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कैसे बनेगा ये भारत

फिर से सोनेकी चिड़िया।

जहाँ खिलखिला के

जीती थी हर माँ की गुड़िया।

खनकती जब बाला

के हाथों में चुड़िया।

लाज का घूँघट कर

शर्मा जाती थीं

उस ज़माने की कुड़िया।

आज क्यों वहीं चूड़ी की

खनक लोगों के कानों

में खलती हैं।

एक बेकसूर क्यों जीते जी

नफरत की आग में जलती हैं।

क्या इसलिए ?

क्यूंकि वो एक बाला हैं।

जिसका क्या हाल तुमने

कर डाला हैं।

पढ़ना चाहें तो पढ़ नहीं सकती

बढ़ना चाहे तो तुम्हारी छाओ

में रुक नहीं सकती।

आखिर क्यों बरती है इतनी सख्ती?

की चाह कर भी वो बाला

कुछ कर नहीं सकती.

Prerna Mehrotra

14/11/2014