>Wed, 18 Mar 2009 04:57:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भोग रोगभयं कुले च्यूतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं माने दैन्यभयं बले रिपुभर्य रूपे जरायाः भयम् शास्त्रे व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भोग रोगभयं कुले च्यूतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं<br />
माने दैन्यभयं बले रिपुभर्य रूपे जरायाः भयम्<br />
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं<br />
सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ- इस संसार में आने पर रोग का भय, ऊंचे कुल में पैदा हानेपर नीच कर्मों में लिप्त होने का भय, अधिक धन होने पर राज्य का भय, मौन रहने में दीनता का भय, शारीरिक रूप से बलवान होने पर शत्रु का भय, सुंदर होने पर बुढ़ापे का भय, ज्ञानी और शास्त्रों में पारंगत होने पर कहीं वाद विवाद में हार जाने का भय, शरीर रहने पर यमराज का भय रहता है। संसार में सभी जीवों के लिये सभी पदार्थ कहीं न कहीं पदार्थ भय से पीडि़त करने वाले हैं। इस भय से मन में वैराग्य  भाव स्थापित कर  ही बचा जा सकता है </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>हर आदमी कहीं न कहीं भय से पीडि़त होता है।  अगर यह देह है तो अनेक प्रकार के ऐसे कार्य करने पड़ते हैं जिससे उसका पालन पोषण हो सके पर इसी कारण अनेक त्रुटियां भी होती हैं।  इन्हीं त्रुटियों के परिणाम  का भय मन को खाये जाता है।  इसके अलावा जो वस्तु हमारे पास होती है उसके खो जाने का भय रहता है। इससे बचने का एक ही मार्ग है वह वैराग्य भाव। श्रीमद्भागवत गीता मेें इसे निष्काम भाव कहा गया है। वैराग्य भाव या निष्काम भाव का आशय यह कतई नहीं है कि जीवन में कोई कार्य न किया जाये बल्कि इससे आशय यह है कि हम जो कोई भी कार्य करें उसके परिणाम या फल में मोह न पालेंं। दरअसल यही मोह हमारे लिये भय का कारण बनकर हमारे दिन रात की शांति को हर लेता है।  हमारे पास अगर नौकरी या व्यापार से जो धन प्राप्त होता है वह कोई फल नहीं है और उससे हम अन्य सांसरिक कार्य करते हैं-इस तरह अपने परिश्रम के बदल्र प्राप्त धन को फल मानने का कोई अर्थ ही नहीं है बल्कि यह तो कर्म का ही एक भाग है। हम अपने पास पैसा देखकर उसमें मोह पाल लेते हैं तो उसके चोरी होने का भय रहता है। अधिक धन हुआ तो राज्य से भय प्राप्त होता है क्योंकि कर आदि का भुगतान न करने पर दंड का भागी बनना पड़ता है। </p>
<p>इसी तरह ज्ञान हो जाने पर जब उसका अहंकार उत्पन्न होता है तब यह डर भी साथ में लग जाता है कि कहीं किसी के साथ वाद विवाद में हार न जायें। यह समझना चाहिये कि कोई सर्वज्ञ नहीं हो सकता है। भले ही एक विषय के अध्ययन या कार्य करने में पूरी जिंदगी लगा दी जाये पर सर्वज्ञ नहीं बना जा सकता है। समय  के साथ विज्ञान के स्वरूप में बदलाव आता है और इसलिये नित नये तत्व उसमें शामिल होते हैं।  जिस आदमी में ज्ञान होते हुए भी नयी बात को सीखने और समझने की जिज्ञासा होती है वही जीवन को समझ पाते हैं पर ज्ञानी होने का अहंकार उनको भी नहीं पालना चाहिये तब किसी हारने का भय नहीं रहता। </p>
<p>कुल मिलाकर सांसरिक कार्य करते हुए अपने अंदर निष्काम या वैराग्य भाव रखकर हम अपने अंदर व्याप्त भय के भाव से बच सकते हैं जहां मोह पाला वह अपने लिये मानसिक संताप का कारण बनता है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.‘शब्दलेख सारथी’</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति: दोस्त गरीब हो तो भी उसकी इज्जत करें ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/03/06/respect-to-friends-vidur-niti/</link>
<pubDate>Fri, 06 Mar 2009 14:09:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/03/06/respect-to-friends-vidur-niti/</guid>
<description><![CDATA[१.जो मित्रों से सत्कार और सहायता पाकर कृतार्थ होकर भी उनका साथ नहीं निभाते ऐसे कृत्घ्नों के मरने पर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>१.जो मित्रों से सत्कार  और सहायता पाकर  कृतार्थ होकर भी उनका  साथ नहीं निभाते ऐसे कृत्घ्नों के मरने पर उनका मांस तो मांसाहारी पशु भी नहीं खाते।<br />
२.धनवान हो धनहीन मित्र का  सम्मान करें। मित्रों से न तो किसी प्रकार की याचना करें और न ही उनकी परीक्षा लें।<br />
३.दुष्ट पुरुषों का स्वभाव मेघ के समान  चंचल होता है, वे सहसा क्रोध कर बैठते हैं और अकारण ही प्रसन्न हो जाते हैं।<br />
<span class="">४.हंस जिस प्रकार सूखे सरोवर के पास   मंडरा कर रह जाते हैं उनके अन्दर प्रवेश नहीं करते उसी प्रकार   जिसके ह्रदय में चंचलता का भाव  विद्यमान है और अज्ञानी हैं वह भी इन्द्रियों के वश में रहता है अरु उसे अर्थ की प्राप्ति नहीं होती। </span><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बहु ने लिखी कविताएँ-व्यंग्य शायरी ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/02/28/naee-bahu-ki-kavitaen-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sat, 28 Feb 2009 09:12:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/02/28/naee-bahu-ki-kavitaen-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[नयी बहू कवियित्री है जब सास को पता लगी तो उसकी परीक्षा लेने की बात दिमाग में आयी उसने उससे अपने ऊपर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>नयी बहू कवियित्री है<br />
जब सास को पता लगी<br />
तो उसकी परीक्षा लेने की बात दिमाग में आयी<br />
उसने उससे अपने ऊपर कविता लिखने को कहा<br />
तो बहू ने बड़ी खुशी से सुनाई<br />
‘मेरी सास दुनियां में सबसे अच्छी<br />
जैसे मैंने अपनी मां पायी<br />
बोलना है कोयल की तरह<br />
चेहरा है लगता है किसी देवी जैसा<br />
क्यों न सराहूं अपना भाग्य ऐसा<br />
चरण धोकर पीयूं<br />
ऐसी सास मैंने पायी’</p>
<p>सास खुश होकर बोली<br />
‘अच्छी कविता करती हो<br />
लिखती रहना<br />
मेरी भाग्य जो ऐसी बहू पाई’</p>
<p>दो साल बाद जब वह<br />
कवि सम्मेलन जाने को थी तैयार<br />
सास जोर से चिल्लाई<br />
‘क्या समझ रखा है<br />
घर या धर्मशाला<br />
मुझसे इजाजत लिये बिना<br />
जब जाती और  आती हो<br />
भूल जाओं कवि सम्मेलन में जाना<br />
हमें  तुम्हारी यह आदत नहीं समझ मंें आयी’</p>
<p>गुस्से में बहू ने अपनी यह कविता सुनाई<br />
‘कौन कहता है कि सास भी<br />
मां की तरह होती है<br />
चाहे कितनी भी शुरू में प्यारी लगे<br />
बाद में कसाई जैसी होती है<br />
हर बात में कांव कांव करेगी<br />
खलनायिका जैसा रूप धरेगी<br />
समझ लो यह मेरी आखिरी कविता<br />
जो पहली सुनाई थी उसके ठीक उलट<br />
अब मत रोकना कभी<br />
वरना कैसिट बनाकर रोज<br />
सुनाऊंगी सभी लोगों को<br />
तुम भूल जाओ अपना रुतवा<br />
मैं नहीं छोड़ सकती कविताई’</p>
<p>सास सिर पीटकर पछताई<br />
‘वह कौनसा मुहूर्त था जो<br />
इससे कविता सुनी थी<br />
और आगे लिखने को कहा था<br />
अब तो मेरी मुसीबत बन आई<br />
अब कहना है इससे बेकार<br />
कहीं सभी को न सुनाने लगे<br />
क्या कहेगा जब सुनेगा जमाई<br />
वैसे ही नाराज रहता है<br />
करने न लगे कहीं वह ऐसी कविताई</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p align="center"><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</blockquote>
<div align="center"></div>
<p>अन्य ब्लाग1.<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a> <a href="http://dprajk.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a> 3.<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि  शतकः इच्छाओं की   आग गुणों को जला देती है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/02/28/icchhaon-ke-aag-aur-gun/</link>
<pubDate>Sat, 28 Feb 2009 04:40:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/02/28/icchhaon-ke-aag-aur-gun/</guid>
<description><![CDATA[तावन्महत्तवं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकता यावज्जवलति नांगेषु हतः पञ्वेषु पावकः हिंदी में भावार्थ-हृद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>तावन्महत्तवं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकता<br />
यावज्जवलति नांगेषु हतः पञ्वेषु पावकः</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>हृदय में विद्वता, कुलीनता और विवेक का प्रभाव तब तक ही रहता है जब तक ही जब तक कामना, वासना और इच्छा की अग्नि प्रज्जवलित नहीं हो उठती है।  मन में लोभ और लालच का भाव आते ही सब सदगुण नष्ट हो जाते है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>इस संसार में मनुष्य के जीवन व्यतीत करने के दो ही मार्ग हैं-एक है ज्ञान मार्ग और दूसरा मोहमाया का मार्ग।  मनुष्य तो अपने मन का दास है जैसे वह कहता है उसकी पांव वही चलते जाते है। यह उसका भ्रम है कि वह स्वयं चल रहा है।  कुछ मनुष्य अपना जीवन ज्ञान के साथ व्यतीत करते हैं। वह सासंरिक कार्य करते हुए भी धन और मित्र के संग्रह में लोभ नहीं करते।  जितना धन मिल गया उसी में संतुष्ट हो जाते हैं पर कुछ लोगों की लालच और लोभ का अंत ही नहीं है। वह धन और मित्र संग्रह से कभी संतुष्ट नहीं होते हैं और मोहमाया के मार्ग पर चलते जाते हैं।  </p>
<p>हां, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अधिक अवसर न मिल पाने की वजह से धन और मित्र संग्रह सीमित मात्रा में कर पाते हैं। वह तब खूब ज्ञान की बातें सुनते और करते हैं।  उनकी बातों ये यह भ्रम भी हो जाता है कि वह संत या साधु प्रवृत्ति के हैं पर ऐसे लोगों को जब धन और मित्र बनाने के अधिक अवसर अचानक प्राप्त होते हैं तब वह सारा ज्ञान भूलकर उसका लाभ उठा लेते है।।  तब उनका सारा ज्ञान एक तरह से  बह जाता है। फिर वह पूरी तरह से धन संपदा और अपने निजी संबंधों के विस्तार पर अपना ध्यान केंद्रित कर देते हैं और उनके लिये पहले अर्जित ज्ञान निरर्थक हो जाता है। </p>
<blockquote><p>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">3.अनंत शब्द योग</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[find sex partner for free for tonight]]></title>
<link>http://livesexy.wordpress.com/2009/02/22/find-sex-partner-for-free-for-tonight/</link>
<pubDate>Sun, 22 Feb 2009 10:29:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>livenature</dc:creator>
<guid>http://livesexy.wordpress.com/2009/02/22/find-sex-partner-for-free-for-tonight/</guid>
<description><![CDATA[Passion.com Maybe you have a site that is not outrightly &#8220;adult&#8221; in nature, but it is mo]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><a href="http://passion.com/go/g1043479"><span style="font-size:13pt;color:#666666;font-weight:bold;">Passion.com</span></a></p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि शतक:घमंडी अमीरों का मुहँ क्यों ताकते हो            संदेश: अहंकारी धनवानों के तरफ़ क्यों देखते हो?]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/02/07/bharatruhari-shatak-amiron-ka-moonh-kyon-takate-ho/</link>
<pubDate>Sat, 07 Feb 2009 07:11:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यः प्रघ्वस्ता तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यः<br />
प्रघ्वस्ता तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः।<br />
वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रस्भमपगतप्रश्रयाणां खलानां<br />
दुःखाप्तसवल्पवित्तस्मय पवनवशान्नर्तितभ्रुलतानि ।।</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> वन और पर्वतों पर क्या फल और अन्य खाद्य सामग्री नष्ट हो गयी है या पहाड़ों से निकलने वाले पानी के झरने बहना बंद हो गये हैं? क्या वृक्षों से रस वाले फलों की शाखायें नहीं रहीं हैं। उनसे तो तन ढंकने के लिये वल्कल वस्त्र भी प्राप्त होते हैं। ऐसा क्या कारण है कि गरीब लोग उन अहंकारी और दुष्ट लोगों की और मुख ताकते हैं जिन्होंनें थोड़ा धन अर्जित कर लिया हैं। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संक्षिप्त संपादकीय व्याख्या-</strong>यह तो प्रकृति का ही कुछ रहस्य है कि माया सभी के पास समान नहीं रहती। जन्म तो सभी एक तरह से लेते हैं पर माया के आधार पर ही गरीब और अमीर का श्रेणी तय होती है। वैसे प्रकृति ने इतना सभी कुछ बनाया है कि आदमी अगर आग न भी जलाये तो भी उसक पेट भरने का  काम चल जाये। तमाम तरह के रसीले फल पेड़ पर लगते हैं पहाड़ों से निकलने वाले झरने पानी देते हैं पर मनुष्य का मन भटकता है केवल उन भौतिक पदार्थों में जो न खाने के काम आते हैं न पीने के। सोना चांदी रुपया और तमाम तरह के अन्य पदार्थ वह संग्रह करता है जो केवल मन के तात्कालिक संतोष के लिये होते हैं।   जिनके पास थोड़ा धन आ जाता है गरीब आदमी उसकी तरफ ही ताकता है कि काश इतना धन मुझे भी प्राप्त होता।  या वह इस प्रयास में रहता है कि उस धनी से उसका संपर्क बना जाये ताकि समाज में उसका सम्मान बने भले ही उससे कोई आर्थिक लाभ न हो-जरूरत पड़ने पर सहायता की भी आशा वह करता है।<br />
ऐसे विचार हमारे अज्ञान का परिचायक होते हैं।  हमें इस प्रकृति की तरफ देखना चाहिये जिसने इतना सब बनाया है कि कोई आदमी दूसरे की सहायता न करे तो भी उसका काम चल जाये। ऐसे में धनिक लोगों की तरफ मूंह ताक कर अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये।<br />
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<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कबीर के दोहे: लड़ने से अधिक बांटकर खाने में चाहिए हिम्मत ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/01/30/kabir-sandesh-himmat/</link>
<pubDate>Fri, 30 Jan 2009 04:34:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/01/30/kabir-sandesh-himmat/</guid>
<description><![CDATA[कबीर तो सांचै मतै, सहै जू सनमुख वार कायर अनी चुभाय के, पीछे झखै अपार संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>कबीर तो सांचै मतै, सहै जू सनमुख वार<br />
कायर अनी चुभाय के, पीछे झखै अपार</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि सच्चा वीर तो वह है जो सामने आकर लड़ता है पर जो कायर है वर पीठ पीछे से वार करता है। </p>
<p><strong>तीर तुपक सों जो लड़ैं, सो तो सूरा नाहिं<br />
सूरा सोइ सराहिये, बांटि बांटि धन खांहि</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो अस्त्र शस्त्र से लड़ते है। उनको वीर नहीं कहा जा सकता है। सच्चे शूरवीर तो हैं जो आपस में मिल बैठकर खाते हैं। वह जो भी कमाते हैं उसे समान रूप से आपस में बांटते हैं।</p>
<p>वर्तमान सन्दर्भ  में संपादकीय व्याख्या-शूरवीर हमेशा उसे ही माना जाता है जो अस्त्र शस्त्र का उपयोग करता है। उनमें भी वही वीर है जो सामने से वार करता है पर जो कायर हैं वह पीठ पीछे वार करते हैं। वैसे अस्त्र शस्त्र से लड़ने में भी साहस की आवश्यकता कहां होती है। अगर अस्त्र शस्त्र हाथ में हों तो वेसे भी मनुष्य के मन में दुस्साहस आ ही जाता है और कोई भी  उपयोग कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि हथियार रखने से क्या होता है उसे चलाने के लिये साहस भी होना चाहिये-विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर लोहे से बना कोई हथियार मनुष्य के हाथ में हो तो उसमें आक्रामता आ ही जाती है। </p>
<p> असली साहस तो अपने कमाये धन का दूसरे के साथ बांटकर खाने में दिखाना चाहिये। आदमी जब धन कमाता है तो उसके प्रति उसका मोह इतना हो जाता है कि वह उसे किसी को थोड़ा देने में भी हिचकता है।  मिलकर बांटने की बात तो छोडि़ये अपनी रोटी का छोटा टुकड़ा देने में भी आदमी की जान जाती है।</p>
<p>हमारे प्राचीन मनीषियों ने दान की महिमा को इसलिये प्रतिपादित किया कि समाज में सामाजिक समरसता का भाव रहे। हमारे अध्यात्म में इतना तक कहा गया है कि किसी को दान देते हुए आंखें नीची करना चाहिये ताकि दूसरे को हमारा अहंकार नहीं दिखाई दे और उसके अंदर अपने प्रति कुंठा भाव न उत्पन्न हो। मगर अब तो समाज कल्याण की बात राज्य के भरोसे छोड़ दी गयी है और वही लोग जन कल्याण के लिये मैदान में उतर रहे हैं जिनको उससे कुछ आर्थिक फायदा है।  यह लोग कायर होते हैं क्योंकि दान और कल्याण क लिये प्राप्त धन का वह हरण करते हैं। </p>
<p>कलुषित तरीके से प्राप्त धन का भी वह दान करने का साहस नहीं कर पाते। अपने धन देने में सभी का हृदय कांपने लगता है। सच है कि जो दानी है वही सच्चा शूरवीर है। वह भी सच्चा वीर है जो अस्त्र शस्त्र लेकर कहकर सामने से प्रहार करता है पर आजकल तो कायरों की पूरी फौज है जो पीठ पीछे से वार करती है। चोर और डकैतों द्वारा किये गये और अपराध और निरंतर बम धमाकों की बढ़ती घटनायें इस बात का प्रमाण हैं। </p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
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