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	<title>hindi-knowledge &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/hindi-knowledge/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-knowledge"</description>
	<pubDate>Tue, 05 Jan 2010 01:07:40 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[नई पीढ़ी को मौक़ा-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/21/nayi-peedhi-ko-mauka-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 13:43:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/21/nayi-peedhi-ko-mauka-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अपने विरोधी पर शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा ‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं लोग भी अब उनके च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अपने विरोधी पर<br />
शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा<br />
‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं<br />
लोग भी अब उनके चेहरे से थके हैं<br />
नया चेहरा सामने नहीं आने देते<br />
जहां मौका मिलता वहीं<br />
अपने लिये हाथ फैला लेते हैं।<br />
हमें देखो<br />
अब तो सब छोड़ दिया है<br />
नये चेहरों को जनता से जोड़ दिया है<br />
बेटी को सौंप दिया है<br />
पत्रकारिता का जिम्मा<br />
बेटे को की जनसेवा की विरासत<br />
अब  हमारे घर में<br />
कोई नहीं बचा युवा पीढ़ी में निकम्मा<br />
हम तो करते हैं<br />
महापुरुषों का अनुसरण<br />
जो नयी पीढ़ी को आगे आने का मौका देते हैं।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://anant-shabd.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<b><a href="http://bharatdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</b></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भाषा का लफड़ा-हिन्दी हास्य व्यंग्य (bhasha ka lafada-hindi commedy satire]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/15/bhasha-vivad-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 11:54:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/15/bhasha-vivad-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[शाम के समय दीपक बापू अपने घर से बाहर निकल एक निकट के उद्यान में हवा खाने पहुंचे। अंदर प्रवेश करने से]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>शाम के समय दीपक बापू अपने घर से बाहर निकल एक निकट के उद्यान में हवा खाने पहुंचे। अंदर प्रवेश करने से पहले ही द्वार पर खड़े होकर उन्होंने देखा कि आदमी को  देखा जिसकी पीठ उनकी तरफ थी। उसके बाल कंधे गर्दन तक लटके हुए थे। सिर और शरीर चैड़ा था। उसने चूड़ीदार पायजामा और चमकदार पीला कुर्ता पहने रखा था। दीपक बापू का अनुमान था कि वह आलोचक महाराज ही होंगे इसलिये वह अंदर जायें कि नहीं इस विचार में खड़े हो गये। वह नहीं चाहते थे कि आलोचक महाराज के कटु शब्द वहां घूम रहे अन्य लोगों के सामने सुनकर अपनी भद्द पिटवायें।<br />
इससे पहले वह कोई निर्णय करते उस आदमी ने अपना मुंह फेर कर उनकी तरफ किया।  दीपक बापू की घिग्घी बंध गयी।  वह आलोचक महाराज ही थे। दीपक बापू खीसें निपोड़ते हुए उनके पास पहुंच गये और हाथ जोड़कर बोले-नमस्ते महाराज, यह आप तफरी के लिये आये हैं! अच्छा है, इससे तंदुरस्ती बढ़ती है।’<br />
आलोचक महाराज ने बिना किसी भूमिका बांधे कहा-‘हम तो पहले ही तंदुरस्त हैं। देखो इतनी बड़ी देह के साथ ही  समाज में भी हमारी  इज्जत है! तुम्हारी तरह कीकड़ी कवि नहीं है कि अनजान होकर इधर बाग में टहलने आयें।  हमें पता था कि तुम शाम को यहां आते हो इसलिये ही तुम्हारा इंतजार कर रहे थे।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज, अभी तो हम तफरी के मूड में हैं फिर कभी बात करेंगे।’<br />
आलोचक महाराज बोले-‘वह फंदेबाज तुम्हारा दोस्त है न! उसे जरा समझा देना। अपने किये की माफी मांग ले वरना हम तुम्हारी कविताओं को अखबार में छपना बंद करवा देंगे।’<br />
दीपक बापू ने अपनी टोपी उतारी और सिर पर हाथ फेराने लगे। आलोचक महाराज बोले-डर गये न!’<br />
दीपक बापू बोले-‘नहीं डरे काहे को? हम तो यह सोच रहे हैं कि कहां आपने मुसीबत ले ली।  फंदेबाज हमारे गले में दोस्त की तरह फंसा है वरना हमारा उससे क्या वास्ता? उसकी बेवकूफियों की वजह से हम हास्य कवितायें लिखते हैं वरना तो जोरदार साहित्यकार होते!   आप उससे सुलह कर लीजिये वरना वह आपको परेशान करेगा। वैसे आपका झगड़ा हुआ किस बात पर था?’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘तुम्हारी बात को लेकर।  वह एक कार्यक्रम में पहुंच गया।  वहां हमने तुम्हारा उदाहरण देकर नये कवियों को समझाया कि देखो उस फ्लाप दीपक बापू को! कभी एक विषय पर ढंग से नहीं लिखता। योजनाबद्ध ढंग से नहीं लिखता। बस वह फंदेबाज मंच पर चढ़ आया और हमें लात घूंसे दिखाने लगा।  कुछ बुर्र बुर्र और हुर्र हुर्र बोल रहा था। हमने तो पहचान लिया क्योंकि उस लफंगे को कई बार तुम्हारे साथ साइकिल पर पीछे बैठे जाते देखा है।’<br />
दीपक बापू बोले-‘शर्मनाक! उसने आप जैसे महान आदमी को अपनी गूंगी मातृभाषा में इतनी भद्दी गालियां दी। हम तो यह गालियां अपनी जुबान से भी नहीं निकाल सकते।’<br />
आलोचक महाराज चैंके-‘वह गालियां दे रहा था! उसकी भाषा अपने समझ में नहीं आयी। हमने तो उसे कई बार अपनी भाषा में बोलते देखा है।’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज उसकी मात्ृभाषा गूंगी है।  उसी मेें वह आपको गालियां दे रहा था।<br />
आलोचक महाराज-‘यह कौनसी भाषा है?’<br />
दीपक बापू-‘हमें नहीं मालुम।’<br />
आलोचक महाराज-‘तो तुम्हें मालुम क्या है?’<br />
दीपक बापू-‘यही कि उसकी मातृभाषा गूंगी है। जब वह गुस्से में होता है तब यही भाषा बोलता है।’<br />
आलोचक महाराज बोले-‘उसका मोबाइल नंबर दो।  अभी उसको फोन करता हूं और जो शराब की बोतल के पैसे उसको दिये वापस मांगता हूं। मैंने यह सोचकर उस कार्यक्रम में उससे हंगामा फिक्स किया था कि वह तुम्हारा दोस्त है। इससे तुम्हें भी प्रचार मिल जायेगा  और तुम कहते हो कि दोस्त नहीं है तो अब देखो उसकी क्या हालत करता हूं? हमें गूंगी भाषा में गालियां देता है। देखो तुम अपनी भाषा वाले हो। हमारा साथ देना। उसके खिलाफ बयान अखबार में देना। यह गूंगी भाषा वाला समझता क्या है?<br />
दीपक बापू ने रुमाल आलोचक महाराज की तरफ बढ़ाते हुए कहा-‘लीजिये महाराज, आवेश में आपका पसीना निकल रहा है।  यह आपका हंगामा फिक्स था तो फिर हमेें काहे धमकाने आये।’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘उसने यह शर्त रखी थी कि उसकी तरफ से तुम्हारे प्रति वफादारी का प्रमाण पत्र पेश करूं।  मगर अब मामला भाषा का है। तुम हम एक हो जाते हैं।’<br />
दीपक बापू बोले-‘कतई नहीं महाराज! आपका झगड़ा हुआ है और इसमें हम कतई नहीं पड़ेंगे।  झगड़ा किसी बात पर और नाम जाति, भाषा और धर्म का लेकर लोगों को लड़ाने का प्रयास कम से कम हमारे साथ तो नहीं चलेगा। रहा अखबार में छपने का सवाल तो हम आपके पास नहीं लायेंगे अपनी रचना!<br />
आलोचक महाराज बोले-‘नहीं तुम लाना! पर हम नहीं छपवायेंगे अखबार में। जब लाओगे और नहीं छपेगा तभी तो हमारे गुस्से का पता चलेगा? अपनी भाषा में हमारी जो इज्जत है उसकी परवाह न करने का परिणाम कैसे चलेगा तुमको?’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज हमें पता है! आप हमारी कविताओं के विषय चुराकर दूसरों को सुनाकर उनसे दूसरी रचनायें लिखवाते हो। आपके पास विषय चिंतन तो  है ही नहीं।  एकाध बार साल में कहीं रचना छपवाकर एहसान हम पर करते हैं! नमस्कार हम चलते हैं! वैसे आप इस विषय को यहीं बंद कर दें क्योंकि आपने यह राज उजागर कर ही दिया है कि वह हंगामा फिक्स था!’<br />
दीपक बापू घर वापस चल पड़े। रात हो चली थी। इधर दारु की बोतल के साथ फंदेबाज भी उनको अपने ही घर के बाहर खड़ा मिला। उनको देखते ही बोला-‘आओ दीपक बापू। आज तुम्हारे लिये जोरदार खबर लाया हूं। आज मैंने आलोचक महाराज की क्या धुर उतारी है! तुम देखते तो वाह वाह कर उठते!  इसी खुशी में यह बोतल खरीद कर अपने घर ले जा रहा था। सोचा तुम्हें बताता चलूं।’<br />
दीपक बापू हंसकर बोले-‘हमें पता है! आलोचक महाराज ने गुस्से में बता दिया कि यह हंगामा फिक्स था! अब तुम अपनी सफाई मत देना।’<br />
फंदेबाज बोला-‘उसने ऐसा किया? अभी जाकर उसकी खबर लेता हूं।’<br />
दीपक बापू बोले-‘यह बोतल घर ले जाकर पीओ।  वरना यह भी छिन जायेगी।  वह बहुत गुस्से में हैं। वहां जो तुम बुर्र बुर्र और हुर्र हुर्र बोले रहे थे उसका मतलब उनके समझ में आ गया है।’<br />
फंदेबाज  बोला-‘पर वह तो मैं ऐसे ही कर रहा था1’<br />
दीपक बापू-‘हमने उनसे कह दिया कि वह अपनी मात्ृभाषा गूंगी में आपको गालियां दे रहा था। तुम कहते भी हो कि मेरी मातृभाषा गूंगी है!’<br />
फंदेबाज-‘वह तो इसलिये कि मेरी माताजी गूंगी है। यह कोई अलग से भाषा नहीं है। तुमने यह क्या आग लगाई।’<br />
दीपक बापू बोले-‘लगाई तो तुमने! हमने तो बुझाई।  दोनों ने हमारा नाम लेकर हंगामा किया और हमने दोनों की कराई लड़ाई।’<br />
दीपक बापू अंदर चले गये इधर फंदेबाज बुदबुदाया-‘अब इसका क्या नशा चढ़ेगा! इनको तो पता चल गया  कि यह हंगामा फिक्स था! फिर यह अपनी भाषा और गूंगी भाषा का मुद्दा चिपकाये आये हैं।  वह आलोचक महाराज पूरा खब्ती है। खबरों में छपने के लिये वह कुछ भी कर सकता है।  इससे पहले कि वह कुछ करे उसे समझाये आंऊ कि गूंगी कोई अलग से भाषा नहीं है। इस दीपक बापू का क्या? यह तो हास्य कविता लिखकर फारिग हो लेगा। मेरी शामत आयेगी। यह बोतल भी आलोचक महाराज को वापस कर आता हूं<br />
वह तुरंत वहां से चल पड़ा।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
<b>कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किताबों में लिखे शब्द दुनियां नहीं चलाते-व्यंग्य कविता (kitab,shabd aur duniya-vyangya kavita)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/12/shabda-ke-duniyan-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 15:37:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/12/shabda-ke-duniyan-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[किताबों में लिखे शब्द कभी दुनियां नहीं चलाते। इंसानी आदतें चलती अपने जज़्बातों के साथ कभी रोना कभी ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>किताबों में लिखे शब्द<br />
कभी दुनियां नहीं चलाते।<br />
इंसानी आदतें चलती<br />
अपने जज़्बातों के साथ<br />
कभी रोना कभी हंसना<br />
कभी उसमें बहना<br />
कोई फरिश्ते आकर नहीं बताते।</p>
<p>ओ किताब हाथ में थमाकर<br />
लोगों को बहलाने वालों!<br />
शब्द दुनियां को सजाते हैं<br />
पर खुद कुछ नहीं बनाते<br />
कभी खुशी और कभी गम<br />
कभी हंसी तो कभी गुस्सा आता<br />
यह कोई करना नहीं सिखाता<br />
मत फैलाओं अपनी  किताबों में<br />
लिखे शब्दों से जमाना सुधारने का वहम<br />
किताबों की कीमत से मतलब हैं तुम्हें<br />
उनके अर्थ जानते हो तुम भी कम<br />
शब्द समर्थ हैं खुद<br />
ढूंढ लेते हैं अपने पढ़ने वालों को<br />
गूंगे, बहरे और लाचारा नहीं है<br />
जो तुम उनका बोझा उठाकर<br />
अपने फरिश्ते होने का अहसास जताते।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
<b>कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आत्मप्रचार की भूख-चिंतन आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/11/atmapracha-ki-bhookh-chintan-lekh/</link>
<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 15:04:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/11/atmapracha-ki-bhookh-chintan-lekh/</guid>
<description><![CDATA[अगर सभी लोग जीवन सहज भाव से व्यतीत करें तो शायद उनके बीच कोई विवाद ही न हो। मगर यह संभव नहीं है क्यो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अगर सभी लोग जीवन सहज भाव से व्यतीत करें तो शायद उनके बीच कोई विवाद ही न हो। मगर यह संभव नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग बाह्यमुखी होते हैं और उनमें कुछ ऐसे होते हैं जो अपने व्यवसाय के हित के लिये शोर शराबा करते हुए लोगों का ध्यान अपनी ओर बनाये रखते हैं।  आज के आधुनिक युग में इंटरनेट, टीवी, एफ.एम. रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं में विज्ञापनों का भंडार है उनका लक्ष्य केवल एक ही है कि किसी तरह लोगों को उलझाये रखा जाये।  ऐसे में श्रीगीता में वर्णित सहज ज्ञान योग ही वह शक्ति है जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बनाकर दूसरों के जाल में फंसने से बचा सकती है।  यही कारण है कि जितनी उपभोग की प्रवृत्तियां के साथ स्वाभाविक रूप से  योग का प्रचार भी बढ़ रहा है।  दरअसल यही योग भी एक विक्रय योग्य वस्तु बन गया है यही कारण कि विश्व विख्यात योग शिक्षक भी लोगों के केंद्र बिन्दू में आ गये हैं और लोग उनको अपने कार्यक्रमों में देखकर एक सुख की अनुभूति करते हैं।  योग शिक्षक भारतीय धर्म के प्रतीक हैं और उन्होंने एक गैर हिन्दू कार्यक्रम में शामिल होकर यह सािबत भी किया कि<br />
उनके लिये पूरा विश्व एक परिवार है।   यहां योग गुरु को गलत ठहराना ठीक नहीं है पर कुछ सवाल ऐसे हैं उनके जवाब में हम ऐसे विचारों तक पहुंच सकते हैं जिनसे सहजयोग के सिद्धांत का विस्तार हो। </p>
<p>यह विश्व विख्यात योग शिक्षक कहने के लिये भले ही गैर हिन्दूओं के कार्यक्रम में गये हों पर वह सभी इसी देश  के  ही बाशिंदे हैं।  मुख्य बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रम में उनको बुलाकर आयोजक सिद्ध क्या करना चाहते हैं?<br />
अधिक चर्चा से पहले एक बात स्पष्ट करें कि आम भारतीय अपनी रोजमर्रा के संघर्ष में ही व्यस्त है।  किसी भी जाति, धर्म और भाषा समूह के आम आदमी के दिल में झांकिये वहां उसकी निज समस्यायें डेरा डाले बैठे रहती हैं।  इनमें से कुछ लोग टीवी तो कुछ समाचार पत्रों में समाचार पढ़कर ऐसे जातीय, भाषाई और धार्मिक समूहों के सम्मेलनों की जानकारी पढ़ते हैं।  अगर उनका भावनात्मक जुड़ाव होता है तो कुछ देर सोचकर भूल जाते हैं।  आम आदमी में इतना सामथ्र्य नहीं है कि वह ऐसे कार्यक्रमों के लिये धन और समय का अपव्यय करे।   मगर चूंकि उसकी सोच में जातीय, धार्मिक और भाषाई विभाजनों का बोध रहता है इसलिये उसका ध्यान आकर्षित करने  के लिये उनके शिखर पुरुष ऐसी बैठकें कर अपनी शक्ति का बाहरी समाजों के सामने प्रदर्शन करते हैं। हर समूह के शिखर पुरुष ऐसी गतिविधियों से अपनी कथित समाज सेवा का प्रदर्शन करते हैं। </p>
<p>जिन लोगों ने यह कार्यक्रम किया वह एक भारतीय योग शिक्षक को बुलाकर अपने और बाहरी समाज के सामने अपनी शक्ति के प्रदर्शन करने के साथ ही अपनी छबि भी बनाना चाहते थे।  वह जताना चाहते थे कि विश्व भर के प्रचार माध्यमों में छायी एक बड़ी हस्ती उनके कार्यक्रम में आयी।  योग शिक्षक ने उनको क्या सिखाया या वह क्या सीखे यह इसी बात से पता चलता है कि अपने इसी सम्मेलन में एक गीत के विरुद्ध अपना निर्णय सुनाया।   एक गीत से अपने समाज को डराने वाले यह लोग उस योग शिक्षक से क्या सीखे होंगे-यह आसानी से समझा जा सकता है।   1.10  अरब की इस आबादी में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं।  देश के एक प्रतिशत से भी कम लोग हैं जिनके पास धन अपार मात्रा में है।   अगर हम आम और खास आदमी का अंतर देखें तो इतनी दूरी दिखाई देगी जितनी चंद्रमा से इस धरती की।  आम आदमी के संघर्ष पर अधिक क्या लिखें? उसके दर्द का भी व्यापार होने लगा है। अगर हम जातीय, धार्मिक और भाषाई सम्मेलनों को देखें तो उसमें खास लोग और उनके अनुयायी शामिल होते हैं पर वह अपने समाज का सही  प्रतिनिधित्व नहीं करते हालांकि वह लोगा ऐसा  भ्रम वह पैदा करते हैं।  मुश्किल यह है कि यह मान लिया जाता है कि उनके पास ही समाज को नियंत्रित करने की शक्ति है इसलिये बाहरी समाज के शिखर पुरुष उनसे संबंध रखते हैं।  आम आदमी का कोई संगठन नहीं होता तो जो बनाते हैं वह बहुत जल्दी खास बन जाते हैं उनका लक्ष्य भी यही होता है कि आम आदमी को भीड़ में भेड़ की तरह हांके। </p>
<p>योग शिक्षक बाकायदा उस वैचारिक सम्मेलन में गये जिसे गैर हिन्दू धर्मी लोगों का भी कहा जा सकता ह-हालांकि इस युग में यह शब्द ही मूर्खतापूर्ण लगता है पर पढ़ने वालों को अपनी बात समझाने के लिये लिखना ही पड़ता है।   शायद योगाचार्य  यह दिखाने के लिये गये होंगे कि इससे शायद देश में एकता का आधार मजबूत होगा।  उन्होंने यह भी उम्मीद लगायी होगी कि इसमें वह  उस समाज को कोई संद्रेश दे पायेंगे।  उनका यह प्रयास एक सामान्य घटना बनकर रह गया क्योंकि वहां तो समाज के ऐसे शिखर पुरुषों का बाहुल्य था जो कि उनकी उपस्थिति को अपने कार्यक्रम का प्रभाव बढ़ाना चाहते थे।  किसी दूसरे समुदाय के धर्माचार्य का संदेश   ऐसे शिखर पुरुष कभी भी अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली का भाग नहीं बनाते। वह जानते हैं कि ऐसी जरा भी भी कोशिश उनका अपने समूह से नियंत्रण खत्म करेगी।  एक व्यक्ति हाथ से निकला नहीं कि सारा समाज ही हाथ से निकल जायेगा।  आखिर एक गीत से घबड़ाने वाले इतने साहसी हो भी कैसे सकते हैं।<br />
भारतीय योग में केवल योगासन और प्राणायाम ही नहीं आते बल्कि मंत्रोच्चार भी होता है।   मंत्रोच्चार में ऐसे शब्द है जिसमें देवी देवताओं की उपासना होती है-एक गीत से घबड़ाने वाले शिखर पुरुष भला दूसरे समूह के इष्टों का नाम अपने लोगों को कैसे लेने दे सकते हैं? कुल मिलाकर यह एक अर्थहीन प्रयास था।  योगशिक्षक की उपस्थिति से उनकोकोई अंतर नहीं पड़ा पर आयोजकों के शिखर पुरुष एक अंतर्राष्ट्रीय हस्ती के पास बैठकर अपना वजन बढ़ाने में सफल रहे।  </p>
<p>कहने का तात्पर्य यह है कि आम आदमी चाहे किसी भी जाति, भाषा  या धर्म का हो उसके समूह के शिखर पुरुष प्रचार माध्यमों में छाये लोगों को अपने यहां बुलाकर अपना वजन बढ़ाते हैं भले ही वह उनके समुदाय का न हो-प्रचार माध्यमों में अपनी छबि बनाने के अलावा उनका कोई उद्देश्य नहीं होता।  यह किसी एक समूह के साथ नहीं है बल्कि हर समूह में ऐसा हो रहा है।  इसका कारण यह है कि आज की महंगाई, बेकारी, पर्यावरण प्रदूषण तथा सामाजिक कटुता ने आम आदमी को असहज बना दिया है।  इसी असहजता को अधिक बढ़कार सभी समाजों को शिखर पुरुष उसे सांत्वना और साहस देने के नाम पर ऐसे सम्मेलन करते हैं पर उनका लक्ष्य केवल आत्म प्रचार करना होता है। जहां तक आदमी आदमी की जिंदगी का प्रश्न है तो वह कठिन से कठिन होती जा रही है और सभी समूहों  शिखर पुरुषों के केवल अपने सदस्यों की संख्या की चिंता रहती है।<br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य दर्शन-दुष्ट और कांटों को जूतों से कुचल दें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/09/chankya-niti-dusht-aur-kante/</link>
<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 15:04:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/09/chankya-niti-dusht-aur-kante/</guid>
<description><![CDATA[खलानां कपटकानां च द्विवेधैव प्रतिक्रिया। उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।। हिंदी में भावार्थ-दुष्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>खलानां कपटकानां च द्विवेधैव प्रतिक्रिया।<br />
उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</b>दुष्टों और कांटों को दूर करने के दो ही उपाय है या तो जूतों से उनका मुंह कुचल दिया जाये अथवा उन्हें दूर से ही त्याग दे।<br />
<b>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</b>सच बात तो यह है कि जिन लोगों की प्रवृत्ति दुष्ट है उनको दूर से त्याग देना चाहिए। आजकल के समय तो दुष्ट लोगों को न केवल समाज का उच्च वर्ग ही समर्थन देता है बल्कि सामान्य लोग भी उससे लड़ने में डरते हैं।  फिर आजकल नियम भी ऐसे है कि हिंसा करना परेशानी का कारण हो सकता है। इसलिये अच्छा यही है कि दुष्टों को दूर से ही नमस्कार कर चलते बने।  उनके साथ आत्मीय संबंध बनाकर अपनी सुरक्षा का विचार करना निहायत बेवकूफाना है।  </p>
<p>महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस को पूर्ण करने के लिये दुष्टों से भी प्रार्थना की थी। उनसे सबक यही निकलता है कि जहां तक हो सके दुष्ट लोगों से अपनी दूरी बना लें।   जहां तक उनको जूते मारने वाली बात है तो आजकल अर्थ के सारे स्त्रोत दुष्टों के घर भी वैसे हैं जैसे सज्जनों के पास।  यह जूता मारना दंडनीति का परिचायक है जिसका उपयेाग अपने से कमजोर व्यक्ति पर किया जाता है। चूंकि आजकल दुष्ट न केवल धनार्जन बड़ी मात्रा में कर लेते हैं बल्कि समाज भी उनको सम्मान देता है इसलिये उनसे दूर रहना भी अपनी सुरक्षा का सबसे बढ़िया उपाय है।  वैसे देखा जाये तो आजकल दुष्ट ही दुष्ट से लड़कर नष्ट भी हो जाते हैं।  इस पूरे विश्व की हालत ऐसी है कि सज्जन के पास इसके अलावा कोई उपाय नहीं है कि वह दुष्टों से दूर रहकर अहंकार वश होने वाले उनके संघर्षों को देखे।<br />
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
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</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरदास के दोहे-अपनी तारीफ और दूसरे की बुराई न करें (kabir ke dohe-apne tarif aur doosre ke burai na karen)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/25/burai-aur-tarif-kabir-vani/</link>
<pubDate>Sun, 25 Oct 2009 09:42:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/25/burai-aur-tarif-kabir-vani/</guid>
<description><![CDATA[आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय। चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।। संत शिरोमणि कबीरदास ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।<br />
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।<br />
<strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।<br />
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[विष की शुद्धि-त्रिपदम  (vish ki shuddhi-tripadam)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/23/vish-par-hindi-kavita/</link>
<pubDate>Fri, 23 Oct 2009 15:16:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/23/vish-par-hindi-kavita/</guid>
<description><![CDATA[मन में विष किसमें नहीं होता शुद्धि कहां है। सोच से जड़ हो गये ये इंसान बुद्धि कहां है। जले शब्द उगलते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>मन में विष<br />
किसमें नहीं होता<br />
शुद्धि कहां है।</p>
<p>सोच से जड़<br />
हो गये ये इंसान<br />
बुद्धि कहां है।</p>
<p>जले शब्द<br />
उगलते चूल्हे<br />
वाणी कहां है।</p>
<p>सभी भिखारी<br />
ढूंढ रहे हैं माल<br />
दानी कहां है।</p>
<p>लंगड़ी भाषा<br />
सिखाई गुरुओं ने<br />
बोध कहां है।</p>
<p>शिक्षित झुंड<br />
शहर में घूमता<br />
शोध कहां है।</p>
<p>दर्द की दवा<br />
मिलती कभी कभी<br />
रोज कहां है।</p>
<p>प्रश्न वन<br />
घना है चारों ओर<br />
खोज कहां है।</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-जागरुक लोग अपनी बेइज्जती नहीं सहते (jagruk aur apmaan-hindi sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/22/jagruk-log-aur-ijjat/</link>
<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 13:59:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/22/jagruk-log-aur-ijjat/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211; यद चेतनोऽपिपादै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<strong>यद चेतनोऽपिपादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः।<br />
तत्तेजस्वी पुरुषः परकृत निकृतिंक कथं सहते ।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>सूर्य की रश्मियों के ताप से जब जड़ सूर्यकांन्त मणि ही जल जाती है तो चेतन और जागरुक पुरुष दूसरे के द्वारा किये अपमान को कैसे सह सकता है।</p>
<p><strong>लांगल चालनमधश्चरणावपातं भू मौ निपत्य बदनोदर दर्शनं च।<br />
श्चा पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीरं विलोकपति चाटुशतैश्चय भुंवते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>श्वान भोजने देने वाले के आगे पूंछ हिलाते हुए पैरों में गिरकर पेट मूंह और पेट दिखाते हुए अपनी दीनता का प्रदर्शन करता है जबकि हाथी भोजन प्रदान करने वालो को गहरी नजर से देखने के बाद  उसके द्वारा आग्रह करने पर ही भोजन ग्रहण करता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>भले ही आदमी के पास अन्न और धन की कमी हो पर  मनुष्य को स्वाभिमानी होना चाहिए नहीं तो अधिक धनवान, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोग उसे गुलाम बनाये रखने के लिये हमेशा तत्पर रहते हैं।  आजकल सुख सुविधाओं ने अधिकतर लोगों को शारीरिक और मानसिक तौर से सुस्त बना दिया है इसलिये वह उन्हें बनाये रखने के लिये अपने से अधिक शक्तिशाली लोगों की चाटुकारिता में लगना अपने लिये निज गौरव समझते हैं। यही कारण है कि निजी क्षेत्र में स्त्रियों और पुरुषों का शोषण बढ़ रहा है। हमारे यहां की शिक्षा कोई उद्यमी नहीं पैदा करती बल्कि नौकरी के लिये गुलामों की भीड़ बढ़ा रही है। कितनी विचित्र बात है कि आजकल हर आदमी अपने बच्चे को इसलिये पढ़ाता है कि वह कोई नौकरी कर अपने जीवन में अधिकतम सुख सुविधा जुटा सके।  ऐसे में बच्चों के अंदर वैसे भी स्वाभिमान मर जाता है। उनका अपने माता पिता और गुरुजनों से अच्छा गुलाम बनने की प्रेरणा ही मिलती है। </p>
<p>ऐसी स्थिति में हम अपने देश और समाज के प्रति कथित रूप से जो स्वाभिमान दिखाते हैं पर काल्पनिक और मिथ्या लगता है।  स्वाभिमान की प्रवृत्ति तो ऐसा लगता है कि हम लोगों में रही नहीं है। ऐसे मेें यही लगता है कि हमें अब अपने प्राचीन साहित्य का अध्ययन भी करते रहना चाहिये ताकि पूरे देश में लुप्त हो चुका स्वाभिमान का भाव पुनः लाया जा सके।<br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http:/rajlekh.blogpot.com<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धर्म के नाम पर कुश्ती-हिंदी व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/16/dharm-kushti-hindi-vyangya-kahani/</link>
<pubDate>Fri, 16 Oct 2009 13:43:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/16/dharm-kushti-hindi-vyangya-kahani/</guid>
<description><![CDATA[वह डंडा लेकर उस मैदान में लड़ने पहुंचे। यह मैदान ‘धर्मकुश्ती’ के लिये विख्यात था। मैदान के मध्य में उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वह डंडा लेकर उस मैदान में लड़ने पहुंचे। यह मैदान ‘धर्मकुश्ती’ के लिये विख्यात था। मैदान के मध्य में उन दोनों ने अपने अपने धर्म का नाम लेकर लड़ाई शुरु की। पहले एक दूसरे पर डंडे से प्रहार करते-साथ में अपने धर्म की जय भी बोलते जाते। डंडे से डंडे टकराते। वह उनको चलाते चलाते थक गये तब वह डंडे फैंककर दोनों मल्लयुद्ध करने लगे। एक दूसरे पर घूंसे बरसाते जाते। काफी जमकर कुश्ती हुई। मगर कोई नहीं जीता। वह थककर वहीं बैठ गये। उनके हाथ पांव में घावों से रक्त भी बहता आ रहा था।<br />
उनको प्यास लगी। वहीं से कुछ दूर मैदान के किनारे बने चबूतरे पर एक ज्ञानी भी बैठा था जिसके साथ पानी पिलाने वाला एक शिष्य था। अपने उसी शिष्य से उस ज्ञानी से कहा कि‘जाओ उनको पानी पिलाओ। अब वह थककर चूर होकर बैठे हैं।<br />
वह पानी लेकर उनके पास पहुंचा और दोनों को ग्लास भरकर देने लगा। धर्मयोद्धाओं में से एक ने उससे पूछा-‘तुझे कैसे मालुम कि हमें पानी की प्यास लगी है।’<br />
उस शिष्य ने कहा-‘यह मैदान धर्मकुश्ती के लिये विख्यात है। यहां आप जैसे अनेक लोग आते हैं। हमारे ज्ञानी जी यहां रोज आकर बैठते हैं क्योंकि उनको मालुम है कि यहां आकर धर्म कुश्ती करने से कोई नतीजा नहीं निकलेगा पर प्यास तो योद्धाओं उनको लगेगी। वह परेशान न हों इसलिये मुझे भी साथ रखते हैं ताकि उनको पानी दे सकूं।’<br />
दूसरे ने पूछा-‘तेरा धर्म क्या है?’<br />
शिष्य ने जवाब दिया-‘पानी पिलाना।’<br />
पहले ने कहा-‘यह भी कोई धर्म है?’<br />
शिष्य ने कहा-‘हमारे गुरुजी कहते हैं कि आज के अक्षरज्ञानी विद्वानों ने कुश्ती प्रदर्शन के लिये धर्मों का नाम रख लिया है। मनुष्य का आचरण, व्यवहार, कर्म तथा विचार से ही पता लगता है कि वह धर्मी है या अधर्मी।<br />
पहले धर्म के नाम पर बांटकर लोगों पहले राज्य किया जाता है आज व्यापार भी किया जाता है। आप यहां कुश्ती करने आये कल यह खबर सभी जगह चमकेगी तो बताओ&#160;खबरफरोशों&#160;&#160;&#160;का धंधा हुआ कि नहीं।’<br />
उन दोनों ने पानी पिया और सुस्ताने लगे। उसी समय एक आदमी आया और बोला-‘शांति रखो! शांति रखो। सभी धर्म एक समान है। सभी धर्म शांति, अहिंसा और प्रेम का संदेश देते हैं।’<br />
इससे पहले वह महायोद्धा कुछ कहते वह चला गया। इस तरह चार लोग शांति संदेश देकर चले गये। एक महायोद्धा ने शिष्य से पूछा-‘यह लोग कौन हैं?’<br />
शिष्य ने कहा-‘‘ इनके नाम भी कल अपनी खबर के साथ देख लेना। यह पंच लोग हैं जो इस बात का इंतजार करते हैं कि कब यहां कुश्ती हो और शांति संदेश सुनाने पहुंच जायें। यह शांति सन्देश देकर अपना धर्म&#160;निभाते&#160;&#160;हैं।&#160;&#160;वैसे यह भी लोग नहीं जानते कि धर्म क्या है?’<br />
दूसरे महायोद्धा ने कहा-‘पर इनका शांति संदेश तो ठीक लगता है। तुम्हारे गुरु जी किस धर्म को मानते हैं’।’<br />
शिष्य ने कहा-‘वह ज्ञानी हैं और वह कहते हैं कि हमारे महापुरुषों तो अच्छे आचरण, व्यवहार, कर्म तथा सुविचार को ही धर्म मानते हैं और इसके विपरीत अधर्म। मेरा धर्म है प्यासे को पानी पिलाना और उनका धर्म है ज्ञान देना।’<br />
एक महायोद्धा ने कहा-‘हम उनसे ज्ञान लेना चाहते हैं।’<br />
शिष्य ने कहा-‘यह उनका ज्ञान देने का समय नहीं है। वह तो यहां इसलिये आते हैं ताकि ऐसी कुश्तियों से कुछ ज्ञान प्राप्त कर सकें। यहां आकर योद्धा आपस में मूंहवाद भी करते हैं। अपने अपने तर्क देते हैं उन्हें सुनकर वह अपना मंतव्य निर्धारित करते हैं। अब आप बाहर जाकर अपने जख्मों का इलाज कराओ। वहां भी एक चिकित्सक हैं जो सेवा भाव से धर्म कुश्ती में घायल होने वालों का इलाज करते हैं।’<br />
वह दोनों लड़खड़ाते हुए बाहर चल दिये। चलते चलते भी दोनों एक दूसरे को गालियां देते रहे।<br />
इधर यह शिष्य अपने गुरू के पास लौटा। गुरू ने उससे पूछा-‘उनको ठीक ढंग से पानी पिलाये आये?’<br />
‘हां, गुरुजी, मैंने अपना धर्म निभा दिया।’शिष्य ने कहा।<br />
गुरुजी अपने ध्यान में लीन हो गये। कुछ देर बाद उन्होंने आंखें खोली तो इधर अचानक शिष्य की नजर उन दो डंडों पर पड़ी जो दोनों योद्धा उस मैदान में छोड़ गये थे। वह बोला-‘गुरूजी! उनके डंडे छूट गये हैं। वह ले जाकर उनको वापस कर आता हूं। वह जरूर उसी डाक्टर के पास होंगे।’<br />
गुरुजी ने कहा-‘रहने दे! डंडे अब उनके किसी काम के नहीं है। वह दोनों शांत हो गये हैं। अगर डंडा हाथ में लेंगे तो कहीं उनकी आग फिर भड़क उठी तो गलत होगा। तेरा काम पानी पिलाना है न कि आग लगाना।’<br />
शिष्य ने कहा-‘नहीं गुरुजी, आपने कहा है कि हर किसी की मदद करना चाहिये। इन डंडों को वापस करना अच्छा होगा।’<br />
इससे पहले गुरुजी कुछ समझाते वह भाग कर चला गया। कुछ देर बाद शिष्य लौटा तो उसके बदन पर भी पट्टी बंधी हुई थी। गुरुजी के कारण पूछने पर वह बोला-‘वह दोनों अपने जख्मों पर पट्टी बंधवा चुके थे। जब मैंने जाकर उनको डंडे दिये तो दोनों ने यह कहते हुए मुझ पर डंडे बरसाये कि तू हमारी इजाजत के बगैर हमारी कुश्ती देख कैसे रहा था?’<br />
गुरुजी ने कहा-‘मैंने तुझसे कहा था कि तेरा धर्म पानी पिलाना पर तू आग लगाने पहुंच गया। यह धर्म परिवर्तन करना ही तेरे लिये घातक रहा। तेरे संस्कारों में डंडा चलाना नहीं लिखा तो तू चला भी नहीं सकता। इसलिये उसे हाथ लगाना भी तेरे लिये अपराध है। फिर तू उन लोगों की संगत करने गया जिनके संस्कार तेरे ठीक विपरीत हैं। तू धर्म ईमानदारी से निभाता है उन धर्मकुश्ती करने वाले योद्धाओं से पानी पिलाने तक ही तेरा संबंध ठीक था। इससे आगे तो यही होना था।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति -अहिंसक मनुष्य शीघ्र अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है (ahinsa aur lakshya-manu smriti)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/12/hindu-adhyatm-sandesh/</link>
<pubDate>Mon, 12 Oct 2009 04:46:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/12/hindu-adhyatm-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्। न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।<br />
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।<br />
<strong>यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।<br />
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।</strong><br />
हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है वह अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य और परमार्थ और दूसरा असत्य और हिंसा।  यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है।  श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।<br />
वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है।  वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अखबार ने पाठ छापा पर नाम नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/11/my-post-in-news-paper-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 11 Oct 2009 05:24:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/11/my-post-in-news-paper-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[हिंदी की सेवा करने का दावा करने वाले बहुत हैं। इनके नाम भी आपने देखे होंगे। यह लोग हिंदी के नाम पर क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>हिंदी की सेवा करने का दावा करने वाले बहुत हैं। इनके नाम भी आपने देखे होंगे। यह लोग हिंदी के नाम पर कितना लिखते हैं यह अलग बात है पर जो हिंदी में लिखने वाले मौलिक तथा स्वतंत्र लेखक हैं उनसे यह अपीलें जरूर करते हैं कि हिंदी की सेवा करना तुम्हारा धर्म है। इनके आचरण पर अधिक क्या कहें? जहां धन देने की बात आती है तो यह धर्म की बात करते हैं कि ‘भई आपकी मातृभाषा  हिंदी है जिसकी सेवा करना आपका धर्म है। यह भी मान लिया पर जहां नाम देने की बात आती है तब इनकी सारी नैतिकता गायब हो जाती है।<br />
बहुत निराशा हुई यह देखकर कि यह लेखक तो निष्काम भाव से केवल अंतर्जाल पर इस भाव से लिख रहा है कि नई पीढ़ी को अपने अध्यात्मिक ज्ञान की वास्तविक अनुभूति हो क्योंकि लोग महापुरुषों के संदेशों की व्याख्या तो करते हैं पर उसकी वर्तमान संदर्भों में सही ढंग से प्रस्तुति नहीं कर पाते। इस लेखक का यह दावा नहीं है कि इसमें कोई सिद्धि प्राप्त है पर जिस तरह आज एक समाचार पत्र ने इसके अध्यात्मिक विषय लेख को एक दो शब्दों के संशोधन के साथ प्रकाशित किया उससे लगता है कि वाकई कुछ ऐसा है जो लोग अखबारों में नाम देने से डर रहे हैं।  लेख को कुछ शब्दों की हेरफेर के साथ प्रस्तुत किया पर इस ब्लाग के लेखक का नाम नहीं दिया। इससे एक बात साफ लग रही है कि हिंदी के नाम पर कथित रूप से स्वयंसेवा के लिये प्रेरित करने वाले लोग यहां के ब्लाग लेखकों की रचनाओं को अपने माध्यमों में बिना नाम के छापकर अपना हित साधना चाहते हैं।  प्रकाशन माध्यमों के इस व्यवहार का कारण यही समझ में आता है कि वह डर रहे हैं कि कही उनको ब्लाग लेखकों से चुनौती नहीं मिल जाये। उस अखबार का नाम देना ठीक नहीं है क्योंकि उससे उसका प्रचार होगा।  फिर यह काम करने वाले लोग अपने जैसे ही सामान्य रोजगार वाले होते हैं और किसी के रोजीरोटी पर वक्र दृष्टि डालना पाप है। हो सकता है उसने इस पर ध्यान नहीं दिया हो और उसे लगता हो कि अंतर्जाल पर हर सामग्री फ्री है। ऐसे में प्रकाशन माध्यमों से जुड़े लोगों से यह आग्रह है कि भई क्या इतनी मेहनत के बाद हम इस बात से भी गये कि नाम भी न दिया जाये।<br />
बहरहाल आपने आज अगर कहीं यह लेखक पढ़ा हो तो स्वयं ही देख सकते हैं।  इतना ही नहीं इस लेखक के अध्यात्म विषयों को नियमित पढ़ने वाले  लेखक मित्रों तथा पाठक मित्रों से यह भी आग्रह है कि वह कहीं भी अध्यात्म विषया पर लिखा हुआ देखें तो उस पर ध्यान करें तो देखेंगे कि अनेक समाचार पत्र पत्रिकाओं में कहीं पाठ तो कहीं विचार वहीं से लिये मिलेंगे।<br />
यह कोई शिकायत नहीं है बल्कि सूचना है कि अंतर्जाल पर लिखे गये विषयों की बाहर मांग हैं पर हिंदी लेखक को सम्मान देने के नाम पर शक्तिशाली वर्ग देखने, सुनने और कहने की प्रक्रिया से दूर हो जाता है ठीक गांधी जी के तीन वानरों की तरह।  इस लेख के माध्यम सें हम केवल यही बताना चाहते हैं कि हिंदी की सेवा सत्य करने का ढोंग किया जाता है। उसका सच्चे सेवक तो अल्पधनी, निष्काम भावी और मूल चिंतन वाले लेखक ही होते हैं।<br />
नीचे का यह लेख देखें जिसे संशोधित कर किसी समाचार पत्र में प्रकाशित किया गया है।<br />
<strong>कबीर के दोहे-प्रेम का वास्तविक रूप कोई नहीं समझता </strong><br />
<strong><br />
प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय<br />
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके। </p>
<p><strong>गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय<br />
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्सािहत करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम मेंें शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है। </p>
<p>वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-कविताओं से बहकाया जाता है (hindi santdesh-kavitavon se bharam]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/10/kavitaon-se-vaham-hindi-sandesh/</link>
<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 14:47:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/10/kavitaon-se-vaham-hindi-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;- सत्यत्वे न शशा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं  कि</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong></strong><strong>सत्यत्वे न शशांक एव बदनीभूतो न चेन्दोवर द्वंद्व लोनतां गतं  न कनकैरष्यंगयश्टिः कूता।<br />
किंतवेवं कविभि प्रतारितमनतत्वं विजनान्नपि त्वं मांसस्थ्मियं वयूर्मृगदृशां मंदो जनः सेवते।।</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> न तो चंद्रमा जमीन पर आकर किसी सुंदरी युवती के मुख पर सजा है और न ही कभी कमल ने किसी के नेत्र का स्थान लिया है और न ही किसी की देह सोने से बनी है पर फिर भी कविगणों के बहकावे में  सामान्य लोग आ जाते हैं और हाड़मांस के इस नश्वर को सर्वस्व मानते हुए भोगों में लिप्त हो जाते हैं।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>बरसो पूर्व कही गयी यह बात आज भी कितनी प्र्रासंगिक है।  हमारे यहां आजकल फिल्मों में सूफी तरीके से गीत लिखे जा रहे हैं जिसमेंे भगवान और प्रेमिका को एक ही गदद्ी पर बिठाया जाता है यानि उस गीत को  सोलह साल का लड़का अपनी प्रेयसी पर भी गा सकता है और कोई भक्त भगवान के लिये भी गा सकता है। सच तो यह है कि सच्चे भक्त के लिये तो किसी सुर संगीत की आवश्यकता तो होती नहीं इसलिये वह उनके दांव पर नहीं फंसते पर युवक युवतियां उन गीतों पर झूमते हैं और कभी कभार तो यह लगता है कि इस तरह देश को बहकाया जा रहा है। उनके दांव में कच्चे भक्त भी फंस जाते हैं और गीत सुनकर अपनी गर्दन हिलाने लगते हैं।<br />
भगवान की निष्काम भक्ति का सर्वश्रेष्ठ रूप एकांत में उनका ध्यान और स्मरण करना है जबकि सुर संगीत से उनका स्मरण करना एक तरह से सकाम भक्ति का प्रमाण है और जिस तरह प्यार प्यार की बात आती है उससे  तो ध्यान भटकता है और देह तथा मन को कोई लाभ भी हीं होता।<br />
इस तरह भगवान और प्रेयसी के प्रति एक साथ प्रेम पैदा करने वाले शब्द केवल बहकाते हैं और आजकल के व्यवसायिक युग में इसका प्रचलन बढ़ गया है। कभी कभी तो लगता है कि इस तरह के सूफी गीत भारत के युवाओं में मौजूद अध्यात्मिक की स्वाभाविक प्रवृति को अपने स्वार्थ को भुनाने के लिये लिखे गये हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर दर्शन-दूसरे की कमी देखकर हंसो नहीं (Sant Kabir Darshan - Seeing the lack of other not Laugh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/06/kabir-ke-dohe-doosre-par-hanso-nahin/</link>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 16:50:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/06/kabir-ke-dohe-doosre-par-hanso-nahin/</guid>
<description><![CDATA[आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय। चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।। संत शिरोमणि कबीरदास ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।<br />
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।<br />
<strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।<br />
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति-दूसरों के माल पर नजर न डालें (paraya mal apna na samjhen)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/03/manu-smriti-in-hindi/</link>
<pubDate>Sat, 03 Oct 2009 04:55:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/03/manu-smriti-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[मनु महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212; यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>मनु महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<p><strong>यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्रह्यणि च।<br />
अदत्तान्युपयु´्जानः एनसः स्वात्तुरीभाक्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>वाहन, शैय्या, आसन, कुआं, उद्यान और भवन आदि का उपभोग कुछ दान कर ही करना लाभदायक होता है।<br />
<strong>परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन।<br />
नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अन्य व्यक्तियों द्वारा बनवाये गये स्नान के लिये बनाये गये स्थानों-स्नानगृहों,सरोवरों और कुऐं आदि-पर नहाना नहीं चाहिए। वह स्नानगृह अगर पापों के धन से बनाये गये हैं तो उसमें नहाने वाला भी उसका भागी बनता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>आजकल की व्यस्त एवं दीर्घसूत्रीय जिंदगी में यह देखना कठिन काम है कि हम कहीं बाहर जाकर रुक रहे हैं तो वहां का स्थान किस प्रकार के धन से बनाया गया है। वैसे भी आजकल बिना काले धन के यह कैसे संभव है कि समाज का भौतिक विकास इतनी तीव्र गति से हो। ऐसे में भ्रष्ट और अनैतिक रूप से कमाये गये धन से बने आवास और स्नानगृहों में रहने और नहाने का प्रतिबंध स्वीकार करना संभव नहीं लगता। बड़े बड़े शहरों में बड़े और आलीशान होटल बन गये हैं जिनमें स्वीमिंग पूल भी होते हैं। अब यह कैसे कहा जा सकता है कि वह भ्रष्ट या अनैतिक धन से बने हैं या सात्विक धन से। वैसे तो आजकल धर्नाजन के कई ऐसे&#160;साधन&#160;&#160;पवित्र माने जाते हैं जिनको पहले अपवित्र माना जाता था। अतः इस बारे में अपने विवेक से विचार करना चाहिये। </p>
<p>मगर सच तो यह है कि जिस प्रकार हम अपने जीवन में जिस प्रकार के व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में आते हैं उसके पाप पुण्य का प्रभाव हम पर होता है। कहा जाता है कि ‘जैसे खायें अन्न वैसा हो मन’। इसका आशय यह तो है ही कि जिस प्रकार की वस्तु का हम उपभोग करेंगे वैसे ही प्रभाव हमारी देह के साथ ही हमारे मन और विचारों पर होगा। साथ ही यह भी कि उसके आने का सात्विक मार्ग है या असात्विक इस बात का प्रभाव भी उसके उपभोग करने वाले पर होता है। तात्पर्य यह है कि अगर हमें लगता है कि कोई व्यक्ति या वस्तु-जिसके बारे में यह यकीन हो कि वह असात्विक प्रकृत्ति की है तो उससे अपने आपको दूर रखना चाहिये। यह ठीक है कि आजकल की भागम भाग जिंदगी में यह कहना कठिन है कि किसका धन एक नंबर का है या दो नंबर का पर थोड़ा विवेक का इस्तेमाल करें तो सभी समझ में आ जाता है। दूसरा सच यह भी कि हम किसी बड़े शहर में जाकर अपने लिये सस्ता और अच्छा स्थान रहने के लिये ढूंढते हैं पर तब यह देखने का न तो समय होता है न जरूरत कि वह किस प्रकार के धन से बना है। हालांकि अनजान रहने पर किसी वस्तु का उपभोग करने पर उसके पाप का भागी नहीं बनते यह भी हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
&#160;&#160;&#160;<strong>&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://deepkraj.blogspot.com/">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com/">3.अनंत शब्द योग</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर के दोहे-बिना अनुभव के ज्ञान देना अनुचित ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/02/kabir-ke-dohe-gyan-aur-anubhav/</link>
<pubDate>Fri, 02 Oct 2009 01:34:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/02/kabir-ke-dohe-gyan-aur-anubhav/</guid>
<description><![CDATA[कूकट कूटै कन बिना, बिन करनी का ज्ञान। ज्यौं बन्दूक गोली बिना, भड़क न मरि आन।। संत शिरोमणि कबीरदास जी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>कूकट कूटै कन बिना, बिन करनी का ज्ञान।<br />
ज्यौं बन्दूक गोली बिना, भड़क न मरि आन।।<br />
</b>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बिना अनुभव के ज्ञान देना, चावल की  भूसी कूटने के समान है।<br />
<b>सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार।<br />
सुन जो कोई बाते बचै, तीन लोग ते न्यार।।<br />
</b>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह चंचल मन सामान्य मनुष्य हों या असाधारण सभी को ठगता है।<br />
<b>जग हटबारा स्वाद ठग, माया वेश्या लाय।<br />
राम नाम गाढ़ा गहो, जनि जहु जन्म गंवा।।<br />
</b>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के बाजार में स्वाद ही ठग और माया ही वैश्या की तरह व्यवहार करती है। इसलिये राम का नाम का दिल की गहराई से स्मरण करें वरना पूरा जीवन व्यर्थ चला जायेगा।<br />
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में किसी भी कंपनी का उत्पाद देखिये उसके समर्थन में प्रस्तुत विज्ञापन की भाषा बहुत आकर्षक और मन लुभावनी होती है। खाने पीने की वस्तुओं का विज्ञापन तो इस तरह होता है कि पढ़ते ही मूंह में पानी आ जाता है।  यह सब आदमी के जेब से पैसे या माया निकालने की कला है जिसका नाम बाजार है। आदमी के जेब अगर पैसा या माया अधिक है तो उसकी बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है और वह उन चीजों को खरीदने चला जाता है।<br />
अगर हम आज की उपभोक्ता संस्कृति का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो अनुभव होगा कि कुछ लोगों के पास पैसा वाकई बहुत अधिक आ गया है वरना इतना सारा विज्ञापन जगत चल ही नहीं सकता। इसके अलावा खाने पीने की वस्तुओं में ऐसे पदार्थों का उपयोग बढ़ रहा है जो जीभ के लिये स्वादिष्ट हैं पर पेट के लिये पाचन योग्य नहीं। परिणाम स्वरूप नयी नयी बीमारियों की उत्पत्ति हो रही है और फिर उनके लिये दवा निर्माण के लिये नये कारखाने खुलते हैं फिर उनका विज्ञापन हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है। यह बाजार और माया का चक्र में जिसके अंदर विज्ञापन आदमी को अपनी सवारी कर घुमाता  है।<br />
यह सब हमारे देश में अधिक हो रहा है क्योंकि यहां अब नये नये धनवान अधिक हो गये हैं और इसलिये जिन चीजों को पुराने अमीर देशों के लोगों ने त्याग कर दिया है उनको यहां ग्रहण किया जा रहा है। हमारे देश के प्राचीन अध्यात्मिक ज्ञान को एक तरफ उठाकर रख दिया गया है और अगर उसे कुछ लोग प्रस्तुत भी कर रहे हैं तो वह स्वयं के लिये धनार्जन और विज्ञापन के लिये।  राम की चर्चा करते हैं पर माया का संग पाने की इच्छा के साथ। ऐसे लोग अध्यात्मिक ज्ञान की पुस्तकों के संदेश तो रट लेते हैं पर धारण करना उनके वश में भी नहीं होता।<br />
सच बात तो यह है कि अगर हृदय से भगवान का स्मरण किया जाये तो मन में एक नयापन आता है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं के प्रति आकर्षण अंततः मनोविकारों का कारण बनता है।  भक्ति से जहां हमारे अंदर सकारात्मक भाव का निर्माण होता है वहीं मनोविकारों से मुक्ति मिलती है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-गलत संपर्क से आदमी बर्बाद होता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/01/galat-sanpark-chankya-niti/</link>
<pubDate>Thu, 01 Oct 2009 04:24:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/01/galat-sanpark-chankya-niti/</guid>
<description><![CDATA[ग्रहीत्वां दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्। प्राप्तविद्यां गुरुं शिष्या दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा। हि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>ग्रहीत्वां दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।<br />
प्राप्तविद्यां गुरुं शिष्या दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान का घर छोड़ देते हैं। गुरु से शिक्षा प्राप्त कर शिष्य उसे दक्षिण देकर आश्रम से चले जाते हैं। उसी तरह जंगल जल जाने पर मृग उसका त्याग कर देते हैं।<br />
<strong>दुराचारी च दुर्दृष्टिराऽवासी च दुर्जनः।<br />
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति।।</strong><br />
<strong>हिन्दी में भावार्थ-</strong>दुराचारी, कुदृष्टि रखने और बुरे स्थान पर रहने वाले व्यक्ति से संबंध बनाने पर श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>संबंध बनाने में हमेशा सतर्कता बरतना चाहिये। देखा गया है कि आजकल के युवक युवतियां  अक्सर संबंध तात्कालिक आकर्षण में फंसकर मित्रता ऐसे लोगों से कर बैठते हैं जिनके स्वभाव और इतिहास का पता उनको नहीं होता। बाद में जब वह उनकी वजह से कहीं फंस जाते हैं तब उनको अपनी गलती की अनुभूति होती है मगर तब देर भी हो जाती है। ऐसी एक नहीं अनेक घटनायें घटित हो चुकी हैं जिसमें किसी भले युवक ने किसी गलत साथी का चुनाव किया और बाद में उसके अपराध के छींटे उस पर भी पड़े। उसी तरह युवतियों ने भी प्रारंम्भिक आकर्षण में आकर ऐसे लड़कों से प्रेम प्रसंग स्थापित किये जिसका परिणाम उनके लिये घातक रहा। कई बार तो वह ऐसे युवकों से विवाह भी कर बैठती हैं जो दिखाने के लिये अपने संस्कर अच्छे दिखाते हैं पर बाद में उनकी असलियत सामने आती है तो युवतियों को पछतावा होता है। अनेक युवतियां पहले अपने घरेलू संस्कारों को भुलाकर ऐसे लड़कों से विवाह कर बैठती हैं जिनके घरेलू संस्कार बिल्कुल विपरीत होते हैं। विवाह से पहले तो उनके घर से लड़कियों का संबंध नहीं होता पर बाद विवाह बाद जब उसके परिवार वाले अपने संस्कार अपनाने को विवश करते हैं तब लड़कियों को बहुत परेशानी आती है और इसी बात पर सबसे अधिक तनाव उनको ही झेलना पड़ता है क्योंकि पुरुष तो घर से बाहर रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लड़का हो या लड़की उसे अपने संबंध बनाने से पहले सामने वाले व्यक्ति की पूरी जांच करना चाहिये।</p>
<p>नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि जब कहीं से अपना उद्देश्य पूरा हो जाये तो उस स्थान पर अधिक नहीं ठहरना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि इस जीवन में अपने कार्य और उद्देश्य पूर्ति के लिये अनेक स्थानों पर जाने के साथ ही लोगों से संपर्क भी बनाने पड़ते हैं। उनमें अपनी लिप्तता उतनी ही रहना चाहिये जितनी अपने हित के लिये आवश्यक हो। अधिक लिप्तता कार्य और उद्देश्य पर बुरा प्रभाव डाल सकती है।<br />
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<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-चाटुकारिता से फायदा नहीं होता (Brtrihri Policy century - butter would not benefit ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/30/chatukarita-se-labh-nahin-hindu-sandesh/</link>
<pubDate>Wed, 30 Sep 2009 03:55:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/30/chatukarita-se-labh-nahin-hindu-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः जरा देहं मृत्युरति दयितं ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं<br />
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः<br />
जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं<br />
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः</strong> </p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है। हमारी अभिलाषायें और आकांक्षायें की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में बड़ा पद पाने की लालसा है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और ताकते रहते हैं और उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगों को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देेते हैं तो केवल चाटुकारित के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर।</p>
<p>सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।<br />
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</item>
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<title><![CDATA[संत कबीर के दोहे-भक्त नारी से रानी भी बराबरी  नहीं कर सकती (kabir ke dohe-bhakt nari se rani)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/20/sant-kabir-vani-nari-aur-rani/</link>
<pubDate>Sun, 20 Sep 2009 05:08:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/20/sant-kabir-vani-nari-aur-rani/</guid>
<description><![CDATA[दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि संत शिरोमणि कबीर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि<br />
सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भूख के कष्ट के कारण दुखी आदमी मर रहा है तो  ढेर सारे सुख के कारण सुखी भी कष्ट उठा रहा है किंतु राम के भक्त तो हर हाल  में मजे से रहते हैं क्योंकि वह दुःख सुख के भाव से परे हो गये हैं। </p>
<p><strong>हैवर गैवर सघन धन, छन्नपती की नारि<br />
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान की भक्ति करने वाली  गरीब नारी की बराबरी  महलों में रहने वाली रानी भी नहीं कर सकती भले ही उसके राजा पति के पास हाथियों और घोड़ो का झुंड और बहुत सारी धन संपदा है।<br />
<strong></strong><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>दुनियां में तीन तरह के लोग होते हैं-दुःखी,सुखी और भक्त। अभाव और निराशा के कारण दुःखी आदमी हमेशा परेशान रहता है तो सुखी आदमी अपने सुख से उकता जाता है और वह हर ‘मन मांगे मोर’ की धारा में बहता रहता है। विश्व के संपन्न राष्ट्रों के देश भारत के अध्यात्मिक ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तो भारत के लोग उनकी भौतिक संपन्नता प्रभावित होते हैं।  पश्चिम में तनाव है तो पूर्व वाले भी सुखी नहीं।  कहने का तात्पर्य यह है कि लोेग इस मायावी संसार में केवल दैहिक सुख सुविधाओं के पीछे भागते हैं। जिसके भौतिक साधन नहीं है वह कर्ज वगैरह लेता है और फिर उसे चुकाते हुए तकलीफ उठाता है और अगर वह चीजें नहीं खरीदे तो परिवार के लोग उसका जीना हराम किये देता है। सुख सुविधा का सामान खरीद लिया तो फिर दैहिक श्रम से स्त्री पुरुष विरक्त हो जाते हैं और इस कारण स्वास्थ बिगड़ने लगता है।  </p>
<p>जिन लोगों ने अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह जीवन को दृष्टा की तरह जीते हैं और भौतिकता के प्रति उनका आकर्षण केवल उतना ही रहता है जिससे देह का पालन पोषण सामान्य ढंग से हो सके।  वह भौतिकता की चकाचैंध मेंे आकर अपना हृदय मलिन नहीं करते और किसी चीज के अभाव में उसकी चिंता नहीं करते।  ऐसे ही लोग वास्तविक राजा है। जीवन का सबसे बड़ा सुख मन की शांति हैं और किसी चीज का अभाव खलता है तो इसका आशय यह है कि हमारे मन में लालच का भाव है और कहीं अपने आलीशान महल में भी बैचेनी होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि हमारे अंदर ही खालीपन है। दुःख और सुख से परे आदमी तभी हो सकता है जब वह निष्काम भक्ति करे।<br />
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<title><![CDATA[प्रतिक्रियावादी लेखन-व्यंग्य आलेख (Reflective writing in hindi - satire article)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/14/pratikriyavadi-lekha-hindi-vyangya-lekh/</link>
<pubDate>Mon, 14 Sep 2009 16:21:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/14/pratikriyavadi-lekha-hindi-vyangya-lekh/</guid>
<description><![CDATA[आजकल एक नारा बहुत कम सुनाई देता है‘प्रतिक्रियावादी ताकतों से बचें।’ आजकल यह नारा कम ही सुनाई देता है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आजकल एक नारा बहुत कम सुनाई देता है‘प्रतिक्रियावादी ताकतों से बचें।’ आजकल यह नारा कम ही सुनाई देता है इसका कारण यह है कि यहां तो अब प्रतिक्रियात्मक लेखन ही साहित्य हो गया है।  यह नारा पहले विकासवादियों ने लगाया था जिनको यह यकीन था कि वह अपने कार्य अपनी मौलिक सोच से कर रहे हैं और जो उनके विरोधी है वह केवल विरोध करते हैं जबकि उनका अपना कोई मूल सोच नहीं है। अब हालत यह है कि प्रतिक्रियात्मक लेखक ही सभी जगह छाये हुए हैं ऐसे में मौलिक विचारधाराओं को अब स्थान मिलना ही नहीं है। इसका कारण यह है कि अखबारों और टीवी चैनलों पर नाम केवल प्रतिक्रियात्मक लेखन से ही मिलता है और साहित्य लिखने वालों के लिये वहां कोई अधिक स्थान नहीं है दूसरा साहित्यकारों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वह अपने पैसे से किताबें छपवा सकें।<br />
जी हां, यह देश आजादी के समय से ही नारों और वाद पर चलता रहा है। हालत यह है कि आजादी तो मिल गयी पर गुलामी की मानसिकता यथावत है। इस देश का इतिहास सदियों पुराना है पर आजादी की जंग के इर्दगिर्द ही सारे विचारक घूम रहे हैं। कहते हैं कि यह देश दो हजार वर्ष तक गुलाम रहा पर जिस तरह देश की हालत है अब भी आजादी दूर की कौड़ी लगती है। अगर हम देश के बुद्धिजीवियों के विचार देखें तो तो उनके लिये आजादी का मतलब यही है कि दूसरे देश की बजाय अपने ही देश के लोग अपना शोषण करें।<br />
ऐसा नहीं है कि इस देश में चिंतक नहीं है और उनको पता नहीं कि प्रतिक्रियावादी क्या होते हैं पर चूंकि वह स्वयं ही भी उसी राह पर चल रहे हैं तो यह संभव नहीं है कि सोते हुए समाज को जगाकर बतायें कि प्रतिक्रियावाद किस बला का नाम है। आजादी का संघर्ष इस देश का इतिहास है पर सभी कुछ वह नहीं है।  आप भारतवर्ष की भौतिक  आजादी की बात कर रहे हैं वह अभी बहुत छोटा है। एक समय इस देश के राजाओं की सीमा तिब्बत तक फैली हुई थी और आज हम जिस चीनी ड्रैगन से डर रहे हैं इसी इतिहास से खौफ खाता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि यह आजादी एक सीमित उद्देश्य की पूर्ति करती है न किस इससे कोई बृहद लक्ष्य हासिल हुआ है। इसी आजादी के संघर्ष में कई योद्धा हुए जिनका आजादी के बाद इस देश को बनाने की अपनी एक योजना और विचार थे। इनमें कई शहीद हो गये तो कई आजादी के बाद विस्मृत हो गये। हम उनको नमन करते हैं पर अब जिस तरह उन शहीदों और योद्धाओं के नाम पर लोग अपने लिये उपयोग कर रहे हैं  चिंतन और मनन का विषय है।  मुख्य बात यह है कि जब किसी भी महापुरुष का जीवन सुनाया जाता है तो उसका महत्व और उसके विचारों का महत्व समान नहीं रहता।  महापुरुषों के चरित्र पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए पर विचारों में इसकी गुंजायश होती है।  हो सकता है कि हम किसी महापुरुष के जीवन से प्रभावित हों पर यह जरूरी नहीं है कि हम उसके विचारों का भी समर्थन करें खासतौर से जब आजादी के बाद का अनुभव उनके पास नहीं रहा हो। फिर यह सवाल यह है कि आजादी के योद्धाओें के मन में जो संघर्ष का भाव था मातृभूमि से प्रेम के कारण उपजा था पर उनके विचारों का स्त्रोत क्या था, यह भी देखने वाली बात होती है।<br />
अब हो यह रहा है कि अनेक लोग आजादी या आजादी के तत्काल बाद के महान विचारकों के प्रति सम्मान का भाव प्रदर्शन करते हुए उनके विचारों का भी बोझ उठा रहे हैं और यहीं से प्रारंभ हो जाता है प्रतिक्रियात्मक लेखन जो कि किसी भी दशा में साहित्य और भाषा की वृद्धि में सहायक नहीं होता।  प्रतिक्रियात्मक लेखन से आशय यह है कि समाज में घटित होने वाली घटनायें और  समाचारों पर ही अपनी टिप्पणी, कहानी, व्यंग्य या कविता लिखना। ऐसा लेखन समय के साथ अप्रासंगिक हो जाता है। इनके प्रासंगिक होने की केवल एक ही शर्त है कि पात्रों, वस्तुओं या स्थितियों में ऐसे तत्व अपनी सामग्री में शामिल करें जो कभी भी पुरानी न पड़ें।  मान लीजिये भाई ने भाई को धोखा दिया तो आप केवल उस घटना पर ही लिख रहे हैं जबकि उसमें ऐसी हालातों, दोनों के मानसिक उतार चढ़ाव और चरित्र को भी विस्तार दें क्योंकि उनमें दोहराव संभव है जबकि पात्रों का नहीं। मतलब यह है कि एक भाई दूसरे को धोखा फिर कहीं देगा उस समय आपका लिखा तभी याद किया जायेगा जब उसमें कुछ दोहराने लायक संदेश होगा।  प्रतिक्रियात्मक लेखन के मुकाबले संदेशात्मक लेखन बहुत उपयोगी होता है हालांकि उसके परिणाम दीर्घकाल में मिलते हैं।  प्रतिक्रियावादी ताकतों से बचाव का कोई उपाय नजर नहीं आ रहा क्योंकि उसे अब कोई ललकारता ही नहीं बल्कि टीवी और अखबार उनका उपयोग करते हुए उनको प्रचार दे रहे हैं।<br />
किसी घटना या समाचार पर लिखने वाले इतने हैं कि उनके बीच बैठकर मौलिक और स्वतंत्र लिखने वालों को असहजता अनुभव होती है।  एक बाद दूसरी भी है कि भारत में हर कोई अपने लिखे से समाज बदलना चाहता है।  समाज बदलना है इसलिये लिखते हैं। ऐसे प्रतितक्रियात्मक लेखन से कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि वह एक बार पढ़ते ही पुराना हो जाता है।  दूसरी बात यह है कि हमारे देश के अधिकतर लेखक विचाराधाराओं के जाल में फंसे हैं जो कि केवल नारों पर आधारित हैं। यह सभी विचाराधारायें पश्चिम से आई हैं। कहने को भले ही लोग कहें कि हमें अंग्रेजियत  से परहेज है पर उनकी लिखने और काम करने की शैली वही हैं जो अंग्रेजों की दी हुई हैं।  </p>
<p>हिंदी के महान रचनाकार प्रेमचंद का मुकाबला आज तक कोई भी नहीं कर सका क्योंकि उनका लेखन कभी प्रतिक्रियात्मकवाद नहीं रहा।  गुलाम देश में सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद उन्होंने सामाजिक संदर्भों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया। उनकी रचनाओं में देश की आजादी या गुलामी की चर्चा अधिक पढ़ने में नहीं आती। इसका सीधा आशय यह है कि वह हिंदी  साहित्य में सामाजिक संदर्भ देखना चाहते थे।  हालांकि इस लेखक ने प्रेमचंद की ढेर सारी रचनायें पढ़ी हैं पर यह नहीं जान पाया कि आजादी और उसके संघर्ष पर उनकी क्या राय थी?  जहां तक हमारी जानकारी है प्रेमचंद जी ने आजादी के संबंध में कोई बड़ी रचना नहीं लिखी। संभवतः वह जानते थे कि आजादी के बाद वह पुरानी पड़ जायेंगी। यह संभव नहीं है कि  इतने बड़े साहित्यकार ने आखिर इस आजादी और उसके संघर्ष के कुछ न सोचा हो पर उसकी चर्चा न होना इस बात का प्रमाण है कि एक साहित्यकार की दृष्टि से आजादी के विषय में उनके मायने इतने संक्षिप्त नहीं रहे होंगे जितने अन्य विद्वानों के दिखते हैं।<br />
सच बात तो यह है कि प्रतिक्रियात्मक लेखन के बिना चलना भी कठिन है।  साहित्य लिखने वाले दूसरों का लिखा साहित्य कम बल्कि प्रतिक्रियात्मक लेखन अधिक पढ़ते हैं क्योंकि उनमें ही उनके लिये नये विषय होते हैं। प्रतिक्रियात्मक लेखकों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह समाज को तत्काल अपने शब्दों से जागरुक करने को भ्रम पाल लेते हैं। ऐसा न होने पर झल्लाते हैं। इसके विपरीत साहित्य लिखने वाले इस बात से बेपरवाह होते हैं। वैसे देश के प्रतिक्रियात्मक लेखन करने वालों को यह समझ लेना चाहिये कि वह नारों और वाद की धारा में लिख रहे हैं और समाज को जागृत करने के लिये जिस अध्ययन और चिंतन-आज के दौर में गहन और गंभीर नहीं है बल्कि सूक्ष्म और संक्षिप्त भी चलेगा- की आवश्यकता है उसके बिना कोई भी शब्द सामग्री प्रभावी नहीं होती।  एक मुश्किल दूसरी भी है कि लोग सोच तो देशी लेते हैं पर कार्यशैली की वकालत विदेशी की करते हैं और यहीं से उनका तारतम्य बिगड़ जाता है।  हमें वही करना चाहिये जैसा कि वह-अंग्रेज और अन्य पश्चिमी जगत-कर रहें है यह सोच उनकी राह में भटकाव लाती है।<br />
आखिरी बात यह है कि अंग्रेजी और अंग्रेजियत से मोह रखने वाले यहां हर विषय पर कानून बनाने की मांग करते हैं पर उनको पता नहीं है कि अंग्रेज कभी भी लिखित कानून पर नहीं चलते। यह उनका आत्मविश्वास है। भारत के कुछ विचारक-जो वाकई धन्य है जो ऐसी बात कह गये-कहते हैं कि अंग्रेज तो क्रिश्नियिटी पर चलते हैं जो हमारी ही कृष्ण नीति है। शायद वह सच कहते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने सहज योग का संदेश दिया पर लगता है कि वह ंअंग्रेजों के पास पहुंच गया। इसलिये वह स्वयं हमेशा अलिखित संविधान के सहजता से चलते जा रहे हैं पर अपनी हरकतों से पूरे विश्व में असहजता फैला रखी है।  लोग उनको देखकर असहज हुए जाते हैं कि हम भी उनकी तरह हो जायें पर इस चक्कर में सभी असहज हुए जा रहे हैं। इसी असहजता का परिणाम यह है कि किसी घटना या समाचार में हर कोई अपने विचार तो रख लेता है ताकि उस पर जल्दी प्रतिक्रिया मिल जाये पर दीर्घकालीन स्थिति तक प्रभाव रहे ऐसा बहुत कम ही लोग लिख पाते हैं। अंग्रेज स्वयं कई खेल खेलते हैं जबकि भारत को क्रिकेट ही सौंप गये ताकि वह उसी पर उलझा रहे। शेष फिर कभी<br />
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<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वेद और मनुस्मृति के विषयों  पर  भ्रमित करने का प्रयास-आलेख (disscution on ved and manu smriti-hindi lekh]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/13/ved-aur-manu-smruti-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 04:37:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/13/ved-aur-manu-smruti-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का आधार कोई एक ग्रंथ या पुस्तक नहीं है। समय समय पर अनेक महापुरुषों, तपस्पियो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का आधार कोई एक ग्रंथ या पुस्तक नहीं है। समय समय पर अनेक महापुरुषों, तपस्पियों, ऋषियों तथा मुनियों ने अपने सतत प्रयासों से इस ज्ञान भंडार को भरा है।  इसकी शुरुआत वेदों से हुई पर अंत कहीं नहीं है।  भौतिक और व्यक्त जगत पर शोध तो अनेक देशों ने किया पर अध्यात्मिक और अव्यक्त जगत पर जितना ज्ञान भारत में है किसी के पास नहीं रहा।  हम यहां वेदों के साथ मनुस्मृति की भी बात करेंगे जिनको लेकर हिन्दुओं को भ्रमित किया गया-इसे यूं भी कहें कि हमारा समाज स्वयं भी इसको लेकर भ्रमित है।<br />
अक्सर हिन्दू धर्म के अन्य धार्मिक आलोचक (इसका आशय विदेशी विचारकों और प्रचारकों से है)<br />
इन्हीं वेदों और मनुस्मृति से श्लोक लेकर हमला करते हैं पर यह उनकी सोच नहीं है। अन्य धार्मिक विचाराधारओं के मानने वालों (विदेशी विचारकों और प्रचारकों) के पास इतनी चिंतन क्षमता हो ही नहीं सकती कि वह भारतीय वेदों, पुराणों और मनुस्मृति को पढ़कर आलोचना कर सकें बल्कि यह भारतीय समाज के अंदरूनी तत्वों द्वारा ही जानकारी प्रदान की जाती है।  इससे भी आगे हम यह कहें कि हमें गैर भारतीय विचारधर्मियों से कम अपने ही समाज के और बौद्धिक तत्वों से अधिक चुनौती  है जो विदेशी विचाराधाराओं के सहारे यहां वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। इसमें हम जनवादी प्रगतिवादी विचाराधारा के सभी नहीं तो कुछ तत्वों को शामिल पाते हैं जिनको इस देश के समाज को गरीब, मजदूर, स्त्री, बालक,बीमार और बदहाल जैसे वर्गों में बांटकर कल्याण करने का शौक है।  </p>
<p>यहां हमारा आशय हिन्दू धर्म और उसके ग्रंथों के आलोचकों को उत्तर देना नहीं वरन् समान विचारधार्मियों को यह समझाना है कि वह अपने तर्क ठोस ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पाते और परिणाम स्वरूप उत्तेजना या गुस्से में ऐसी अभिव्यक्ति करते हैं जो उनके लिये उचित नहीं है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति सदैव  नवनिर्माण, सौम्य विकास और वैचारिक प्रवाह की निरंतरता की पोषक है।  इस धरा की ऊर्जा मनुष्य में ज्ञान और विज्ञान  की धारा को प्रवाहित रखती है जिससे यहां अध्यात्मिक और भौतिक ज्ञान का सदैव भंडार रहता है।<br />
वेदों की रचना प्रारंम्भिक काल में हुई।  इसकी रचना का काल खंड कोई प्रमाणिक रूप से नहीं जानता क्योंकि इनमें ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों तथा महापुरुषों ने अपने अथक प्रयासों से इसमें अपना ज्ञान प्रस्तुत किया और वह इतने निष्कामी और निष्प्रयोजक दयालु थे कि आत्मप्रचार से बचने के लिये नाम भी नहीं लिखते थे।   हमारे देश में अध्यात्मिक ज्ञान के लिये निरंतर अन्वेषण होता रहा है इसलिये यह कहना कठिन है कि किसी एक महापुरुष ने इसकी रचना की होगी।  कहने वाले तो यह कहते हैं कि दुनियां में कहीं भी कही या लिखी गयी अच्छी और समाज हित की बात वेद का ही हिस्सा है या इसे यूं कहें कि वह वेदों में कही जा चुकी है। हम यहां वेदों का महत्व साबित नहीं करने जा रहे बल्कि हिन्दू धर्म समाज की उस सतत प्रवाहित वैचारिक धारा की चर्चा कर रहे जिससे अन्य धार्मिक समाज दूर रहते हैं।  वेद या मनुस्मृति की आलोचना या चर्चा कर हमारे समाज को रास्ते से हटाने का प्रयास सदियों से चल रहा है और इसे समझना होगा क्योंकि आज का समाज केवल इनके सहारे आगे नहीं बढ़ रहा। हम यहां बाल्मीकी रामायण, श्रीमद्भागवत, महाभारत और श्री मद्भागवत गीता जैसे वह ग्रंथ क्यों भूल जाते हैं जिनसे आज के समाज का सर्वाधिक प्रयोजन है।   वेदों या मनुस्मृति में अवर्ण जातियों तथा स्त्रियों के लिये जो बातें तत्कालीन संदर्भों में कही गयीं उनका संदर्भ हमें पता नहीं है पर उनको वर्तमान में कौन मानता है? जो मानते हैं उनको समाज के ज्ञानी लोग ही मूर्ख कहते हैं।  फिर समाज जैसे जैसे आगे बढ़ता गया अन्य रचनायें होती गयीं और वेदों से उचित ज्ञान उनमें समावेश किया गया।   आज केवल धर्म में विशिष्टता प्राप्त करने के जिज्ञासु ही इन धर्म ग्रंथों को पढ़ते हैं पर अन्य सामान्य व्यक्ति इनके बारे में अधिक नहीं समझता। </p>
<p>कहा जाता है कि वेदों में असंख्य श्लोक थे पर अब हजारों में उपलब्ध हैं? इसका मतलब यह नहीं है कि श्लोक कहीं खो गये बल्कि उनको कहीं न कहीं संजो कर रखा जाता रहा इसलिये वेदों के प्रति यह समाज उदासीन होता चला गया।  सच बात तो यह है कि वेदों में जो तत्व ज्ञान है उसे तो अनेक लोगों ने अपनी रचनाओं में स्थान दिया।   वेदों में भी दो तरह की ज्ञान ही हो सकता था-एक तो दैहिक-भौतिक तथा दूसरा अभौतिक-अध्यात्मिक।  इनमें दैहिक तथा भौतिक ज्ञान तो समय के साथ परिवर्तित होता है पर अभौतिक तथा अध्यात्मिक ज्ञान में परिवर्तन नहीं आता और यही मनुष्य मन के लिये लाभदायी होता है।  इसी अव्यक्त और अध्यात्मिक ज्ञान को संजोए रखने के लिये प्रयास हुए जिसके कारण समाज वेदों से उदासीन है।<br />
भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का मूल तत्व निष्काम कर्म और  निष्प्रयोजन दया जैसे अनेक संदेश हैं। वेदों से उदासीन होने का कारण भगवान श्री कृष्ण जी की गीता भी रही। चारों वेदों का सार उसमें आ गया-सच कहें तो श्रीकृष्ण ने अपनी  अलौकिक बुद्धि से  चारों वेदों का सार जिस तरह प्रस्तुत किया उससे तो उन्हें इस विश्व का प्रथम  संपादक कहकर मन गद्गद् कर उठता है।  उन्होंने न केवल वेदों के तत्व ज्ञान का इसमें समावेश किया बल्कि दैहिक एवं भौतिक संसार को समझने का विज्ञान भी दिया।<br />
उस दिन एक सज्जन ने कहा कि ‘भला बताईये, आयुर्वेद की कौनसी शिक्षा इसमें शामिल है।’<br />
इसका जवाब है कि ‘आयुर्वेद में बीमारियों की दवा से बचने के अलावा उनके इलाज की चर्चा है मगर भगवान श्रीकृष्ण जी ने उनसे बचने का उपाय भी बताया और इलाज भी। उन्होंने बीमारियों से बचने के लिये उचित खानपान का ज्ञान दिया तो इलाज के लिये प्राणायम का उपाय भी बताया।’<br />
यह दुनियां का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान और विज्ञान दोनों ही शामिल है।  इसमें शामिल  हिन्दूओं का समग्र ज्ञान है और वह भी संक्षिप्त रूप से। ऐसा कुशल संपादन कौन संपादक कर सकता था?<br />
आधुनिक काल के हिन्दी भाषी लेखकों ने अपनी कलम विचाराधाराओं के द्वंद्व पर अधिक चलाई पर वैश्विक काल-जीं हां, अंतर्जाल पर लिखने के साथ ही इसकी शुरुआत हुई क्योंकि वह रूढ़ हो चुके संस्थानों की पकड़ से बाहर निकली है-के हिन्दी लेखकों को वेदों के महत्व बताने की बजाय अपने संपूर्ण अध्यात्मिक ग्रंथ का प्रतीक श्रीगीता में ही आलोचकों के उत्तर ढूंढने चाहिये।  उससे अगर संतुष्ट न हों तो बाल्मीकी रामायण और श्रीमद्भागवत का अध्ययन करें।  वेदों और मनुस्मृति पर विवाद या (कु)चर्चा करने में समय बरबाद करना व्यर्थ है। हमारा समाज निरंतर चलता रहता है और कहीं एक जगह अटक कर रह जाना उसकी फितरत नहीं है।  यह अलग बात है कि श्रीगीता में जो ज्ञान दिया है वह हर युग की दृष्टि से स्थिर रहने वाला है और यही हमारी सबसे बड़ी  ताकत है।<br />
दरअसल भारत में एक बौद्धिक वर्ग है जिसे यह अध्यात्मिक ज्ञान नहीं सुहाता।  वह खुशहाल समाज नहीं देखना चाहता बल्कि समाज में व्याप्त आर्थिक गरीब, जातीय विवाद तथा सामाजिक रूढ़ियों के प्रतिवाद में अपनी जगह तलाशता है।  ऐसा नहीं है कि यह साठ या सत्तर साल पुरानी  बात है बल्कि यह कबीर जी के समय से ही चल रहा है।  भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के चरित्रों की कहानियां सुनाकर कुछ लोगों ने अपने अध्यात्मिक ज्ञानी होने का ढोंग रचाया जिसको दिखाकर हिन्दू धर्म के आलोचक अधिक बौखला जाते हैं। भले ही ऐसे लोग ढोंगी हैं पर धर्म प्रवाह में उनकी एक भूमिका है जो वह अनजाने में ही निभा जाते हैं।  हिन्दू धर्म के आलोचक उन जैसे नहीं बन सकते क्योंकि उन्होंने धर्म ग्रंथ पढ़े नहीं है पर उन जैसा पुजना चाहते हैं। इसलिये आप सुनते होंगे कि कुछ लोगों के नाम लगी उपाधियों-‘गरीबों के मसीहा, शोषितों के मसीहा, नारी कल्याण के प्रतीक।</p>
<p>कहने कहा तात्पर्य यह है कि समय के साथ ही हमारे महापुरुष, तपस्वी, ऋषि और मुनि वेदों से प्रदत्त ज्ञान को इस तरह लेकर आगे चले कि उनमें परिवर्तित होने वाला दैहिक तथा भौतिक ज्ञान जो अप्रासंगिक हो गया है उसे छोड़ दिया जाये। हां, जो तत्व ज्ञान है उसे किसी ने नहीं छोड़ा।   हमारी इस पावन धरा पर समय समय महापुरुष आते हैं यह उसका गुण है और उसी तरह समाज का भी यह गुण है कि वह उनके संदेशों के साथ अपना रास्ता बनाता जाता है।  किसी एक पुस्तक या महापुरुष से चिपक कर केवल उसे ही मान लेना मानसिक दृढ़ता का नहीं बल्कि वैचारिक संकीर्णता का प्रतीक है। फिर वैश्विक काल के हिन्दी लेखकों को यह नहीं भूलना चाहिये कि उनका असली संघर्ष गैर भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा मानने वालों से नहीं वरन् कथित रूप से अपनी विचाराधारा वाले लोगों से ही है।<br />
वह वेद की बात करें तो तुम उनको बाल्मीकी रामायण, श्रीमद्भागवत और श्रीगीता दिखाओ-उन्हें बताओ कि यह है हमारी ताकत।  वह तो वेद और मनुस्मृति पर चर्चा करेंगे क्योंकि उनको इन तीनों महांग्रथों से खौफ लगता है। श्रीगीता के बारे में तो कहना ही क्या? वह इसका नाम भी नहीं लेंगे क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने इसमें संदेश ही इस तरह दिया है कि पढ़ लिख चाहे जो भी ले पर जब तक वह हृदय से उनके प्रति श्रद्धा नहीं दिखायेगा वह समझेगा नहीं और जो उनको मानेगा ही नहीं तो उसकी जुबां से श्रीगीता का नाम निकलेगा ही नहीं और कान से सुनते ही उसकी नसों में भय दौड़ने लगेगा। याद रखो कि वेद और मनुस्मृति पर (कु) केवल विचलित करने के लिये की जाती है और  बाल्मीकी रामायण, श्रीमद्भागवत तथा श्रीगीता की बात करने का उन लोगों  में नहीं है। सच बात तो यह है कि वेदों और मनुस्मृति पर उनसे (कु)चर्चा कर उनके जाल में ही फंसना है। आखिर हम उनके ऐजेंडे पर ही बहस क्यों करें वह हमारे ऐजेंडे पर बहस क्यों नहीं करते? वह वेदों और मनुस्मृति को उठाते हैं पर श्रीगीता से उनकी परहेज क्या उनकी दुर्भावना का प्रतीक नहीं है?शेष फिर कभी<br />
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<title><![CDATA[चाणक्य नीति-मंदिरों में तोड़फोड़ करना वाले लोग गंदे (mandiron men todfod-chankya niti]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/12/todfor-galat-chankya-niti/</link>
<pubDate>Sat, 12 Sep 2009 06:44:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/12/todfor-galat-chankya-niti/</guid>
<description><![CDATA[परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः। छली द्वेषी मृदः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते।। हिंदी में भाव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः।<br />
छली द्वेषी मृदः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>जो मनुष्य दूसरे के कार्यों को बिगाड़ने वाला, पाखंडी, अपना मतलबी साधने वाला, छलिया, दूसरों की उन्नति देखकर जलने वाला तथा बाहर से कोमल और अंदर कपट भाव रखने वाला है वह भले ही विद्वान क्यों न हो पशु के समान है।<br />
<strong>चापी-कूप-तडागानामाराम-सुर-वेश्मनाम्।<br />
उच्छेद निरऽऽशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>जो मनुष्य बावड़ी, कुआं तालाब, बगीचे और धर्म स्थानों में तोड़फोड़ और उनको नष्ट करने से जो डरते नहीं है वह भले ही विद्वान हों म्लेच्छ कहलाता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या</strong>-सभी को अपने जीवन में अपना स्वयं के धर्म और कर्म केंद्रित करना चाहिये। कुछ ऐसे मनुष्य भी हैं जो केवल धर्म का दिखावा करते हैं पर उनका लक्ष्य उसकी आड़ में व्यवसाय या उसके सहारे अपना समाज पर वर्चस्व स्थापित करना है। ऐसे लोग धर्म के आधार पर निकृष्ट कर्म करते हैं जो केवल पाप की श्रेणी में आते हैं। हालांकि कहा जाता है अशिक्षित और गंवार लोग ही ऐसे हैं जो धर्म की आड़ में पाप काम करते हैं पर चाणक्य महाराज की बात को देखें तो यह काम पहले भी विद्वान और शिक्षित लोगों के द्वारा होता रहा है। बस अंतर इतना है कि अब यह काम केवल विद्वान आर शिक्षित लोग ही कर नजर आते हैं। कथित अशिक्षित और गंवार लोगों को तो अपनी रोजी रोटी कमाने से ही आजकल फुरसत कहां मिल पाती है?<br />
देश, प्रदेश, और शहर की संपत्ति और धार्मिक स्थानों पर तोड़फोड़ करने वाले भारी पाप करते हैं और उनको एक तरह से म्लेच्छ कहा जाता है। चाहे अपने धर्म का हो या दूसरे धर्म का उसमें तोड़फोड़ करने वाले महापापी हैं और उनका कभी समर्थन न करे। ऐसे लोग धर्म के नाम पर विवाद कर समाज का ध्यान अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर उसका लाभ उठाते हैं। अगर हम उनकी तरफ देखें तो भी समझ लेना चाहिये कि पाप हो गया।<br />
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</item>
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<title><![CDATA[ मंदिर कहीं, गर्व और गौरव कहीं-चिंत्तन आलेख (Temple somewhere, anywhere pride and glory -hindi Articles) ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/09/05/manid-kahin-garva-kahin-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Sat, 05 Sep 2009 05:26:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[वह एक ब्राह्म्ण लेखक का पाठ था-ऐसा उन्होंने अपने पाठ में स्वयं ही बताया था। उसने बताया कि राजस्थान क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वह एक ब्राह्म्ण लेखक का पाठ था-ऐसा उन्होंने अपने पाठ में स्वयं ही बताया था।  उसने बताया कि राजस्थान के सीमावर्ती गांवों में विभाजन के समय आये सिंधी किस तरह अपनी संस्कृति को संजोये हुए हैं। एक सिंधी ने उससे कहा कि ‘आपमें और हममें बस इतना अंतर है कि हम अभी कुछ समय पहले वहां से आये हैं और आप तीन चार सौ साल पहले बाहर से आये हैं।’<br />
उस लेखक ने इसी आधार  पर अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा कि बाहर से कितने ही आक्रांता इस देश के लूटने आये पर यहां के लोगों ने उनके विचारों में नयापन होने के कारण स्वीकार किया। यहां नित नित नये समाज बने।   उस लेखक ने यह भी लिखा है कि इस समाज की यह खूबी है कि वह नये विचारों को ग्रहण करने को लालायित रहता है।<br />
उस लेखक और इस पाठ के लेखकों में विचारों की साम्यता लगी और ऐसा अनुभव हुआ कि इस देश के इतिहास में कई ऐसी सामग्री हैं जिनका विश्लेषण नये ढंग से किया जाना चाहिये।  हुआ यह है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति से शिक्षित इस देश बौद्धिक समाज दूसरे द्वारा थोपे गये विषयों पर विचार भी उनके ढंग से करता है।  पिछले तीस चालीस वर्ष के समाचार पत्र पत्रिकायें उठाकर देख लीजिये इतिहास की गिनी चुनी घटनाओं के इर्दगिर्द ही नये ढंग से विचार ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे नया हो।<br />
अधिकतर तो हम पिछले बासठ वर्ष के इतिहास पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं तो कभी कभी हजारों वर्ष पीछे चले जाते हैं।  इन सबमें हम अपना गौरव ढूंढने से अधिक कुछ नहीं करते।  इससे कभी निराशा का भाव आता है। दरअसल हमारी समस्या यह है कि हम यथास्थिति से आत्ममुग्ध हैं और उसमें अपना गौरव ढूंढना ही अधिक सुविधाजनक लगता है।<br />
इसमें एक गौरव पूर्ण बात कही जाती है कि हिन्दू धर्म कभी इतना विस्तृत था कि उसका विस्तार मध्य एशिया तक था। मध्य एशिया में बने हिन्दू मंदिरों को अपना गौरव बताने की यह प्रवृत्ति हमारे देश में बहुत है।  इसके पीछे वास्तविकता क्या है और नये संदर्भों में हम उसे कैसे देखें? यह विचार करने का साहस कोई विद्वान नहीं करता।  आईये हम कुछ इस पर प्रकाश डालें। </p>
<p>एक पश्चिमी विद्वान ने खोजकर बताया था कि मनुष्य की उत्पति दक्षिण अफ्रीका में हुई। वह वहां बिल्कुल बंदरों की तरह था।  उसके बाद वह भारत आया और वहां उसने ज्ञान प्राप्त किया फिर वह मध्य एशिया में गया जहां उसने सभ्यता का नया स्वरूप प्राप्त किया।  फिर वह भारत की तरफ लौटा और बौद्धिक रूप से परिष्कृत होकर उसके बाद अन्य स्थानों पर गया। हम इसे अगर सही माने तो आज भी कुछ नहीं बदला।  भारत आकर इंसान ने यहां की आबोहवा मेें राहत अनुभव की और अपने प्रयोग से उसने सत्य का ज्ञान प्राप्त किया। उसके प्रचार के लिये वह मध्य एशिया में गया जहां उसे सांसरिक और भौतिकता का ज्ञान भी मिला।  दोनों ही ज्ञानों में संपन्न होने के बाद वह पूरे विश्व में फैला।  इसमें एक बात निश्चित रही कि जिस तत्व ज्ञान की वजह से भारत विश्व में अध्यात्मिक गुरु है उसका आभास इसी धरती पर होता है। मुश्किल यह है कि तत्व ज्ञान अत्यंत सूक्ष्म और संक्षिप्त है और बाह्य रूप से उसका आकर्षण दिखता नहीं है। जब इंसान अपने अंदर की आंखों खोले तभी उसका महत्व उसे अनुभव हो सकता है। </p>
<p>भारत में हमेशा ही प्रकृति की कृपा रहने के साथ जनसंख्या का भी घनत्व हमेशा अधिक रहा है इसलिये यहां हमेशा आदमी खातापीता रहा हैं इसके विपरीत अन्य देशों में इतना प्राकृतिक कृपा नहीं है इसलिये यहां का भौतिक आकर्षण विदेशियों को हमेशा ही यहां खींच लाता है।  इनमें कुछ पर्यटक के रूप में आते हैं तो कोई आक्रांता के रूप में।<br />
विदेशों से यहां आवागमन हमेशा रहा है और तय बात है कि विदेशों से जो लोग आये उनकी सभ्यता भी यहां मिलती गयी। यही कारण है कि हम अनेक समाजों के कर्मकांडों में विविधता देखते हैं। इतिहासकारों के अनुसार भारत में मूर्तिपूजा का प्रवृत्ति मध्य एशिया से आयी है।   उनकी बात में दम इसलिये भी नजर आती है कि भारतीय धर्म ग्रंथों में यज्ञ हवन आदि की चर्चा तो होती है पर मूर्ति पूजा यहां के मूल धर्म का भाग हो ऐसा नहीं लगता।  रामायण काल में भी रावण द्वारा यज्ञों में विध्वंस पैदा करने की घटनाओं की चर्चा होती है पर मंदिर आदि पर हमला कहीं हुआ हो इसकी जानकारी नहीं मिलती।<br />
श्रीगीता में भी द्रव्य यज्ञ और ज्ञान यज्ञ की चर्चा होती है। द्रव्य यज्ञ से आशय वही यज्ञ हैं जिनमें धन का व्यय होता है और निश्चित रूप से उनका आशय उन यज्ञों से है जिनमें भौतिक सामग्री का प्रयोग होता है।<br />
इतिहास में इस बात की चर्चा होती है कि मध्य एशिया में किसी समय अनेक देवी देवताओं की पूजा होती थी और इस कारण वहां सामाजिक वैमनस्य भी बहुत था।  लोग अपने देवी देवताओं को श्रेष्ठ बताने के लिये आपस में युद्ध करते थे।  इन देवी देवताओं की संख्या भारत में वर्तमान में प्रचलित देवी देवताओं से कई गुना अधिक थी।<br />
इतिहासकारों के अनुसार वहां एक राजा हुआ जो सूर्य का उपासक था।  उसने सूर्य को छोड़कर अन्य देवी देवताओं  की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया।  दरअसल उसका मानना था कि सूर्य ही सृष्टि का आधार है और  वही पूज्यनीय है।  उसने अन्य देवी देवताओं के मंदिर और मूर्तियां तुड़वा दीं। इससे लोग नाराज हुए और उसे इतिहास का क्रूर राजा माना गया। बाद में उस राजा की हत्या हो गयी। इतिहासकार मानते हैं कि भले ही उसकी जनता उससे नाराज थी पर उसने यह सत्य स्थापित तो कर ही दिया कि इस सृष्टि का स्वामी एक परमात्मा है।<br />
कुछ इतिहासकार कहते हैं कि उस राजा के मरने के बाद फिर पुनः विभिन्न देवी देवताओं की पूजा होने लगी।  नतीजा फिर आपसी संघर्ष बढ़ने लगे और यह तब तक चला जब तक वहां एक ईश्वर का सिद्धांत ताकत के बल पर स्थापित नहीं हो गया।<br />
दरअसल हम इतिहास पर विचार करें तो मूर्ति पूजकों और उनके विरोधियों का संघर्ष वहीं से होता भारत तक आ पहुंचा।  भारत में इसे अधिक महत्व नहीं मिला क्योंकि यहां तत्व ज्ञान हमेशा ही अपना काम करता रहता है।  यह तत्वज्ञान श्रीगीता में पूरी तरह वर्णित है।  इसके अलावा एक अन्य बात यह भी है कि भारतीय समाज मानता है कि समय समय पर महापुरुष पैदा होकर समाज सुधार के लिये कुछ न कुछ करते रहते हैं और उनका यह विश्वास गलत नहीं है।  आधुनिक काल में कबीर, तुलसी, रहीम, मीरा, रैदास तथा अन्य संत कवियों ने अपनी रचनाओं ने केवल तत्व ज्ञान का प्रचार किया बल्कि भक्ति के ऐसे रस का निर्माण किया जिसके सेवन से यह समाज हमेशा ही तरोताजा रहता है।  इसके विपरीत जहां नवीन विचारों के आगमन पर रोक है वह समाज जड़ता को प्राप्त हो गये हैं।<br />
पूर्व में ऋषियों मुनियों और तपस्वियों द्वारा खोजे गये तत्व ज्ञान तथा आधुनिक काल के संत कवियों के भक्ति तत्व का प्रचार हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं।  अगर हम यह  कहते हैं कि मध्य एशिया में फैले मंदिर हमारे गौरव हैं तो यह भी याद रखिये वह मंदिर हमारे तत्वज्ञान और भक्ति भाव का प्रतीक नहीं है। इसके अलावा सूर्य मंदिरों का मध्य एशिया में होना तो कोई अजूबा नहीं है क्योंकि वहां कभी उनकी पूजा होती है।  हम उनके साथ अपनी संस्कृति और सभ्यता को नहीं जोड़ सकते क्योंकि उनके साथ आपसी खूनी संघर्षों का इतिहास भी जुड़ा है। कहने को तो भारत में भी विभिन्न धार्मिक मतों को लेकर विवाद होते रहे हैं पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि इसको लेकर किसी ने किसी पर हमला किया हो।<br />
हमारी वर्तमान सभ्यता, संस्कृति और धर्म अनेक तरह के प्रयोगों के दौर से होते हुए वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुआ है।  इसके आधार स्तंभ तत्व ज्ञान और भक्ति ही हमारी वास्तविक पहचान है।  एक बात याद रखिये इतिहासकार कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका से चलकर इंसान भारत में ज्ञानी हुआ और फिर प्रचार के लिये मध्य एशिया में गया जहां उसे अन्य ज्ञान मिला। वह उसे प्राप्त कर यहां लौटा फिर पूरी तरह से परिष्कृत होकर अन्य जगह पर गया।  इसका आशय यह है कि अतीत का गौरव जो हमारे देश में यहीं को लोगों की तपस्य और परिश्रम से निर्मित हुआ है  वही श्रेष्ठ है और उससे आगे की सीमा का  गौरव तो धूल धुसरित हो गया है।  यह वहां रहे लोगों को तलाशना है उस पर हमें गर्व करना बेकार है। इसलिये कहीं मध्य एशिया के पुराने मंदिर ही नहीं बल्कि पश्चिम देशों में बनने वाले मंदिरों में अपने धर्म का गौरव ढूंढना का प्रयास किसी को अच्छा लग सकता है पर अघ्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि यह केवल एक क्षणिक मानसिक सुख है और इसका उस ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है जिसकी वजह से यह देश विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है।<br />
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[योग साधकों के साथ पिकनिक-आलेख (yog sadhkon ke sath picnic-hindi lekh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/31/yogi-and-picnic-hindi-article/</link>
<pubDate>Mon, 31 Aug 2009 16:08:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/31/yogi-and-picnic-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[उस पिकनिक हम सब आम लोग ही थे पर दूसरों से कुछ अलग! हम सभी नियमित योग साधना करने वाले लोग थे। योगी कह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>उस पिकनिक हम सब आम लोग ही थे पर दूसरों से कुछ अलग! हम सभी नियमित योग साधना करने वाले लोग थे। योगी कहना कठिन है क्योंकि हम में से कोई गेहुंआ वस्त्रधारी नहीं था। इतना जरूर है कि सामान्य लोगों से अलग होने का अहसास इस तरह की पिकनिक में लगता है क्योंकि वहां केवल योग से संबंधित विषय पर ही आपस चर्चा होती है। </p>
<p>यह पिकनिक योग सीखने और सिखाने वाले शिक्षकों और साधकों को आपसी मेल मिलाप के लिये आयोजित की जाती है। कुछ अंतर इस पिकनिक अन्य के मुकाबले नजर आया।  पैंतालीस पैंतालीस मिनट के तीन सत्रों की चर्चा के दौरान कवितायें, विचार, चुटकुले और योग संबंधी चर्चायें हुईं। दूसरा खाना लेट होने या उससे परेशान होने की बात लोगों में नहीं दिखाई दी।  खाने खाते समय ऐसा नहीं लगा कि लोग उस पर टूट पड़े हों।  यह सिद्ध लोगों की बैठक नहीं थी-क्योंकि इसमें नौकरी और व्यापार के साथ अन्य व्यवसाय करने वाले लोग शामिल थे।  सबसे बड़ी बात यह है कि वहां कोई अपनी बीमारी की चर्चा कोई नहीं कर रहा था जो कि इसका प्रमाण था कि वहां योग साधक लोग ही आये थे।<br />
इसके आयोजक वह लोग थे जो निष्काम भाव से न केवल योग शिविरों में जाकर सिखाते हैं बल्कि उसके प्रचार के लिये भी कार्य करते हैं।  उनकी साधना का तेज उनकी बातों में देखा जा सकता है।<br />
एक महिला ने ध्यान करवाया और उसने शरीर के सात चक्रों पर अपना प्रकाश डाला। उसकी बातें सुनकर तो ऐसा लगा कि लोग पता नहीं क्यों अपनी बीमारियों के लिये चिकित्सकों के यहां चक्कर लगाते हैं जबकि उसको सही करने के साधन ही अपने अंदर मौजूद हैं।  एक महिला ने सूर्य नमस्कार पर प्रकाश डाला।  </p>
<p>इस पिकनिक में एक ऐसी महिला भी दिखाई दी जिसे हम बहुत पहले जानते थे। वह बहुत मोटी थी।  एक विवाह समारोह में वह मिली थी तो वह अन्य भद्र महिला से अपनी मधुमेह की बीमारी का जिक्र कर रही थी।  अब उसे शायद पांच वर्ष बाद देखा होगा।  वह हमें पहचान नहीं पायी पर हमें उसका चेहरा याद था।  अब वह उतनी मोटी नहीं दिख रही थी न उसके चेहरे पर निराशा का भाव दिख रहा था जो शादी में देखा था। उम्रदराज हैं पर पहले के मुकाबले अधिक ढंग से मजबूत दिख रही थी। कहने का तात्पर्य यह है कि नियमित योगसाधना का लाभ उनके चेहरे पर दिखाई दे रहा था।<br />
एक मित्र से चर्चा हुई। वह इस बात से निराशा थे कि वहां एक भी नवयुवक या नवयुवती नहीं दिखाई दे रही। उनका कहना था कि<br />
1.आजकल के लड़के लड़कियां योग का महत्व नहीं समझते। अगर कहो तो कहेंगे कि जिम जायें या हैल्थ क्ल्ब में शामिल हों। मतलब वह पैसे खर्च करने की बात करेंगे।<br />
2.उनको सुबह योग साधना के लिये बुलाना भी कठिन है क्योंकि वह शिक्षा के बोझ तले हैं। दिन में विद्यालय महाविद्यालय जाने के साथ उन पर चार चार जगह ट्यूशन जाने का भी बोझ है। बिचारे थक जाते हैं।’<br />
जब वह अपनी बात कह चुके तब हमने उनसे कहा कि<br />
1. ठीक है! यह जरूरी है क्या कि सभी योग शिविरों में  सुबह आयें।  लड़के लड़कियां तो वैसे भी हाथ पांव बहुत मारते हैं। इसलिये अगर वह योगसन और प्राणायम के लिये सुबह नहीं आते तो कोई बात नहीं।  जब बाहर से घर वापस आते हैं तो उनसे भृकुटि पर नजर रखते हुए ध्यान रखने के लिये कहो। उस समय वह शरीर को ढीला छोड़ दे तो विद्यालय महाविद्यालय और ट्यूशन के दौरान जो शारीरिक मानसिक थकवाट दूर हो जायेगी। वह उठते बैठते और चलते फिरते तनाव में जीने के इस कदर आदी है कि उनको पता ही नहीं कि विश्राम क्या होता है? जब ध्यान से विश्राम अनुभव होगा  तब उनको पता लगेगा कि योग साधना क्या चीज है और फिर वह योग शिविर में भी आयेंगे।  योग साधना का चरम ध्यान ही है और जो इस विद्या में पारंगत हो जायेगा उसका तो कहना ही क्या?<br />
2. उन्हें समझाओ कि जिम या हैल्थ क्लब दैहिक के लिये अस्थाई रूप से लाभ दायक हैं जबकि योगासन, प्राणायम और ध्यान से देह, मन और शरीर के विकार तो निकलते ही है बल्कि प्रभावपूर्ण वाणी और पवित्र व्यवहार से दूसरे पर भी प्रभाव पड़ता है और साथ ही चेहरे पर सुंदरता आती है जिसे आज की युवा पीढ़ी सबसे अधिक जरूरी मानती है।<br />
एक महिला ने कविता गायी। वह न केवल योग शिक्षिका है बल्कि बरसों से निष्काम भाव से कार्य करते रहने के कारण सभी उसका सम्मान भी करते हैं।  उसने  देश भक्ति और नारी स्वाभिमान से पूर्ण अपनी कविता में  एक जगह नारी के लिये सकारात्मक रूप से ‘रणचंडी’ शब्द का प्रयोग किया।<br />
सब कुछ ठीक था पर उसकी कविता समाप्त होते ही एक पुरुष सज्जन ने कहा कि ‘रणचंडी बने पर ऐसी नहीं कि जैसे वह&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;थी।  कार्यक्रम  का संचालन करने वाले ने कहा कि इस पर बहस होना चाहिये। उसने पुरुष सदस्य से कहा कि आप थोड़ा विस्तार से बात करें। उस पुरुष सदस्य से अपनी बात दोहराई और फिर दूसरी बात भी करने लगा।<br />
तब संचालक ने उस महिला से कहा कि ‘आप भी कुछ कहिये।  हम इस  विषय पर चर्चा  बढ़ाना चाहेंगे।’<br />
उस महिला ने कहा कि‘यह जिस तरह बात कर रहे हैं। मेरी बात  समझेंगे नहीं।’<br />
यह पता नहीं कि वह महिला और पुरुष एक दूसरे को पहले से जानते थे पर ऐसा लगा कि हम ब्लाग और कमेंट के खेल में फंस रहे हैं।  एक बार हमने सोचा कि  उठकर उस महिला से अपनी बात कहें पर लगा कि कहीं अर्थ का अनर्थ न हो जाये।  उस समय ब्लाग जगत की याद आ रही थी कि कमेंट दें कि नहीं।  सबसे बड़ी बात यह थी कि वह महिला योग साधना विषयक ज्ञान में हमसे अधिक प्रवीण थी इस बात ने हमें चुप रहने को विवश किया।  तमाम तरह की बातें हमने वहां सुनी और लगा कि संभव है कि कभी हमारे शिक्षक रहे सभी गुणीजन योग साधना में बहुत प्रवीण है पर वह ऐसे मार्ग पर खड़े हैं जहां से श्रीगीता का द्वार  खुलता है।  जब हम बोलने का मन बना रहे थे तब यह तय था कि हम श्रीगीता के संदेश के साथ ही अपनी बात कहते पर फिर खामोश रहे।<br />
खाने के समय वह भद्र महिला हमारे से कुछ ही दूर बैठी थी। सोचा अब कहें पर फिर चुप रहे।  हम कहना यही चाहते थे कि ‘आप कुशल योग शिक्षिका हैं और आपकी वाणी के साथ विचारों के तेज की अनुभूति तो  कविता से हो गयी थी।  मगर अब कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं चल रहा जिसमें रणचंडी या रणबांकुरे चाहिये बल्कि योग और योगिनियों की जरूरत है क्योंकि युद्ध कौशल और जीवन का तत्व  ज्ञान यह दोनों ही गुण उसमें हो सकते हैं।  इस समय देश मेें युद्ध नहीं बल्कि विवेक जगाने के लिये एक अभियान की आवश्यकता है जो काम उन जैसे लोग इतनी सहजता से कर सकते हैं कि हम जैसे आदमी को तो पसीना ही आ जाये। आप 1983 से योग साधना से जुड़ी हैं और इसका मतलब यह है कि आप में वह शक्ति है जो आम आदमी या स्त्री में नहीं हो सकती। मुख्य बात यह है कि हमें अपने विषय और लक्ष्य के स्वरूप को समझना होगा।’<br />
इस बार नहीं कहा पर जल्दी उनसे कहीं न कहीं मुलाकात होने की संभावना है तब यह बात कहेंगे।  बहरहाल हमें वहां एक बात लगी कि योग साधना, प्राणायम और ध्यान के बाद आदमी के लिये श्रीगीता का अध्ययन ही शेष रह जाता है जो किसी को पूर्ण योगी बनाता है और इसका मतलब सन्यासी होना कतई नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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<title><![CDATA[विदुर नीतिः ख़ुद की  मूल प्रवृत्ति   के विरुद्ध  कार्य न करें (mool pravrutti aur kam)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/09/vidur-niti-in-hindi/</link>
<pubDate>Sun, 09 Aug 2009 07:42:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/09/vidur-niti-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा। गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।। हिंदी में भावार्थ-न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।<br />
गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर जी कहते हैं कि जो अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करते हैं वह कभी नहीं शोभा पाते। गृहस्थ होकर अकर्मण्यता और सन्यासी होते हुए विषयासक्ति का प्रदर्शन करना ठीक नहीं है। </p>
<p><strong>द्वाविमौ कपटकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषिणी।<br />
यश्चाधनः कामयते पश्च कुप्यत्यनीश्वरः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अल्पमात्रा में  धन होते हुए भी  कीमती वस्तु को पाने की कामना और शक्तिहीन होते हुए भी क्रोध करना मनुष्य की देह के लिये कष्टदायक और कांटों के समान है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या </strong>-किसी भी कार्य को प्रारंभ करने पहले यह आत्ममंथन करना चाहिए कि हम उसके लिये या वह हमारे लिये उपयुक्त है कि नहीं।  अपनी शक्ति से अधिक का कार्य  और कोई वस्तु पाने की कामना करना स्वयं के लिये ही कष्टदायी होता है।<br />
न केवल अपनी शक्ति का बल्कि अपने स्वभाव का भी अवलोकन करना चाहिये। अनेक लोग क्रोध करने पर स्वतः ही कांपने लगते हैं तो अनेक लोग निराशा होने पर मानसिक संताप का शिकार होते हैं। अतः इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि हमारे जिस मानसिक भाव का  बोझ हमारी यह देह नहीं उठा पाती उसे अपने  मन में ही न आने दें।<br />
कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम कोई काम  या कामना करते हैं तो उस समय हमें अपनी आर्थिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति का भी अवलोकन करना चाहिये। कभी कभी गुस्से या प्रसन्नता के कारण हमारा रक्त प्रवाह तीव्र हो जाता है और हम अपने मूल स्वभाव के विपरीत कोई कार्य करने के लिये तैयार हो जाते हैं और जिसका हमें बाद में दुःख भी होता है। अतः इसलिये विशेष  अवसरों पर आत्ममुग्ध होने की बजाय आत्म चिंतन करते हुए कार्य करना चाहिए।<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p>
</div>]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[नागपंचमी-पर्यावरण के लिये सांप और नाग की रक्षा जरूरी-हिंदी आलेख hindi article on nag panchami]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/07/26/nag-panchami-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 26 Jul 2009 07:59:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज नागपंचमी है जो कि भारतीय अध्यात्म की दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद इस दिन भी ऐसे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज नागपंचमी है जो कि भारतीय अध्यात्म की दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद इस दिन भी ऐसे कर्मकांड और अंधविश्वास देखने को मिलते हैं जिनको देखकर आश्चर्य और दुःख होता है।<br />
सांप और नाग मनुष्य के ऐसे मित्र मित्र माने जाते हैं जो उसके साथ रहते नहीं है।  सांप और नागों की खूबी यह है कि उनका भोजन मनुष्य से अलग है।  आज के दिन सांप को दूध पिलाने के लिये अनेक लोग दान करते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि दूध एक तरह से सांप के लिये  विष है जो उसकी हत्या कर देता है।  सांप को वन्य प्रेमी एक तरह से संपदा मानते हैं तथा पर्यावरण विद् तो सांप प्रजातियां लुप्त होने पर निरंतर चिंता जताते आ रहे हैं।   सांप मनुष्य के भोजन के लिये पैदा होने वाली वस्तुओं को नष्ट करने वाले चूहों और कीड़ मकोड़ों को खाकर मनुष्य की रक्षा करता है।  इसके बावजूद इंसान सांप से डरता है। यह डर इतना भयानक है कि वह सांप को देखकर ही उसे मार डालता है कहीं वह दोबारा उसे रास्ते में डस न ले।  </p>
<p>आधुनिक वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि अधिकतर सांप और नाग जहरीले नहीं होते मगर हमारे देश में इसके बावजूद अनेक निर्दोष सांप और नाग इसलिये  जलाकर मार दिये जाते है  कि वह इंसान के लिये खतरा है।  यह इस देश में हो रहा है जिसमें नाग को देवता का दर्जा हासिल है और यह हमारे विचार, कथन और कर्म के विरोधाभासों को भी दर्शाता है कि हम एक दिन को छोड़कर सांप और नाग के प्रति डर का भाव रखते हैं। कहते हैं कि डर हमेशा क्रूरता को जन्म देता है और सांप के प्रति हम भारतीयों का व्यवहार इसका एक प्रमाण है।<br />
हमारे देश के अध्यात्मिक दर्शन के अनसार शेष नाग ने इस धरती को धारण कर रखा है। महाभारत काल में जब दुर्योधन ने जहर देकर भीम को नदी में फिंकवा दिया था तब सांपों ने ही उनका विष निकाला था और बाद में वह सुरक्षित बाहर आये थे।  जब वासुदेव महाराज अपने पुत्र श्रीकृष्ण के जन्म के बाद उनको वृंदावन छोड़ने जा रहे थे तब नाग ने ही उनके सिर पर रखी डलिया पर बरसात से बचाने के लिये छाया की थी।  हमारे पौराणिक ग्रंथों में कहीं भी मनुष्य द्वारा सांप को भोजन कराने या दूध पिलवाने का जिक्र नहीं आता। इसका आशय यही है कि उनका भोजन जमीन पर फिरने वाले वह जीव जंतु हैं जो कि मनुष्य के लिये एक तरह शत्रु हैं। शायद यही कारण है कि हमारे ऋषि मुनि मनुष्य को अहिंसा के लिये प्रेरित करते हैं क्योंकि सृष्टि ने उसकी देह और भोजन की रक्षा के लिये अन्य जीवों का सृजन कर दिया है जिनमें प्रमुख रूप से सांप और नाग भी शामिल है।<br />
देश में बढ़ती आबादी के साथ जंगल कम हो रहे हैं और इसलिये वन्य जीवों के लिये रहना दूभर हो गया है।  जहां नई कालोनियां बनती हैं वहां शुरुआत में सांप निकलते हैं और लोग डर के बार में उनको मार डालते हैं। अधिकतर सांप और नाग जहरीले नहीं होते हैं पर जो होते भी हैं तो वह किसी को स्वतः डसने जायें यह संभव नहीं है।  जहां तक हो सके वह इंसान से बचते हैं पर अनजाने वह उनके पास से निकल जाये तो वह भय के मारे वह डस देते हैं।  इसके विपरीत इंसान के अंदर जो वैचारिक विष है उसकी तो किसी भी विषैले जीव से तुलना ही नहीं है।  धन-संपदा, प्रतिष्ठा और बाहुबल प्राप्त होने पर वह किसी विषधर से कम नहीं रह जाता। वह उसका प्रमाणीकरण को लिये निरीह और बेबस मनुष्यों को शिकार के रूप में चुनता है। वह धन-संपदा, प्रतिष्ठा और शक्ति के शिखर पर पहुंचकर भी संतुष्ट नहीं होता बल्कि वह चाहता है कि लोग उसके सामने ही उसकी प्रशंसा करेें।<br />
सांप और नाग हमारे ऐसे मित्र हैं जो दाम मांगने हमारे सामने नहीं आते और न ही हम धन्यवाद देने उनके पास जा सकते।  वैसे भी उनकी नेकी शहर में बैठकर नहीं जानी जा सकती। वह तो खेतों और खलिहानों में चूहों तथा अन्य कीड़ों का खाकर अप्रत्यक्ष रूप से मित्रता दिखाते हैं। इस नागपंचमी पर सभी ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई। समस्त लोग प्रसन्न रहें इसकी कामना करते हुए हम यह अपेक्षा करते हैं कि वन्य प्राणियों की रक्षा के साथ पर्यावरण संतुलन बनाये रखने का उचित प्रयास करते रहें।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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