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Monday's Quote

«My brother had a house in Paris. To it came many Western classical musicians. These musicians all made the same point: ‘Indian music,’ they said, ‘is beautiful when we hear it with the dancers.

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Monday's Quote

5 Songs That Will Get The Indian Spirit Within You To Burst Out And Paint You In Its Tricolored Aura!

It’s that time of year when all of India is rocking the colors of the Indian Flag! The Indian Republic Day is a representative of victory over a fight for an idea known as freedom. 309 more words

What's Happenin'

On Kishore Kumar...

हम अपना चश्‍मा, घड़ी, छाता कहीं रखकर भूल जाएं तो घड़ी-दो घड़ी में फिर उन्‍हें ढूंढ़ ही लेते हैं, लेकिन अगर किसी मर्तबान में मुरब्‍बा रखकर भूल जाएं तो मुमकिन है अरसे तक उसकी याद न आए। कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्‍हें मैं अपने चश्‍मे, घड़ी, छाते की तरह हमेशा पास रखता हूं : जैसे बुद्ध, बोर्हेस, काफ़्का, तारकोव्‍स्‍की, इमरे कर्तेश : लेकिन बीसियों ऐसे भी हैं, जिन्‍हें मैंने अपने मन के किसी मर्तबान में मुरब्‍बे की तरह सहेजकर रखा है, अपनी कैफियत से उन्‍हें जैसे भुला रखा है, पर यदा-कदा उन्‍हें अपने भीतर सहलाकर-टटोलकर देख लेता हूं। किशोर कुमार उन्‍हीं में से एक हैं। कल शैलेन ने याद दिलाया तो याद आया कि कोई तीनेक साल पहले दैनिक भास्‍कर ब्‍लॉग के लिए एक पॉपुलर सीरीज़ के चलते किशोर कुमार, राजेश खन्‍ना, जॉर्ज हैरिसन, बॉब डिलन, मोत्‍सार्ट, उस्‍ताद अमीर ख़ां वग़ैरह पर लिखना हुआ था (आगे यह सिलसिला नईदुनिया में लता, वीवीएस लक्ष्‍मण, नील आर्मस्‍ट्रांग, प्राण, शमशाद, मन्‍ना डे आदि पर प्रकाशित लेखों के रूप में जारी रहा)। कबाड़खाना वाले अशोक पांडे जी ने किशोर वाले उस लेख को अपने ब्‍लॉग पर जगह दी थी। आज वैसे तो किशोर को याद करने की कोई सूरत और सिलसिला नहीं, फिर भी उसे यहां साझा किए दे रहा हूं। कभी-‍कभी सर्द वक्‍़तों में यह तसव्‍वुर भी हमें रोशनी से भर सकता है कि ख़ुदावंद ने एेसी खनकती हुई आवाज़ अपने हाथों से गढ़ी थी।

किशोर कुमार की आवाज हिंदी सिने संगीत की पहली आधुनिक और बेतकल्लुफ आवाज थी। उसमें एक खास सांकेतिकता थी। खिलंदड़ रति चेष्टाएं थीं, मनुहार थी, अभिसार का आमंत्रण था। किशोर की आवाज में कोई चेकपोस्ट न थे, नाकेबंदी न थी, इसीलिए यह भी अकारण नहीं है कि अपने प्लेबैक गायन के प्रारंभिक दिनों में किशोर देव आनंद के लिए गाते थे, जो कि हिंदी सिनेमा के पहले आधुनिक, शहराती और डेमोक्रेटिक सितारे थे।

किशोर कुमार ने अपने समकालीनों की तुलना में देरी से प्रतिष्ठा पाई, लेकिन उनकी आवाज उन सभी से दीर्घायु सिद्ध हुई। किशोर अगर भूमंडलीकरण द्वारा प्रस्तावित संस्कृति के प्रिय गायक बन गए हैं तो यह भी अनायास नहीं है। किसी भी म्यूजिकल प्लैनेट में चले जाइए, 1950-60 के दशक का सुगम संगीत वहां मिले न मिले, किंतु ‘कॉफी विद किशोर’ सरीखे रुपहले बॉक्स सेट जरूर मिल जाएंगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि किशोर की आवाज आधुनिकता, उच्छृंखलता और अनौपचारिकता के उन गुणों का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे भूमंडलीकरण की पीढ़ी ने अपनी देहभाषा में अंगीकार किया है।

लेकिन महज इतने में किशोर कुमार को महदूद कर देना उन्हें सिरे से चूक जाना होगा। किशोर का असल गायन राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के लिए गाए गए पॉपुलर प्लेबैक गीतों में नहीं है। किशोर का असल गाना सुनना हो तो आ चल के तुझे मैं ले के चलूं या ठंडी हवा ये चांदनी सुहानी जैसे तराने सुनें।

या फिर अनिल बिस्वास की 1953 की वह बंदिश सुनें – आ मुहब्बत की बस्ती बसाएं सनम या फिर सत्यजित राय की फिल्म ‘चारुलता’ का वह भीना-भीना बांग्ला गीत सुनें : आमि चिनी गो चिनी तोमारे, ओ गो बिदेशिनी। खरे सोने जैसी खनकदार आवाज, पिघले शीशे-सी ढलाई, गाढ़ा पौरुषपूर्ण स्वर, स्मृतियों में थिगा भाव अमूर्तन और एक निरपेक्ष विषाद, ये किशोर के गायन के अनिवार्य गुण हैं।

किशोर के गाने में निर्वेद का तत्व भी हमेशा उपस्थित रहा। आए तुम याद मुझे या कोरा कागज था ये मन मेरा जैसे शांत रस के गीतों में भी उनकी आवाज डूबी-सी लगती है। लगता है जैसे किशोर की आवाज का निर्वेद विश्व-स्थिति पर एक उदास टिप्पणी है, एक कायनाती अफसोस है। कोई हमदम न रहा के अंतरे में जब किशोर की आवाज कोहरे में फैलती है तो लगता है जैसे उनके भीतर का वह अलक्षित विषाद सघन होकर दिशाओं में व्याप गया हो।

संगीत अगर निज को सार्वभौम बनाने का रसायन है तो किशोर की आवाज इसका प्रतिमान है। उनके यहां मन्ना डे का आत्मिक आलोड़न नहीं, तलत का कातर भाव या रफी की रूमानी रुलाइयां भी नहीं, एक ऐसा तत्व वैशिष्ट्य है, जिसे व्याख्याओं से नहीं, व्यंजनाओं से ही पकड़ा जा सकता है, जैसे ग्रीष्म की दुपहरियां, ऊंघता निदाघ, सांझ के लंबे साये, झुटपुटे में गुमी किरणों, घड़ी का झूलता पेंडुलम, रेडियो पर रवींद्र संगीत या कतबों के सामने सुबकती मोमबत्तियां।

किशोर हिंदी सिने संगीत के विरल म्यूजिकल जीनियस हैं। गाते समय वे अंगुलियों पर मात्राएं नहीं गिनते, अपनी धमनियों में गूंजती लय को सुनते और उसका अनुसरण करते हैं। वे सुरों के सगे बेटे हैं।

किशोर को सुनते हुए हम सभी कमोबेश किशोर हो जाते हैं। और इसीलिए उनके गीतों की पंक्तियां हमें अपना आत्मकथ्य जान पड़ती हैं, जैसे यह :

ऐसे मैं चल रहा हूं पेड़ों की छांव में
जैसे कोई सितारा बादल के गांव में
मेरे दिल तू सुना
कोई ऐसी दास्तां
जिसको सुनकर मिले चैन मुझे मेरी जां
मंजिल है अनजानी.

Thoughts

भारतीय संगीत का औदात्य

भारतीय संगीत और प्राचीन भारत के औदात्य को दर्शानेवाला यह वृत्तांत मुझे अपने फेसबुक मित्र श्री सुमंत भट्टाचार्य की वॉल पर दिखा. प्रथम-दृष्टया यह किसी फेसबुकिया बहस का भाग प्रतीत होता है. 6 more words

Thoughts

Ragini

I know not how thou singest, my master! 
I ever listen in silent amazement.
The light of thy music illuminates the world.
The life breath of thy music… 66 more words

Indian Classical Music

Album Review: Inside the Kremlin

“Ravi Shankar is the Godfather of world music.” These are the words of non-other than Mr. George Harrison. Yes, the George Harrison! This multi-instrumentalist and lead guitarist of The Beatles happens to have collaborated with the sitar maestro of Indian Classical Music. 724 more words

Blog

Bells

It’s 29 November 2001, a Thursday. My father is still shaken from the terrorist attack on NYC and the Pentagon that happened in September. This is the second time in as many months that I come home from third grade to see my father crying as he watches the news. 710 more words