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Concerning Modi’s “Rajya Dharma”

“We, The people of India, having solemnly resolved to constitute India into a Sovereign, Socialist secular democratic republic and to secure to all its citizens Justice, Liberty, Equality and Fraternity” this preamble of constitution must be upheld in its spirit. 950 more words

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गीता प्रेरणा उत्सव का मतलब?

भगवद्गीता के लिए उत्सव मनाने का औचित्य तो मुझे समझ में आता है लेकिन यह 5151 वर्ष पहले पैदा हुयी थी इसको लेकर मेरे भीतर एक उहापोह है ! उस काल-खंड का निर्णय करना बहुत कठिन है इसलिए बेहतर होता हम कयास न लगा कर सिर्फ उत्सव को मनाते और कुछ सार्थक बहस करते ।  इस समय देश को राजनीति नहीं सार्थक काम और सार्थक बहसों की जरुरत है । मसलन हम आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में भगवदगीता पर एक धर्म सभा बुलाते और उन विषयों पर चर्चा करते जिनसे देश बड़ी मुसीबत में है । उन पर चर्चा करते जिनसे भूमंडल के लोग परेशान हैं। हम ग्लोबल वार्मिंग पर चर्चा करते जिससे दुनिया का पर्यावरण खतरे में पड़ गया है । इस परिप्रेक्ष्य में भगवदगीता हमारा मार्ग प्रदर्शक हो सकती है। भगवदगीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है:

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ।।

यदि हम प्रकृति का दोहन करते हैं तो हमें प्रकृति को वापस भी तो करना चाहिए ! यह एक उच्च अध्यात्मिक भाव है जिसको हम नहीं समझ पा रहे हैं ! वैष्णव सिद्ध योगी देवरहा बाबा नें एक बार गंगा के जल से ही हवन करवा दिया था लेकिन जितना जल घी के रूप में प्रयोग हुआ उसे उन्होंने यजमान से मंगवाकर गंगा जल में डलवा दिया । लोगों नें पूछा “ऐसा क्यों कर रहे हो बाबा?” तो देवरहा बाबा नें कहा जिस प्रकृति से तुम लेते हो उसको वापस भी करना तुम्हारा फर्ज है, ऐसा न करने से पाप होता है ! यह एक भाव है जिसका संस्कार अध्यात्म से आता है ।

भारत दुराचार से जूझ रहा है, देश अब कब धर्म गुरु बनेगा पता नहीं लेकिन यह वेश्यावृत्ति में विश्व में चौथे स्थान पर है । साधू महात्माओं के इस देश नें यह स्थिति कैसे पैदा की है? देश में लाखों की संख्या में बाबा, साधु, योगी , प्रवचनकर्ता  धर्म का प्रचार करते हैं और धर्म गायब होता जा रहा है, यह क्या एक बड़ा आश्चर्य नहीं है ? क्या ये धार्मिक लोग ही अधर्म  की वृद्धि करने में संलग्न नहीं हैं –आशाराम से रामपाल तक जो सामने आया है वह धार्मिक अधर्मियों की पोल खोलता है ! वास्तव में जुर्म, शोषण , रेप , कालाबाजारी, ब्लैक मनी , इत्यादि के गढ़ बन गए हैं धार्मिक संस्थान और धार्मिक समितियां ! कहाँ चूक हुयी है !! इस पर चर्चा ज्यादा महत्वपूर्ण है बनिस्बत इसके कि गीता के नाम पर हवन कर तमाम दिखावा करें। हिंदू समाज में ऐसा कभी नहीं रहा. वेश्यावृत्ति में विश्व में चौथे स्थान पर और बलात्कार में तीसरे नम्बर पर होना बहुत बड़ी चिंता का विषय है । गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस वस्तुस्थिति पर संसद में खेद जताते हुए कहा है “यह इस देश के लिए शर्म की बात है “! इस बावत भी भगवदगीता हमारा मार्ग प्रदर्शक हो सकती है और हमें सही रस्ते पर ले जा सकती है। भगवदगीता में कृष्ण नें कहा है : “धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ: – हे अर्जुन! मैं वहीँ वासनाएं और इच्छायें हूँ जो धर्म के अविरुद्ध अर्थात् वे जो धर्म की वृद्धि करती हैं और व्यक्ति को सत्य तक ले जाती हैं !” हम इस पर न  तो चलते हैं और न  ही इसको मानते हैं । यह भी वस्तुतः पर्यावरण का ही विषय है ! वह भारतीय जीवन कहाँ विलुप्त हो गया जिसमें अध्यात्मिक-अधिदैविक और अधिभौतिक इन तीन स्तरों पर पर्यावरण की संकल्पना की गई थी? क्या हमें अभिज्ञान शाकुंतलम का वह दृश्य याद है जिसमें  पूरा वन शकुन्तला का विरोध करता है !
भो भोः संनिहितास्तपोवनतरवः |
पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या.
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम् ।
आद्ये वः प्रथमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः.
सेयम् याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञाप्यताम् ॥
पेड़ कहते हैं देखो ! देखो ! वही शकुन्तला अपने पति के घर जा रही है जिसने हमें जल दिए बगैर स्वयं कभी जल ग्रहण नहीं किया । चलो सभी मिलकर उसे न जाने के लिए कहें । फिर कण्व ऋषि शकुंतला को कहते हैं, “पुत्री उन दरख्तों से भी विदा लो जिनकी गोंद में तुम खेली हो और बड़ी हुयी हो। जाओ पुत्री, उनका जल से अभिसिंचन करो, वे तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं !” शकुन्तला लोटे में जल ले जाती है  उन पेड़ों को जल देती है और उनसे विदा लेती है !
अनुमत गमना शकुन्तला तरुभिरियम वनवास बंधुभिः !
प्रभृतविरुतम कलं यथा प्रतिवचनीकृतमेभिरीदृशं!!

शकुन्तला को जाने का इजाजत पेड़ों से मिलती है, वन में रहने वाले बंधुओं से, उन पशु पक्षियों से मिलती है जिनके बीच वह पली बढ़ी थी। कालिदास में वह सौन्दर्य दृष्टि कहाँ से आयी? यह हमारी जीवन दृष्टि रही है जिसको उन्होंने अपने काव्य में अभिव्यक्त किया है।

दिल्ली में गीता प्रेरणा उत्सव का आयोजन किया गया अच्छी बात है लेकिन प्रेरणाओं का जिक्र नहीं हुआ । इस मौके पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा पहले ही मिल गया है लेकिन इसे संसद में रखा जायेगा इसे राष्ट्र-ग्रन्थ घोषित करने की मांग की जायेगी । क्या हो जायेगा इससे? देशभर में हजारों लोग प्रति दिन भगवदगीता पर ज्ञान यज्ञ करते हैं, हजारों सालों से ज्ञान यज्ञ हो रहा है लेकिन वह ज्ञान-यज्ञ देश से अन्धकार नहीं मिटा पा रहा है ! क्यों है ऐसा? क्या यज्ञ में त्रुटि है या यज्ञकर्ता में त्रुटि है ! “यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र”  क्या यज्ञ ज्ञान के लिए ही निष्काम भाव से किया जा रहा है? नहीं किया जा रहा है, यह एक कर्मकांड भर रह गया है ! आदि शंकराचार्य नें ज्ञानयज्ञ से बौद्ध धर्मानुयायियों द्वारा फैलाये गए अज्ञान को ख़त्म कर इस देश में पुनः धर्म की स्थापना किया लेकिन हम अक्षम हैं । इस संदर्भ में भी भगवद्गीता ही मार्गदर्शन कर सकती है ! कलियुग में गीता से प्रेरणा साधू भी नहीं लेना चाहते। धर्म के विरुद्ध काम करने वाले साधुओं की जमात धर्म के लिए काम करने वाले साधुओं से अधिक है ! इस देश में ही  रामपाल, आशाराम जैसे राक्षस धर्म के लिबास में  धर्म को ख़त्म करने पर तुले हुए हैं! यह सृष्टि सामंजस्य विरहित हो गयी है। मनुष्यता में कुछ गुणों की प्रबलता से जुर्म , वेश्यावृत्ति, भ्रष्टाचार इत्यादि में असीम वृद्धि हुयी है । गीता इन मुसीबतों का  समाधान में कुछ सहयोगी जरूर हो सकती है! हमें अपने पर्यावरण को इनके द्वारा ही दुरुस्त करना होगा ।

नान्यः पन्था विद्यतेSनाय !

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Socialism Quotation Placeholder Post #1: Étienne Balibar on Class Struggle

Greetings to my long-suffering readers. If you have felt the Tiger Manifesto post drought as acutely as I have, you must be going through quite the trauma. 402 more words

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Sam and Max: Freelance Kitschmongers

Human beings seem to have this idea that, if animals could talk, they would be terribly cynical about everything. One of the archetypal examples of this is Hobbes from the Bill Watterson comic strip. 1,365 more words

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Something in the Caucasian Air: Vladimir Mayakovsky's Poetry

From a cursory examination of Mayakovsky’s biography, it seems fitting to situate him in three spheres: futurist poetry and Russian modernism, Russian communist politics, and the Caucasus region. 745 more words

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विश्व का सबसे बड़ा कत्लगाह गढ़ीमाई का द्धार

नेपाल सीमा पर बारा जिला कलैया बरियारपुर में स्थित गढ़ीमाई का प्राचीन मंदिर इन दिनों विश्व भर में चर्चा में है । विश्व प्रसिद्ध इस ऐतिहासिक सिद्धपीठ को शक्ति , शौर्य , ऐश्वर्य और प्रसिद्धि की देवी माना जाता है । यहां पर देशी-विदेशी लाखों पर्यटक मनाये जाने वाले उत्सव् को देखने के लिए दूर दूर से आते हैं। लाखों लोग देवी गाढ़ीमाई के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और अपने भौतिक उत्थान की मन्नत मांगते हैं । देवी मंदिर के बाहर प्रांगड़ में हर पांच साल बाद पशु बलि का आयोजन किया जाता है । मंदिर के इस कंक्रीट से बने कत्लगाह में बलि की शुरुआत मंदिर के प्रधान पुजारी द्धारा की जाती है । मंदिर के प्रधान पुजारी को ” सप्तबली” नाम से पुकार जाता है। वास्तव में सप्तबली के अंतर्गत भैंसा के अतिरिक्त चूहा , कबूतर , मुर्गा , बत्तख और सुअर जैसे जीव आते है जिसको मंदिर का प्रमुख पुजारी देवी रूप में स्वीकार करता है।

पिछले बलि आयोजन के आंकड़ों के अनुसार 20,000 से अधिक भैसो की बलि पहले दिन ही दे दी गई थी, कुल बलि पशुओं की संख्या पांच लाख तक पहुंच गयी थी। गढ़ी माई के कत्लगाह में मन्दिर द्वारा नियुक्त २०० लोग बलि कर्म को अंजाम देते हैं । हर पांच साल बाद ३ लाख से ५ लाख तक पशुओं की बलि दी जाती है । यह बलि प्रमुख रूप से महिष की होती है (जिसे जल महिष कहा जाता है) लेकिन उसकी बलि के साथ साथ बकरी , मेष , सूअर , मुर्गा और कबूतर इत्यादि की भी बलि दी जाती है । बलि एक दिन नहीं पूरे महीनें भर चलता रहता है । पशुओं की बलि इस हद तक दी जाती है कि पिछले 2009 में हुए बलि आयोजन के दौरान न केवल पशुओं की कमी हो गई थी बल्कि भक्तों को उसके मांस की भी कमी हो गई थी । उस समय सरकार नें रेडियो से घोषणा करके किसानों को देवी की प्रसन्नता के लिए अपने पशुओ को बेचने के लिए कहा था ! इस कत्लगाह में इस दौरान की अफरातफरी और चीख पुकार दिल दहलाने वाला होता है, ऐसा लगता है मानो पूरा प्रांगण ही खून का तालाब बन गया हो । इस बलि का दृश्य बीभत्स होता है क्योकि बहुतेरे तो वहां खून पीते हुए भी दिखते हैं। इस वीभत्स दृश्य और इसका खौफ का अनुमान वहां उपस्थित बच्चों की आँखों में देख कर लगाया जा सकता है । बलि में काटे गए पशुओं को पड़ोस के गावों में ले जाया जाता है जहाँ सारे गांव के लोग उसे प्रसाद रूप में वितरित कर लेते हैं और अपने घर में पका कर खाते हैं। उनका मानना है कि यह प्रसाद अशुभ को ख़त्म कर उनके यहाँ शुभत्व ले आता है। इस बलि आयोजन के दौरान यह विश्व का सबसे बड़ा स्लॉटर हाउस बन जाता है ।

गौरतलब है कि देवी के मंदिर में इस दौरान आये श्रद्धालुओं में और बलि करनें वालों में ७०% उत्तर प्रदेश , बिहार और बंगाल से होते हैं क्योकि इन राज्यों में बलि प्रथा पर कमोवेश बैन है । इन लोगों में मूलभूत रूप से गांवों के किसान , श्रमिक , फैक्टरी में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या सबसे ज्यादा होती है । ये अज्ञानी लोग यह समझते हैं की मुर्गे की बलि मात्र से उनके सरे कष्ट मिट जायेंगे और देवी उन्हें ऐश्वर्य से भर देंगी ! पिछले बलि आयोजन के लिए नेपाल सरकार नें 36,000 पौंड आवंटित किया था जिसका पशु कल्याण और अंतर्राष्ट्रीय पशु अधिकार संस्थाओं ने जबरदस्त विरोध किया था । इस मास स्लॉटर का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं में मेनका गांधी भी एक प्रमुख नाम है जिन्होंने नेपाल सरकार को पत्र लिख कर इस बलि को रोकने का अनुरोध किया था । नेपाल सरकार नें पशु अधिकार संस्थाओं के विरोध को नजरअंदाज करते हुए इस वीभत्स प्रथा को जारी रखा है । सरकार का कहना है कि यह उत्सव नेपाल के मधेशी लोगों का एक सबसे प्रमुख त्यौहार है इसलिए इसको रोकना कमोवेश असम्भव् है । नेपाल के पशु अधिकार कार्यकर्ता रामबहादुर बोम्जो को अब भी आशा है कि नेपाल के लोग इस वीभत्स कर्मकांड का विरोध करेंगे और इससे मुक्त होकर देवी की सात्विक भक्ति की तरफ जायेंगे । राम बहादुर को पशु बलि का विरोध करने और इस बावत जनजागृति लाने के कारण नेपाल में करुणा का अवतार तक कहा जाता है । लोगों का मानना है कि रामबहादुर का प्रयास एकदिन जरूर सफल होगा और यह दुर्दांत प्रथा नेपाल से ख़त्म हो जाएगी । उनके आंदोलन से अब सरकार भी जागृत होने लगी है, उनके कहने मात्र से अब सरकार पुलिस को उन स्थानों पर बलि रोकने के लिए भेजने लगी है जहाँ इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं ! भारत के उच्च न्यायालय नें भी इस दिशा में पशु अधिकार की अपील पर कुछ कदम उठाये हैं। पिछली बार ही सुप्रीम कोर्ट नें एक निर्देश जारी कर राज्य सरकारों को पशुओं की तस्करी रोकने के लिए सख्त कदम उठाने के लिए कहा था । जिन राज्यों से गढ़ी माई के लिए पशु तस्करी किये जाते हैं उन राज्य सरकारों द्वारा इस पर ध्यान कम दिया जाता है जिसके कारण अब भी हजारों की संख्या में पशु सीमावर्ती इलाकों से ले जाये जाते हैं ।

हिन्दू धर्म में हिंसा का कोई स्थान नहीं है । वास्तव में यज्ञ में भी पशु हिंसा का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता. वैदिक कोष- निरुक्त २.७ यज्ञ को ‘अध्वर‘ कहता है अर्थात हिंसा से रहित (ध्वर=हिंसा)|पशु हिंसा ही क्या, यज्ञ में तो शरीर, मन, वाणी से भी की जाने वाली किसी हिंसा के लिए स्थान नहीं है|वेदों के अनेक मन्त्र यज्ञ के लिए अध्वर शब्द का प्रयोग करते हैं! यज्ञ में वैदिक मन्त्र ही पढ़े जाते थे और अग्नि में घी, दूध, दही, जौ, इत्यादि की ही आहुति दी जाती थी किसी अन्य अमिष तत्व की नहीं ! वास्तव में पशु याग का अर्थ पशु से नहीं बल्कि पाशविक चित्तवृत्तियों से है। देवता के समक्ष इन वृत्तियों की ही बलि दी जानी चाहिए, यही शास्त्र सम्मत है ! उपनिषदों के अनुसार –“कामक्रोधलोभादयः पशवः ” अर्थात काम, क्रोध और लोभ इत्यादि ही पशु हैं, इन्हीं का यज्ञ में हवन करंना चाहिए । शैवागम में भी पशु का तात्पर्य इन्ही मनोवृत्तियों से है। ऋग्वेद में तो पशु हत्या मात्र निषेध है : “माँ नो गोषु , माँ नो अश्वेषु रिरिषः-ऋग्वेद १ /११४/८ ” हमारी गायों और घोड़ो को मत मारो। सामवेद में भी यह एक एकदम स्पष्ट है ” न कि देवा इनिमसि न क्या योपयामसि । मन्त्र श्रुत्यं चरामसि ” अर्थात हे देव ! हम हिंसा नहीं करते और न ही ऐसा अनुष्ठान करते हैं, हम वेद मन्त्र के अनुसार आचरण करते हैं ” ! पद्मपुराण में तो देवी पार्वती स्वयं पशु बलि का विरोध करती हुई कहती हैं ” जो व्यक्ति मेरी पूजा के विचार से प्राणियों का वध करते हैं वह पूजा अपवित्र है। इस हिंसा से निश्चय ही उनकी अधोगति होती है। हे शिव तामसिक वृत्ति के लोग ही ऐसा दुष्कृत्य करते हैं। करोड़ों कल्प तक उनका नरक में वास होता है इसमें कोई संशय नहीं है ।“ पीछे हमने लिखा है कि यज्ञ का मतलब “अध्वर” होता है मतलब हिंसा रहित। यज्ञ के ब्राह्मण का पद अध्वर्यु इस “अध्वर” से ही आया है अर्थात अध्वर्यु वह होता है जो यज्ञ में इस बात को प्रमुखता से देखता है कि कहीं यज्ञ में किसी तरह की हिंसा न हो, यहां तक वाक् की हिंसा तक को महापातक माना गया है । स्पष्ट है यह श्रुतियों के खिलाफ है । सनातन हिन्दू धर्म श्रुतिसम्मत है इसमें हिंसा का कोई स्थान नहीं । महात्मा गांधी नें अहिंसा को सत्य का आधार माना है और यह “सत्यमेव जयते” के अन्तर्गत ही है । हमारे महावाक्य “वसुधैव कुटुंबकम ” के भी अन्तर्गत यह बात आ ही जाती है । गढ़ी माई जैसी घोर बलि जैसी प्रथाएं अनपढ़, अज्ञानी पुजारियों के कारण हिन्दू धर्म में चली आयीं । इस तरह के अन्धविश्वास असभ्य और जंगली लोगों में ही पाये जाते हैं । यदि हम स्वयं को संस्कृत और सभ्य मानते हैं तो हमें इस तरह की प्रथाओं और कर्मकांडों का विरोध ही नहीं बल्कि उसे बलपूर्वक ख़त्म करना चाहिए ।

–प्रजातंत्र लाइव अखबार का  Nov 29, 2014 अंक में छपा हुआ लेख 

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Scientific Revolution: Marxism Beyond Social Criticism

Labouring over papers and articles makes me restless at times. It’s not just a matter of extended physical inactivity that does it, though that can certainly be unhealthy. 1,097 more words

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