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Maa ...Kabhi badli hi nahi.. !


Kal ki hi baat thi,
Main bhi yahan tha,
Ghar ke samne ek school tha,
Aaj bhi wahin par hai.

Par ab..!
Kuch ajnabi sa lagta hai, 101 more words

Hindi Poems

Ye sheher badla.. Ya hum badle..!


Isi sheher ke ..hum hain,
isi sheher ke ..tum ho,
Isi sheher mein ..mashoor hain,
Isi sheher mein ..gum ho.

Kabhi aao! Milne humse,
To batayein.. 185 more words

Hindi Poems

स्वामी विवेकानंद जी के जीवन सेे संबंधित प्रेरक प्रसंग

लक्ष्य पर ध्यान लगाओ

स्वामी विवेकानंद अमेरिका में भ्रमण कर रहे थे ।  एक जगह से गुजरते हुए उन्होंने पुल पर खड़े  कुछ लड़कों को नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बन्दूक से निशाना लगाते देखा ।  किसी भी लड़के का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था ।  तब उन्होंने ने एक लड़के से बन्दूक ली और खुद निशाना लगाने लगे ।  उन्होंने पहला निशाना लगाया और वो बिलकुल सही लगा ….. फिर एक के बाद एक उन्होंने कुल 12 निशाने लगाये और सभी बिलकुल सटीक लगे ।  ये देख लड़के दंग रह गए और उनसे पुछा , ” भला आप ये कैसे कर लेते हैं ?”
     स्वामी जी बोले , “तुम जो भी कर रहे हो अपना पूरा दिमाग उसी एक काम में लगाओ ।  अगर तुम निशाना लगा रहे हो तो तम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर होना चाहिए ।  तब तुम कभी चूकोगे नहीं ।  अगर तुम अपना पाठ पढ़ रहे हो तो सिर्फ पाठ के बारे में सोचो ।  मेरे देश में बच्चों को ये करना सिखाया जाता है । ”

डर का सामना

     एक बार बनारस में स्वामी जी दुर्गा जी के मंदिर से निकल रहे थे कि तभी वहां मौजूद  बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया ।  वे उनके नज़दीक आने लगे और डराने लगे ।  स्वामी जी भयभीत हो गए और खुद को बचाने के लिए दौड़ कर भागने लगे, पर बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए और वे उन्हें दौडाने लगे ।  पास खड़े एक वृद्ध सन्यासी ये सब देख रहे थे ।  उन्होंने स्वामी जी को रोका और बोले , ” रुको ! उनका सामना करो !”
     स्वामी जी तुरन्त पलटे  और बंदरों के तरफ बढ़ने लगे ।  ऐसा करते ही सभी बन्दर भाग गए ।  इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली और कई सालों बाद उन्होंने एक संबोधन में कहा भी – ” यदि तुम कभी किसी चीज से भयभीत हो तो उससे भागो मत, पलटो और सामना करो ।”

सच बोलने की हिम्मत

     स्वामी विवेकानंदा प्रारंभ से ही एक मेधावी छात्र थे और सभी उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित  रहते थे ।   जब वो साथी छात्रों से कुछ बताते तो सब मंत्रमुग्ध हो उन्हें सुनते ।   एक दिन इंटरवल के दौरान वो कक्षा में कुछ मित्रों को कहानी सुना रहे थे, सभी उनकी बातें सुनने में इतने मग्न थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब मास्टर जी कक्षा में आये और पढ़ाना शुरू कर दिया ।

     मास्टर जी ने अभी पढ़ना शुरू ही किया था कि उन्हें कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी ।

     “कौन बात कर रहा है ?” उन्होंने तेज आवाज़ में पूछा  ।   सभी ने स्वामी जी और उनके साथ बैठे छात्रों किई तरफ इशारा कर दिया ।

     मास्टर जी  तुरंत क्रोधित हो गए  ।  उन्होंने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और  पाठ से संबधित एक प्रश्न पूछने लगे ।  जब कोई भी उत्तर न दे सका तब अंत में मास्टर जी ने  स्वामी जी से भी वही प्रश्न किया । पर स्वामी जी तो मानो सब कुछ पहले से ही जानते हों,  उन्होंने आसानी से उत्तर दे दिया.

     यह देख उन्हें यकीन हो गया कि स्वामी जी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बात-चीत में लगे हुए थे ।  फिर क्या था उन्होंने स्वामी जी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी ।  सभी छात्र एक -एक कर बेच पर खड़े होने लगे ।  स्वामी जे ने भी यही किया ।

     तब मास्टर जी बोले,  “नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद) तुम बैठ जाओ.”

     “नहीं सर, मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि वो मैं ही था जो इन छात्रों से बात कर रहा था ।”  स्वामी जी ने आग्रह किया ।

Myhindistories

कफन - प्रेमचंद

झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देनेवाली आवाज निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था। 90 more words

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असली परख

एक जौहरी था उसके देहांत के बाद उसके परिवार पर बहुत बड़ा सन्कट आ गया।खाने के भी लाले पड गए एक दिन उसकी पत्नी न अपने बेटे को एक नीलम का हार दे कर कहा बेटा इसे अपने चाचा की दुकान पर लेकर जाओ और कहना कि इसे बेच कर कुछ रुपए दो वह उस हार को लेकर चाचा जी के पास गया। चाचा जी ने हार को अच्छी तरह से देख परख कर कहा कि बेटा अपनी माँ से कहना कि अभी बाज़ार बहुत मन्दा हैं थोड़ा रुककर बेचना अच्छे दाम मिलेगे और थोड़े से रुपये देकर कहा कि तुम कल से दुकान पर आ कर बैठना। अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान पर जाने लगा और वहां पर हीरो की परख करने लगा एक दिन वह हीरो का बहुत बड़ा पारखी बन गया लोग दूर दूर से अपने हीरो की परख कराने आने लगे।एक दिन उसके चाचा जी ने कहा कि बेटा अपनी माँ से वह हार लेकर आना और कहना कि अब बाज़ार बहुत तेज है उसके अब अच्छे दाम मिल जाएगे ।बेटा हार लेने घर गया और मा से हार लेकर परख कर देखा कि यह तो artificial हैं और उसको घर पर ही छोड़ कर वापस लौट आया तो चाचा जी ने पूछा कि हार नहीं लाए तो उसने कहा कि वह हार तो नकली था। तब चाचा जी ने कहा कि जब पहली बार लेकर आए थे अगर मैं उस समय हार को नकली बताता तो तुम सोचते कि आज हम पर बुरा वक्त आया तो हमारी चीज़ को नकली बताने लगे आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो पता चल गया कि यह नकली हैं इससे हमें यही शिक्षा मिलती है कि ज्ञान के बिना इस सन्सार मे हम जो भी सोचते हैं देखते हैं जानते हैं सब गलत है अगर हम दुखि हैं या अभाव ग्रस्त है तो इसका एक ही कारण है अज्ञानता अज्ञान के ही कारण डर हैं सब कुछ पाना आसान है दुर्लभ है सन्सार मे एक यथार्थ ज्ञान।

Myhindistories

कर्फ्यू की चिंता

कर्फ्यू की चिंता

सुना है दंगे भड़के है फिर

पुरे शहर में लगा है कर्फ्यू

नही पता दंगे के कारण का

चाहे जातिवाद हो या सम्‍प्रदायवाद

कारण से मुझे लेना देना भी नही

भूखे पेट को कारण से वास्‍ता भी नही

मुझे तो चिंता है कर्फ्यू  के लगने की

कर्फ्यू का नाम सुनते ही उड़ गए मेरे होश

काम गया, मजदूरी गयी, आज के दिन की

रोजाना काम की करता हूँ तलाश

काम के वेतन से लाता हूँ राशन

लेकिन आज वह भी नसीब नही

आज गैरहाजरी लगी मेरे रोजगार की

आज गैरहाजरी लगी हमारे खाने की

राशन लाता था रोजाना की कमाई से

बने खाने को खाते थे हम बॉंटकर

आज मेरा परिवार रहेगा भूखा

चिंता नही है भूखे काम पर जाने की

सोचता हूँ जितेजी चिंता मिटेगी क्‍या

चिंता आज भी है कल भी रहेगी

कल रहेगी चिंता भय की, असुरक्षा की

कल रहेगी चिंता जातिगत तनाव की

कल रहेगी चिंता मंदिर मस्जिद के झगड़े की

आज की चिंता है भूख से मरने की

कल की चिंता होगी मारे जाने के डर की

आज की चिंता है कर्फ्यू  के लगने की

कल की चिंता है कर्फ्यू  के हटने की.

मुक्ति का जश्‍न

मुक्ति का जश्‍न

आज मुर्दा और आत्‍मा है प्रसन्‍न

दोनो जश्‍न मना रहे है अपनी मुक्ति का

आत्‍मा से अलग हुए मुर्दे पर है रौनक

मुर्दे से अलग हुई आत्‍मा में है चमक

मुर्दे का चेहरा लगता है तनाव मुक्‍त

आत्‍मा की  रंगत  लगती है चिंतामुक्‍त

दोनो को गम नही है अलग होने का

मुर्दा जिंदा होने को नही है तैयार

न आत्‍मा है मुर्दे में मिलने को तैयार

दुनिया में दोनों एक दुसरे से थे परेशान

मुर्दे को यातनाएं थी आत्‍मा के कारण

आत्‍मा को परेशानियां थी मुर्दे के कारण

आज दोनों परेशानियों से हुए मुक्‍त

जिंदगी भर दोनों ने निभाया पूरा साथ

फिर क्‍यों न अब इच्‍छा है मिलाने को हाथ ?

एक ही उत्‍तर था दोनों का

दुनियां में एक थे- प्रेरणा‍ मिली अलग रहने की

यहॉं बन जाते है दोस्‍त दुश्‍मन, दुश्‍मन दोस्‍त

दोस्‍ती और दुश्‍मनी का रिश्‍ता टिका है स्‍वार्थ पर

यहीं से सीखे है हम स्‍वार्थपन और लालचपन

जबतक जिन्‍दा थे, न लालची थे न स्‍वार्थी थे

इसलिए दुनियां मे हम थे परेशान

भले ही अब हम दुश्‍मन ही क्‍यों न बने

हम पुन: कभी न रहेंगे साथ

अब दुनियां वाले कुछ भी कहे

जिंदगी भर की परेशानियां पुन: न झेलने

अब हमे रहना है अलग

हम तो मरने के बाद हुए अलग

पर दुनियां वाले जितेजी ही रहते है अलग

यहॉं तो जिंदा रहना ही बन गया है अभिशाप

यहॉं जिंदो को मारते है, मरने पर पूजते है

अब आगे दुनियां की हकीकत न पूछो

अलग होने पर न हम रो सकते, न हंस सकते

न अपने बीते दुखड़ो को कह सकते

आज यहॉं मरकर हमें मिली है चिरशांति

आज हमारी मुक्ति का दिन है

हमे आज मुक्ति का जश्‍न मनाने दो.