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	<title>hindi-sahitya &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/hindi-sahitya/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-sahitya"</description>
	<pubDate>Sat, 26 Dec 2009 16:29:48 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-भक्ति को धंधे की तरह न करें (bhakti ko dhandha n samjhen-hindu sandesh)]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2009/11/29/bhartrihari-niti-shatak-in-hindi/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 06:25:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2009/11/29/bhartrihari-niti-shatak-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212; क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि </strong><br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong><br />
<strong>कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।<br />
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।</strong></p>
<p><strong></strong><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के&#160;लिए &#160;कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें। </p>
<p>वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया। </p>
<p>यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये। भक्त&#160;&#160;करते समय इस बात का विचार नहीं करना चाहिए कि कोई स्वर्ग का टिकट आरक्षित करवा रहे है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
<b>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</p>
<p></b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
</strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लोग अपने से बात करते हुए पाठ अंतर्जाल पर पढ़ना चाहते हैं-संपादकीय]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/17/logon-se-apni-bat-hindi-editorial/</link>
<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 15:32:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/17/logon-se-apni-bat-hindi-editorial/</guid>
<description><![CDATA[आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक संपादक के दिलचस्प संस्मरण जुड़े हुए हैं।  यह ब्लाग जब बनाया तब लेखक का छठा ब्लाग था। उस समय दूसरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर यूनिकोड में न रखकर सामान्य देव फोंट में रचनाएं लिख रहा था। वह किसी के समझ में  नहीं आते थे।  ब्लाग स्पाट के हिंदी ब्लाग से केवल शीर्षक ले रहा था।  इससे हिन्दी ब्लाग लेखक उसे सर्च इंजिन में पकड़ रहे थे पर बाकी पाठ उनकी समझ में नहीं आ रहा था। यूनिकोड में रोमन लिपि में लिखना इस लेखक के लिये कठिन था।  एक ब्लाग लेखिका ने पूछा कि ‘आप कौनसी भाषा में लिख रहे हैं, पढ़ने में नहीं आ रहा।’ उस समय इस ब्लाग पर छोटी क्षणिकायें रोमन लिपि से यूनिकोड में हिन्दी में लिखा इस पर प्रकाशित की गयीं।  कुछ ही मिनटों में किसी अन्य ब्लाग लेखिका ने इस पर अपनी टिप्पणी भी रखी।  इसके बावजूद यह लेखक रोमन लिपि में यूनिकोड हिंदी लिखने को तैयार नहीं था।  बहरहाल लेखिका को इस ब्लाग का पता दिया गया और उसने बताया कि इसमें लिखा समझ में आ रहा है। उसके बाद वह लेखिका फिर नहीं दिखी पर लेखक ने तब यूनिकोड हिन्दी में लिखना प्रारंभ किया तब धीरे धीरे बड़े पाठ भी लिखे। </p>
<p>उसके बाद तो बहुत अनुभव हुए। यह ब्लाग प्रारंभ से ही पाठकों को प्रिय रहा है।  यह ब्लाग तब भी अधिक पाठक जुटा रहा था जब इसे एक जगह हिन्दी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों  का समर्थन नहीं मिलता था। आज भी यहां पाठक सर्वाधिक हैं और एक लाख की संख्या इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी अपनी गति से अंतर्जाल पर बढ़ रही है।  मुख्य बात है विषय सामग्री की।  इस ब्लाग पर अध्यात्मिक रचनाओं के साथ व्यंग, कहानी, कवितायें भी हैं।  हास्य कवितायें अधिक लोकप्रिय हैं पर अध्यात्मिक रचनाओं की तुलना किसी भी अन्य विधा से नहीं की जा सकती।  लोगों  की अध्यात्मिक चिंतन की प्यास इतनी है कि उसकी भरपाई कोई एक लेखक नहीं कर सकता।  इसके बाद आता है हास्य कविताओं का।  यकीनन उनका भाव आदमी को हंसने को मजबूर करता है। हंसी से आदमी का खून बढ़ता है।  दरअसल एक खास बात नज़र आती है वह यह कि यहां लोग समाचार पत्र, पत्रिकाओं तथा किताबों जैसी रचनाओं को अधिक पसंद नहीं करते।   इसके अलावा क्रिकेट, फिल्म, राजनीति तथा साहित्य के विषय में परंपरागत विषय सामग्री, शैली तथा विधाओं से उन पर प्रभाव नहीं पड़ता।  वह अपने से बात करती हुऐ पाठ पढ़ना चाहते हैं।  अंतर्जाल पर लिखने वालों को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि उनको अपनी रचना प्रक्रिया की नयी शैली और विधायें ढूंढनी होंगी।  अगर लोगों को राजनीति, क्रिकेट, फिल्म, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषयों पर परंपरागत ढंग से पढ़ना हो तो उनके लिये अखबार क्या कम है? अखबारों जैसा ही यहां लिखने पर उनकी रुचि कम हो जाती है। हां, यह जरूर है कि अखबार फिर यहां से सामग्री उठाकर छाप देते हैं। कहीं नाम आता है कहीं नहीं।  इस लेखक के गांधीजी तथा ओबामा पर लिखे गये दो पाठों का जिस तरह उपयेाग एक समाचार पत्र के स्तंभकार ने किया वह अप्रसन्न करने वाला था।  एक बात तय रही कि उस स्तंभकार के पास अपना चिंतन कतई नहीं था। उसने इस लेखक के  तीन पाठों से अनेक पैरा लेकर छाप दिये।  नाम से परहेज! उससे यह लिखते हुए शर्म आ रही थी कि ‘अमुक ब्लाग लेखक ने यह लिखा है’।  सच तो यह है कि इस लेखक ने अनेक समसामयिक घटनाओं पर चिंतन और आलेख लिखे पर उनमें किसी का नाम नहीं दिया। उनको संदर्भ रहित लिखा गया इसलिये कोई समाचार पत्र उनका उपयोग नहीं कर सकता  क्योंकि समसामयिक विषयों पर हमारे प्रचार माध्यमों को अपने तयशुदा नायक और खलनायकों पर लिखी सामग्री चाहिये। इसके विपरीत यह लेखक मानता है कि प्रकृत्तियां वही रहती हैं जबकि घटना के नायक और खलनायक बदल जाते हैं। फिर समसामयिक मुद्दों पर क्या लिखना? बीस साल तक उनको बने रहना है इसलिये ऐसे लिखो कि बीस साल बाद भी ताजा लगें-ऐसे में किसी का नाम देकर उसे बदनाम या प्रसिद्ध करने<br />
से अच्छा है कि अपना नाम ही करते रहो।<br />
मुख्य बात यह है कि लोग अपने से बात करते हुऐ पाठ चाहते हैं। उनको फिल्म, राजनीति, क्रिकेट तथा अन्य चमकदार क्षेत्रों के प्रचार माध्यमों द्वारा निर्धारित पात्रों पर लिख कर अंतर्जाल पर प्रभावित नहीं किया जा सकता।  अपनी रचनाओं की भाव भंगिमा ऐसी रखना चाहिये जैसी कि वह पाठक से बात कर रही हों। यह जरूरी नहीं है कि पाठक टिप्पणी रखे और रखे तो लेखक उसका उत्तर दे।  पाठक को लगना चाहिये कि जैसे कि वह अपने मन बात उस पाठ में पढ़ रहा है या वह पाठ पढ़े तो वह उसके मन में चला जाये।  अगर वह परंपरागत लेखन का पाठक होता तो फिर इस अंतर्जाल पर आता ही क्यों?  अपने मन की बात ऐसे रखना अच्छा है जैसे कि सभी को वह अपनी लगे।<br />
इस अवसर पर बस  इतना ही। हां, जिन पाठकों को इस लेखक के समस्त ब्लाग/पत्रिकाओं का संकलन देखना हो वह <a href="http://anant-shabd.blogspot.com">हिन्द केसरी पत्रिका</a> को अपने यहां सुरक्षित कर लें। इस पत्रिका के पाठकों के लिये अब इस पर यह प्रयास भी किया जायेगा कि ऐसे पाठ लिखे जायें जो उनसे बात करते हुए लगें। </p>
<div><strong><font size="5">लेखक संपादक दीपक भारतदीप,ग्वालियर&#160;</font></strong></div>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मातृभक्त पति पसंद नहीं-हास्य व्यंग्य (matrubhakt pati pasand nahin-hasya vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/12/vandematram-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 15:30:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/12/vandematram-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[अधिकतर लड़कियां अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती। यह पता अब जाकर इस आधुनिक समा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अधिकतर लड़कियां  अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती।  यह पता अब जाकर इस आधुनिक समाज को चला है।  सच कहें तो सदियों से पेट में दबी बात अब जुबान में आयी है वरना तो कौन इसे मानता?  आधुनिक संचार माध्यमों में तमाम बुराईयां हो सकती हैं पर उससे ऐसे सच सामने भी आने लगे हैं जिन पर समाज जानबूझकर पर्दा डालता आया है।  अपने घर का सच बताने में हर पुरुष शर्माता है।  चार लोगों के बीच वह यह साबित करता है कि उसका अपने घर पर पूरा नियंत्रण है।  अगर कोई गलती से कह दे कि ‘मेरी घर में नहीं सुनी जाती है तो सुनने वाले उसकी मजाक उड़ायेंगे।<br />
इसके विपरीत चार औरतें आपस में मिलेंगी तो अपने परिवार के दोष गिनाने में नहीं चूकेंगी।  सासें एकत्रित हुईं तो बहुओं और अगर बहुऐं मिली तो सासों की शिकायत करती हैं।<br />
कोई कोई तो कहते भी नहीं झिझकती कि ‘हमारे पति तो अपनी मां के चमचे हैं।’<br />
कोई मां भी कह जाती है कि ‘मेरा लड़का तो जोरु का गुलाम है।<br />
मान लीजिये ऐसे वार्तालाप में कोई पुरुष दूसरे की निंदा सुन रहा हो तो वह भी ऐसा जाल में फंसता है कि चर्चा किये जाने वाले पुरुष को वैसा ही समझ  लेता है।  अगर औरत के साथ पुरुष का रक्त संबंध हुआ तो वह उस पुरुष के बारे में प्रतिकूल टिप्पणी भी कर जाता है-‘कैसा आदमी है? क्या उसे घर चलाने की अक्ल नहीं है, लगता है बाप ने कुछ सिखाया ही नहीं है।’<br />
एक औरत मां, पत्नी, बहिन सास तथा दादी तथा अन्य रिश्तों में पुरुष का साथ निभाती है तो पुरुष भी पुत्र, पति, ससुर  तथा भाई के रूप में निभाता है।  कहने का तात्पर्य यही है कि स्त्री पुरुष के संबंध उसके रिश्तों के अनुसार बनते और बिगड़ते हैं।  जब कहीं स्त्री पुरुष के आपसी रिश्ते बिगड़ते हैं तो रक्त संबंधों के अनुसार हर कोई किसी का पक्ष भी लेता है।  कहते हैं कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य कोई नहीं जानता पर यह फार्मूला पुरुष पर भी समान रूप से लागू है।<br />
सफल पुरुष वही है जो स्त्रियों के आपसी संबंधों में बस हां हु ही कहता रहे।<br />
कई बार पत्नी ताना देती है कि ‘जाओ, अपनी मां की बात सुनो। मेरी सुनते ही कहां हो?’<br />
उसके तत्काल बाद मां की भी ताना मिल सकता है कि ‘जा जोरु के गुलाम! तेरी बात पर अब मेरा भरोसा नहीं रहा।’<br />
एक दिन हम एक सेठजी की दुकान पर खड़े थे।  उनका एक मित्र आया और बोला-‘तुझे कल सामान खरीदने बाहर चलना है कि नहीं। इतनी देर से दुकान पर न बताने आया और न ही नौकर के हाथ से संदेश भेजा।’<br />
सेठजी ने कहा-‘यार, घर पर एक काम है। देखना पड़ेगा कि चल पाऊंगा कि नहीं।’<br />
उस समय फोन की सुविधा ऐसी नहीं थी जैसी आज है।  वह आदमी बोला-‘सीधा कह न! बीबी से पूछे बिना कोई काम नहीं कर सकता।’<br />
सेठजी ने भी सरल भाव से कहा-‘तुम क्या बीबी से बिना पूछे चल रहे हो।  परसों जब मैंने चलने को कहा था तो क्यों नहीं चला? तेरा नौकर बता रहा था कि घर से मना कर दिया है। अब तुम मेरे को अपनी सफाई मत देना।’<br />
वह आदमी हंस कर चला गया। उसके जाने के बाद सेठजी हमसे बोले-‘एक बात कहूं।  बाहर आदमी कितना भी शेर बनता हो पर घर में होते सभी भीगी बिल्ली हैं। यह अलग बात है कि कोई इस बात को मानता है कि नहीं।’<br />
औरत अगर बहु है तो वह चाहती है कि पति अपनी मां यानि उसकी सास से पहले उसकी बात सुने। अगर मां है तो वह चाहती है कि इतने बरसों से जिस लड़के को पाला है वह मेरी बात सुने।’<br />
फिर इस पर बहने और अन्य रिश्ते भी होते हैं।  बहिन सोचती है कि भाई अपनी साली से अधिक हमें तवज्जो दे।  साली है तो वह चाहती है कि जीजाजी हमें अपनी बहिन से अधिक सम्मान दें।<br />
हमारे यहां समाज पुरुष प्रधान इसलिये है क्योंकि अभी भी अधिकतर प्रत्यक्ष आय का भार उस पर है-याद रहे अमेरिकी विशेषज्ञ कहते हैं कि सामान्य भारतीय गृहिणियां अपनी पति से अधिक आय करती हैं यानि वह इतना काम करती हैं कि अगर उनका रुपये में मूल्यांकन हो तो पति से अधिक आय उनकी होना चाहिये। इस प्रत्यक्ष आय के कारण उसका प्रभाव घर पर रहता है पर दूसरी समस्या उसके साथ यह है कि वह हमेशा घर से बाहर ही होता है।  दिन में घर पर क्या हुआ? किसने क्या कहा? उसे पता तब चलता है जब वह शाम को घर वापस आता है।  हर कोई अपने हिसाब से अपनी बात उसे सुनाता है।  ऐसे मेें उसकी थकान और तनाव बढ़ जाता है।  यह घर घर की कहानी है। इस पर हंसने जैसी कोई बात नहीं है।  यदि इन बातों पर आप हंसते हैं तो इसका आशय यह है कि अभी आपका विवाह नहीं हुआ या फिर आप हमसे क्या अपने आपसे अपना सच छिपा रहे हैं।<br />
अब सवाल है कि लड़कियां ही ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है तो फिर उसके जीवन साथी से आप क्या कहेंगे? मां की बात सुन क्योंकि पुरुष तो तू है। इधर दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा के भी कानून बना रखे हैं तब आदमी पर एक दबाव तो रहता ही है। एक अजीब संयोग है कि इस समय वंदेमातरम को लेकर तमाम तरह की चर्चा है ऐसे में ही एक टीवी चैनल से यह संदेश निकला कि ‘लड़कियां ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है।’ इन्हीं लड़कियों में ही भविष्य की मातायें हैं और कभी वंदेमातरम शब्द सुनकर उनको भी खुशी होगी पर अभी उनके लिये इसका क्या मतलब? ऐसे में अगर कोई लड़का अगर पसंद होने और करने  के लिये-आजकल दोनों की मर्जी चलती है- किसी लड़की से मिलने गया और जाते ही बोला दिया ‘वंदेमातरम’, तब वह तो पहली नजर में ही अस्वीकृत कर दिया जायेगा। हमने टीवी चैनल के उस कार्यक्रम के कुछ हिस्से कभी कभी देखे हैं और उसमें लड़कियों की लड़कों की माताओं पर टिप्पणियां भी सुनी है तब यह सोचते हैं कि समाज ने बहुत समय से कई बातें दबा कर रखी हैं जो सामने आ रही हैं।<br />
हमारे एक सेठ जी कहते थे कि सफल पुरुष वही है जो औरतों की विवाद में बस हां हु करता रहे।  जिस आदमी ने सोचा कि मैं कोई फैसला कर शांति करवाऊं वह अपने घर के साथ ही अपने दिल की भी शांति ऐसे दांव पर लगा देगा कि काम पर भी उसका मन नहीं लगेगा।’<br />
बहरहाल स्त्री और पुरुष के आपसी संबंधों के साथ ही स्त्रियों के आपसी रिश्ते भी होते हैं और उनके बीच जब पुरुष फंसता है और बात ऊंच नीच हुई तो पुरुष का ही नाम खराब होता है क्योंकि नाम उसके घर पर ही चलता है।  इस विषय पर एक विद्वान का कथन याद आ रहा है।  जब यह निर्णय किया गया कि स्कूल में प्रवेश के समय पिता के नाम की अनिवार्यता नहीं होगी और मां भी अपना नाम वहां लिखा सकती है।  तब उन विद्वान ने कहा था कि ‘पुरुष का तो बस एक नाम ही था वरना तो घर तो चलाती स्त्रियां ही हैं।  अब वह नाम भी पुरुष के हाथ से गया।’<br />
कहने का तात्पर्य यही है कि इस संसार में किसी रिश्ते को समझना और उस बयान करना ही गलती है।  हालात, समय और स्वार्थ अपने हिसाब से संबंध बदलते रहते हैं।</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://anantraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सम्मेलन पर झगड़ा-हास्य व्यंग्य (hindi sammelan-hasya vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/11/hindi-sammelan-hindi-commedy-satire/</link>
<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 14:58:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/11/hindi-sammelan-hindi-commedy-satire/</guid>
<description><![CDATA[ब्लागर उस समय सो रहा था कि चेले ने आकर उसके हाथ हिलाकर जगाया। ब्लागर ने आखें खोली तो चेले ने कहा-‘सा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>ब्लागर उस समय सो रहा था कि चेले ने आकर उसके हाथ हिलाकर जगाया। ब्लागर ने आखें खोली तो चेले ने कहा-‘साहब, बाहर कोई आया है। कह रहा है कि मैं ब्लागर हूं।’<br />
ब्लागर एकदम उठ बैठा और बोला-‘जाकर बोल दे कि गुरुजी घर पर नहीं है।’<br />
चेले ने कहा-’साहब, मैंने कहा था। तब उसने पूछा ‘तुम कौन हो’ तो मैंने बताया कि ‘मैं उनका शिष्य हूं। ब्लाग लिखना सीखने आया हूं’। तब वह बोला ‘तब तो वह यकीनन अंदर है और तुम झूठ बोल रहे हो, क्योंकि उसने सबसे पहले तो तुम्हें पहली शिक्षा यही दी होगी कि आनलाईन भले ही रहो पर ईमेल सैटिंग इस तरह कर दो कि आफलाईन लगो। जाकर उससे कहो कि तुम्हारा पुराना जानपहचान वाला आया है। और हां, यह मत कहना कि ब्लागर दोस्त आया है।’</p>
<p>ब्लागर बोला-‘अच्छा ले आ उसे।’<br />
शिष्य बोला-‘आप&#160;&#160; निकर छोड़कर&#160;पेंट&#160; पहन लो। वरना क्या कहेगा।’<br />
ब्लागर ने कहा-‘ क्या कहेगा ? वह कोई ब्लागर शाह है। खुद भी अपने घर पर इसी तरह तौलिया&#160;पहने &#160;कई बार मिलता है। मैं तो फिर भी आधुनिक&#160;प्रकार&#160;की &#160;नेकर&#160;पहने&#160;रहता&#160;&#160;हूं, जिसे पहनकर लोग सुबह मोर्निंग वाक् पर जाते हैं।’<br />
इधर दूसरे ब्लागर ने अंदर प्रवेश करते ही कहा-‘यह शिष्य कहां से ले आये? और यह ब्लागिंग में सिखाने लायक है क्या? बिचारे से मुफ्त में सेवायें ले रहे हो?’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘अरे, यह तो दोपहर ऐसे ही सीखने आ जाता है। मैं तुम्हारी तरह लोगों से फीस न लेता न सेवायें कराता हूं। बताओ कैसे आना हुआ।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कंप्यूटर की तरफ देखते हुए पूछा-‘यह तुम्हारा कंप्यूटर क्यों बंद है? आज कुछ लिख नहीं रहे। हां, भई लिखने के विषय बचे ही कहां होंगे? यह हास्य कवितायें भी कहां तक चलेंगी? चलो उठो, मैं तुम्हारे लिखने के लिये एक जोरदार समाचार लाया हूं। ब्लागर सम्मेलन का समाचार है इसे छाप देना।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम खुद क्यों नहीं छाप देते। तुम्हें पता है कि ऐसे विषयों पर मैं नहीं लिखता।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘अरे, यार मैं अपने काम में इतना व्यस्त रहता हूं कि घर पर बैठ नहीं पाता। इसलिये कंप्यूटर बेच दिया और इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा दिया। अब अपने एक दोस्त के यहां बैठकर कभी कभी ब्लाग लिख लेता हूं।’<br />
पहले ब्लागर ने घूरकर पूछा-‘ब्लाग लिखता हूं से क्या मतलब? कहो न कि अभद्र टिप्पणियां लिखने के खतरे हैं इसलिये दोस्त के यहां बैठकर करता हूं। तुमने आज तक क्या लिखा है, पता नहीं क्या?’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘क्या बात करते हो? आज इतना बड़ा सम्मेलन कराकर आया हूं। इसकी रिपोर्ट लिखना है।’<br />
पहले ब्लागर ने इंकार किया तो उसका शिष्य बीच में बोल पड़ा-‘गुरुजी! आप मेरे ब्लाग पर लिख दो।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘अच्छा तो चेले का ब्लाग भी बना दिया! चलो अच्छा है! तब तो  संभालो यह पैन ड्ाईव और कंप्यूटर खोलो उसमें सेव करो।’<br />
शिष्य ने अपने हाथ में पैन ड्राईव लिया और कंप्यूटर खोला।<br />
पहले ब्लागर ने पूछा-‘यह फोटो कौनसे हैं?<br />
दूसरे ब्लागर ने एक लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा‘-जब तक यह इसके फोटो सेव करे तब तक तुम उसको देखो।<br />
ब्लागर ने फोटो को एक एक कर देखना शुरु किया। एक फोटो देखकर उसने कहा-‘यह फोटो कहीं देखा लगता है। तुम्हारा जब सम्मान हुआ था तब तुमने भाषण किया था। शायद&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.’<br />
दूसरे ब्लागर ने बीच में टोकते हुए कहा-‘शायद क्या? वही है।’<br />
दूसरा फोटो देखकर ब्लागर ने कहा-‘यह चाय के ढाबे का फोटो। अरे यह तो उस दिन का है जब मेरे हाथ से नाम के लिये ही उद्घाटन कराकर मुझसे खुद और अपने चेलों के लिये चाय नाश्ते के पैसे खर्च करवाये थे। मेरा फोटो नहीं है पर तुम्हारे चमचों का&#8230;&#8230;.’’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘अब मैं तुम्हारे इस चेले को भी चमचा कहूं तो तुम्हें बुरा लगेगा न! इतनी समझ तुम में नहीं कि ब्लागिंग कोई आसान नहीं है। जितना यह माध्यम शक्तिशाली है उतना कठिन है। लिखना आसान है, पर ब्लागिंग तकनीकी एक दिन में नहीं सीखी जा सकती। इसके लिये किसी ब्लागर गुरु का होना जरूरी है। सो किसी को तो यह जिम्मा उठाना ही है। तुम्हारी तरह थोड़े ही अपने चेले को घर बुलाकर सेवा कराओ। अरे ब्लागिंग सिखाना भी पुण्य का काम है। तुम तो बस अपनी हास्य कवितायें चिपकाने को ही ब्लागिंेग कहते हो।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, यह तो है! यह तीसरा फोटो तो आइस्क्रीम वाले के पास खड़े होकर तुम्हारा और चेलों का आईस्क्रीम खाने का है। यह आईसक्रीम वाला तो उस दिन मेरे सामने रास्ते पर तुमसे पुराना उधार मांग रहा था। तब तुमने मुझे आईसक्रीम खिलाकर दोनों के पैसे दिलवाकर अपनी जान बचाई थी।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘मेरे फोटो वापस करो।’<br />
पहले ब्लागर ने सभी फोटो देखकर उसे वापस करते हुए कहा-‘यार, पर इसमें सभी जगह मंच के फोटो हैं जिसमें तुम्हारे जान पहचान के लोग बैठे हैं। क्या घरपर बैठकर खिंचवायी है या किसी कालिज या स्कूल पहुंच गये थे। सामने बैठे श्रोताओं और दर्शकों का कोई फोटो नहीं दिख रहा।’<br />
दूसरे ब्लागर ने पूछा-‘तुम किसी ब्लागर सम्मेलन में गये हो?’<br />
पहले ब्लागर ने सिर हिलाया-‘नहीं।’<br />
दूसरा ब्लागर-‘तुम्हें मालुम होना चाहिये कि ब्लागर सम्मेलन में सिर्फ ब्लागर की ही फोटो खिंचती हैं। वहां कोई व्यवसायिक फोटोग्राफर तो होता नहीं है। अपने मोबाइल से जितने और जैसे फोटो खींच सकते हैं उतने ही लेते हैं। ज्यादा से क्या करना?<br />
पहला ब्लागर-हां, वह तो ठीक है! ब्लागर सम्मेलन में आम लोग कहां आते हैं। अगर वह हुआ ही न हो तो?<br />
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया-‘लाओ! मेरे फोटो और पैन ड्राइव वापस करो। तुमसे यह काम नहीं बनने का है। तुम तो लिख दोगे ‘ न हुए ब्लागर सम्मेलन की रिपोर्ट’।<br />
पहला ब्लागर ने कहा-‘क्या मुझे पागल समझते हो। हालांकि तुम्हारे कुछ दोस्त कमेंट में लिख जाते हैं ईडियट! मगर वह खुद हैं! मैं तो लिखूंगा ‘छद्म सम्मेलन की रिपोर्ट!’<br />
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया उसने कंप्यूटर में से खुद ही पेनड्राइव निकाल दिया और जाने लगा।<br />
फिर रुका और बोला-‘पर इस ब्लागर मीट पर रिपोर्ट जरूर लिखना। हां, इस ब्लागर सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना। तुम जानते नहीं इंटरनेट लेखकों के सम्मेलन और चर्चाऐं कैसे होती हैं? इंटरनेट पर अपने बायोडाटा से एक आदमी ने अट्ठारह लड़कियों को शादी कर बेवकूफ बनाया। एक आदमी ने ढेर सारे लोगों को करोड़ों का चूना लगाया। इस प्रकार के समाचार पढ़ते हुए तुम्हें हर चीज धोखा लगती है। इसलिये तुम्हें समझाना मुश्किल है। कभी कोई सम्मेलन किया हो तो जानते। इंटरनेट पर कैसे सम्मेलन होते हैं और उनकी रिपोर्ट कैसे बनती है, यह पहले हमसे सीखो। सम्मेलन करो तो जानो।’<br />
पहले ब्लागर ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा-ऐसे सम्मेलन कैसे कराऊं जो होते ही नहीं।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘होते हैं, करना हमसे सीख लो।’<br />
वह चला गया तो पहला ब्लागर सामान्य हुआ। उसने शिष्य से कहा-‘अरे, यार कम से कम उसके फोटो तो कंप्यूटर में लेना चाहिये थे।’<br />
शिष्य ने कहा-‘ गुरुजी फोटो तो मैंने फटाफट पेनड्राइव से अपने कंप्यूटर से ले लिये।’<br />
पहला ब्लागर कंप्यूटर पर बैठा और लिखने लगा। शिष्य ने पूछा’क्या लिख रहे हैं।<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘जो उसने कहा था।’<br />
शिष्य ने पूछा-‘यही न कि इस मुलाकात की बात लिख देना।’<br />
ब्लागर ने जवाब दिया‘नहीं! उसने कहा था कि ‘इस सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना’।’’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
<b>नोट-यह व्यंग्य पूरी तरह से काल्पनिक है। किसी घटना या सम्मेलन का इससे कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो यह एक संयोग होगा। इसका लेखक किसी दूसरे ब्लागर से ब्लागर से मिला तक नहीं है। </b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जमाने की चाहत-हास्य हिंदी कविता ]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2009/11/07/zamane-ki-chahat-hindi-sahitya-kavita/</link>
<pubDate>Sat, 07 Nov 2009 07:45:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2009/11/07/zamane-ki-chahat-hindi-sahitya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[सुनते हैं मरते समय रावण ने राम का नाम जपा इसलिये पुण्य कमाने के साथ स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया। ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>सुनते हैं मरते समय<br />
रावण ने राम का नाम जपा<br />
इसलिये पुण्य कमाने के साथ<br />
स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया।<br />
उसके भक्त भी लेते<br />
राम का नाम पुण्य कमाने के वास्ते,<br />
हृदय में तो बसा है सभी के<br />
सुंदर नारियों को पाने का सपना<br />
चाहते सभी मायावी हो महल अपना<br />
चलते दौलत के साथ शौहरत पाने के रास्ते,<br />
मुख से लेते राम का नाम<br />
हृदय में रावण का वैभव बसता<br />
बगल में चलता उसका साया।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
गरीब और लाचार से<br />
हमदर्दी तो सभी दिखाते हैं<br />
इसलिये ही बनवासी राम भी<br />
सभी को भाते हैं।<br />
उनके नायक होने के गीत गाते हैं।<br />
पर वैभव रावण जैसा हो<br />
इसलिये उसकी राह पर भी जाते हैं।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
पूरा जमाना बस यही चाहे<br />
दूसरे की बेटी सीता जैसी हो<br />
जो राजपाट पति के साथ छोड़कर वन को जाये।<br />
मगर अपनी बेटी कैकयी की तरह राज करे<br />
चाहे दुनियां इधर से उधर हो जाये।<br />
सीता का चरित्र सभी गाते<br />
बहू ऐसी हो हर कोई यही समझाये<br />
पर बेटी को राज करने के गुर भी<br />
हर कोई बताये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<p><strong>यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://teradipak.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a>पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रजातंत्र में ब्लॉग की महत्वपूर्ण भूमिका-हिंदी लेख (democracy and hindi blog-hindi article)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/04/loktantra-aur-blog/</link>
<pubDate>Wed, 04 Nov 2009 15:47:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/04/loktantra-aur-blog/</guid>
<description><![CDATA[भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इसे साढ़े बारह करोड़ बताते हैं। इन प्रयोक्ताओं को यह अनुमान नहीं है कि उनके पास एक बहुत बड़ा अस्त्र है जो उनके पास अपने अनुसार समाज बनाने और चलाने की शक्ति प्रदान करता है-बशर्ते उसके उपयोग में संयम, सतर्कता और चतुरता बरती जाये, अन्यथा ऐसे लोगों को इस पर नियंत्रण करने का अवसर मिल जायेगा जो समाज को गुलाम की तरह चलाने के आदी हैं।</p>
<p>यह इंटरनेट न केवल दृश्य, पठन सामग्री तथा समाचार प्राप्त करने के लिये है बल्कि हमें अपने फोटो, लेखन सामग्री तथा समाचार संप्रेक्षण की सुविधा भी प्रदान करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम केवल प्रयोक्ता नहीं निर्माता और रचयिता भी बन सकते हैं। अनेक वेबसाईट-जिनमें ब्लागस्पाट तथा वर्डप्रेस मुख्य रूप से शामिल हैं- ब्लाग की सुविधा प्रदान करती हैं। अधिकतर सामान्य प्रयोक्ता सोचते होंगे कि हम न तो लेखक हैं न ही फोटोग्राफर फिर इन ब्लाग की सुविधा का लाभ कैसे उठायें? यह सही है कि अधिकतर साहित्य बुद्धिजीवी लेखकों द्वारा लिखा जाता है पर यह पुराने जमाने की बात है। फिर याद करिये जब हमारे बुजुर्ग इतना पढ़े लिखे नहीं थे तब भी आपस में चिट्ठी के द्वारा पत्राचार करते थे। आप भी अपनी बात इन ब्लाग पर बिना किसी संबंोधन के एक चिट्ठी के रूप में लिखने का प्रयास करिये। अपने संदेश और विचारों को काव्यात्मक रूप देने का प्रयास हर हिंदी नौजवान करता है। इधर उधर शायरी या कवितायें लिखवाकर अपनी मित्र मंडली में प्रभाव जमाने के लिये अनेक युवक युवतियां प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं कई बार अपने ज्ञान की अभिव्यक्ति के लिये तमाम तरह के किस्से भी गढ़ते हैं। यह प्रयास अगर वह ब्लाग पर करें तो यह केवल उनकी अभिव्यक्ति को सार्वजनिक रूप ही नहीं प्रदान करेगा बल्कि समाज को ऐसी ताकत प्रदान करेगा जिसकी कल्पना वह नहीं कर सकते। </p>
<p>आप फिल्म, क्रिकेट,साहित्य,समाज,उद्योग व्यापार, पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनल तथा उन अन्य क्षेत्रों को देखियें जिससे बड़े वर्ग द्वारा छोटे वर्ग पर प्रभाव डाला जा सकता है वहां पर कुछ निश्चित परिवारों या गुटों का नियंत्रण है। यहां प्रभावी लोग जानते हैं कि यह सभी प्रचार साधन उनके पास ऐसी शक्ति है जिससे वह आम लोगों को अपने हितों के अनुसार संदेश देख और सुनाकर उनको अपने अनुकूल बनाये रख सकते हैं। क्रिकेट में आप देखें तो अनेक वर्षों तक एक खिलाड़ी इसलिये खेलता&#160; है क्योंकि उसे पीछे खड़े आर्थिक शिखर पुरुष उसका व्यवसायिक उपयोग करना चाहते हैं। फिल्म में आप देखें तो अब घोर परिवारवाद आ गया है। सामान्य युवकों के लिये केवल एक्स्ट्रा में काम करने की जगह है नायक के रूप में नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक तथा प्रचार के शिखरों पर जड़ता है। आप पत्र पत्रिकाओं में अगर लेख पढ़ें तो पायेंगे कि उसमें या तो अंग्रेजी के पुराने लेखक लिख रहे हैं या जिनको किसी अन्य कारण से प्रतिष्ठा मिली है इसलिये उनके लेखन को प्रकाशित किया जा रहा है। पिछले पचास वर्षों में कोई बड़ा आम लेखक नहीं आ पाया। यह केवल इसलिये कि समाज में भी जड़ता है। याद रखिये जब राजशाही थी तब यह कहा जाता था कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’, पर लोकतंत्र में ठीक इसका उल्टा है। इसलिये इस जड़ता के लिये सभी आम लोग जिम्मेदार हैं पर वह शिखर पर बैठे लोगों को दोष देकर अपनी असमर्थता जाहिर करते हैं कि ‘क्या किया जा सकता है।’</p>
<p>इस इंटरनेट पर जरा गौर करें। अक्सर आप लोग देखते होंगे कि समाचार पत्र पत्रिकाओं में में उसकी चर्चा होती है। आप सुनकर आश्चर्य करेंगे कि इनमें से कई ऐसे आलेख होते हैं जिनको इंटरनेट पर ब्लाग से लिया जाता है-जब किसी का नाम न दिखें तो समझ लें कि वह कहीं न कहीं इंटरनेट से लिया गया है। यह सब इसलिये हो रहा है क्योंकि अधिकतर इंटरनेट प्रयोक्ता केवल फोटो देखने या अपने पढ़ने के लिये बेकार की सामग्री पढ़ने में व्यस्त हैं। उनकी तरफ से हिंदी भाषी लेखकों के लिये प्रोत्साहन जैसा कोई भाव नहीं है। ऐसा कर आप न अपना समय जाया कर रहे हैं बल्कि अपने समाज को जड़ता से चेतन की ओर ले जाने का अवसर भी गंवा रहे हैं। वह वर्ग जो समाज को गुलाम बनाये रखना चाहता है कि फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों के फोटो देखकर आप अपना समय नष्ट करें क्योंकि वह तो उनके द्वारा ही तय किये मुखौटे हैं। आपके सामने टीवी और समाचार पत्रों में भी वही आ रहा है जो उस वर्ग की चाहत है। ऐसे में आपकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं था तो झेल लिये। अब इंटरनेट पर ब्लाग और ट्विटर के जरिये आप अपना संदेश कहीं भी दे सकते हैं। इस पर अपनी सक्रियता बढ़ाईये। जहां तक इस लेखक का अनुभव है कि एक एस. एम. एस लिखने से कम मेहनत यहां पचास अक्षरों का एक पाठ लिखने में होती है। जहां तक हो सके हिंदी में लिखे गये ब्लाग और वेबसाईट को ढूंढिये। स्वयं भी ब्लाग बनाईये। भले ही उसमें पचास शब्द हों। लिखें भले ही एक माह में एक बार। अगर आप समाज के सामान्य आदमी है तो बर्हिमुखी होकर अपनी अभिव्यक्ति दीजिये। वरना तो समाज का खास वर्ग आपके सामने मनोरंजन के नाम पर कार्यक्रम प्रस्तुत कर आपको अंतर्मुखी बना रहा है ताकि आप अपनी जेब ढीली करते रहें। आप किसी से एस. एम. एस. पर बात करने की बजाय अपने ब्लाग पर बात करें वह भी हिंदी में। ऐसे टूल उपलब्ध हैं कि आप रोमन में लिखें तो हिंदी हो जाये और हिंदी में लिखें तो यूनिकोड में परिवर्तित होकर प्रस्तुत किये जा सकें।<br />
याद रखें इस पर अपनी अभिव्यक्ति वैसी उग्र या गालीगलौच वाली न बनायें जैसी आपसी बातचीत में करते हैं। ऐसा करने का मतलब होगा कि उस खास वर्ग को इस आड़ में अपने पर नियंत्रण करने का अवसर देना जो स्वयं चाहे कितनी भी बदतमीजी कर ले पर समाज को तमीज सिखाने के लिये हमेशा नियंत्रण की बात करते हुए धमकाता है।<br />
<span style="color:blue;">प्रसंगवश यहां यह भी बता दें कि यह ब्लाग भी पत्रकारिता के साथ ही चौथा स्तंभ है पांचवां नहीं जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं। सीधी सी बात है कि विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका और पत्रकारिता चार स्तंभ हैं। इनमें सभी में फूल लगे हैं। विधायिका में अगर हम देखें तो संसद, विधानसभा, नगर परिषदें और ग्राम पंचायतें आती हैं। कार्यपालिका में मंत्री, संतरी,अधिकारी और लिपिक आते हैं। न्याय पालिका के विस्तारित  रूप को देखें तो उसमें भी माननीय न्यायाधीश, अधिवक्ता, वादी और प्रतिवादी  होते हैं। उसी तरह पत्रकारिता में भी समाचार पत्र, पत्रिकायें, टीवी चैनल और ब्लाग- जिसको हम जन अंतर्जाल पत्रिका भी कह सकते हैं- आते हैं। इसे लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ केवल अभिव्यक्ति के इस जन संसाधन का महत्व कम करने के लिये प्रचारित किया जा रहा है ताकि इस पर लिखने वाले अपने महत्व का दावा न करे।<br />
</span><br />
कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी के ब्लाग जगत में आपकी सक्रियता ही इंटरनेट या अंतर्जाल पर आपको प्रयोक्ता के साथ रचयिता बनायेगी। जब ब्लाग आम जन के जीवन का हिस्सा हो जायेगा तक अब सभी क्षेत्रों में बैठे शिखर पुरुषों का हलचल देखिये। अभी तक वह इसी भरोसे हैं कि आम आदमी की अभिव्यक्ति का निर्धारण करने वाला प्रचारतंत्र उनके नियंत्रण में इसलिये चाहे जैसे अपने पक्ष में मोड़ लेंगे। हालांकि अभी हिंदी ब्लाग जगत अधिक अच्छी हालत में नहीं है- इसका कारण भी समाज की उपेक्षा ही है-तब भी अनेक लोग इस पर आंखें लगाये बैठे हैं कि कहीं यह माध्यम शक्तिशाली तो नहीं हो रहा। इसलिये पांचवां स्तंभ या रचनाकर्म के लिये अनावश्यक बताकर इसकी उपेक्षा न केवल स्वयं कर रहे हैं बल्कि समाज में भी इसकी चर्चा इस तरह कर रहे हैं कि जैसे इसको बड़े लोग-जैसे अभिनेता और प्रतिष्ठत लेखक-ही बना सकते हैं। जबकि हकीकत यह है कि अनेक ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपने रोजगार से जुड़े काम से आने के बाद यहां इस आशा के साथ यहां लिखते हैं कि आज नहीं तो कल यह समाज में जनजन का हिस्सा बनेगा तब वह भी आम लोगों के साथ इस समाज को एक नयी दिशा में ले जाने का प्रयास करेंगे। इसलिये जिन इंटरनेट प्रयोक्ताओं की नजर में यह आलेख पड़े वह इस बात का प्रचार अपने लोगों से अवश्य करें। याद रखें यह लेख उस सामान्य लेखक है जो लेखन क्षेत्र में कभी उचित स्थान न मिल पाने के कारण यह लिखने आया है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नया सामान भी कबाड़ हो जाता है-हिंदी व्यंग्य कविता (naya saman aur kabad-hindi vyangya kavita)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/31/naya-saman-kabad-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Sat, 31 Oct 2009 05:40:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/31/naya-saman-kabad-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[सुनने और पढने वाला जाल में फंस जाए विज्ञापन ऐसे ही सजाये जाते हैं. अगर उनमें सच होता तो नहीं भर जाते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>सुनने और पढने वाला<br />
जाल में फंस जाए<br />
विज्ञापन ऐसे ही सजाये जाते हैं.<br />
अगर उनमें सच होता तो<br />
नहीं भर जाते घर उस  कबाड़ के सामान से<br />
जिनको  खरीदा था  कभी चाव से<br />
बड़े महंगे भाव से<br />
आये  थे जो सामान नए बनकर  ठेले से<br />
वही कभी कबाड़ बनकर फिर उसमें लद जाते हैं.<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
बाज़ार अब नगद ही नहीं<br />
उधार  पर भी  चलते हैं.<br />
चुकाते हुए रोते रहो<br />
नहीं चुकाने पर<br />
चीख पुकार भी मचती है<br />
कभी उधार वाले<br />
पहलवान बनकर गर्दन भी पकड़ते हैं.</b><br />
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
</b><br />
<strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[असली  नकली पुरस्कार-हिंदी हास्य व्यंग्य (hindi comedy satire on prize)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/22/puraskar-par-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 13:49:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/22/puraskar-par-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[समाज सेवाध्यक्ष जी ने अपनी बाहें टेबल पर टिकाई अपना मूंह हथेलियों पर रखने को बाद अपने सात सभासदों की]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>समाज सेवाध्यक्ष जी ने अपनी बाहें टेबल पर टिकाई अपना मूंह हथेलियों पर रखने को बाद अपने सात सभासदों की उपस्थिति देखकर गिनती की। आठवां सदस्य सचिव लेखपालक गायब था। उन्होंने कहा‘-यह सचिव लेखपालक हमेशा ही देर से आता है। सारा हिसाब किताब उसके पास है और उसके बिना यहां चर्चा नहीं हो सकती।’<br />
सामने बैठे सभी सातों सदस्य एकटक उनकी तरफ देख रहे थे। समाज सेवाध्यक्ष जी उठे और बैठक कक्ष में ही टहलने लगे। फिर कुछ कहने लगे। मौजूद सदस्य यह नहीं समझ पा रहे थे कि वह अपने से बात कर रहे हैं या उनसे।  अलबत्ता उनके शब्द सभी को साफ सुनाई दे रहे थे।<br />
वह कह रहे थे कि ‘इस बार हमने सूखा राहत और बाढ़ बचाव  में अपना काम कर यह सिद्ध कर दिया है कि हमारी इस संस्था की भूमिका समाज सेवा के मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;’’<br />
इससे पहले वह कुछ आगे बोलें एक सदस्य ने यह सिद्ध करने के लिये कि वह भी बोलना जानते हैं, उनकी बात पूरी होने से पहले ही  अपनी बात कही-’पर साहब, यह तो पुरस्कार समिति की बैठक है!’<br />
इससे पहले कि समाज सेवाध्यक्ष कुछ कहते एक दूसरे सदस्य ने भी यह सिद्ध करने के लिये कि वह बहस भी कर सकता है, उस सदस्य को फटकारा-‘अरे, कैसी बेवकूफी वाली बात करते हो। चाहे बाढ़ हो या अकाल, काम तो अपनी समिति ही करती है जिसके सदस्य तो हम आठ और नौवें साहब हैं। हमारा काम क्या है, केवल चंदा उगाहना और अपनी समाज सेवा के रूप में  उसे बांटने में कलाकारी दिखाना। साहब को बोलने दो, बीच में बोलकर उनकी चिंतन प्रक्रिया को भंग मत करो।’<br />
समाज सेवाध्यक्ष ने दूसरे को डांटा-‘यह बांटने में कलाकारी वाली बात इतनी जोर से मत कहो। दीवारों के भी कान होते हैं।<br />
बैठक में सन्नाटा छा गया। थोड़ी देर बाद समाज सेवाध्यक्ष कुर्सी पर विराजे और बोले-‘‘इस बार हमनें खास ढंग के पुरस्कार बांटने की घोषणा की थी ताकि उसके लिये स्वप्रायोजक मिलें या फिर कोई प्रायोजक पकड़ कर इनाम लेने आयें।  लगता है कि बाढ़ और अकाल में काम का प्रचार ढंग से नहीं हुआ। वैसे अखबारों में धन और अन्न लेने वाले पीड़ितों के हमने इधर उधर से फोटो जुगाड़ने में बहुत मेहनत की। उनके प्रचार पर कुछ पैसा भी खर्च हुआ लगता है उसका परिणाम नहीं निकला।’<br />
तीसरा सदस्य बोला-‘आजकल लोगों में दया धर्म कम हो गया है। ढंग से चंदा भी नहीं देते। हिसाब मांगते हैं। हम तो कह देते हैं कि हम तो चंदा लेकर तुम्हें दान का पुण्य दे रहे हैं वरना खुद कर देख लो हमारे जैसी समाज सेवा।’<br />
एक अन्य सदस्य ने उसे फटकारा-‘कमबख्त, तुम कहां चंदा मांगने जाते हो? बस, प्रचार सचिव के नाम पर इधर उधर पर्चे बांटते हो। तुम्हारा काम इतना खराब है जिसकी वजह से लोगों को हमारी कार्य प्र्रगति की जानकारी नहीं मिल पाती।’<br />
एक अन्य सदस्य को उसकी बात समझ में नहीं आयी तो बोल पड़ा-‘हम काम कौनसा करते हैं जिसकी जानकारी लोगों को मिले। बस काम का प्रचार है, वह भी यह ढंग से नहीं करता।’<br />
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘खामोश हो जाओ, अपनी असलियत यहां क्यों बखान कर रहे हो। कोई सुन लेगा तो! फिर आजकल स्टिंग आपरेशन भी हो जाते हैं।  हमारी संस्था की कमाई देखकर बहुत से लोग हमारे पीछे पड़े हैं। इसलिये अब सोच समझकर बोला करो। यहां ही नहीं बाहर भी ऐसी आदत डाल दो।’<br />
इतने में सचिव लेखपालक आ गया। उसे देखते ही समाज सेवाध्यक्ष बोले-‘यह आने का समय है? कहां चले गये थे?’<br />
सचिव लेखपालक बोला-‘सारा काम तो मुझे ही करना पड़ता है, आप तो सभी केवल देखते हो। इस साल पुरस्कार देने के लिये जुगाड़ लगाना था। इसके लिये दो तीन लोगों से बात कर ली है।  कार्यक्रम का खर्च, उनको दिये जाने वाला उपहार और अपने लिये कमीशन का जुगाड़ लगाना था। फिर पुरस्कार के नाम पर चंदा भी लेना है। इसके लिये कुछ लोगों को ‘समाज सेवा’ के लिये सम्मान देना था।’<br />
एक सदस्य चिल्लाया-‘नहीं! समाज सेवा का पुरस्कार हम देंगे तो फिर हमारी समाज सेवा की क्या इज्जत रह जायेगी।’<br />
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘हम यहां समाज सेवा की बात नहीं कर रहे पुरस्कार देकर प्रोत्साहन देने वाला काम रहे हैं।  समाज सेवा के  लिये एक पुरस्कार अपने सचिव और प्रचार सचिव को भी देंगे। कौन रोकड़ा देना है? देंगे तो आयेगा तो अपने पास ही। आगे बोलो।’<br />
सचिव ने कहा-‘इस बार हथेली पर सरसों जमाने और बबूल बोकर आम उगाने के लिये अनोखे पुरस्कार दिये जायेंगे।’<br />
एक सदस्य के मूंह से चीख निकल गयी-‘पर यह तो कभी हो ही नहीं सकता। बरसों पुरानी कहावत है।’<br />
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? वह लोग बड़ी संस्थाओं का प्रमाणपत्र ले आयेंगे जो यहां उपस्थित सभी दर्शकों को दिखाये जायेंगे।’<br />
एक अन्य सदस्य ने कहा-‘पर वह संस्थायें कौनसी होंगी। पता करना असली है कि नकली।’<br />
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? अरे, जब हम किसी से हाथ में हजार का नोट लेते हैं तो क्या पहचान पाते हैं कि वह असली है या नकली!  यहां किसको फुर्सत रखी है कि यह जानने का प्रयास करे कि ऐसा प्रमाण पत्र देने वाली संस्थायें असली हैं या नकली।  बस, इतना पता है कि जिन लोगों ने इसके लिये पुरस्कार मांगे हैं उनमें एक स्व प्रयोजक है और दूसरे का प्रायोजन एक ऐसा आदमी कर रहा है जिसे पुरस्कार लेने वाले से भारी राशि कर्जे के रूप में लेनी है जिसे वह कभी चुकायेगा नहीं। समझे! बाकी पुरस्कार तो समाज सेवियों के हैं जो बिचारे अपने घर से बाहर कभी सोच भी नहीं पाते पर उनको अपने घर की महिलाओं पर रौब गालिब करना है।’<br />
सभी सोच में पड़ गये तक समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘तुम सभी को संाप क्यों सूंघ गया। सचिव लेखपालक ने जो प्रस्ताव रखा है वह भी कम अनोखा नहीं है। बजाओ तालियां।’<br />
सभी लोगों ने सहमति में अपनी तालियां बजायीं।</b></p>
<p>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
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<title><![CDATA[सब दिया उसने फिर भी हाथ फैलाते-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/19/god-and-man-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Mon, 19 Oct 2009 14:09:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/19/god-and-man-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[सर्वशक्तिमान के दरबार में क्यों जाकर भीड़ लगाते हो, जिसने दिए काम करने को हाथ उसी के सामने कुछ मांगन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>सर्वशक्तिमान के दरबार में<br />
क्यों जाकर भीड़ लगाते हो,<br />
जिसने दिए काम करने को हाथ<br />
उसी के सामने कुछ मांगने के लिए<br />
क्यों फैलाते हो.<br />
जिसने दिए चलने के लिए पाँव<br />
क्यों लौटकर जाते हो फिर &#160;उसके गाँव,<br />
उसने दुनियाँ&#160;&#160;&#160;देखने के लिए दी है आँखें<br />
टकटकी लगाए उसी की तरह क्यों देखते हो<br />
जैसे&#160; कैद किये हों तुम्हें सलाखें,<br />
विचार करने के लिए दिया है दिमाग<br />
जिसका करते हो उपयोग&#160;&#160;केवल पांच प्रतिशत भाग,<br />
कितना ताकतवर तुम्हें उसने बनाया<br />
तुम लाचार होकर उसके सामने क्यों पहुँच जाते हो.<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[ऐसे ही अफसाने-हिंदी व्यंग्य कविता (bade log-hindi vyangya kavita)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/18/aise-hee-afsaane-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 09:08:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/18/aise-hee-afsaane-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[जब बहता था दरिया में पानी तब भला कौन वादा करता था उसे लाने का। कहीं बांध बनाये कहीं रास्ता बदला पानी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><span style="font-size:large;">जब बहता था दरिया में पानी</span><br />
<span style="font-size:large;">तब भला कौन वादा करता था उसे लाने का।</span><br />
<span style="font-size:large;">कहीं बांध बनाये</span><br />
<span style="font-size:large;">कहीं रास्ता बदला</span><br />
<span style="font-size:large;">पानी को बनाकर बेचने की शय</span><br />
<span style="font-size:large;">जिन्होंने बिगाड़ दी प्रकृति की लय</span><br />
<span style="font-size:large;">अब वही करते हैं सभी जगह दावा</span><br />
<span style="font-size:large;">पानी का दरिया बहाने का।</span><br />
<span style="font-size:large;">छोटे ईमान के लोग</span><br />
<span style="font-size:large;">बड़े बन जाते हैं इस जमाने में</span><br />
<span style="font-size:large;">लेकर सहारा ऐसे ही अफसाने का।</span><br />
<span style="font-size:large;">&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</span></p>
<p><strong>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong><br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी अध्यात्म सन्देश-बुरे काम से दूर होकर ही अच्छाई समझना संभव (hindu adhyatm sandesh)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/18/vidru-niti-pap-se-pare-hon/</link>
<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 08:43:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/18/vidru-niti-pap-se-pare-hon/</guid>
<description><![CDATA[अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्। न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।। हिंदी में भावार्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।<br />
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता। </p>
<p><strong>यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।<br />
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>यह कहना गलत है धर्म के मार्ग पर अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्म-ईमानदारी, सहजता, परमार्थ, और अपने कर्तव्य से प्रतिबद्धता-का परिणाम ही अर्थ की प्राप्ति ही है। यह अलग बात है कि जल्दी अमीर बनने या आवश्यकता से अधिक धनार्जन के के लिये लोग अपने जीवन में आक्रामक और बेईमानी की प्रवृत्ति अपना लेते हैं। इस संसार में ऐसे लोग भी है जो बेईमानी से धन कमाकर कथित रूप से प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का आकर्षण समाज के युवाओं को आकर्षित करता है पर उनको यह समझ लेना चाहिये कि बेईमान और भ्रष्ट लोगों को धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की शक्ति की वजह से सामने कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे सभी लोग उनके प्रति घृणा का भाव दिखाने से नहीं चूकते। फिर भ्रष्ट और बेईमान लोग का धन जिस तरह बर्बाद होता है उसे भी देखना चाहिये। </p>
<p>नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जिस व्यक्ति ने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह इस संसार में व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थितियों की प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह समझ जाते हैं। इस ज्ञान से वह विकृतियेां से परे रहने में सफल रहते हैं और प्रकृतियां उनका स्वतः ही मार्ग प्रशस्त करती हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति -अहिंसक मनुष्य शीघ्र अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है (ahinsa aur lakshya-manu smriti)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/12/hindu-adhyatm-sandesh/</link>
<pubDate>Mon, 12 Oct 2009 04:46:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/12/hindu-adhyatm-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्। न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।<br />
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।<br />
<strong>यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।<br />
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।</strong><br />
हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है वह अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य और परमार्थ और दूसरा असत्य और हिंसा।  यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है।  श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।<br />
वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है।  वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य दर्शन-धर्म परिवर्तन करने से मनुष्य बाद में दु:खी हो जाता है(hindi sandesh-dharm parivaratan anuchit-chankya niti]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/10/chenge-of-religion-is-not-good-chankya-policy/</link>
<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 14:57:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/10/chenge-of-religion-is-not-good-chankya-policy/</guid>
<description><![CDATA[नीति विशारद चाणक्य कहते हैं &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>नीति विशारद चाणक्य कहते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<strong>आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।<br />
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।</strong><br />
<b>हिन्दी में भावार्थ</b> कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।<br />
कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है। धर्म परिवर्तन करने वाले कभी सुखी नहीं रहते है और आस्था बदलने वालों का भटकाव कभी ख़त्म नहीं होता यह&#160; अंतिम सत्य है।<br />
&#160;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
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</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[hindi rankaar 28 09 2009]]></title>
<link>http://egujarati.wordpress.com/2009/10/07/hindi-rankaar-28-09-2009/</link>
<pubDate>Wed, 07 Oct 2009 12:17:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>egujarati</dc:creator>
<guid>http://egujarati.wordpress.com/2009/10/07/hindi-rankaar-28-09-2009/</guid>
<description><![CDATA[हिन्दी रणकार चाहे समज में आये या ना आये, और अगर याद रहे या ना रहे, छोटे बच्चों को हर नयी फिल्म का हर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>हिन्दी रणकार</p>
<p>चाहे समज में आये या ना आये, और अगर याद रहे या ना रहे, छोटे बच्चों को हर नयी  फिल्म का हर नया गाना याद रह ही जाता है. भले फिर उन्हे ये गीत कुछ ही समय और कुछ  ही दिन के लिये याद रहे, या अच्छे लगे. हॅमरिंग यानि कि बार बार एक ही चीज़  दिखा-बता कर लोगो के सर पर मारने का ज़माना है यह. ऍडवर्टाईजमॅन्ट टॅलिविज़न  प्रमॉशन, बिनज़रूरी दिखावा कर के ईस ज़माने में कोई भी आदमी और कोई भी चीज़ लोगों  का ध्यान अपनी और आकर्षित कर सकता है. ईसके लिये अच्छे गुण या कोई विशिष्ट खासियत  होने की भी आवश्यकता नहि. प्रचार, दिखावा ईत्यादी की असर बच्चों के मन पर बेहद  ज्यादा होती है ये बात भी माननी ही पडेगी. चाहे वो फिल्मी गाने हो, खानेपीने के  फॅन्सी पदार्थ हो, टॉईलेटरीज़ हो, ईलॅक्ट्रॉनिक उपकरण हो&#8230; कुछ भी हो, सब कुछ  बेचने के लिये मानो बच्चों को ही लक्ष्य बनाने का दौर चल रहा है. ईसके कारण दो  आपत्ति आ पडी है: एक तो ये कि बच्चों को समजाए कैसे कि सचमुच क्या काम का है और  क्या बेकार है, और दूसरी ये कि बच्चें नहि माने तो किसीने की हुई पब्लिसिटी के लिये  आम आदमी को जो फिजुल खर्च करना पडता है उसे टाले तो कैसे टाले? फिर भी जरा सोचिए:  ईसमें अगर दोष है तो किसका है? बुजुर्गों का ही तो. बच्चें तो निर्दोष होते है.  बच्चें त्तो किसीका भी कहा मान लेंगे और हो सकता है कि किसीका भी कहा ना माने.  लेकिन बच्चों को सही-गलत की सच्ची शिक्षा देने का, उनके मन को समजकर उनका मन  साफ-सच्चा और तेज़ बनाने का काम करने का समय कितने बुजुर्गों के पास है? अगर  बुजुर्ग बच्चों को भले-बूरे का फर्क समजाने के लिये समय ना निकाले तो ये बेहद ही  स्वाभाविक हो जाता है कि बचच्चों को टॅलिविजन पर, फिल्मो में जो दिखाया जाएगा वो  सच्चा ही लगेगा. और तो और, गुस्सा करने के बाद, डराने-धमकाने के बाद अगर बुजुर्ग  बच्चों को कुछ रूपये देकर मनचाही चीज खरीदने की छूट दे दे, ये सोचकर कि, &#8220;चलो, कुछ  रूपयों मे जान तो छूटी&#8230;&#8221; तो आखिर में बच्चे को तो ऐसा ही लगेगा कि उसके मन की हो  गयी. बच्चे को ना बुजुर्ग की सीख याद रहती है, और ना ही याद रहता है उनका गुस्सा.  एक बात बुजुर्गों को याद रहे कि निर्दोषता के मीठे वर्षों में मिलने वाली शिक्षा और  समजदारी से ही तय होता है कि बच्चे सयाने होकर क्या बनेंगे, कैसे बनेंगे.  टॅलिविजन के पांच एडवर्टाईज जितना समय बच्चे को नियमित देकर कोशिश तो करके देखिए कि  बच्चे को आप सच्ची शिक्षा दे सकते हो या नहि. उन्हे ये समजा़कर तो देखिए कि अच्छा,  सच्चा, उपयोगी और फिजुल क्या है. फिर उन्हे फर्क समज में ना आए ऐसा हो ही नहि सकता.  लेकिन उसके लिये पहले बुजुर्गो को समय निकालना पडेगा, तब जाकर&#8230;</p>
<p>- संजय वि. शाह</p>
<p>(२८-०९-२००९ के गुजराती रणकार का हिन्दी संस्करण. रणकार मुंबई समचार में पिछले  ११ वर्षों से प्रसिद्ध होती सुविचार की लोकप्रिय कटार है)</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शिशुओं का क्रीड़ाश्रम और मिठाई-हिन्दीहास्य व्यंग (child story and sweats-hindi vyanga]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/06/child-labourd-hindi-sastire/</link>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 14:53:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/06/child-labourd-hindi-sastire/</guid>
<description><![CDATA[सुबह दीपक बापू सड़कों पर पानी से भरे गड्ढों में गिरने से बचते हुए जल्दी जल्दी ही आलोचक महाराज के घर प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>सुबह दीपक बापू सड़कों पर पानी से भरे गड्ढों में गिरने से बचते हुए जल्दी जल्दी ही आलोचक महाराज के घर पहुंचे। उस दिन बरसात होने से  उनको आशा थी कि आलोचक महाराज प्रसन्न मुद्रा में होंगे। इधर उमस के मारे सभी परेशान थे तो आलोचक महाराज भी भला कहां बच सकते थे। ऐसे में दीपक बापू को यह आशंका थी उनकी कविताओं पर आलोचक महाराज कुछ अधिक ही निंदा स्तुति कर देंगे। वैसे भी दीपक बापू की कविताओं पर आलोचक महाराज ने कभी कोई अच्छी मुहर नहीं लगायी  पर दीपक बापू आदत से  मजबूर थे कि उनको दिखाये बगैर अपनी कवितायें कहीं भेजते ही नहीं थे। </p>
<p>सड़क से उतरकर जब उनके दरवाजे तक पहुंचे तो दीपक बापू के मन में ऐसे आत्मविश्वास आया जैसे कि मैराथन जीत कर आये हों।  इधर मौसम ने भी कुछ ऐसा आत्मविश्वास उनके अंदर पैदा हुआ कि उनको लगा कि ‘वाह वाह’ के रूप में उनको एक कप मिल ही जायेगा।  उन्होंने दरवाजे के अंदर झांका तो देखा आलोचक महाराज सोफे पर जमे हुए सामने टीवी देख रहे थे। वहां से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। उन्होंने आलोचक महाराज<br />
को हाथ जोड़कर नमस्ते की भी और मुख से उच्चारण कर उनका ध्यान आकर्षित करने का  भी प्रयास किया-यह करना ही पड़ता है जब आदमी आपकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा हो।<br />
आलोचक महाराज ने उनकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया। दीपक बापू ने जरा गौर से देखा तो पाया कि उनकी आंखों से आंसु निकल रहे थे। दीपक बापू सहम गये। क्या सोचा था क्या हो गया। कहां सोचा था कि मौसम अच्छा है आलोचक महाराज का मूड भी  अच्छा होगा। पहली बार अपनी कविताओं पर ‘वाह वाह रूपी कविताओं का कप’ ले जायेंगे। कहां यह पहले से भी बुरी हालत में देख रहे हैं। वैसे दीपक बापू ने आलोचक महाराज को कभी हंसते हुए नहीं देखा था-तब भी जब उनका सम्मान हुआ था। आज इस तरह रोना!<br />
‘क्या बात है आलोचक महाराज! मौसम इतना सुहाना है और आप है कि रुंआसे हो रहे हैं।‘दीपक बापू बोले।<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘देखो सामने! टीवी पर बच्चा रो रहा है। इसके माता पिता ने इसको खुद ऐसे लोगों को सौंपा है जो इस वास्तविक शो में नकली माता पिता की भूमिका निभा रहे हैं। वह लोग इतने नासमझ हैं कि उनको पता ही नहीं कि बच्चा अपनी माता के बिना कभी खुश नहीं रह सकता।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज! यह तो सीन ही नकली है! आप कहां चक्कर में पड़ गये। अब यह टीवी बंद कर दीजिये। हम अपने साथ मिठाई का डिब्बा साथ में ले आयें हैं ताकि आप उनको खाते हुए हमारी यह दो कविताओं पर अपना विचार व्यक्त कर सकें।’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘बेवकूफ आदमी! समाज में कैसी कैसी घटनायें हो रही हैं उस पर तुम कभी सोचते ही नहीं हो।  अरे, देखो इन बच्चों की चीत्कार हमारा हृदय विदीर्ण किये दे रही है। अरे, हमें इसके माता पिता मिल जायें तो उनको ऐसी सुनायें जैसी कभी तुम्हारी घटिया कविताओं पर भी नहीं सुनाई होगी।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज हमारी कविताओं पर हमें क्या मिलता है? उनको तो इस बच्चे के अभिनय पर पैसा मिला होगा। ऐसे कार्यक्रमों में पहुंचना भी भाग्य समझा जाता है। इन शिशुओं ने जरूर अपने पूर्व जन्म में कोई पुण्य किया होगा कि पैदा होते ही यह कार्यक्रम उनको मिल गया। बिना कहीं प्रशिक्षण लिये ही अभिनय करने का अवसर मिलना कोई आजकल के जमाने में आसान नहीं है। खासतौर से जब आपके माता पिता ने भी यह नहीं किया हो।’<br />
दीपक बापू की इस से आलोचक महाराज को इतना गुस्सा आया कि  दुःख अब हवा हो गया और इधर बिजली भी चली गयी। इसने उनका क्रोध अधिक बढ़ा दिया। वह दीपक बापू से बोले-‘रहना तुम ढेर के ही ढेर! यह पूर्व जन्म का किस्सा कहां से लाये। तुम्हें पता है कि अपने देश में बाल श्रम अपराध है।’<br />
दीपक बापू ने स्वीकृति में यह सोचकर हिलाया कि हो सकता है कि आलोचक महाराज की प्रसन्नता प्राप्त हो। फिर आलोचक महाराज ने कहा-‘अरे, इस पर कुछ लिखो। यह बाल श्रम कानून के हिसाब से  गलत है। इस पर कुछ जोरदार लिखो।’<br />
दीपक बापू बोले-महाराज, आपके अनेक शिष्य इस पर लिख रहे हैं। हमारे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।  यह शिशु, बालक, नवयुवक, युवक, अधेड़ और वृद्ध का संकट अलग अलग प्रस्तुत किया है जबकि हमें सभी का संकट एक दूसरे से जुड़ा दिखाई देता है।  फिर इसमें भी भेद है स्त्री और पुरुष का। हम यह विभाजन कर नहीं पाते।  हमने तो देखा है कि एक का संकट दूसरे का बनता ही है।  वैसे आपने कहा कि यह बालश्रम कानून के विरुद्ध है पर यह तो शिशु श्रम है। इस विषय पर आप अपने स्थाई शिष्यों से कहें तो वह अधिक प्रकाश डाल सकेंगे। वैसे तो शिशु रोते ही हैं हालांकि उनको इसमें श्रम होता है और इससे उनके अंग खुलते हैं।’<br />
आलोचक महाराज उनको घूरते हुए बोले-‘मतलब तुम्हारे हिसाब से यह ठीक हो रहा है। इस तरह बच्चों के रोने का दृश्य दिखाकर लोगों के हृदय विदीर्ण करना तुम्हें अच्छा लगता है।  यह बालश्रम की परिधि में नहीं आता! क्या तुम्हारा दिमाग है कि इसे स्वाभाविक शिशु श्रम कह रहे हो?’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज, हमने कहां इसे जायज कहा? हम तो आपके शिष्यों के मुताबिक इसका एक विभाजन बता रहे हैं। हम तो कानून भी नहीं जानते इसलिये बालश्रम और शिशुश्रम में अंतर लग रहा है। वैसे माता पिता अपने बच्चे को इस तरह दूसरों को  देकर पैसा कमाते होंगे। हालांकि वह भद्र लोग हैं पर इतना तो कर ही सकते हैं कि पैसा मिलने पर बच्चा कुछ देर रोए तो क्या? वैसे आपको तो यह पता ही होगा कि इस देश में इतनी गरीबी है कि लोग अपना बच्चा बेच देते हैं। कई औरतें किराये पर कोख भी देती हैं।  यह अलग बता है कि ऐसे मामले पहले गरीबों में पाये जाते थे पर अब तो पैसे की खातिर पढ़े लिखे लोग भी यह करने लगे हैं। अरे, आप कहां इन वास्तविक धारावाहिकों की अवास्तविकताओं में फंस गये। आप तो हमारी कविता पढ़िये जो उमस और बरसात पर लिखी गयी हैं बिल्कुल आज ही!’<br />
आलोचक महाराज ने कागज हाथ में लिये और उसे फाड़ दिये फिर कहा-‘वैसे भी तुम श्रृंगार रस में कभी नहीं लिख पाते। जाओ, इस कथित शिशुश्रम पर कुछ लिखकर लाओ। और हां, हास्य व्यंग्य कविता मत लिख देना। इस पर बीभत्स रस की चाशनी में डुबोकर कुछ लिखना और मुझे पंसद आया तो उसे कहीं छपवा भी दूंगा।’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज, आपके चेलों का असर आप पर भी हो गया है। यह तो गलत है कि आपके शिष्य बालश्रम, नारी अत्याचार, युवा बेरोजगारी पर लिखते हैं पर शिशु श्रम पर हम लिखें।’<br />
आलोचक महाराज ने घूरकर पूछा-यह बालश्रम और शिशुश्रम अलग अलग कब से हो गये?’<br />
दीपक बापू बोले-‘हमें पता नहीं! पर हां, आपके शिष्यों को पढ़ते पढ़ते हम कभी इस विभाजन की तरफ निकल ही आते हैं। लिखते इसलिये नहीं कि हमें लिखना नहीं आता। वैसे आप कह रहे हो तो लिखकर आते हैं।’<br />
दीपक बापू मिठाई का डिब्बा हाथ में वापस लेकर जाने लगे तो आलोचक महाराज बोले-‘यह मिठाई का डिब्बा वापस कहां लेकर जा रहे हो।’<br />
दीपक बापू बोले-‘अभी आपके कथानुसार दूसरी रचना लिखकर ला रहा हूं। तब यहां खाली हाथ आना अच्छा नहीं लगेगा। इसलिये साथ लेकर जा रहा हूं।’<br />
ऐसा कहते ही दीपक बापू कमरे से बाहर निकल गये क्योंकि उनको आशंका थी कि कहीं वह छीनकर वापस न लें। बाहर निकल कर वह इस बात से खुश हुए कि उनकी कवितायें सुरक्षित थी क्योंकि उनकी कार्बन कापी वह घर पर रख आये थे, वरना तो शिशुश्रम विषय पर उनके साथ ही मिठाई का डिब्बा भी भेंट चढ़ जाने वाला था। </b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[खेल और हवा-हिंदी व्यंग्य लघुकथा (khel aur hava-hindu laghu katha)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/06/fotbal-and-air-hindi-comedy-satire/</link>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 14:44:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/10/06/fotbal-and-air-hindi-comedy-satire/</guid>
<description><![CDATA[उसने एक फुटबाल ली और उस पर लिख दिया धर्म। वह उस फुटबाल के साथ एक डंडा लेकर उस मैदान में पहुंच गया जह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>उसने एक फुटबाल ली और उस पर लिख दिया धर्म। वह उस फुटबाल के साथ एक डंडा लेकर उस मैदान में पहुंच गया जहां गोल पोस्ट बना हुआ था। तमाम लोग वहां तफरी करने आते थे इसलिये वह पहले जोर से चिल्लाया और बोला-‘है कोई जो सामने आकर मुझे गोल करने से रोक सके।’<br />
उसने अपनी आंखों पर चश्मा लगा लिया था। उसका डीलडौल और हाथ में डंडा देखकर लोग डर गये और फिर वह शुरु हो गया उसके गोल करने का सिलसिला। एक के बाद एक गोल कर वह चिल्लाता रहा-है कोई जो मेरा सामना कर सके। देखों धर्म को मैं कैसे लात मारकर गोल कर रहा हूं।’<br />
लोग देखते और चुप रहते। कुछ बच्चे शोर बचाते तो कुछ बड़े कराहते हुए आपस में एक दूसरे का सांत्वना देते कि कोई तो माई का लाल आयेगा जो उसका गोल रोकेगा।’<br />
उसी समय एक ज्ञानी वहां से निकला। उसने यह दृश्य देखा और फिर उसके पास जाकर बोला-‘क्या बात है? सामने कोई गोल पर तो है नहीं जो गोल किये जा रहे हो।’<br />
वह बोला-‘तुम सामने आओ। मेरा गोल रोककर दिखाओ। यह फुटबाल मैंने एक कबाड़ी से खरीदी है और मैं चाहता हूं कि कोई मेरे से गोल गोल खेले।</p>
<p>ज्ञानी ने कहा-‘ यह होता ही है।  अगर फुटबाल है तो खेलने का मन होगा। डंडा है तो उसे भी किसी को मारने का मन आयेगा।  ऐसे में तुम्हारे साथ कोई नहीं खेलने आयेगा।’<br />
उसने कहा-‘तुम ही खेल लो। दम है तो आ जाओ सामने।’<br />
ज्ञानी ने उससे फुटबाल हाथ में ली और उसकी हवा भरने के मूंह पर जाकर उसका ढक्कन खोल दिया। वह पूरी हवा निकल गयी।<br />
वह चिल्लाने लगा और बोला-‘अरे, डरपोक हवा निकाल दी। अभी डंडा मारता हूं।’<br />
ज्ञानी ने कहा-‘फंस जाओगे। यहां बहुत सारे लोग हैं। फुटबाल पर तुमने धर्म लिखकर लोगों की भावनाओं को संशकित कर दिया था पर अब वह यहीं आयेंगे। देखो वह आ रहे हैं।’<br />
उसने देखा कि लोग उसकी तरफ आ रहे हैं। ज्ञानी ने कहा-‘तुम अब घर जाओ। यह तुम नहीं फुटबाल थी जो तुमसे खेल रही थी। फुटबाल में  हवा भरी थी  जो उसके साथ तुम्हें भी उड़ा रही थी।  वैसे तुम्हारी देह भी हवा से चल रही है पर यह हवा तुम्हारे दिमाग को भी चला रही थी। अब न यह फुटबाल चलेगी न  डंडा।’<br />
वह ज्ञानी ऐसा कहकर चल दिये तो तफरी करने आये एक सज्जन ने पूछा-‘पर आपने सब क्यों और कैसे किया?’<br />
ज्ञानी ने कहा-‘मैंने कुछ नहीं किया। यह तो हवा ने किया है।  उसे फुटबाल में भरी हवा ने बौखला दिया था। वह निकल गयी तो उसके लिये अपना यह नाटक जारी रखना कठिन था। मुझे करना ही क्या था? उसके कहने पर उसके साथ फुटबाल खेलने से अच्छा है कि उसकी हवा निकाल कर मामला ठंडा कर दो। फुटबाल खेलता तो वह गोल रोकने को लेकर विवाद करता। मेरे गोल पर आपत्तियां जताता। उसको छोड़ कर जाता तो वह यहां भीड़ के लोगों को बेकार में डराता। इससे अच्छा है कि धर्म नाम लिखकर झगड़ा बढ़ाने की उसकी योजना को फुटबाल में से हवा निकाल कर बेकार कर दिया जाये।’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;. </b><br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[rankaar 30 09 2009]]></title>
<link>http://egujarati.wordpress.com/2009/10/05/rankaar-30-09-2009/</link>
<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 14:08:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>egujarati</dc:creator>
<guid>http://egujarati.wordpress.com/2009/10/05/rankaar-30-09-2009/</guid>
<description><![CDATA[रणकार सचीन तेंडुलकर, राहुल द्रविड, सुनील गावसकर&#8230; देश और दुनिया के बडे़ बडे़ क्रिकॅटर्स को लोगो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>रणकार</p>
<p>सचीन तेंडुलकर, राहुल द्रविड, सुनील गावसकर&#8230; देश और दुनिया के बडे़ बडे़  क्रिकॅटर्स को लोगो ने शून्य रन बनाकर आउट होते हुए देखा है. कितने चपल, विचारशील,  चॅम्पियन और महान कक्षा के होने के बावजुद ईन खिलाडीओं को हमने एक भी रन बनाए बिना  आउट होते देखा है. किसीके भी साथ ऐसा हो सकता है, होता भी है. ईन्सान की काबिलियत  उसके लिए सुख-समॄद्धि पाने की एक ज़रूरत है. लेकिन उसका उपयोग करते वक्त जो संजोग  होते है, जो जरूरतें आन पडती है, उनके सारे पहलु ईन्सान के हाथ में नहि होते. कर  सकना, करने के बारे में सोचना और सचमूच कर दिखाना ये तीनो बात अलग है. सचमूच कर  दिखाते वक्त कोई भी बात विघ्न का रूप ले सकती है. क्रिकॅटर और आम आदमी में फर्क  ईतना ही है कि आम आदमी विफल हो जाता है तो सबसे पहले तो वो खुद ही अपने आपको  कोसेगा. फिर उसे कोसेंगे उसके परिवार वाले, और फिर सारी दुनिया भी उसे कोसने में  कोई कसर नहि छोडेगी. क्रिकॅटर के साथ ऐसा नहि होता. वो नाकाम हो जाए तो उसे फोर्म  दिखाने का, कुछ कर दिखाने का मौका अगमे मॅच में मिल जाता है. अगर वो सफल हो जाए तो  उसकी पिछली गलती तो सब रातोरात भूल जाते है. आम आदमी एक बार नाकाम होता है तो उसे  सारा जीवन बट्टा लेकर जीना पडता है, बूरी यादें उसका पीछा करते रहती और दुनिया उसे  गुजरा हुआ कल याद दिलाकर कोसती रहती है. एक व्यापारी अगर व्यापार में वक्त पर पैसे  ना चूका सके तो बरसोप तक बाजार में कहा जाएगा, &#8220;उसका व्यवहार साफ नहि है&#8230;&#8221; और ईस  दबाव में, लोगों की गलत मान्यताओं के बोज तले जो दब गया उसका क्या हाल होगा यह तो  सिर्फ सोचने की बात है. लेकिन हम सब ईसी समाज के प्रतिनिधि है. और हमे ये समजना  पडेगा कि किसी ईन्सान को उसकी एकाद गलती के कारण हमेशा के लिये गलत मान लेना, नाकाम  कह देना ये ठीक नहि है. जिस क्रिकॅटर को आप जानते नहि, जिसकी करनी से प्रत्यक्ष रूप  से हमारे जीवन पर कोई प्रभाव नहि पडता, उसे सुधरने का, कुछ कर दिखाने का बार बार  मौका हम देते है, उस पर बुलंद भरोसा रखते है, तो उन ईन्सानो पर क्यों भरोसा ना रखे  जो हमारे आसपास है, हमारे अपने है? किसी पर भरोसा रखकर, उसे प्रोत्साहित करके देखिए  तो सही, उस ईन्सान का जीवन भी उजला हो जाएगा और समाज भी.</p>
<p>- संजय वि. शाह</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बनाते हैं अपनी दुनियां खुद-हिंदी कविता (khud banate apne duinyan-hindi kavita]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/05/men-and-world-hindi-poem/</link>
<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 14:06:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/05/men-and-world-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[धरती पर अपने कदम दर कदम चलते हुए जब नजर करता हूं नीचे की तरफ तब जहां तक देखता हूं वहीं तक ख्याल चलते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>धरती पर अपने कदम दर कदम<br />
चलते हुए जब<br />
नजर करता हूं नीचे की तरफ<br />
तब  जहां तक देखता हूं<br />
वहीं तक ख्याल चलते हैं<br />
दुनियां बहुत छोटी हो जाती है।</p>
<p>आंखें उठाकर देखता हूं जब आकाश में<br />
चारों तरफ घुमते हुए<br />
उसके अनंत स्वरूप के दृश्य से<br />
इस दुनियां के बृहद होने की<br />
अनुभूति स्वतः होने लग जाती है।<br />
ख्यालों को लग जाते हैं पंख<br />
सोचता हूं मेरे पांव भले ही<br />
नरक में चलते हों<br />
पर कहीं तो स्वर्ग होगा<br />
तब अधरों पर मुस्कान खेल जाती है।</p>
<p>दृष्टि से बनता जैसा दृष्टिकोण<br />
वैसा ही दृश्य सामने आता है<br />
मगर दृष्टिकोण से जब बनती है दृष्टि<br />
तब हृदय को छू लें<br />
ऐसे मनोरम दृश्य सामने आते हैं<br />
शायद यही वजह है<br />
इस संसार में रहते दो प्रकार के लोग<br />
एक जो बनाते हैं अपनी दुनियां खुद<br />
दूसरे वह जिनको दूसरी की<br />
बनी बनायी लकीर चलाती है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</b><br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर के दोहे-ज्ञानी कभी भूख की चिंता नहीं करते (kabirdas-Wise do not worry about ever hungry)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/04/gyangi-aur-bhookh-kabir-ke-dohe/</link>
<pubDate>Sun, 04 Oct 2009 10:36:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/04/gyangi-aur-bhookh-kabir-ke-dohe/</guid>
<description><![CDATA[आसन मारे कह भयो, मरी न मन की आस। तेल केरे बैल ज्यौं, घर ही कोस पचास।। संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>आसन मारे कह भयो, मरी न मन की आस।<br />
तेल केरे बैल ज्यौं, घर ही कोस पचास।।<br />
</b>संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि आसन लगाने से भी क्या लाभ जब मन में कामनाएं जीवित रहें। वह तो तेली के बैल की तरह है जो घर में पचास कोस का चक्कर काट लेता है।<br />
<b>जोगी हृै जग जीतता, बहिरत है संसार।<br />
एक अंदेशा रहि गया, पीछै पड़ा आहार।।<br />
</b>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जोगी जग जीतकर विचरण करता है पर अगर उसके अंदर अपने आहार के विषय में संशय रह गया तो वह ठीक नहीं है।<br />
<b>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-</b>कबीरदास जी ने योग साधना के विषय में जो बातें कही है वह उनके काल में शायद इसलिये ही ठीक लगी क्योंकि उस समय नियमित परिश्रम के कारण लोगों में रोग आदि कम होते थे और जो लोग योगासाधना करते थे उनको केवल सन्यासी मान लिया जाता था। जबकि वर्तमान समय में परिश्रम की प्रवृत्ति कम हुई है जिससे बीमारियों का प्रकोप बढ़ा  है जिससे समाज में शारीरिक और मानसिक के कारण लोग बहुत परेशान हैं इसलिये योग साधना केवल भक्ति ही नहीं बल्कि उन विकारों से लड़ने का एक अच्छा साधन लगती है।<br />
इसमें कोई संदेह नहीं है कि संत शिरोमणि कबीरदास जी को योग साधना और ध्यान के विषय में अधिक जानकारी नहीं थी।  दूसरा यह भी कि वह भक्ति के ऐसे चरम शिखर पर पहुंचे थे जहां कोई विरला पहुंचता है। योगसाधना भक्ति का रूप नहीं है बल्कि उसके लिये शक्ति अर्जित करने का एक साधन है।  कबीरदास जी कहते हैं कि योगी जग जीतता हुआ जग में विचरण करता है पर आहार विषयक उसका संदेह उसे सांसरिक व्यक्तियों की श्रेणी में खड़ा कर देता है। इस तरह के संशय मनुष्य में अपनी ही देह, मन और विचारों में स्थित विकारों के कारण उत्पन्न होते हैं और योग साधना, ध्यान और मंत्रोच्चार से उनको दूर कर परमात्मा की भक्ति बहुत सहज ढंग से की जा सकती है यह बात शायद कबीर नहीं समझ पाये।  इसलिये उन्होंने आसनों के विषय में ऐसी प्रतिक्रिया दी है।  इसके बावजूद योग साधकों को कबीरदास जी के कथनों की अनदेखी नहीं करना चाहिये क्योंकि उनकी आहार विषयक चेतावनी बहुत महत्वपूर्ण है और यही वह बिन्दू है जहां मनुष्य आकर रुक जाता है। एक बार पेट भरने के बाद उसे अगले समय की चिंता लग जाती है।  सामान्य गृहिणियों का अधिकतर समय तीन समय का भोजन बनाने में लग जाता है और ऐसे में वह तो अध्यात्मिक विषय में चिंतन कर ही नहीं पातीं।<br />
योग साधना और ध्यान के बावजूद अगर आहार व्यवहार विषयक शुद्धता हमारे अंदर नहीं आती तो अपनी नियमित अवधि को बढ़ायें। जहां तक ध्यान का विषय तो अपने अंदर संकल्प लें कि हम तो वह लगाते ही रहेंगे चाहे लगे या नहीं।  अंततः उसमें सफलता मिलेगी और शनैः शनैः दैहिक, मानसिक और वैचारिक विकार दूर निकल जायेंगे और आहार विषय चिंता से मुक्ति मिल सकेगी।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृति-दूसरों के माल पर नजर न डालें (paraya mal apna na samjhen)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/03/manu-smriti-in-hindi/</link>
<pubDate>Sat, 03 Oct 2009 04:55:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/03/manu-smriti-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[मनु महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212; यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>मनु महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<p><strong>यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्रह्यणि च।<br />
अदत्तान्युपयु´्जानः एनसः स्वात्तुरीभाक्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>वाहन, शैय्या, आसन, कुआं, उद्यान और भवन आदि का उपभोग कुछ दान कर ही करना लाभदायक होता है।<br />
<strong>परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन।<br />
नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अन्य व्यक्तियों द्वारा बनवाये गये स्नान के लिये बनाये गये स्थानों-स्नानगृहों,सरोवरों और कुऐं आदि-पर नहाना नहीं चाहिए। वह स्नानगृह अगर पापों के धन से बनाये गये हैं तो उसमें नहाने वाला भी उसका भागी बनता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>आजकल की व्यस्त एवं दीर्घसूत्रीय जिंदगी में यह देखना कठिन काम है कि हम कहीं बाहर जाकर रुक रहे हैं तो वहां का स्थान किस प्रकार के धन से बनाया गया है। वैसे भी आजकल बिना काले धन के यह कैसे संभव है कि समाज का भौतिक विकास इतनी तीव्र गति से हो। ऐसे में भ्रष्ट और अनैतिक रूप से कमाये गये धन से बने आवास और स्नानगृहों में रहने और नहाने का प्रतिबंध स्वीकार करना संभव नहीं लगता। बड़े बड़े शहरों में बड़े और आलीशान होटल बन गये हैं जिनमें स्वीमिंग पूल भी होते हैं। अब यह कैसे कहा जा सकता है कि वह भ्रष्ट या अनैतिक धन से बने हैं या सात्विक धन से। वैसे तो आजकल धर्नाजन के कई ऐसे&#160;साधन&#160;&#160;पवित्र माने जाते हैं जिनको पहले अपवित्र माना जाता था। अतः इस बारे में अपने विवेक से विचार करना चाहिये। </p>
<p>मगर सच तो यह है कि जिस प्रकार हम अपने जीवन में जिस प्रकार के व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में आते हैं उसके पाप पुण्य का प्रभाव हम पर होता है। कहा जाता है कि ‘जैसे खायें अन्न वैसा हो मन’। इसका आशय यह तो है ही कि जिस प्रकार की वस्तु का हम उपभोग करेंगे वैसे ही प्रभाव हमारी देह के साथ ही हमारे मन और विचारों पर होगा। साथ ही यह भी कि उसके आने का सात्विक मार्ग है या असात्विक इस बात का प्रभाव भी उसके उपभोग करने वाले पर होता है। तात्पर्य यह है कि अगर हमें लगता है कि कोई व्यक्ति या वस्तु-जिसके बारे में यह यकीन हो कि वह असात्विक प्रकृत्ति की है तो उससे अपने आपको दूर रखना चाहिये। यह ठीक है कि आजकल की भागम भाग जिंदगी में यह कहना कठिन है कि किसका धन एक नंबर का है या दो नंबर का पर थोड़ा विवेक का इस्तेमाल करें तो सभी समझ में आ जाता है। दूसरा सच यह भी कि हम किसी बड़े शहर में जाकर अपने लिये सस्ता और अच्छा स्थान रहने के लिये ढूंढते हैं पर तब यह देखने का न तो समय होता है न जरूरत कि वह किस प्रकार के धन से बना है। हालांकि अनजान रहने पर किसी वस्तु का उपभोग करने पर उसके पाप का भागी नहीं बनते यह भी हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
&#160;&#160;&#160;<strong>&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;&#160;यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://deepkraj.blogspot.com/">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://anantraj.blogspot.com/">3.अनंत शब्द योग</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर दर्शन-सात्विक कार्य सिद्ध न हो भी चिंता नहीं]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/01/satvik-karya-ke-chinta-hindu-sandesh-in-hindi/</link>
<pubDate>Thu, 01 Oct 2009 04:33:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/01/satvik-karya-ke-chinta-hindu-sandesh-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत। अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।। हिंदी में भावार्थ-मिथ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत।<br />
अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>मिथ्या उपाय से कपट पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं पर उनमें मन लगाना ठीक नहीं है।<br />
<strong>तथैव योगविहितं यत्तु कर्म नि सिध्यति।<br />
उपाययुक्तं मेधावी न तव्र गलपयेन्मनः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अच्छे और सात्विक प्रयास करने पर कोई सत्कर्म सिद्ध नहीं भी होता है तो भी बुद्धिमान पुरुष को अपने अंदर ग्लानि नहीं अनुभव करना चाहिए।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अक्सर आपने सुना होगा कि प्यार और जंग में सब जायज है-यह पश्चिम से आयातित विचार है।  जीवन की तो यह वास्तविकता है कि जैसा कर्म करोगे वैसा परिणाम सामने आयेगा।  जैसा  मन में संकल्प होगा वैसे ही यह संसार हमारे साथ व्यवहार करेगा। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने कर्म की शुद्धता और अशुद्धता का बोध नहीं रहता। इसी कारण वह ऐसे उपायों का भी सहारा लेता है जो अपवित्र और अनैतिक हैं। फिर उसको अपनी बात के प्रमाण  रखने के लिये अनेक प्रकार के झूठ भी बोलने पड़ते हैं।  इस तरह वह हमेशा पाप की दुनियां में घूमता है।  मगर मन तो मन है वह उसकी तृप्ति के लिये भक्ति और साधना का ढोंग भी करता है। इससे प्रकार वह एक ऐसे मायाजाल में फंसा रहता है जिससे जीवन भर उसकी मुक्ति नहीं होती।<br />
इसलिये अपने जीवन में अच्छे संकल्प धारण करने के साथ ही अपने कार्य की सिद्ध के लिये पवित्र और नैतिक उपायों की ही सहायता लेना चाहिए। </p>
<p>बाकी लोग किस रास्ते पर जा रहे हैं यह विचार करने की बजाय यह देखना चाहिए कि हमारे लिये उचित मार्ग कौनसा है। इसके अलावा यह भी एक अन्य बात यह भी  है कि अगर हमारा कोई पवित्र और सात्विक कर्म अपने उचित उपाय से सिद्ध नहीं होता तो भी परवाह नहीं करना चाहिए। याद रखें कार्य सिद्ध होने का भी अपना एक समय होता है और जब आता है तो हमें यह भी पता नहीं लगता कि वह काम कैसे पूरा हुआ।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p>
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-गलत संपर्क से आदमी बर्बाद होता है]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/01/galat-sanpark-chankya-niti/</link>
<pubDate>Thu, 01 Oct 2009 04:24:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/10/01/galat-sanpark-chankya-niti/</guid>
<description><![CDATA[ग्रहीत्वां दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्। प्राप्तविद्यां गुरुं शिष्या दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा। हि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>ग्रहीत्वां दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।<br />
प्राप्तविद्यां गुरुं शिष्या दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान का घर छोड़ देते हैं। गुरु से शिक्षा प्राप्त कर शिष्य उसे दक्षिण देकर आश्रम से चले जाते हैं। उसी तरह जंगल जल जाने पर मृग उसका त्याग कर देते हैं।<br />
<strong>दुराचारी च दुर्दृष्टिराऽवासी च दुर्जनः।<br />
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति।।</strong><br />
<strong>हिन्दी में भावार्थ-</strong>दुराचारी, कुदृष्टि रखने और बुरे स्थान पर रहने वाले व्यक्ति से संबंध बनाने पर श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>संबंध बनाने में हमेशा सतर्कता बरतना चाहिये। देखा गया है कि आजकल के युवक युवतियां  अक्सर संबंध तात्कालिक आकर्षण में फंसकर मित्रता ऐसे लोगों से कर बैठते हैं जिनके स्वभाव और इतिहास का पता उनको नहीं होता। बाद में जब वह उनकी वजह से कहीं फंस जाते हैं तब उनको अपनी गलती की अनुभूति होती है मगर तब देर भी हो जाती है। ऐसी एक नहीं अनेक घटनायें घटित हो चुकी हैं जिसमें किसी भले युवक ने किसी गलत साथी का चुनाव किया और बाद में उसके अपराध के छींटे उस पर भी पड़े। उसी तरह युवतियों ने भी प्रारंम्भिक आकर्षण में आकर ऐसे लड़कों से प्रेम प्रसंग स्थापित किये जिसका परिणाम उनके लिये घातक रहा। कई बार तो वह ऐसे युवकों से विवाह भी कर बैठती हैं जो दिखाने के लिये अपने संस्कर अच्छे दिखाते हैं पर बाद में उनकी असलियत सामने आती है तो युवतियों को पछतावा होता है। अनेक युवतियां पहले अपने घरेलू संस्कारों को भुलाकर ऐसे लड़कों से विवाह कर बैठती हैं जिनके घरेलू संस्कार बिल्कुल विपरीत होते हैं। विवाह से पहले तो उनके घर से लड़कियों का संबंध नहीं होता पर बाद विवाह बाद जब उसके परिवार वाले अपने संस्कार अपनाने को विवश करते हैं तब लड़कियों को बहुत परेशानी आती है और इसी बात पर सबसे अधिक तनाव उनको ही झेलना पड़ता है क्योंकि पुरुष तो घर से बाहर रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लड़का हो या लड़की उसे अपने संबंध बनाने से पहले सामने वाले व्यक्ति की पूरी जांच करना चाहिये।</p>
<p>नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि जब कहीं से अपना उद्देश्य पूरा हो जाये तो उस स्थान पर अधिक नहीं ठहरना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि इस जीवन में अपने कार्य और उद्देश्य पूर्ति के लिये अनेक स्थानों पर जाने के साथ ही लोगों से संपर्क भी बनाने पड़ते हैं। उनमें अपनी लिप्तता उतनी ही रहना चाहिये जितनी अपने हित के लिये आवश्यक हो। अधिक लिप्तता कार्य और उद्देश्य पर बुरा प्रभाव डाल सकती है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति-कुविचारी नारी से तो कोई साथ न हो अच्छा (chankya niti-kuvichari nari ka sath]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2009/09/30/kuvichari-nari-chankya-niti/</link>
<pubDate>Wed, 30 Sep 2009 04:02:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2009/09/30/kuvichari-nari-chankya-niti/</guid>
<description><![CDATA[नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<strong>वरं न राज्यं कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।<br />
वरं न शिष्यो कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदारा।।</strong><br />
<strong>हिन्दी में भावार्थ-</strong>अयोग्य राजा के राज्य में रहने से अच्छा है राज्यविहीन राज्य में रहना। दुर्जन मित्र से अच्छा है कोई मित्र ही न हो। मूर्ख शिष्य से किसी शिष्य का न होना ही अच्छा है। बुरे विचारों से वाली नारी से अच्छा है साथ में कोई नारी ही न हो।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>व्यक्ति को अपने जीवन में संगत न मिले पर उसे कुसंग नहीं करना चाहिये। कहते हैं कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। जिस तरह की संगत वाले लोग होते हैं वैसे ही वह व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी और दृष्टि की अपवित्रता का प्रभाव स्वाभविक रूप से उनकी संगत करने वाले पर होता है। अक्षम, अयोग्य, और बकवाद करने वाला संगी साथी हो तो वह अपने दुष्प्रभाव से जीवन को नरक बना देता है।<br />
मित्रता करने के विषय में लोग अत्यंत लापरवाह होते हैं। कहते हैं कि ‘दुष्ट और नकारा मित्र हो तो हमें क्या फर्क पड़ता है।’ यह सोचना स्वयं को ही धोखा देना है। जिन लोगों के साथ हम रहते हैं उनकी छबि अगर खराब है तो निश्चित रूप से हमारी भी खराब होगी। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि उनके साथ रहने पर उनके ही किये अपराध में हमारा सहयोग होने का संदेह लोगों को होता है। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिसमें कपटी, दुष्ट और अपराधी मित्र का दुष्परिणाम उनके मित्रों को ही भोगना पड़ता है।<br />
जिस तरह आजकल छल कपट की प्रवृत्ति बढ़ रही है उसके देखते हुए तो और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है मगर इसके विपरीत लोग चाहे जिसे अपना मित्र बनाकर अपने लिये संकट का आमंत्रण देते हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p>
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</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[न सतयुग, न कलियुग-हास्य कविता (satyug aur kaliyug-hasya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/29/n-satyug-hai-n-kaliyug-hindi-hasya/</link>
<pubDate>Tue, 29 Sep 2009 17:45:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/29/n-satyug-hai-n-kaliyug-hindi-hasya/</guid>
<description><![CDATA[फंदेबाज मिला रास्ते में और बोला ‘चलो दीपक बापू तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें। वहां सर्वशक्तिमान के]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>फंदेबाज मिला रास्ते में<br />
और बोला<br />
‘चलो दीपक बापू<br />
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।<br />
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।<br />
हमारे दोस्त का आयोजन है<br />
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,<br />
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का<br />
इस जीवन को देने का कर्जा,<br />
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’</p>
<p>सुनकर पहले चौंके दीपक बापू<br />
फिर टोपी घुमाते हुए बोले<br />
‘कमबख्त,<br />
न यहां दुःख है न सुख है<br />
न सतयुग है न कलियुग है<br />
सब है अनूभूति का खेल<br />
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया<br />
रौशनी होगी तभी<br />
जब चिराग में होगी बाती और तेल,<br />
मार्ग दो ही हैं<br />
एक योग और दूसरा रोग का<br />
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,<br />
दृश्यव्य माया है<br />
सत्य है अदृश्य<br />
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी<br />
सत्य से भागता है<br />
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है<br />
इस पूर्ण ज्ञान को<br />
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये<br />
प्रकृति की कितनी कृपा है<br />
इस धरा पर यह भी समझा गये<br />
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान<br />
कोई नया अवतार<br />
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है<br />
वही हैं हमारे करतार<br />
अब तो जिनको धंधा चलाना है<br />
वही लाते इस देश में नया अवतार,<br />
कभी देश में ही रचते<br />
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते<br />
उनकी नीयत है तार तार,<br />
हम तो सभी से कहते हैं<br />
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है<br />
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।<br />
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में<br />
हम कैसे फंस जायें?<br />
यहां तो धर्म के नाम पर<br />
कदम कदम पर<br />
लोग किसी न किसी अवतार  का<br />
ऐसे ही जाल बिछायें।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नए अवतार का जाल-हास्य व्यंग्य कविता (naye avtar ka jaal-hindi hasya kavita]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2009/09/25/avtar-ka-jaal-hindi-comedy-satire-poem/</link>
<pubDate>Fri, 25 Sep 2009 16:37:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2009/09/25/avtar-ka-jaal-hindi-comedy-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[फंदेबाज मिला रास्ते में और बोला ‘चलो दीपक बापू तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें। वहां सर्वशक्तिमान के]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>फंदेबाज मिला रास्ते में<br />
और बोला<br />
‘चलो दीपक बापू<br />
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।<br />
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।<br />
हमारे दोस्त का आयोजन है<br />
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,<br />
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का<br />
इस जीवन को देने का कर्जा,<br />
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’</p>
<p>सुनकर पहले चौंके दीपक बापू<br />
फिर टोपी घुमाते हुए बोले<br />
‘कमबख्त,<br />
न यहां दुःख है न सुख है<br />
न सतयुग है न कलियुग है<br />
सब है अनूभूति का खेल<br />
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया<br />
रौशनी होगी तभी<br />
जब चिराग में होगी बाती और तेल,<br />
मार्ग दो ही हैं<br />
एक योग और दूसरा रोग का<br />
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,<br />
दृश्यव्य माया है<br />
सत्य है अदृश्य<br />
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी<br />
सत्य से भागता है<br />
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है<br />
इस पूर्ण ज्ञान को<br />
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये<br />
प्रकृति की कितनी कृपा है<br />
इस धरा पर यह भी समझा गये<br />
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान<br />
कोई नया अवतार<br />
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है<br />
वही हैं हमारे करतार<br />
अब तो जिनको धंधा चलाना है<br />
वही लाते इस देश में नया अवतार,<br />
कभी देश में ही रचते<br />
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते<br />
उनकी नीयत है तार तार,<br />
हम तो सभी से कहते हैं<br />
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है<br />
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।<br />
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में<br />
हम कैसे फंस जायें?<br />
यहां तो धर्म के नाम पर<br />
कदम कदम पर<br />
लोग किसी न किसी अवतार  का<br />
ऐसे ही जाल बिछायें।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>

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