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	<title>hindi-nai-duinia &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-nai-duinia"</description>
	<pubDate>Wed, 02 Dec 2009 16:58:07 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[मानवाधिकार-व्यंग्य आलेख (manvadhikar-vyanyga chittan)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/29/manvadhikar-vyangya-chitan/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 05:58:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो आदमी अपने रिश्तेदार को पानी के लिये भी नहीं पूछता। वैसे यह मानवीय प्रवृत्ति पुराने समय से है कि बिना मतलब के कोई  किसी का काम नहीं करता पर आजकल के समय में कुछ कथित समाज सेवक देखकर यह साफ लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से लाभ लिये बिना काम नहीं कर रहे हैं ।  यही स्थिति मानवाधिकार के लिये काम करने वाले लोगों और उनके संगठनों के बारे में देखी जा सकती है। हम तो सीधी बात कहें कि जब हम किसी को जनकल्याण, मानवाधिकार या किसी अन्य सार्वजनिक अभियान चलाते हुए देखते हैं तो उसके उद्ददेश्य से अधिक इस बात को जानने का प्रयास करते हैं कि वह उसके पीछे कौनसा अपना हित साध कहा है।<br />
आतंकवाद के बारे में कुछ विशेषज्ञों का स्पष्टतः मानना है कि यह एक उद्योग है जिसके सहारे अनेक दो नंबरी व्यवसाय चलते हैं।  आंकड़े इस बात का प्रमाण है कि जहां आतंकवाद दृष्टिगोचर होता है वहीं दो नंबर का व्यापार अधिक रहता है। आतंकवाद को उद्योग इसलिये कहा क्योंकि किसी नवीन वस्तु का निर्माण करने वाला स्थान ही उद्योग कहा जाता है और आतंकवाद में एक इंसान को हैवान बनाने का काम होता है।  इसी आतंकवाद या हिंसा का सहायक व्यापार मानवाधिकार कार्यक्रम लगता है।  नित अखबार और समाचार पत्र पढ़ते हुए कई प्रश्न कुछ लोगों के  दिमाग में घुमड़ते हैं।  इसका जवाब  इधर उधर ढूंढते हैं पर कहीं नहीं मिलता।  जवाब तो तब मिले जब वैसे सवाल कोई उठाये। कहने का तात्पर्य यह है सवाल करने वालों का भी टोटा है।<br />
बहरहाल एक बड़ा उद्योग या व्यवसाय अनेक सहायक व्यवसायों का भी पोषक होता है। मान लीजिये कहीं कपड़े के नये बाजार का निर्माण होता है तो उसके सहारे वहां चाय और नाश्ते की दुकानें खुल जाती हैं।  वजह यह है कि कपड़े का बाजार है पर वहां रहने वाले दुकानदार और आगंतुकों के लिये खाने पीने की व्यवस्था जरूरी है। इस तरह कपड़े का मुख्य स्थान होते हुए भी वहां अन्य सहायक व्यवसाय स्थापित हो जाते हैं। कहीं अगर बुनकरी का काम होता है तो उसके पास ही दर्जी और रंगरेज की दुकानें भी खुल जाती हैं।  यही स्थिति शायद आतंकवाद के उद्योग के साथ है। जहां इसका प्रभाव बढ़ता है वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता अधिक सक्रिय हो जाते हैं।  उनकी यह बात हमें बकवाद लगती है कि वह केवल स्व प्रेरणा की वजह से यह काम कर रहे हैं।  यह ऐसे ही जैसे कपड़े की बाजार के पास कोई चाय की दुकान खोले और कहे कि ‘मैं तो यहां आने वाले व्यापारियों की सेवा करने आया हूं।’<br />
ऐसे अनेक निष्पक्ष विशेषज्ञ हैं जो भले ही साफ न कहते हों पर विश्व भर में फैले आतंकवाद के पीछे काम कर रहे आर्थिक तत्वों का रहस्ययोद्घाटन करते हैं पर वह  समाचार पत्रों में अंदर के कालम में छपते हैं और फिर उन पर कोई अधिक नहीं लिखता क्योंकि विश्व भर में बुद्धिजीवियों को तो जाति, भाषा, धर्म, और क्षेत्र के नाम पर फैल रहे आतंकवाद की सच्चाई पर ध्यान देने की बजाय उसके कथित विषयों पर अनवरत बहस करनी होती है।  अगर वह इस सच को एक बार मान लेंगे कि इसके पीछे दो नंबर का धंधा चलाने वाले किसी न किसी रूप से अपना आर्थिक सहयोग इसलिये देते हैं ताकि प्रशासन का ध्यान बंटे और उनका काम चलते रहे, तो फिर उनके लिये बहस की गुंजायश ही कहां बचेगी? फिर मानवाधिकार कार्यकताओं का काम भी कहां बचेगा, जिसके सहारे अनेक लोग मुफ्त का खाते हैं बल्कि प्रचार माध्यमों को अपने कार्यक्रमों की जगह भरने के लिये अपने शब्द और चेहरा भी प्रस्तुत करते हैं।<br />
शक की पूरी गुंजायश है और यह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में छपी सामग्री पर थोड़ा भी चिंतन करें तो वह पुख्ता भी हो जाता है।  यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मानवाधिकारों का हनन हो रहा है।  ऐसा कोई भी गांव या शहर नहीं है जो इससे मुक्त हो। अलबत्ता घटना केवल उन्हीं जगहों की सामने आती हैं जिनको प्रचार माध्यम इन्हीं मानवाधिकार कार्यकताओं के सहारे प्राप्त करते हैं।<br />
आप जरा ध्यान से अखबार पढ़ें कि भारत के मध्य क्षेत्र में ऐसे अनेक एनकांउटर होते हैं जिनमें किसी कुख्यात अपराधी को मार दिया जाता है।  उस पर उसके परिवार वाले विरोध भी जताते हैं पर वहां कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता या संगठन सक्रिय नहीं होता क्योंकि इसके लिये उनको कोई प्रायोजक नहीं मिलता। प्रायोजक तो वहीं मिलेगा जहां से आय अच्छी होती हो।  सीमावर्ती क्षेत्रों से तस्करी और घुसपैठ को लेकर अनेक संगठन कमाई करते हैं और इसलिये वहां आतंकवादियों की सक्रियता भी रहती है।  इसलिये वहां सुरक्षाबलों से उनकी मुठभेड भी होती है जिसमें लोग मारे जाते हैं। मानवाधिकर कार्यकर्ता वहां एकदम सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता पर कोई आपत्ति नहीं है पर मध्य क्षेत्र में उनकी निष्क्रियता संदेह पैदा करती है।  पूर्वी क्षेत्र को लेकर इस समय हलचल मची हुई है।  हिंसक तत्व वहां की प्राकृत्तिक संपदा का दोहन करने का आरोप लगाते हुए सक्रिय हैं। वह अनेक बार अनेक सामान्य सशस्त्र कर्मियों को मार देते हैं पर इन हिंसक तत्वों में कोई मरता है तो मानवाधिकार कार्यकर्ता उसका नाम लेकर चिल्लाते हैं।  सवाल यह है कि क्या यह मानवाधिकार कार्यकर्ता यह मानते हैं कि सामान्य सुरक्षा अधिकारी या कर्मचारी का तो काम ही मरना है। उसका तो कोई परिवार ही नहीं है।  उसके लिये यह कभी आंसु नहीं बहाते।<br />
कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि अगर कहीं संसाधनों के वितरण को लेकर हिंसा हो रही है तो वह इसलिये नहीं कि आम आदमी तक उसका हिस्सा नहीं पहुंच रहा बल्कि यह कि उसका कुछ हिस्सा हिंसक तत्व स्वयं अपने लिये चाहते हैं।  इसके अलावा यह हिंसक तत्व आर्थिक क्षेत्र की आपसी प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे को निपटाने के काम भी आते हैं<br />
इसके बाद भी एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कुछ लोगों ने तो बड़ी बेशर्मी से खास जाति, भाषा और धर्म के समूह पकड़ कर उनके मानवाधिकारों के हनन का प्रचार कर रखा है।  इसमें भी उनका स्वार्थ दिखाई देता है।  इनमें अगर जातीय या भाषाई समूह हैं तो उनका धरती क्षेत्र ऐसा है जो धन की दृष्टि से उपजाऊ और धार्मिक है तो उसके लिये कहीं किसी संस्था से उनको अप्रत्यक्ष रूप से पैसा मिलता है-उनकी गतिविधियां यही संदेह पैदा करती हैं।  इधर फिर कुछ ऐसे देश अधिक धनवान हैं जो धर्म पर आधारित शासन चलाते हैं और उनके शासनध्यक्षों से कृपा पाने के लिये कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता उनके धर्म की पूरे विश्व में बजा रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यह मानवाधिकार कार्यक्रम चलाने वाले जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र की दृष्टि से बंटे समाज में ऐसे छिद्र ढूंढते हैं जिनको बंद करने का प्रयास सुधारक करते हैं।<br />
अखबार में एक नहीं अनेक ऐसी खबरें छपती हैं जिनमें मानवाधिकार हनन का मामला साफ बनता है पर वहां कार्यकर्ता लापता होते हैं।  कल एक ब्लाग में पढ़ने को मिला जिसमें बताया कि सरकार ने धारा 498-ए के तहत मामले छानबीन के बाद दर्ज करने का आदेश जारी किया है क्योंकि पाया गया कि इसमें फर्जी मामले दर्ज हुए और शिकायत में ढेर सारे नाम थे पर छानबीन के बाद जांच एजेंसियों ने पैसा खाकर कुछ लोगों को छोड़ा। इतना ही नहीं कई में तो शिकायत ही झूठी पायी गयी।  इससे अनेक लोगों को परेशानी हुई। इस तरह के कानून से हमारे भारतीय समाज के कितने लोगों को परेशानी झेलनी पड़ी है इस पर कथित रूप से कोई मानवाधिकार संगठन कभी कुछ नहीं बोला। सरकार ने स्वयं ही यह काम किया।  यह कैसे मान लें कि सरकार समाज का दर्द नहीं जानती। मानवाधिकार कार्यकर्ता तो केवल चिल्लाते हैं पर सरकार अपना काम करती है,यह इसका प्रमाण है<br />
सच तो हम नहीं जानते। अखबार और टीवी के समाचारों के पीछे अपने चिंत्तन के घोड़े दौड़ाते है-हमारे गुरु जी का भी यही संदेश है- तब यही सवाल हमारे दिमाग में आते हैं। दूसरा हमारा फार्मूला यह है कि आज कल कोई भी आदमी बिना स्वार्थ के समाज सेवा नहीं करता। फिर उनके चेहरे भी बताते हैं कि वह कितने निस्वार्थी होंगे।  हम ब्रह्मा तो हैं नहीं कि सब जानते हों। हो सकता है कि हमारी सोच में ही कमी हो। एक आम लेखक के रूप में यही अभिव्यक्ति दिखी, व्यक्त कर दी।<br />
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
</b><br />
<strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[योगासन,  प्राणायाम, ध्यान और धारणा-हिन्दी लेख (hindi lekh on yogasan)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/10/yogasan-dhyam-aur-pranayam-hindi-article/</link>
<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 03:56:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/10/yogasan-dhyam-aur-pranayam-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[प्राचीन भारतीय योग साधना पद्धति की तरफ पूरे विश्व का रुझान बढ़ना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। आज से द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>प्राचीन भारतीय योग साधना पद्धति की तरफ पूरे विश्व का रुझान बढ़ना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। आज से दस वर्ष पूर्व तक अनेक लोग योगसाधना को अत्यंत गोपनीय या असाधारण बात समझते थे। ऐसी धारणा बनी हुई थी कि योग साधना सामान्य व्यक्ति के करने की चीज नहीं है। इसका कारण यह था कि शरीर के लिये विलासिता की वस्तुओं का उपभोग बहुत कम था और लोग शारीरिक श्रम के कारण बीमार कम पड़ते थे।<br />
आज की नयी पीढ़ी के लोगों जहां भी वाहन का स्टैंड देखते हैं वहां पर पैट्रोल चालित वाहनों को अधिक संख्या में देखते हैं  जबकि पुरानी पीढ़ी के लोगों के अनुभव इस बारे में अलग दिखाई देते हैं।   पहले इन्हीं स्टैंडों पर साइकिलें खड़ी मिलती थीं। सरकारी कार्यालय, बैंक, सिनेमाघर तथा उद्यानों के बाहर साइकिलों की संख्या अधिक दिखती थी।  फिर स्कूटरों की संख्या बढ़ी तो अब कारों के काफिले सभी जगह मिलते हैं।  पहले जहां रिक्शाओं, बैलगाड़ियों तथा तांगों की वजह से जाम लगा देखकर मन में क्लेश होता था वहीं अब कारें यह काम करने लगी हैं-यह अलग बात है कि गरीब वाहन चालकों को लोग इसके लिये झिड़क देते थे पर अब किसी की हिम्मत नहीं है कार वाले से कुछ कह सके। </p>
<p>योगसाधना की शिक्षा बड़े लोगों का शौक माना जाता था। यह सही भी लगता है क्योंकि परंपरागत वाहनों तथा साइकिल चलाने वालों का दिन भर व्यायाम चलता था।  उनकी थकान उनको रात को चैन की नींद का उपहार प्रदान करती थी।  उस समय ज्ञानी लोगों का इस तरफ ध्यान नहीं गया कि लोगों को योगासन से अलग प्राणायाम तथा ध्यान की तरफ प्रेरित किया जाये।  संभवतः योगासाधना के आठों अंगों में से पृथक पृथक सिखाने का विचार किसी ने नहीं किया। अब जबकि विलासिता पूर्ण जीवन शैली है तब योगसाधना की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव की जा रही है तो उसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए।  पहले जब लोग पैदल अधिक चलने के साथ ही परिश्रम करते थे इसलिये उनका स्वास्थ्य सदैव अच्छा रहता था । बाद में साइकिल युग के चलते भी लोगों के स्वास्थ्य में शुद्धता बनी रही।  फिर योग साधना को केवल राजाओं, ऋषियों और धनिकों के लिये आवश्यक इसलिये भी माना गया क्योंकि वह शारीरिक श्रम कम करते थे जबकि बदलते समय के साथ इसे जनसाधारण में प्रचारित किया जाना चाहिये था।  भले ही शारीरिक श्रम से लोगों का लाभ होता रहा है पर प्राणायाम  से जो मानसिक लाभ की कल्पना किसी ने नहीं की।  श्रमिक तथा गरीब वर्ग के लिये  योगासन के साथ प्राणायाम  और ध्यान का भी  महत्व अलग अलग रूप से प्रचारित किया जाना जरूरी लगता है।  यह बताना जरूरी है कि जो लोग शारीरिक श्रम के कारण रात की नींद आराम से लेते हैं उनको भी जीवन का आनंद उठाने के लिये प्राणायाम और ध्यान करना चाहिये। </p>
<p>अब योग साधना के आठ भाग देखकर तो यही लगता है कि उसके आठ अंगों को -यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-एक पूरा कार्यक्रम मानकर देखा गया। सच तो यह है कि जो लोग परिश्रम करते हैं या सुबह सैर करके आते हैं उनको नियम, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि जैसे अन्य सात अंगों का भी अध्ययन करना चाहिये।  योगासन या सुबह की सैर के बाद प्राणायम और ध्यान की आदत डालना श्रेयस्कर है। जो लोग गरीब, मजदूर तथा अन्य शारीरिक श्रम करते हैं उनके लिये भी प्राणायाम के साथ ध्यान बहुत लाभप्रद है। इस बात का प्रचार बहुत पहले ही होना चाहिये था इसलिये  अब इस पर भी इस पर काम होना चाहिये।<br />
प्राणायाम  से प्राणवायु तीव्र गति से अंदर जाकर शरीर और मन के विकारों को परे करती है।  उसी तरह ध्यान भी योगासन और प्राणायाम के बाद प्राप्त शुद्धि को पूरी देह और मन में वितरित करने की एक प्रक्रिया है।  जब कभी आप थक जायें और सोने की बजाय आंखें बंद कर केवल बैठें और अपने ध्यान को भृकुटि पर केंद्रित करके देखें।  शुरुआत में आराम नहीं मिलेगा पर पांच दस मिनट बाद आप को अपने शरीर और मन में शांति अनुभव होगी।  जैसे मान लीजिये आप किसी समस्या से परेशान हैं। वह उठते बैठते आपको परेशान करती है।  आप ध्यान लगा कर बैठें।  समस्या हल होना एक अलग मामला है पर ध्यान के बाद उससे उपजे तनाव से राहत अनुभव करेंगे।  सच बात तो यह है कि हम अपने दिमाग और शरीर को बहुत खींचते हैं और उसको बिना ध्यान के विराम नहीं मिल सकता।  यह को व्यायाम नहीं है एक तरह से पूर्णाहुति है उस यज्ञ की जो हम अपनी देह के लिये करते हैं। शेष फिर कभी। </b><br />
<b>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://terahdeep.blogspot.com<br />
</b>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://rajlekh.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दयोग सारथी-पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नए स्वांग और मुखौटे-हास्य व्यंग्य कविताएँ (svang aur mukhaute-hindi satire poem)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/31/face-to-face-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sat, 31 Oct 2009 05:49:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/31/face-to-face-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[रोज रचते हैं नया स्वांग चेहरे पर लगाते नए मुखौटे और बदलकर आते हैं कपड़े मगर छद्म होकर भी करते हैं हमे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>रोज रचते हैं नया स्वांग<br />
चेहरे पर लगाते नए मुखौटे<br />
और बदलकर आते हैं  कपड़े<br />
मगर छद्म होकर भी   करते हैं हमेशा लफड़े.<br />
आदमी अपना बाहर का रूप<br />
कितना भी बदल ले<br />
अदाओं से पहचाना जाता है,<br />
जहां स्वर बदले<br />
शब्दों से पकड़ा जाता है,<br />
खुलकर सांस लेने से घबड़ाते हैं जो लोग<br />
छिपकर करते वार<br />
पर अपने हथियारों की शकल<br />
और तौरतरीकों  से जाते हैं पकड़े.</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>अपनी महफ़िल में उन्होंने बुलाया नहीं<br />
हमारी परवाह न होने का अहसास जताया.<br />
खूब चिराग जलाए उन्होंने<br />
पर अन्दर के अँधेरे में<br />
चमकता रहा हमारा चेहरा और नाम<br />
बड़ी मेहनत से उन्होंने छिपाया.<br />
हमारा नाम लेने पर उन्होंने<br />
अपने मेहमान पर गुस्सा दिखाकर<br />
अपनी नापसंदगी दिखाई<br />
पर सच है कि जो खौफ है<br />
उनके दिमाग में<br />
हमारे हाथ से जलते चिरागों से<br />
ज़माने के रौशन होने का<br />
वही अनजाने में बाहर आया.</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong>कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<blockquote><p>
<strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।</p>
<p>अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com/">4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सेल के रोग का इलाज नहीं-हास्य व्यंग्य कविता (sel rog ka ilaj-hasya vyangyakavita)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/23/sel-ki-bimari-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Fri, 23 Oct 2009 15:43:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/23/sel-ki-bimari-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[अपने साथ फंदेबाज एक पर्चा लेकर आया और हाथ में देते हुए बोला- ‘दीपक बापू, बूढ़े आदमियों के लिये तैयार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अपने साथ फंदेबाज  एक पर्चा लेकर आया<br />
और हाथ में देते हुए बोला-<br />
‘दीपक बापू,<br />
बूढ़े आदमियों के लिये<br />
तैयार कपड़ों की एक सेल लगी है<br />
चलो तुम्हें वहां से<br />
टोपी, कुर्ता धोती और स्वेटर दिलवायें<br />
बहुत पुराने लगते हैं तुम्हारी तरह<br />
तुम्हारें कपड़े भी सजायें।<br />
यह ठीक है अभी तक फ्लाप हो<br />
चिंता की बात नहीं<br />
पर कल हिट हो जाओगे<br />
तो कैसे सम्मेलनों में अपना चेहरा दिखाओगे<br />
सेल में एक चीज पर एक मुफ्त है<br />
एक रख लेना रोज पहनने के लिये<br />
दूसरा बाहर के लिये रख लेना<br />
चलो तो मौके का पूरा फायदा उठायें।’</p>
<p>सुनते ही भड़के फिर<br />
अपनी पुरानी टोपी की तरफ<br />
निहारते हुए बोले दीपक बापू<br />
‘कमबख्त, हमारे फ्लाप होने का ताना<br />
देने के लिये कोई बहाना ढूंढ जरूर लेना<br />
अरे, इस टोपी, धोती और स्वेटर के<br />
पुराने होने पर तुम्हें तरस आ रहा है<br />
पर कोई दूसरा तो नहीं गा रहा है<br />
एक के साथ एक फ्री ले आये थे<br />
पहले इसी इरादे से<br />
पर दोनों ही घिस गये<br />
अंतर्जाल पर टाईप करते<br />
पर हमारे ब्लाग अभी आहें भरते<br />
पैकिंग में धोती, कुर्ता, टोपी और स्वेटर<br />
बहुत अच्छे दिखे<br />
पर घर लाये तो सभी में छेद दिखे<br />
फिर तुम सभी जगह हमारे<br />
फ्लाप होने की कथा सुना रहे हो<br />
आपने हिट दोस्त होने का अच्छा साथ भुना रहे हो<br />
हम किस हाल में है<br />
भला कौन पाठक जानता है<br />
इतना ही ठीक है<br />
इस ‘एक के साथ एक फ्री’ में<br />
पगला गये हैं कई लोग<br />
जिसका इलाज नहीं है<br />
ऐसा बन गया है यह सेल का रोग<br />
हम तो मुफ्त में ब्लाग  लिखने  के साथ<br />
यह दूसरा फ्री का रोग नहीं पाल सकते<br />
रुपये भला कैसे लगायें।<br />
दो रोग पालना एक साथ मूर्खता है<br />
यह तुम्हें कैसे समझायें’’<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</b><br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com/">2.अनंत शब्दयोग</a><br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com/">4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खाली ज़ेब का रुआब-हास्य व्यंग्य कविता (khali zeb ka ruaab-hindi hasya kavita)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/18/khali-zeb-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 09:19:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/18/khali-zeb-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[सूखी मन गयी दिवाली क्योंकि जेब थी खाली, ज़माने में अपना रुआब दिखाने के लिए सबसे कह रहे हैं&#8221;हैप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सूखी मन गयी दिवाली<br />
क्योंकि जेब थी खाली,<br />
ज़माने में अपना रुआब  दिखाने के<br />
लिए सबसे कह रहे हैं&#8221;हैप्पी दीवाली&#8221;.</p>
<p><strong>जेब खाली हो तो<br />
अपना चेहरा आईने में देखते हुए भी<br />
बहुत डर लगता है<br />
अपने ही खालीपन का अक्स<br />
सताने लगता है।</p>
<p>क्यों न इतरायें दौलतमंद<br />
जब पूरा जमाना ही<br />
आंख जमाये है उन पर<br />
और अपने ही गरीब रिश्ते से<br />
मूंह फेरे रहता है।</p>
<p>अपना हाथ ही जगन्नाथ<br />
फिर भी लगाये हैं उन लोगों से आस<br />
जिनके घरों मे रुपया उगा है जैसे घास<br />
घोड़ों की तरह हिनहिना रहे सभी<br />
शायद मिल जाये कुछ कभी<br />
मिले हमेशा दुत्कार<br />
फिर भी आशा रखे कि मिलेगा पुरस्कार<br />
इसलिये दौलतमंदों के लिये<br />
मुफ्त की इज्जत और शौहरत का दरिया<br />
कमअक्लों की भीड़ के घेरे में ही बहता है।</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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<title><![CDATA[खेल और हवा-हिंदी व्यंग्य लघुकथा (khel aur hava-hindu laghu katha)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/06/fotbal-and-air-hindi-comedy-satire/</link>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 14:44:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/06/fotbal-and-air-hindi-comedy-satire/</guid>
<description><![CDATA[उसने एक फुटबाल ली और उस पर लिख दिया धर्म। वह उस फुटबाल के साथ एक डंडा लेकर उस मैदान में पहुंच गया जह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>उसने एक फुटबाल ली और उस पर लिख दिया धर्म। वह उस फुटबाल के साथ एक डंडा लेकर उस मैदान में पहुंच गया जहां गोल पोस्ट बना हुआ था। तमाम लोग वहां तफरी करने आते थे इसलिये वह पहले जोर से चिल्लाया और बोला-‘है कोई जो सामने आकर मुझे गोल करने से रोक सके।’<br />
उसने अपनी आंखों पर चश्मा लगा लिया था। उसका डीलडौल और हाथ में डंडा देखकर लोग डर गये और फिर वह शुरु हो गया उसके गोल करने का सिलसिला। एक के बाद एक गोल कर वह चिल्लाता रहा-है कोई जो मेरा सामना कर सके। देखों धर्म को मैं कैसे लात मारकर गोल कर रहा हूं।’<br />
लोग देखते और चुप रहते। कुछ बच्चे शोर बचाते तो कुछ बड़े कराहते हुए आपस में एक दूसरे का सांत्वना देते कि कोई तो माई का लाल आयेगा जो उसका गोल रोकेगा।’<br />
उसी समय एक ज्ञानी वहां से निकला। उसने यह दृश्य देखा और फिर उसके पास जाकर बोला-‘क्या बात है? सामने कोई गोल पर तो है नहीं जो गोल किये जा रहे हो।’<br />
वह बोला-‘तुम सामने आओ। मेरा गोल रोककर दिखाओ। यह फुटबाल मैंने एक कबाड़ी से खरीदी है और मैं चाहता हूं कि कोई मेरे से गोल गोल खेले।</p>
<p>ज्ञानी ने कहा-‘ यह होता ही है।  अगर फुटबाल है तो खेलने का मन होगा। डंडा है तो उसे भी किसी को मारने का मन आयेगा।  ऐसे में तुम्हारे साथ कोई नहीं खेलने आयेगा।’<br />
उसने कहा-‘तुम ही खेल लो। दम है तो आ जाओ सामने।’<br />
ज्ञानी ने उससे फुटबाल हाथ में ली और उसकी हवा भरने के मूंह पर जाकर उसका ढक्कन खोल दिया। वह पूरी हवा निकल गयी।<br />
वह चिल्लाने लगा और बोला-‘अरे, डरपोक हवा निकाल दी। अभी डंडा मारता हूं।’<br />
ज्ञानी ने कहा-‘फंस जाओगे। यहां बहुत सारे लोग हैं। फुटबाल पर तुमने धर्म लिखकर लोगों की भावनाओं को संशकित कर दिया था पर अब वह यहीं आयेंगे। देखो वह आ रहे हैं।’<br />
उसने देखा कि लोग उसकी तरफ आ रहे हैं। ज्ञानी ने कहा-‘तुम अब घर जाओ। यह तुम नहीं फुटबाल थी जो तुमसे खेल रही थी। फुटबाल में  हवा भरी थी  जो उसके साथ तुम्हें भी उड़ा रही थी।  वैसे तुम्हारी देह भी हवा से चल रही है पर यह हवा तुम्हारे दिमाग को भी चला रही थी। अब न यह फुटबाल चलेगी न  डंडा।’<br />
वह ज्ञानी ऐसा कहकर चल दिये तो तफरी करने आये एक सज्जन ने पूछा-‘पर आपने सब क्यों और कैसे किया?’<br />
ज्ञानी ने कहा-‘मैंने कुछ नहीं किया। यह तो हवा ने किया है।  उसे फुटबाल में भरी हवा ने बौखला दिया था। वह निकल गयी तो उसके लिये अपना यह नाटक जारी रखना कठिन था। मुझे करना ही क्या था? उसके कहने पर उसके साथ फुटबाल खेलने से अच्छा है कि उसकी हवा निकाल कर मामला ठंडा कर दो। फुटबाल खेलता तो वह गोल रोकने को लेकर विवाद करता। मेरे गोल पर आपत्तियां जताता। उसको छोड़ कर जाता तो वह यहां भीड़ के लोगों को बेकार में डराता। इससे अच्छा है कि धर्म नाम लिखकर झगड़ा बढ़ाने की उसकी योजना को फुटबाल में से हवा निकाल कर बेकार कर दिया जाये।’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;. </b><br />
<a href="http://bharatdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप<strong></strong></p>
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<title><![CDATA[बहस कि कामेडी-हिंदी लघु व्यंग्य (disscusion as a comedy-hindi satire)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/05/bahas-aur-comedy-hindi-laghkatha/</link>
<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 14:21:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/05/bahas-aur-comedy-hindi-laghkatha/</guid>
<description><![CDATA[उस उद्यान में ज्ञानियों के बीच देश की गरीबी मिटाने के लिये बहस चल रही थी। विषय था देश में गरीबी और श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>उस उद्यान में ज्ञानियों के बीच  देश की गरीबी मिटाने के लिये बहस चल रही थी। विषय था देश में गरीबी और शौषण खत्म कैसे किया जाये। सभी सजधजकर बहस करने आये थे। सभी वक्ता अपने अपने विचार रख रहे थे।<br />
एक ने कहा ‘हमें गरीबों के दिमाग में अपने अधिकार के लिये चेतना जगाने का अभियान छेड़ना चाहिये।<br />
वहीं एक फटीचर आदमी भी बैठा था। उसने उठकर पूछा-‘पर कैसे? क्या कहें गरीबों से जाकर कि अमीरों का पैसा छीन लो!’<br />
सभा के संचालक ने उसे बिठा दिया और कहा‘-आप आमंत्रित वक्ता नहीं है इसलिये बहस मत करिये।’<br />
दूसरे वक्ता ने कहा-‘हमें एक आंदोलन छेड़ना चाहिये।’<br />
वह फटीचर फिर उठकर खड़ा हो गया और बोला-‘बहस और आंदोलन तो बरसों से चल रहे हैं।’<br />
संचालक फिर चिल्लाया-‘चुपचाप बैठ जाओ। वरना बाहर फैंक दिये जाओगे।  हम कितने गंभीर विषय पर बहस कर रहे हैं और तुम अपनी टिप्पणियां मुफ्त में दिये जा रहे हो।’<br />
वह फटीचर आदमी वहां से चला गया तो एक विद्वान ने दूसरे से पूछा-‘यह कौन फटीचर यहां आ गया था।’<br />
दूसरे ने कहा-‘पता नहीं।’<br />
वहीं एक दूसरा फटीचर आदमी र्बैठा था वह बोला-‘वह मेरा दोस्त था। पहले किताबें पढ़कर बहुत बहस कर चुका है पर जब से  बहुत ज्ञानी हो गया तब से उसने ऐसी बहसें बंद कर दी हैं। अलबत्ता कभी कभी चला आता है ऐसी बहसें देखने। क्योंकि इसे इसमें कामेडी नजर आती है।’<br />
यह बात सुनते ही दोनों विद्वानों का खूल खौल उठा वह बोले-‘तू हमारी बहस को कामेडी कहता है।’<br />
वह दोनों उठकर खड़े गये और चिल्लाने लगे कि‘यह हमारी बहस को कामेडी कह रहा है। इसे मारो पीटो।’<br />
सब लोग उस पर चढ़ पड़े। वह चिल्लाता रहा‘मैं नहीं वह कहता है।’<br />
उसके पुराने  कपड़ों में पहले ही पैबंद लगे थे वह और अधिक फट गये। जब वह पिट पिटकर बेहोश हो गया तब उसे छोड़ दिया गया। विद्वान फिर बहस करने लगे।  कुछ देर बात उसे होश आया तो वह दोनों विद्वान वहीं बैठे बहस मेें व्यस्त थे। उसने उनसे कहा-‘यार, मैं थोड़े ही कहता हूं। वह कहता है। तुम दोनों क्यों पिटवाया।’<br />
उनमें से एक ने कहा-‘हम विद्वान है सांप को निकलने देते हैं उसके बाद लकीर पीटते हैं।’<br />
वह बिचारा वापस अपने दोस्त के पास पहुंचा और पूरा हाल बताकर बोला-‘यार, किस मुसीबत में फंसा आये। हम तो सोच रहे थे कि विद्वान हैं पर वह हिंसा पर उतर आये।’<br />
उसने जवाब दिया-‘यह भ्रम मुझे भी होता था। इसलिये तुझसे कहता हूं कि ऐसी जगहों पर अधिक मत रुका करो। वहां बहस वही करते हैं जो किताबी ज्ञानी हैं। कबीरदास जी कह गये हैं कि किताब पढ़ने वालों को अहंकार आ ही जाता है।  मैं भी तुझसे कहता हूं कि ऐसी बहसें कामेडी नाटक की तरह हैं क्योंकि किताबी ज्ञानी लकीर के फकीर होते हैं पर वहां सबके बीच में नहीं कहा।  सच बात भी सही जगह और सही समय पर बोलना चाहिये। बस तुम्हारे और मेरे बीच यही अंतर है। इसलिये मैं तुम्हें अल्पज्ञानी कहता हूं। मैंने खतरा देखा तो निकल लिया और तुम फंसं गये।’</p>
<blockquote><p>
<strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[ पसंद कि नापसंद-हास्य व्यंग (hindi comedy satire) ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/02/funny-not-funny-hindi-comedy-satire/</link>
<pubDate>Fri, 02 Oct 2009 14:26:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/02/funny-not-funny-hindi-comedy-satire/</guid>
<description><![CDATA[एक सज्जन ने मन्नत मांगी थी कि अगर उनको कभी कहीं से कोई सम्मान प्राप्त होगा तो वह किसी नये कवि का सम्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>एक  सज्जन ने मन्नत मांगी थी कि अगर उनको कभी कहीं से कोई सम्मान प्राप्त होगा तो वह किसी नये कवि का सम्मेलन करायेंगे।  इससे तो उनका सम्मान का प्रचार तो होगा ही साहित्य में नयी पीढ़ी को आगे लाने के लिये भी प्रसिद्धि मिलेगी। दरअसल उन्होंने अपने बेकारी के दिनों में अनेक कवितायें लिखी थी जिनका एक किताब के रूप में प्रकाशन कराया। उन्होंने अपने मित्र को वह कविता दिखाई तो उसने कहा-‘‘चुपचाप इनको रख लो। यह कवितायें तुम्हारी मजाक बनवायेंगी। अलबत्ता जब तुम्हारे सपंर्क बन जायें तो इस किताब के सहारे कोई सम्मान वगैरह जुगाड़ लेना क्योंकि तुम जिस तरह अपने व्यवसाय में आगे जा रहे हो तुम्हारे लिये अच्छे अवसर हैं।’’<br />
वह सज्जन अनेक तरह के ठेके लिया करते थे।  ढेर सारी किताबें रखने के लिये उन्होंने एक अलमारी बनवायी थी जिस पर रोज अगरबत्ती जलाकर घुमाते।<br />
इधर समय के साथ उनके व्यवसाय के साथ बड़े और प्रतिष्ठित लोगों से  संपर्क बढ़ रहे थे।  एक कारखाने में निर्माण का  ठेका उनको मिला। वह कंपनी अवार्ड वगैरह भी बांटा करती थी। दरअसल उसका यह समाज कल्याण अभियान बड़े लोगों से संपर्क बढ़ाने के लिये था और वह अपने को फायदा देने वालों को सम्मानित भी कर चुकी थी। ठेकेदार सज्जन की उसी कंपनी के प्रबंधक से बातचीत हुई। ठेकेदार सज्जन को मालुम था कि यह कंपनी अवार्ड वगैरह बांटती है इसलिये वह प्रबंधक से अधिक प्रगाढ़ संबंध  बनाने लगे। एक दिन उन्होंने प्रबंधक से कहा-‘आप हमें साहित्य के लिये अपना अवार्ड दिलवा दीजिये। आपका कमीशन दुगना कर देता हूं।’<br />
प्रबंधक ने कहा-‘पहले वह किताब दिखाओ। नहीं दिखाना है तो कमीशन तीन गुना करो।’<br />
ठेकेदार सज्जन बहुत खुश हो गये।  मन ही मन कहने लगे कि‘यह बेवकूफ है, अगर चार गुना भी कहता तो देता।’<br />
उन्होंने अपनी सहमति दी।  इस तरह यह इनाम उनको मिल गया। वह भी साहित्यकार के रूप में। शहर भर के साहित्यकारों को तो मानो सांप सूंध गया। हरेक कोई एक दूसरे से पूछा रहा था  कि ‘यह कौन महाकवि इस शहर में रहता है जो हमारी नजर से नहीं गुजरा। कभी किसी मंच पर नही देखा। उसका अखबार में नहीं पढ़ा।’<br />
सम्मान मिलना तो सो मिल गया। एक दो आलोचक उनके घर पहुंच गये और कविता के शीर्षकों से ही समीक्षा अखबारों में लिखकर छाप दी। ठेकेदार सज्जन ने बकायदा आलोचकों की खातिर की।  इधर उनके मन में बस एक ही बात थी कि किसी नये लेखक का एकल पाठ कराकर अपनी वह मिन्नत पूरी करूं जो किसी दिन मन में आ गयी थी।  भले ही दस वर्ष बाद यह पूरी हुई पर मिन्नत का मान रखना भी जरूरी था।  मुश्किल यह थी कि पहले उन्होंने नये कवि को अच्छी खासी रकम देने का विचार रखा था पर इधर खर्चा इतना हो गया कि वह सोच रहे थे कि सस्ते में निपट जाये। इसी चिंता में रहते थे। घर से बाहर एक दिन एक लड़का उनको मिल गया जिसके बारे में उनको पता लगा कि उसकी कोई कविता कहीं छपी थी-यह दावा वह मोहल्ले में करता फिर रहा था।</p>
<p>उन्होंने उससे पूछा-‘‘क्यों गंजू उस्ताद, कैसी चल रही है तुम्हारी कवितागिरी।’’<br />
गंजू उस्ताद ने कहा-‘आपसे तो अच्छी नहीं चल रही।  अब सोच रहा हूं कि मैं भी ठेकेदारी शुरु करूं। बहुत दिनों से काम तलाश रहा हूं। सोच रहा हूं कि आपको गुरु बना लूं।  हो सकता है एक दो अवार्ड अपने किस्मत में भी आ जाये।’<br />
ठेकेदार सज्जन ने कहा-‘अरे, कहां ठेकेदारी के चक्कर में पड़े हो। तुम तो अपनी कविता सविता के साथ आनंद करो।’<br />
गंजू उस्ताद बीच में ही बोल पड़ा-‘‘छि&#8230;छि&#8230;&#8230;&#8230;चुप हो जाईये। अभी अभी तो मेरी शादी हुई है। किसी ने सुना लिया कि सविता से मेरा चक्कर था तो गड़बड़ हो जायेगी।’’<br />
ठेकेदार ने कहा-‘‘कविता के साथ मैंने तो ऐसे ही सविता जोड़ दिया। इधर मैं सोच रहा हूं कि तुम्हारा काव्य पाठ करवा दूं। इससे तुम्हें प्रचार मिलेगा और मुझे भी तसल्ली होगी कि साहित्य की सेवा की।’’<br />
गंजू उस्ताद बोला-‘‘हां, पर अब आप मुझे उस्ताद न कहकर कवि नाम से पुकारें। आप अवसर दे रहे हैं तो अच्छी बात है। आप तैयारी करिये मैं अपनी नयी नवेली पत्नी के पास जाकर उसे यह खबर देता हूं। वह मुझे निठल्ला कहने के साथ ही कवितायें जलाने की धमकी देती है। इधर पिताजी भी कह रहे हैं कि अब तेरी शादी हो गयी तो कुछ कमाई करो। आप कितना पैसे देंगे।’’<br />
ठेकेदार ने कहा-‘‘अरे, तुम्हें एक कवि सम्मेलन मिल गया तो फिर रास्ता खुल जायेगा। यही क्या कम है?’’<br />
गंजू उस्ताद मान गया। वह गया तो ठेकेदार सोचने लगा कि ‘कितना बेवकूफ है कि अगर पांच सात सौ रुपये  भी मांगता तो मैं देता।’<br />
एक पार्क में बने बनाये मंच पर गंजू उस्ताद का एकल कविता पाठ प्रारंभ हुआ।  मगर वह नया था उसे क्या मालुम कि कवितायें ठेली जाती हैं श्रोताओं की परवाह किये बिना।  वह हर कविता पर श्रोताओं से पूछता-‘‘आप बताईये कि यह कविता आपको पसंद आयी।’’<br />
लोग चिल्लाये -‘‘नापसंद नापसंद’’।<br />
इस तरह उसने दस कवितायें सुनायी।  अब तो हर कविता की समाप्ति पर लोग चिल्लाते-‘‘नापसंद नापसंद।’’<br />
गंजू उस्ताद के बारे में यह कहा जाता है कि जब वह घर में अपने माता पिता से नाराज होता तो अपने कपड़े फाड़ने और बाल नौचने लगता था। इतना ही नहीं फिर घर से बाहर आकर ऐसे ही पत्थर उड़ाने लगता।  यह बचपन की बात थी पर जब लोगों ने उसे इस तरह प्रताड़ित किया तो खिसियाहट में अपने बाल्यकाल में चला गया।  वह अपने कपड़े फाड़ने लगा। उधर से लोग चिल्लाये ‘‘पसंद पसंद’’।<br />
वह बाल नौचने लगा। लोग चिल्लाये-‘‘पसंद पसंद’’।<br />
वह मंच से उतर गया और पत्थर उछालने लगा। लोग चिल्लाने लगे ‘‘पसंद पसंद।’’<br />
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे ठेकेदार सज्जन भाग निकले। उनके पीछे गंजू उस्ताद भी भाग निकला। पीछे से लोग भी चिल्लाते हुए भागे-‘पसंद पसंद’<br />
बाद में वह ठेकेदार सज्जन से मिला-‘‘और कुछ नहीं तो मेरे कपड़े फट गये उसके पैसे दे दो। आपको पता है कि वह शादी में मुझे ससुराल से मिले थे। आपके कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये मैंने उनको फाड़ डाला। तभी तो लोग चिल्ला रहे थे ‘पसंद पसंद’। वरना तो ‘नापसंद नापसंद’ कर पूरा कार्यक्रम ही बरबाद किये दे रहे थे।’’<br />
ठेकेदार सज्जन बोले-‘बेशरम आदमी! तुम्हारी वजह से मेरी बदनामी हुई है।  मैंने तुम्हार काव्य पाठ सुनने के लिये कार्यक्रम करवाया था या लोगों की पसंद नापसंद जानने के लिये।  अरे, यह भीड़ है इस पर चाहे जितना अपनी कवितायें या कहानी थोप दो चुपचाप झेलती है। अगर बोलने का अवसर दो तो फिर यही करती है जो तुम्हारे साथ किया।’<br />
गंजू उस्ताद उदास होकर चला गया।  इधर ठेकेदार सज्जन सोचने लगे कि‘अगर जिद्द करता तो एक दो हजार मैं दे ही देता। चलो अच्छा है चला गया।  मुझे तो अपना प्रचार मिल ही गया न!<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</b></p>
<blockquote><p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी ब्लाग अंग्रेजी से आगे निकल सकते हैं-आलेख]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/27/hindi-and-inglish-blog-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 27 Sep 2009 14:57:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/27/hindi-and-inglish-blog-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[अंतर्जाल पर कौन कितना सफल है यह तो कहना कठिन है क्योंकि यहां अनेक तरह के फर्जीवाड़े हैं जिनको समझना ए]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अंतर्जाल पर कौन कितना सफल है यह तो कहना कठिन है क्योंकि यहां अनेक तरह के फर्जीवाड़े हैं जिनको समझना एक कठिन काम है। चाहे किसी भी भाषा के ब्लाग हैं उनको लेकर अनेक तरह के भ्रम बने ही रहते हैं।  अनेक दिलचस्प बातें सामने आती हैं।  लोग तमाम तरह की वेबसाईटों पर अपने ब्लाग की रेटिंग दिखाकर अपने को सबसे सफल ब्लाग या वेबसाईट लेखक होने का दावा भी करते हैं।  अनेक लोगों को तो यह लगता है कि हम तो अच्छा लिख नहीं रहे इसलिये सफल नहीं है।<br />
अनेक समझदार ब्लाग लेखक ऐसी बातें लिख जाते हैं उनके आशय कुछ भी लिये जा सकते हैं।  अभी कुछ दिनों पहले एक समाचार था कि अंतर्जाल पर लिखे जा रहे ब्लागों को एक ही आदमी पढ़ता है।  इसका आशय यह भी हो सकता है कि लेखक स्वयं ही पढ़ता है या  यह भी हो सकता है कि जिन वेबसाईटों पर ब्लाग बने हैं वहीं से उनकी सामग्री देखी जा सकती है या कहीं उनके द्वारा कुछ लोग इसके लिये नियुक्त हैं जिन्हें रोज ब्लाग पर व्यूज भेजने के लिये रखा गया है।<br />
एक कमाने वाले ब्लाग लेखक ने लिखा था कि ‘हजारों ऐसे पाठक लेकर क्या करूंगा जिनसे मुझे एक पैसा भी न मिले। मुझे तो दस ऐसे ही पाठक काफी हैं जो मेरे विज्ञापनों से मुझे आय अर्जित करायें।’<br />
अब सच क्या है कोई नहीं जानता। अलबत्ता इतना तय है कि अनेक तरह के फर्जीवाड़े संभावित हैं इसलिये यह कहना कठिन है कि कौन कितना सफल है? यह बात  केवल ब्लाग लेखकों तक नहीं बड़ी बड़ी वेबसाईटों पर भी लागू होती है।  अलबत्ता आॅनलाईन से जनता का काम करने वाली व्यवसायिक वेबसाईटें जरूर अधिक देखी जाती हैं पर वह सफलता और असफलता के दायरे से बाहर हैं। संभव है कोई ऐसा ब्लाग या वेबसाईट लेखक हो जिसको एक हजार पाठक रोज देखते हों और वह कमाता भी हो तो उसे सफल मान लिया जाये और जिसे सौ पाठक देखते हों और वह न कमाता हो उसे असफल मान लिया जाये। इसमें एक पैंच ही फंसता है कि जिसके पास सौ पाठक हों संभव है  वह पूरी तरह से सौ हों और जिसके पास हजार हों उसके लिये केवल बीस ही सक्रिय हों।  जो ब्लागर कमा रहे हैं उनकी इस बात के लिये प्रशंसा करना चाहिए कि वह आय अर्जित करने का गुर सीख गये हैं और नये लोगों को उनसे प्रेरणा भी लेना चाहिए। मुश्किल यह है कि जिनके लिये अंगूर खट्टे हैं वह कैसे संतोष करें। न पैसा मिले न प्रतिष्ठा उनके लिये क्या है यहां पर? ऐसे में उनके पास एक ही चारा है कि वह अपने पास ऐसे कांउटर लगायें जिससे पता लगे कि उनको कितने लोग पढ़ रहे हैं और कहीं मित्र लोग ही तो केवल फर्जी व्यूज नहीं दे रहे  क्योंकि सफलता का भ्रम तो असफलता से भी अधिक बुरा होता है।<br />
इधर हमने <a href="http://www.shinystat.com">शिनी का स्टेट कांउटर</a> लगाकर देखा। यह कांउटर केवल वर्डप्रेस के ब्लाग पर लगाया यह देखने के लिये कि आखिर देखें तो सही कि हमारे ब्लाग किस दिशा में जा रहे हैं। इस कांउटर के साथ अच्छी बात यह है कि इसने ब्लाग के वर्गीकरण कर दिये हैं। पंजीकृत समझ में अधिक नहीं आया पर जो उचित लगा वह वर्ग ले लिया। इसमें मनोरंजन और साहित्य के अलग अलग वर्ग लिये।<br />
इसका अवलोकन करने के बाद करने पर पता चला कि अंग्रेजी के ब्लागों पर भी अब हिंदी ब्लाग की बढ़त बन सकती है।  इतना ही नहीं यौन सामग्री से सुसंज्जित सामग्री के मुकाबले भी साहित्य का स्थान बन सकता है।  इस कांउटर पर अभी अन्य ब्लाग अधिक पंजीकृत नहीं है इसलिये यह कहना कठिन है कि उनके मुकाबले इस लेखक के ब्लाग का क्या स्तर है? अलबत्ता प्रारंभ में ही हिंदी ब्लागों को  पचास में 10 से 13 तक अंक और समाज में <a href="http://dpkraj.wordpress.com">ई पत्रिका</a> और <a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com">दीपक बापू कहिन</a> को साहित्य वर्ग  मे 22, 23 स्थान मिलना अच्छा संकेत है। वैसे <a href="http://deepakraj.wordpress.com">हिंदी पत्रिका </a>को मनोरंजन के अन्य वर्ग में 82 वां स्थान मिला है पर वहां उसके सामने अंग्रेजी ब्लाग हैं जो शायद अधिक पढ़े जाते है। यह ब्लाग दो दिन पहले तक 92 वें स्थान पर था। यह आंकड़े ऊपर नीचे होंगे। यह कोई बड़ी सफलता का प्रमाण भी नहीं है पर इससे एक बात साफ है कि अंतर्जाल पर  हिंदी की पाठक संख्या ठीक ठाक है और भविष्य में हिंदी ब्लाग अंग्रेजी को जरूर चुनौती देंगे।  वैसे ब्लाग स्पाट के ब्लाग की सफलता का सबसे अच्छा आंकलन गूगल विश्लेषण प्रस्तुत करता है जिसका दावा है कि वह आपको फर्जी व्यूज से भ्रमित होने से बचाता है।  इसके बावजूद अन्य वेबसाईटों पर भी ब्लाग की स्थिति देखी जा सकती है पर उनके साफ्टवेयरों पर अनेक लोग संदेह जाहिर करते हैं। अलबत्ता शिनी ने जो अलग वर्ग बनाये हैं वह एक अच्छी बात है। हमने <a href="http://www.shinystat.com">यह कांउटर</a> एक किसी हिंदी ब्लाग लेखक के ब्लाग से दो सप्ताह पहले  ही लिया था पर यह पता नहीं वह किस श्रेणी में पंजीकृत हैं क्योंकि हमने अपनी श्रेणियों में उनको देखने का प्रयास किया था पर दिखाई नहीं दिया। यहां यह भी याद रखने लायक है कि अनेक वेबसाईटें ऐसी हैं जो वहां पंजीकरण कराने पर रैकिंग देती हैं इसलिये उनको लेकर अपना यह दावा करना ठीक नहीं लगता कि हम सफल हैं, क्योंकि संभव है कि अन्य अपंजीकृत ब्लाग हमसे भी श्रेष्ठ हो सकते हैं।</p>
<p>हां, एक मजेदार बात सामने आई। कहा जाता है कि अधिकतर ब्लाग को एक आदमी पढ़ता है। लेखक समेत हम दो मान लें तो सफलता का एक पैमाना यह भी होता है कि आपके ब्लाग को तीसरा आदमी भी पढ़ता दिखे। इस काउंटर पर हमने अपने ब्लाग पर आनलाईन पाठक की संख्या पांच से सात तक देखी है। इसका आशय यह है कि हमारे ब्लाग उस दायरे से तो बाहर निकल गये हैं जो उसे एक या दो पाठक तक ही सीमित रहते हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com/">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लागर सरकार पर एसा वैसा मत लिख देना-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya on blogger sarkar)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/23/hindi-comede-satire-on-blogger/</link>
<pubDate>Wed, 23 Sep 2009 17:02:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/23/hindi-comede-satire-on-blogger/</guid>
<description><![CDATA[सर्दी की सुबह चाय पीने के बाद ब्लागर कोहरे में घर से बाहर निकला। उसका शरीर ठंड से कांप रहा था पर चाय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सर्दी की सुबह चाय पीने के बाद ब्लागर कोहरे में घर से बाहर निकला। उसका शरीर ठंड से कांप रहा था पर चाय पीने से जो पेट मं गैस बनती है उससे निपटने का ब्लागर के पास यही एक नुस्खा था कि वह बाहर टहल आये।   वह थोड़ा दूर चला होगा तो उसे कालोनी के नोटिस बोर्ड पर एक पर्चा चिपका दिखाई दिया।  वह उसे देखकर कर अनेदखा कर निकल जाता पर उसे लगा कि कहीं ब्लागर शब्द लिखा हुआ है। वह सोच में पड़ गया कि यह आखों का वहम होगा।  भला यहां कौन जानता है ब्लागर के बारे में। फिर वह रुककर उस पर्चे के पास गया और उसे पढ़ने लगा। उस पर लिखा था कि</p>
<blockquote><p>
<strong>‘आज ब्लागर सरकार की दरबार  पर विशेष कार्यक्रम होगा। सभी इंटरनेट धार्मिक बंधुओं से निवेदन है कि वहां पहुंचकर लाभ उठावें  । इस अवसर पर ब्लागर सरकार की विशेष आरती होगी उसके बाद समस्त धार्मिक बंधुओं को ज्योतिष,विज्ञान,तकनीकी तथा वैवाहिक ब्लाग तथा वेबसाईटों की जानकारी दी जायेगी। ब्लागर सरकार की पूजा से अनेक लोगों ने इंटरनेट पर हिट पाये हैं और उनके प्रवचन भी इस अवसर पर आयोजित किये जायेंगे। स्थान-नीली छतरी, दो पुलों के बीच, घाटी के बगल में। निवेदक ब्लागर स्वामी। </strong></p></blockquote>
<p>ब्लागर का माथा ठनका। वह भागा हुआ घर लौटा। गृहस्वामिनी ने कहा-‘क्या बात है इतनी जल्दी लौट आये। क्या सर्दी सहन नहीं हुई। मैंने पहले ही कहा था कि बाहर मत जाओ।’<br />
ब्लागर ने कहा-‘यह बात नहीं हैं। मैं साइकिल पर जा रहा हूं थोड़ा दूर जाना होगा। वह जो दूसरा ब्लागर है न! उसने शायद कोई ब्लागर सरकार का दरबार के नाम से कुछ बनाया है। इतने दिन से आया नहीं हैं। मैं समझ गया था कि वह कुछ न कुछ करता होगा।<br />
गृहस्वामिनी ने कहा-‘वह क्यों ब्लागर सरकार का दरबार बनायेगा। उसके सामने तो वैसे ही सर्वशक्तिमान का पुराना बना बनाया दरबार है जहां उसकी महफिल जमती है।’<br />
ब्लागर ने कहा-‘पर ठिकाना वही है। जरूर वह कुछ गड़बड़ कर रहा है। मैं जाता हूं। यह दरबार उसी का होना चाहिये। उसने कोई नया बखेड़ा खड़ा किया होगा। वह बहुत दिनों से उस दरबार में भक्तों के जमावड़े और चढ़ावा बढ़ाने की योजनायें बन रहा है।<br />
गृहस्वामिनी ने कहा-‘तो फिर स्कूटर ले जाओ।’<br />
ब्लागर अपने पुराने स्कूटर की तरफ झपटा तो गृहस्वामिनी ने कहा-‘अब इस पुराने स्कूटर को मत ले जाओ।  नया स्कूटर ले जाओ। वैसे ही वहां भीड़ होगी और वह मजाक बनायेगा। उसके नये दरबार में अपनी भद्द मत पिटवाओ।<br />
ब्लागर ने अपना नया स्कूटर लिया। रास्ते में उसका कालोनी का एक मित्र टिप्पणी स्वामी मिल गया। उसे जब ब्लागर ने अपनी बात बताई तो वह भी उसके साथ हो लिया। स्कूटर पर बैठते हुए वह बोला-‘वैसे तो वह तुम और वह दोनों फालतू हो पर क्योंकि स्कूटर तुम्हारा है और पेट्रोल भी तो साथ चलता हूं।  मेरा घूमना फ्री में हो जायेगा इसलिये साथ चल रहा हूं।’<br />
दोनों स्कूटर पर सवाल होकर साढ़े तीन मिनट में-टिप्पणी स्वामी की वहां पहुंचते ही दी गयी टिप्पणी के अनुसार-वहां पहुंच गये। ब्लागर का  संदेह ठीक था। दूसरे ब्लागर ने अपने सामने बने पुराने दरबार पर पहले ही कब्जा कर रखा था और उसके आंगन में खाली पड़ी जमीन पर बना दिया था ‘ब्लागर सरकार का दरबार’।<br />
ब्लागर अपना स्कूटर सीधे अंदर ले गया। वहां एक आदमी तौलिया पहने दांतुन कर रहा था। उसने सिर से ठोढ़ी तक टोपा  तथा शरीर पर भारीभरकम पुराना स्वेटर पहनकर रखा था। मूंह में दातुन रखे ही उसने ब्लागर की तरफ उंगली उठाकर कहा-‘उधर रखो। इधर स्कूटर कहां रख रहे हो। यह ब्लागर सरकार का दरबार है।’<br />
ब्लागर उसे घूर कर देख रहा था। टिप्पणी स्वामी ने उससे कहा-‘अरे, भाई यह ब्लागर सरकार का दरबार है और हमारे यह मित्र ब्लागर हैं। इस दरबार का जो स्वामी है वह इनका खास मित्र है। जाओ उसे बुलाओ। ब्लागरों का स्कूटर भी खास होता है।’  </p>
<p>जानता हूं। जानता हूं। इसका नया स्कूटर तो क्या पुरानी साइकिल भी खास होती है।’ यह कहकर वह आदमी कुल्ला करने गया। इधर पहले ब्लागर ने टिप्पणी स्वामी से कहा-‘अरे, तुमने पहचाना नहीं यही है वह ब्लागर स्वामी। अब लौटते ही  शाब्दिक आक्रमण करेगा।’<br />
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘अरे, यार मैंने उसे एक बार ही देखा है। तुम तो अक्सर उससे मिलते हो।’</p>
<p>उधर से दूसरा ब्लागर लौटा और पहले ब्लागर से बोला-‘यह कौन कबूतर पकड़ लाये? जो मुझे बता रहा है कि तुम्हारा स्कूटर खास है?<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘यह टिप्पणी स्वामी है।  कभी कभार टिप्पणी देता है। हालांकि जबसे इसके मकान की उपरी मंजिल बनना शुरू हुई तब से इसकी पत्नी इसे इंटरनेट पर काम नहीं करने देती इसलिये वह भी अब बंद है।  बहरहाल यह ब्लागर सरकार के दरबार का क्या चक्कर है।’</p>
<p>दूसरे ब्लागर ने कहा-‘चक्कर क्या है? अधार्मिक कहीं के।  तुम अपनी टांग क्यों फंसाने आ गये? तुम तो अध्यात्मिक ज्ञान और धर्म को अलग अलग मानते हो न! क्या जानो धर्म के बारे में।  चक्कर नहीं है। यह मेरीे श्रद्धा और आस्था है। उस दिन रात को सपने में ब्लागर सरकार के दर्शन हुए और उन्होंने बताया कि उनकी स्थापना करूं!  आजकल इंटरनेट  के समय लोग सर्वशक्तिमान के सभी नाम और स्वरूपों को पुराना समझते हैं इसलिये उन्होंने मुझे इस नये स्वरूप की स्थापना का संदेश दिया। वैसे तुम यहां निकल लो क्योंकि तुम अपने ब्लाग पर मूर्तिपूजा के विरुद्ध लिखते रहते हो जबकि चाहे जिस दरबार में मूंह उठाये पहुंच जाते हो।  हमारा चरित्र तुम्हारी तरह दोहरा नहीं है।’<br />
टिप्पणी स्वामी ने पहले ब्लागर से कहा-‘यार, यह तो तुम्हें काटने दौड़ रहा है। इसे मालुम नहीं कि तुम अध्यात्म के विषय पर लिखते हो।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘कोई बात नहीं। इस बिचारे का दोष नहीं है। बहुत व्यस्त आदमी है इसलिये इसे पढ़ने का अवसर नहीं मिलता।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-वैसे तुम पढ़ने लायक लिखते क्या हो जिसे मैं  पढ़ूं। वैसे इस नये स्कूटर का मुहूर्त करने यहां आये हो क्या? यह केवल खाली हाथ मुझे दिखाकर क्या दिखाना चाहते होे। वैसे मैंने तुम्हें उस दिन नये स्कूटर पर  देख लिया था। अब बताओ यहां किसलिये आये हो।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम्हारे इस दरबार का पर्चा अपनी कालोनी में पढ़ा। मुझे लगा कि यह तुम्हारा कोई नया स्वांग है जिसे देखने चला आया।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘हां, तुमसे यही उम्मीद थी।  तुम मेरी धार्मिक भावनाओं को आहत कर रहे हो। वैसे तुम चाहे कितना भी लिखो जब तक ब्लाग स्वामी की कृपा नहीं होगी तब तक तुम हिट नहीं हो सकते।’<br />
पहला ब्लागर-‘ठीक है पहले तुम्हारे ब्लागर सरकार की मूर्ति अंदर चलकर  देख लें।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-नहीं। तुम जैसे नास्तिकों का अंदर प्रवेश वर्जित है।’<br />
टिप्पणीकार बोला-‘मैं तो अस्तिक हूं।  अंदर जाकर देख सकता हूं न!<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘नहीं! तुम इसके  साथी हो। नास्तिक का साथी भी नास्तिक ही होता है मेरे सामने तुम्हारा यह पाखंड नहीं चल सकता।’<br />
पहला ब्लागर बोला-‘ठीक है। अंदर क्या जाना? यहीं से पूरी तस्वीर दिख रही है। यह पत्थर की है न!<br />
दूसरा ब्लागर-‘नहीं प्लास्टिक की है। आर्डर देकर बनवाई है।<br />
पहला ब्लागर बोला-‘यार, फिर तुम मुझसे नाराज क्यों होते हो? मैंने तो कभी प्लास्टिक की मूर्तियों की पूजा करने से तो रोका  नहीं है।  वैसे यह डिजाइन तो ठीक है।’<br />
दूसरा ब्लागर-‘‘हां, डिजाइन पर अधिक पैसा खर्च हुआ है जो भक्तों के चंदे से मिले हैं। जैसे सपने में डिजाईन जैसी देखी थी वैसी ही बनवाई है।’<br />
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘यह डिजाईन तो शायद मैंने किसी पत्रिका में देखा था। फिर पैसे किस पर खर्च हुए। लगता है किसी ने ठग लिया।’<br />
दूसरा ब्लागर-टिप्पणी स्वामी! तुम अपनी बेतुकी टिप्पणियां करने बाज आओ। कहीं ब्लागर सरकार नाराज हो गये तो तुम्हारा इस दोस्त को एकाध टिप्पणी मिलती है उससे भी  तरस जायेगा। मकान बनने के बाद भी तुम्हारी पत्नी तुम्हें इंटरनेट पर काम करने नहंी देगी।<br />
दोनों मूर्तियां देखने लगे। कंप्युटर के उपर रखे कीबोर्ड पर अपने दोनों हाथों की उंगलियां रख ेएक चूहा बैठा मुस्कराने की मुस्कराने की मुद्रा में था। कंप्यूटर से जुड़ी हर सामग्री को वहां दिखाया गया था। कंप्यूटर की स्क्रीन पर लिखा था ब्लागर सरकार।</p>
<p>टिप्पणीकार ने धीरे से कहा-‘यह चूहा और कीबोर्ड कंप्यूटर  के ऊपर क्यों रखा हुआ है।’<br />
दूसरा ब्लागर चीखा-‘चूहा! अरे, यही तो हैं ब्लागर स्वामी! तुम कुछ तो सोचकर बोला करो। अपने इस दोस्त के चक्कर में तुम भी वैसी ही बेहूदा टिप्पणियां कर रहे हो जैसे यह पाठ लिखता है।’<br />
पहला ब्लागर अभी प्लास्टिक की मूर्ति को घूर रहा था। फिर बोला-‘मैंने अपनी कालोनी में एक पहचान वाले के यहां ऐसी ही मूर्ति देखी थी। वह बता रहे थे कि उन्होंने यह कबाडी को बेची थी।’<br />
दूसरा ब्लागर’-‘तुम क्या कहना चाहते हो कि मैंने यह कबाड़ी से खरीदी थी। अब तुम जाओ। यार, तुम मेरा समय खोटी कर रहे हो। अब यहां भक्तों के आने का समय हो गया है।  यहां पर मैंने लोगों को ज्योतिष,चैट,विवाह तथा नौकरी में मदद देने के लिये असली कंप्यूटर लगा रखे हैं। वह भक्त आते होंगे।<br />
पहले ब्लागर ने देखा कि टीन शेड से बने केबिन थे जहां कंप्यूटर रखे दिख रहे थे।  दूसरा ब्लागर बोला-‘जैसे जैसे भक्तों के कमेंट आते जायेंगे वैसे वैसे दरबार का विकास होता जायेगा।’<br />
ब्लागर और टिप्पणी स्वामी ने आश्चर्य से पूछा-‘कमेंट!<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘कमेंट यानि चढ़ावा। अरे, इतने दिन से ब्लागिंग कर रहे हो तुम्हें मालुम नहीं कि कमेंट भी चढ़ावे की तरह होता है और प्रसाद भी! वैसे तुम क्या समझोगे? तुम्हारे पाठ पढ़ता कौन है? जो कमेंट लगायेगा।’<br />
दूसरा ब्लागर मूर्ति तक गया और वहां से लड्ड्ओं की थाली ले आया। उस एक लड्ड् के दो भाग किये। एक भाग अपने मूंह में रख गया। फिर दूसरे भाग के दो भाग कर उसका एक भाग अपने मूंह में रख लिया और बाकी के दो भागों में एक पहले ब्लागर को दूसरा टिप्पणी स्वामी को देते हुए बोला-तुम दोनों तो हो नास्तिक। फिर भी यह थोड़ा थोड़ा प्रसाद खा लो। कल हमारे यहां एक लड़के को इंटरनेट पर चैट करते समय अपनी गर्लफ्रैंड का पहला ईमेल मिला तो उसने मन्नत पूरी होने पर यह लड्डूओं की कमेेंट चढ़ा गया।’<br />
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘इसकी क्या जरूरत थी। हम तो ब्लागर सरकार के दर्शन कर वैसे ही बहुत खुश हो गये।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘चुपचाप खालो टिप्पणी स्वामी! वरना इससे भी जाओगे।<br />
फिर उसने दूसरे ब्लागर से पूछा-‘वह तुम्हारा विशेष कार्यक्रम कब है?’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘परसों हो गया। क्या तुमने उस पर्चे में तारीख नहीं पढ़ी थी।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, जोश में होश नहीं रहा। अच्छा हम दोनों चलते हैं।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘बहुत मेहरबानी! अब मैं ब्लाग सरकार की विशेष आरती करूंगा। ब्लाग सरकार की मेहरबानी हो तो अच्छा अच्छे कमेंट आयेंगे तो तुम दोनों की शक्लें देखने से जो  बुरा टोटका हो गया उसको मिटाने के लिये यह जरूरी है। और हां! ब्लागर सरकार पर कुछ एैसा-वैसा मत लिख देना।’</p>
<p>पहला ब्लागर और टिप्पणी स्वामी स्कूटर से वापस लौटने लगे। टिप्पणी स्वामी ने पहले ब्लागर से पूछा-‘तुम इस पर कुछ लिखोगे।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, हास्य व्यंग्य!<br />
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘पर उसने मना किया था न! कहा था कि ब्लागर सरकार पर कुछ एैसा-वैसा मत लिख देना।’<br />
पहले ब्लागर ने स्कूटर रोक दिया और बोला-‘यार, उसने हास्य व्यंग्य लिखने से मना तो नहीं किया था!  चलो लौटकर  फिर भी पूछ लेते हैं।’<br />
टिप्पणीकार हैरान होकर उसकी तरफ देखने लगा। फिर पहले ब्लागर ने कहा-‘अगली बार पूछ लूंगा।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-patrika.com">‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल का दिमाग से रिश्ता-हिंदी कविता (dil aur dimag-hindi sahityak kavita)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/14/heart-and-mind-hindi-poem/</link>
<pubDate>Mon, 14 Sep 2009 16:13:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/14/heart-and-mind-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[दिल में कुछ दिमाग में कुछ जुबां से दूसरे बोल ही निकल आते हैं। दिल का दिमाग से दिमाग का जुबां से रिश्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>दिल में कुछ<br />
दिमाग में कुछ<br />
जुबां से दूसरे बोल ही निकल आते हैं।<br />
दिल का दिमाग से<br />
दिमाग का जुबां से रिश्ता<br />
भला कितने लोग जान पाते हैं।<br />
दूसरों से संवाद क्या करेंगे<br />
अपने ही भाव नहीं पढ़ पाते हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
अर्थहीन शब्द<br />
औपचारिक संवाद<br />
सुनने की आदत हो गयी है।<br />
दोस्ती और रिश्तों की भीड़ में<br />
आत्मीयता ढूंढती थक चुकीं<br />
मन की आंखें, अब सो गयी हैं।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-patrika.com/">‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हुकुम मेरे आका-हास्य व्यंग्य कविता(hukum mere aka-hasya hindi kavita]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/13/vine-aur-jinn-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 08:04:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/13/vine-aur-jinn-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[शराब की बोतल से जिन्न निकला और उस पियक्कड़ से बोला -&#8221;हुकुम मेरे आका! आप जो भी मुझसे मंगवाओगे व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><span style="font-size:large;">शराब की बोतल से जिन्न निकला </span><br />
<span style="font-size:large;">और उस पियक्कड़ से बोला </span><br />
<span style="font-size:large;">-&#8221;हुकुम मेरे आका! </span><br />
<span style="font-size:large;">आप जो भी मुझसे मंगवाओगे</span><br />
<span style="font-size:large;">वह ले आउंगा </span><br />
<span style="font-size:large;">बस शराब की बोतल नहीं मंगवाना </span><br />
<span style="font-size:large;">वरना मुझसे हाथ धोकर पछताओगे.</span><br />
<span style="font-size:large;"><br />
</span><br />
<span style="font-size:large;">सुनकर पियक्कड़ बोला</span><br />
<span style="font-size:large;">-&#8221;मेरे पास बाकी सब है </span><br />
<span style="font-size:large;">उनसे भागता हुआ ही शराब के नशे में</span><br />
<span style="font-size:large;">घुस जाता हूँ </span><br />
<span style="font-size:large;">दिल को छु ले, ऐसा कोई प्यार नहीं देता </span><br />
<span style="font-size:large;">देने से पहले प्यार, अपनी कीमत लेता </span><br />
<span style="font-size:large;">तुम भी दुनिया की तमाम चीजें लेकर</span><br />
<span style="font-size:large;">मेरा दिल बहलाओगे </span><br />
<span style="font-size:large;">मैं तो शराब ही मांगूंगा </span><br />
<span style="font-size:large;">मुझे मालूम है तुम छोड़ जाओगे.</span><br />
<span style="font-size:large;">जाओ जिन्न किसी जरूरतमंद के पास</span><br />
<span style="font-size:large;">मुझे नहीं खुश कर पाओगे..</span><br />
<span style="font-size:large;">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</span><br />
<strong>रिश्ते और समय की धारा-हिंदी कविता </strong><br />
<strong>हम दोनों तूफान में फंसे थे<br />
उनको सोने की दीवारों का<br />
सहारा मिला<br />
हम ताश के पतों  की तरह ढह गये।</p>
<p>अब गुजरते हैं जब उस राह से<br />
यादें सामने आ जाती हैं<br />
कभी अपनो की तरह देखने वाली आंखें<br />
परायों  की तरह ताकती हैं<br />
रिश्ते समय की धारा में यूं ही बह गये।<br />
जुबां से निकलते नहीं शब्द उनके<br />
पर इशारे हमेशा   बहुत कुछ कह गये।</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://teradipak.blogspot.com/"></a>पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p>
‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</p></blockquote>
</blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दोनों तूफान में फंसे थे-हिंदी कविता(rishton men tufan-hindi poem)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/02/rishti-yoon-bah-gaye-hindi-kavita/</link>
<pubDate>Wed, 02 Sep 2009 15:19:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/09/02/rishti-yoon-bah-gaye-hindi-kavita/</guid>
<description><![CDATA[हम दोनों तूफान में फंसे थे उनको सोने की दीवारों का सहारा मिला हम ताश के पतों की तरह ढह गये। अब गुजरत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>हम दोनों तूफान में फंसे थे<br />
उनको सोने की दीवारों का<br />
सहारा मिला<br />
हम ताश के पतों  की तरह ढह गये।</p>
<p>अब गुजरते हैं जब उस राह से<br />
यादें सामने आ जाती हैं<br />
कभी अपनो की तरह देखने वाली आंखें<br />
परायों  की तरह ताकती हैं<br />
रिश्ते समय की धारा में यूं ही बह गये।<br />
जुबां से निकलते नहीं शब्द उनके<br />
पर इशारे हमेशा   बहुत कुछ कह गये।</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[नकली खून और डाक्टर-हास्य व्यंग्य (nakle khoon aur dactor-hindi hasya vyangya)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/08/31/blood-and-doctor-hindi-satire/</link>
<pubDate>Mon, 31 Aug 2009 15:45:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/08/31/blood-and-doctor-hindi-satire/</guid>
<description><![CDATA[डाक्टर साहब बाहर ही मिल गये। उस समय वह एक किराने वाले से सामान खरीद रहे थे और हम पहले लेचुके सामान क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>डाक्टर साहब बाहर ही मिल गये। उस समय वह एक किराने वाले से सामान खरीद रहे थे और हम पहले लेचुके सामान का पैसा उसे देने गये थे। दुपहिया से जैसे ही उतरे डाक्टर साहब से नमस्कार किया और पैसा देकर जैसे ही वापस मुड़े तो डाक्टर साहब ने पूछा-‘कहीं बाजार जा रहे हैं।’<br />
हमने कहा-‘हां, आज अवकाश का दिन है सोच रहे हैं कि बाजार जाकर घूमे और सामान खरीद लायेें।’<br />
डाक्टर साहब बोले-हां, सप्ताह में एक बार बाजार जाना स्वास्थ्य के लिये अच्छा होता है।  आदमी रोज घर का खाना खाते हुए उकता जाता है, इसलिये कभी बाजार में खाना बुरा नहीं है।’<br />
हम रुक गये और उनकी तरफ घूर कर देखा और कहा-‘पर एक बार जब हम बीमार पड़े थे तब आपने कहा था कि बाजार का खाना ठीक नहीं होता। तब से लगभग हमने यह कार्य बंद ही कर दिया है।’<br />
वह बोले-‘हां, पर यह छह वर्ष पहले की बात है। वैसे आजकल आप सुबह योग कर लेते हैं इसलिये अब आपको इतनी परेशानी नहीं आयेगी।  वैसे क्या आपने वाकई बाजार का खाना पूरी तरह बंद कर दिया है।’<br />
हमने कहा-‘अधूरी तरह किया था पर अब तो टीवी वगैरह ने नकली घी, तेल, दूध, चाय तथा खोये का ऐसा खौफ भर दिया है कि बाजार में खाने के सामान की  खुशबू नाक को कितना भी परेशान करे पर उस पर अपना ध्यान नहीं जाने देते।’<br />
डाक्टर साहब बोल-‘हां, यह तो सही है पर सभी जगह थोड़े ही नकली सामान मिल रहा है।’<br />
हमने कहा-‘आपकी बात सही है पर हम करें क्या? आधा आपने डराया और आधा इन टीवी वालोें ने।  जैसे आपकी सलाह के बाद हमने योग साधना शुरु की वैसे ही बाहर का खाना भी बंद कर दिया है।’<br />
डाक्टर साहब बोले-‘ आप अपने स्वास्थ्य के प्रति आप सजग है, यह अच्छी बात है। वैसे आप बहुत दिनों से घर नहीं आये।’<br />
हमने हंसते हुए कहा-‘डाक्टर साहब, आपके घर आने से बचने के लिये तो रोज सुबह इतनी मेहनत करते हैं। पहले आपकी और अब टीवी वालों की चेतावनी को इसलिये ही याद रखते हैं क्योंकि हमें आपके घर आने से डर लगता है।  अनेक बार तो बुखार और जुकान की बीमारियों से स्वतः ही निपटते हैं क्योंकि सोचते हैं कि हमने जो खराब खाना खाया है उसका दुष्प्रभाव कम होते ही सब ठीक हो जायेगा।’<br />
डाक्टर साहब हंस पड़े-हां, वैसे भी हम छोटी मोटी बीमारियों का इलाज करते हैं पर बड़ी बीमारी के लिये तो बड़े डाक्टर के पास मरीज को भेजना ही पड़ता है।’<br />
हमने बातों ही बातों  में उनसे पूछा-‘डाक्टर साहब आप नकली खून की पहचान कर सकते हैं।’<br />
वह एकदम बोले-‘हम तो होम्योपैथी के डाक्टर हैं। इसके बारे में ज्यादा नहीं जानते अलबत्ता टीवी पर देखा तो हैरान रह गये।’<br />
हमने कहा-‘मतलब यह है कि कभी किसी को बड़ी बीमारी हो और उसमें दूसरे का खून शरीर में देना जरूरी हो तो आपके पास न आयें। आपने तो हमारी उम्मीद ही तोड़ दी।’<br />
डाक्टर साहब बोले-‘आपकी बात सुनकर मेरा ध्यान अपने चचेरे भाई की तरफ चला गया है।   एक किडनी खराब होने के कारण वह एक अस्पताल में भर्ती है  और उसे निकाला जाने वाला है। उसके लिये भी खून की जरूरत है। मैं अभी जाकर अपने दूसरे चचेरे भाई को फोन कर कहता हूं कि जरा देखभाल कर खून ले आये।’<br />
डाक्टर साहब के चेहरे पर चिंता के भाव आ गये और वह शीघ्र  वहां से चले गये।  एक डाक्टर की आंखों में ऐसे चिंता के भाव देखकर हमें हैरानी हुई साथ ही यह चिंता भी होने लगी कि कहीं हमें अपने या किसी अन्य के लिये खून की जरूरत हुई तो क्या करेंगे? ऐसे में हमें सिवाय इसके कुछ नहीं सूझता तो फिर योग साधना का विचार आता है।  सोचने लगे कि थोड़ी योग साधना से छोटी बीमारियों को ठीक कर लेते हैं तो क्यों न कल से अधिक अधिक कर बड़ी बीमारियों को अपने से दूर रखने का प्रयास करें।  हालांकि कभी कभी लगता है कि इनसे अच्छा तो टीवी देखना ही बंद कर दें। वह बहुत सारी चिंतायें देने लगता है। कहा भी गया है कि ‘चिंता सम नास्ति शरीरं शोषणम्।’<br />
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<p>hindi aritcle, hindi laghu katha, hindi vyangya, खून, डाक्टर, बीमारी, मनोरंजन, हिंदी साहित्य</p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[ हिन्दी के  कवि और शायर बिना पढ़े ही गीता पर लिखते हैं-हिन्दी आलेख (Hindi poet writes on without reading the Gita - Hindi article) ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/08/29/hindi-kavi-and-shayar-writting-on-gita/</link>
<pubDate>Sat, 29 Aug 2009 05:46:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/08/29/hindi-kavi-and-shayar-writting-on-gita/</guid>
<description><![CDATA[अक्सर अनेक कवितायें, शायरियों गीत, और गद्य रचनायें हमारे सामने आती हैं जिसमें भारतीय धर्म ग्रंथों के]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अक्सर अनेक कवितायें, शायरियों गीत, और गद्य रचनायें हमारे सामने आती हैं जिसमें भारतीय धर्म ग्रंथों के साथ ही अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें भूलकर इंसान से प्रेम करने का संदेश  शामिल होता है। जिन कवियों और शायरों को देशभक्ति, एकता और धार्मिक सद्भावना सुसज्जित कर अपनी रचनाओं में दिखानी होती है वह अक्सर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के साथ ही अन्य धार्मिक ग्रंथों पर भी बरसने लगते हैं।  इस पर कोई आपत्ति नहीं करता क्योंकि अपने देश के लोगों का यह रवैया है कि चलो हमारे साथ दूसरे धर्म की पुस्तक को भी भुलाने की बात तो कही।  हमारा कान पकड़ तो दूसरे का भी तो नहीं छोड़ा।<br />
अगर कोई कवि या शायर अकेली यह बात कहे कि श्री रामायण या श्री रामचरित मानस पढ़ना छोड़ दो, श्रीगीता और वेद  पुराण और श्रीगीता भूल जाओ तो उस पर हाहाकार मच जायेगा। लोग उस पर छद्म धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगा देंगे। अगर उसने किसी अन्य धर्म का नाम लिया तो उस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लग जायेगा।   अगर भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के साथ अन्य धर्म की पुस्तकों को त्यागने की बात कोई शायर, कवि या निबंधकार कहता है तो कोई उस पर ध्यान नहीं देता।  चलो हमें काना कहा तो दूसरे को भी तो एक आंख वाला कहा।<br />
अगर कोई अन्य भारतीय धर्मग्रंथ की बात कहे तो हम भी मूंह फेर सकते हैं पर जब मामला श्रीगीता का हो तब बात हमें कुछ जमती नहीं।  हमें याद है कि बचपन में हमने जब हिंदी का प्रारंम्भिक ज्ञान प्राप्त किया था तब  महाभारत ग्रंथ पढ़ते समय हमने श्रीगीता को पढ़ा था तब समझ में नहीं आया, पर कहते हैं कि बचपन में कोई बात भले ही समझ में न आये पर उसका अर्थ कहीं न कहीं आदमी के जेहन में रहता है।  यही हाल हमारे साथ श्रीगीता का हुआ।  अन्य किसी धर्मग्रंथ से जब भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ की तुलना किसी फिल्मी या साहित्यक गीत, कविता, शायरी या आलेख में होती तो हम सहजता से लेते पर श्रीगीता का नाम आते ही असहज होते हैं।  जब हिंदी का पूर्णता से ज्ञान हुआ तब पता लगा कि यह दुनियां की इकलौती ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान और विज्ञान है। समय के साथ हम भी चलते रहे पर श्रीगीता का ज्ञान कहीं न कहीं हमारे मस्तिष्क में रहा।  इस पर अनेक लेख समाचार पत्रों में भेजे पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।  तब हम सोचते थे कि हो सकता है कि हमारे लिखे में कमी हो। </p>
<p>इधर जब से अंतर्जाल पर लिखने का सौभाग्य मिला तो हमने सोचा कि चलो यहां अपनी अध्यात्मिक भूख भी मिटा लो।  ऐसा करते हुए हमारा ध्यान श्रीगीता की तरफ जाना स्वाभाविक था।  सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लिखने से पहले हम इतना नहीं लिखते थे पर कहते हैं कि लिखते लिखते लव हो जाये।  जब भी अवसर मिलता है श्रीगीता पर अवश्य लिखते हैं और यही लिखते लिखते हमें ऐसा लग रहा है कि या तो हम ही कुछ दिमाग से विचलित हैं या फिर शायर और कवि लोग ही सतही रूप से लिखते रहे हैं।  एक तरह से वह कार्ल माक्र्स और अंग्रेजों के चेलों की संगत में नारे और वाद ढोने आदी हो गये हैं।<br />
नारों और वाद पर चलने के आदी हो चुके इस समाज से यह आशा ही नहीं करना चाहिये कि वह कवियों और शायरों की  चालाकियों को समझकर उनकी योग्यता पर उंगली उठाये।  हम तो दूसरी बात कहते हैं कि जिस विषय पर आप जानते नहीं उस पर नहीं लिखें।  हमने केवल भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ ही पढ़े हैं इसलिये उन पर लिखते हैं-वह भी सकारात्मक पक्ष में। न तो हमने  विदेशी लेखकों को पढ़ा है न ही गैर भारतीय धर्म ग्रंथों को देखा  है इसलिये उन पर नहीं लिखते।  उनकी आलोचना भी नहीं करते क्योंकि उर्दू शायरों की यह प्रवृत्ति हमें बिल्कुल नहीं भाती कि बिना जाने ही किसी विषय पर भी कुछ लिखने लगो।<br />
एक सवाल हमारे दिमाग में आता है कि अगर कोई अन्य धर्म का भारतीय व्यक्ति भारतीय धर्म ग्रंथ पर कुछ प्रतिकूल बात कहता है तो हम उस पर चढ़ दौड़ते हैं  चाहे भले ही उसने अपने धर्म ग्रंथ पर भी प्रतिकूल लिखा या कहा हो पर अगर कोई भारतीय धर्म का व्यक्ति ऐसा करे तो उसे हम सामान्य कहकर नजरअंदाज करते हैं-क्या यह हमारी बौद्धिका संकीर्णता का प्रमाण नहीं है।<br />
दरअसल हुआ यह है कि उर्दू शायरों की लच्छेदार शायरियों से प्रभावित होकर जब देश के लोग वाह वाह करने लगे होंगे तो तो हिंदी कवि भी इसी राह पर चल पड़े होंगे। इसमें भी एक पैंच हैं। भले ही उर्दू और हिंदी समान भाषायें लगती हैं पर दोनों का भाव अलग है।  एक बार धर्म को लेकर मामला बढ़ गया था तब एक विद्वान ने कहा कि अंग्रेजी में रिलीजन शब्द का भाव सीमित है पर हिंदी में धर्म शब्द का भाव बहुत व्यापक है। यही हाल उर्दू का है। उर्दू का प्यार शब्द दैहिक संबंधों तक ही सीमित है जबकि हिंदी का प्रेम शब्द इतना व्यापक है कि उसे इंसान के अलावा सर्वशक्तिमान और अन्य जीवों से भी जोड़ जाता है और उसे तभी समझा जा सकता है जब हमारे अपने आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति आस्था हो।  मुख्य बात संकल्प की है और हिंदी के प्रेम शब्द का उच्चारण करते ही हमारे अंदर समस्त जीवों के प्रति दया, करुणा और सहृदयता का भाव आता है।<br />
बात कहां से शुरु हुई और कहां पहुंच गयी।  उर्दू शायरों में केवल श्रोताओं और लेखकों में सतही भाव पैदा करने की ललक होती है।  इसके विपरीत हिंदी कवियों में इसके साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान जाग्रत करने का भाव भी पैदा होता है।  मगर उर्दू शायरों की सफलता ने हिंदी कवियों को भी पथभ्रष्ट कर दिया है।  यही कारण है कि कबीर, रहीम, तुलसी और मीरा के बाद फिर कोई कवि  रत्न पैदा ही नहीं हुआ।  यह शिकायत नहीं है और न ही किसी कवि विशेष के विरुद्ध प्रचार है बल्कि अपनी बात कहने का अंतर्जाल पर कहने का जो अवसर मिला है उसका लाभ उठाने का एक प्रयास भर है।  हमें तो हर पाठक और लेखक प्रिय है। जो लिखने और पढ़ने में परिश्रम करते हैं।  परिश्रम करने वालों का प्रेम करते हुए उनका  सम्मान करना  चाहिये- श्रीगीता को पढ़ने और समझने के बाद हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। शेष फिर कभी<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दूसरे की दौलत  को धूल समझें-चाणक्य नीति (dusre ki daulat ko dhool samjhen-chankya niti]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/12/doosre-ki-daulat-dhool-chankya-niti/</link>
<pubDate>Sun, 12 Jul 2009 09:51:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/12/doosre-ki-daulat-dhool-chankya-niti/</guid>
<description><![CDATA[यो मोहन्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी। स तस्य वशगो मूढो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत्।। हिंदी मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>यो मोहन्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी।<br />
स तस्य वशगो मूढो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत्।।</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद चाणक्य के अनुसार कुछ पुरुषों में विवेक नहीं होता और वह सुंदर स्त्री से व्यवहार करते हुए यह भ्रम पाल लेते हैं कि वह वह उस पर मोहित है। वह भ्रमित पुरुष फिर उस स्त्री के लिये ऐसे ही हो जाता है जैसे कि मनोरंजन के लिये पाला गया पक्षी।<br />
<strong>मातृवत् परदारांश्चय परद्रव्याणि लोष्ठवत्।<br />
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स नरः।।</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>दूसरों की पत्नी को माता तथा धन को मिट्टी के ढेले की भांति समझना चाहिये। इस संसार में वह यथार्थ रूप से मनुष्य है जो सारे प्राणियों को अपनी आत्मा की भांति देखने वाला मानता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>हर व्यक्ति को अपने अंदर विवेक धारण करना चाहिये। कुछ लोग स्त्रियों के  विषय में अत्यंत भ्रमित होते हैं।  उनको लगता है कि कोई स्त्री उनसे अच्छी तरह बात कर रही है तो इसका आशय यह है कि वह उन पर मोहित है-यह उनका केवल एक भ्रम है। स्त्रियों का स्वभाव तथा वाणी कोमल होती है और इसी कारण वह हमेशा मृदभाषा से पुरुषों का मन मोह लेती हैं पर कुछ अज्ञानी और अविवेकी पुरुष यह भ्रम पाल कर अपने आपको ही कष्ट देते हैं कि वह उनके प्रति आकर्षित है।<br />
नीति विशारद चाणक्य ऐसे व्यक्तियों की तरफ संकेत करते हुए कहते हैं कि दूसरे की स्त्री को माता के समान समझना चाहिये। उसी तरह दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला समझना चाहिये। वह यह भी कहते हैं कि इस संसार में वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो सभी लोगों को देह नहीं बल्कि इस संसार में दृष्टा की तरह उपस्थित आत्मा ही मानता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कल्पित भाभी, कामयाबी की चाभी,-व्यंग्य कविता kalpit bhabhi, kamyabi ki chabhi-vyangya kavita]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/10/kavita-on-bhabhi/</link>
<pubDate>Fri, 10 Jul 2009 18:20:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/10/kavita-on-bhabhi/</guid>
<description><![CDATA[कवि देवर ने लिखी अपनी प्यारी भाभी पर कविता ‘बहुत सुंदर और सुशील हैं मेरी भाभी मेरी कामयाबी की है चाभ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>कवि देवर ने लिखी<br />
अपनी प्यारी भाभी पर कविता<br />
‘बहुत सुंदर और सुशील हैं मेरी भाभी<br />
मेरी कामयाबी की है चाभी।<br />
जब कहीं जाता था साक्षात्कार के लिये<br />
वही मेरा सामान बनाती<br />
अटैची में कपड़े सजाती<br />
मेरी कामयाबी के लिये<br />
सर्वशक्तिमान की मूर्ति के सामने<br />
दिल लगाकर आरती गाती<br />
भाई के साथ फेरे लगाकर आई<br />
जैसे मैने नई मां पाई<br />
दिल करता है मां संबोधित करूं न कि भाभी।’<br />
लेकर पहुंचा वह मित्र के पास<br />
राय मांगने तो उसने कहा<br />
‘किस जमाने को कवि हो<br />
उगते नहीं जैसे डूबते रवि  हो<br />
भला आज के जमाने में ऐसी<br />
पुरातनपंथी कवितायें को लिखता है<br />
इसलिये तू फ्लाप दिखता है<br />
अगर जमाने में वाह वाह चाहिये<br />
तो पात्र बना अपनी कविता में<br />
असली नहीं बल्कि कल्पित भाभी।<br />
उसे रोज  होटलों में भेज<br />
जहां सजे उसकी  अय्याशी की सेज<br />
नाम देशी रखना<br />
पर लगाना अंग्रेजी टखना<br />
हो जायेगी हिट, तेरी भी भाभी।<br />
कामयाबी की इमारत में<br />
घुसने के लिये यही है तेरे लिए चाभी।’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-patrika.com">‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शराबी ईमेल-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/06/sharabi-email-hindi-hasya-vyangay/</link>
<pubDate>Mon, 06 Jul 2009 15:28:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/06/sharabi-email-hindi-hasya-vyangay/</guid>
<description><![CDATA[उस ईमेल में सबसे ऊपर लगे फोटो में शराब की बोतलें सजी थीं। नीचे संदेश में लिखा था कि ‘कृपया इस ईमेल क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>उस ईमेल में सबसे ऊपर लगे फोटो में  शराब की बोतलें सजी थीं।  नीचे संदेश में लिखा था कि ‘कृपया इस ईमेल को ध्वस्त न करें। इसे पढ़ें और अपने अन्य मित्रों को  भेजें। इस ईमेल को पढ़कर एक आदमी ने इसे ध्वस्त कर दिया तो अगले दिन ही सुबह उसके घर में रखी शराब की बोतल अपने आप ही गिर कर टूट गयी।<br />
एक आदमी ने यह ईमेल पांच लोगों को भेजा तो उसे सुबह ही मुफ्त पांच बोतलों का पार्सल मिला।<br />
एक आदमी ने इसे दस लोगों को भेजा तो उसे उसके मित्र ने एक बढ़िया काकटेल पार्टी दी।<br />
एक अधिकारी ने इसे पंद्रह लोगों को भेजा तो अगले दिन ही उसे प्रमोशन मिल गया।’<br />
यह एक मित्र ने भेजा था और साथ में लिखा था कि इसे मजाक न समझें।  हम बहुत गंभीर हो गये। इस बात को लेकर कि हम जैसे व्यक्ति के साथ इस तरह का मजाक करना खतरनाक भी हो सकता था। छहः वर्ष पहले छूटी लत वापस भी आ सकती थी पर लिखने का यह नशा जो बचपन से लगा है उसकी वजह से बचने की संभावना थी पर फ्री में शराब की बोतल का मोह छोड़ना मुश्किल था।<br />
अगले दिन  हम एक शराब की दुकान के पास से गुजर रहे थे तो ईमेल की याद आ गयी तो वहीं  खड़े हो गये। दरअसल हमें उस फोटो की याद आ गयी। पीछे से एक मित्र ने टोककर कहा-‘चले जाओ, खरीद लो बोतल। डरते किसलिये हो। कोई नहीं देख रहा सिवाय हमारे।  हां अगर घर बुलाकर एकाध पैग पिला दो तो हम किसी से नहीं कहेंगे। वैसे तुम कवि हो और इसका सेवन तुम्हारे लिये फायदेमंद है। अच्छी कवितायें लिख लोगे।<br />
हमने कहा-‘क्या इस शराब वाले ने तुम्हें कोई कमीशन दिया है जो प्रचार कर रहे हो? हम तो बस बोतलें देख रहे  थे। वैसे ही सजी थीं जैसे कि हमारे ईमेल पर। हमने पांच लोगों को ईमेल भेजा है और सोच रहे थे कि शायद यह शराब वाला हमें मुफ्त में दो चार शराब की बोतलें देगा।  सुबह से कोई पार्सल तो मिला नहीं।’<br />
वह मित्र घूरकर हमें देखने लगा और बोला-‘यह क्या कह रहे हो?’<br />
हमने कहा-‘सच कह रहे हैं हमने पांच लोगों को ईमेल किया है। हमें एक ईमेल मिला था जिसमें लिखा था कि यही ईमेल अगर मित्रों को भेजोगे तो कुछ न कुछ  मिलेगा। हमने सोचा कि ब्लाग तो हमारे हिट होने से रहे तो हो सकता है कि शराब की एकाध बोतल ही फ्री में मिल जाये।’<br />
उसे हमने पूरी कथा सुनाई तो वह एकदम चीख पड़ा-‘क्या बात है शराब के नाम पर अभी भी तुम बहकने लगते हो।  कहते हो कि छोड़ दी है फिर यह कैसा स्वांग रचा है। लगता है कि इंटरनेट ने तुम्हारे दिमाग के सारे बल्ब फ्यूज कर दिये हैं।’<br />
हमने कहा-‘सच कह रहे हैं हमने पांच लोगों को ईमेल भेजा है।’<br />
’’अच्छा-‘’वह घूरकर बोला-‘आज से बीस साल पहले हमने तुम्हें एक सर्वशक्तिमान की एक दरबार के लिये एक पर्चा दिया था कि इसे छपवाकर सौ लोगों को दो तो फायदा होगा तब तुमने कहा था कि यह सब ढकोसला है और आज ईमेल पर शराब का संदेश भेजने की बात आ गयी तो सब भूल गये। क्या जमाना आया गया। आदमी सर्वशक्तिमान के संदेश छपवाता नहीं है पर शराब के ईमेल भेजने को तैयार है।’<br />
तब हमें याद आया कि इस तरह के पर्चे पहले छपते थे कि अमुक जगह सर्वशक्तिमान के अमुक रूप की तस्वीर प्रकट हुई है। उसके बारे में यह पर्चा छपवाकर सौ लोगों को भेजो तो सारी समस्या हल हो जायेगी।  दरअसल यह सर्वशक्तिमानों के दरबारों का प्रचार होता था।  उसमें यह भी बताया जाता था कि अमुक जगह अमुक तस्वीर मिली तो जिसने प्रचार किया उसको लाभ हुआ जिसने वह पर्चे छपवाने की बजाय फैंक दिया तो उसे हानि हुई।  हमने सतर्कता से मित्र को जवाब दिया-‘वह पर्चे छपवाने में पैसे खर्च होते हैं जबकि हमारा इंटरनेट कनेक्शन ब्राडबैंड वाला है इसलिये कोई अलग से पैसा नहीं देना पड़ता। इसलिये प्रयास करने में क्या बुराई है।’<br />
मित्र बोला-‘हां, इससे इंटरनेट के कनेक्शन बने रहेंगे यह क्या कम है? उनकी कमाई नहीं होगी। फिर यह पूरब और पश्चिम का मेल कैसे हो रहा है? कहां अध्यात्म की बातें करते हो  और कहां यह शराब की दुकान पर झांक रहे हो। निकल लो। किसी चाहने वाले ने देख लिया तो उसके सामने तुम्हारी पोल खुल जायेगी।’<br />
हम सहम गये।  हमारे दिमाग से ईमेल वाली बात निकल ही नहीं रही थी। पांच लोगों को ईमेल किया था पर कहीं से कोई पार्सल आदि नहीं मिला।  फिर सोचा कि-‘यार, यह इंटरनेट पर पूरब पश्चिम का मेल  कुछ इस तरह ही होगा।  प्रचार का तरीका पुराना पर इष्ट तो नया होगा। कहां सर्वशक्तिमान के स्वरूप आदमी को प्रिय थे अब तो यह शराब ही प्रिय है।’</p>
<p>हमने गलत नहीं सोचा। टीवी, कूलर,फ्रिज, और गाड़ियों का अविष्कार इस देश में नहीं हुआ पर उपलब्ध सभी को हैं। हां, उनके उपयोग का तरीका जरूर पश्चिमी देशों से नहीं मिलता। कारें तो एक से एक सुंदर आ रही हैं पर रोड पुरानी और खटारा है। फ्र्रिज है पर लाईट की उठक बैठक उसके साथ लगी हुई है। टीवी आया पर विदेश के लोग उसका आनंद उठाते हैं जबकि  हम लोग चिपक जाते हैं। फिर यह सभी चीजें चाहिये पर दहेज के रूप में। मतलब यह कि हम अपने चलने फिरने का ढर्रा नहीं बदल सकते पर इस्तेमाल करने वाली चीजों का बदल देते हैं। यही हाल उस शराब की ईमेल का है।  पहले सर्वशक्तिमान की दरबारें कमाई का जरिया होती थी तो अब शराब की दुकानें हो गयी हैं  इसलिये प्रचार के लिये उनका ही तो फोटा लगेगा न!<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p><strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रीगीता संदेश-गैर धर्म गुणवान होने पर भी दु:खदायी (shri gita sandesh)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/04/other-relision-cause-of-trouble-gita-sandesh/</link>
<pubDate>Sat, 04 Jul 2009 07:01:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/04/other-relision-cause-of-trouble-gita-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। हिंदी में भाव]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।<br />
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>श्रीगीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपने धर्म से पराया धर्म श्रेष्ठ लगता है तब उसको कभी श्रेय न प्रदान करें। अपना धर्म संपन्न नहीं दिखता पर दूसरे का धर्म तो हमेशा भयावह परिणाम देने वाला होता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अक्सर लोग धर्म को लेकर बहस करते हैं पर उसका मतलब नहीं समझते।  हर टीवी चैनल, अखबार और पत्रिका को उठाकर देख लें धर्म को लेकर तमाम सतही बातें लिखी मिल जायेंगी जिनका सार तो विषय सामग्री प्रस्तुत करने वाले स्वयं नहीं जानते न ही पाठक या दर्शक समझने का प्रयास करते हैं।  कई बार तो ऐसा लगता है कि धर्म बिकने, खरीदने, और लाभ हानि वाली व्यापारिक वस्तु हो गयी है।  अनेक प्रचार माध्यम बकायदा धर्मपरिवर्तित कर जिंदगी में भौतिक उपलब्धि प्राप्त करने वाले लोगों का प्रचार करते हैं।  इतना ही नहीं धर्म परिवर्तित कर विवाह करने पर लड़कियों को वीरांगना करार दिया जाता है।  यह केवल प्रचार है जिससे बुद्धिमान भारतीय तत्व ज्ञान से दिखने वाले कटु सत्यों से भागते हुए करते हैं क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान जीवन के ऐसे रहस्यों को उद्घाटित करने के सत्यों से भरा पड़ा है जिसको जानने वाला धर्म न पकड़ता है न छोड़ता है।<br />
हमारे भारतीय अध्यात्म में स्पष्ट रूप से धर्म को कर्म से जोड़ा गया न कि कर्मकांडों से। कर्मकांडों और रूढ़ियों को लेकर भारतीय धर्मों की आलोचना करने वाले मायावी  लोग  उस तत्व ज्ञान को जानते नहीं है पर उनको यह पता है कि अगर उसका प्रचार हो गया तो फिर उनकी माया धरी की धरी रह जायेगी।<br />
एक मजे की बात है कि धर्म परिवर्तित दूसरा धर्म अपनाने वाली युवतियां विवाह कर लेती हैं इसमें बुराई नहीं है पर उसके बाद उनको जब दूसरे धर्म के संस्कार अपनाने पड़ते हैं तब उन पर क्या गुजरती है इस पर कोई प्रकाश नहीं डालता।  दरअसल फिल्मों की कहानियों को केवल विवाह तक ही सीमित देखने वाले बुद्धिजीवी उससे आगे कभी सोच ही नहीं पाते। यही कारण है कि विवाह के बाद जब पराये धर्म के कर्मकांडों को मन मारकर अपनाना पड़ता है तब उन युवतियों की क्या कहानी होती है इस पर कोई भी आज का महापुरुष नहीं लिखता।<br />
दरअसल धर्म दिखाने या छूने की वस्तु नहीं बल्कि हृदय में की जाने वाली अनुभूति है। बचपन से जिस धर्म के संस्कार पड़ गये उनसे पीछा नहीं छूटता विवाह या अन्य किसी भौतिक प्राप्ति के लिये धर्म परिवर्तन तो लोग कर लेते हैं उसके बाद जो उनपर तनाव आता है उसकी चर्चा भी गाहे बगाहे करते हैं। एक मजे की बात है कि कथित आधुनिक लोग धर्म परिवर्तन करते हैं पर उसके साथ अपना नाम और इष्ट भी परिवर्तित कर लेते हैं। मतलब वह दूसरे धर्म के के बंधन को ओढ़ते है और दावा आजादी का करते हैं।  सच बात तो यह है कि धर्म का आशय सही मायने में भारतीय अध्यात्म में ही है जिसका आशय है कि बिना लोभ लालच और कामना के भगवान की भक्ति करते हुए जीवन व्यतीत करना न कि उनके वशीभूत होकर धर्म मानना।  दूसरी बात यह है कि धर्म परिवर्तित करने वाले अपनी पहचान गुम होने के भय से अपना पुराना नाम भी साथ लगाते हैं।   दूसरे के धर्म के क्या कर्मकांड हैं किसी को पता नहीं होता? इसलिये उस धर्म के लोग मजाक उड़ाते हैं जिसे अपनाया गया है।  </p>
<p>संत कबीरदास और चाणक्य भी कहते हैं कि दूसरे धर्म या समुदाय का आसरा लेना हमेशा दुःख का कारण होता है।  किसी भी व्यक्ति या समाज को बाहर से देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका धर्म कैसा है या वह उसे कितना मानता है। वह तो जब कोई नया आदमी धर्म परिवर्तन कर उस धर्म में जाता है तब उसे पता लगता है कि सच क्या है? इसके बावजूद यह सच है कि दूसरा धर्म नहीं अपनाना चाहिये क्योंकि उससे तनाव बढ़ता है। हालांकि आजकल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षा लाभों के लिये अनेक लोग धर्म बदल लेते हैं। वह भले ही दावा करें कि उनको ज्ञान प्राप्त हुआ है पर यह झूठ है। जिसे ज्ञान प्राप्त होता है वह धर्म से परे होकर योग साधना, ध्यान और भक्ति में रहते हुए निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया करता है न कि धर्म छोड़ने या पकड़ने के चक्कर में पड़ता है।<br />
हां एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय धर्म व्यापक दृष्टिकोण वाले होते हैं क्योंकि इसमें किसी प्रकार की भाषा या उस पर आधारित नाम या कर्मकांड की बाध्यता नहीं होती। हमारा श्रीगीता ग्रंथ दुनिया का अकेला ऐसा धर्म ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान की भी चर्चा है।  इसमें निरंकार परमात्मा की निष्काम भक्ति के साथ ही अन्य जीवों पर निष्प्रयोजन दया करने का भी संदेश है।  यह मनुष्य को विकास की तरफ जाने के लिये प्रेरित करने के साथ  विनाश से भी रोकता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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dharm, gyan, hindi article, hindu, shri gita, अध्यात्म, ज्ञान, धर्म, मनुष्य, विज्ञान, समाज, हिंदी साहित्य<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बरसात के साथ धार्मिक चालाकी-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/02/barsat-aur-chalaki-hindi-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Thu, 02 Jul 2009 16:59:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/02/barsat-aur-chalaki-hindi-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अध्यात्म  नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़ में कोई अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है तो कोई अपना व्यवसाय कर रहा है।  जब कहीं सार्वजनिक रूप से  प्रार्थनायें सभायें होती हैं तब यह लगता है कि लोग दिखावा अधिक कर रहे हैं। आज के संचार युग में तो यह कहना कठिन है कि धर्म का बाजार लग रहा है या बाजार ही धर्म बना रहा है।  ऐसा लगता है कि पहले लोगों के पास मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे इसलिये धार्मिक पात्रों की व्याख्या करना ही धर्म प्रचार मान लिया गया। इस आड़ में तमाम तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास सृजित किये गये ताकि उनकी आड़ में धरती पर उत्पन्न  अनावश्यक भौतिक साधान बिक सकें जिसके माध्यम से  आदमी की जेब से पैसा निकाला जाये।<br />
अब तो प्रचार युग आ गया है और लोग अध्यात्मिक  आधार पर इसलिये अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहते है ताकि सामाजिक, आर्थिक तथा वैचारिक संगठनों में अपनी छबि बनाकर पुजते रहें।  वह आधुनिक बाजार में आधुनिक अध्यात्मिक  व्यापारी बनकर चलना चाहते हैं पर उनकी दुकान सामान उनका बरसो पुराना ही है जिसमें केवल धार्मिक प्रतीक और कर्मकांड ही हैं। जब कहीं हिंसा हो तो वहां लोग शांति के लिये सामूहिक प्रार्थनायें करने के लिये एकत्रित होते हैं।  उनको प्रचार माध्यमों में बहुत दिखाया जाता है। जब यह कहना कठिन हो जाता है कि बाजार को ऐसी खबरें चाहिये इसलिये यह सब हो रहा है या सभी विचारधारा के ज्ञानियों  को प्रचार चाहिये इसलिये वह इस तरह की सामूहिक प्रार्थनायें करते हैं।<br />
हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि पूजा, भक्ति या साधना तो एकांत में ही परिणाम देने वाली होती है।’ इसलिये जब इस तरह के सामूहिक कार्यक्रम होते हैं तो वह दिखावा लगते हैं।  आजकल अनेक स्थानों पर बरसात बुलाने के लिये प्रार्थना सभायें हो रही हैं। हर तरह की धार्मिक विचाराधारा के स्वयंभू ज्ञानी लोगों से बरसात के लिये सामूहिक प्रार्थनाऐं आयोजित  कर रहे हैं। प्रचार भी उनको खूब मिल रहा है। हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर अपने जैसे लोगों से अपनी बात करने का एक अलग ही मजा है। कुछ लोग है जो इसमें हो रही चालाकियों को देखते हैं।<br />
हम जरा इस बरसात के मौसम पर विचार करें तो लगेगा कि उसका आना तय है। देश के कुछ इलाकों में उसका  प्रवेश हो चुका है और अन्य तरफ मानसून बढ़ रहा है।</p>
<p>उस दिन मई की एक शाम बाजार में तेज बरसात से बचने के लिये हम एक मंदिर में बैठ गये।  उस समय तेज अंाधी के साथ बरसात हो रही थी। हालांकि  गर्मी कम नहीं थी और बरसात से राहत मिली पर एक शंका मन में थी कि यह मानसून के लिये संकट का कारण बन सकता है। प्रकृत्ति का अपना खेल है और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है।  मनुष्य यह चाहता है कि प्रकृति उसके अनुरूप चले पर पर उसके साथ खिलवाड़ भी करता है।  मई में उस दिन हुई बरसात के अगले कुछ दिनों में ही अखबारों में हमने पढ़ा कि बरसात देर से आयेगी। विशेषज्ञों ने बरसात कम होने की भविष्यवाणी की है-औसत से सात प्रतिशत कम यानि 93 प्रतिशत होने का अनुमान है। </p>
<p>ऐसा नहीं है कि बरसात हमेशा समय पर आती हो-कभी विलंब से तो कभी जल्दी भी आती है-पिछली बार कीर्तिमान भंजक वर्षा हुई थी। बरसात जब तक नहीं आती तब आदमी व्यग्र रहता है।  ऐसे में उसके जज्बातों से खेलना बहुत सहज होता है। उसका ध्यान गर्मी पर है तो उसे भुनाओ।   कहने के लिये तो कह रहे हैं कि हम सर्वशक्तिमान को बरसात भेजने के लिये पुकार रहे हैं। पर उसका समय पर चर्चा नहीं करते।  जब बरसात आने के संकेत हो चुके हैं तब ऐसी प्रार्थनाओं के समाचार खूब आ रहे हैं।   वैसे तो फरवरी के आसपास भी ऐसे समाचार आ गये थे कि इस बार बरसात देर से आयेगी और कम होगी। तब ऐसी प्रार्थना सभायें क्यों नहीं की गयी। उस समय नहीं तो मई में ही कर लेते।<br />
सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के चेले चालाक हैं।  उस समय करते तो कौन लोग उनको याद रखते। जब एक दो दिन या सप्ताह में बरसात आने वाली तब ऐसी प्रार्थना सभायें इसलिये कर रहे हैं ताकि जब हों तो लोग माने कि उनके ‘ज्ञानियों’ को कितनी सिद्धि प्राप्त है।  बहरहाल हम देख रहे हैं कि बाजार के प्रबंधक और सर्वशक्तिमान के यह आधुनिक दूत एक जैसे चालाक हैं।  टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाऐं तो व्यवसायिक हैं पर सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के यह ज्ञानी चेले भी क्या व्यवसायी है? उनकी इस तरह की चालाकियों से तो यही लगता है?<br />
प्रसंगवश याद आया एक पाठक ने अपनी टिप्पणी में पूछा था कि ‘आपके लेखों से यह पता ही नहीं लगता कि आप किस धर्म या भगवान की बात कर रहे हैं?<br />
दरअसल इसका कारण यह है कि हम सभी तरह की विचारधाराओं पर अपने विचार रखते हैं। किसी एक का तयशुदा नाम लेने पर लोग कहते हैं कि तुम उनके नाम पर लिखो तो जाने।  जहां तक हमारी जानकारी सर्वशक्तिमान शब्द  किसी भी खास विचारधारा से नहीं जुड़ा  यही स्थिति उसके ठेकेदार शब्द ं की भी है। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता कि हमारी बात करते हो उनकी करके देखो तो जानो।<br />
अगर सभी विरोध करने लगें तो हम भी कह सकते हैं कि तुम सर्वशक्तिमान और ठेकेदार शब्द से अपने को क्यों जोड़ते हो? दरअसल हमने देखा कि यह समाजों के ठेकेदारो का काम ही चालाकी पर चल रहा है और लोगों को जज्बात से भड़काने और बहलाने के काम में यह सब सक्षम होते हैं। हम इसलिये अपनी बात व्यंजना विधा में कहते हैं। हां, बरसात की पहली बूंदों का इंतजार हमें भी है। अब यह गर्मी सहना कठिन हो गया है।  कभी कभी आकाश में बिना बरसते बादल देखते हैं तो भी गुस्सा आता है कि यह हमारी धरती की गर्मी नष्ट कर रहे हैं जो कि बरसात को खींचती है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><blockquote><strong>यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://teradipak.blogspot.com"><br />
<blockquote>‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</p></blockquote>
<p></a> पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति-कम ताकत के होते गुस्सा करना तकलीफदेह]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/01/gussa-aur-taqat-vidur-niti/</link>
<pubDate>Wed, 01 Jul 2009 04:08:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/07/01/gussa-aur-taqat-vidur-niti/</guid>
<description><![CDATA[द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा। गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।। हिंदी में भावार्थ-न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।<br />
गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर जी कहते हैं कि जो अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करते हैं वह कभी नहीं शोभा पाते। गृहस्थ होकर अकर्मण्यता और सन्यासी होते हुए विषयासक्ति का प्रदर्शन करना ठीक नहीं है। </p>
<p><strong>द्वाविमौ कपटकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषिणी।<br />
यश्चाधनः कामयते पश्च कुप्यत्यनीश्वरः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अल्पमात्रा में  धन होते हुए भी  कीमती वस्तु को पाने की कामना और शक्तिहीन होते हुए भी क्रोध करना मनुष्य की देह के लिये कष्टदायक और कांटों के समान है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या </strong>-किसी भी कार्य को प्रारंभ करने पहले यह आत्ममंथन करना चाहिए कि हम उसके लिये या वह हमारे लिये उपयुक्त है कि नहीं।  अपनी शक्ति से अधिक का कार्य  और कोई वस्तु पाने की कामना करना स्वयं के लिये ही कष्टदायी होता है।<br />
न केवल अपनी शक्ति का बल्कि अपने स्वभाव का भी अवलोकन करना चाहिये। अनेक लोग क्रोध करने पर स्वतः ही कांपने लगते हैं तो अनेक लोग निराशा होने पर मानसिक संताप का शिकार होते हैं। अतः इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि हमारे जिस मानसिक भाव का  बोझ हमारी यह देह नहीं उठा पाती उसे अपने  मन में ही न आने दें।<br />
कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम कोई काम  या कामना करते हैं तो उस समय हमें अपनी आर्थिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति का भी अवलोकन करना चाहिये। कभी कभी गुस्से या प्रसन्नता के कारण हमारा रक्त प्रवाह तीव्र हो जाता है और हम अपने मूल स्वभाव के विपरीत कोई कार्य करने के लिये तैयार हो जाते हैं और जिसका हमें बाद में दुःख भी होता है। अतः इसलिये विशेष  अवसरों पर आत्ममुग्ध होने की बजाय आत्म चिंतन करते हुए कार्य करना चाहिए।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ख़ुद भटके,द्रूसरे को देते रास्ते का पता-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/06/29/khud-bhatke-hindi-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Mon, 29 Jun 2009 16:57:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/06/29/khud-bhatke-hindi-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अपनी मंजिल पर कभी वह पहुंचे नहीं। चले कहीं के लिये थे पहुंचे गये कहीं। भटकाव सोच का था कभी रास्ते से]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>अपनी मंजिल पर<br />
कभी वह पहुंचे नहीं।<br />
चले कहीं के लिये थे<br />
पहुंचे गये कहीं।<br />
भटकाव सोच का था<br />
कभी रास्ते से वह उतर जाते<br />
कभी खो जाता रास्ता कहीं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..<br />
अपने रास्ते से वह भटके<br />
अपने ही गम में वह लटके<br />
कोई उपाय न देखकर<br />
बूढ़े बरगद के नीचे धूनि रमाई।</p>
<p>दूसरे को रास्ता बताने लगे<br />
यूं भीड़ का काफिला बढ़ता गया<br />
जमाना ही उनके जाल में फंसता गया<br />
फिर भी चल रहा है उनका धंधा<br />
कभी आता नहीं मंदा<br />
जब तक लोग भटकते रहेंगे<br />
रास्ते पूछने की कीमत सहेंगे<br />
मंजिल पर पहुंच जायेगा राही<br />
बन नहीं हो जायेगी कमाई।<br />
भ्रम वह सिंहासन है<br />
जिसे सिर पर बिठाया तो<br />
बन गये प्रजा<br />
उस पर बैठे तो बने राजा<br />
सच है सर्वशक्तिमान ने<br />
खूब यह दुनियां बनाई</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<strong>नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक तथा इसका किसी व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है और किसी से इसका विषय मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।</strong></p>
<blockquote><blockquote><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इस ब्लाग/पत्रिका ने पार की पाठक संख्या पचास हजार-संपादकीय]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/06/16/vews-50-thausand-hindi-editroiyal/</link>
<pubDate>Tue, 16 Jun 2009 16:00:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/06/16/vews-50-thausand-hindi-editroiyal/</guid>
<description><![CDATA[पाठ पठन/पाठक संख्या पचास हजार पार करने वाला ईपत्रिका इस लेखक का तीसरा ब्लाग/पत्रिका है। इसने हाल ही ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>पाठ पठन/पाठक संख्या पचास हजार पार करने वाला <a href="http://dpkraj.wordpress.com">ईपत्रिका</a> इस लेखक का तीसरा ब्लाग/पत्रिका है। इसने हाल ही मैं गूगल के पैज रैंक में चौथा स्थान प्राप्त किया-जो कि इसकी बहुत बड़ी उपलब्धि है।  इसे लेखक के  पचास हजार की पाठ पठन/पाठक संख्या पार करने वाले अब तीन ब्लाग हैं-<br />
<a href="http://deepakraj.wordpress.com">1. हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">2.शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">3.ईपत्रिका</a><br />
गूगल के पैज रैंक में चार अंक प्राप्त करने वाले अब चार ब्लाग/पत्रिका इस प्रकार हैं-<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1. शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://deepakraj.wordpress.com">2. हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">3. शब्दलेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">4. ईपत्रिका</a><br />
     आंकड़ों का खेल हमेशा ही दिलचस्प होता है। <a href="http://rajlekh.wordpress.com">शब्द पत्रिका</a> ने भी पचास हजार पाठ पठन/पाठक संख्या पार की है पर उसे गूगल की पैज रैंक में तीन अंक प्राप्त हैं जबकि<a href="http://rajdpk.wordpress.com"> शब्दलेख पत्रिका</a> ने गूगल पैज रैंक में दस में से चार अंक प्राप्त किये हैं पर उसकी संख्या अभी पचास हजार से दूर है।  गूगल का पैज रैंक किसी भी ब्लाग की लोकप्रियता को प्रमाणित करने वाला अकेला प्रमाणिक टूल  है। हालांकि अन्य कुछ वेबसाईट भी ब्लाग की लोकप्रियता का आंकलन करती हैं पर अनेक ब्लाग लेखक मानते हैं कि उनके साफ्टवेयर अधिक प्रमाणिक नहीं है।<br />
जब ब्लाग लेखन की यात्रा प्रारंभ की थी तब यह लेखक अकेला था पर अंतर्जाल पर बहुत सारे मित्र मिले और  जो पहले ही मित्र थे वह अब पाठक भी हो गये हैं।  वर्डप्रेस की पाठक संख्या पर वह हमेशा नजर लगाये रहते हैं और यह बताते हैं कि तुम्हारा वह ब्लाग आज पचास हजार पार सकता है। आज तो अच्छा संपादकीय लिखना। मना करने पर कहते हैं कि-नहीं, आजकल वह समय नहीं है कि चुपचाप बैठकर लिखते जाओ। लोगों को यह बताना जरूरी है कि हम भी है नंबर वन की दौड़ में।’<br />
तब बरबस हंसी आती है। सच तो हम जानते हैं कि हिंदी में लेखन कभी आसान नहीं रहा।  अपने काम की व्यसततओं से समय निकालकर लिखने में मजा आता है पर समस्या उसके प्रकाशन की आती है।<br />
प्रसंगवश आज एक लेख पर नजर पड़ गयी।  उस लेख में बताया गया कि अनेक लेखकों द्वारा अपना पैसा लगाकर पुस्तकें प्रकाशित कराने की प्रवृत्ति से अनेक प्रकाशक जमकर पैसा कमा रहे है।<br />
उस लेख में कहा गया कि आज हिंदी के लेखक की वह छबि नहीं है कि वह रद्दी दिखता हो या गरीब हो।  उस पाठ में लिखा गया था कि  अनेक अप्रवासी भारतीय भारत आते हैं और अपने पैसे से किताब छपवाकर आकर्षक कार्यक्रम में उसका विमोचन करते हुए चले जाते हैं।  उस पाठ के लेखक का मानना था कि ऐसी किताबों की विषय सामग्री कूड़ा हो यह जरूरी नहीं है।  आखिर धनी मानी लोगों को भी लिखने का अधिकार है। उसने कुछ पुराने लेखकों के नाम भी गिनाये जो अमीर परिवारों से आये। इसलिये यह जरूरी नहीं कि हिंदी लेखक गरीब हो या जो गरीब है वही अच्छा लिख सकता है।<br />
उस लेखक की बात ठीक थी पर कुछ सवाल हमारे सामने थे। जिन  धनी मानी परिवारों में पैदा पुराने हिंदी लेखकों की उसने बात की उन्होंने अपने पैसे से किताब छपवाकर विमोचन नहीं किया।  दूसरा यह है कि जो धनीमानी लोग किताबें छपवाते हैं उनमें होता क्या है? उनके जीवन के अनुभव जिनमें झूठ के अलावा कुछ भी नहीं होता। उनमें वह यह साबित करने का प्रयास किया जाता है वह वह धनी, उच्च पदस्थ और प्रसिद्ध होने के साथ संवेदनशील लेखक भी हैं।  फिर सवाल यह नहीं है कि अमीर आदमी को लिखने या छपने का अधिकार नहीं हैं।  हां, उनमें भी बहुत अच्छे लेखक हो सकते हैं। पर अनवरत चलने वाली  बहस का निष्कर्ष यह  है कि अपना पैसा खर्च किये बिना कोई लेखक प्रसिद्ध नहीं हो सकता।  इसे हम यह भी कह सकते हैं कोई भी आदमी अपने लिखने के दम पर प्रसिद्ध नहीं हो सकता।<br />
दूसरा यह है कि जो धनीमानी हैं उनका समय अधिकतर अपने व्यवसायों पर ही रहता है। समाज के उतार चढ़ाव में वह बहते हैं पर वह किस तरह आते हैं और इसके लिये कौनसी प्रवृत्तियां जिम्मेदार हैं यह देखने के पास उनके पास इतना समय नहीं होता जितना अल्प धनिक के पास रहता है। अल्प धनिक के पास ही वह समय होता है कि वह जमीन पर चलते हुए अनेक यथार्थ घटनाओं को एक स्वपनदृष्टा की तरह प्रस्तुत करता है।  मुख्य बात यह है कि हिंदी में लिखने की बात आज वही सोच सकता है जिसके पास अपने रोजगार का कोई साधन हो। इससे रोटी पाने की कोई आशा नहीं कर सकता।  हिंदी भाषी समाज की यह प्रवृत्ति है कि वह शुद्ध लेखक को पाल नहीं सकता।<br />
ऐसे में यह अंतर्जाल ही एक आशा की किरण है। उसमें भी शर्त यही है कि इंटरनेट कनेक्शन व्यय करने की शक्ति होना चाहिए।  इस लेखक ने लिखना तब शुरु किया था जब वह कमाने की सोच भी नहीं सकता था। जीवन संघर्ष के दौरान लिखते हुए कभी यह नहीं लगा कि उसक सहारे धन या प्रतिष्ठा मिलेगी। बस, एक आनंद आता है। इंटरनेट कनेक्शन लेते समय यह विचार भी था कि जब अवसर मिलेगा अपनी रचनायें प्रतिष्ठत समाचार पत्रों में भेज दिया जायेगा।  कुछ समय बाद अध्ययन किया तो इस बात का आभास हो गया कि हर क्षेत्र में शिखर पर बैठे लोग कंप्यूटर पर काम करने से इसलिये कतराते हैं क्योंकि उनको लगता है कि यह काम टाईपिस्ट या लिपिक’ का है। इंटरनेट से भेजी गयी रचनाओं का भी वही हाल रहा जो डाक से भेजी गयी रचनाओं का था।  ऐसे में स्वतंत्र लेखन के लिये ब्लाग मिला तो लिखना शुरु किया। इस लेखक की कवितायें, व्यंग्य, आलेख और कहानियां अच्छी है या बुरी इस स्वयं कभी नहीं सोचता।  लिखते समय इस बात का ध्यान रहता है कि उसका सामाजिक सरोकार और संबंध जरूर होना चाहिये।  अपनी कहानी लिखना आसान है पर वह तभी प्रभावी होती है जब उसकी प्रस्तुति ऐसी होना चाहिये कि वह सभी को अपनी लगे।<br />
इधर इंटरनेट पर अच्छे लेखक भी आ गये हैं। उनका पढ़कर आनंद आता है और उनसे भी लिखने की प्रेरणा मिलती है।   सच बात तो यह है कि कई ऐसे स्तरीय पाठ भी सामने आये जो व्यवसायिक पत्र पत्रिकाओं में नहीं दिखते।  साहित्य, फिल्म, व्यापार, कला तथा प्रचार माध्यमों में एक परंपरागत ढांचा है जो परिवार, जाति, भाषा और धर्म में ही अपने रचनाकार तथा पात्र ढूंढता है।  नयी व्यवस्था के आने की आशंका से यथास्थितिवादी खौफ खाते हैं और इसलिये वह ऐसी योजना बनाते हैं कि वह बदलाव आये ही नहीं और आये तो उसमें उसके मोहरे ही फिट हों। इसका पता तो पहले से ही था पर अंतर्जाल लिखते हुए इसका आभास अच्छी तरह होता जा रहा है।<br />
एक ब्लाग मित्र-उसकी और इस लेखक की  मित्रता ब्लाग लिखने के पहले से ही है- से उसी दिन बात हो रही थी। उसकी इंटरनेट पर अनेक ब्लाग लेखकों से चर्चा भी होती है। उसने कहा-’‘वह लोग तुम्हें पंसद करें या नहीं पर जानते सभी हैं। यह तय बात है। वह लोग कहते हैं कि ‘उसके कुछ ब्लाग बहुत अच्छे हैं और कुछ ऐसे ही हैं। मतलब यह कि तुम्हारी पहचान है और इसे कोई मिटा नहीं सकता।  सबसे बड़ी बात यह है कि मुझे भी तुम्हारा वह ब्लाग पसंद हैं जो सभी की पसंद है।’<br />
इशारा  समझ में आया। मगर यह यात्रा बहुत लंबी है। कोई जल्दी नहीं है।  आशा से अधिक जिज्ञासा है कि देखें यथास्थितिवादी किस तरह बदलाव लाने के लिये जूझ रहे लेखकों के सामने प्रतिरोध  कर रहे हैं।  जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र और परिवार के दायरों से मुक्त रहने का संदेश वाले छद्म लोग वास्तव में यथास्थितिवादी है और बदलाव लाने वाले तो केवल अपने कर्म में लिप्त रहते हैं।  इसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होकर देखने का अलग ही मजा है। खुद मैदान में उतरने का अर्थ है अपने लिये अधिक से अधिक विरोधी बनाना।  ऐसे अवसरों पर लिखने का केवल एक ही मतलब होता है कि जिन लोगों की हिंदी ब्लाग का विश्लेषण करने वाले ब्लाग लेखकों के लिये अगर कुछ हो तो वह समझ लें। पूर्व में ऐसे ही आलेखों का प्रभाव क्या हुआ है यह इस लेखक ने देखा है। ब्लाग लेखक मित्रों से जो पाया है उनको ही कुछ लौटाया जा सकता है तो वह इसी तरह ताकि वह अगर इससे कोई लाभ उठा सकें तो ठीक, नहीं भी तो पाठकों में यह प्रेरणा तो आ ही सकती है कि अंतर्जाल पर हिंदी में लिखना उतना बुरा नहीं है जितना लगता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p><strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर के दोहे: भक्ति और ध्यान एकांत में करें ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/06/05/dhayn-ekatn-men-karen-kabir-ke-dohe/</link>
<pubDate>Fri, 05 Jun 2009 04:43:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/06/05/dhayn-ekatn-men-karen-kabir-ke-dohe/</guid>
<description><![CDATA[चर्चा करु तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय ध्यान करो तब एकिला, और न दूजा कोय संत श्री कबीरदास जी का कथन है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>चर्चा करु तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय<br />
ध्यान करो तब एकिला, और न दूजा कोय</strong><br />
संत श्री कबीरदास जी का कथन है जब ज्ञान चर्चा चौराहै पर करो पर जब उसका अध्ययन करना हो तो दो लोगों की बीच में ही ठीक है। ज्ञान के  बारे में जब ध्यान, चिंतन और मनन करना हो तो उसे एकांत में ही रहे जहां कोई दूसरा व्यक्ति न हो।<br />
<strong>अष्ट सिद्धि नव निधि लौं, सबही मोह की खान<br />
त्याग मोह की वासना, कहैं कबीर सुजान</strong><br />
संत श्री कबीरदास का कथन है कि आठों सिद्धियां और नवों निधियां तो मोह की खान है। अतः इस मोह को त्याग करना ही श्रेयस्कर है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या</strong>-हम लोग अक्सर यह कहते हैं कि अमुक संत सिद्ध है और उसकी शरण लेना चाहिए या वह तो बहुत पहुंचे हुए हैं। कई कथित संत और साधु अपने लिये बकायदा विज्ञापन करते हैं जैसे कि बहुत बड़े सिद्ध हों। यह सब ढोंग हैं। अनेक लोग मंत्रों आदि के द्वारा काम सिद्ध करने का दावा करते हैं। यह सब मोह से उपजा भ्रम है।  सिद्धियां और निधियों की आड़ में अनेक लोग धंधा कर रहे हैं।  सिद्धि केवल मन की शांति के रूप में ही है बाकी तो दुनियां चलती है।  माया का भंडार पास में हो पर अगर मन अशांत हो तो वह भी व्यर्थ नजर आता है।   इस प्रकार की मानसिक शांति  लिये तत्व ज्ञान  होना चाहिये। वैसे तो इसके लिये गुरु का होना जरूरी है पर न मिले तो किसी समक+क्ष व्यक्ति के साथ बैठकर स्वाध्याय करना चाहिये। उसके बाद अकेले ध्यान में बैठकर अपने द्वारा ग्रहण तत्व पर विचार करना ही ठीक है।  हां, उसकी चर्चा चार लोगों के करने में कोई बुराई नहीं है।  इस चर्चा से न केवल अपने दिमाग में मौजूद ज्ञान का पूर्नस्मरण हो जाता है और वह पुष्ट भी होता है। </p>
<p>हम जो ज्ञान प्राप्त करें उससे अपने आपको सिद्ध मान लेना मूर्खता है क्योंकि तत्व ज्ञान का रूप अत्यंत सूक्ष्म है पर उसका विस्तार इतना दिया जाता  है कि लोग उसका लाभ व्यवसायिक रूप से उठाते हैं। अनेक सिद्धियों और निधियों का  प्रचार इस तरह किया जाता है जैसे वह दुनियां में रह मर्ज की दवा हैं।  इनसे दूर होकर अपने स्वाध्याय, ध्यान और ज्ञान से अपने मन के विकार दूर करते रहना चाहिये।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हादसों से सीखा, अफ़सानों ने समझाया-व्यंग्य कविता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/06/02/hadse-aur-afsane-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Tue, 02 Jun 2009 15:10:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/06/02/hadse-aur-afsane-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[कुछ हादसों से सीखा कुछ अफसानों ने समझाया। सभी जिंदगी दो चेहरों के साथ बिताते हैं शैतान छिपाये अंदर ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>कुछ हादसों से सीखा<br />
कुछ अफसानों ने समझाया।<br />
सभी जिंदगी दो चेहरों के साथ बिताते हैं<br />
शैतान छिपाये अंदर<br />
बाहर फरिश्ता दिखाते हैं<br />
आगे बढ़ने के लिये<br />
पीठ पर जिन्होंने हाथ फिराया।<br />
जब बढ़ने लगे कदम तरक्की की तरफ<br />
उन्होंने ही बीच में पांव फंसाकर गिराया।<br />
इंसान तो मजबूरियों का पुतला<br />
और अपने जज़्बातों का गुलाम है<br />
कुदरत के करिश्मों ने यही बताया।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
कदम दर कदम भरोसा टूटता रहा<br />
यार जो बना, वह फिर रूठता रहा।<br />
मगर फिर भी ख्यालात नहीं बदलते<br />
भले ही हमारे सपनों का घड़ा फूटता रहा<br />
हमारे हाथ की लकीरों में नहीं था भरोसा पाना<br />
कोई तो है जो निभाने के लिए जूझता रहा।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</strong></p>
<blockquote><p><strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
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