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	<title>hindi-review &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-review"</description>
	<pubDate>Sun, 27 Dec 2009 03:06:44 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[Wake up Sid Review]]></title>
<link>http://preethika.wordpress.com/2009/12/23/wake-up-sid-review/</link>
<pubDate>Wed, 23 Dec 2009 14:01:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>preethika</dc:creator>
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<description><![CDATA[The cutest movie of 2009!!! (Not Ranbir but the movie on the whole) Wake up Sid opens with a guy who]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>The cutest movie of 2009!!! (Not Ranbir but the movie on the whole)</p>
<p>Wake up Sid opens with a guy who sits with his book to study for his exams and falls asleep in the procees and before I could fall asleep, the background score just makes you feel fresh and makes you wait to see what happens next!</p>
<p>Base story</p>
<p>Sid (Ranbir &#8211; Hero) is a rich kid who once used to be a topper at school. He is now totally not interested in studies one bit. All he wants in life is to have fun, bindaas life, care free attitude and does not worry about tomorrow. Aiysha (Konkana &#8211; Heroine) is a new girl in the city who wants a have things of her own and live an independent life. How these both meet, become responsible and make their life beautiful together is what Wake up Sid is all about.</p>
<p>Well the movie</p>
<p>Sid and his frien<a href="http://preethika.wordpress.com/files/2009/12/wake-up-sid-film-review4.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-63" title="wake-up-sid-film-review" src="http://preethika.wordpress.com/files/2009/12/wake-up-sid-film-review4.jpg?w=300" alt="" width="300" height="222" /></a>ds are in their final year of college and its time for their farewell party. He loves to take photos and since he has no date for the farewell party (the setup is just a replica of a prom) clicks random pictures. This is where he meets Aiysha. Knowing that she is not a part of the college, he starts talking to her and they quickly become friends. As she is also new to the city,  he decides to show her the new place and so they to go for a stroll. Here they talk about passion, how she wants to write, how he loves the monsoon which eventually leads in them sharing their mail id. As time goes by, they both become real good friends, she buys her own house, gets the job that she had wished for.</p>
<p>When everything seems to be fine, Sid fails in the university exams while his other friends pass. This gets him dejected, leading to a big fight at home and ends with him walking out of home. He then lands up knocking on the doors of Aiysha. As days fly, Sid learns how to cook, make his bed and also think of getting a job which he does with the help of Aiysha.</p>
<p>Here is the cute turn of events &#8211; Sid&#8217;s proposal to Aiysha which was once rejected by her due to his immatured and childish behaviour. makes her fall in love with him for the same reason. It definitely sounds &#8220;yeah I knew it&#8221; but how it happens is where one will enjoy.</p>
<p>Climax</p>
<p>Sid finally becomes responsible and finds a job in the magazine that he interned. This makes his parents very happy and decides to move back home. How they both express their feelings and get together is what the story ends.</p>
<p>Conclusion</p>
<p>While Hollywood movies end with french kiss, Bollywood ends with a HUG!</p>
<p>My review</p>
<p>I loved Konkana&#8217;s emotions &#8211; as usual perfect!! No draggy scenes, excellent Background score and a cute couple makes this movie worth watching.</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्री गुरूवाणी-ढोंगी साधुओं की भूख कभी नहीं मिटती]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/30/shri-guruvani-kapati-sadhuon-ki-bhookh/</link>
<pubDate>Sat, 30 May 2009 03:20:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/05/30/shri-guruvani-kapati-sadhuon-ki-bhookh/</guid>
<description><![CDATA[‘हिरदै जिनके कपटु बाहरहु संत कहाहि। तृस्ना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि।। हिंदी में भावार्थ-ऐसे संत ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>‘हिरदै जिनके कपटु बाहरहु संत कहाहि।<br />
तृस्ना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>ऐसे संत जो कि बाहर ने अपने आपको धार्मिक प्रवृत्ति का प्रदर्शित करते हैं पर उनके हृदय में कपट और पाप होता है उनकी तृष्णा ओर कामनाऐं कभी शांत नहीं होती। अंत में उनको बहुत पछताना पड़ता है। </p>
<p><strong>‘जिना अंतरि कपटु विकार है तिना रोइ किआ कीजै।’<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार जिनके मन में कपट और विकार हैं उनकी विपत्तियां देखकर उनके साथ सहानुभूति दिखाना व्यर्थ है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>श्री गुरुनानक देव जी ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर ही प्रहार नहीं किये बल्कि समाज को मार्गदर्शन करने वाले कथित धार्मिक संतों-जो केवल आजीविका के लिये धार्मिक प्रतीक धारण करते हुए चोला पहन लेते हैं-की नाटकबाजी की भी आलोचना की।<br />
यह सच है कि आम इंसान में लोभ और लालच की प्रवृत्ति होती है पर वह उसकी पूर्ति के लिये अपनी सीमा में नैतिक आधार पर कर्म करता है। इतना ही नहीं अगर उसकी इच्छाऐं और कामनायें पूरी न हों तो वह एक बार उनकी पूर्ति करने का इरादा छोड़ भी देता है क्योंकि वह अकेले होने के कारण अपने उद्ददेश्य की लिये लंबे समय तक संघर्ष नहीं कर सकता।  जबकि कथित लोभी और लालची साधु की कभी तृष्णायें शांत नहीं होती फिर उनको अपनी पूज्यता, सम्मान और शक्ति का भ्रम इस कदर ढीठ बना देता है कि वह अपनी इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिये किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। उसके लिये उनको अपने ही जैसे लोभी और लालची शिष्यों का भी समर्थन मिलता है।  श्री गुरुग्रंथ साहिब की वाणियों से यही संदेश मिलता है किं ऐसे ही कथित ढोंगी और लालची साधुओं से सतर्क रहना चाहिये जो कि इच्छा और तृष्णा की पूर्ति न होने पर एक आम आदमी से अधिक खतरनाक हो जाते हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.. </p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">3.अनंत शब्द योग</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम संदेश: मुसीबत में भी दिल दिमाग पर काबू रखना चाहिए ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/01/29/dil-aur-dimag-kabu-men-rakhen-rahim-sandesh/</link>
<pubDate>Thu, 29 Jan 2009 03:58:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/01/29/dil-aur-dimag-kabu-men-rakhen-rahim-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[सरवर के खग एक से, बाढ़त प्रीति न धीम पै मराल को मानसर, एकै ठौर रहीम अधिकतर पक्षी एक समान होते हैं। उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>सरवर के खग एक से, बाढ़त प्रीति न धीम<br />
पै मराल को मानसर, एकै ठौर रहीम</strong></p>
<p>अधिकतर पक्षी एक समान होते हैं। उनका अपने जल स्त्रोंतो से लगाव तभी तक रहता है जब तक उसमें उनके लिये सुविधानुसार जल रहता है वरना इधर उधर से डोलते रहते हैं पर हंस केवल मानसरोवर में रहता है। यह उसकी दृढ़ता का प्रतीक है।</p>
<p><strong>संपादकीय व्याख्या-</strong>इस संसार में सामान्य लोग स्वार्थ के आधार पर ही अपने संबंध बनानते और बिगाड़ते है। अब तो यह हालत यह हो गयी है कि लोग उन्हीं रिश्तेदारों के नाम सुनाते हैं जो प्रतिष्ठित और धनवान हैं। आपसी वार्तालाप में लोग अपने उन रिश्तेदारों और मित्रों का जिक्र अवश्य करते हैं जो पद, प्रतिष्ठा और पैसे की दृष्टि से शिखर पर है पर उन लोगों का नाम नहीं लेते जो सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं। इतना ही नहीं वह आते जाते भी उन लोगों के पास हैं जहां कभी उनका स्वार्थ सिद्ध होने की संभावना होती है। यह निम्न कोटि की प्रवृत्ति है।  उच्च प्रवृत्ति के लोग सभी के प्रति समान दृष्टिकोण रखते हैं। ऐसे ही लोग सभी जगह सम्मान भी प्राप्त करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण जी श्रीगीता में यह स्पष्ट कथन है कि जो प्रिय को देखकर प्रसन्न नहीं होते और जो अप्रिय को देख दुःखी नहीं होते वही स्थिरप्रज्ञ है। </p>
<p>यह समदर्शिता का भाव रखना अपने जीवन में ही सुख का कारण होता है। जो मनुष्य यह भाव नहीं रखते उनको ही जीवन में तनाव झेलना पड़ता है। वह प्रतिष्ठत, उच्च पदासीन और पैसे वाले रिश्तेदारों और मित्रों के यहां जाकर कोई सम्मान नहीं पाते। वह यह समझते हैं कि समय आने पर वह काम आयेंगे तो यह भी तभी संभव होता है कि जब  वह स्वयं उनका स्वार्थ सिद्ध करने वाले हों। अगर वह ऐसा करने में सक्षम नहीं होते तो समय पड़ने उन्हें अपने से उच्च व्यक्ति की सहायता नहीं मिलती भले ही आश्वासन मिल जाता हो ऐसे में  उनको  भारी निराशा भी झेलनी पड़ती है। जीवन में दु:ख सुख का दौर तो चलता रहता है पर दु:ख के समय अपने स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर जाने का विचार नहीं करना चाहिए।  इससे न केवल स्वयं ही मानसिक रूप से कमजोर होते हैं बल्कि दूसरों के सामने  बिचारगी की स्थिति में प्रस्तुत होना पड़ता है और हमारा स्वाभिमान आहत होता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिः औरत में आदमी से अधिक शक्ति होती है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/09/20/chanakya-niti-aur-men-admi-se-adhik-shakti-hotee-hai/</link>
<pubDate>Sat, 20 Sep 2008 03:08:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[1.कोयल की मधुर वाणी उसका रूप है। वह भी कौए की तरह काली और कुरूप होती है पर उसका कर्णप्रिय स्वर मनुष्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>1.कोयल की मधुर वाणी उसका रूप है। वह भी कौए की तरह काली और कुरूप होती है पर उसका कर्णप्रिय स्वर मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करता है लोग उसके कुरूप होने का दुर्गुण भूल जाते हैं। वह उसके काले और भद्दे होने की उपेक्षा कर उससे प्रेम करने लगते हैं।<br />
2.नारी में पुरुष से दोगुना भोजन करने की क्षमता होती है जबकि लज्जा चार गुना अधिक होती है। साहस छह गुना अधिक होता है।<br />
3.नदी के तेज बहाव के कारण उसके किनारे खडे पेड़ पौधे जिस तरह नष्ट हो जाते हैं उसी तरह दूसरे के घर में रहने वाली स्त्री भी लांछित हो जाती है क्योंकि उसके लिये अपनी रक्षा करना अत्यंत कठिन होता है।<br />
4.किसी भी पुरुष का घर स्त्री के कारण ही बसता है इसलिये नारी में कुल गुण और सहृदयता का होना आवश्यक है। जहां उसका पति के प्रति अनुराग नहीं होगा वहां जीवन की गाड़ी नहीं चल पायेगी। इसलिये स्त्री मन और वचन से सत्य बोलने, सदुव्यवहार करने और श्रेष्ठ गुणों वाली होना आवश्यक है।<br />
5.धरती से निकलने वाला जल, पवित्र व शुद्ध होता है उसी तरह पतिव्रता नारी सदैव शुद्ध और पवित्र होती है। प्रजा के हित के संलिप्त रहने वाला राज तथा संतोष करने वाला विद्वान हमेशा पवित्र होता है।<br />
</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:कार्य संपन्न होने पर मनुष्य अपने सहायक का अनादर करते हैं]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/15/vidur-neeti/</link>
<pubDate>Fri, 15 Aug 2008 03:22:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/15/vidur-neeti/</guid>
<description><![CDATA[1.निरोग रहना, ऋणी न होना, विदेश में रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>1.निरोग रहना, ऋणी न होना, विदेश में रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निर्भय होना ये किसी मनुष्य के लिए लिये इस लोक में छह सुख हैं।<br />
2. ईष्र्या करने वाला, घृणा करने वाला, मन में असंतोष रखने वाला, क्रोधी, सदैव संशय में रहने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीवन पर निर्भर रहने वाला छह लोग सदा दुखी रहते है।<br />
3. शिक्षा समाप्त कर चुका शिष्य अपने गुरु का, विवाहित पुत्र अपनी मां का, काम भावना शांत होने पर पुरुष स्त्री का, कार्य संपन्न होने पर मनुष्य अपने सहायक का, नदी की धारा पार कर लेने वाला पुरुष नाव का  तथा रोग मुक्त हुआ रोगी अपने चिकित्सक का सदा अपने  अनादर करते हैं<br />
4.स्त्रियों के विषय में आसक्त रहना, जुआ, शिकार, मद्यपान, कठोर वाणी बोलना, अत्यंत कठोर दंड देना और अपने धन का दुरुपयोग करना यह सात दुर्गुण त्याग देना में ही भलाई है। </strong></p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
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<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःअर्थ और काम में लिप्त न होने वालों को ही धर्म प्रचार का अधिकार]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/09/manu-smruti-3/</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 05:53:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/09/manu-smruti-3/</guid>
<description><![CDATA[१.धर्मोपदेश देने का विधान उन्हीं लोगों के लिए है जो अर्थ और काम में आसक्त नहीं है। जो व्यक्ति विषयों]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>१.धर्मोपदेश देने का विधान उन्हीं लोगों के लिए है जो अर्थ और काम में आसक्त नहीं है। जो व्यक्ति विषयों में आसक्ति रखता उसकी धर्म में रूचि हो ही नहीं सकती और होगी तो दिखावे की। धर्म तत्व को जानने के इच्छुक लोगों के लिए धर्म ग्रंथों का ज्ञान ही सर्वोच्च प्रमाण है।<br />
२.वेदों में जहाँ दो कथनों में विरोध हो वहाँ विद्वान लोगों को बराबर महत्व देते हुए उचित निर्णय लेना चाहिए।<br />
३.धर्म के चार लक्षण हैं-१.वेदों द्वारा प्रतिपादित २. स्मृतियों द्वारा अनुमोदित ३. महर्षियों द्वारा आचरित 4. जहाँ किसी विषय में एक से अधिक मत हों वहाँ उस धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति की आत्मा को प्रिय। इन कसौटियों पर सिद्ध होने वाला ही प्रामाणिक धर्म है।</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह इस ब्लाग <a href="http://rajdpk.worpdress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’</a> पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःस्वामी वही जो नौकर से भी निभाये]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/08/manu-smruti-2/</link>
<pubDate>Fri, 08 Aug 2008 01:25:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/08/08/manu-smruti-2/</guid>
<description><![CDATA[आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थ: सन्यथाभाषितमादित:। स: दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम।। मनु स्मृति के इस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थ: सन्यथाभाषितमादित:।<br />
स: दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम।।</strong><br />
मनु स्मृति के इस श्लोक के अनुसार जो नौकर स्वस्थ अवस्था में ईमानदारी व निष्ठा से स्वामी के आदेश का पालन करता है वह रोगादि के कारण यदि लंबे समय तक अनुपस्थित रहे तो भी उसे वेतन प्रदान करना चाहिए। </p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong> आज हम अक्सर ऐसी घटनाएँ देखते हैं जिसमें नौकर द्वारा मालिक के प्रति तमाम तरह के अपराध किये जाते हैं। दरअसल आज के भौतिक युग में सब जगह अविश्वास का माहौल है और ऐसे में किसी का विश्वास जीतना है तो उसकी सहायता कर ही यह संभव है। जो लोग धनी हैं उन्हें अपने नौकरों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि विपति में वह उसकी सहायता करेंगे। कोई भी मालिक जब अपने नौकर को कोई काम कहता है तो वह उसे ईमानदारी से करता है तो उसकी प्रशंसा करना चाहिए। जब कई लोग बेईमानी से काम करते हैं उनको भी वेतन मिलता है तो और ईमानदार को भी वही तो न्याय कहाँ रह जाता है। </p>
<p>जो धनिक लोग चाहते हैं कि उनके नौकर ईमानदार रहें उन्हें उनके लिए नियत वेतन के साथ उसकी ईमानदारी के लिए एक राशि अपने मन में रख लेना चाहिए जो उसे बीमार पड़ने, बच्चों की शिक्षा और बेटी के विवाह आदि के समय उपहार के रूप में देनी चाहिए। अगर वह कभी स्वयं बीमार पड़ जाता है तो उसका वेतन तो देना चाहिए बल्कि उसका इलाज भी कराना चाहिए। उसे विश्वास दिलाना चाहिऐ कि वह अगर नौकर के रूप में वफादारी निभाएगा तो हम मालिक की तरह भी निभाएंगे। याद रखना श्रम खरीदा जा सकता है पर ईमानदारी नहीं।</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:बन्दर की तरह उछलकूद कर जनसेवा करने वालों से सावधान रहें]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/06/23/%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%89/</link>
<pubDate>Mon, 23 Jun 2008 03:24:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2008/06/23/%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%89/</guid>
<description><![CDATA[बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि कविवर रहीम कहते है इस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><div class="deleteBody">
<p class="postBody" style="color:#777;"><strong>बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि<br />
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते है इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।</p>
<p><strong>आज के संदर्भ में व्याख्या-</strong> आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है। यह तो केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।</p>
<p>समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।</p>
</div>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःगुणहीन व्यक्ति पशु के समान]]></title>
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<pubDate>Sat, 17 May 2008 05:14:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[रहिमन सो न कछु गनै, जासों, लागे नैन सहि के सोच बेसाहियो, गया हाथ को चैन कविवर रहीम कहते हैं कि जिन म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>रहिमन सो न कछु गनै, जासों, लागे नैन<br />
सहि के सोच बेसाहियो, गया हाथ को चैन<br />
</strong>कविवर रहीम कहते हैं कि जिन मनुष्यों को नयनों के माध्यम से प्रेम संबंध हो जाता है, वह दुनियां का कोई विचार नहीं करते। जो लोग ऐसा प्यार करते हैं उनको यह समझ लेना चाहिए कि उनके जीवन का चैन गया और सब कुछ सहकर इस झगड़े को मोल लेना चाहिए।</p>
<p><strong>रहिमन विद्या बुद्धि नहिं, नहीं धरम, जस, दान<br />
भू पर जनम वृथा धरै, पसु बिन पूंछ बिषान </strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जिन मनुष्यों में विद्या, बुद्धि, धर्म, यश और दान जिस व्यक्ति में नहीं है उनका इस धरती पर जन्म लेना ही व्यर्थ हो जाता है। वह लोग पशु के समान हैं।</p>
<p><strong>रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार<br />
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार </strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि  पाप के धन को नष्ट होने में अधिक देर नहीं लगती-जैसे चोरी कर होली की लकड़ी लायी जाती है* और वह कुछ ही पल में जल जाती है।<br />
*पहले होलिकोत्सव पर लकड़ी लाने के लिए चोरी की जाती थी। समय के अनुसार अब यह परंपरा लुंप्त होती जा रही थी।</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
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<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते उस संपत्ति को कोई ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर नीति:विद्या सज्जन पुरुष की शक्ति होती है ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2008/02/15/vidur-neetividhyaa-sajjan-purush-kee-shakti-hotee-hai/</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 04:13:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[१. विद्या का मद, धन का मद और तीसरा ऊंची कुल का मद है. यह घमंडी पुरुषों के लिए मद हैं परन्तु सज्जन पु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>१. विद्या का मद, धन का मद और तीसरा ऊंची कुल का मद है. यह घमंडी पुरुषों के लिए मद हैं परन्तु सज्जन पुरुषों के लिए दम के साधन हैं.<br />
२.मनस्वी पुरुषों को सहारा देने वाले संत है, संतों के भी सहारे संत ही हैं. दुष्टों को सहारा देने वाले संत हैं, पर दुष्ट लोग संतों को सहारा नहीं देते.<br />
३.अच्छे वस्त्र वाला सभा को जीतता है, जिसके पास गाय है वह मीठे स्वाद की आकांक्षा को जीत लेता है, सवारी से चलने वाला मार्ग को जीत लेता है और शीलवान पुरुष सब पर विजय पा लेता है.<br />
४.पुरुष शील में ही प्रधान है जिसका वही नष्ट हो जाता है, इस संसार में उसका जीवन, धन और बंधुओं से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता. </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[क्रिकेट बहुत दिन बाद जनचर्चा का विषय बना ]]></title>
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<pubDate>Fri, 28 Sep 2007 16:36:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज पहली बार बहुत समय बाद लोगों के मुहँ से क्रिकेट के बारे में चर्चा करते सुना, और स्पष्ट है कि यह कल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज पहली बार बहुत समय बाद लोगों के मुहँ से क्रिकेट के बारे में चर्चा करते सुना, और स्पष्ट है कि यह कल बीस ओवरीय विश्वकप प्रतियोगिता के सेमी फाइनल में आस्ट्रेलिया को हारने के बाद शुरू हुई। पहले ऎसी चर्चा १९८३ में शुरू हुई थी बाजार में लोगों को जमकर भुनाया गया और विश्व में आर्थिक रुप से गरीब कहे जाने वाला भारत क्रिकेट का आर्थिक आधार बन गया। फिर एक दौर एसा आया कि भारतीय टीम अंतर्राष्ट्रीय दौरों पर तो अच्छा प्रदर्शन करती पर प्रतियोगिताओं में पिट कर आ जाती। क्रिकेट के कर्ण धारों को लगता कि अन्तराष्ट्रीय दौरों के सफलता से भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता बरकरार रहेगी और उन्होने प्रतियोगिताओं को भी सामान्य रुप से लिया और पिछले विश्व कप के बाद भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता कम हो गयी भले ही क्रिकेट से जुडे लोग इसे नही मानते हैं पर इसके आर्थिक पक्ष से जुडे विशेषज्ञ इस पहलू को जानते हैं कि लोगों में अगर लगाव अधिक नहीं है तो उसका फ़ायदा नही उठाया जा सकता है।</p>
<p>बीस ओवरीय मैच अगर देखा जाये तो भारत में क्रिकेट को लोकप्रियता दिला सकते हैं और बाजार में एक बार फिर लोगों में इसके प्रति लगाव पैदा कर उसे भुना सकते है पर उसकी एक ही शर्त है कि भारत इस कप को जीत ले। महत्वपूर्ण मैच हारने के मामले में भारतीय खिलाडी बदनाम है और इसी कारण दर्शकों में खेल और खिलाडियों के प्रति जज्बा कम भी है। हालांकि लोग कहते हैं कि खेल है उसको खेल की भावना से देखा जाना चाहिऐ पर और यह सही भी है पर जब इससे जुडे आर्थिक पक्षों के बारे में सोचेंगे तो यह साफ लगेगा कि जीत और सिर्फ जीत ही उसमें काम करती है, खिलाडियों को आर्थिक फायदा दिलाने में । सभी जगह एक नंबर को सलाम किया जाता है और दो और तीन नंबर वाले कहा जाता है कि&#8217;कोई बात नहीं अगली बार प्रयास करना&#8217;।</p>
<p>कल की जीत के बाद अगर लोगों में पुन: क्रिकेट के बारे में चर्चा शुरू हुई है तो इससे जुडे बाजार के लोग जरूर खुश हुए होंगे। आज मैं बाजार गया तो दुकानों, ठेलों और पार्कों के आसपास एकत्रित लोगों के मुहँ से इस बात में चर्चा सुनी -शायद कई वर्षों बाद। इसमें हर वर्ग का आदमी था-अब वर्गों के स्वरूप तो सब जानते ही हैं उनमें विस्तार से जाने की बजाय हम कह सकते हैं कि क्रिकेट के बारे मे पहली बार जन सामान्य के बीच चर्चा हुई। आर्थिक समीक्षकों की दृष्टि से कहें तो आज बहुत दिन बाद क्रिकेट का बाजार खुला।</p>
<p>बहुत दिन से क्रिकेट के लेकर लोगों में निराशा का भाव था और फाइनल में उत्साह का संचार तो हुआ है पर यह आगे बना रहे तो इसकी एक ही शर्त है कि भारत इस विश्व कप को जीत ले। वैसे मुझे यह यकीन है कि भारत इस विश्व कप जीत लेगा क्योंकि इसमें सब युवा खिलाड़ी हैं और उनमें पूरी तरह एकजुटता का भाव दिखाई देता है जबकि पिछले एक दिवसीय विश्व कप में गयी टीम के बारे में किसी को विश्वास नहीं था और खिलाडियों के मनमुटाव की चर्चाएं भी सार्वजनिक रुप से हो चुकीं थी। फिर उसके अनेक खिलाडी अनफिट थे। जैसा कि मैं कहता हूँ कि क्रिकेट खिलाड़ी की फिटनेस का आंकलन उसकी बैटिंग और बोलिंग से नही बल्कि उसकी रन लेने के लिए विकेटों की बीच दौड़ तथा क्षेत्र रक्षण करने की फुर्ती से देखा जाना चाहिऐ और मुझे इस टीम में इस दृष्टि से कोई कमी नहीं दिखाई देती। मेरी इस टीम को शुभकामना है कि वह जीते और देशवासियों का मनोबल बढाए जिनके जज्बातों पर उनका और इस खेल का भविष्य टिका हुआ है।</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रामजी लगायेंगे बेडा पार]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/21/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 21 Sep 2007 03:50:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[विश्वास धारण कर हृदय में रामजी करेंगे बेड़ा पार जलमार्ग हो या थल मार्ग या करना हो आकाश में बिना पंख व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>विश्वास धारण कर हृदय में<br />
रामजी करेंगे बेड़ा पार<br />
जलमार्ग हो या थल मार्ग या<br />
करना हो आकाश में<br />
बिना पंख विचरण<br />
कोई अगर बाधा होगी तो<br />
हृदय से स्मरण कर नाम का<br />
हो जाओगे उसके पार<br />
उनकी भक्ति में शक्ति अपार<br />
पर आएगा आड़े तुम्हारा अंहकार</p>
<p>तुम चाहोगे कि<br />
काम सब रामजी करें<br />
नाम तुम्हारा हो<br />
दूसरों के यकीन और भक्ति की<br />
परवाह नहीं<br />
बढाना चाहते अपना व्यापार<br />
दिखाते है लोगों को सपने<br />
लक्ष्य का पता नहीं अपने<br />
रामजी के नाम से बड़ा नामा<br />
क्या करेंगे लोगों का भला<br />
उनकी नजर में है बसता है अपना ही परिवार</p>
<p>रामजी ने कहा<br />
&#8216;मुझसे बडे हैं भक्त मेरे<br />
बिना लालच और लोभ<br />
मेरी भक्ति के भाव में पडे&#8217;<br />
ऐसे भक्तों की शक्ति अपार<br />
जिनका कुछ लोग भी करते व्यापार<br />
जो अभक्ति में देखते फ़ायदा<br />
वह भी लेते रामजी का नाम कई बार</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
सच और झूठ का पता तो रामजी जाने<br />
पर हम तो उनकी शक्ति को माने<br />
भक्त तो नाम लेते हैं<br />
अभक्त भी लगाते पुकार<br />
पर उनसे भी क्या कहें<br />
कहीं एक क्षण भी हृदय से याद किया<br />
तो हो जाएगा उनका बेड़ा पार<br />
रामजी की माया है अपरंपार<br />
अपने भक्तों के दें भक्ति<br />
और अभक्तों को माया के चक्कर में<br />
ऐसा फंसायें कि घूमें बेकार<br />
इस धरती पर ही स्वर्ग बसाने के चाह<br />
अपनी देह के अमर होने का भ्रम<br />
व्यापार ही जिनका धर्म<br />
भक्तों की भावनाओं बेखबर<br />
जिन्होंने तय कर लिया है कि<br />
अपनी दैहिक शक्ति का प्रदर्शन दिखाएँगे<br />
रामजी के अलावा उन्हें<br />
कौन समझा सकता है कि<br />
यकीन कर लो<br />
कुछ पल हृदय से भक्ति कर लो<br />
रामजी तुम्हारा भी बेड़ा पार लगाएंगे</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्री गणेश जी को कोटि-कोटि नमन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 12:46:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                     महाभारत ग्रंथ की रचना के साथ वेद्व्यास जी का नाम जुडा हुआ है, पर इस बात की चर्च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p align="justify">                     महाभारत ग्रंथ की रचना के साथ वेद्व्यास जी का नाम जुडा हुआ है, पर इस बात की चर्चा बहुत कम ही होती है उसके लेखक तो भगवान श्री गणेश जी ही थे। भगवान ब्रह्मा जी के आदेश पर श्री वेदव्यास से ने यह ग्रंथ लिखने के लिये ही गणेश जी का स्मरणं किया था। वह प्रकट हुए तो वेदव्यास जी ने उनसे आग्रह किया कि मैं महाभारत की कथा बोलता जाऊंगा और आप लिखते जाईयेगा।</p>
<p align="justify">                 श्री गणेश जी बहुत प्रसंन हुए और बोले-&#8217; मैं लिखता जाऊंगा पर मेरी कलम नहीं रुकना चाहिये।&#8217;<br />
वेदव्यास जी ने उनकी बात मान ली साथ ही कहा-&#8217;आप भी सोच समझ कर लिखियेगा।&#8217;</p>
<p align="justify">
              आज हम जिस श्रीमदभागवत गीता का जो विश्व व्यापी प्रभाव देख रहे हैं वह महाभारत ग्रंथ का ही एक भाग है और कहना चाहिये कि सबसे महत्वपूर्ण भी है। भारत के विद्वान मनीषियों ने इसे सोच-विचारकर महाभारत से प्रथक करने का निर्णय किया क्योंकि इसमें शाश्वत सत्य का जो उदघाटन किया गया है उसको देखते हुए आवश्यक भी था।
</p>
<p align="justify">श्रीमदभागवत गीता की चर्चा आज पूरे विश्व में होती है और यही कारण है कि भगवान श्री क्रुष्ण का नाम जहां घर-घर में जाना जाता पर कई लोगों को तो यह भी पता नहीं कि इस पवित्र ग्रंथ को विश्व में स्थापित करने का श्रेय श्री गणेश जी की कलम को भी है। महर्षि वेदव्यास का नाम तो फ़िर भी चर्चा में आता है पर श्री गीता के नाम से तो कभी श्री गणेश जी का नाम जोडा ही नहीं जाता।</p>
<p align="justify">         महाभारत जैसा इतना बृहद ग्रंथ लिखने के बावजूद उस पर अपना नाम तक उन्होने अंकित नही किया। भगवान श्री कृष्ण ने जिस निष्काम भाव से कर्म करने का जो उपदेश दिया उसके एक प्रतीक श्री गणेश जी भी है, आमतौर से ऐसी चर्चा बहुत कम लोग करते है। श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वही महर्षि वेद्व्यास जी ने बोला और गणेश जी ने लिखा केवल इसलिये ही उनको बुद्धि का देवता नहीं माना जाता बल्कि उन्होने कई ऐसे उदाहरण भी प्रस्तुत किये जिससे इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि मनुष्य की बुद्धि ही उसकी पहचान है। अपनी बुद्धि से वह जैसे कर्म करेगा वैसी ही उसकी मानव समाज में पहचान होगी। जब देवताओं में सर्वश्रेष्ठ कहलाने के लिये पूरी दुनिया की परिक्रमा करने की होड लगी तब वह बहुत देर तक वहीं अपने माता-पिता के पास बैठे रहे और फ़िर उठे और उनकी परिक्रमा कर वहीं बैठ गये और विजेता घोषित किये गये। इसी कारण उन को पूजा में सबसे पहले स्थान मिला। कभी उनके क्रोध कराने या युद्ध में भाग लेने की चर्चा भी नही आती। अन्य देवताओं द्वारा युद्ध में भाग लेने और अपनी शक्ति के द्वारा उसमें विजय प्राप्त करने के ढेर सारे प्रसंग है पर श्री गणेश जी बौद्धिक् शौर्य से सारे संसार को पल भर में जीतने के पराक्रम के कारण सारे विश्व में शुभ का प्रतीक बन गये। अगर उनके चरित्र को देखें तो मनुष्य में बुद्धि तत्त्व की कितनी प्रधानता हो सकती है इसका ज्ञान मिलता है<br />
अगर हम देखें तो वास्तव में मनुष्य अपनी ही बुद्धि के अनुसार ही अच्छे और बुरे कर्म करता है। इसी कारण हमेशा ही यह कहा जाता है कि अपनी बुद्धि में अच्छे विचार और संस्कार धारण करो तो स्वतः ही अच्छे काम करोगे। हमने देख होगा कि वैसे तो धनवान, उच्च पदासीन लोग सदैव सम्मान पाते हैं पर जब विपत्ति आती है तब सलाह्-मशविरा के लिये बुद्धिमान लोगों की शरण ली जाती है और वह उसका निवारण भी करते हैं। यही कारण है कि बौद्धिक शौर्य के प्रतीक भगवान श्री गणेश जी विघ्न निवारक भी माना जाता है और इसलिये कोई शुभ कार्य प्रारम्भ होने से पहले उनकी स्तुति की जाती है। मन में यह भाव रहता है कि चूंकि कोई भी काम बौद्धिक चातुर्य के बिना सम्पंन नही हो सकता इसलिये श्री गणेश जी का स्मरणं किया जाता है।</p>
<p align="justify">
                गणेश चतुर्थी के इस पावन पर्व पर हमें यह याद रखना चाहिये कि शिव्-पार्वती पुत्र श्री गणेश महाराज न केवल शुभ के प्रतीक हैं बलिक उनसे यह प्रेरणा भी मिलती है कि अपने जीवन का लक्ष्य अगर पाया जा सकता है तो वह केवल बौद्धिक शौर्य, धैर्य और संयम से पाया जा सकता है। अपनी सफ़लता के लिये किसी को गिराने, अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिये दूसरे की निंदा करने और अपनी उपलब्धि की लिये दूसरे का अधिकार छीनने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही सहजता, सरलता और शांति से अपना कार्य संपन्न करने की प्रेरणा भी मिलती है।
</p>
<p align="justify">                      भगवान गणेश सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणों के ईश माने जाते हैं। गुणों का ईश ही प्रणवस्वरूप &#8216;ॐ&#8217; है। प्रणवस्वरूप &#8216;ॐ&#8217; में गणेश जी की मूर्ति सदा स्थित रहती है। अत: &#8216;ॐ&#8217; गणेश जी की प्रणवाकार मूर्ति है, जो वेद मन्त्र के प्रारंभ में रहती है। इसीलिये &#8216;ॐ&#8217; को गणेश जी की साक्षात मूर्ति मानकर वेदों के पढने वाले सबसे पहले &#8216;ॐ&#8217; का उच्चारण करते हैं। श्री गणेश जीं को मेरा कोटि-कोटि नमन।</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
