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	<title>hindi-thought &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-thought"</description>
	<pubDate>Thu, 03 Dec 2009 14:58:24 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[भावनाओं का व्यापर-हिन्दी आलेख और व्यंग्य कविताएँ ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/28/sanevenaon-ka-vyapar-hindi-article-and-poem/</link>
<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 06:27:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जिन हिंन्दी के महानुभावों ने रसों की पहचान दी है वह भी खूब रहे होंगे। अगर वह इन रसों की पहचान नहीं क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>जिन हिंन्दी के महानुभावों ने रसों की पहचान दी है वह भी खूब रहे होंगे। अगर वह इन रसों की पहचान नहीं कराते तो शायद हिन्दी वाले कई ऐसी चीजों को नहीं समझ पाते जिनको बाजार के सौदागर बेचने के लिये सजाते हैं।  वात्सल्य, श्रृंगार, वीभत्स, हास्य, भक्ति, करुण तथा वीर रस की चाश्नी में डुबोकर फिल्में बनायी जाती थीं। फिर टीवी चैनल भी बनने लगे।   अधिकतर धारावाहिक तथा फिल्मों की कथा पटकथा में सभी रसों का समावेश किया जाता है।  मगर अब समाचारों के प्रसारण में भी इन रसों का उपयोग इस तरह होने लगा है कि उनको समझना कठिन है।  कभी कभी तो यह समझ में नहीं आता है कि वीर रस बेचा जा रहा है कि करुणता का भाव पैदा किया जा रहा है या फिर देशभक्ति का प्रदर्शन हो रहा है।<br />
इस देश में आतंकवाद की अनेक घटनायें हो चुकी हैं। पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई पर हमला किया गया था।  सैंकड़ों बेकसूरों की जान गयी।  इससे पहले भी अनेक हमले हो चुके हैं और उनमें हजारों बेकसूर चेतना गंवा चुके हैं।  मगर मुंबई हमले की बरसी मनाने में प्रचार तंत्र जुटा हुआ है। कहते हैं कि मुंबई पर हुआ हमला पूरे देश पर हमला था तब बाकी जगह हुआ हमला किस पर माना जाये? जयपुर, दिल्ली और बनारस भी इस देश में आते हैं। फिर केवल मुंबई हादसे की बरसी क्यो मनायी जा रही है? जवाब सीधा है कि बाकी शहरों में सहानुभूति के नाम पर पैसे खर्च करने वाले अधिक संभवतः न मिलें।   मुंबई में फिल्म बनती है तो टीवी चैनलों के धारावाहिक  का भी निर्माण होता है। क्रिकेट का भी वह बड़ा केंद्र है।  सच तो यह है कि दिल्ली, बनारस और जयपुर किसी के सपनों में नहीं बसते जितना मुंबई। इसलिये उसके नाम पर मुंबई के भावुक लोगों के साथ बाहर के लोग भी पैसे खर्च कर सकते हैं। सो बाजार तैयार है!<br />
वैसे संगठित प्रचार माध्यम-टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकायें-यह सवाल नहीं उठायेंगे कि क्या बाजार का आतंकवाद से किसी तरह का क्या कोई अप्रत्यक्ष संबंध है जो अमेरिका की तर्ज पर यहां भी मोमबतियां जलाने के साथ एस.एम.एस. संदेशों की तैयारी हो रही है। अलबत्ता अंतर्जाल पर अनेक वेबसाईटों और ब्लाग पर इस तरह के सवाल उठने लगे हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि बाजार का अब वैश्वीकरण हो गया है इसलिये उसके लिये देश की कोई सीमा तो हो नहीं सकती पर वह भक्ति रस बेचने के लिये देशभक्ति का शगुफा छोड़ने से बाज नहीं आयेगा। जहां तक संवेदनाओं के मानवीय गुण होने का सवाल है तो क्या बाजार इस बात की गारंटी दे रहा है कि वह मुफ्त में मोमबत्त्यिां बंटवायेगा या एस. एम. एस. करवायेगा। यकीनन नहीं!<br />
एक बाद दूसरी भी है कि इधर मुंबई के हमलावारों के बारे में अनेक जानकारी इन्हीं प्रचार माध्यमों में छपी हैं। योजनाकर्ताओं के मुंबईया फिल्म हस्तियों से संबंधों की बात तो सभी जानते हैं।  इतना ही नहीं उनके भारतीय बैंकों में खातों की भी चर्चा होती है। पहले भी अनेक आतंकवादियों के भारत की कंपनियों में विनिवेश की चर्चा होती रही है।  फिल्मों में भी ऐसे अपराधियों का धन लगने की बात इन्हीं प्रचार माध्यमों में चलती  रही है जो आतंकवाद को प्रायोजित करते  हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि इस देश के पैसे से ही आतंकवादी अपना  तंत्र चला रहे हैं।  एक बात तय रही है कि यह अपराधी या आतंकवादी कहीं पैसा लगाते हैं तो फिर चुप नहीं बैठते होंगे बल्कि उन संगठनों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अपना नियंत्रण रखते होंगे  जिनमें उनका पैसा लगा है। मतलब सीधा है कि बाजार के कारनामों में में उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका हो सकती है पर शायद बाजार के प्रबंधक इसका आभास नहीं कर पाते।  सच तो हम नहीं जानते पर इधर उधर देखी सुनी खबरों से यह आभास किसी को भी हो सकता है। ऐसे में आतंकवाद की घटनाओं में बाजार का रवैया उस हर आम आदमी को सोचने को मजबूर कर सकता है जो फालतु चिंतन में लगे रहते हैं।  वैसे पता नहीं आतंकवादी घटनाओं को लोग सामान्य अपराध शास्त्र से पृथक होकर क्यों देखते हैं क्योंकि उसका एक ही सिद्धांत है कि जड़ (धन), जोरु  (स्त्री) तथा जमीन के लिये ही  अपराध होता है। आतंकवादी घटनाओं के बाद अगर यह देखा जाये कि किसको क्या फायदा हुआ है तो फिर संभव है कि अनेक प्रकार के ऐसे समूहों पर संदेह जाये जिनका ऐसी घटनाओं से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं होता? हालांकि इस विचार से  भाषा, जाति, तथा धर्म तथा क्षेत्र के नाम पर होने वाली  आतंकवादी घटनाओं की विवेचना भी भटक सकती है क्योंकि बाजार में सभी सौदागर ऐसे नहीं कि वह आतंकवाद को धन से प्रश्रय दें अलबत्ता वह लोगों में करुण रस को दोहने इसलिये करते हैं क्योंकि यह उनका काम है? बहरहाल प्रस्तुत है इस पर कुछ काव्यात्मक पंक्तियां-<br />
<b>सज रहा है<br />
देश का बाजार रस से।<br />
कुछ देर आंसु बहाना<br />
दिल में हो या न हो<br />
पर संवेदना बाहर जरूर बरसे।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;<br />
कभी कभी त्यौहार पर<br />
जश्न की होती थी तैयारी।<br />
अब विलाप पर भी सजने लगा है बाजार<br />
सभी ने भर ली है जेब<br />
उसे करुण रस में बहाकर निकालने की<br />
आयी अब सौदागरों की बारी।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
तारीखों में इतने भयंकर मंजर देखे हैं<br />
कि दर्द का कुंआ सूख गया है।<br />
इतना खून बहा देख है इन आंखों ने कि<br />
आंसुओं की नयी धारा  बहाये<br />
वह हिमालय अब नहीं रहा,<br />
देशभक्ति के जज़्बात<br />
हर रोज दिखाओ<br />
यह भी किसने कहा,<br />
जो दुनियां छोड़ गये<br />
उनकी क्या चिंता करना<br />
जिंदा लोगों का भी हो गया रोज मरना<br />
ऐ सौदागरों,<br />
करुण रस में मत डुबोना पूरा यह ज़माना,<br />
इस दिल को तुमने ही आदत डाली है<br />
और अधिक प्यार मांगने की<br />
क्योंकि तुम्हें था अधिक कमाना,<br />
अब हालत यह है इस दिल की<br />
प्यार क्या मांगेगा<br />
नफरत करने से भी रूठ गया है।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर<br />
http://anantraj.blogspot.com</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मातृभक्त पति पसंद नहीं-हास्य व्यंग्य (matrubhakt pati pasand nahin-hasya vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/12/vandematram-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 15:30:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/12/vandematram-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[अधिकतर लड़कियां अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती। यह पता अब जाकर इस आधुनिक समा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अधिकतर लड़कियां  अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती।  यह पता अब जाकर इस आधुनिक समाज को चला है।  सच कहें तो सदियों से पेट में दबी बात अब जुबान में आयी है वरना तो कौन इसे मानता?  आधुनिक संचार माध्यमों में तमाम बुराईयां हो सकती हैं पर उससे ऐसे सच सामने भी आने लगे हैं जिन पर समाज जानबूझकर पर्दा डालता आया है।  अपने घर का सच बताने में हर पुरुष शर्माता है।  चार लोगों के बीच वह यह साबित करता है कि उसका अपने घर पर पूरा नियंत्रण है।  अगर कोई गलती से कह दे कि ‘मेरी घर में नहीं सुनी जाती है तो सुनने वाले उसकी मजाक उड़ायेंगे।<br />
इसके विपरीत चार औरतें आपस में मिलेंगी तो अपने परिवार के दोष गिनाने में नहीं चूकेंगी।  सासें एकत्रित हुईं तो बहुओं और अगर बहुऐं मिली तो सासों की शिकायत करती हैं।<br />
कोई कोई तो कहते भी नहीं झिझकती कि ‘हमारे पति तो अपनी मां के चमचे हैं।’<br />
कोई मां भी कह जाती है कि ‘मेरा लड़का तो जोरु का गुलाम है।<br />
मान लीजिये ऐसे वार्तालाप में कोई पुरुष दूसरे की निंदा सुन रहा हो तो वह भी ऐसा जाल में फंसता है कि चर्चा किये जाने वाले पुरुष को वैसा ही समझ  लेता है।  अगर औरत के साथ पुरुष का रक्त संबंध हुआ तो वह उस पुरुष के बारे में प्रतिकूल टिप्पणी भी कर जाता है-‘कैसा आदमी है? क्या उसे घर चलाने की अक्ल नहीं है, लगता है बाप ने कुछ सिखाया ही नहीं है।’<br />
एक औरत मां, पत्नी, बहिन सास तथा दादी तथा अन्य रिश्तों में पुरुष का साथ निभाती है तो पुरुष भी पुत्र, पति, ससुर  तथा भाई के रूप में निभाता है।  कहने का तात्पर्य यही है कि स्त्री पुरुष के संबंध उसके रिश्तों के अनुसार बनते और बिगड़ते हैं।  जब कहीं स्त्री पुरुष के आपसी रिश्ते बिगड़ते हैं तो रक्त संबंधों के अनुसार हर कोई किसी का पक्ष भी लेता है।  कहते हैं कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य कोई नहीं जानता पर यह फार्मूला पुरुष पर भी समान रूप से लागू है।<br />
सफल पुरुष वही है जो स्त्रियों के आपसी संबंधों में बस हां हु ही कहता रहे।<br />
कई बार पत्नी ताना देती है कि ‘जाओ, अपनी मां की बात सुनो। मेरी सुनते ही कहां हो?’<br />
उसके तत्काल बाद मां की भी ताना मिल सकता है कि ‘जा जोरु के गुलाम! तेरी बात पर अब मेरा भरोसा नहीं रहा।’<br />
एक दिन हम एक सेठजी की दुकान पर खड़े थे।  उनका एक मित्र आया और बोला-‘तुझे कल सामान खरीदने बाहर चलना है कि नहीं। इतनी देर से दुकान पर न बताने आया और न ही नौकर के हाथ से संदेश भेजा।’<br />
सेठजी ने कहा-‘यार, घर पर एक काम है। देखना पड़ेगा कि चल पाऊंगा कि नहीं।’<br />
उस समय फोन की सुविधा ऐसी नहीं थी जैसी आज है।  वह आदमी बोला-‘सीधा कह न! बीबी से पूछे बिना कोई काम नहीं कर सकता।’<br />
सेठजी ने भी सरल भाव से कहा-‘तुम क्या बीबी से बिना पूछे चल रहे हो।  परसों जब मैंने चलने को कहा था तो क्यों नहीं चला? तेरा नौकर बता रहा था कि घर से मना कर दिया है। अब तुम मेरे को अपनी सफाई मत देना।’<br />
वह आदमी हंस कर चला गया। उसके जाने के बाद सेठजी हमसे बोले-‘एक बात कहूं।  बाहर आदमी कितना भी शेर बनता हो पर घर में होते सभी भीगी बिल्ली हैं। यह अलग बात है कि कोई इस बात को मानता है कि नहीं।’<br />
औरत अगर बहु है तो वह चाहती है कि पति अपनी मां यानि उसकी सास से पहले उसकी बात सुने। अगर मां है तो वह चाहती है कि इतने बरसों से जिस लड़के को पाला है वह मेरी बात सुने।’<br />
फिर इस पर बहने और अन्य रिश्ते भी होते हैं।  बहिन सोचती है कि भाई अपनी साली से अधिक हमें तवज्जो दे।  साली है तो वह चाहती है कि जीजाजी हमें अपनी बहिन से अधिक सम्मान दें।<br />
हमारे यहां समाज पुरुष प्रधान इसलिये है क्योंकि अभी भी अधिकतर प्रत्यक्ष आय का भार उस पर है-याद रहे अमेरिकी विशेषज्ञ कहते हैं कि सामान्य भारतीय गृहिणियां अपनी पति से अधिक आय करती हैं यानि वह इतना काम करती हैं कि अगर उनका रुपये में मूल्यांकन हो तो पति से अधिक आय उनकी होना चाहिये। इस प्रत्यक्ष आय के कारण उसका प्रभाव घर पर रहता है पर दूसरी समस्या उसके साथ यह है कि वह हमेशा घर से बाहर ही होता है।  दिन में घर पर क्या हुआ? किसने क्या कहा? उसे पता तब चलता है जब वह शाम को घर वापस आता है।  हर कोई अपने हिसाब से अपनी बात उसे सुनाता है।  ऐसे मेें उसकी थकान और तनाव बढ़ जाता है।  यह घर घर की कहानी है। इस पर हंसने जैसी कोई बात नहीं है।  यदि इन बातों पर आप हंसते हैं तो इसका आशय यह है कि अभी आपका विवाह नहीं हुआ या फिर आप हमसे क्या अपने आपसे अपना सच छिपा रहे हैं।<br />
अब सवाल है कि लड़कियां ही ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है तो फिर उसके जीवन साथी से आप क्या कहेंगे? मां की बात सुन क्योंकि पुरुष तो तू है। इधर दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा के भी कानून बना रखे हैं तब आदमी पर एक दबाव तो रहता ही है। एक अजीब संयोग है कि इस समय वंदेमातरम को लेकर तमाम तरह की चर्चा है ऐसे में ही एक टीवी चैनल से यह संदेश निकला कि ‘लड़कियां ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है।’ इन्हीं लड़कियों में ही भविष्य की मातायें हैं और कभी वंदेमातरम शब्द सुनकर उनको भी खुशी होगी पर अभी उनके लिये इसका क्या मतलब? ऐसे में अगर कोई लड़का अगर पसंद होने और करने  के लिये-आजकल दोनों की मर्जी चलती है- किसी लड़की से मिलने गया और जाते ही बोला दिया ‘वंदेमातरम’, तब वह तो पहली नजर में ही अस्वीकृत कर दिया जायेगा। हमने टीवी चैनल के उस कार्यक्रम के कुछ हिस्से कभी कभी देखे हैं और उसमें लड़कियों की लड़कों की माताओं पर टिप्पणियां भी सुनी है तब यह सोचते हैं कि समाज ने बहुत समय से कई बातें दबा कर रखी हैं जो सामने आ रही हैं।<br />
हमारे एक सेठ जी कहते थे कि सफल पुरुष वही है जो औरतों की विवाद में बस हां हु करता रहे।  जिस आदमी ने सोचा कि मैं कोई फैसला कर शांति करवाऊं वह अपने घर के साथ ही अपने दिल की भी शांति ऐसे दांव पर लगा देगा कि काम पर भी उसका मन नहीं लगेगा।’<br />
बहरहाल स्त्री और पुरुष के आपसी संबंधों के साथ ही स्त्रियों के आपसी रिश्ते भी होते हैं और उनके बीच जब पुरुष फंसता है और बात ऊंच नीच हुई तो पुरुष का ही नाम खराब होता है क्योंकि नाम उसके घर पर ही चलता है।  इस विषय पर एक विद्वान का कथन याद आ रहा है।  जब यह निर्णय किया गया कि स्कूल में प्रवेश के समय पिता के नाम की अनिवार्यता नहीं होगी और मां भी अपना नाम वहां लिखा सकती है।  तब उन विद्वान ने कहा था कि ‘पुरुष का तो बस एक नाम ही था वरना तो घर तो चलाती स्त्रियां ही हैं।  अब वह नाम भी पुरुष के हाथ से गया।’<br />
कहने का तात्पर्य यही है कि इस संसार में किसी रिश्ते को समझना और उस बयान करना ही गलती है।  हालात, समय और स्वार्थ अपने हिसाब से संबंध बदलते रहते हैं।</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर<br />
http://anantraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सम्मेलन पर झगड़ा-हास्य व्यंग्य (hindi sammelan-hasya vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/11/hindi-sammelan-hindi-commedy-satire/</link>
<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 14:58:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/11/hindi-sammelan-hindi-commedy-satire/</guid>
<description><![CDATA[ब्लागर उस समय सो रहा था कि चेले ने आकर उसके हाथ हिलाकर जगाया। ब्लागर ने आखें खोली तो चेले ने कहा-‘सा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>ब्लागर उस समय सो रहा था कि चेले ने आकर उसके हाथ हिलाकर जगाया। ब्लागर ने आखें खोली तो चेले ने कहा-‘साहब, बाहर कोई आया है। कह रहा है कि मैं ब्लागर हूं।’<br />
ब्लागर एकदम उठ बैठा और बोला-‘जाकर बोल दे कि गुरुजी घर पर नहीं है।’<br />
चेले ने कहा-’साहब, मैंने कहा था। तब उसने पूछा ‘तुम कौन हो’ तो मैंने बताया कि ‘मैं उनका शिष्य हूं। ब्लाग लिखना सीखने आया हूं’। तब वह बोला ‘तब तो वह यकीनन अंदर है और तुम झूठ बोल रहे हो, क्योंकि उसने सबसे पहले तो तुम्हें पहली शिक्षा यही दी होगी कि आनलाईन भले ही रहो पर ईमेल सैटिंग इस तरह कर दो कि आफलाईन लगो। जाकर उससे कहो कि तुम्हारा पुराना जानपहचान वाला आया है। और हां, यह मत कहना कि ब्लागर दोस्त आया है।’</p>
<p>ब्लागर बोला-‘अच्छा ले आ उसे।’<br />
शिष्य बोला-‘आप&#160;&#160; निकर छोड़कर&#160;पेंट&#160; पहन लो। वरना क्या कहेगा।’<br />
ब्लागर ने कहा-‘ क्या कहेगा ? वह कोई ब्लागर शाह है। खुद भी अपने घर पर इसी तरह तौलिया&#160;पहने &#160;कई बार मिलता है। मैं तो फिर भी आधुनिक&#160;प्रकार&#160;की &#160;नेकर&#160;पहने&#160;रहता&#160;&#160;हूं, जिसे पहनकर लोग सुबह मोर्निंग वाक् पर जाते हैं।’<br />
इधर दूसरे ब्लागर ने अंदर प्रवेश करते ही कहा-‘यह शिष्य कहां से ले आये? और यह ब्लागिंग में सिखाने लायक है क्या? बिचारे से मुफ्त में सेवायें ले रहे हो?’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘अरे, यह तो दोपहर ऐसे ही सीखने आ जाता है। मैं तुम्हारी तरह लोगों से फीस न लेता न सेवायें कराता हूं। बताओ कैसे आना हुआ।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कंप्यूटर की तरफ देखते हुए पूछा-‘यह तुम्हारा कंप्यूटर क्यों बंद है? आज कुछ लिख नहीं रहे। हां, भई लिखने के विषय बचे ही कहां होंगे? यह हास्य कवितायें भी कहां तक चलेंगी? चलो उठो, मैं तुम्हारे लिखने के लिये एक जोरदार समाचार लाया हूं। ब्लागर सम्मेलन का समाचार है इसे छाप देना।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम खुद क्यों नहीं छाप देते। तुम्हें पता है कि ऐसे विषयों पर मैं नहीं लिखता।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘अरे, यार मैं अपने काम में इतना व्यस्त रहता हूं कि घर पर बैठ नहीं पाता। इसलिये कंप्यूटर बेच दिया और इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा दिया। अब अपने एक दोस्त के यहां बैठकर कभी कभी ब्लाग लिख लेता हूं।’<br />
पहले ब्लागर ने घूरकर पूछा-‘ब्लाग लिखता हूं से क्या मतलब? कहो न कि अभद्र टिप्पणियां लिखने के खतरे हैं इसलिये दोस्त के यहां बैठकर करता हूं। तुमने आज तक क्या लिखा है, पता नहीं क्या?’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘क्या बात करते हो? आज इतना बड़ा सम्मेलन कराकर आया हूं। इसकी रिपोर्ट लिखना है।’<br />
पहले ब्लागर ने इंकार किया तो उसका शिष्य बीच में बोल पड़ा-‘गुरुजी! आप मेरे ब्लाग पर लिख दो।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘अच्छा तो चेले का ब्लाग भी बना दिया! चलो अच्छा है! तब तो  संभालो यह पैन ड्ाईव और कंप्यूटर खोलो उसमें सेव करो।’<br />
शिष्य ने अपने हाथ में पैन ड्राईव लिया और कंप्यूटर खोला।<br />
पहले ब्लागर ने पूछा-‘यह फोटो कौनसे हैं?<br />
दूसरे ब्लागर ने एक लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा‘-जब तक यह इसके फोटो सेव करे तब तक तुम उसको देखो।<br />
ब्लागर ने फोटो को एक एक कर देखना शुरु किया। एक फोटो देखकर उसने कहा-‘यह फोटो कहीं देखा लगता है। तुम्हारा जब सम्मान हुआ था तब तुमने भाषण किया था। शायद&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.’<br />
दूसरे ब्लागर ने बीच में टोकते हुए कहा-‘शायद क्या? वही है।’<br />
दूसरा फोटो देखकर ब्लागर ने कहा-‘यह चाय के ढाबे का फोटो। अरे यह तो उस दिन का है जब मेरे हाथ से नाम के लिये ही उद्घाटन कराकर मुझसे खुद और अपने चेलों के लिये चाय नाश्ते के पैसे खर्च करवाये थे। मेरा फोटो नहीं है पर तुम्हारे चमचों का&#8230;&#8230;.’’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘अब मैं तुम्हारे इस चेले को भी चमचा कहूं तो तुम्हें बुरा लगेगा न! इतनी समझ तुम में नहीं कि ब्लागिंग कोई आसान नहीं है। जितना यह माध्यम शक्तिशाली है उतना कठिन है। लिखना आसान है, पर ब्लागिंग तकनीकी एक दिन में नहीं सीखी जा सकती। इसके लिये किसी ब्लागर गुरु का होना जरूरी है। सो किसी को तो यह जिम्मा उठाना ही है। तुम्हारी तरह थोड़े ही अपने चेले को घर बुलाकर सेवा कराओ। अरे ब्लागिंग सिखाना भी पुण्य का काम है। तुम तो बस अपनी हास्य कवितायें चिपकाने को ही ब्लागिंेग कहते हो।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, यह तो है! यह तीसरा फोटो तो आइस्क्रीम वाले के पास खड़े होकर तुम्हारा और चेलों का आईस्क्रीम खाने का है। यह आईसक्रीम वाला तो उस दिन मेरे सामने रास्ते पर तुमसे पुराना उधार मांग रहा था। तब तुमने मुझे आईसक्रीम खिलाकर दोनों के पैसे दिलवाकर अपनी जान बचाई थी।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘मेरे फोटो वापस करो।’<br />
पहले ब्लागर ने सभी फोटो देखकर उसे वापस करते हुए कहा-‘यार, पर इसमें सभी जगह मंच के फोटो हैं जिसमें तुम्हारे जान पहचान के लोग बैठे हैं। क्या घरपर बैठकर खिंचवायी है या किसी कालिज या स्कूल पहुंच गये थे। सामने बैठे श्रोताओं और दर्शकों का कोई फोटो नहीं दिख रहा।’<br />
दूसरे ब्लागर ने पूछा-‘तुम किसी ब्लागर सम्मेलन में गये हो?’<br />
पहले ब्लागर ने सिर हिलाया-‘नहीं।’<br />
दूसरा ब्लागर-‘तुम्हें मालुम होना चाहिये कि ब्लागर सम्मेलन में सिर्फ ब्लागर की ही फोटो खिंचती हैं। वहां कोई व्यवसायिक फोटोग्राफर तो होता नहीं है। अपने मोबाइल से जितने और जैसे फोटो खींच सकते हैं उतने ही लेते हैं। ज्यादा से क्या करना?<br />
पहला ब्लागर-हां, वह तो ठीक है! ब्लागर सम्मेलन में आम लोग कहां आते हैं। अगर वह हुआ ही न हो तो?<br />
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया-‘लाओ! मेरे फोटो और पैन ड्राइव वापस करो। तुमसे यह काम नहीं बनने का है। तुम तो लिख दोगे ‘ न हुए ब्लागर सम्मेलन की रिपोर्ट’।<br />
पहला ब्लागर ने कहा-‘क्या मुझे पागल समझते हो। हालांकि तुम्हारे कुछ दोस्त कमेंट में लिख जाते हैं ईडियट! मगर वह खुद हैं! मैं तो लिखूंगा ‘छद्म सम्मेलन की रिपोर्ट!’<br />
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया उसने कंप्यूटर में से खुद ही पेनड्राइव निकाल दिया और जाने लगा।<br />
फिर रुका और बोला-‘पर इस ब्लागर मीट पर रिपोर्ट जरूर लिखना। हां, इस ब्लागर सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना। तुम जानते नहीं इंटरनेट लेखकों के सम्मेलन और चर्चाऐं कैसे होती हैं? इंटरनेट पर अपने बायोडाटा से एक आदमी ने अट्ठारह लड़कियों को शादी कर बेवकूफ बनाया। एक आदमी ने ढेर सारे लोगों को करोड़ों का चूना लगाया। इस प्रकार के समाचार पढ़ते हुए तुम्हें हर चीज धोखा लगती है। इसलिये तुम्हें समझाना मुश्किल है। कभी कोई सम्मेलन किया हो तो जानते। इंटरनेट पर कैसे सम्मेलन होते हैं और उनकी रिपोर्ट कैसे बनती है, यह पहले हमसे सीखो। सम्मेलन करो तो जानो।’<br />
पहले ब्लागर ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा-ऐसे सम्मेलन कैसे कराऊं जो होते ही नहीं।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘होते हैं, करना हमसे सीख लो।’<br />
वह चला गया तो पहला ब्लागर सामान्य हुआ। उसने शिष्य से कहा-‘अरे, यार कम से कम उसके फोटो तो कंप्यूटर में लेना चाहिये थे।’<br />
शिष्य ने कहा-‘ गुरुजी फोटो तो मैंने फटाफट पेनड्राइव से अपने कंप्यूटर से ले लिये।’<br />
पहला ब्लागर कंप्यूटर पर बैठा और लिखने लगा। शिष्य ने पूछा’क्या लिख रहे हैं।<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘जो उसने कहा था।’<br />
शिष्य ने पूछा-‘यही न कि इस मुलाकात की बात लिख देना।’<br />
ब्लागर ने जवाब दिया‘नहीं! उसने कहा था कि ‘इस सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना’।’’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
<b>नोट-यह व्यंग्य पूरी तरह से काल्पनिक है। किसी घटना या सम्मेलन का इससे कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो यह एक संयोग होगा। इसका लेखक किसी दूसरे ब्लागर से ब्लागर से मिला तक नहीं है। </b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रजातंत्र में ब्लॉग की महत्वपूर्ण भूमिका-हिंदी लेख (democracy and hindi blog-hindi article)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/04/loktantra-aur-blog/</link>
<pubDate>Wed, 04 Nov 2009 15:47:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/04/loktantra-aur-blog/</guid>
<description><![CDATA[भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इसे साढ़े बारह करोड़ बताते हैं। इन प्रयोक्ताओं को यह अनुमान नहीं है कि उनके पास एक बहुत बड़ा अस्त्र है जो उनके पास अपने अनुसार समाज बनाने और चलाने की शक्ति प्रदान करता है-बशर्ते उसके उपयोग में संयम, सतर्कता और चतुरता बरती जाये, अन्यथा ऐसे लोगों को इस पर नियंत्रण करने का अवसर मिल जायेगा जो समाज को गुलाम की तरह चलाने के आदी हैं।</p>
<p>यह इंटरनेट न केवल दृश्य, पठन सामग्री तथा समाचार प्राप्त करने के लिये है बल्कि हमें अपने फोटो, लेखन सामग्री तथा समाचार संप्रेक्षण की सुविधा भी प्रदान करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम केवल प्रयोक्ता नहीं निर्माता और रचयिता भी बन सकते हैं। अनेक वेबसाईट-जिनमें ब्लागस्पाट तथा वर्डप्रेस मुख्य रूप से शामिल हैं- ब्लाग की सुविधा प्रदान करती हैं। अधिकतर सामान्य प्रयोक्ता सोचते होंगे कि हम न तो लेखक हैं न ही फोटोग्राफर फिर इन ब्लाग की सुविधा का लाभ कैसे उठायें? यह सही है कि अधिकतर साहित्य बुद्धिजीवी लेखकों द्वारा लिखा जाता है पर यह पुराने जमाने की बात है। फिर याद करिये जब हमारे बुजुर्ग इतना पढ़े लिखे नहीं थे तब भी आपस में चिट्ठी के द्वारा पत्राचार करते थे। आप भी अपनी बात इन ब्लाग पर बिना किसी संबंोधन के एक चिट्ठी के रूप में लिखने का प्रयास करिये। अपने संदेश और विचारों को काव्यात्मक रूप देने का प्रयास हर हिंदी नौजवान करता है। इधर उधर शायरी या कवितायें लिखवाकर अपनी मित्र मंडली में प्रभाव जमाने के लिये अनेक युवक युवतियां प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं कई बार अपने ज्ञान की अभिव्यक्ति के लिये तमाम तरह के किस्से भी गढ़ते हैं। यह प्रयास अगर वह ब्लाग पर करें तो यह केवल उनकी अभिव्यक्ति को सार्वजनिक रूप ही नहीं प्रदान करेगा बल्कि समाज को ऐसी ताकत प्रदान करेगा जिसकी कल्पना वह नहीं कर सकते। </p>
<p>आप फिल्म, क्रिकेट,साहित्य,समाज,उद्योग व्यापार, पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनल तथा उन अन्य क्षेत्रों को देखियें जिससे बड़े वर्ग द्वारा छोटे वर्ग पर प्रभाव डाला जा सकता है वहां पर कुछ निश्चित परिवारों या गुटों का नियंत्रण है। यहां प्रभावी लोग जानते हैं कि यह सभी प्रचार साधन उनके पास ऐसी शक्ति है जिससे वह आम लोगों को अपने हितों के अनुसार संदेश देख और सुनाकर उनको अपने अनुकूल बनाये रख सकते हैं। क्रिकेट में आप देखें तो अनेक वर्षों तक एक खिलाड़ी इसलिये खेलता&#160; है क्योंकि उसे पीछे खड़े आर्थिक शिखर पुरुष उसका व्यवसायिक उपयोग करना चाहते हैं। फिल्म में आप देखें तो अब घोर परिवारवाद आ गया है। सामान्य युवकों के लिये केवल एक्स्ट्रा में काम करने की जगह है नायक के रूप में नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक तथा प्रचार के शिखरों पर जड़ता है। आप पत्र पत्रिकाओं में अगर लेख पढ़ें तो पायेंगे कि उसमें या तो अंग्रेजी के पुराने लेखक लिख रहे हैं या जिनको किसी अन्य कारण से प्रतिष्ठा मिली है इसलिये उनके लेखन को प्रकाशित किया जा रहा है। पिछले पचास वर्षों में कोई बड़ा आम लेखक नहीं आ पाया। यह केवल इसलिये कि समाज में भी जड़ता है। याद रखिये जब राजशाही थी तब यह कहा जाता था कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’, पर लोकतंत्र में ठीक इसका उल्टा है। इसलिये इस जड़ता के लिये सभी आम लोग जिम्मेदार हैं पर वह शिखर पर बैठे लोगों को दोष देकर अपनी असमर्थता जाहिर करते हैं कि ‘क्या किया जा सकता है।’</p>
<p>इस इंटरनेट पर जरा गौर करें। अक्सर आप लोग देखते होंगे कि समाचार पत्र पत्रिकाओं में में उसकी चर्चा होती है। आप सुनकर आश्चर्य करेंगे कि इनमें से कई ऐसे आलेख होते हैं जिनको इंटरनेट पर ब्लाग से लिया जाता है-जब किसी का नाम न दिखें तो समझ लें कि वह कहीं न कहीं इंटरनेट से लिया गया है। यह सब इसलिये हो रहा है क्योंकि अधिकतर इंटरनेट प्रयोक्ता केवल फोटो देखने या अपने पढ़ने के लिये बेकार की सामग्री पढ़ने में व्यस्त हैं। उनकी तरफ से हिंदी भाषी लेखकों के लिये प्रोत्साहन जैसा कोई भाव नहीं है। ऐसा कर आप न अपना समय जाया कर रहे हैं बल्कि अपने समाज को जड़ता से चेतन की ओर ले जाने का अवसर भी गंवा रहे हैं। वह वर्ग जो समाज को गुलाम बनाये रखना चाहता है कि फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों के फोटो देखकर आप अपना समय नष्ट करें क्योंकि वह तो उनके द्वारा ही तय किये मुखौटे हैं। आपके सामने टीवी और समाचार पत्रों में भी वही आ रहा है जो उस वर्ग की चाहत है। ऐसे में आपकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं था तो झेल लिये। अब इंटरनेट पर ब्लाग और ट्विटर के जरिये आप अपना संदेश कहीं भी दे सकते हैं। इस पर अपनी सक्रियता बढ़ाईये। जहां तक इस लेखक का अनुभव है कि एक एस. एम. एस लिखने से कम मेहनत यहां पचास अक्षरों का एक पाठ लिखने में होती है। जहां तक हो सके हिंदी में लिखे गये ब्लाग और वेबसाईट को ढूंढिये। स्वयं भी ब्लाग बनाईये। भले ही उसमें पचास शब्द हों। लिखें भले ही एक माह में एक बार। अगर आप समाज के सामान्य आदमी है तो बर्हिमुखी होकर अपनी अभिव्यक्ति दीजिये। वरना तो समाज का खास वर्ग आपके सामने मनोरंजन के नाम पर कार्यक्रम प्रस्तुत कर आपको अंतर्मुखी बना रहा है ताकि आप अपनी जेब ढीली करते रहें। आप किसी से एस. एम. एस. पर बात करने की बजाय अपने ब्लाग पर बात करें वह भी हिंदी में। ऐसे टूल उपलब्ध हैं कि आप रोमन में लिखें तो हिंदी हो जाये और हिंदी में लिखें तो यूनिकोड में परिवर्तित होकर प्रस्तुत किये जा सकें।<br />
याद रखें इस पर अपनी अभिव्यक्ति वैसी उग्र या गालीगलौच वाली न बनायें जैसी आपसी बातचीत में करते हैं। ऐसा करने का मतलब होगा कि उस खास वर्ग को इस आड़ में अपने पर नियंत्रण करने का अवसर देना जो स्वयं चाहे कितनी भी बदतमीजी कर ले पर समाज को तमीज सिखाने के लिये हमेशा नियंत्रण की बात करते हुए धमकाता है।<br />
<span style="color:blue;">प्रसंगवश यहां यह भी बता दें कि यह ब्लाग भी पत्रकारिता के साथ ही चौथा स्तंभ है पांचवां नहीं जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं। सीधी सी बात है कि विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका और पत्रकारिता चार स्तंभ हैं। इनमें सभी में फूल लगे हैं। विधायिका में अगर हम देखें तो संसद, विधानसभा, नगर परिषदें और ग्राम पंचायतें आती हैं। कार्यपालिका में मंत्री, संतरी,अधिकारी और लिपिक आते हैं। न्याय पालिका के विस्तारित  रूप को देखें तो उसमें भी माननीय न्यायाधीश, अधिवक्ता, वादी और प्रतिवादी  होते हैं। उसी तरह पत्रकारिता में भी समाचार पत्र, पत्रिकायें, टीवी चैनल और ब्लाग- जिसको हम जन अंतर्जाल पत्रिका भी कह सकते हैं- आते हैं। इसे लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ केवल अभिव्यक्ति के इस जन संसाधन का महत्व कम करने के लिये प्रचारित किया जा रहा है ताकि इस पर लिखने वाले अपने महत्व का दावा न करे।<br />
</span><br />
कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी के ब्लाग जगत में आपकी सक्रियता ही इंटरनेट या अंतर्जाल पर आपको प्रयोक्ता के साथ रचयिता बनायेगी। जब ब्लाग आम जन के जीवन का हिस्सा हो जायेगा तक अब सभी क्षेत्रों में बैठे शिखर पुरुषों का हलचल देखिये। अभी तक वह इसी भरोसे हैं कि आम आदमी की अभिव्यक्ति का निर्धारण करने वाला प्रचारतंत्र उनके नियंत्रण में इसलिये चाहे जैसे अपने पक्ष में मोड़ लेंगे। हालांकि अभी हिंदी ब्लाग जगत अधिक अच्छी हालत में नहीं है- इसका कारण भी समाज की उपेक्षा ही है-तब भी अनेक लोग इस पर आंखें लगाये बैठे हैं कि कहीं यह माध्यम शक्तिशाली तो नहीं हो रहा। इसलिये पांचवां स्तंभ या रचनाकर्म के लिये अनावश्यक बताकर इसकी उपेक्षा न केवल स्वयं कर रहे हैं बल्कि समाज में भी इसकी चर्चा इस तरह कर रहे हैं कि जैसे इसको बड़े लोग-जैसे अभिनेता और प्रतिष्ठत लेखक-ही बना सकते हैं। जबकि हकीकत यह है कि अनेक ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपने रोजगार से जुड़े काम से आने के बाद यहां इस आशा के साथ यहां लिखते हैं कि आज नहीं तो कल यह समाज में जनजन का हिस्सा बनेगा तब वह भी आम लोगों के साथ इस समाज को एक नयी दिशा में ले जाने का प्रयास करेंगे। इसलिये जिन इंटरनेट प्रयोक्ताओं की नजर में यह आलेख पड़े वह इस बात का प्रचार अपने लोगों से अवश्य करें। याद रखें यह लेख उस सामान्य लेखक है जो लेखन क्षेत्र में कभी उचित स्थान न मिल पाने के कारण यह लिखने आया है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com</b><br />
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<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[दूसरी किताब-हास्य व्यंग्य  (doosri kitab- hindi hasya vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/26/second-book-hindo-comedy-satire/</link>
<pubDate>Mon, 26 Oct 2009 16:25:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/26/second-book-hindo-comedy-satire/</guid>
<description><![CDATA[बुद्धिजीवियों का सम्मेलन हो रहा था। अनेक प्रकार के बुद्धिजीवियों को उसमें आमंत्रण दिया गया। यह सम्मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>बुद्धिजीवियों का सम्मेलन हो रहा था।  अनेक प्रकार के बुद्धिजीवियों को उसमें आमंत्रण दिया गया।  यह सम्मेलन एक ऐसे बुद्धिजीवी की देखरेख में हो रहा था जिन्होंने तमाम तरह की किताबें लिखी और जिनको अकादमिक संगठनों के पुस्तकालय खरीदकर अपने यहां सजाते रहे।  आम लोग उनका नाम समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी के माध्यम से जानते थे कि कोई ऐसे लेखक हैं जो लिखते हैं।  इस सम्मेलन के आयोजन के लिये एक प्रकाशन संस्थान ने उनके प्रेरित किया जो अब ऐसे लेखक ढूंढ रहा था जिनको अपने बुद्धिजीवी होने का भ्रम हो और वह किताब छपवायें।<br />
प्रकाशक ने उस बुद्धिजीवी से कहा-‘कोई नये बकरे लाओ तो हम आपका कविता संग्रह बिना पैसे लिये  छाप देते हैं।’<br />
उस बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूं। अब ऐसे बकरे नहीं मिलते जो छपास के लिये किताबें छपवायें।’<br />
प्रकाशक ने कहा-‘ठीक है! कोई दूसरा आदमी ढूंढता हूं।  हमें प्रकाशन के लिये ऐसे बकरे चाहिये जो आप जैसे बुद्धिजीवियों की महफिलों में भेड़ की तरह हांक कर लाये जाते हैं।’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘ठीक है! तुम कहते हो तो कोशिश करता हूं।’<br />
उसने अपने चेले चपाटों को बुलाया। एक चेले ने कहा-‘महाराज, हमारे झांसे में अब ऐसे भेड़नुमा लेखक कहां आयेंगे जिनको बकरा बनाकर उस प्रकाशक के पास ले जायें।’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘लानत! सारी शिक्षा बेकार गयी।  इतने वर्ष से क्या मेरे यहां झक मार रहे थे। अरे, कोई सम्मेलन करो।  इतने सारे लोग छद्म श्री, और अहम भूषण सम्मानों के लिये फिर रहे हैं।  उनको अपने वाक्जाल में फंसाकर लाओ।’</p>
<p>चेले अपने अभियान पर निकल पड़े।  एक महाबुद्धिजीवी सम्मेलन का आयोजन किया।  कुल जमा पहुंचे आठ लोग-जिनमें अधिकतर नये नये बुद्धिजीवी बने थे जिनको अपने बहुत बड़े लेखक होने का गुमान था। सम्मेलन संपन्न हो गया।  फोटो वगैरह भी खींच लिये गये।  बुद्धिजीवी के साथ उसके पच्चीस  चेले पांच पांच के समूह में बारी बारी से  ही  मंच पर विराजमान होते रहे।   एक एक कर बाहर ने आये नये  बुद्धिजीवियों को परिचय देने के लिये मंच पर बुलाया गया था।  बाद में उनको नीचे धकिया दिया जाता था। एक नये बुद्धिजीवी लेखक ने कहा-‘भई, हमें भी कुछ बोलने दो।’<br />
मंच पर उन महान बुद्धिजीवी ने अपने चेले को देखा तो वह उस पर बरस पड़ा-‘अबे, तेरी किताबें छपी हैं जो इतने बड़े मंच पर बोलने का अवसर चाहता है।’<br />
तब बुद्धिजीवी ने अपने चेले को डांटा-‘अरे, ऐसा बोला जाता है। यह नये लेखक हैं इनको प्रोत्साहन देना है।’<br />
फिर वह उस नये लेखक से बोले-‘भई, अब तो समय निकल गया है। अगली बार सम्मेलन में तुम्हारा लंबा भाषण रखेंगे। तब तक  ऐसे दो चार सम्मेलनों में बोलने का अभ्यास कर लो। हां, एक किताब जरूर छपवा लेना।’<br />
तब एक दूसरा बुद्धिजीवी बोला-‘पर महाशय, मैं तो तीस साल से लिख रहा हूं। कोई किताब नहीं छपी, पर अखबारों में कभी कभी जगह मिल जाती है।’<br />
बुद्धिजीवी महाशय ने कहा-‘अरे भई, अच्छा लिखोगे तो छपोगे।’<br />
इससे पहले कि वह मेहमान बुद्धिजीवी प्रतिवाद करता तब मंच पर बैठे उन महान बुद्धिजीवी के चेलों  ने तालियां बजा दी जैसे कि कोई रहस्यमय बात उन्होंने कही हो।’</p>
<p>कार्यक्रम समाप्त हो गया। अब सवाल यह था कि उनका प्रचार कैसे हो? बुद्धिजीवी ने समझाया-‘फोटो केवल मंच के ही देना। मेरा भाषण देते हुए जरूर देना।  अपने भी फोटो ऐसे देना जैसे कि सभी का आ जाये।  इसलिये ही मैंने तुम्हें पांच पांच में बांटकर बारी बारी से बैठने के लिये कहा था ताकि अधिक फोटो छप सकें।’<br />
एक चेले ने पूछा-‘महाराज, पर दर्शकों और श्रोताओं के फोटो भी तो छापने पड़ेंगे।’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘खाली कुर्सियों के फोटो छपवाओगे, मूर्ख कहीं के! फिर यह भेड़ की तरह लोग आये थे इनके फोटो अगर अखबार में छप गये तो यह शेर हो जायेंगे।  फिर नहीं आने वाले अपने जाल में। यहां आदमी को तब ऊंचा न उठाओ जब तक उससे कोई फायदा न हो।’<br />
चेले ने कहा-‘ठीक है।’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘और सुनो। नाश्ते, भोजन, और चाय के भी फोटो छाप देना।  अपने पिछले सम्मेलन की वह फोटो जो नहीं भेज पाये, उपयोग  में  लेना।  खाने की प्लेटों में बचे सामान, पन्नी में पड़े पानी के खाली ग्लास, और टेबलों पर बैठे तुम लोगों के जो फोटो बनवाये थे उनका उपयोग इस बार भी जरूर करना। लिखना कि शानदार भोजन हुआ।’<br />
चेले ने पूछा-‘अगर किसी ने जांच करने का प्रयास किया तो?’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘यह लोग तो बाहर के आये थे चले जायेंगे।  तुम लोगों से कोई पूछे तो बता देना।  हां, तुम लोगों ने चाय के ढाबे पर बैठकर जो फोटो खिंचवायी थी वह भी भेज देना।’<br />
एक चेले ने कहा-‘पिछली बार वह छपवा चुके हैं। दो साल पहले।<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब कौन उसे याद रखता है? हां, एक बात याद रखना। मेरे कुछ बुद्धिजीवियों के बयान भी छाप देना। भले ही वह न आये। इससे यह महासम्मेलन लगेगा। कुछ छद्म नाम के विद्वान लोगों का आगमन भी दर्शा देना। इन आठों में लगे रहो। कम से कम दो जरूर बकरे बन जायेंगें।’<br />
नये बुद्धिजीवी रेल्वे स्टेशन पर   अपने ठिकाने लौटने के लिये आये तो उसमें दो गायब थे। एक ने दूसरे से पूछा-‘यह दो क्यों नहीं आये? यहां इसी स्टेशन पर मिलने का सभी ने वादा किया था।<br />
दूसरे ने कहा-‘वह अपनी किताब छपवाने के बाद ही यहां से जायेंगे।  बुद्धिजीवी  के एक चेले ने उनको पटा लिया है। एक ने मुझे मोबाइल पर यह बात बतायी।’<br />
इधर पता लगा कि उनकी ट्रेन आज नहीं जा रही है। दूसरे ट्रेन का इंतजार करने की बजाय उन्होंने वह शहर घूमने का निर्णय किया और पास में ही एक होटल में रुक गये।<br />
अगले दिन सुबह उन्होंने होटल के बाहर एक चाय के ढाबे पर ही अखबार देखा।  उसमें उस महासम्मेलन की खबर छपी थी। अपना नाम और फोटो न देखकर उनको गुस्सा आया। तब वह आपस में बात करने लगे। एक ने कहा-‘यार, हम काहे इतनी दूर आये थे। न खाना खाया न नाश्ता किया। यह खबर देखो। क्या बकवाद लगती है।’<br />
उनकी बातें पास ही बैठा चाय पीता हुआ एक आदमी सुन रहा था।  उसने उनसे पूछा-‘तो तुम भी सम्मेलन में आये हो? जरा सोच समझकर जाना। कहीं जेब कट गयी तो कहीं के नहीं रहोगे।’<br />
उन्होंने उस आदमी की तरफ देखा। वह एकदम मैला कुचला पायजामा पहने हुए था। उसकी दाढ़ी और बाल इतने बढ़े हुए थे कि उसकी तरफ देखना भी बुरा लगता था।<br />
एक बुद्धिजीवी ने उससे जवाब दिया-‘हां, एक बुद्धिजीवी सम्मेलन में आये हैं।’<br />
उसने कहा-‘मैं भी ऐसे ही फंस गया। अपने आपको बड़ा बुद्धिजीवी समझता था। रहने वाला तो यहीं का हूं।  अलबत्ता किताब छपवाने के चक्कर में इतना पैसा खर्च किया फिर उसका विमोचन कराया।  मुझसे कहा गया कि तुम बहुत बड़ बुद्धिजीवी बन जाओगे। छद्म श्री और अहम भूषण पुरस्कार भी मिल सकता है।  मगर उसके बाद कहीं का न रहा।  फिर मुझसे कहा गया कि दूसरी किताब छपवाओ।  उसके लिये बचे खुचे पैसे लेकर निकला तो जेब कट गयी। अरे, ऐसे सम्मेलनों के चक्कर में मत पड़ो।  यहां भेड़ बनाकर लाते हैं और बकरे बनाकर भेज देते हैं।’<br />
उसकी इस कहानी का उन नवबुद्धिजीवियो पर ऐसा असर हुआ कि वह चाय आधी छोड़ कर भाग निकले।<br />
स्टेशन पर एक ने दूसरे से कहा-‘यार, गनीमत है कि भेड़ की तरह आये पर बकरे नहीं बने।’</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर<br />
http://dpkraj.blogspot.com<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</b></p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[असली  नकली पुरस्कार-हिंदी हास्य व्यंग्य (hindi comedy satire on prize)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/22/puraskar-par-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 13:49:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/22/puraskar-par-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[समाज सेवाध्यक्ष जी ने अपनी बाहें टेबल पर टिकाई अपना मूंह हथेलियों पर रखने को बाद अपने सात सभासदों की]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>समाज सेवाध्यक्ष जी ने अपनी बाहें टेबल पर टिकाई अपना मूंह हथेलियों पर रखने को बाद अपने सात सभासदों की उपस्थिति देखकर गिनती की। आठवां सदस्य सचिव लेखपालक गायब था। उन्होंने कहा‘-यह सचिव लेखपालक हमेशा ही देर से आता है। सारा हिसाब किताब उसके पास है और उसके बिना यहां चर्चा नहीं हो सकती।’<br />
सामने बैठे सभी सातों सदस्य एकटक उनकी तरफ देख रहे थे। समाज सेवाध्यक्ष जी उठे और बैठक कक्ष में ही टहलने लगे। फिर कुछ कहने लगे। मौजूद सदस्य यह नहीं समझ पा रहे थे कि वह अपने से बात कर रहे हैं या उनसे।  अलबत्ता उनके शब्द सभी को साफ सुनाई दे रहे थे।<br />
वह कह रहे थे कि ‘इस बार हमने सूखा राहत और बाढ़ बचाव  में अपना काम कर यह सिद्ध कर दिया है कि हमारी इस संस्था की भूमिका समाज सेवा के मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;’’<br />
इससे पहले वह कुछ आगे बोलें एक सदस्य ने यह सिद्ध करने के लिये कि वह भी बोलना जानते हैं, उनकी बात पूरी होने से पहले ही  अपनी बात कही-’पर साहब, यह तो पुरस्कार समिति की बैठक है!’<br />
इससे पहले कि समाज सेवाध्यक्ष कुछ कहते एक दूसरे सदस्य ने भी यह सिद्ध करने के लिये कि वह बहस भी कर सकता है, उस सदस्य को फटकारा-‘अरे, कैसी बेवकूफी वाली बात करते हो। चाहे बाढ़ हो या अकाल, काम तो अपनी समिति ही करती है जिसके सदस्य तो हम आठ और नौवें साहब हैं। हमारा काम क्या है, केवल चंदा उगाहना और अपनी समाज सेवा के रूप में  उसे बांटने में कलाकारी दिखाना। साहब को बोलने दो, बीच में बोलकर उनकी चिंतन प्रक्रिया को भंग मत करो।’<br />
समाज सेवाध्यक्ष ने दूसरे को डांटा-‘यह बांटने में कलाकारी वाली बात इतनी जोर से मत कहो। दीवारों के भी कान होते हैं।<br />
बैठक में सन्नाटा छा गया। थोड़ी देर बाद समाज सेवाध्यक्ष कुर्सी पर विराजे और बोले-‘‘इस बार हमनें खास ढंग के पुरस्कार बांटने की घोषणा की थी ताकि उसके लिये स्वप्रायोजक मिलें या फिर कोई प्रायोजक पकड़ कर इनाम लेने आयें।  लगता है कि बाढ़ और अकाल में काम का प्रचार ढंग से नहीं हुआ। वैसे अखबारों में धन और अन्न लेने वाले पीड़ितों के हमने इधर उधर से फोटो जुगाड़ने में बहुत मेहनत की। उनके प्रचार पर कुछ पैसा भी खर्च हुआ लगता है उसका परिणाम नहीं निकला।’<br />
तीसरा सदस्य बोला-‘आजकल लोगों में दया धर्म कम हो गया है। ढंग से चंदा भी नहीं देते। हिसाब मांगते हैं। हम तो कह देते हैं कि हम तो चंदा लेकर तुम्हें दान का पुण्य दे रहे हैं वरना खुद कर देख लो हमारे जैसी समाज सेवा।’<br />
एक अन्य सदस्य ने उसे फटकारा-‘कमबख्त, तुम कहां चंदा मांगने जाते हो? बस, प्रचार सचिव के नाम पर इधर उधर पर्चे बांटते हो। तुम्हारा काम इतना खराब है जिसकी वजह से लोगों को हमारी कार्य प्र्रगति की जानकारी नहीं मिल पाती।’<br />
एक अन्य सदस्य को उसकी बात समझ में नहीं आयी तो बोल पड़ा-‘हम काम कौनसा करते हैं जिसकी जानकारी लोगों को मिले। बस काम का प्रचार है, वह भी यह ढंग से नहीं करता।’<br />
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘खामोश हो जाओ, अपनी असलियत यहां क्यों बखान कर रहे हो। कोई सुन लेगा तो! फिर आजकल स्टिंग आपरेशन भी हो जाते हैं।  हमारी संस्था की कमाई देखकर बहुत से लोग हमारे पीछे पड़े हैं। इसलिये अब सोच समझकर बोला करो। यहां ही नहीं बाहर भी ऐसी आदत डाल दो।’<br />
इतने में सचिव लेखपालक आ गया। उसे देखते ही समाज सेवाध्यक्ष बोले-‘यह आने का समय है? कहां चले गये थे?’<br />
सचिव लेखपालक बोला-‘सारा काम तो मुझे ही करना पड़ता है, आप तो सभी केवल देखते हो। इस साल पुरस्कार देने के लिये जुगाड़ लगाना था। इसके लिये दो तीन लोगों से बात कर ली है।  कार्यक्रम का खर्च, उनको दिये जाने वाला उपहार और अपने लिये कमीशन का जुगाड़ लगाना था। फिर पुरस्कार के नाम पर चंदा भी लेना है। इसके लिये कुछ लोगों को ‘समाज सेवा’ के लिये सम्मान देना था।’<br />
एक सदस्य चिल्लाया-‘नहीं! समाज सेवा का पुरस्कार हम देंगे तो फिर हमारी समाज सेवा की क्या इज्जत रह जायेगी।’<br />
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘हम यहां समाज सेवा की बात नहीं कर रहे पुरस्कार देकर प्रोत्साहन देने वाला काम रहे हैं।  समाज सेवा के  लिये एक पुरस्कार अपने सचिव और प्रचार सचिव को भी देंगे। कौन रोकड़ा देना है? देंगे तो आयेगा तो अपने पास ही। आगे बोलो।’<br />
सचिव ने कहा-‘इस बार हथेली पर सरसों जमाने और बबूल बोकर आम उगाने के लिये अनोखे पुरस्कार दिये जायेंगे।’<br />
एक सदस्य के मूंह से चीख निकल गयी-‘पर यह तो कभी हो ही नहीं सकता। बरसों पुरानी कहावत है।’<br />
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? वह लोग बड़ी संस्थाओं का प्रमाणपत्र ले आयेंगे जो यहां उपस्थित सभी दर्शकों को दिखाये जायेंगे।’<br />
एक अन्य सदस्य ने कहा-‘पर वह संस्थायें कौनसी होंगी। पता करना असली है कि नकली।’<br />
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? अरे, जब हम किसी से हाथ में हजार का नोट लेते हैं तो क्या पहचान पाते हैं कि वह असली है या नकली!  यहां किसको फुर्सत रखी है कि यह जानने का प्रयास करे कि ऐसा प्रमाण पत्र देने वाली संस्थायें असली हैं या नकली।  बस, इतना पता है कि जिन लोगों ने इसके लिये पुरस्कार मांगे हैं उनमें एक स्व प्रयोजक है और दूसरे का प्रायोजन एक ऐसा आदमी कर रहा है जिसे पुरस्कार लेने वाले से भारी राशि कर्जे के रूप में लेनी है जिसे वह कभी चुकायेगा नहीं। समझे! बाकी पुरस्कार तो समाज सेवियों के हैं जो बिचारे अपने घर से बाहर कभी सोच भी नहीं पाते पर उनको अपने घर की महिलाओं पर रौब गालिब करना है।’<br />
सभी सोच में पड़ गये तक समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘तुम सभी को संाप क्यों सूंघ गया। सचिव लेखपालक ने जो प्रस्ताव रखा है वह भी कम अनोखा नहीं है। बजाओ तालियां।’<br />
सभी लोगों ने सहमति में अपनी तालियां बजायीं।</b></p>
<p>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
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<p><strong></strong></p>
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</item>
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<title><![CDATA[सब दिया उसने फिर भी हाथ फैलाते-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/19/god-and-man-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Mon, 19 Oct 2009 14:09:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/19/god-and-man-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[सर्वशक्तिमान के दरबार में क्यों जाकर भीड़ लगाते हो, जिसने दिए काम करने को हाथ उसी के सामने कुछ मांगन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>सर्वशक्तिमान के दरबार में<br />
क्यों जाकर भीड़ लगाते हो,<br />
जिसने दिए काम करने को हाथ<br />
उसी के सामने कुछ मांगने के लिए<br />
क्यों फैलाते हो.<br />
जिसने दिए चलने के लिए पाँव<br />
क्यों लौटकर जाते हो फिर &#160;उसके गाँव,<br />
उसने दुनियाँ&#160;&#160;&#160;देखने के लिए दी है आँखें<br />
टकटकी लगाए उसी की तरह क्यों देखते हो<br />
जैसे&#160; कैद किये हों तुम्हें सलाखें,<br />
विचार करने के लिए दिया है दिमाग<br />
जिसका करते हो उपयोग&#160;&#160;केवल पांच प्रतिशत भाग,<br />
कितना ताकतवर तुम्हें उसने बनाया<br />
तुम लाचार होकर उसके सामने क्यों पहुँच जाते हो.<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर<br />
http://dpkraj.blogspot.com<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंदी अध्यात्म सन्देश-बुरे काम से दूर होकर ही अच्छाई समझना संभव (hindu adhyatm sandesh)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/18/vidru-niti-pap-se-pare-hon/</link>
<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 08:43:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/18/vidru-niti-pap-se-pare-hon/</guid>
<description><![CDATA[अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्। न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।। हिंदी में भावार्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।<br />
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता। </p>
<p><strong>यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।<br />
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>यह कहना गलत है धर्म के मार्ग पर अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्म-ईमानदारी, सहजता, परमार्थ, और अपने कर्तव्य से प्रतिबद्धता-का परिणाम ही अर्थ की प्राप्ति ही है। यह अलग बात है कि जल्दी अमीर बनने या आवश्यकता से अधिक धनार्जन के के लिये लोग अपने जीवन में आक्रामक और बेईमानी की प्रवृत्ति अपना लेते हैं। इस संसार में ऐसे लोग भी है जो बेईमानी से धन कमाकर कथित रूप से प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का आकर्षण समाज के युवाओं को आकर्षित करता है पर उनको यह समझ लेना चाहिये कि बेईमान और भ्रष्ट लोगों को धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की शक्ति की वजह से सामने कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे सभी लोग उनके प्रति घृणा का भाव दिखाने से नहीं चूकते। फिर भ्रष्ट और बेईमान लोग का धन जिस तरह बर्बाद होता है उसे भी देखना चाहिये। </p>
<p>नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जिस व्यक्ति ने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह इस संसार में व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थितियों की प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह समझ जाते हैं। इस ज्ञान से वह विकृतियेां से परे रहने में सफल रहते हैं और प्रकृतियां उनका स्वतः ही मार्ग प्रशस्त करती हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महात्मा गांधी नोबल नहीं वरन् ग्लोबल थे-आलेख (mahatma gandhi and noble]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/12/hindi-article-on-noble-prize/</link>
<pubDate>Mon, 12 Oct 2009 15:08:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/12/hindi-article-on-noble-prize/</guid>
<description><![CDATA[नोबल पुरस्कार देने वालों ने वाकई हास्यास्पद स्थिति का निर्माण किया है। उन्होंने अमेरिका के कट्टर विर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>           नोबल पुरस्कार देने वालों ने वाकई हास्यास्पद स्थिति का निर्माण किया है।  उन्होंने अमेरिका के कट्टर विरोधियों को बहुत कुछ आरोप लगाने का अवसर दिया है जो  इस अवसर का खूब उपयोग कर रहे हैं। अमेरिका के कट्टर से कट्टर समर्थक भी इस विषय पर उनके सामने टिक नहीं सकता।<br />
आमतौर से भारतीय समाचार माध्यम अप्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिम के पुरस्कारों का गुणगान करते हैं पर इस विषय पर वह व्यंग्य कस रहे हैं।  कहीं पढ़ने को मिला कि प्रत्येक वर्ष का नोबल उसी वर्ष की एक फरवरी तक के दर्ज नामों पर उसी दिन तक किये गये काम के लिये दिया जाता है। इसका आशय यह है कि उसके बाद किसी ने नोबल लायक कोई काम किया है तो उसे अगले वर्ष वह पुरस्कार दिया जा सकता है।   इस आधार पर वर्ष 2009 का शांति पुरस्कार 1 फरवरी 2009 तक के कार्यों के लिये दिया जा रहा है जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा ने 20 फरवरी 2009 का वहां के राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभाला था। मतलब यह कि उन्होंने 11 दिन में ही नोबल पुरस्कार प्राप्त करने का काम कर लिया था।<br />
अगर यह तर्क दिया जाये कि उन्होंने विश्व शांति के लिये उससे पहले काम किया गया तो वह इसलिये भी हास्यस्पद होगा क्योंकि स्वयं नोबल देने वाले मानते हैं कि उनके राष्ट्रपति पद पर किये गये कार्यों के लिये ही यह शांति पुरस्कार दिया गया है। बराक ओबामा यकीनन बहुत प्रतिभाशाली हैं और उनकी नीयत पर संदेह का कोई कारण नहीं है। उनको पुरस्कार देना नोबल समिति की किसी भावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है। हो सकता है कि वह सोच रहे हैं कि विश्वभर में फैली हिंसा रोकने के लिये शायद यह एक उपाय काम कर सकता है।<br />
हमें बाहरी मसलों से लेनादेना अधिक नहीं रखना चाहिये पर इधर लोग आधुनिक समाज में हिंसा का मंत्र स्थापित करने वाले महात्मा गांधी को नोबल पुरस्कार नहीं देने पर नाराज दिख रहे हैं।   दरअसल श्री बराक ओबामा को नोबल देने पर महात्मा गांधी का नाम लेना ही कृतघ्नता है।  इस दुनियां में एक बार ही परमाणु बम का प्रयोग किया गया है और उसका अपराध अमेरिका के नाम पर दर्ज है।  जब पश्चिम  अपनी विज्ञान की शक्ति पर हथियार बनाकर पूर्व को दबा रहा था तब उसकी बढ़त बनाने  का श्रेय उन महानुभावों को जाता है जो उसका हिंसक प्रतिरोध कर रहे थे।  दरअसल पश्चिमी देश तो चाहते थे कि कोई बंदूक उठाये तो हम उस पर तोप दागें।  इतना ही नहीं वह विरोधी को मारकर नायक भी बन रहे थे और सभ्य होने का प्रमाण पत्र भी जुटा लेते थे।  उस समय महात्मा गांधी ने अहिंसक आंदोलन चलाकर न उनको बल्कि चुनौती दी बल्कि उनको सभ्यता का मुखौटा पहने रखने  के लिये बाध्य किया।<br />
वैसे तो हमारे देश में अहिंसा का सिद्धांत बहुत पुराना है पर आधुनिक संदर्भ में जब पूरे विश्व में कथित रूप से सभ्य लोकतंत्र है-चाहे भले ही कहीं तानाशाही हो पर चुनाव का नाटक वहां भी होता है-तब महात्मा गांधी का अहिंसक आंदोलन करने वाला मंत्र बहुत काम का है।  सच तो यह है कि महात्मा गांधी का नाम विश्वव्यापी हो गया है।  जहां तक हमें जानकारी नोबल का अर्थ  अद्वितीय होता है। इसका मतलब यह है कि जिस क्षेत्र में नोबल पुरस्कार दिया जाता है उसमें कोई दूसरा नहीं होना चाहिये। जबकि यह पुरस्कार हर वर्ष दिया जाता है। इसे देखकर कहें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि नोबल लेने के बाद भी कोई अद्वितीय नहीं हो जाता। अगले वर्ष कोई दूसरा आ जाता है।  अद्वितीय कहने में एक पैंच है वह यह कि उस समय वह व्यक्ति अद्वितीय है पर आगे कोई होगा इसकी संभावना नहीं जताई जा सकती। गांधी जी के बारे में अगर हम कहें तो अहिंसा का संदेश देने में वह अद्वितीय नहीं थे क्योंकि उसके पहले भी अनेक महापुरुष ऐसा संदेश दे चुके हैं। दूसरा सच यह भी है कि ‘उन जैसा व्यक्ति दूसरा पैदा होगा इसकी संभावना भी नहीं लगती। सीधा मतलब यह है कि वह अद्वितीय  थे नहीं और उन जैसा होगा नहीं। वह अलौकिक शक्ति के स्वामी थे।  इस लोक के सारे पुरस्कार उनके सामने छोटे थे।<br />
कुछ लोगों को इस बात का अफसोस है कि नोबल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिये जाते। अगर ऐसा होता तो शायद महात्मा गांधी जी के नाम पर नोबल आ जाता।  ऐसा सोच लोगो की संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है जो शायद सतही देशभक्ति भावना से से उपजा है।  ऐसा सतही देशभक्ति भाव रखने वालों ने गांधी जी का सही मूल्यांकन नहीं किया है।  वह अफसोस करते हैं कि मरणोपरांत नोबल नहीं दिया जाता और महात्मा गांधी को अपने हृदय में स्थान देने वाले इसे अपना भाग्य कहकर सराह रहे हैं कि उनका नाम कम से कम मरणोपरांत अपमानित होने से बच गया। यह पश्चिमी लोग उनको नोबल देकर स्वयं को ही सम्मािनत करते अगर उन्होंने ऐसा नियम नहीं बनाया होता।<br />
गांधी जी को मानने वाले दक्षिण अफ्रीका के नेता नेल्सन मंडेला को यह पुरस्कार मिला पर उनको गांधी के समकक्ष नहीं माना जाता क्योंकि गांधी जी का कृत्य एक कौम या देश की आजादी तक ही सीमित नहीं है वरन् आधुनिक सभ्यता को एक दिशा देने से जुड़ा है।  नोबल नार्वे की एक संस्था द्वारा दिया जाता है। जी हां, इस नार्वे के बारे में भी हम अखबार में पढ़ चुके हैं जो श्रीलंका में आतंकवादियों की बातचीत के लिये वहां की सरकार से बातचीत करता था। यही नहीं यही नार्वे ने भारत के नगा विद्रोही नेताओं को भी अपने यहां पनाह देता देता था। नार्वे के बारे में अधिक नहीं मालुम पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि वह अमेरिका का पिट्ठू हो सकता है और ऐसे वहां की नोबल बांटने वाली समिति कोई निर्णय अपने देश की नीतियों के प्रतिकूल लेती होगी यह संभव नहीं है।<br />
लब्बोलुआब यह है कि नोबल कोई ऐसा पुरस्कार नहीं रहा जिसे लेकर हम अपने देश के उन महान लोगों को हल्का समझें  जिनको यह नहीं मिला।  सच तो यह है कि अगर आप हमसे पूछेंगे कि इस विश्व का आधुनिक महान लेखक कौन है तो हम निसंकोच अपने हिंदी लेखक प्रेमचंद का नाम ले देंगे। जार्ज बर्नाड या शेक्सिपियर को यहां पढ़ने वाले कितने लोग हैं? इस देश के लिये किसकी नीतियां अनुकूल हैं? इस प्रश्न का जवाब इस व्यंग्य में नहीं दिया जा सकता।  वह अध्यात्म से जुड़ा है। याद रहे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान न केवल व्यक्ति बल्कि समाज और राष्ट्र के संचालन के सिद्धांत भी प्रतिपादित करता है। बस, उसे समझने की जरुरत है।  इन सिद्धांतों को प्रतिपादित करने वालों को नोबल कोई क्या देगा? वह सभी पहले से ही ग्लोबल (विश्व व्यापी) हैं जिनमें हमारे महात्मा गांधी एक हैं।  गांधीजी के नाम पर युग चलता है कोई एक वर्ष नहीं।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नोबल और  ग्लोबल-व्यंग्य आलेख (noble and global-hindi satire)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/11/noble-purskar-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 11 Oct 2009 16:45:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/11/noble-purskar-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा को शांति के लिये नोबल पुरस्कार मिलने पर स्वयं उनको ही बहुत बड़ा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा को शांति के लिये नोबल पुरस्कार मिलने पर स्वयं उनको ही  बहुत बड़ा अचरज हुआ है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओबामा निहायत सज्जन, विचारवान और सहज प्रवृत्ति के इंसान हैं और एक आम आदमी से राष्ट्रपति पद पर पहुंचने की उनकी यात्रा एक जीवंत कहानी जैसी है।  विश्व में शांति स्थापित हो, उनकी इस इच्छा पर संदेह का भी कोई कारण नहीं दिखता। अगर उनको शांति के लिये नोबल पुरस्कार भविष्य की संभावनाओं के मद्देनज़र दिया गया है तो उस भी किसी को आपत्ति नहीं होना चाहिये। मुख्य बात तो यह है कि नोबल पुरस्कार किसी किये गये काम पर दिया जाता है न कि भविष्य में  किये जाने वाले काम पर।<br />
सच तो यह है कि जिस तरह यह पुरस्कार दिया गया है उस पर हंसी अधिक आ रही है क्योंकि उनके पदभार संभालने के बाद विश्व में कहीं को उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है ऐसा कहीं प्रमाणित नहीं होता।  संभव है कि ओबामा के शासन में अमेरिका विश्व में शांति स्थापित करने में सफल हो-हालांकि इसकी संभावना नगण्य ही लगती है-तब यह नोबल पुरस्कार अपनी सार्थकता प्रमाणित करेगा पर इसका फिलहाल औचित्य क्या है? यह स्वयं श्री ओबामा के समझ में नहीं आई होगी।</p>
<p>वैसे आम भारतीयों को नोबल और ओबामा से क्या लेना?  अलबत्ता एक समस्या भारतीय बुद्धिजीवियों और प्रचार माध्यमों के सामने आने वाली है वह कम दिलचस्प नहीं है। अभी तक तो यह कहा जाता था कि नोबल दुनियां का सबसे बड़ा पुरस्कार है जिसे पूरी ईमानदारी के साथ दिया जाता है-हमारे यहां पश्चिम संस्थाओं के प्रति ऐसी ही भ्रांत धारणायें बनायी गयी हैं जो कि अब धीरे धीरे खंडित होती जा रही हैं।  बचपन में भी हमने पढ़ा था कि भारत के जगदीशचंद्र बसु को भी विज्ञान में कार्य करने पर नोबल पुरस्कार दिया गया। उन्होंने ही पूरे विश्व को बताया था कि वनस्पतियों में मनुष्य की तरह जीवन होता है। श्री रविंद्रनाथ टैगौर को भी साहित्य के लिये नेाबल पुरस्कार दिया गया।   तब हमारा मन में इन महानुभावों के लिये जो श्रद्धा पैदा होती थी वह अवर्णनीय है।<br />
समय के साथ जब बड़े हुए तो फिर अपने देश के पुरस्कारों और सम्मानों को भी देखा।  जब लिखना प्रारंभ किया तब यह नहीं जानते थे कि साहित्य में भी सम्मान होता है।  मगर लिखते लिखते यह ख्याल तो आ ही जाता था कि कभी हमें सम्मान या पुरस्कार मिल सकता है पर जैसे थोड़ा आगे बढ़े तो समझ में आ गया कि देश के सम्मान, पुरस्कार या कोई पदवी पाना हमारे जैसे आदमी के लिये सहज नहीं है क्योंकि अभी भी यहां स्वतंत्र रूप से सांस लेना एक अपराध ही है और जहां तक लिखने का सवाल है किसी की गुलामी हमारे बूते का नहीं था।  फिर भी पुरस्कारों के प्रति सम्मान था पर धीरे धीरे वह समाप्त हो गया।  अलबत्ता अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों के प्रति एक आदर का भाव था पर उसे भी धीरे धीरे क्रांतिकारी लेखकों ने समाप्त कर दिया यह बताकर कि वह केवल पश्चिम की अवधाराओं पर खरा उतरने पर ही मिलता है।<br />
माननीय जगदीश चंद्र बसु की याद आती है जिनके बारे में हमें बताया जाता है कि उन्होंने ही बताया था कि वनस्पितियां भी मनुष्य की तरह प्राणवान है। जब हमने  अपने अध्यात्मिक ग्रंथों को पढ़ा तो पाया कि यह कोई नया रहस्योद्घाटन नहीं था-इसलिये कहते हैं कि इन ग्रंथों के कुछ आवश्यक हिस्से आज भी शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाया जाना आवश्यक है।  यकीनन बसु साहब ने बृहद रूप से इस पर कुछ अनुसंधान कर प्रस्तुत किया होगा जो उनको नोबल पुरस्कार मिला होगा। वैसे वह अमेरिका में ही रहकर काम कर रहे थे, इसकी जानकारी भी बाद में हमें मिली।  कहने का मतलब यह है कि वह भारतीय मूल के थे पर अमेरिका में रहते हुए ही उनको पुरस्कार मिला।  तब से हम अनेक बार सुने चुके हैं कि भारतीय मूल के अमेरिकी को नोबल मिला या कोई बड़ा पद मिला आदि आदि।<br />
माननीय श्री रविद्रनाथ टैगौर के बारे में आज के ही एक प्रगतिशील लेखक के रचना में हमने पढ़ा था कि उनकी कहानियों में अंग्रेजों को काफी महत्व दिया गया इसलिये उनको सम्मानित किया गया। यहां तक ह िराष्ट्रीय गीत ‘जन गन मन’ भी एक अंग्रेज लार्ड के भारत आगमन पर उनके द्वारा लिखा गया जिसमें बाद में संशोधन कर प्रस्तुत किया गया-यह जानकारी इस देश के उसी लेखक ने लिखी थी जिसे आजकल जातिवाद के लिये कोसा जा रहा है। हम नहीं जानते कि सच क्या है? हां, इतना जरूर कह सकते हैं कि विदेशी पुरस्कारों के संबंध में अब यह धारणा बन गयी है कि उनका भारतीय संदर्भ में किये गये किसी कार्य से कोई संबंध नहीं होता।  उसके बाद भी हमारे देश से जुड़े अनेक लोगों को नोबल मिला पर उनके कार्य या व्यक्तित्व में पूर्ण भारतीय का अभाव था।<br />
इसके बावजूद हमारे देश के प्रचार माध्यम नोबल पुरस्कार के समाचार इस तरह देते हैं जैसे कि वह दिखा रहे हों कि देखो नालायकों तुम इसके लायक नहीं हो।  लोग भी बिचारे मन मसोस कर रह जाते थे। मुश्किल अब यह आ रही है कि लोगों के दिमाग में नोबल को लेकर पूर्व में बना आकर्षण समाप्त हो सकता है।  आजकल के आधुनिक प्रचार माध्यम अब नोबल जैसे फालतू खबर पर सनसनी नहीं बना सकते।  भारत में सामान्य जन तो यह देखकर ही हैरान है कि शांति का नोबल पुरस्कार ऐसे दिया गया है जैसे कि किसी हिंदी फिल्म के नये अभिनेता को ‘नये चेहरे’ का पुरस्कार दिया गया है।  एक ही झटके नोबल पुरस्कार का महत्व यहां खत्म हो सकता है।  अपने देश के ही जो संचार माध्यम पहले नोबल पुरस्कारों की सूची बहुत शोर के साथ सुनाते थे अब उसमें फिक्सिंग की बात कह रहे हैं।  हम तो सुनकर ही दंग रह गये जब किसी को यह कहते सुना कि ‘यह अमेरिका की ओबामा की प्रसिद्धि बनाये रखने के लिये किये गये प्रबंधकीय कौशल का  कमाल है’।<br />
सच तो यह है कि इस देश के कुछ लोग ऐसे हैं जो वाकई काबिल हैं पर उन्हें देश और विदेश में पुरस्कार नहीं मिले क्योंकि उन्होंने हिंदी या क्षेत्रीय भाषा मेें लिखा या अन्य सृजन किया।  उनका लिखा हुआ या अन्य सृजन इतना जोरदार है कि सदियों तक वह बना रहेगा जबकि भारत की गरीबी पर लिखकर कई ऐसे लेखक पुरस्कार ले आये जो अब पागलपन की बात करते हैं।  इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो सीमावर्ती क्षेत्रों की गरीब और अनाचार देखकर उनको पाकिस्तान तथा चीन को देने की बात करते हैं।  मध्य की गरीबी के लिये वहां से आंतक के आयात का भी समर्थन करने लग जाते हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि भारत विरोधी संदर्भ में उनको कुछ ऐसे पुरस्कार मिले जो नोबल नहीं थे पर उसे जैसे लगते थे। </p>
<p>अब इन विदेशी पुरस्कारों से सम्मानित महानुभावों का बाजार भाव भी गिर सकता है।  राह चलते हुए कोई भी पूछ सकता है कि ‘भला, किससे और कैसे पुरस्कार की फिक्सिंग की थी। जरा बताओ। हम भी कर लेंगे।  वैसे आस्कर को लेकर भी कुछ दिल पहले लोगों का भ्रम टूटा था और अब नोबल ने भी तोड़ दिया।  स्पष्टतः यह पुरस्कार गुप्त ऐजेंडों पर दिये जाते हैं।  इन पर चर्चा करें तो बहुत लंबी बात हो जायेगी। </b><br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य दर्शन-धर्म परिवर्तन करने से मनुष्य बाद में दु:खी हो जाता है(hindi sandesh-dharm parivaratan anuchit-chankya niti]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/10/chenge-of-religion-is-not-good-chankya-policy/</link>
<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 14:57:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/10/chenge-of-religion-is-not-good-chankya-policy/</guid>
<description><![CDATA[नीति विशारद चाणक्य कहते हैं &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>नीति विशारद चाणक्य कहते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<strong>आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।<br />
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।</strong><br />
<b>हिन्दी में भावार्थ</b> कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।<br />
कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है। धर्म परिवर्तन करने वाले कभी सुखी नहीं रहते है और आस्था बदलने वालों का भटकाव कभी ख़त्म नहीं होता यह&#160; अंतिम सत्य है।<br />
&#160;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शिशुओं का क्रीड़ाश्रम और मिठाई-हिन्दीहास्य व्यंग (child story and sweats-hindi vyanga]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/06/child-labourd-hindi-sastire/</link>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 14:53:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/06/child-labourd-hindi-sastire/</guid>
<description><![CDATA[सुबह दीपक बापू सड़कों पर पानी से भरे गड्ढों में गिरने से बचते हुए जल्दी जल्दी ही आलोचक महाराज के घर प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>सुबह दीपक बापू सड़कों पर पानी से भरे गड्ढों में गिरने से बचते हुए जल्दी जल्दी ही आलोचक महाराज के घर पहुंचे। उस दिन बरसात होने से  उनको आशा थी कि आलोचक महाराज प्रसन्न मुद्रा में होंगे। इधर उमस के मारे सभी परेशान थे तो आलोचक महाराज भी भला कहां बच सकते थे। ऐसे में दीपक बापू को यह आशंका थी उनकी कविताओं पर आलोचक महाराज कुछ अधिक ही निंदा स्तुति कर देंगे। वैसे भी दीपक बापू की कविताओं पर आलोचक महाराज ने कभी कोई अच्छी मुहर नहीं लगायी  पर दीपक बापू आदत से  मजबूर थे कि उनको दिखाये बगैर अपनी कवितायें कहीं भेजते ही नहीं थे। </p>
<p>सड़क से उतरकर जब उनके दरवाजे तक पहुंचे तो दीपक बापू के मन में ऐसे आत्मविश्वास आया जैसे कि मैराथन जीत कर आये हों।  इधर मौसम ने भी कुछ ऐसा आत्मविश्वास उनके अंदर पैदा हुआ कि उनको लगा कि ‘वाह वाह’ के रूप में उनको एक कप मिल ही जायेगा।  उन्होंने दरवाजे के अंदर झांका तो देखा आलोचक महाराज सोफे पर जमे हुए सामने टीवी देख रहे थे। वहां से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। उन्होंने आलोचक महाराज<br />
को हाथ जोड़कर नमस्ते की भी और मुख से उच्चारण कर उनका ध्यान आकर्षित करने का  भी प्रयास किया-यह करना ही पड़ता है जब आदमी आपकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा हो।<br />
आलोचक महाराज ने उनकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया। दीपक बापू ने जरा गौर से देखा तो पाया कि उनकी आंखों से आंसु निकल रहे थे। दीपक बापू सहम गये। क्या सोचा था क्या हो गया। कहां सोचा था कि मौसम अच्छा है आलोचक महाराज का मूड भी  अच्छा होगा। पहली बार अपनी कविताओं पर ‘वाह वाह रूपी कविताओं का कप’ ले जायेंगे। कहां यह पहले से भी बुरी हालत में देख रहे हैं। वैसे दीपक बापू ने आलोचक महाराज को कभी हंसते हुए नहीं देखा था-तब भी जब उनका सम्मान हुआ था। आज इस तरह रोना!<br />
‘क्या बात है आलोचक महाराज! मौसम इतना सुहाना है और आप है कि रुंआसे हो रहे हैं।‘दीपक बापू बोले।<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘देखो सामने! टीवी पर बच्चा रो रहा है। इसके माता पिता ने इसको खुद ऐसे लोगों को सौंपा है जो इस वास्तविक शो में नकली माता पिता की भूमिका निभा रहे हैं। वह लोग इतने नासमझ हैं कि उनको पता ही नहीं कि बच्चा अपनी माता के बिना कभी खुश नहीं रह सकता।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज! यह तो सीन ही नकली है! आप कहां चक्कर में पड़ गये। अब यह टीवी बंद कर दीजिये। हम अपने साथ मिठाई का डिब्बा साथ में ले आयें हैं ताकि आप उनको खाते हुए हमारी यह दो कविताओं पर अपना विचार व्यक्त कर सकें।’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘बेवकूफ आदमी! समाज में कैसी कैसी घटनायें हो रही हैं उस पर तुम कभी सोचते ही नहीं हो।  अरे, देखो इन बच्चों की चीत्कार हमारा हृदय विदीर्ण किये दे रही है। अरे, हमें इसके माता पिता मिल जायें तो उनको ऐसी सुनायें जैसी कभी तुम्हारी घटिया कविताओं पर भी नहीं सुनाई होगी।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज हमारी कविताओं पर हमें क्या मिलता है? उनको तो इस बच्चे के अभिनय पर पैसा मिला होगा। ऐसे कार्यक्रमों में पहुंचना भी भाग्य समझा जाता है। इन शिशुओं ने जरूर अपने पूर्व जन्म में कोई पुण्य किया होगा कि पैदा होते ही यह कार्यक्रम उनको मिल गया। बिना कहीं प्रशिक्षण लिये ही अभिनय करने का अवसर मिलना कोई आजकल के जमाने में आसान नहीं है। खासतौर से जब आपके माता पिता ने भी यह नहीं किया हो।’<br />
दीपक बापू की इस से आलोचक महाराज को इतना गुस्सा आया कि  दुःख अब हवा हो गया और इधर बिजली भी चली गयी। इसने उनका क्रोध अधिक बढ़ा दिया। वह दीपक बापू से बोले-‘रहना तुम ढेर के ही ढेर! यह पूर्व जन्म का किस्सा कहां से लाये। तुम्हें पता है कि अपने देश में बाल श्रम अपराध है।’<br />
दीपक बापू ने स्वीकृति में यह सोचकर हिलाया कि हो सकता है कि आलोचक महाराज की प्रसन्नता प्राप्त हो। फिर आलोचक महाराज ने कहा-‘अरे, इस पर कुछ लिखो। यह बाल श्रम कानून के हिसाब से  गलत है। इस पर कुछ जोरदार लिखो।’<br />
दीपक बापू बोले-महाराज, आपके अनेक शिष्य इस पर लिख रहे हैं। हमारे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।  यह शिशु, बालक, नवयुवक, युवक, अधेड़ और वृद्ध का संकट अलग अलग प्रस्तुत किया है जबकि हमें सभी का संकट एक दूसरे से जुड़ा दिखाई देता है।  फिर इसमें भी भेद है स्त्री और पुरुष का। हम यह विभाजन कर नहीं पाते।  हमने तो देखा है कि एक का संकट दूसरे का बनता ही है।  वैसे आपने कहा कि यह बालश्रम कानून के विरुद्ध है पर यह तो शिशु श्रम है। इस विषय पर आप अपने स्थाई शिष्यों से कहें तो वह अधिक प्रकाश डाल सकेंगे। वैसे तो शिशु रोते ही हैं हालांकि उनको इसमें श्रम होता है और इससे उनके अंग खुलते हैं।’<br />
आलोचक महाराज उनको घूरते हुए बोले-‘मतलब तुम्हारे हिसाब से यह ठीक हो रहा है। इस तरह बच्चों के रोने का दृश्य दिखाकर लोगों के हृदय विदीर्ण करना तुम्हें अच्छा लगता है।  यह बालश्रम की परिधि में नहीं आता! क्या तुम्हारा दिमाग है कि इसे स्वाभाविक शिशु श्रम कह रहे हो?’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज, हमने कहां इसे जायज कहा? हम तो आपके शिष्यों के मुताबिक इसका एक विभाजन बता रहे हैं। हम तो कानून भी नहीं जानते इसलिये बालश्रम और शिशुश्रम में अंतर लग रहा है। वैसे माता पिता अपने बच्चे को इस तरह दूसरों को  देकर पैसा कमाते होंगे। हालांकि वह भद्र लोग हैं पर इतना तो कर ही सकते हैं कि पैसा मिलने पर बच्चा कुछ देर रोए तो क्या? वैसे आपको तो यह पता ही होगा कि इस देश में इतनी गरीबी है कि लोग अपना बच्चा बेच देते हैं। कई औरतें किराये पर कोख भी देती हैं।  यह अलग बता है कि ऐसे मामले पहले गरीबों में पाये जाते थे पर अब तो पैसे की खातिर पढ़े लिखे लोग भी यह करने लगे हैं। अरे, आप कहां इन वास्तविक धारावाहिकों की अवास्तविकताओं में फंस गये। आप तो हमारी कविता पढ़िये जो उमस और बरसात पर लिखी गयी हैं बिल्कुल आज ही!’<br />
आलोचक महाराज ने कागज हाथ में लिये और उसे फाड़ दिये फिर कहा-‘वैसे भी तुम श्रृंगार रस में कभी नहीं लिख पाते। जाओ, इस कथित शिशुश्रम पर कुछ लिखकर लाओ। और हां, हास्य व्यंग्य कविता मत लिख देना। इस पर बीभत्स रस की चाशनी में डुबोकर कुछ लिखना और मुझे पंसद आया तो उसे कहीं छपवा भी दूंगा।’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज, आपके चेलों का असर आप पर भी हो गया है। यह तो गलत है कि आपके शिष्य बालश्रम, नारी अत्याचार, युवा बेरोजगारी पर लिखते हैं पर शिशु श्रम पर हम लिखें।’<br />
आलोचक महाराज ने घूरकर पूछा-यह बालश्रम और शिशुश्रम अलग अलग कब से हो गये?’<br />
दीपक बापू बोले-‘हमें पता नहीं! पर हां, आपके शिष्यों को पढ़ते पढ़ते हम कभी इस विभाजन की तरफ निकल ही आते हैं। लिखते इसलिये नहीं कि हमें लिखना नहीं आता। वैसे आप कह रहे हो तो लिखकर आते हैं।’<br />
दीपक बापू मिठाई का डिब्बा हाथ में वापस लेकर जाने लगे तो आलोचक महाराज बोले-‘यह मिठाई का डिब्बा वापस कहां लेकर जा रहे हो।’<br />
दीपक बापू बोले-‘अभी आपके कथानुसार दूसरी रचना लिखकर ला रहा हूं। तब यहां खाली हाथ आना अच्छा नहीं लगेगा। इसलिये साथ लेकर जा रहा हूं।’<br />
ऐसा कहते ही दीपक बापू कमरे से बाहर निकल गये क्योंकि उनको आशंका थी कि कहीं वह छीनकर वापस न लें। बाहर निकल कर वह इस बात से खुश हुए कि उनकी कवितायें सुरक्षित थी क्योंकि उनकी कार्बन कापी वह घर पर रख आये थे, वरना तो शिशुश्रम विषय पर उनके साथ ही मिठाई का डिब्बा भी भेंट चढ़ जाने वाला था। </b><br />
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[द्युतक्रीड़ा से पूरा विश्व शिकार-हास्य व्यंग्य (jua ke shikar duniyan]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/05/hasya-vyangya-on-juaa/</link>
<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 04:04:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/05/hasya-vyangya-on-juaa/</guid>
<description><![CDATA[राजा नल ने जुआ खेली और उसमें हारने पर राज्य और परिवार त्यागकर वन में जाकर दूसरे की सेवा करनी पड़ी। अत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>राजा नल ने जुआ खेली और उसमें हारने पर राज्य और परिवार त्यागकर वन में जाकर दूसरे की सेवा करनी पड़ी। अति सुंदर रुक्मी इंद्र जैसा बलशाली और महान धनुर्धर था पर जुए में खेलने के कारण ही बलराम जी के हाथ से मारा गया। कौशिक राजा मंदबुद्धि दंतवक्र जुए की सभा में बैठने के कारण ही बलराम जी पर हंसने के कारण अपना दांत तुड़ा बैठा। धर्मराज युद्धिष्ठर ने भी हुआ खेला ओर उसके बाद जो उन्होंने और उनके परिवार ने कष्ट झेले उसे सभी जानते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि द्यूत या जुआ कभी भी फलदायी नहीं होता पर आदमी है कि उसके पीछे ही पड़ा रहता है। इधर आजकल तो लग रहा है कि लोगों को जुए का मतलब ही नहीं मालुम। टीवी चैनलों के धारावाहिक हों या दूसरे खेल सट्टे के आगोश में फंसे हैं पर लोग उसे मजे लेकर देख रहे हैं।<br />
जुआ या द्यूत यानि क्या? समझाना पड़ेगा वरना लगता नहीं कि लोग इसका मतलब अधिक जानते है। वरना लोग तो जुआ केवल ताश या पांसा खेलना ही समझते हैं। बहुत कम लोगों को मालुम होगा कि आज भी अनेक लोग यह खेल मुफ्त में खेलकर जीवन गुजार रहे हैं। जुआ का पूरा आशय जान लेंगे तो समझ में आयेगा कि आज तो पूरा वातावरण ही द्यूतमय हो रहा है। पहले तो कभी कभार ही जुए होते थे-वह भी बड़े लोगों के बीच- इसलिये इतिहास में दर्ज हो गये। दर्ज तो आज भी होते हैं पर जुए का स्वरूप सामने नहीं आता। कोई ताश मे हारा या पांसों में पता नहीं लगता। वैसे आज एक अंक का दूसरा क्रिकेट का सट्टा अधिक खेला जाता है। अनेक बार सुनने में आता है कि अमुक आदमी ने अपनी पत्नी को मारा, पिता को मारा या मां को मारा क्योंकि वह सट्टा खेलता था समाचार देने वाले चालाक हैं यह नहीं बताते कि वह कथित अपराधी क्रिकेट के पर सट्टा लगाकर बरबाद हुआ जिस कारण उसने यह जघन्य अपराध किया, क्योंकि इस खेल से भी उनको विज्ञापन और पैसा मिलता है फिर वह जिन नायकों के सहारे पैसा कमा रहे हैं उनकी खलनायकी कैसे दिखा सकते हैं </b></p>
<blockquote><p>
<span style="background-color:lime;color:magenta;">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">अर्थ का नाश, धर्मक्रिया का लोप, कर्मों में अप्रवृत्ति,सत्पुरुषों के समागम से विरक्ति, दुष्टों के साथ उठना बैठना,</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">हर समय क्रोध, हर्ष और संताप होना और क्लेख करना</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">स्नानादि शरीर संस्कार और उसके भोग में अनादर, व्यायाम न करना, अंगों की दुर्बलता,शास्त्र के अर्थ को देखना</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">मूत्रपूरीध के वेग को रोकना, भूख प्यास से अपने को ही पीड़ा देना </span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">यह सभी प्रमाण द्यूत या जुए के लक्षण हैं</span><br />
<span style="background-color:lime;">&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</span>.
</p></blockquote>
<p>पहले तो लोग भला नित प्रतिदिन अपने ग्रंथों का अध्ययन करते थे तब कुछ ज्ञान तो उनमें आ ही जाता था पर आज की पीढ़ी ने तो बस ग्रंथों के नाम ही सुने हैं बाकी तो उनके सामने हैं क्रिकेट या फिर टीवी चैनलों के वास्तविक शो जो किसी भी तरह से द्यूत जैसे नहीं दिखते पर उनसे कम नहीं हैं। इधर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति और फिर बाद में वैसा ही रहन सहन जड़ बुद्धि ही बनाता है। कहने को तो अपने देश के बुद्धिजीवियों ने अच्छे अच्छे नारे गड़ रखे हैं पर पर आसमान में हवा की तरह उड़ते दिखते हैं जमीन पर उनका प्रभाव कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। समाज सुधारक बुद्धिजीवियों को आज के समय के ऐसे खेल जुए की तरह नहीं लगते जिनमें पैसा का व्यय हो रहा है। हो सकता है यह विज्ञापन या चंदे का परिणाम हो कि हमारे समाज सुधारकों के समूह की दृष्टि उन पर वैसी न जाती हो जैसे ताश या पांसे के जूए पर जाती है।<br />
जुए का आशय यही है कि किसी खेल में परिणाम पर धन का लेन देन उसके जुआ होने का प्रमाण है। कोई किसी भी प्रकार के खेल में हिस्सेदारी करे पर उसके परिणाम पर अगर धन का लेनदेन करता है तो वह द्यूतक्रीड़ा में लिप्त है। सीधी बात कहें तो खेल में धन खर्च करना या लेना द्यूतक्रीड़ा या जुआ है। जुआ खेलना ही नहीं देखना भी विषप्रद है। हम अपनी इंद्रियों से जो ग्रहण करते हैं वैसा ही बाहर अभिव्यक्त भी होते हैं। वह चाहे हाथों से ग्रहण करें या नाक, कान, या आंख से। अगर कोई जुआ खेल रहा है और हम देख रहे हैं तो यकीन मानिए उसका दुष्परिणाम हमें भी कहीं न कहीं भोगना है। याद रखिये हमारी घर गतिविध का हम पर मानसिक प्रभाव पड़ता है। अरे यार, यह उपदेश नहीं है। यह सच है। सोचो जब कहीं भयानक आवाज होती है हमारे कान फटते हैं कि नहीं। कहीं से निकल रहे हैं और बदबू नाक में प्रवेश करती है तो कैसा लगता है? वही हाल विचार का भी है। जुआ देखोगे तो विचारों में कलुषिता तो आयेगी तब हम भले ही जूआ न खेलें किसी अन्य रूप में अवश्य प्रकट होगी। क्रिकेट के सट्टे पर कितने लोग बरबाद हो चुके हैं कोई नहीं बता सकता।<br />
क्रिकेट का हाल तो सभी जानते हैं। एक प्रतियोगिता होती है उसमें कोई टीम बहुत अच्छा खेली। उसे ठीक अगली प्रतियोगिता में वह नाकाम होती है। विशेषज्ञ इसे इंगित कर आश्चर्य व्यक्त करते हैं। दूनियां भर की टीमों पर मैच को पूर्वनिर्धारित करने का आरोप लग चुका है। कोई सामान्य आदमी कह भी क्या सकता है जब इसी नये प्रकार के जुआ के बारे में उन्हीं प्रचार माध्यमों में आता है जो इसका प्रचार भी करते हुए विज्ञापन भी पाते हैं। अभी कुछ दिनों पहले टैनिस में भी ऐसी ही बातें आयीं थीं। फुटबाल पर भी संशय किया जाने लगा है। इन सबकी कभी पूरी सच्चाई सामने न आती है न आयेगी क्योंकि पूरा विश्व ही द्यूतमय हो रहा है। कई लोगों को तो यह पता ही नहीं कि जुआ होता क्या है?<br />
इधर टीवी चैनलों पर वास्वविक धारावाहिक प्रदर्शित होते हैं। कई लोग तो उन पर भी पूर्वनिर्धारित होने का आरोप लगाते हैं। लिपपुते चेहरे और आकर्षक दृश्यों की चकाचैंध हमारे कौटिल्य महाराज का यह संदेश नहीं बदल सकती कि द्यूत अनर्थकारी होता है। आप बताईये आखिर हर मैच पर सटोरिये पकड़ जा रहे हैं इसका मतलब यह है कि अभी भी इस पर दांव लगाने वाले बहुत लोग हैं। इधर टीवी चैनलों पर वास्तविक धारावाहिकों के प्रसारण में लोगों से फोन पर संदेश और वोट मांगा जाता है उस पर क्या उनके फोन पर पैसे नहीं खर्च करते। वह मुफ्त में तो नहीं होता। अब यह तो हो गया टीवी चैनल वालों का व्यवसाय पर मनोरंजन करने पर वह भी प्रतिस्पर्धियों के बीच निर्णय कराने के लिये पैसा खर्च करना द्यूत हुआ कि नहीं। कहने को तो हम फिल्म पर भी पैसा खर्च करते हैं पर वहां कोई प्रतिस्पर्धी नहीं होता। सीधा आशय यह है कि मनोरंजन के लिये खेल पर पैसा खर्च करना या लेना द्यूतमय है और देखें तो आज पूरा विश्व उसमे लिप्त हो रहा है। ताश से जुआ खेलने वाले पकड़े जाते हैं क्योंकि उनका अपराध दिखता है पर प्रतिस्पर्धा खेल में पर्दे के पीछे क्या हो रहा है कौन देखने जाता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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<p><strong></strong></p>
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<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-पैसा खत्म होने पर आदमी में जोश नहीं रहता (heat in money-hindi massege)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/03/paise-ki-garmi-bhartrihari-shatak/</link>
<pubDate>Sat, 03 Oct 2009 05:03:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/03/paise-ki-garmi-bhartrihari-shatak/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि&nbsp; &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि&#160;</strong></strong><br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong></p>
<p><strong><strong>तानींद्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव।<br />
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षपोन सोऽष्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।</strong></strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>मनुष्य की इंद्रिया नाम,बुद्धि तथा अन्य सभी गुण वही होते हैं पर धन की उष्मा से रहित हो जाने पर पुरुष क्षणमात्र में क्या रह जाता है? धन की महिमा विचित्र है।<br />
<strong><strong>वर्तमान&#160;सन्दर्भ&#160;&#160;में संपादकीय व्याख्या-</strong></strong> इस सृष्टि को परमात्मा ने बनाया है पर माया की भी अपनी लीला है जिस पर शायद किसी का भी बस नहीं है। माया या धन के पीछे सामान्य मनुष्य हमेशा पड़ा रहता है। चाहे कितना भी किसी के पास आध्यत्मिक ज्ञान या कोई दूसरा कौशल हो पर पंच तत्वों से बनी इस देह को पालने के लिये रोटी कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है। अब तो वैसे ही वस्तु विनिमय का समय नहीं रहा। सारा लेनदेन धन के रूप में ही होता है इसलिये साधु हो या गृहस्थ दोनों को ही धन तो चाहिये वरना किसी का काम नहीं चल सकता। हालांकि आदमी का गुणों की वजह से सम्मान होता है पर तब तक ही जब तक वह किसी से उसकी कीमत नहीं मांगता। वह सम्मान भी उसको तब तक ही मिलता है जब तक उसके पास अपनी रोजी रोटी होती है वरना अगर वह किसी से अपना पेट भरने के लिये धन भिक्षा या उधार के रूप में मांगे तो फिर वह समाप्त हो जाता है।<br />
वैसे भी सामान्य लोग धनी आदमी का ही सम्मान करते है। कुछ धनी लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने गुणों की वजह से पुज रहे हैं। इसी चक्कर में कुछ लोग दान और धर्म का दिखावा भी करते हैं। अगर धनी आदमी हो तो उसकी कला,लेखन तथा आध्यात्मिक ज्ञान-भले ही वह केवल सुनाने के लिये हो-की प्रशंसा सभी करते हैं। मगर जैसे ही उनके पास से धन चला जाये उनका सम्मान खत्म होते होते क्षीण हो जाता है। </p>
<p>इसके बावजूद यह नहीं समझना चाहिये कि धन ही सभी कुछ है। अगर अपने पास धन अल्प मात्रा में है तो अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये। बस मन में शांति होना चाहिये। दूसरे लोगों का समाज में सम्मान देखकर अपने अंदर कोई कुंठा नहीं पालना चाहिये। यह स्वीकार करना चाहिये कि यह धन की महिमा है कि दूसरे को सम्मान मिल रहा है उसके गुणों के कारण नहीं। इसलिये अपने गुणों का संरक्षण करना चाहिये। वैसे यह सच है कि धन का कोई महत्व नहीं है पर वह इंसान में आत्मविश्वास बनाये रखने वाला एक बहुत बड़ा स्त्रोत है। सच<br />
&#160;तो यह है कि खेलती माया है हम सोचते हैं कि हम खेल रहे हैं।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;&#160;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विदुर दर्शन-सात्विक कार्य सिद्ध न हो भी चिंता नहीं]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/01/satvik-karya-ke-chinta-hindu-sandesh-in-hindi/</link>
<pubDate>Thu, 01 Oct 2009 04:33:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/01/satvik-karya-ke-chinta-hindu-sandesh-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत। अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।। हिंदी में भावार्थ-मिथ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत।<br />
अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>मिथ्या उपाय से कपट पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं पर उनमें मन लगाना ठीक नहीं है।<br />
<strong>तथैव योगविहितं यत्तु कर्म नि सिध्यति।<br />
उपाययुक्तं मेधावी न तव्र गलपयेन्मनः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>अच्छे और सात्विक प्रयास करने पर कोई सत्कर्म सिद्ध नहीं भी होता है तो भी बुद्धिमान पुरुष को अपने अंदर ग्लानि नहीं अनुभव करना चाहिए।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अक्सर आपने सुना होगा कि प्यार और जंग में सब जायज है-यह पश्चिम से आयातित विचार है।  जीवन की तो यह वास्तविकता है कि जैसा कर्म करोगे वैसा परिणाम सामने आयेगा।  जैसा  मन में संकल्प होगा वैसे ही यह संसार हमारे साथ व्यवहार करेगा। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने कर्म की शुद्धता और अशुद्धता का बोध नहीं रहता। इसी कारण वह ऐसे उपायों का भी सहारा लेता है जो अपवित्र और अनैतिक हैं। फिर उसको अपनी बात के प्रमाण  रखने के लिये अनेक प्रकार के झूठ भी बोलने पड़ते हैं।  इस तरह वह हमेशा पाप की दुनियां में घूमता है।  मगर मन तो मन है वह उसकी तृप्ति के लिये भक्ति और साधना का ढोंग भी करता है। इससे प्रकार वह एक ऐसे मायाजाल में फंसा रहता है जिससे जीवन भर उसकी मुक्ति नहीं होती।<br />
इसलिये अपने जीवन में अच्छे संकल्प धारण करने के साथ ही अपने कार्य की सिद्ध के लिये पवित्र और नैतिक उपायों की ही सहायता लेना चाहिए। </p>
<p>बाकी लोग किस रास्ते पर जा रहे हैं यह विचार करने की बजाय यह देखना चाहिए कि हमारे लिये उचित मार्ग कौनसा है। इसके अलावा यह भी एक अन्य बात यह भी  है कि अगर हमारा कोई पवित्र और सात्विक कर्म अपने उचित उपाय से सिद्ध नहीं होता तो भी परवाह नहीं करना चाहिए। याद रखें कार्य सिद्ध होने का भी अपना एक समय होता है और जब आता है तो हमें यह भी पता नहीं लगता कि वह काम कैसे पूरा हुआ।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[न सतयुग, न कलियुग-हास्य कविता (satyug aur kaliyug-hasya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/29/n-satyug-hai-n-kaliyug-hindi-hasya/</link>
<pubDate>Tue, 29 Sep 2009 17:45:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/29/n-satyug-hai-n-kaliyug-hindi-hasya/</guid>
<description><![CDATA[फंदेबाज मिला रास्ते में और बोला ‘चलो दीपक बापू तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें। वहां सर्वशक्तिमान के]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>फंदेबाज मिला रास्ते में<br />
और बोला<br />
‘चलो दीपक बापू<br />
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।<br />
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।<br />
हमारे दोस्त का आयोजन है<br />
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,<br />
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का<br />
इस जीवन को देने का कर्जा,<br />
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’</p>
<p>सुनकर पहले चौंके दीपक बापू<br />
फिर टोपी घुमाते हुए बोले<br />
‘कमबख्त,<br />
न यहां दुःख है न सुख है<br />
न सतयुग है न कलियुग है<br />
सब है अनूभूति का खेल<br />
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया<br />
रौशनी होगी तभी<br />
जब चिराग में होगी बाती और तेल,<br />
मार्ग दो ही हैं<br />
एक योग और दूसरा रोग का<br />
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,<br />
दृश्यव्य माया है<br />
सत्य है अदृश्य<br />
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी<br />
सत्य से भागता है<br />
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है<br />
इस पूर्ण ज्ञान को<br />
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये<br />
प्रकृति की कितनी कृपा है<br />
इस धरा पर यह भी समझा गये<br />
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान<br />
कोई नया अवतार<br />
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है<br />
वही हैं हमारे करतार<br />
अब तो जिनको धंधा चलाना है<br />
वही लाते इस देश में नया अवतार,<br />
कभी देश में ही रचते<br />
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते<br />
उनकी नीयत है तार तार,<br />
हम तो सभी से कहते हैं<br />
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है<br />
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।<br />
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में<br />
हम कैसे फंस जायें?<br />
यहां तो धर्म के नाम पर<br />
कदम कदम पर<br />
लोग किसी न किसी अवतार  का<br />
ऐसे ही जाल बिछायें।</b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भारतीय मीडिया और चीन-हिंदी व्यंग्य (bhartiya prachartantra aur china-hindi vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/25/bharat-ka-prachatantra-aur-chin-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Fri, 25 Sep 2009 04:52:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/25/bharat-ka-prachatantra-aur-chin-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[मीडिया यानि टीवी चैनल और समाचार पत्र-जिनकों हम संगठित प्रचारतंत्र भी कह सकते हैं-बिना सनसनी के नहीं ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>मीडिया यानि टीवी चैनल और समाचार पत्र-जिनकों हम संगठित प्रचारतंत्र भी कह सकते हैं-बिना सनसनी के नहीं चल सकते कम से कम उनमें काम करने वाले लोगों की मान्यता तो यही है।  राई का पहाड़ और पहाड़ से निकली चुहिया को हाथी बनाने की कला ही प्रचारतंत्र का मूल मंत्र है।  अब यह कहना कठिन है कि कितनी सनसनी खबरें प्रायोजित  या स्वघटित हैं।<br />
अभी कुछ दिनों पहले एक विदेशी चैनल का एक पत्रकार लोगों की हत्या कराकर उनके समाचारों को सनसनी ढंग से प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।  वह अपने व्यवसाय के सफलता के लिये ऐसी हरकतें कर रहा था। अभी हमारे देश के प्रचार तंत्र के लोगों की आत्मा मरी नहीं है कि वह ऐसी हरकतें करें पर ऐसी खबरें तो प्रायोजित करने के साथ प्रसारित कर ही सकते हैं जिससे किसी को शारीरिक हानि न पहुंचे न ही अपराध हो।<br />
आखिर यह चल तो विदेशी ढर्रे पर ही रहे हैं। हो सकता है ऐसा न हो पर इधर चीन को लेकर जो सनसनी फैली है उसका तो न ओर मिल रहा है न छोर।</p>
<p>प्रचारतंत्र ने कह दिया कि घुसपैठ हुई।   उसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई तो अनेक तरह के कथित प्रमाण लाये गये।  आधिकारिक रूप से खंडन होते रहे हैं पर प्रचार तंत्र है कि बस अड़ा ही हुआ है कि घुसपैठ हुई।  करीब दो सप्ताह से सनसनी फैली रही तब जाकर चीन की नींद खुली।  मुश्किल यह है कि चीनी अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषा सीखते नहीं है इसलिये हिंदी के प्रचारतंत्र का उनको पता नहीं कि क्या चल रहा है?<br />
किसी हिंदी भाषी ने ही उनको चीनी भाषा में  लताड़ते हुए इन खबरों के बारे में पूछा होगा तब  चीन ने आधिकारिक तौर पर भारतीय प्रचारतंत्र पर दुष्प्रचार का आरोप जड़ा।  अभी तक भारत के रणनीतिकारों पर आक्रमण करने वाला चीन इतना बदहवास हो गया कि उसने सीधे ही प्रचारतंत्र को घेरे में ले लिया।<br />
भारत की परवाह न करने वाला चीन पहली बार इतने तनाव में आया इस बात पर भारतीय प्रचारतंत्र को कुछ श्रेय दिया ही जाना चाहिए।  इस प्रचारतंत्र को लेकर चीन भारतीय रणनीतिकारों से यह तो कह नहीं सकता कि इन पर नियंत्रण करो क्योंकि यह प्रचारतंत्र सरकारी नहीं है।  भारत चीन से कह सकता है कि तुम अपने प्रचारतंत्र पर नियंत्रण करो क्योंकि वहां पर सरकार ही उसकी मालिक है। चीन का प्रचारतंत्र भी  तो भारत के विरुद्ध विषवमन करता है और उसका सीधा आशय यही है कि वहां की सरकार यही चाहती है।<br />
मगर इस बार चीन को भारतीय प्रचारतंत्र के रूप में जो असंगठित प्रतिद्वंद्वी मिला है उससे उसका पार पाना संभव नहीं है।   सरकारी तौर पर नियंत्रण से परे इस प्रचारतंत्र की खूबी यह है कि कहता ही रहता है सुनता कुछ नहीं देखता है। एक शब्द देख लिया उस पर पूरा कार्यक्रम बना डाला।  कहते हैं कि चीनी सुनते अधिक परबोलते कम हैं जबकि हमारा यह स्वतंत्र प्रचारतंत्र बोलता अधिक है सुनता कम। चीनी भी आखिर कुछ बोलेंगे पर उनका एक ही शब्द उनको परेशान कर डाल सकता है अगर भारतीय प्रचारतंत्र ने उसका नकारात्मक अर्थ लिया।<br />
जब भारतीय प्रचारतंत्र उसके खिलाफ आग उगल रहा है तब कोई वहां के प्रचारतंत्र  चुप बैठा हों यह संभव नहीं है मगर वह भारतीय प्रचारतंत्र का प्रसारण तो  देखेंगे पर भारतीय प्रचारतंत्र उनकी तरफ नहीं देखेगा।   यह उपेक्षासन का गुण भारतीय प्रचारतंत्र को विजेता बनाये हुए है। अपने विरुद्ध ऐसा प्रचार देख और सुनकर चीनी आग बबूला होकर कार्यक्रम बनायेंगे पर यहां देखेगा कौन?  इससे उनकी आग और बढ़ जाती होगी। </p>
<p>इस प्रचार का ही नतीजा है कि दिल्ली में चीन के राजनयिक इधर उधर भागदौड़ करते रहे। एक तरह से चीन इस प्रचारतंत्र को लेकर भारत पर दबाव डाल रहा है पर यह उसके लिये परेशानी का कारण ही बनने वाला है।  हो सकता है कि अभी यह प्रचारतंत्र चुप हो जाये पर अब चीन को आगे यह सब झेलना पड़ सकता है।<br />
अपने प्रचारतंत्र का एक विषय पाकिस्तान तो बना ही हुआ है। उसके यहां अपने देश तथा विदेश के जो खुराफाती तत्व सक्रिय हैं उन पर हमारा प्रचारतंत्र अपनी बहुत सारी रील और शब्द खर्च कर चुका है। लोग उससे उकता गये हैं।  लोगों को व्यस्त रखने के लिये एक दुश्मन तो चाहिये न!  मुश्किल यह है कि चीन बहुत खौंचड़ी है पर उसने अपने यहां अपराधियों को पनाह नहीं दी है जिसको प्रचारतंत्र हीरो बना दे। वहां की हीरो तो बस सरकार ही है!  अमेरिकी आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि उसकी विकासदर में अपराध के पैसे का भी योगदान है।  ऐसे में वहां के किसी अपराधी का महिमामंडन तो यहां हो नहीं सकता। लेदेकर एक ही विषय बचता है ‘सीधा हमला’।  भारतीय सैन्य विशेषज्ञ स्वयं मानते हैं कि सीमा का आधिकारिक अभिलेख न होने के कारण दोनों के सामने ऐसी समस्या आती है।  जब भारत को समस्या आयी तो उसे इस तरह सीधा हमला प्रसारित कर प्रचारतंत्र ने जो गजब की फुर्ती दिखाई उसके लिये वह प्रशंसा के काबिल है क्योंकि उसने उस देश को हिला दिया जो किसी से डरता नहीं है।  इसका यह भी नतीजा आ सकता है कि आगे चीन ऐसी गल्तियां न करे जिससे तिल का ताड़ बने।<br />
वैसे एक खबर एक चैनल ने दूसरी खबर भी चलाई कि भारतीय बाघ का दुश्मन चीन।  दरअसल वहां  शेर की खाल से शराब बनती है और आरोप लग रहा है कि नेपाल के तस्करी के जरिये भारत से खाल चीन जाती है।  शेरों का शिकार करने कोई चीनी नहीं आते बल्कि अपने ही देश के लोग यह काम करते हैं।  इसमें चीन का पूरा दोष नहीं है पर तस्करी के द्वारा इस तरह शेरों की खाल जाने की जिम्मेदारी से वह बच भी नहीं सकता। फिलहाल दोस्ताना रूप से यह बात तो चैनल वाले मान भी रहे हैं पर यह दोस्ताना आगे जारी रहेगा-यह चीनियों को सोचना भी नहीं चाहिए।   अपने देश में शेरों की हत्या कर देना कोई सामान्य मामला नहीं है पर जिस तरह चीन को लक्ष्य कर यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया उससे तो लग रहा है कि चीन पर प्रचारतंत्र की नजर पड़ गयी है।  आने वाले समय में ऐसे बहुत सारे कार्यक्रम आ सकते हैं जिस पर चीन बौखला सकता है। इसकी वजह यह है कि वहां की हर गतिविधि के लिये सरकार सीधे जिम्मेदार मानी जाती है। अभी कुछ दिनों पहले भारत के नाम से  नकली दवाईयां नाइजीरिया में  भेजने के मामले में चीन फंस चुका है।  भारतीय प्रचारतंत्र अभी तक चीन को समझता नहीं था पर अब उसे लगने लगा कि वहां की सरकार भारत को परेशान करने के लिए अपराध की हद तक जा सकती है। अपराध की भनक भी प्रचारतंत्र के कान खड़े कर सकती है क्योंकि सनसनी तो उसी ही फैलती है न! यहीं से चीन भी अब उसके दायरे में आ गया है क्योंकि उसके साफसुथरे और संपन्न होने का तिलिस्म भारतीय प्रचारतंत्र के सामने खत्म हो गया है।  अब चीन के सामने एक केवल एक मार्ग है वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष से भारत के विरुद्ध अपराध होने को रोक दे नहीं तो जितना वह करेगा उससे अधिक तो भारतीय प्रचारतंत्र बतायेगा। इसे रोकना किसी के लिये संभव नहीं है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खिचड़ी खबरनामा-हिन्दी हास्य व्यंग्य (khichdi khabarnama-hindi hasya vyangya]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/13/khichdi-khabarnama-hindi-comedy-satire/</link>
<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 09:43:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/13/khichdi-khabarnama-hindi-comedy-satire/</guid>
<description><![CDATA[उस क्रिकेट माडल ने टीवी वाले पत्रकारों के साथ बदतमीजी की। यह खबर भी टीवी चैनल वालों ने दी हैं। क्रिक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>उस क्रिकेट माडल ने टीवी वाले पत्रकारों के साथ बदतमीजी की। यह खबर भी टीवी चैनल वालों ने दी हैं। क्रिकेट माडल यानि वह खिलाड़ी जो खेलने के साथ ही विज्ञापन में भी करते हैं। अब टीवी चैनल वाले उस पर शोर मचा रहे हैं कि उसने ऐसा क्यों किया?’<br />
अब उनका यह प्रलाप भी उस तरह प्रायोजित है जैसा कि उनके समाचार या वास्तव में ही वह दुःखी हैं, कहना कठिन हैं। एक जिज्ञासु होने के नाते समाचारों में हमारी दिलचस्पी है पर टीवी समाचार चैनल वाले समाचार दिखाते ही कहां हैं?<br />
इस मामले में उन पर उंगली भी कोई नहीं उठाता। कहते हैं कि हमारा चैनल समाचारों के लिये बना है। टी.आर.पी रैटिंग में अपने नंबरों के उनके दावे भी होते हैं। इस पर आपत्ति भी नहीं की जानी चाहिये पर मुद्दा यह है कि उनको यह सम्मान समाचार के लिये नहीं बल्कि मनोंरजन के लिये मिलता है ऐसे में जो चैनल केवल समाचार देते हैं उनका हक मारा जाता है। सच तो यह है कि अनेक समाचार चैनल तो केवल मनोरंजन ही परोस रहे हैं पर अपनी रेटिंग के लिये वह समाचार चैनल की पदवी ओढ़े रहते है। अगर ईमानदारी से ऐसे मनोरंजन समाचार चैनल का सही आंकलन किया जाये तो उनको पूर्णतः समाचार और मनोरंजन चैनलों के मुकाबले कोई स्थान ही नहीं मिल सकता। अलबत्ता यह खिचड़ी चैनल है और उनके लिये कोई अलग से रैटिंग की व्यवस्था होना चाहिए।<br />
जिस क्रिकेट माडल ने उनको फटकारा वह खिचड़ी चैनलों के चहेतोें में एक है। अपने इन मनोरंजक समाचार चैनलों के पास फिल्मी अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और क्रिकेट खिलाड़ियों के जन्म दिनों का पूरा चिट्ठा है। जिसका वह रोज उपयोग करते हैं। उस दिन जन्म दिन वाला फिल्मी और क्रिकेट माडल तो संभवतः इतना बिजी रहता होगा कि वह शायद ही उनके प्रसारण देख पाता हो। इससे भी मन नहीं भरता तो प्रायोजित इश्क भी करवा देते हैं-समाचार देखकर तो यही लगता है कि कभी किसी अभिनेत्री को क्रिकेट खिलाड़ी से तो कभी अभिनेता से इश्क करवाकर उसका समाचार चटखारे लेकर सुनाते हैं।<br />
यह मनोरंजक समाचार चैनल जो खिचड़ी प्रस्तुत करते हैं वह प्रायोजित लगती है। अब भले ही उस क्रिकेट माडल ने टीवी पत्रकार को फटकारा हो पर उसका प्रतिकार करने की क्षमता किसी में नहीं है। वजह टीवी चैनल और क्रिकेट माडल के एक और दो नंबर के प्रायोजक एक ही हैं। अगर चैनल वाले गुस्से में उसे दिखाना बंद कर दें या उसकी खिचड़ी लीलाओं-क्रिकेट से अलग की क्रियाओं- का बहिष्कार करें तो प्रायोजक नाराज होगा कि तुम हमारे माडल को नहीं दिखा रहे काहे का विज्ञापन? उसका प्रचार करो ताकि उसके द्वारा अभिनीत विज्ञापन फिल्मों के हमारे उत्पाद बाजार में बिक सकें।<br />
खिलाड़ी स्वयं भी नाराज हो सकता है कि जब मेरी खिचड़ी गतिविधियों-इश्क और जन्मदिन कार्यक्रम- का प्रसारण नहीं कर रहे तो काहे का साक्षात्कार? कहीं उसके संगी साथी ही अपने साथी के बहिष्कार का प्रतिकार उसी रूप में करने लगे तो बस हो गया खिचड़ी चैनलों का काम? साठ मिनट में से पचास मिनट तक का समय इन अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और क्रिकेट खिलाड़ियों की खिचड़ी गतिविधियों के कारण ही इन चैनलों का समय पास होता है। अगर आप इन चैनल वालों से कहें कि इस तरह के समाचार क्यों दे रहे हैं तो यही कहेंगे कि ‘दर्शक ऐसा हीं चाहते हैं’। अब इनसे कौन कहे कि ‘तो ठीक है तो अपने आपको समाचार की बजाय मनोरंजन चैनल के रूप में पंजीकृत क्यों नहीं कराते।’<br />
हो सकता है कि यह कहें कि इससे उनको दर्शक कम मिलेंगे क्योंकि अधिकतर समाचार जिज्ञासु फिर धोखे में नहीं फंसेंगे न! मगर इनके कहने का कोई मतलब नहीं है क्योकि सभी जानते हैं कि यह चैनल दर्शकों की कम अपने प्रायोजकों को की अधिक सोचते हैं। यह उनका मुकाबला यूं भी नहीं कर सकते क्योंकि जो इनके सामने जाकर अपमानित होते हैं वह पत्रकार सामान्य होते हैं। उनमें इतना माद्दा नहीं होता कि वह इनका प्रतिकार करें। उनके प्रबंधक तो उनके अपमान की चिंता करने से रहे क्योंकि उनको अपने प्रायोजक स्वामियों का पता है जो कि इन फिल्म और खेलों के माडलों के भी स्वामी है।<br />
वैसे आजकल तो फिल्म वाले क्रिकेट पर भी हावी होते जा रहे हैं। पहले फिल्म अभिनेत्रियां अपने प्रचार के लिये कोई क्रिकेट खिलाड़ी से इश्क का नाटक रचती थीं पर वह तो अब टीम ही खरीदने लगी हैं जिसमें एक नहीं चैदह खिलाड़ी होते हैं और उनकी मालकिन होने से प्रचार वैसे ही मिल जाता है। क्रिकेट, फिल्म और समाचार की यह खिचड़ी रूपरेखा केवल आम आदमी से पैसा वसूलने के लिये बनी हैं।<br />
क्रिकेट खिलाड़ी और फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियां करोड़ों रुपये कमा रहे हैं और उसका अहंकार उनमें आना स्वाभाविक है। उनके सामने दो लाख या तीन लाख माहवार कमाने वाले पत्रकार की भी कोई हैसियत नहीं है ओर फिर उनको यह भी पता है कि अगर इन छोटे पत्रकारों को फटकार दिया तो क्या बिगड़ने वाला है? उनके प्रबंधक भी तो उसी प्रायोजित धनसागर में पानी भरते हैं जहां से हम पीते हैं।<br />
इधर हम सुनते आ रहे हैं कि विदेशों में एक चैनल के संवाददाता ने अपनी सनसनी खेज खबरों के लिये अनेक हत्यायें करा दी। हमारे देश में ऐसा हादसा होना संभव नहीं है पर समाचारों की खिचड़ी पकाने के लिये चालबाजियां संभव हैं क्योंकि उनमें कोई अपराधिक कृत्य नहीं होता। इसलिये लगता है जब कोई खेल या फिल्म की खबर नहीं जम रही हो तो यह संभव है कि किसी प्रायोजक या उसके प्रबंधक से कहलाकर फिल्मी और क्रिकेट माडल से ऐसा व्यवहार कराया जाये जिससे सनसनी फैले। हमारे देश के संचार माध्यमों के कार्यकर्ता पश्चिम की राह पर ही चलते हैं और यह खिचड़ी पकाई गयी कि फिक्स की गयी पता नहीं।<br />
अब यह तो विश्वास की बात हो गयी। वैसे अधिकतर टीवी पत्रकार आम मध्यमवर्गीय होते हैं उनके लिये यह संभव नहीं है कि स्वयं ऐसी योजनायें बनाकर उस पर अमल करें अलबता उनके पीछे जो घाघ लोग हैं उनके लिये ऐसी योजनायें बनाना कोई मुश्किल काम नहीं है। यही कारण है कि खिचड़ी समाचार ही पूर्ण समाचार का दर्जा पाता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;. </b></p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सच का सामना और हास्य कवि-हास्य व्यंग्य कविता (face for trutu and hindi poet-hasya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/06/sach-ka-samna-and-hasya-kavi-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sun, 06 Sep 2009 11:54:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/06/sach-ka-samna-and-hasya-kavi-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[उन सज्जन ने सच की पहचान करने वाली मशीन की दुकान लगाई पर उसके उद्घाटन के लिये कोई तैयार नहीं हुआ भाई।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>उन सज्जन ने सच की पहचान करने वाली<br />
मशीन की दुकान लगाई<br />
पर उसके उद्घाटन के लिये<br />
कोई तैयार नहीं हुआ भाई।<br />
न नेता<br />
न अभिनेता<br />
न अधिकारी<br />
न व्यापारी<br />
उसे जो भी मिले सभी थे<br />
दिखाने के लिये सच के भक्त<br />
पर थे झूठे दरबारी<br />
तब उसे याद आया अपना<br />
भूला बिसरा दोस्त<br />
जो करता था हास्य कविताई।<br />
उसने हास्य कवि से आग्रह किया<br />
‘करो मेरी सच की मशीन का उद्घाटन<br />
तो करूं कमाई।<br />
कोई नहीं मिला<br />
इसलिये तुम्हारी याद आई।<br />
फ्लाप कवि हो तो क्या<br />
हिट है जों उनकी असलियत भी देख ली<br />
अब तुम दिखाओ अपना जलवा<br />
मत करना ना कर बेवफाई।’</p>
<p>सुनकर हास्य कवि बोला-<br />
‘मेरे भूले बिसरे जमाने के मित्र<br />
तुम्हें अब मेरी याद आई।<br />
तुम्हारे धोखे की वजह से<br />
करने लगा था मैं हास्य कविताई।<br />
वैसे भी तुम पहले नहीं थे<br />
न तुम आखिरी हो जिससे धोखा खाया<br />
फिर दाल रोटी के चक्कर में<br />
बहुत से सच सामने आते हैं<br />
उन्हें भुलाने के लिये शब्द भी चले आते हैं<br />
लिखते नहीं नाम किसी का<br />
इशारों में तो बहुत कुछ कह जाता हूं<br />
लोग भागते हैं<br />
पर मैं अपने सच से स्वयं लड़ता जाता हूं<br />
मुझे तो कोई डर नहीं है<br />
सच पहचाने वाली मशीन की<br />
गर्म कुर्सी पर बैठ जाऊंगा<br />
पर जो जेहन में हैं मेरे<br />
उन लोगों के नाम भी आ जायेंगे<br />
उनमें तुम्हारा भी होगा<br />
बोलो झेल सकोगे जगहंसाई।’</p>
<p>मित्र भाग निकला यह सुनकर<br />
फिर पीछे देखने की सोच भी उसमें न आई।</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[सच का सामना करने से नहीं होगा तय रिश्ता-हिन्दी हास्य कविता (sach ka samana aur shadi ka rishta-hindi hasya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/05/sach-ka-samana-aur-vivah-hindi-comedy-satire-peom/</link>
<pubDate>Sat, 05 Sep 2009 05:38:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/09/05/sach-ka-samana-aur-vivah-hindi-comedy-satire-peom/</guid>
<description><![CDATA[लड़के की मां ने रिश्ते कराने वाले मध्यस्थ से कहा ‘‘लड़की और परिवार के साथ दहेज का मामला भी समझ में आये]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>लड़के की मां ने<br />
रिश्ते कराने वाले मध्यस्थ से कहा<br />
‘‘लड़की और  परिवार के साथ<br />
दहेज का मामला भी समझ में आयेगा।<br />
बस एक बात रह गयी है कहना कि<br />
अब तो चल गया है  सच के सामना करने का फैशन<br />
इसलिये लड़की को उस मशीन पर भी बिठायेंगे<br />
चाहें उसके मां बाप तो<br />
अपने लड़के को भी उस पर दिखायेंगे<br />
इस तरह रिश्ता तय हो जायेगा।’</p>
<p>सुनकर लड़का चौंका<br />
और इशारा कर मां को बाहर बुलाया<br />
और बोला-<br />
‘यह क्या कर रही हो माताश्री<br />
उस तरह तो मेरा कभी भी विवाह<br />
संपन्न नहीं हो पायेगा।<br />
तेरा और मेरा रिश्ता तो इसी जन्म का है<br />
जो व्यर्थ जायेगा।<br />
यह टीवी देखकर मत चलो<br />
ऐसा न हो कि फिर इस रिश्ते से हाथ मलो<br />
सच की मशीन है इस तरह कि<br />
जो मेरे बारे में तुम भी नहीं जानती<br />
सभी को पता चल जायेगा।<br />
चुपचाप हामी भर दो<br />
वरना तुम्हारे सास बनने का<br />
और मेरा घर बसने का सपना<br />
सच का सामना करते ही टूट जायेगा।’’</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इश्क में नहीं होता सच का सामना-हास्य कविता (ishq aur sach ka samana-hasya kavita)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/08/31/premi-premika-aur-sach-hindi-sakvita/</link>
<pubDate>Mon, 31 Aug 2009 16:01:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/08/31/premi-premika-aur-sach-hindi-sakvita/</guid>
<description><![CDATA[इश्क परवान चढ़ जाये माशुका बीवी बन साथ निभाये इसलिये आशिक ने कमाने के लिये सच की पहचान करने वाली मशीन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>इश्क परवान चढ़ जाये<br />
माशुका बीवी बन साथ निभाये<br />
इसलिये आशिक ने कमाने के लिये<br />
सच की पहचान करने वाली मशीन की<br />
दुकान लगाई<br />
और यह खबर माशुका को सुनाई।<br />
सुनकर वह हो गयी पसीना पसीना<br />
पूछने पर बोली<br />
‘’यह कैसी दुकान लगायी।<br />
अरे, तुमने सुना नहीं<br />
इसके चक्कर में अमेरिका में<br />
कितने घर बरबाद हुए हैं<br />
फिर अपने देश में भी हो चुकी<br />
कई लोगों की जगहंसाई।<br />
कोई और काम ढूंढो<br />
कहीं काम नहीं चला तो तुम<br />
कभी खुद गरम कुर्सी (हाट सीट) पर बैठोगे<br />
कभी मुझसे बैठने को कहोगे<br />
कहीं हो न जाये तुम्हारे और मेरे बीच लड़ाई।’’</p>
<p>सुनकर आशिक हंसा और बोला<br />
‘‘अरे, यह बात नहीं है<br />
यह एकदम नयी चीज है<br />
अपने देश का आदमी बस<br />
नयी चीज चाहता है<br />
अपने पुराने ज्ञान से भागता है<br />
अभी तो दुकान पर बोर्ड ही लगा है<br />
तब ढेर सारे लोग तो  आ रहे हैं<br />
अपनों का सच जानने उनको ला रहे हैं<br />
जानते हैं सब<br />
सच कड़वा होता है<br />
कभी कभी दुश्मनी का बीज भी बोता है<br />
फिर भी अंधे होकर<br />
फैशन की दौड़ में जा रहे हैं<br />
किसी का घर बिगड़े हमें क्या<br />
अपनी रोजी निकलनी चाहिये<br />
जहां तक तुम्हारे और मेरे बैठने की बात है<br />
भला कोई हलवाई अपनी मिठाई खाता है<br />
जो हम गरम कुर्सी पर बैठेंगे<br />
बहुत सोचकर समझकर ही मैंने यह योजना बनाई।&#8221;</strong><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लॉग पर लिखा गया भी साहित्य है-हिन्दी आलेख (Literature written on the blog - the Hindi article)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/08/27/hindi-blog-writting-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Thu, 27 Aug 2009 14:54:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/08/27/hindi-blog-writting-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[हिंदी की विकास यात्रा नहीं रुकेगी। लिखने वालों का लिखा बना रहेगा भले ही वह मिट जायें। पिछले दिनों कु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>हिंदी की विकास यात्रा नहीं रुकेगी। लिखने वालों का लिखा बना रहेगा भले ही वह मिट जायें।  पिछले दिनों कुछ दिलचस्प चर्चायें सामने आयीं। हिंदी के एक लेखक महोदय प्रकाशकों से बहुत नाखुश थे पर फिर भी उन्हें ब्लाग में हिंदी का भविष्य नहीं दिखाई दिया। अंतर्जाल लेखकों को अभी भी शायद इस देश के सामान्य लेखकों और प्रकाशकों की मानसिकता का अहसास नहीं है यही कारण है कि वह अपनी स्वयं का लेखकीय स्वाभिमान भूलकर उन लेखकों के वक्तव्यों का विरोध करते हुए भी उनके जाल में फंस जाते हैं।<br />
एक प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या ब्लाग पर लिखा गया साहित्य है? जवाब तो कोई नहीं देता बल्कि उलझ कर सभी ऐसे मानसिक अंतद्वंद्व में फंस जाते हैं जहां केवल कुंठा पैदा होती है।  हमारे सामने इस प्रश्न का उत्तर एक प्रति प्रश्न ही है कि ‘ब्लाग पर लिखा गया आखिर साहित्य क्यों नहीं है?’</p>
<p>जिनको लगता है कि ब्लाग पर लिखा गया साहित्य नहीं है उनको इस प्रश्न का उत्तर ही ढूंढना चाहिए।  पहले गैरअंतर्जाल लेखकों की चर्चा कर लें। वह आज भी प्रकाशकों का मूंह जोहते हैं।  उसी को लेकर शिकायत करते हैं।  उनकी शिकायतें अनंतकाल तक चलने वाली है और अगर आज के समय में आप अपने लेखकीय कर्म की स्वतंत्र और मौलिक अभिव्यक्ति चाहते हैं तो अंतर्जाल पर लिखने के अलावा कोई चारा नहीं है।  वरना लिफाफे लिख लिखकर भेजते रहिये। एकाध कभी छप गयी तो फिर उसे दिखा दिखाकर अपना प्रचार करिये वरना तो झेलते रहिये दर्द अपने लेखक होने का।<br />
उस लेखक ने कहा-‘ब्लाग से कोई आशा नहीं है। वहां पढ़ते ही कितने लोग हैं?<br />
वह स्वयं एक व्यवसायिक संस्थान में काम करते हैं। उन्होंने इतनी कवितायें लिखी हैं कि उनको साक्षात्कार के समय सुनाने के लिये एक भी याद नहीं आयी-इस पाठ का  लेखक भी इसी तरह का ही है।  अगर वह लेखक सामने होते तो उनसे पूछते कि ‘आप पढ़े तो गये पर याद आपको कितने लोग करते हैं?’<br />
अगर ब्लाग की बात करें तो पहले इस बात को समझ लें कि हम कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं उसका नामकरण  केल्कूलेटर, रजिस्टर, टेबल, पेन अल्मारी और मशीन के  शब्दों को जोड़कर किया गया है।  मतलब यह है कि इसमें वह सब चीजें शामिल हैं जिनका हम लिखते समय उपयोग करते हैं।  अंतर इतना हो सकता है कि अधिकतर लेखक हाथ से स्वयं लिखते हैं पर टंकित अन्य व्यक्ति करता है और वह उनके लिये एक टंकक भर होता है। कुछ लेखक ऐसे भी हैं जो स्वयं टाईप करते हैं और उनके लिये यह अंतर्जाल एक बहुत बड़ा अवसर लाया है।  स्थापित लेखकों में संभवतः अनेक टाईप करना जानते हैं पर उनके लिये स्वयं यह काम करना छोटेपन का प्रतीक है। यही कारण है अंतर्जाल लेखक उनके लिये एक तुच्छ जीव हैं।<br />
इस पाठ का लेखक कोई प्रसिद्ध लेखक नहीं है पर इसका उसे अफसोस नहीं है।  दरअसल इसके अनेक कारण है।  अधिकतर बड़े पत्र पत्रिकाओं के कार्यालय बड़े शहरों में है और उनके लिये छोटे शहरों में पाठक होते हैं लेखक नहीं। फिर डाक से भेजी गयी सामग्री का पता ही नहीं लगता कि पहुंची कि नहीं।  दूसरी बात यह है अंतर्जाल पर काम करना अभी स्थापित लोगों के लिये तुच्छ काम है और बड़े अखबारों को सामगं्री ईमेल से भी  भेजी जाये तो उनको संपादकगण स्वयं देखते हों इसकी संभावना कम ही लगती है। ऐसे में उनको वह सामग्री मिलती भी है कि नहीं या फिर वह समझते हैं कि अंतर्जाल पर भेजकर लेखक अपना बड़प्पन दिखा रहा इसलिये उसको भाव मत दो।  एक मजेदार चीज है कि अधिकतर बड़े अखबारों के ईमेल के पते भी नहीं छापते जहां उनको सामग्री भेजी जा सके।  यह शिकायत नहीं है।  हरेक की अपनी सीमाऐं होती हैं पर छोटे लेखकों के लिये प्रकाशन की सीमायें तो अधिक संकुचित हैं  और ऐसे में उसके लिये  अंतर्जाल पर ही एक संभावना बनती है।<br />
इससे भी हटकर एक बात दूसरी है कि अंतर्जाल पर वैसी रचनायें नहीं चल सकती जैसे कि प्रकाशन में होती हैं।  यहां संक्षिप्तीकरण होना चाहिये।  मुख्य बात यह है कि हम अपनी लिखें।  जहां तक हिट या फ्लाप होने का सवाल है तो यहां एक छोटी कहानी और कविता भी आपको अमरत्व दिला सकती है।  हर कविता या कहानी तो किसी भी लेखक की भी हिट नहीं होती।  बड़े बड़े लेखक भी हमेशा ऐसा नहीं कर पाते।<br />
एक लेखिका ने एक  लेखक से कहा-‘आपको कोई संपादक जानता हो तो  कृपया उससे  मेरी रचनायें प्रकाशित करने का आग्रह करें।’<br />
उस लेखक ने कहा-‘पहले एक  संपादक को जानता था पर पता नहीं वह कहां चला गया है। आप तो रचनायें भेज दीजिये।’<br />
उस लेखिका ने कहा कि -‘ऐसे तो बहुत सारी रचनायें भेजती हूं। एक छपी पर उसके बाद कोई स्थान हीं नहीं मिला।‘<br />
उस लेखक ने कहा-‘तो अंतर्जाल पर लिखिये।’<br />
लेखिका ने कहा-‘वहां कौन पढ़ता है? वहां मजा नहीं आयेगा।<br />
लेखक ने पूछा-‘आपको टाईप करना आता है।’<br />
लेखिका ने नकारात्मक जवाब दिया तो लेखक ने कहा-‘जब आपको टाईप ही नहीं करना आता तो फिर अंतर्जाल पर लिखने की बात आप सोच भी कैसे सकती हैं?’<br />
लेखिका ने कहा-‘वह तो किसी से टाईप करवा लूंगी पर वहां मजा नहीं आयेगा।  वहां कितने लोग मुझे जान पायेंगे।’<br />
लेखन के सहारे अपनी पहचान शीघ्र नहीं ढूंढी जा सकती। आप अगर शहर के अखबार में निरंतर छप भी रहे हैं तो इस बात का दावा नहीं कर सकते कि सभी लोग आपको जानते हैं।  ऐसे में अंतर्जाल पर जैसा स्वतंत्र और मौलिक लेखन बेहतर ढंग से  किया जा सकता है और उसका सही मतलब वही लेखक जानते हैं जो सामान्य प्रकाशन में भी लिखते रहे हैं।<br />
सच बात तो यह है कि ब्लाग लिखने के लिये तकनीकी ज्ञान का होना आवश्यक है और स्थापित लेखक इससे बचने के लिये ऐसे ही बयान देते हैं।  वैसे जिस तरह अंतर्जाल पर लेखक आ रहे हैं उससे पुराने लेखकों की नींद हराम भी है।  वजह यह है कि अभी तक प्रकाशन की बाध्यताओं के आगे घुटने टेक चुके लेखकों के लिये अब यह संभव नहीं है कि वह लीक से हटकर लिखें।<br />
इधर अंतर्जाल पर कुछ लेखकों ने इस बात का आभास तो दे ही दिया है कि वह आगे गजब का लिखने वाले हैं।  सम सामयिक विषयों पर अनेक लेखकों ने ऐसे विचार व्यक्त किये जो सामान्य प्रकाशनों में स्थान पा ही नहीं सकते।  भले ही अनेक प्रतिष्ठत ब्लाग लेखक यहां हो रही बहसें निरर्थक समझते हों पर यह लेखक नहीं मानता।  मुख्य बात यह है कि ब्लाग लेखक आपस में बहस कर सकते हैं और आम लेखक इससे बिदकता है।  जिसे लोग झगड़ा कह रहे हैं वह संवाद की आक्रामक अभिव्यक्ति है जिससे हिंदी लेखक अभी तक नहीं समझ पाये।  हां, जब व्यक्तिगत रूप से आक्षेप करते हुए नाम लेकर पाठ लिखे जाते हैं तब निराशा हो जाती है। यही एक कमी है जिससे अंतर्जाल लेखकों को बचना चाहिये। वह इस बात पर यकीन करें कि उनका लिखा साहित्य ही है।  क्लिष्ट शब्दों का उपयोग, सामान्य बात को लच्छेदार वाक्य बनाकर कहना या बड़े लोगों पर ही व्यंग्य लिखना साहित्य नहीं होता। सहजता पूर्वक बिना लाग लपेटे के अपनी बात कहना भी उतना ही साहित्य होता है। शेष फिर कभी।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गणेश चतुर्थी पर उनके गुणों का स्मरण-आलेख (hindi article on ganesh ji)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/08/23/article-on-ganesh-chatuthi/</link>
<pubDate>Sun, 23 Aug 2009 08:17:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में भगवान शिव को सत्य का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा एक बात महत्वपूर्ण ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में भगवान शिव को सत्य का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय अध्यात्म में अनेक प्रकार के भगवत् स्वरूपों की चर्चा आती है पर उनमें शायद ही कोई अन्य स्वरूप हो जिसके पूरे परिवार के समस्त सदस्य ही जनमानस द्वारा सहज रूप से भगवत्रूप मान लिये जाते हैं। भगवान शिव और पार्वती के साथ उनके पुत्र श्री कार्तिकेयन और श्री गणेश दोनों ही भगवतस्वरूप भारतीय जनमानस के हृदय में विद्यमान हैं। कार्तिकेयन को देवताओं का सेनापति माना जाता है और यही देवता इस प्रथ्वी का भरण भोषण करते हैं।<br />
भगवान श्रीगणेश जी एक लीला की बहुत चर्चा होती है। वह यह है कि एक बार देवताओं में यह होड़ लगी कि उनमें कौन श्रेष्ठ है। तब यह तय हुआ कि जो प्रथ्वी का चक्कर पहले लगा लेगा उसे ही श्रेष्ठ माना जायेगा। दावेदारों में श्रीगणेश जी ने भी अपना नाम लिखाया।  बाकी सभी देवता तो चक्कर लगाने चले गये पर महाराज गणेश जी वहीं जमे रहे। इधर उनके समर्थक इस बात को लेकर चिंतित थे कि श्री गणेश जी एक तो वैसे ही भारी है तिस पर बड़े आराम से अपने माता पिता के पास ही बैठकर आराम फरमा रहे हैं। ऐसे में यह जीतेंगे कैसे?  आखिर जब बहुत देर हो गयी तो श्रीगणेश जी उठे और अपने माता पिता की प्रदक्षिणा कर फिर वही बैठ गये और कहा कि मैने तो पूरी सृष्टि का चक्क्र लगा लिया।<br />
वह विजेता घोषित किये गये। यही कारण है कि कहीं भी पूजा करने से पहले भगवान श्रीगणेशजी की स्तुति गायी जाती है।  मगर उपरोक्त कथा ही  परिचय के रूप में पर्याप्त नहीं है।  माता पिता की प्रदक्षिणा करने से अधिक महत्व का कार्य तो उन्होंने भगवान श्री वेदव्यास का महाभारत जैसा महाग्रंथ स्वयं लिख कर पूरा किया।  सच बात तो यह है कि यही महाभारत जैसा महाग्रंथ-जिसमें शामिल श्री मद्भागवत् जैसा वह उपग्रंथ शामिल है जिसमें जीवन और सृष्टि के ऐसे रहस्य शामिल हैं जो आज भी प्रमाणिक माने जाते हैं-भारतीय जनमानस के लिये एक ऐसा ग्रंथ  है जो उनके लिये एतिहासिक और अध्यात्मिक धरोहर है।<br />
इस तरह भगवान श्री गणेशजी एक तरह से दिव्य लेखक हैं और उन्होंने अपनी उस महान रचना के लिये कोई पारिश्रमिक नहीं मांगा।  महाभारत की रचना लिखवाने के लिये भगवान श्री वेदव्यास ने श्री गणेश की तपस्या की थी। जब वह प्रकट हुए तो वेदव्यास की समक्ष यह शर्त रखी कि ‘वह निरंतर लिखेंगे और अगर श्री वेदव्यास की वाणी कहीं अवरुद्ध हो गयी तो वह उसे बीच में ही छोड़ देंगे।’<br />
इस तरह वह वह अनुपम ग्रंथ पूरा हुआ।  सरस्वती देवी बुद्धि की देवी मानी जाती है और अनेक भक्त सदबुद्धि पाने के लिये उनकी आराधना करते हैं पर सच तो यह है कि अच्छी या बुरी बुद्धि के लिये सरस्वती देवी जी का न दायित्व है न दोष।  वह तो सभी को बुद्धि प्रदान करने वाली हैं-अच्छी भी और बुरी भी- जिनको इससे वंचित रखती हैं उनका जीना न जीना बराबर हो जाता है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग मनुष्य के रूप में पैदा होते हैं पर उनकी  बौद्धिक विकलांगता उनके साथ ही उनके परिवार के लिये भी कष्टदायक होती है।  कहने का तात्पर्य यह है कि सरस्वती देवी तो बुद्धि की देवी हैं। कभी कभी वह देवताओं के कहने पर बुद्धि को दोष पूर्ण भी बना सकती हैं जैसे देवताओं के आग्रह पर कैकयी की दासी मंथरा की बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी ताकि भगवान श्रीराम बनवास जाकर राक्षसों का संहार कर सकें।<br />
इसी बुद्धि को नियंत्रण कर बड़े बड़े काम करने के लिये ही श्रीगणेश जी की उपासना की जाती है।  हर अच्छा काम करने से पूर्व इसलिये ही श्रीगणेश जी की स्तुति की जाती है ताकि भक्त की बुद्धि और बल का समन्वय बना रहे।   अगर बुद्धि में शुद्धता नहीं है तो कोई शुभ काम पूर्ण हो ही नहीं सकता-इसी कारण श्रीगणेश जी की स्तुति की जाती है। </p>
<p>देश में अनेक भगवत्स्वरूपों के स्मरण करते हुए पर्व मनाये जाते हैं पर इस दौरान केवल शोरशराबा कर भक्ति का दिखावा करना एक तरह से स्वयं को धोखा देना है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में वर्णित सभी भगवत्स्वरूपों में प्रथक प्रथक गुण हैं और शायद इसलिये ही सभी का स्मरण करने की परंपरा प्रारंभ हुई है कि उनके गुणों की चर्चा कर मनुष्य अपने अंदर उनको स्थापित करे पर इसके विपरीत केवल उनका नाम लेकर दिखावा कर स्वयं को भक्त होने का धोखा देते हैं। दरअसल यह अवसर होता है कि सत्संग कर उनके देवस्वरूपों की चर्चा कर उनके गुणों की चर्चा की जाये। इस तरह की चर्चा करने से भी गुणों का समावेश अपने अंदर होता है।  बाहर से अंदर गुण ले जाने के लिये तीन प्रक्रियायें हैं, दर्शन(तस्वीर को देखते हुए भगवान के गुणों का स्मरण), अध्ययन और श्रवण।  यह तभी संभव है जब ऐसा संकल्प हो।<br />
कुछ लोग कहते हैं हिन्दू धर्म में ढेर सारे भगवान हैं यह गलत है। यह कहने वाले अज्ञानी हैं।  सच तो यह है कि ऐसा करने से भक्तों को सत्संग की सुविधा मिल जाती है।  सभी भगवत्स्वरूपों में अलग अलग गुण हैं। चूंकि सभी मानव लीला में रूप में प्रकट होते हैं तो उनमें इसलिये उनकी देह सर्वगुण संपन्न नहीं होती।  सत्संग  में उनके गुणों की चर्चा भी हो तो उनकी लीलाओं में मानवीय चूकों पर भी विचार हो जाता है।  चूंकि होते तो सभी भक्त ही हैं और किसी न किसी स्वरूप पर उनका मस्तिष्क स्थिर रहता ही है इसलिये वार्तालाप युद्ध में नहीं बदलता। इसके विपरीत अन्य धर्मों में बस एक ही महापुरुष के नाम पर ही सारा समाज खड़ा है और वहां इसलिये सत्संग नहीं हो पाता क्योंकि उस दौरान किसी प्रकार की कमी की चर्चा अपराध हो जाता है।  हमारे समाज में सत्संग की जो परंपरा है वही उसे एक किये रहती है। विभिन्न जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों और समूहों को सत्संग की छत्रछाया में बैठकर आनंद लेते हुए देखा जा सकता है।<br />
इस अवसर पर सभी ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई इस संदेश के साथ कि भगवान श्रीगणेश की ध्यान अवश्य करें।  उनके गुणों का स्मरण स्वयं करने के साथ ही अपने परिवार के सदस्यों को भी इसके लिये प्रेरित करें।  वर्तमान युग में जो हालत हैं उनको हम नहीं बदल सकते पर उनसे होने वाले तनाव से मुक्ति तभी संभव है जब हमारा बुद्धि पर नियंत्रण हो।<br />
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<title><![CDATA[धार्मिक भेदभाव की शिकायत बेमानी-आलेख Meaningless complain of religious discrimination - hindi articles]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/22/dharm-ke-adhar-par-bhedbhav-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Sat, 22 Aug 2009 15:48:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/08/22/dharm-ke-adhar-par-bhedbhav-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[जहां तक नस्ल, जाति, भाषा और धर्म के आधार पर भेदभाव का प्रश्न है तो यह एक विश्वव्यापी समस्या है। इसे ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>जहां तक नस्ल, जाति, भाषा और धर्म के आधार पर भेदभाव का प्रश्न है तो यह एक विश्वव्यापी समस्या है।  इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि यह एक मानवीय स्वभाव है कि मनुष्य  समय पड़ने पर अपनी नस्ल, जाति, भाषा और धर्म से अलग व्यक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करता है और काम पड़े तो उससे निकलवाता भी है।  भारत के बाहर नस्लवाद एक बहुत गंभीर समस्या माना जाता है पर जाति, भाषा और धर्म के आधार पर यहां भेदभाव होता है-इससे इंकार नहीं किया जा सकता।  इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि किसी भी व्यक्ति के साथ यह भेदभाव सामयिक होता है और इसका शिकार कोई भी हो सकता है। मुश्किल यह है कि इस देश में अग्रेजों ने जो विभाजन के बीज बोये वह अब अधिक फलीभूत हो गये हैं।  फिर स्वतंत्रता के बाद भी जाति, धर्म और भाषा के नाम पर विवाद चलाये गये ताकि लोगों का ध्यान उनमें लगा रहे-यह इस लेखक के सोचने का अपना यह  तरीका हो सकता है। इसके साथ ही बुद्धिजीवियों का एक वर्ग विकास का पथिक तो दूसरा वर्ग परंपरारक्षक बन गया। दोनों वर्ग कभी गुलामी की मानसिकता से  उबर नहीं पाये और जमीन वास्तविकताओं से परे होकर केवल नारे और वाद के सहारे चलते रहे।  प्रचार माध्यमों में भी यही बुद्धिजीवी हैं जिनके पास जब कोई काम या खबर नहीं होता तो कुछ खबरें वह फिलर तत्वों से बनाते हैं। फिलर यानि जब कहीं अखबार में खबर न हो तो कोई फोटो या कार्टून  छाप दो।  इनमें एक जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव का भी है।<br />
अभी एक अभिनेता ने शिकायत की थी कि उसको धर्म के कारण मकान नहीं मिल पा रहा।  सच तो वही जाने पर उसकी बात पर शुरु से ही हंसी आयी।  यकीन नहीं था कि ऐसा हो सकता है-इसके बहुत सारे तर्क हैं पर उनकी चर्चा करना व्यर्थ है।<br />
आज से 22 वर्ष पूर्व जब हम अपना मकान छोड़कर किराये के मकान में गये तो यह सोचकर परेशान थे कि समय कैसे निकलेगा?  बहरहाल दो साल उस किराये के मकान में गुजारे। फिर एक दिन मकान मालिक से एक रात झगड़ा हुआ। हमने घोषणा कर दी कि परसों शाम तक मकान खाली कर देंगे।<br />
हमने यह घोषणा की थी झगड़ा टालने के लिये पर मकान मालिक ने कहा कि-‘ अगर नहीं किया तो&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..’’<br />
हमने मकान ढूंढ लिया। हम मकान देखने गये वहां मालकिन से बात  हुई।  जातिगत या कहें कि भाषाई दृष्टि से अलग होने के बावजूद एक समानता थी कि दोनों के पूर्वज विभाजन के समय इधर आये थे-भारत पाकिस्तान विभाजन पर हमारी राय कुछ अलग है उस पर फिर कभी। यह हमारी किस्मत कहें कि मकान मिल गया।  अगले दिन हम मकान खाली कर सामान गाड़ी से लेकर उस मकान में पहुंचे।  सामान उतारने से पहले हमने उस मकान का दरवाजा खटखटाया तो मकान मालिक बाहर निकले। हमने कहा-‘ हम सामान ले आयें हैं।’<br />
पीछे मकान मालकिन भी आ गयी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ लग रहा था। मकान मालिक ने कहा-‘भाई साहब हम आपको जानते नहीं है। इसलिये&#8230;..’’<br />
इसी बीच एक अन्य सज्जन भी बाहर आये और मुझे देखकर बोले-’’अरे, तुम यहां कैसे? अरे, भई यह तो बहुत बढ़िया लड़का है।’<br />
वह उस मकान मालिक के बहनोई थे और व्यापारिक रिश्तों की वजह से हमें जानते थे। यह अलग बात है कि तब हम व्यापार से अलग हो चुके थे।<br />
बहरहाल हम मकान के अंदर पहुंच गये।  माजरा कुछ समझ में नहीं आया।<br />
बाद में मकान मालिक ने बताया कि ‘आपको तो हमारे पति वापस भेजने वाले थे। वह तो हमारे ननदोई जी ने आपको अच्छी तरह पहचान लिया इसलिये इन्होंने नहीं रोका। यह आपके आने से चिंतित थे इसलिये अपने बहनोई को बुला लिया था कि किसी तरह आपको वापस भेज दें।  हमारे पति  कह रहे थे कि ‘उनकी जाति/भाषा वाले लोग झगड़ालू होते हैं।’<br />
हम उनके मकान में दो किश्तों में चार साल रहे।  पहले वह मकान खाली किया और फिर लौटकर आये। वह मकान मालिक मुझे आज भी अपना छोटा भाई समझते हैं। मान लीजिये उस दिन उनके बहनोई नहीं आते या पहचान के नहीं निकलते तो&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.हमें उस मकान से बाहर कर दिया जाता। तब हम कौनसे और क्या शिकायत करते।<br />
अपने मकान के बाद फिर अपने मकान पहुंचने में हमें बारह बरस लगे। चार मकान खाली किये। चार मकान देखे।  कुछ मकान मालिकों ने प्याज खाने की वजह से तो कुछ लोगों ने जाति की वजह से मकान देने से मना किया।  हर हाल में रहे हम लेखक ही। जानते थे कि यह सब झेलने वाले हम न पहले हैं न आखिरी!  हमारा जीवन संघर्ष हमारा है और वह हमें लड़ना है।<br />
हो सकता है कई लोग मेरी इस बात से नाराज हो जायें कि हमने बचपन से बकवास बहुत सुनी है जैसे  जनकल्याण, प्रगति, सामाजिक धार्मिक एकता, संस्कार और संस्कृति की रक्षा, समाज का विकास और भी बहुत से नारे जो सपनों की तरह बिकते हैं। इस देश में आम आदमी का संघर्ष हमेशा उसकी व्यक्तिगत आधार पर निर्भर होता है। अपने जीवन संघर्ष में हमने या तो अपनी भाषा और जाति से बाहर  के मित्रों से सहयोग पाया या फिर अपने दम पर युद्ध जीता।  एक जाति के आदमी ने सहयोग नहीं दिया पर उसी जाति के दूसरे आदमी ने किया।  सभी प्रकार की जातियों और अलग अलग प्रदेशों के लोगों से मित्रता है-इस लेखक जैसे इतने विविध संपर्क वाले लोग इस देश में ही बहुत कम लोग होंगे भले ही विविधता वाला यह देश है।   लेखक होने के नाते सभी से सम्मान पाया।  जिस तरह धर्म और भक्ति एकदम निजी विषय हैं वैसे ही किसी व्यक्ति का व्यवहार! आप एक व्यक्ति के व्यवहार के संदर्भ में पूरे समाज पर उंगली उठाते हैं तो  हमारी नजर में आप झूठ बोल रहे हैं या निराशा ने आपको भ्रमित कर दिया है।<br />
मुश्किल यही है कि बुद्धिजीवियों का एक तबका इसी भेदभाव को मिटाने की यात्रा पर निकलकर देश में प्रसिद्ध होता रहा है तो बाकी उनकी राह पर चलकर यही बात कहते जाते हैं।  इधर विश्व स्तर पर कुछ ऐसे लेखक पुरस्कृत हुए हैं तो फिर कहना ही क्या? आप ऐसे विषयों पर रखी बातें इस लेखक के सामने रख दीजिये तो बता देगा कि उसमें कितना झूठ है।  पांचों उंगलियां कभी बराबर नहीं होती। एक परिवार में नहीं होती तो समाज में कैसे हो जायेंगी? फिर एक बात है कि सामाजिक कार्य में निष्क्रिय लोगों की संख्या अधिक हो सकती है पर मूर्खों और दुर्जनों की नहीं। भेदभाव करने वाले इतने नहीं है जितना समभाव रखने वाले।<br />
अभी एक ब्लाग लेखक ने लिखा कि एक हिन्दू ने मूंह फेरा तो दूसरे ने मदद  की। अब उसका लिखना तो केवल मूंह फेरने वाले पर ही था। वह उसी परिप्रेक्ष्य में भेदभाव वाली बात कहता गया।  हम आखिर तक यही सोचते रहे कि उस मदद करने वाले की मदद कोई काम नहीं आयी। यह नकारात्मक सोच है जो कि  अधिकतर बुद्धिजीवियों में पायी जाती है। हमने सकारात्मक सोच अपनाया है इसलिये यही कहते हैं कि सभी एक जैसे नहीं है। हां, अगर लिखने से नाम मिलता है तो लिखे जाओ। हम भी तो अपनी बात लिख ही रहे हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..<br />
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<title><![CDATA[इंसान कभी बंदर नहीं रहा होगा-व्यंग्य आलेख (insan aur bandar-hindi hasya vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/07/23/insan-aur-bandar-hindi-article/</link>
<pubDate>Thu, 23 Jul 2009 14:55:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/07/23/insan-aur-bandar-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[आदमी कभी बंदर रहा होगा-इस सिद्धांत पर यकीन नहीं होता। दरअसल बरसों पहले यह पश्चिमी सिद्धांत पढ़ा था कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आदमी कभी बंदर रहा होगा-इस सिद्धांत पर यकीन नहीं होता।  दरअसल बरसों पहले यह पश्चिमी सिद्धांत पढ़ा था कि आदमी पहले बंदर था या इसे यूं कहें कि बंदर धीरे धीरे आदमी बन गया। दरअसल हमने चालीस बरसों से किसी बंदर को आदमी बनते हुए नहीं देखा। कहा जाता है कि आदमी की बुद्धि इस सृष्टि में सबसे तीव्र है इसलिये ही वह पशु और पक्षियों तथा अन्य जीवों  पर नियंत्रण कर लेता है और जिसमें बंदर भी शामिल है।<br />
कई बार हमने बंदर को देखा है। उसे कभी हमलावर नहीं पाया। हमारे देश में कई ऐसे पवित्र स्थान हैं जहां बंदरों  के झुंड के झुंड रहते हैं।  वहां उनका आचरण आदमी से मेल नहीं खाता नजर नहीं आता।  बंदर शरारती होते हैं पर खूंखार नहीं। आदमी अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर कब खूंखार हो जाये कहना कठिन है।<br />
इस सिद्धांत को न मानने के अनेक तर्क हैं।  सबसे पहला तो यह है कि इंसान अगर बंदर था तो वह वर्तमान स्थिति में कभी नहीं आता।  इधर हमने अध्यात्मिक ग्रंथ भी छान मारे पर कहीं इस बात का उल्लेख नहीं मिलता कि आदमी पहले कभी बंदर था।  वैसे यह खोज पश्चिम की है इसलिये इस पर आपत्ति करना आसान नहीं है पर उनके इस सिद्धांत में अविश्वास के कारण है। एक तो यह है कि सृष्टि के प्रारंभ में ही सभी प्रकार के जीव प्रकट हो गये थे। सभी का चाल चलन, रहन सहन, आयु और स्वभाव के मूल तत्व कभी नहीं बदले।  इसी स्वभाव के वशीभूत हर जीवन अपने कर्म करता है।  </p>
<p>एक बार हम दूसरे कोटा (राजस्थान)शहर गये। वहां मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर पर प्रसाद चढ़ाया और हाथ में उसका लिफाफा लिये परिक्रमा लगाने गये। परिक्रमा के बीच में मंदिर के पीछे एक बंदर आया और हमारे हाथ से वह लिफाफा ऐसे लेकर चलता बना जैसे कि उसको देने ही आये थे। बाद में हमने देखा कि वह आराम से अपने परिवार के साथ वह खा रहा है।<br />
हम यह कहें कि उसने छीना तो यह एक अपराध की तरह है।  उस समय वह इतने आराम से ले गया कि हाथ से जाने के बाद हमें पता लगा कि वह तो लिफाफा ले गया।<br />
हम मंदिर के बाहर निकले तो वहां अनेक भिखारी प्रसाद मांग रहे थे। हमारे हाथ से लिफाफा जा चुका था इसलिये हम तो चुपचाप चले आये। घर आकर मेजबान से कहा तो उन्होंने कहा-‘हां, ऐसा होता है। कई लोगों के साथ ऐसा हुआ है पर हम भी कई बार वहां गये पर ऐसी घटना नहीं हुई।<br />
कुछ  दिन पहले एक मंदिर के बाहर एक औरत चिल्ला रही थी। कोई उसका पर्स उसके हाथ से छीनकर भाग गया था। वह चिल्लाती रही पर जब तक किसी का  ध्यान इस ओर  जाता तब तक छीनने वाला लोगों की नजरों से ओझल हो गया।<br />
तब हमें उस बंदर की याद आयी।  हम सोच रहे थे कि ‘क्या उसके द्वारा हमारे हाथ से प्रसाद का लेना क्या छीनना कहा जा सकता है?’<br />
उत्तर भी हमने दिया ‘नहीं’।<br />
इंसान दो ही काम कर सकता है-भीख मांगना या छीनना। भीख मांगने और छीनने वाला भी इंसान है पर इसी इंसान की फितरत है कि अगर कोई इंसान बंदर की तरह आराम से चीज ले जाये तो हल्ला मचा देगा। भीख देगा पर यह नहीं चाहेगा कि कोई उसकी चीज को अपनी समझकर ले जाये। छीन जाये अलग बात है। आशय यह है कि लेनदेन में सहजता का भाव तो नहीं रह सकता जैसे कि बंदर द्वारा हमारे हाथ से प्रसाद लेने पर हुआ था। हमने जरा भी प्रतिवाद नहीं किया। सोचा भूखा होगा? फिर आये भी तो वानरराज हनुमान जी के मंदिर में थे। अगर वहां कोई इंसान होता तो उससे प्रतिवाद कर वह लिफाफा वापस लेते पर बंदर से हमें स्वयं ही डर लग रहा था कि कहीं हमला कर भाग गया तो कहां उसे पकड़ पायेंगे?<br />
तब ही हमेें इस बात पर यकीन हो गया था कि इंसान कभी बंदर नहीं रहा।  बंदर के पीछे हम नहीं भाग सकते पर वह हमारे पीछे भाग सकता है।  वह हमसे डरता है पर हमेशा नहीं! हां, हम उससे हमेशा डरते हैं।<br />
बंदर की पतली टांगें और हाथ तथा देह की लंबाई चैड़ाई देखकर नहीं लगता कि उसकी कोई पीढ़ी आगे इंसान भी बन सकती है।  बंदर में अपने भोजन का संचय करने की प्रवृत्ति नहीं होती। इंसान में तो वह इतनी विकट है कि उसका कहीं अंत नहीं है।  सोने के लिये बिस्तरा और खाने के लिये रोटी चाहिये पर इंसान को उससे भी चैन कहां? उसे तो बैंक खाते में भी एक बड़ा आंकड़ा चाहिये जिससे देखकर उसका मन हमेशा अपने साहूकार होने के भ्रम में जीता रहे।<br />
जब भी हम कहीं बंदर देखते हैं तब सोचते हैं कि क्या कभी इंसान भी ऐसा रहा होगा? तमाम तरह के विचार मंथन किये पर इस सिद्धांत को मन नहीं मानता। बंदर शरारती होता है पर अपराधी नहीं।<br />
हम एक बार एक उठावनी कार्यक्रम  में गये थे। वहां पर एक स्कूटर के पास खड़े थे जिस पर बंदर चढ़ा और हमारा चश्मा लेकर पास ही खड़े मकान की गैलरी पर बनी लोहे की सींखचों से चिपक कर बैठ गया। एक लड़का उसे पत्थर मारकर वह चश्मा वापस लेने का प्रयास करने लगा।  वहां खड़े एक आदमी ने कहा कि ’कोई खाने वाली चीज फैंको तो उसे लेने के चक्कर में वह चश्मा नीचे फैंक देगा।’</p>
<p> तब एक  बिस्कुट लेकर उसकी तरफ उछाला गया। उसे पकड़ने के चक्कर में वह चश्मा उसके हाथ से छूट गया और हमने नीचे उसे लपक लिया। वह बिस्कुट भी नीचे आ गिरा पर हमने उसे स्कूटर पर रख दिया और वहां से हट गये और वह उसे लेकर चला गया।  उसने उस चश्मे को नष्ट करने का प्रयास नहीं किया बस उसे पकड़े रहा।  तब उसकी इस शरारत पर हमें हंसी आयी। तब भी यही ख्याल आया कि इंसान कभी बंदर नहीं रहा होगा।<br />
एक आदमी ने हमें एक बात बताई थी पता नहीं वह सच है कि झूठ।  उसने बताया था कि भुटटे लगाने वाले खेतिहर यह दुआ करते हैं कि कोई बंदर उनके खेत पर आये।  होता यह है कि बंदर एक भुट्टा उठाकर अपनी कांख में दबाता है फिर दूसरा तोड़ता है।  बंदर इस तरह बहुत से भुट्टे तोड़कर खेत स्वामी की मेहनत बचाता है।  आखिर तक उसकी कांख में एक ही भुट्टा बना रहता है।  कुछ न कहो कहीं से बंदिरया की आवाज आये तो वह भी छोड़ कर चलता बने।  इंसान ऐसा कभी नहीं रहा होगा।<br />
बंदरों की मस्ती देखते ही बनती है। इंसान प्रकृत्ति की मस्ती को समझता नहीं है बल्कि उसे उजाड़ कर कागजी मुद्रा में परिवर्तित कर वह बहुत प्रसन्न होता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान कभी बंदर नहीं रहा होगा।  यह सच है कि इस सृष्टि में परिवर्तित होते रहते हैं।  कई प्रकार के जीव बनते और बिगड़ते हैं, पर उनके स्वरूप में बदलाव नहीं आता। यह स्वरूप उनका मूल स्वभाव निर्धारित करता है। हो सकता है कि इंसानों जैसे बंदर रहे हों पर उनसे यह इंसान बना होगा यह संभव नहीं है। वह मिट गये होंगे पर इंसान नहीं बने होंगे। इंसान तो शुरु से ऐसा था और ऐसा ही रहा होगा। जीवों के मूल स्वभाव में परिवर्तन नहीं होता भले ही वह मिट जाते हों।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
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