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	<title>hindi-megzine &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-megzine"</description>
	<pubDate>Sun, 06 Dec 2009 18:33:06 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-भक्ति को धंधे की तरह न करें (bhakti ko dhandha n samjhen-hindu sandesh)]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2009/11/29/bhartrihari-niti-shatak-in-hindi/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 06:25:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212; क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि </strong><br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong><br />
<strong>कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।<br />
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।</strong></p>
<p><strong></strong><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के&#160;लिए &#160;कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें। </p>
<p>वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया। </p>
<p>यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये। भक्त&#160;&#160;करते समय इस बात का विचार नहीं करना चाहिए कि कोई स्वर्ग का टिकट आरक्षित करवा रहे है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
<b>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</p>
<p></b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
</strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मानवाधिकार-व्यंग्य आलेख (manvadhikar-vyanyga chittan)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/29/manvadhikar-vyangya-chitan/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 05:58:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/29/manvadhikar-vyangya-chitan/</guid>
<description><![CDATA[वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो आदमी अपने रिश्तेदार को पानी के लिये भी नहीं पूछता। वैसे यह मानवीय प्रवृत्ति पुराने समय से है कि बिना मतलब के कोई  किसी का काम नहीं करता पर आजकल के समय में कुछ कथित समाज सेवक देखकर यह साफ लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से लाभ लिये बिना काम नहीं कर रहे हैं ।  यही स्थिति मानवाधिकार के लिये काम करने वाले लोगों और उनके संगठनों के बारे में देखी जा सकती है। हम तो सीधी बात कहें कि जब हम किसी को जनकल्याण, मानवाधिकार या किसी अन्य सार्वजनिक अभियान चलाते हुए देखते हैं तो उसके उद्ददेश्य से अधिक इस बात को जानने का प्रयास करते हैं कि वह उसके पीछे कौनसा अपना हित साध कहा है।<br />
आतंकवाद के बारे में कुछ विशेषज्ञों का स्पष्टतः मानना है कि यह एक उद्योग है जिसके सहारे अनेक दो नंबरी व्यवसाय चलते हैं।  आंकड़े इस बात का प्रमाण है कि जहां आतंकवाद दृष्टिगोचर होता है वहीं दो नंबर का व्यापार अधिक रहता है। आतंकवाद को उद्योग इसलिये कहा क्योंकि किसी नवीन वस्तु का निर्माण करने वाला स्थान ही उद्योग कहा जाता है और आतंकवाद में एक इंसान को हैवान बनाने का काम होता है।  इसी आतंकवाद या हिंसा का सहायक व्यापार मानवाधिकार कार्यक्रम लगता है।  नित अखबार और समाचार पत्र पढ़ते हुए कई प्रश्न कुछ लोगों के  दिमाग में घुमड़ते हैं।  इसका जवाब  इधर उधर ढूंढते हैं पर कहीं नहीं मिलता।  जवाब तो तब मिले जब वैसे सवाल कोई उठाये। कहने का तात्पर्य यह है सवाल करने वालों का भी टोटा है।<br />
बहरहाल एक बड़ा उद्योग या व्यवसाय अनेक सहायक व्यवसायों का भी पोषक होता है। मान लीजिये कहीं कपड़े के नये बाजार का निर्माण होता है तो उसके सहारे वहां चाय और नाश्ते की दुकानें खुल जाती हैं।  वजह यह है कि कपड़े का बाजार है पर वहां रहने वाले दुकानदार और आगंतुकों के लिये खाने पीने की व्यवस्था जरूरी है। इस तरह कपड़े का मुख्य स्थान होते हुए भी वहां अन्य सहायक व्यवसाय स्थापित हो जाते हैं। कहीं अगर बुनकरी का काम होता है तो उसके पास ही दर्जी और रंगरेज की दुकानें भी खुल जाती हैं।  यही स्थिति शायद आतंकवाद के उद्योग के साथ है। जहां इसका प्रभाव बढ़ता है वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता अधिक सक्रिय हो जाते हैं।  उनकी यह बात हमें बकवाद लगती है कि वह केवल स्व प्रेरणा की वजह से यह काम कर रहे हैं।  यह ऐसे ही जैसे कपड़े की बाजार के पास कोई चाय की दुकान खोले और कहे कि ‘मैं तो यहां आने वाले व्यापारियों की सेवा करने आया हूं।’<br />
ऐसे अनेक निष्पक्ष विशेषज्ञ हैं जो भले ही साफ न कहते हों पर विश्व भर में फैले आतंकवाद के पीछे काम कर रहे आर्थिक तत्वों का रहस्ययोद्घाटन करते हैं पर वह  समाचार पत्रों में अंदर के कालम में छपते हैं और फिर उन पर कोई अधिक नहीं लिखता क्योंकि विश्व भर में बुद्धिजीवियों को तो जाति, भाषा, धर्म, और क्षेत्र के नाम पर फैल रहे आतंकवाद की सच्चाई पर ध्यान देने की बजाय उसके कथित विषयों पर अनवरत बहस करनी होती है।  अगर वह इस सच को एक बार मान लेंगे कि इसके पीछे दो नंबर का धंधा चलाने वाले किसी न किसी रूप से अपना आर्थिक सहयोग इसलिये देते हैं ताकि प्रशासन का ध्यान बंटे और उनका काम चलते रहे, तो फिर उनके लिये बहस की गुंजायश ही कहां बचेगी? फिर मानवाधिकार कार्यकताओं का काम भी कहां बचेगा, जिसके सहारे अनेक लोग मुफ्त का खाते हैं बल्कि प्रचार माध्यमों को अपने कार्यक्रमों की जगह भरने के लिये अपने शब्द और चेहरा भी प्रस्तुत करते हैं।<br />
शक की पूरी गुंजायश है और यह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में छपी सामग्री पर थोड़ा भी चिंतन करें तो वह पुख्ता भी हो जाता है।  यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मानवाधिकारों का हनन हो रहा है।  ऐसा कोई भी गांव या शहर नहीं है जो इससे मुक्त हो। अलबत्ता घटना केवल उन्हीं जगहों की सामने आती हैं जिनको प्रचार माध्यम इन्हीं मानवाधिकार कार्यकताओं के सहारे प्राप्त करते हैं।<br />
आप जरा ध्यान से अखबार पढ़ें कि भारत के मध्य क्षेत्र में ऐसे अनेक एनकांउटर होते हैं जिनमें किसी कुख्यात अपराधी को मार दिया जाता है।  उस पर उसके परिवार वाले विरोध भी जताते हैं पर वहां कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता या संगठन सक्रिय नहीं होता क्योंकि इसके लिये उनको कोई प्रायोजक नहीं मिलता। प्रायोजक तो वहीं मिलेगा जहां से आय अच्छी होती हो।  सीमावर्ती क्षेत्रों से तस्करी और घुसपैठ को लेकर अनेक संगठन कमाई करते हैं और इसलिये वहां आतंकवादियों की सक्रियता भी रहती है।  इसलिये वहां सुरक्षाबलों से उनकी मुठभेड भी होती है जिसमें लोग मारे जाते हैं। मानवाधिकर कार्यकर्ता वहां एकदम सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता पर कोई आपत्ति नहीं है पर मध्य क्षेत्र में उनकी निष्क्रियता संदेह पैदा करती है।  पूर्वी क्षेत्र को लेकर इस समय हलचल मची हुई है।  हिंसक तत्व वहां की प्राकृत्तिक संपदा का दोहन करने का आरोप लगाते हुए सक्रिय हैं। वह अनेक बार अनेक सामान्य सशस्त्र कर्मियों को मार देते हैं पर इन हिंसक तत्वों में कोई मरता है तो मानवाधिकार कार्यकर्ता उसका नाम लेकर चिल्लाते हैं।  सवाल यह है कि क्या यह मानवाधिकार कार्यकर्ता यह मानते हैं कि सामान्य सुरक्षा अधिकारी या कर्मचारी का तो काम ही मरना है। उसका तो कोई परिवार ही नहीं है।  उसके लिये यह कभी आंसु नहीं बहाते।<br />
कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि अगर कहीं संसाधनों के वितरण को लेकर हिंसा हो रही है तो वह इसलिये नहीं कि आम आदमी तक उसका हिस्सा नहीं पहुंच रहा बल्कि यह कि उसका कुछ हिस्सा हिंसक तत्व स्वयं अपने लिये चाहते हैं।  इसके अलावा यह हिंसक तत्व आर्थिक क्षेत्र की आपसी प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे को निपटाने के काम भी आते हैं<br />
इसके बाद भी एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कुछ लोगों ने तो बड़ी बेशर्मी से खास जाति, भाषा और धर्म के समूह पकड़ कर उनके मानवाधिकारों के हनन का प्रचार कर रखा है।  इसमें भी उनका स्वार्थ दिखाई देता है।  इनमें अगर जातीय या भाषाई समूह हैं तो उनका धरती क्षेत्र ऐसा है जो धन की दृष्टि से उपजाऊ और धार्मिक है तो उसके लिये कहीं किसी संस्था से उनको अप्रत्यक्ष रूप से पैसा मिलता है-उनकी गतिविधियां यही संदेह पैदा करती हैं।  इधर फिर कुछ ऐसे देश अधिक धनवान हैं जो धर्म पर आधारित शासन चलाते हैं और उनके शासनध्यक्षों से कृपा पाने के लिये कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता उनके धर्म की पूरे विश्व में बजा रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यह मानवाधिकार कार्यक्रम चलाने वाले जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र की दृष्टि से बंटे समाज में ऐसे छिद्र ढूंढते हैं जिनको बंद करने का प्रयास सुधारक करते हैं।<br />
अखबार में एक नहीं अनेक ऐसी खबरें छपती हैं जिनमें मानवाधिकार हनन का मामला साफ बनता है पर वहां कार्यकर्ता लापता होते हैं।  कल एक ब्लाग में पढ़ने को मिला जिसमें बताया कि सरकार ने धारा 498-ए के तहत मामले छानबीन के बाद दर्ज करने का आदेश जारी किया है क्योंकि पाया गया कि इसमें फर्जी मामले दर्ज हुए और शिकायत में ढेर सारे नाम थे पर छानबीन के बाद जांच एजेंसियों ने पैसा खाकर कुछ लोगों को छोड़ा। इतना ही नहीं कई में तो शिकायत ही झूठी पायी गयी।  इससे अनेक लोगों को परेशानी हुई। इस तरह के कानून से हमारे भारतीय समाज के कितने लोगों को परेशानी झेलनी पड़ी है इस पर कथित रूप से कोई मानवाधिकार संगठन कभी कुछ नहीं बोला। सरकार ने स्वयं ही यह काम किया।  यह कैसे मान लें कि सरकार समाज का दर्द नहीं जानती। मानवाधिकार कार्यकर्ता तो केवल चिल्लाते हैं पर सरकार अपना काम करती है,यह इसका प्रमाण है<br />
सच तो हम नहीं जानते। अखबार और टीवी के समाचारों के पीछे अपने चिंत्तन के घोड़े दौड़ाते है-हमारे गुरु जी का भी यही संदेश है- तब यही सवाल हमारे दिमाग में आते हैं। दूसरा हमारा फार्मूला यह है कि आज कल कोई भी आदमी बिना स्वार्थ के समाज सेवा नहीं करता। फिर उनके चेहरे भी बताते हैं कि वह कितने निस्वार्थी होंगे।  हम ब्रह्मा तो हैं नहीं कि सब जानते हों। हो सकता है कि हमारी सोच में ही कमी हो। एक आम लेखक के रूप में यही अभिव्यक्ति दिखी, व्यक्त कर दी।<br />
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
</b><br />
<strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लायकी से अधिक मिले तो घमंड आ ही जाता है-विदुर नीति-(yogyata aur ghamand-hindu sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/28/layiki-aur-ghamand-vidur-nigi/</link>
<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 05:14:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/28/layiki-aur-ghamand-vidur-nigi/</guid>
<description><![CDATA[कौटिल्य महाराज के अनुसार &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;- उच्चेरुच्च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><span style="font-size:small;"><strong>कौटिल्य महाराज के अनुसार </strong></span><br />
<span style="font-size:small;"><strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</strong></span><br />
<strong></strong><strong>उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदन्यायच्छतै महान्।<br />
नवैनींचैस्तरां याति निपातभयशशकया।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने वाला व्यक्ति महान पद् पर तो विराजमान हो जाता है पर उससे नीचे गिरने की भय और आशंका से वह नैतिक आधार पर नीचे से नीचे गिरता जाता है।<br />
<strong>प्रमाणश्चधिकश्यापि महत्सत्वमधष्ठितः।<br />
पदं स दत्ते शिरसि करिणः केसरी यथा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>प्रमाणित योग्यता से अधिक पद की इच्छा करने वाला व्यक्ति भी उस महापद पर विराजमान हो जाता है उसी प्रकार जैसे सिंह हाथी पर अधिष्ठित हो जाता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>समाज के सभी क्षेत्रों में शिखर पर विराजमान पुरुषों से सामान्य पुरुष बहुत सारी अपेक्षायें करते हैं। वह उनसे अपेक्षा करते हैं कि आपात स्थिति में उनकी सहायता करें। ज्ञानी लोग ऐसी अपेक्षा नहीं करते क्योंकि वह जानते हैं कि शिखर पर आजकल कथित बड़े लोग कोई सत्य या योग्यता की सहायता से नहीं पहुंचते वरन कुछ तो तिकड़म से पहुंचते हैं तो कुछ धन शक्ति का उपयोग करते हुए। ऐसे लोग स्वयं ही इस चिंता से दीन अवस्था में रहते हैं कि पता नहीं कब उनको उस शिखर से नीचे ढकेल दिया जाये। चूंकि उच्च पद पर होते हैं इसलिये समाज कल्याण का ढकोसला करना उनको जरूरी लगता है पर वह इस बात का ध्यान रखते हैं कि उससे समाज का कोई अन्य व्यक्ति ज्ञानी या शक्तिशाली न हो जाये जिससे वह शिखर पर आकर उनको चुनौती दे सके। उच्च पद या शिखर पर बैठे लोग डरे रहते हैं और डर हमेशा क्रूरता को जन्म देता है। यही क्रूरता ऐसे शिखर पुरुषों को निम्न कोटि का बना देती है अतः उनमें दया या परोपकार का भाव ढूंढने का प्रयास नहीं करना चाहिए।<br />
यही हाल उन लोगों का भी है जिनको योग्यता से अधिक सम्मान या पद मिल जाता है। मायावी चक्र में सम्मान और पद के भूखे लोगों से ज्ञानी होने की आशा करना व्यर्थ है। उनको तो बस यही दिखाना है कि वह जिस पद पर हैं वह अपनी योग्यता के दम पर हैं और इसलिये वह बंदरों वाली हरकतें करते हैं। अपनी अयोग्यता और अक्षमता उनको बहुत सताती है इसलिये वह बाहर कभी मूर्खतापूर्ण तो कभी क्रूरता पूर्ण हरकतें कर समाज को यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वह योग्य व्यक्ति हैं। ऐसे लोगों की योग्यता को अगर कोई चुनौती दे तो वह उसे अपने पद की शक्ति दिखाने लगते हैं। अपनी योग्यता से अधिक उपलब्धि पाने वाले ऐसे लोग समाज के विद्वानों, ज्ञानियों और सज्जन पुरुषों को त्रास देकर शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। वह अपने मन में अपनी अयोग्यता और अक्षमता से उपजी कुंठा इसी तरह बाहर निकालते हैं। अतः जितना हो सके ऐसे लोगों से दूर रहा जाये। कहा भी जाता है कि घोड़े के पीछे और राजा के आगे नहीं चलना चाहिये।<br />
आजकल हम जब किसी बड़े पदासीन व्यक्ति को देखते हैं तो यह भी नहीं समझना चाहिए कि वह कोई अधिक योग्य है क्योंकि अनेक ऐसे लोग जो अपनी योग्यता से अधिक का पद पाने&#160;&#160;की कामना कहते हैं वह येनकेन प्रकरेन उस पद पर पहुँच जाते है,या &#160;फिर दूसरे लोग मुखौटे की तरह उनको वहां बिठा देते हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#160; </p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अश्लीलता और श्लीतता में अंतर-हिंदी  हास्य व्यंग्य कविताएँ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/22/shlilata-hindi-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 14:20:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/22/shlilata-hindi-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अश्लीलता और श्लीतता में अंतर कितना रह गया है बस छह इंच के कपड़े का। क्यों इतना रोज छोड़ मचता है खत्म क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अश्लीलता और श्लीतता में<br />
अंतर कितना रह गया है<br />
बस छह इंच के कपड़े का।<br />
क्यों इतना रोज छोड़ मचता है<br />
खत्म कर दो हर कायदा<br />
कोई पहने या न पहने<br />
लगा दो एक नारा चौराहे पर<br />
अपनी इज्जत की रक्षा खुद करें<br />
दूसरे में तब देखें<br />
पहले अपनी आंखों में शर्म भरें<br />
नहीं मिलेगा कोई पहरेदार<br />
आपनी आबरू के लिये बनो खुद्दार<br />
और भी जमाने में मुसीबतें हैं<br />
नहीं करेगा कोई कायदा हिफाजत<br />
हल खुद ही करो पहनावे के लफड़ा।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
निर्देशक ने अपनी फिल्म के<br />
कपड़ा निर्देशक से<br />
चर्चा करते हुए कहा<br />
‘भई, यह कम बजट की फिल्म है<br />
इसलिये अधिक पैसे की उम्मीद नहीं करना।<br />
इसमें केवल नायक के कपड़े ही<br />
अधिक बनाने होंगे<br />
नायिका तो पूरी फिल्म में छह इंच के ही<br />
वस्त्र धारण करेगी<br />
कभी कभी एक फुट का भी वेश धरेगी<br />
इसलिये अपने अनुबंध में<br />
कपड़ों की राशि कम से कम भरना।</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<strong>कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<blockquote><p>
<strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नई पीढ़ी को मौक़ा-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/21/nayi-peedhi-ko-mauka-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 13:43:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/21/nayi-peedhi-ko-mauka-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अपने विरोधी पर शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा ‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं लोग भी अब उनके च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अपने विरोधी पर<br />
शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा<br />
‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं<br />
लोग भी अब उनके चेहरे से थके हैं<br />
नया चेहरा सामने नहीं आने देते<br />
जहां मौका मिलता वहीं<br />
अपने लिये हाथ फैला लेते हैं।<br />
हमें देखो<br />
अब तो सब छोड़ दिया है<br />
नये चेहरों को जनता से जोड़ दिया है<br />
बेटी को सौंप दिया है<br />
पत्रकारिता का जिम्मा<br />
बेटे को की जनसेवा की विरासत<br />
अब  हमारे घर में<br />
कोई नहीं बचा युवा पीढ़ी में निकम्मा<br />
हम तो करते हैं<br />
महापुरुषों का अनुसरण<br />
जो नयी पीढ़ी को आगे आने का मौका देते हैं।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://anant-shabd.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<b><a href="http://bharatdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</b></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लोग अपने से बात करते हुए पाठ अंतर्जाल पर पढ़ना चाहते हैं-संपादकीय]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/17/logon-se-apni-bat-hindi-editorial/</link>
<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 15:32:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/17/logon-se-apni-bat-hindi-editorial/</guid>
<description><![CDATA[आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक संपादक के दिलचस्प संस्मरण जुड़े हुए हैं।  यह ब्लाग जब बनाया तब लेखक का छठा ब्लाग था। उस समय दूसरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर यूनिकोड में न रखकर सामान्य देव फोंट में रचनाएं लिख रहा था। वह किसी के समझ में  नहीं आते थे।  ब्लाग स्पाट के हिंदी ब्लाग से केवल शीर्षक ले रहा था।  इससे हिन्दी ब्लाग लेखक उसे सर्च इंजिन में पकड़ रहे थे पर बाकी पाठ उनकी समझ में नहीं आ रहा था। यूनिकोड में रोमन लिपि में लिखना इस लेखक के लिये कठिन था।  एक ब्लाग लेखिका ने पूछा कि ‘आप कौनसी भाषा में लिख रहे हैं, पढ़ने में नहीं आ रहा।’ उस समय इस ब्लाग पर छोटी क्षणिकायें रोमन लिपि से यूनिकोड में हिन्दी में लिखा इस पर प्रकाशित की गयीं।  कुछ ही मिनटों में किसी अन्य ब्लाग लेखिका ने इस पर अपनी टिप्पणी भी रखी।  इसके बावजूद यह लेखक रोमन लिपि में यूनिकोड हिंदी लिखने को तैयार नहीं था।  बहरहाल लेखिका को इस ब्लाग का पता दिया गया और उसने बताया कि इसमें लिखा समझ में आ रहा है। उसके बाद वह लेखिका फिर नहीं दिखी पर लेखक ने तब यूनिकोड हिन्दी में लिखना प्रारंभ किया तब धीरे धीरे बड़े पाठ भी लिखे। </p>
<p>उसके बाद तो बहुत अनुभव हुए। यह ब्लाग प्रारंभ से ही पाठकों को प्रिय रहा है।  यह ब्लाग तब भी अधिक पाठक जुटा रहा था जब इसे एक जगह हिन्दी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों  का समर्थन नहीं मिलता था। आज भी यहां पाठक सर्वाधिक हैं और एक लाख की संख्या इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी अपनी गति से अंतर्जाल पर बढ़ रही है।  मुख्य बात है विषय सामग्री की।  इस ब्लाग पर अध्यात्मिक रचनाओं के साथ व्यंग, कहानी, कवितायें भी हैं।  हास्य कवितायें अधिक लोकप्रिय हैं पर अध्यात्मिक रचनाओं की तुलना किसी भी अन्य विधा से नहीं की जा सकती।  लोगों  की अध्यात्मिक चिंतन की प्यास इतनी है कि उसकी भरपाई कोई एक लेखक नहीं कर सकता।  इसके बाद आता है हास्य कविताओं का।  यकीनन उनका भाव आदमी को हंसने को मजबूर करता है। हंसी से आदमी का खून बढ़ता है।  दरअसल एक खास बात नज़र आती है वह यह कि यहां लोग समाचार पत्र, पत्रिकाओं तथा किताबों जैसी रचनाओं को अधिक पसंद नहीं करते।   इसके अलावा क्रिकेट, फिल्म, राजनीति तथा साहित्य के विषय में परंपरागत विषय सामग्री, शैली तथा विधाओं से उन पर प्रभाव नहीं पड़ता।  वह अपने से बात करती हुऐ पाठ पढ़ना चाहते हैं।  अंतर्जाल पर लिखने वालों को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि उनको अपनी रचना प्रक्रिया की नयी शैली और विधायें ढूंढनी होंगी।  अगर लोगों को राजनीति, क्रिकेट, फिल्म, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषयों पर परंपरागत ढंग से पढ़ना हो तो उनके लिये अखबार क्या कम है? अखबारों जैसा ही यहां लिखने पर उनकी रुचि कम हो जाती है। हां, यह जरूर है कि अखबार फिर यहां से सामग्री उठाकर छाप देते हैं। कहीं नाम आता है कहीं नहीं।  इस लेखक के गांधीजी तथा ओबामा पर लिखे गये दो पाठों का जिस तरह उपयेाग एक समाचार पत्र के स्तंभकार ने किया वह अप्रसन्न करने वाला था।  एक बात तय रही कि उस स्तंभकार के पास अपना चिंतन कतई नहीं था। उसने इस लेखक के  तीन पाठों से अनेक पैरा लेकर छाप दिये।  नाम से परहेज! उससे यह लिखते हुए शर्म आ रही थी कि ‘अमुक ब्लाग लेखक ने यह लिखा है’।  सच तो यह है कि इस लेखक ने अनेक समसामयिक घटनाओं पर चिंतन और आलेख लिखे पर उनमें किसी का नाम नहीं दिया। उनको संदर्भ रहित लिखा गया इसलिये कोई समाचार पत्र उनका उपयोग नहीं कर सकता  क्योंकि समसामयिक विषयों पर हमारे प्रचार माध्यमों को अपने तयशुदा नायक और खलनायकों पर लिखी सामग्री चाहिये। इसके विपरीत यह लेखक मानता है कि प्रकृत्तियां वही रहती हैं जबकि घटना के नायक और खलनायक बदल जाते हैं। फिर समसामयिक मुद्दों पर क्या लिखना? बीस साल तक उनको बने रहना है इसलिये ऐसे लिखो कि बीस साल बाद भी ताजा लगें-ऐसे में किसी का नाम देकर उसे बदनाम या प्रसिद्ध करने<br />
से अच्छा है कि अपना नाम ही करते रहो।<br />
मुख्य बात यह है कि लोग अपने से बात करते हुऐ पाठ चाहते हैं। उनको फिल्म, राजनीति, क्रिकेट तथा अन्य चमकदार क्षेत्रों के प्रचार माध्यमों द्वारा निर्धारित पात्रों पर लिख कर अंतर्जाल पर प्रभावित नहीं किया जा सकता।  अपनी रचनाओं की भाव भंगिमा ऐसी रखना चाहिये जैसी कि वह पाठक से बात कर रही हों। यह जरूरी नहीं है कि पाठक टिप्पणी रखे और रखे तो लेखक उसका उत्तर दे।  पाठक को लगना चाहिये कि जैसे कि वह अपने मन बात उस पाठ में पढ़ रहा है या वह पाठ पढ़े तो वह उसके मन में चला जाये।  अगर वह परंपरागत लेखन का पाठक होता तो फिर इस अंतर्जाल पर आता ही क्यों?  अपने मन की बात ऐसे रखना अच्छा है जैसे कि सभी को वह अपनी लगे।<br />
इस अवसर पर बस  इतना ही। हां, जिन पाठकों को इस लेखक के समस्त ब्लाग/पत्रिकाओं का संकलन देखना हो वह <a href="http://anant-shabd.blogspot.com">हिन्द केसरी पत्रिका</a> को अपने यहां सुरक्षित कर लें। इस पत्रिका के पाठकों के लिये अब इस पर यह प्रयास भी किया जायेगा कि ऐसे पाठ लिखे जायें जो उनसे बात करते हुए लगें। </p>
<div><strong><font size="5">लेखक संपादक दीपक भारतदीप,ग्वालियर&#160;</font></strong></div>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समन्दर पीने से भी प्यास नहीं बुझेगी (samandar se bhee pyas nahin bujhegee)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/15/samandar-aur-pyasa-hindi-article-and-poem/</link>
<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 12:13:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/15/samandar-aur-pyasa-hindi-article-and-poem/</guid>
<description><![CDATA[सभी लोग हमेशा दूसरे के सुख देखकर मन में अपने लिये उसकी कमी का विचार करते हुए अपने को दुःख देते हैं। ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सभी लोग हमेशा दूसरे के सुख देखकर मन में अपने लिये उसकी कमी का विचार करते हुए अपने को दुःख देते हैं।  दूसरे का दुःख देकर अपने आपको यह संतोष देते हैं कि वह उसके मुकाबले अधिक सुखी हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि लोग बहिर्मुखी जीवन व्यतीत करते हैं और अपने बारे में उनके चिंतन के आधार बाह्य दृश्यों से प्रभावित होते हैं।  यह प्रवृत्ति असहज भाव को जन्म देती है।  इसके फलस्वरूप लोग अपनी बात ही सही ढंग से सही जगह प्रस्तुत नहीं करते।  अनेक जगह इसी बात को लेकर विवाद पैदा होते हैं कि अमुक ने यह इस तरह कहा तो अमुक ने गलत समझा।  आप अगर देखें तो कुदरत ने सभी को जुबान दी है पर सभी अच्छा नहीं बोलकर नहीं कमाते।  सभी को स्वर दिया है पर सभी गायक नहीं हो जाते।   भाषा ज्ञान सभी को है पर सभी लेखक नहीं हो जाते।  जिनको अपने जीवन के विषयों का सही ज्ञान होता है तथा जो अपने गुण और दुर्गुण को समझते हैं वही आगे चलकर समाज के शिखर पर पहुंचते हैं।  इस संदर्भ में दो कवितायें प्रस्तुत हैं।<br />
<b>सोचता है हर कोई<br />
पर अल्फाजों की शक्ल और<br />
अंदाज-ए-बयां अलग अलग होता है<br />
बोलता है हर कोई<br />
पर अपनी आवाज से हिला देता है<br />
आदमी पूरे जमाने को<br />
कोई बस रोता है।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
पी लोगे सारा समंदर भी<br />
तो तुम्हारी प्यास नहीं जायेगी।<br />
ख्वाहिशों के पहाड़ चढ़ते जाओ<br />
पर कहीं मंजिल नहीं आयेगी।<br />
रुक कर देखो<br />
जरा कुदरत का करिश्मा<br />
इस दुनियां में<br />
हर पल जिंदगी कुछ नया सिखायेगी।<br />
__________________________</b></p>
<p><b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p><strong>यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://teradipak.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a>पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
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</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किताबों में लिखे शब्द दुनियां नहीं चलाते-व्यंग्य कविता (kitab,shabd aur duniya-vyangya kavita)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/12/shabda-ke-duniyan-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 15:37:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/12/shabda-ke-duniyan-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[किताबों में लिखे शब्द कभी दुनियां नहीं चलाते। इंसानी आदतें चलती अपने जज़्बातों के साथ कभी रोना कभी ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>किताबों में लिखे शब्द<br />
कभी दुनियां नहीं चलाते।<br />
इंसानी आदतें चलती<br />
अपने जज़्बातों के साथ<br />
कभी रोना कभी हंसना<br />
कभी उसमें बहना<br />
कोई फरिश्ते आकर नहीं बताते।</p>
<p>ओ किताब हाथ में थमाकर<br />
लोगों को बहलाने वालों!<br />
शब्द दुनियां को सजाते हैं<br />
पर खुद कुछ नहीं बनाते<br />
कभी खुशी और कभी गम<br />
कभी हंसी तो कभी गुस्सा आता<br />
यह कोई करना नहीं सिखाता<br />
मत फैलाओं अपनी  किताबों में<br />
लिखे शब्दों से जमाना सुधारने का वहम<br />
किताबों की कीमत से मतलब हैं तुम्हें<br />
उनके अर्थ जानते हो तुम भी कम<br />
शब्द समर्थ हैं खुद<br />
ढूंढ लेते हैं अपने पढ़ने वालों को<br />
गूंगे, बहरे और लाचारा नहीं है<br />
जो तुम उनका बोझा उठाकर<br />
अपने फरिश्ते होने का अहसास जताते।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
<b>कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-क्षमा करती है कवच की तरह काम]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/10/hindu-adhyatmik-sandesh-kshama-kavach-hai/</link>
<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 04:02:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/10/hindu-adhyatmik-sandesh-kshama-kavach-hai/</guid>
<description><![CDATA[क्षान्तिश्चत्कवचेन किं किमनिरभिः क्रोधीऽस्ति चेद्दिहिनां ज्ञातिश्चयेदनलेन किं यदि सहृदद्दिव्यौषधं कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>क्षान्तिश्चत्कवचेन किं किमनिरभिः क्रोधीऽस्ति चेद्दिहिनां ज्ञातिश्चयेदनलेन किं यदि सहृदद्दिव्यौषधं किं फलम्।<br />
किं सर्पैयीदे दुर्जनाः किमु धनैर्विद्याऽनवद्या चदि व्रीडा चेत्किमुभूषणै सुकविता यद्यपि राज्येन किम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</b>यदि क्षमा हो तो किसी कवच की आवश्यकता नहीं है। यदि मन में क्रोध है तो फिर किसी शत्रु की क्या आवश्यकता? यदि मंत्र है तो औषधियो की आवश्यकता नहीं है। यदि अपने दुष्ट की संगत कर ली तो सांप की क्या कर लेगा? विद्या है तो धन की मदद की आवश्यकता नहीं। यदि लज्जा है तो अन्य आभूषण की आवश्यकता नहीं है।<br />
<b>वर्तमान में संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</b> ध्यान दें तो भर्तृहरि महाराज ने पूरा जीवन सहजता से व्यतीत करने वाला दर्शन प्रस्तुत किया है।  अगर आदमी विनम्र हो और दूसरे के अपराधों को क्षमा करे तो उसे कहीं से खतरा नहीं रहता। जैसा कि हम देख रहे हैं कि आजकल अस्त्र शस्त्र रखने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है।  इसका कारण यह है कि लोगों का विश्वास अपने ऊपर से उठ गया है।  अपने छोटे छोटे विवादों के बड़े हमले में परिवर्तित होने का भय उनको रहता है इसलिये ही लोग हथियार रखते हैं।  उनको यह भी विश्वास है कि वह किसी को क्षमा नहीं करते इसलिये उनके क्रोध या हिंसा का शिकार कभी भी उन पर हमला कर सकता है। जिन लोगों में क्षमा का भाव है वह किसी प्रकार की आशंका से रहित होकर जीवन व्यतीत करते हैं।  क्षमा का भाव होता है तो क्रोध का भाव स्वतः ही दूर रहता है।  ऐसे में अन्य कोई शत्रु नहीं होता जिससे आशंकित होकर हम अपनी सुरक्षा करें। </p>
<p>उसी तरह अपनी संगत का भी ध्यान रखना चाहिये। जिनकी सामाजिक छबि खराब है उनसे दूर रहें इसी में अपना हित समझें।  वैसे आजकल तो हो यह रहा है कि लोग दादा और गुंडा टाईप के लोगों से मित्रता करने में अपनी इज्जत समझते हैं मगर सच तो यह है कि ऐसे लोग उसी व्यक्ति को तकलीफ देते हैं जो उनको जानता है।  इसके अलावा अपने दोस्तों से रुतवे के बदल अच्छी खासी कीमत भी वसूल करते हैं भले ही उनका कोई काम नहीं करते हों पर भविष्य में सहयोग का विश्वास दिलाते हैं। देखा यह गया है कि दुष्ट लोगों की संगत हमेशा ही दुःखदायी होती है।<br />
अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रतिदिन योग साधना के साथ अगर मंत्र जाप करें तो फिर आप औषधियों के नाम जानने का भी प्रयास न करें। राह चलते हुए फाईव स्टार टाईप के अस्पताल देखकर भी आपको यह ख्याल नहीं आयेगा कि कभी आपको वहां आना है।<br />
जहां तक हो सके अच्छी बातों का अध्ययन और श्रवण करें ताकि समय पड़ने पर आप अपनी रक्षा कर सकें। याद रखिये जीवन में रक्षा के लिये ज्ञान सेनापति का काम करता है। अगर आपके पास धन अल्प मात्रा में है और ज्ञान अधिक मात्रा में तो निश्चिंत रहिये।<br />
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
</b><br />
<blockquote>
<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[योगासन,  प्राणायाम, ध्यान और धारणा-हिन्दी लेख (hindi lekh on yogasan)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/10/yogasan-dhyam-aur-pranayam-hindi-article/</link>
<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 03:56:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/10/yogasan-dhyam-aur-pranayam-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[प्राचीन भारतीय योग साधना पद्धति की तरफ पूरे विश्व का रुझान बढ़ना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। आज से द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>प्राचीन भारतीय योग साधना पद्धति की तरफ पूरे विश्व का रुझान बढ़ना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। आज से दस वर्ष पूर्व तक अनेक लोग योगसाधना को अत्यंत गोपनीय या असाधारण बात समझते थे। ऐसी धारणा बनी हुई थी कि योग साधना सामान्य व्यक्ति के करने की चीज नहीं है। इसका कारण यह था कि शरीर के लिये विलासिता की वस्तुओं का उपभोग बहुत कम था और लोग शारीरिक श्रम के कारण बीमार कम पड़ते थे।<br />
आज की नयी पीढ़ी के लोगों जहां भी वाहन का स्टैंड देखते हैं वहां पर पैट्रोल चालित वाहनों को अधिक संख्या में देखते हैं  जबकि पुरानी पीढ़ी के लोगों के अनुभव इस बारे में अलग दिखाई देते हैं।   पहले इन्हीं स्टैंडों पर साइकिलें खड़ी मिलती थीं। सरकारी कार्यालय, बैंक, सिनेमाघर तथा उद्यानों के बाहर साइकिलों की संख्या अधिक दिखती थी।  फिर स्कूटरों की संख्या बढ़ी तो अब कारों के काफिले सभी जगह मिलते हैं।  पहले जहां रिक्शाओं, बैलगाड़ियों तथा तांगों की वजह से जाम लगा देखकर मन में क्लेश होता था वहीं अब कारें यह काम करने लगी हैं-यह अलग बात है कि गरीब वाहन चालकों को लोग इसके लिये झिड़क देते थे पर अब किसी की हिम्मत नहीं है कार वाले से कुछ कह सके। </p>
<p>योगसाधना की शिक्षा बड़े लोगों का शौक माना जाता था। यह सही भी लगता है क्योंकि परंपरागत वाहनों तथा साइकिल चलाने वालों का दिन भर व्यायाम चलता था।  उनकी थकान उनको रात को चैन की नींद का उपहार प्रदान करती थी।  उस समय ज्ञानी लोगों का इस तरफ ध्यान नहीं गया कि लोगों को योगासन से अलग प्राणायाम तथा ध्यान की तरफ प्रेरित किया जाये।  संभवतः योगासाधना के आठों अंगों में से पृथक पृथक सिखाने का विचार किसी ने नहीं किया। अब जबकि विलासिता पूर्ण जीवन शैली है तब योगसाधना की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव की जा रही है तो उसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए।  पहले जब लोग पैदल अधिक चलने के साथ ही परिश्रम करते थे इसलिये उनका स्वास्थ्य सदैव अच्छा रहता था । बाद में साइकिल युग के चलते भी लोगों के स्वास्थ्य में शुद्धता बनी रही।  फिर योग साधना को केवल राजाओं, ऋषियों और धनिकों के लिये आवश्यक इसलिये भी माना गया क्योंकि वह शारीरिक श्रम कम करते थे जबकि बदलते समय के साथ इसे जनसाधारण में प्रचारित किया जाना चाहिये था।  भले ही शारीरिक श्रम से लोगों का लाभ होता रहा है पर प्राणायाम  से जो मानसिक लाभ की कल्पना किसी ने नहीं की।  श्रमिक तथा गरीब वर्ग के लिये  योगासन के साथ प्राणायाम  और ध्यान का भी  महत्व अलग अलग रूप से प्रचारित किया जाना जरूरी लगता है।  यह बताना जरूरी है कि जो लोग शारीरिक श्रम के कारण रात की नींद आराम से लेते हैं उनको भी जीवन का आनंद उठाने के लिये प्राणायाम और ध्यान करना चाहिये। </p>
<p>अब योग साधना के आठ भाग देखकर तो यही लगता है कि उसके आठ अंगों को -यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-एक पूरा कार्यक्रम मानकर देखा गया। सच तो यह है कि जो लोग परिश्रम करते हैं या सुबह सैर करके आते हैं उनको नियम, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि जैसे अन्य सात अंगों का भी अध्ययन करना चाहिये।  योगासन या सुबह की सैर के बाद प्राणायम और ध्यान की आदत डालना श्रेयस्कर है। जो लोग गरीब, मजदूर तथा अन्य शारीरिक श्रम करते हैं उनके लिये भी प्राणायाम के साथ ध्यान बहुत लाभप्रद है। इस बात का प्रचार बहुत पहले ही होना चाहिये था इसलिये  अब इस पर भी इस पर काम होना चाहिये।<br />
प्राणायाम  से प्राणवायु तीव्र गति से अंदर जाकर शरीर और मन के विकारों को परे करती है।  उसी तरह ध्यान भी योगासन और प्राणायाम के बाद प्राप्त शुद्धि को पूरी देह और मन में वितरित करने की एक प्रक्रिया है।  जब कभी आप थक जायें और सोने की बजाय आंखें बंद कर केवल बैठें और अपने ध्यान को भृकुटि पर केंद्रित करके देखें।  शुरुआत में आराम नहीं मिलेगा पर पांच दस मिनट बाद आप को अपने शरीर और मन में शांति अनुभव होगी।  जैसे मान लीजिये आप किसी समस्या से परेशान हैं। वह उठते बैठते आपको परेशान करती है।  आप ध्यान लगा कर बैठें।  समस्या हल होना एक अलग मामला है पर ध्यान के बाद उससे उपजे तनाव से राहत अनुभव करेंगे।  सच बात तो यह है कि हम अपने दिमाग और शरीर को बहुत खींचते हैं और उसको बिना ध्यान के विराम नहीं मिल सकता।  यह को व्यायाम नहीं है एक तरह से पूर्णाहुति है उस यज्ञ की जो हम अपनी देह के लिये करते हैं। शेष फिर कभी। </b><br />
<b>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://terahdeep.blogspot.com</p>
<p></b>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जमाने की चाहत-हास्य हिंदी कविता ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2009/11/07/zamane-ki-chahat-hindi-sahitya-kavita/</link>
<pubDate>Sat, 07 Nov 2009 07:45:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2009/11/07/zamane-ki-chahat-hindi-sahitya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[सुनते हैं मरते समय रावण ने राम का नाम जपा इसलिये पुण्य कमाने के साथ स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया। ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>सुनते हैं मरते समय<br />
रावण ने राम का नाम जपा<br />
इसलिये पुण्य कमाने के साथ<br />
स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया।<br />
उसके भक्त भी लेते<br />
राम का नाम पुण्य कमाने के वास्ते,<br />
हृदय में तो बसा है सभी के<br />
सुंदर नारियों को पाने का सपना<br />
चाहते सभी मायावी हो महल अपना<br />
चलते दौलत के साथ शौहरत पाने के रास्ते,<br />
मुख से लेते राम का नाम<br />
हृदय में रावण का वैभव बसता<br />
बगल में चलता उसका साया।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
गरीब और लाचार से<br />
हमदर्दी तो सभी दिखाते हैं<br />
इसलिये ही बनवासी राम भी<br />
सभी को भाते हैं।<br />
उनके नायक होने के गीत गाते हैं।<br />
पर वैभव रावण जैसा हो<br />
इसलिये उसकी राह पर भी जाते हैं।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
पूरा जमाना बस यही चाहे<br />
दूसरे की बेटी सीता जैसी हो<br />
जो राजपाट पति के साथ छोड़कर वन को जाये।<br />
मगर अपनी बेटी कैकयी की तरह राज करे<br />
चाहे दुनियां इधर से उधर हो जाये।<br />
सीता का चरित्र सभी गाते<br />
बहू ऐसी हो हर कोई यही समझाये<br />
पर बेटी को राज करने के गुर भी<br />
हर कोई बताये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<p><strong>यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://teradipak.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a>पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[योगासन के बाद प्राणायाम जरूर करें-चिंतन आलेख (yog aur pranayam-chintan alekh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/07/hindi-article-on-yogsadhna/</link>
<pubDate>Sat, 07 Nov 2009 05:27:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/07/hindi-article-on-yogsadhna/</guid>
<description><![CDATA[अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं। योगा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।<br />
<b>योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</b>योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।<br />
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर।  अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें।  इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायम की विधियां दी गयी हैं।   योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।<br />
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया।  अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं।  कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।<br />
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली  क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं।  धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें  अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी  ढीला छोड़ना जरूरी है।<br />
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं।  इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है।  अगर कुछ आसन कर प्राणायम करें तो बहुत अच्छा रहेगा।  प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की  चलाई जाती है।  अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें।  अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें।  अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें।  इन क्रियायों को आराम से करें।  शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें।  सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है।  योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना।  शेष फिर कभी<br />
<b>लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://anant-shabd.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b></p>
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समाज हिन्दी भाषा का महत्व समझे- चिंतन आलेख (hindi ka mahatva-hindi chitan lekh]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/02/hindi-ka-mahatv-aur-samaj-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Mon, 02 Nov 2009 13:05:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/02/hindi-ka-mahatv-aur-samaj-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[सुना है अब इंटरनेट में लैटिन के साथ ही देवनागरी में भी खोज सुगम होने वाली है। यह एक अच्छी खबर है मगर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>सुना है अब इंटरनेट में लैटिन के साथ ही देवनागरी में भी खोज सुगम होने वाली है। यह एक अच्छी खबर है मगर इससे हिंदी भाषा के पढ़ने और लिखने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ जायेगी, यह आशा करना एकदम गलत होगा।  सच तो यह है कि अगर देवनागरी में खोज सुगम हुई भी तो भी इसी मंथर गति से ही हिंदी लेखन और पठन में बढ़ोतरी होगी जैसे अब हो रही है।  हिंदी को लेकर जितनी उछलकूल दिखती है उतनी वास्तविकता जमीन पर नहीं है।  सच कहें तो कभी कभी तो लगता है कि हम हिंदी में इसलिये लिख पढ़े रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी हमारे समझ में नहीं आती। हम हिंदी में लिख पढ़ते भी इसलिये भी है ताकि जैसा लेखक ने लिखा है वैसा ही समझ में आये।  वरना तो जिनको थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती है उनको तो हिंदी में लिखा दोयम दर्जे का लगता है।  वैसे अंतर्जाल पर हम लोगों की अंग्रेजी देखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि लोगों की अंग्रेजी भी कोई परिपक्व है इस पर विश्वास नहीं करना चाहिए-क्योंकि बात समझ में आ गयी तो फिर कौन उसका व्याकरण देखता है और अगर दूसरे ढंग से भी समझा तो कौन परख सकता है कि उसने वैसा ही पढ़ा जैसा लिखा गया था।  बहरहाल अंग्रेजी के प्रति मोह लोगों का इसलिये अधिक नहीं है कि उसमें बहुत कुछ लिखा गया है बल्कि वह दिखाते हैं ताकि लोग उनको पढ़ालिखा इंसान समझें।<br />
‘आप इतना पढ़ें लिखें हैं फिर भी आपको अंग्रेजी नहीं आती-‘’हिंदी में पढ़े लिखे एक सज्जन से उनके पहचान वाले लड़के ने कहा’‘-हमें तो आती है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं न!’<br />
मध्यम वर्ग की यह नयी पीढ़ी हिंदी के प्रति रुझान दिखाने की बजाय उसकी उपेक्षा में आधुनिकता का बोध इस तरह कराती है जैसे कि ‘नयी भारतीय सभ्यता’ का यह एक एक प्रतीक हो।<br />
जैसे जैसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है-निजी क्षेत्र में अंग्रेजी की शिक्षा का प्रसार बढ़ा है।  एक दौर था जब सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पाना ही एक विजय समझा जाता था-उस समय निजी क्षेत्र के छात्रों को फुरसतिया समझा जाता था। उस समय के दौर के विद्यार्थियों ने हिंदी का अध्ययन अच्छी तरह किया। शायद उनमें से ही अब ऐसे लोग हैं जो हिंदी में लेखन बेहतर ढंग से करते हैं। अब अगर हिंदी अच्छे लिखेंगे तो वही लोग जिनके माता पिता फीस के कारण अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों में नहीं पढ़ा सकते और सरकारी विद्यालयों में ही जो अपना भविष्य बनाने जाते हैं।<br />
एक समय इस लेखक ने अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध स्तंभकार श्री खुशवंत सिंह के इस बयान पर विरोध करते हुए एक अखबार में पत्र तक लिख डाला‘जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदी गरीब भाषा है।’<br />
बाद में पता लगा कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा  बल्कि उनका आशय था  कि ‘हिन्दुस्तान में हिंदी गरीबों की भाषा है’। तब अखबार वालों पर भरोसा था इसलिये मानते थे कि उन्होंने ऐसा कहा होगा पर अब जब अपनी आंखों के सामने बयानों की तोड़मोड़ देख रहे हैं तो मानना पड़ता है कि ऐसा ही हुआ होगा। बहरहाल यह लेखक उनकी आलोचना के लिये अब क्षमाप्रार्थी है क्योंकि अब यह लगने लगा है कि वाकई हिंदी गरीबों की भाषा है।  इन्हीं अल्पधनी परिवारों में ही हिंदी का अब भविष्य निर्भर है  इसमें संदेह नहीं और यह आशा करना भी बुरा नहीं कि आगे इसका प्रसार अंतर्जाल पर बढ़ेगा, क्योंकि यही वर्ग हमारे देश में सबसे बड़ा है।</p>
<p>समस्या यह है कि इस समय कितने लोग हैं जो अब तक विलासिता की शय समझे जा रहे अंतर्जाल पर सक्रिय होंगे या उसका खर्च वहन कर सकते हैं।  इस समय तो धनी, उच्च मध्यम, सामान्य मध्यम वर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिये ही यह एक ऐसी सुविधा है जिसका वह प्रयोग कर रहे हैं और इनमें अधिकतर की नयी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित है।  जब हम अंतर्जाल की बात करते हैं तो इन्हीं वर्गों में सक्रिय प्रयोक्ताओं से अभी वास्ता पड़ता है और उनके लिये अभी भी अंग्रेजी पढ़ना ही एक ‘फैशनेबल’ बात है।  ऐसे में भले ही सर्च इंजिनों में भले ही देवनागरी करण हो जाये पर लोगों की आदत ऐसे नहीं जायेगी।  अभी क्या गूगल हिंदी के लिये कम सुविधा दे रहा है।  उसके ईमेल पर भी हिंदी की सुविधा है।  ब्लाग स्पाट पर हिंदी लिखने की  सुविधा का उपयेाग करते हुए अनेक लोगों को तीन साल का समय हो गया है।  अगर हिंदी में लिखने की इच्छा वाले पूरा समाज होता  तो क्या इतने कम ब्लाग लेखक होते?  पढ़ने वालों का आंकड़ा भी कोई गुणात्मक वुद्धि नहीं दर्शा रहा।<br />
गूगल के ईमेल पर हिंदी लिखने की सुविधा की  चर्चा करने पर एक नवयौवना का जवाब बड़ा अच्छा था-‘अंकल हम उसका यूज (उपयोग) नहीं करते, हमारे मोस्टली (अधिकतर) फ्रैंड्स हिंदी नहीं समझते। हिंदी भी उनको इंग्लिश (रोमन लिपि) में लिखना पसंद है।  सभी अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं। जो हिंदी वाले भी हैं वह भी इससे नहीं लिखते।’<br />
ऐसे लोगों को समझाना कठिन है।  कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी की कितनी भी सुविधा अंतर्जाल पर आ जाये उसका लाभ तब तक नहीं है जब तक उसे सामान्य समाज की आदत नहीं बनाया जाता। इसका दूसरा मार्ग यह है कि इंटरनेट कनेक्शन सस्ते हो जायें तो अल्प धन वाला वर्ग भी इससे जुड़ेे जिसके बच्चों को हिंदी माध्यम में शिक्षा मजबूरीवश लेनी पड़ रही है।  यकीनन इसी वर्ग के हिंदी भाषा का भविष्य को समृद्ध करेगा।  ऐसा नहीं  कि उच्च वर्ग में हिंदी प्रेम करने वाले नहीं है-अगर ऐसा होता तो इस समय इतने लिखने वाले नहीं होते-पर उनकी संख्या कम है।  ऐसा लिखने वाले निरंकार भाव से लिख रहे हैं पर उनके सामने जो समाज है वह अहंकार भाव से फैशन की राह पर चलकर अपने को श्रेष्ठ समझता है जिसमे हिंदी से मूंह फेरना एक प्रतीक माना जाता है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</b><br />
<strong>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://zeedipak.blogspot.com</strong></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<item>
<title><![CDATA[बदतमीज बात पर नजर-हिंदी व्यंग्य (badtamij bat par nazar-hindi vyangya)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/02/bat-bebat-ki-hindi-article/</link>
<pubDate>Mon, 02 Nov 2009 12:58:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/02/bat-bebat-ki-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[एक टीवी चैनल को उसके मनोरंजक कार्यक्रम में अभद्र और अश्लील शब्दों के प्रयोग पर आखिर नोटिस थमा दिया ग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>एक टीवी चैनल को उसके मनोरंजक कार्यक्रम में अभद्र और अश्लील शब्दों के प्रयोग पर आखिर नोटिस थमा दिया गया है।  हो सकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ समर्थक इस पर नाराज हों पर यह एक जरूरी कदम है।  दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई रोक नहीं होना चाहिये पर अभद्र और अश्लील शब्दों के सार्वजनिक प्रयोग पर रोक तो लगानी होगी।  स्वतंत्रता समर्थक पश्चिम की तरफ देख कर यहां की बात करते हैं पर उनको भाषाओं के जमीनी स्वरूप का अधिक ज्ञान नहीं है।  अंग्रेजी में मंकी शब्द नस्लवाद का प्रतीक है पर भारतीय भाषाओं में इसे इतना बुरा नहीं समझा जाता। इसके अलावा हिंदी भाषा में कई ऐसे शब्द और संकेत हैं जो बड़े भयावह हैं और संभवतः वह अंग्रेजी में तो हो ही नहीं सकते।  ऐसे में भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खुलेपन के वैसे मायने भी नहीं हो सकते जैसे पश्चिम में है।<br />
दूसरी भी एक वजह है। यह पता नहीं पश्चिम के  लोगों पर की मनस्थिति पर टीवी और फिल्मों में प्रस्तुत सामग्री का कितना प्रभाव पड़ता है ं पर भारत में बहुत पड़ता है।  यहां बच्चे बच्चे को टीवी और फिल्मों में दिखाये गये वाक्य और गीत याद रहते हैं। अनेक बार अखबार भी अनेक बार लिखते हैं कि अमुक अपराध अमुक फिल्म को देखकर किया गया।  भले ही टीवी और फिल्म वाले कहते हैं कि जो समाज में चल रहा है उसे हम दिखाते हैं पर हम उसका उल्टा देखते हैं।  महिलाओं के प्रति अपराध पहले इतने नहीं थे जितने फिल्मों में दिखाने के बाद बड़े हैं।  इसके अलावा आशिकों और सिरफिरों  के टंकी पर चढ़ने के किस्से भी पहले नहीं सुने गये थे। इनका प्रचलन शोले के बाद ही शुरु हुआ वह भी बहुत समय बाद! एक तरह से इस फिल्म के प्रदर्शित होते  समय जो बच्चे थे बड़े होने के बाद इस तरह की हरकत करते नजर आने लगे।<br />
मनोरंजन में भारतीय समाज अपने लिये अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के संदेश ढूंढता है।   सीधे शब्दों में लिखी गयी गीता कौन पढ़ता अगर उसके साथ महाभारत की फंतासी या नाटकीयता जुड़ी नहीं होती।  हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने महान अध्यात्मिक ज्ञान के रूप में  वेदों में सृजन किया पर उसे पढ़ने वाले कितने रहे।  यही ज्ञान श्री रामायण, श्रीमद्भागवत, और महाभारत (श्रीगीता उसी का ही एक हिस्सा है) में भी व्यक्त हुआ।  उनके साथ अधिक  फंतासी या नाटकीयता  जैसी सामग्री जुड़ी है इसलिये उनको खूब सुना और सुनाया जाता है, पर उसमें जो अध्यात्मिक संदेश है उसे कौन ध्यान में रखना चाहता है?<br />
कहते हैं कि कमल कीचड़ में और गुलाब कांटों में खिलता है अगर हम भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को कमल या गुलाब माने तो हमें अपने समाज को मनोवृत्ति को  कीचड़ या कांटे की तरह मानना ही होगा।  यह सत्य की खोज की गयी क्योंकि लोग असत्य का शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं।  उन्हें चैमासा ही मनोरंजन चाहिये पर इसलिये उनकी अध्यात्मिक शांति की आवश्यकतायें भी अधिक है।  जिस तरह ठंडा खाने के बाद गर्म पदार्थ की आवश्यकता अनुभव होती है वही स्थिति मनोरंजन के बाद मन की शांति पाने की इच्छा चाहत के रूप में प्रकट होती है।<br />
अब ऐसे में यह मनोरंजक चैनल अगर इस तरह अभद्र शब्द या अश्लील शब्द सार्वजनिक रूप से सुनाये तो हो सकता है कि बच्चों पर ही क्या बड़ों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़े। यह तो गनीमत है कि सच का सामना जल्दी बंद हो गया वरना अगर एक दो साल चल पड़ता तो जगह जगह लोग एक दूसरे से सच जानते हुए लड़ते नजर आते।  मनोरंजक कार्यक्रमों में शुद्ध रूप से मनोरंजन है पर कोई संदेश नहीं है।  उनके कार्यक्रमों में अगर गंदे वाक्य शामिल होंगे तो उनका सार्वजनिक प्रचनल बढ़ेगा। ऐसे में उन पर नियंत्रण रखना चाहिये। अगर इन पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो हो सकता है कि परिवारों में छोटे बच्चे ऐसे शब्दों का उपयोग करने लगें जिससे बड़े शर्मिंदगी झेलने को बाध्य हों। </b></p>
<p><b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
</b><br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नए स्वांग और मुखौटे-हास्य व्यंग्य कविताएँ (svang aur mukhaute-hindi satire poem)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/31/face-to-face-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sat, 31 Oct 2009 05:49:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/31/face-to-face-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[रोज रचते हैं नया स्वांग चेहरे पर लगाते नए मुखौटे और बदलकर आते हैं कपड़े मगर छद्म होकर भी करते हैं हमे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>रोज रचते हैं नया स्वांग<br />
चेहरे पर लगाते नए मुखौटे<br />
और बदलकर आते हैं  कपड़े<br />
मगर छद्म होकर भी   करते हैं हमेशा लफड़े.<br />
आदमी अपना बाहर का रूप<br />
कितना भी बदल ले<br />
अदाओं से पहचाना जाता है,<br />
जहां स्वर बदले<br />
शब्दों से पकड़ा जाता है,<br />
खुलकर सांस लेने से घबड़ाते हैं जो लोग<br />
छिपकर करते वार<br />
पर अपने हथियारों की शकल<br />
और तौरतरीकों  से जाते हैं पकड़े.</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>अपनी महफ़िल में उन्होंने बुलाया नहीं<br />
हमारी परवाह न होने का अहसास जताया.<br />
खूब चिराग जलाए उन्होंने<br />
पर अन्दर के अँधेरे में<br />
चमकता रहा हमारा चेहरा और नाम<br />
बड़ी मेहनत से उन्होंने छिपाया.<br />
हमारा नाम लेने पर उन्होंने<br />
अपने मेहमान पर गुस्सा दिखाकर<br />
अपनी नापसंदगी दिखाई<br />
पर सच है कि जो खौफ है<br />
उनके दिमाग में<br />
हमारे हाथ से जलते चिरागों से<br />
ज़माने के रौशन होने का<br />
वही अनजाने में बाहर आया.</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong>कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<blockquote><p>
<strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।</p>
<p>अन्य ब्लाग<br />
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</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नया सामान भी कबाड़ हो जाता है-हिंदी व्यंग्य कविता (naya saman aur kabad-hindi vyangya kavita)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/31/naya-saman-kabad-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Sat, 31 Oct 2009 05:40:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/31/naya-saman-kabad-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[सुनने और पढने वाला जाल में फंस जाए विज्ञापन ऐसे ही सजाये जाते हैं. अगर उनमें सच होता तो नहीं भर जाते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>सुनने और पढने वाला<br />
जाल में फंस जाए<br />
विज्ञापन ऐसे ही सजाये जाते हैं.<br />
अगर उनमें सच होता तो<br />
नहीं भर जाते घर उस  कबाड़ के सामान से<br />
जिनको  खरीदा था  कभी चाव से<br />
बड़े महंगे भाव से<br />
आये  थे जो सामान नए बनकर  ठेले से<br />
वही कभी कबाड़ बनकर फिर उसमें लद जाते हैं.<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
बाज़ार अब नगद ही नहीं<br />
उधार  पर भी  चलते हैं.<br />
चुकाते हुए रोते रहो<br />
नहीं चुकाने पर<br />
चीख पुकार भी मचती है<br />
कभी उधार वाले<br />
पहलवान बनकर गर्दन भी पकड़ते हैं.</b><br />
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
</b><br />
<strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीरदास के दोहे-अपनी तारीफ और दूसरे की बुराई न करें (kabir ke dohe-apne tarif aur doosre ke burai na karen)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/25/burai-aur-tarif-kabir-vani/</link>
<pubDate>Sun, 25 Oct 2009 09:42:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/25/burai-aur-tarif-kabir-vani/</guid>
<description><![CDATA[आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय। चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।। संत शिरोमणि कबीरदास ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।<br />
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।<br />
<strong>आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।<br />
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।</strong>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।<br />
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सेल के रोग का इलाज नहीं-हास्य व्यंग्य कविता (sel rog ka ilaj-hasya vyangyakavita)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/23/sel-ki-bimari-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Fri, 23 Oct 2009 15:43:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/23/sel-ki-bimari-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[अपने साथ फंदेबाज एक पर्चा लेकर आया और हाथ में देते हुए बोला- ‘दीपक बापू, बूढ़े आदमियों के लिये तैयार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अपने साथ फंदेबाज  एक पर्चा लेकर आया<br />
और हाथ में देते हुए बोला-<br />
‘दीपक बापू,<br />
बूढ़े आदमियों के लिये<br />
तैयार कपड़ों की एक सेल लगी है<br />
चलो तुम्हें वहां से<br />
टोपी, कुर्ता धोती और स्वेटर दिलवायें<br />
बहुत पुराने लगते हैं तुम्हारी तरह<br />
तुम्हारें कपड़े भी सजायें।<br />
यह ठीक है अभी तक फ्लाप हो<br />
चिंता की बात नहीं<br />
पर कल हिट हो जाओगे<br />
तो कैसे सम्मेलनों में अपना चेहरा दिखाओगे<br />
सेल में एक चीज पर एक मुफ्त है<br />
एक रख लेना रोज पहनने के लिये<br />
दूसरा बाहर के लिये रख लेना<br />
चलो तो मौके का पूरा फायदा उठायें।’</p>
<p>सुनते ही भड़के फिर<br />
अपनी पुरानी टोपी की तरफ<br />
निहारते हुए बोले दीपक बापू<br />
‘कमबख्त, हमारे फ्लाप होने का ताना<br />
देने के लिये कोई बहाना ढूंढ जरूर लेना<br />
अरे, इस टोपी, धोती और स्वेटर के<br />
पुराने होने पर तुम्हें तरस आ रहा है<br />
पर कोई दूसरा तो नहीं गा रहा है<br />
एक के साथ एक फ्री ले आये थे<br />
पहले इसी इरादे से<br />
पर दोनों ही घिस गये<br />
अंतर्जाल पर टाईप करते<br />
पर हमारे ब्लाग अभी आहें भरते<br />
पैकिंग में धोती, कुर्ता, टोपी और स्वेटर<br />
बहुत अच्छे दिखे<br />
पर घर लाये तो सभी में छेद दिखे<br />
फिर तुम सभी जगह हमारे<br />
फ्लाप होने की कथा सुना रहे हो<br />
आपने हिट दोस्त होने का अच्छा साथ भुना रहे हो<br />
हम किस हाल में है<br />
भला कौन पाठक जानता है<br />
इतना ही ठीक है<br />
इस ‘एक के साथ एक फ्री’ में<br />
पगला गये हैं कई लोग<br />
जिसका इलाज नहीं है<br />
ऐसा बन गया है यह सेल का रोग<br />
हम तो मुफ्त में ब्लाग  लिखने  के साथ<br />
यह दूसरा फ्री का रोग नहीं पाल सकते<br />
रुपये भला कैसे लगायें।<br />
दो रोग पालना एक साथ मूर्खता है<br />
यह तुम्हें कैसे समझायें’’<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</b><br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप<br />
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</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विष की शुद्धि-त्रिपदम  (vish ki shuddhi-tripadam)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/23/vish-par-hindi-kavita/</link>
<pubDate>Fri, 23 Oct 2009 15:16:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/23/vish-par-hindi-kavita/</guid>
<description><![CDATA[मन में विष किसमें नहीं होता शुद्धि कहां है। सोच से जड़ हो गये ये इंसान बुद्धि कहां है। जले शब्द उगलते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>मन में विष<br />
किसमें नहीं होता<br />
शुद्धि कहां है।</p>
<p>सोच से जड़<br />
हो गये ये इंसान<br />
बुद्धि कहां है।</p>
<p>जले शब्द<br />
उगलते चूल्हे<br />
वाणी कहां है।</p>
<p>सभी भिखारी<br />
ढूंढ रहे हैं माल<br />
दानी कहां है।</p>
<p>लंगड़ी भाषा<br />
सिखाई गुरुओं ने<br />
बोध कहां है।</p>
<p>शिक्षित झुंड<br />
शहर में घूमता<br />
शोध कहां है।</p>
<p>दर्द की दवा<br />
मिलती कभी कभी<br />
रोज कहां है।</p>
<p>प्रश्न वन<br />
घना है चारों ओर<br />
खोज कहां है।</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-जागरुक लोग अपनी बेइज्जती नहीं सहते (jagruk aur apmaan-hindi sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/22/jagruk-log-aur-ijjat/</link>
<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 13:59:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/22/jagruk-log-aur-ijjat/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211; यद चेतनोऽपिपादै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<strong>यद चेतनोऽपिपादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः।<br />
तत्तेजस्वी पुरुषः परकृत निकृतिंक कथं सहते ।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>सूर्य की रश्मियों के ताप से जब जड़ सूर्यकांन्त मणि ही जल जाती है तो चेतन और जागरुक पुरुष दूसरे के द्वारा किये अपमान को कैसे सह सकता है।</p>
<p><strong>लांगल चालनमधश्चरणावपातं भू मौ निपत्य बदनोदर दर्शनं च।<br />
श्चा पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीरं विलोकपति चाटुशतैश्चय भुंवते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>श्वान भोजने देने वाले के आगे पूंछ हिलाते हुए पैरों में गिरकर पेट मूंह और पेट दिखाते हुए अपनी दीनता का प्रदर्शन करता है जबकि हाथी भोजन प्रदान करने वालो को गहरी नजर से देखने के बाद  उसके द्वारा आग्रह करने पर ही भोजन ग्रहण करता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>भले ही आदमी के पास अन्न और धन की कमी हो पर  मनुष्य को स्वाभिमानी होना चाहिए नहीं तो अधिक धनवान, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोग उसे गुलाम बनाये रखने के लिये हमेशा तत्पर रहते हैं।  आजकल सुख सुविधाओं ने अधिकतर लोगों को शारीरिक और मानसिक तौर से सुस्त बना दिया है इसलिये वह उन्हें बनाये रखने के लिये अपने से अधिक शक्तिशाली लोगों की चाटुकारिता में लगना अपने लिये निज गौरव समझते हैं। यही कारण है कि निजी क्षेत्र में स्त्रियों और पुरुषों का शोषण बढ़ रहा है। हमारे यहां की शिक्षा कोई उद्यमी नहीं पैदा करती बल्कि नौकरी के लिये गुलामों की भीड़ बढ़ा रही है। कितनी विचित्र बात है कि आजकल हर आदमी अपने बच्चे को इसलिये पढ़ाता है कि वह कोई नौकरी कर अपने जीवन में अधिकतम सुख सुविधा जुटा सके।  ऐसे में बच्चों के अंदर वैसे भी स्वाभिमान मर जाता है। उनका अपने माता पिता और गुरुजनों से अच्छा गुलाम बनने की प्रेरणा ही मिलती है। </p>
<p>ऐसी स्थिति में हम अपने देश और समाज के प्रति कथित रूप से जो स्वाभिमान दिखाते हैं पर काल्पनिक और मिथ्या लगता है।  स्वाभिमान की प्रवृत्ति तो ऐसा लगता है कि हम लोगों में रही नहीं है। ऐसे मेें यही लगता है कि हमें अब अपने प्राचीन साहित्य का अध्ययन भी करते रहना चाहिये ताकि पूरे देश में लुप्त हो चुका स्वाभिमान का भाव पुनः लाया जा सके।<br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http:/rajlekh.blogpot.com<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<blockquote><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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 </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब उनके पुतलों की पोल खुल जायेगी-हिंदी कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/21/putle-aur-insan-hindi-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Wed, 21 Oct 2009 15:51:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/21/putle-aur-insan-hindi-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[पर्दे के पीछे वह खेल रहे हैं सामने उनके पुतले डंड पेल रहे हैं। आत्ममुग्धता हैं जैसे जमाना जीत लिया स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>पर्दे के पीछे वह खेल रहे हैं<br />
सामने उनके पुतले डंड पेल रहे हैं।<br />
आत्ममुग्धता हैं जैसे जमाना जीत लिया<br />
समझते नहीं भीड़ के इशारे<br />
अपनी उंगलियों से पकड़ी रस्सी से<br />
मनचाहे दृश्य वह मंच पर ठेल रहे हैं।<br />
भीड़ में बैठे हैं उनके किराये के टट्टू<br />
जो वाह वाही करते हैं<br />
तमाम लोग तो बस झेल रहे हैं।<br />
खेल कभी लंबा नहीं होता<br />
कभी तो खत्म होगा<br />
सच्चाई तो सामने आयेगी<br />
जब उनके पुतलों की पोल खुल जायेगी<br />
तब जवाब मांगेंगे लोग<br />
हम भी यही सोचकर झेल रहे हैं।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<strong>यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://teradipak.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a>पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किसका हुआ कभी कोहिनूर-व्यंग्य कविता (kiska hua kohinoor-vyangya kavita)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/19/a-hindi-poem-on-kohinoor/</link>
<pubDate>Mon, 19 Oct 2009 13:28:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/19/a-hindi-poem-on-kohinoor/</guid>
<description><![CDATA[चंद खोये सिक्के ढूंढने के लिए पूरा घर का सामान बिखेर डाला मिले पलंग के नीचे गिरे हुए पहले तो खुशी मि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>चंद खोये सिक्के ढूंढने के लिए<br />
पूरा घर का सामान बिखेर डाला<br />
मिले पलंग के नीचे गिरे हुए<br />
पहले तो खुशी मिली, फिर हुई काफूर।<br />
बिखरी हुई शयों को समेटने के<br />
ख्याल ने कर दिया बदन पहले ही चूर।<br />
खोये पाये के हिसाब में<br />
पूरी जिंदगी हो जाती है बेनूर।<br />
सिक्के इतने जमा कर लिये संभाले नहीं जाते<br />
गिनती में भूल जायें<br />
तो देखते हैं उनको घूर।<br />
सोचते कौन कम हुआ चश्मेबद्दूर।<br />
खोये हुए सिक्के मिल गये<br />
पर चले जायेंगे हाथ से<br />
बनेंगे किसी दूसरे हाथ का नूर।<br />
जिंदगी में गमों का सिलसिला भी आता है<br />
खुशियां भी साथ चलती थोड़ी दूर।<br />
अपना कितनों ने माना होगा<br />
पर किसका हुआ कभी कोहिनूर।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
<strong>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://zeedipak.blogspot.com</strong></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a></strong><br />
<strong>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिवाली का शुभ दिन बीत गया-आलेख (hindi article on diwali festival]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/19/divali-ke-shubh-din-par-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Mon, 19 Oct 2009 04:47:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/19/divali-ke-shubh-din-par-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[होश संभालने के बाद शायद जिंदगी में यह पहली दिवाली थी जिसमें मिठाई नहीं खाई। कभी इसलिये मिठाई नहीं खा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>होश संभालने के बाद शायद जिंदगी में यह पहली दिवाली थी जिसमें मिठाई नहीं खाई। कभी इसलिये मिठाई नहीं खाते थे कि बस अब दिवाली आयेगी तो जमकर खायेंगेे।  हमें मिठाई खाने का शौक शुरु से रहा है और कुछ लोग मानते हैं कि मिठाई के शौकीन झगड़ा कम करते हैं क्योंकि उनकी वाणी में मधुरता आ जाती है। हम भी इस बात को मानते हैं पर वजह दूसरी है। दरअसल अधिक मीठा खाने वाले मोटे हो जाते हैं इसलिये उनके झगड़ा करने की ताकत कम होती है।  अगर कहीं शारीरिक श्रम  की बात आ जाये तो हांफने लगते हैं। हमारे साथ भी यही होता रहा है, अलबत्ता हमने शारीरिक श्रम खूब किया है और साइकिल तो आज भी चलाते हैं।  हां, यह सच है कि मोटे अपने खाने की चिंता अधिक करते हैं क्योंकि उनके खाली पेट में जमा गैस उनको सताने लगती है जिसे हम भूख भी कहते हैं।  इसके बावजूद हम मानते हैं कि मोटे लोग शांतिप्रिय होते हैं-कहने वाले कहते रहें कि डरपोक होते हैं पर यह सच है कि कोई उन पर आसानी से हाथ डालने की भी कोई नहीं सोचता।<br />
दिवाली के अगली  सुबह बाजार में निकले तो देखा कि  बाजार में मिठाईयां बिक रही थीं। बिकने की जगह देखकर ही मन दुःखी हो रहा था।  इधर हम घर पर ही जब कभी खाने की कोई सामग्री देखने को मिलती है तो उसे हम स्वतः ही प्लेट से ढंकने लगते हैं।  मंगलवार हनुमान जी का प्रसाद ले आये और अगर कभी उसका लिफाफा खुला छूट गया तो फिर हम न तो खाते हैं न किसी को खाने देते हैं।  मालुम है कि आजकल पर्यावरण प्रदूषण की वजह से अनेक प्रकार की खतरनाक गैसें और कीड़े हवा में उड़कर उसे विषाक्त कर देते हैं।  ऐसे में बाजार में खुली जगह पर रखी चीज-जिसके बारे में हमें ही नहीं पता होता कि कितनी देर से खुले में पड़ी है-कैसे खा सकते हैं।  पिछले सात वर्षों से योग साधना करते हुए अब खान पान की तरह अधिक ही ध्यान देने लगे हैं तब जब तक किसी चीज की शुद्धता का विश्वास न हो उसे ग्रहण नहीं करते।  यही कारण है कि बीमार कम ही पड़ते हैं और जब पड़ते हैं तो दवाई नहीं लेते क्योंकि हमें पता होता है कि हम क्या खाने से बीमार हुए हैं? उसका प्रभाव कम होते ही फिर हमारी भी वापसी भी हो जाती है।<br />
बाजार में सस्ती मिठाईयां गंदी जगहों के बिकते देखकर हम सोच रहे थे कि कैसे लोग इसे खा रहे होंगे।  कई जगह डाक्टरों की बंद दुकानें भी दिखीं तब तसल्ली हो जाती थी कि चलो आज इनका अवकाश है कल यह उन लोगों की मदद करेंगी जो इनसे परेशान होंगे।  वैसे मिठाई के भाव देखकर इस बात पर यकीन कम ही था कि वह पूरी तरह से शुद्ध होंगी।<br />
ज्यादा मीठा खाना ठीक नहीं है अगर आप शारीरिक श्रम नहीं करते तो।  शारीरिक श्रम खाने वाले के लिये मीठा हजम करना संभव है मगर इसमें मुश्किल यह है कि उनकी आय अधिक नहीं होती और वह ऐसी सस्ती मिठाई खाने के लिये लालायित होते हैं।  संभवतः सभी बीमार इसलिये नहीं पड़ते क्योंकि उनमें कुछ अधिक परिश्रमी होते हैं और थोड़ा बहुत खराब पदार्थ पचा जाते हैं पर बाकी के लिये वह नुक्सानदेह होता है।  वैसे इस बार अनेक हलवाईयों ने तो खोये की मिठाई बनाई हीं नहीं क्योंकि वह नकली खोए के चक्कर में फंसना नहीं चाहते थे। इसलिये बेसन जैसे दूध न बनने वाले पदार्थ उन्होंने बनाये तो कुछ लोगों ने पहले से ही तय कर रखा था कि जिस प्रकार के मीठे में मिलावट की संभावना है उसे खरीदा ही न जाये।<br />
पटाखों ने पूरी तरह से वातावरण को विषाक्त किया। अब इसका प्रभाव कुछ दिन तो रहेगा।  अलबत्ता एक बात है कि हमने इस बार घर पर पटाखों की दुर्गंध अनुभव नहीं की। कुछ लोगों ने शगुन के लिये पटाखे जलाये पर उनकी मात्रा इतनी नहीं रही कि वह आसपास का वातावरण अधिक प्रदूषित करते। महंगाई का जमाना है फिर अब आज की पीढ़ी-कहीं पुरानी भी- लोग टीवी और कंप्यूटर से चिपक जाती है इसलिये परंपरागत ढंग से दिवाली मनाने का तरीका अब बदल रहा है।<br />
अपनी पुरानी आदत से हम  बाज नहीं आये। घर पर बनी मिठाई का सेवन तो किया साथ ही बाजार से आयी सोहन पपड़ी भी खायी।  अपने पुराने दिनों की याद कभी नहीं भूलते।  अगर हमसे पूछें तो हम एक ही संदेश देंगे कि शारीरिक श्रम को छोटा न समझो। दूसरा जो कर रहा है उसका ख्याल करो।  उपभोग करने से सुख की पूर्ण अनुभूति नहीं होती बल्कि उसे मिल बांटकर खाने में ही मजा है।  इस देश में गरीबी और बेबसी उन लोगों की समस्या तो है जो इसे झेल रहे हैं पर हमें भी उनकी मदद करने के साथ सम्मान करना चाहिए।  ‘समाजवाद’ तो एक नारा भर है हमारे पूरे अध्यात्मिक दर्शन में परोपकार और दया को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है ताकि समाज स्वतः नियंत्रित रहे। यह तभी संभव है जब अधिक धन वाले अल्प धन वालों की मदद बिना प्रचार के करें।  कहते हैं कि दान देते समय लेने वाले से आंखें तक नहीं मिलाना चाहिए।  इसके विपरीत हम देख रहे हैं कि हमारे यहां के नये बुद्धिजीवी डंडे और नियम कें जोर पर ऐसा करना चाहते हैं।  इसके लिये वह राज्य को मध्यस्थ की भूमिका निभाने का आग्रह करते हैं। इसका प्रभाव यह हुआ है कि समाज के धनी वर्ग ने सभी समाज कल्याण अब राज्य का जिम्मा मानकर गरीबों की मदद से मूंह फेर लिया है और हमारे सामाजिक विघटन का यही एक बड़ा कारण है।<br />
खैर, इस दीपावली के निकल जाने पर मौसम में बदलाव आयेगा। सर्दी बढ़ेगी तो हो सकता है कि मौसम बदलने से भी बीमारी का प्रभाव बढ़े।  ऐसे में यह जरूरी है कि सतर्कता बरती जाये।<br />
इधर ब्लाग पर अनेक टिप्पणीकर्ता लिखते हैं कि आप अपना फोटो क्यों नहीं लगाते? या लिखते हैं कि आप अपना फोन नंबर दीजिये तो कभी आपके शहर आकर आपके दीदार कर ले। हम दोनों से इसलिये बच रहे हैं कि कंप्यूटर पर लिखने की वजह से हमारा पैदल चलने का कार्यक्रम कम हो गया है इसलिये पेट अधिक बाहरं निकल आया है। फोटो भी अच्छा नहीं खिंच रहा।  इसलिये सोचा है कि कल से योगासन का समय बढ़ाकर अपना चेहरा मोहरा ठीक करें तो फोटो खिंचवाकर लगायेंगे और नंबर भी ब्लाग पर लिखेंगे।<br />
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<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
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</div>]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[खाली ज़ेब का रुआब-हास्य व्यंग्य कविता (khali zeb ka ruaab-hindi hasya kavita)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/18/khali-zeb-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 09:19:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/18/khali-zeb-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[सूखी मन गयी दिवाली क्योंकि जेब थी खाली, ज़माने में अपना रुआब दिखाने के लिए सबसे कह रहे हैं&#8221;हैप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सूखी मन गयी दिवाली<br />
क्योंकि जेब थी खाली,<br />
ज़माने में अपना रुआब  दिखाने के<br />
लिए सबसे कह रहे हैं&#8221;हैप्पी दीवाली&#8221;.</p>
<p><strong>जेब खाली हो तो<br />
अपना चेहरा आईने में देखते हुए भी<br />
बहुत डर लगता है<br />
अपने ही खालीपन का अक्स<br />
सताने लगता है।</p>
<p>क्यों न इतरायें दौलतमंद<br />
जब पूरा जमाना ही<br />
आंख जमाये है उन पर<br />
और अपने ही गरीब रिश्ते से<br />
मूंह फेरे रहता है।</p>
<p>अपना हाथ ही जगन्नाथ<br />
फिर भी लगाये हैं उन लोगों से आस<br />
जिनके घरों मे रुपया उगा है जैसे घास<br />
घोड़ों की तरह हिनहिना रहे सभी<br />
शायद मिल जाये कुछ कभी<br />
मिले हमेशा दुत्कार<br />
फिर भी आशा रखे कि मिलेगा पुरस्कार<br />
इसलिये दौलतमंदों के लिये<br />
मुफ्त की इज्जत और शौहरत का दरिया<br />
कमअक्लों की भीड़ के घेरे में ही बहता है।</strong><br />
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<strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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<title><![CDATA[ऐसे ही अफसाने-हिंदी व्यंग्य कविता (bade log-hindi vyangya kavita)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/18/aise-hee-afsaane-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 09:08:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/18/aise-hee-afsaane-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[जब बहता था दरिया में पानी तब भला कौन वादा करता था उसे लाने का। कहीं बांध बनाये कहीं रास्ता बदला पानी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><span style="font-size:large;">जब बहता था दरिया में पानी</span><br />
<span style="font-size:large;">तब भला कौन वादा करता था उसे लाने का।</span><br />
<span style="font-size:large;">कहीं बांध बनाये</span><br />
<span style="font-size:large;">कहीं रास्ता बदला</span><br />
<span style="font-size:large;">पानी को बनाकर बेचने की शय</span><br />
<span style="font-size:large;">जिन्होंने बिगाड़ दी प्रकृति की लय</span><br />
<span style="font-size:large;">अब वही करते हैं सभी जगह दावा</span><br />
<span style="font-size:large;">पानी का दरिया बहाने का।</span><br />
<span style="font-size:large;">छोटे ईमान के लोग</span><br />
<span style="font-size:large;">बड़े बन जाते हैं इस जमाने में</span><br />
<span style="font-size:large;">लेकर सहारा ऐसे ही अफसाने का।</span><br />
<span style="font-size:large;">&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</span></p>
<p><strong>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong><br />
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