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रवीश से मुझे दिक्कत है

दिक्कत तब से हुई है जब से दिल्ली के चुनाव घोषित हुए हैं। मैं भाजपा को वोट देता हूँ, आगे भी दूँगा। दिल्ली का वोटर हूँ नहीं पर सरकार भाजपा की चाहता हूँ। ये मैं पहले ही पैरा में क्लियर कर दे रहा हूँ क्योंकि रवीश कुमार आजतक क्लियर कर नहीं पाए कि वो किस पार्टी के पक्ष में हैं।

रवीश कुमार का मैं मुरीद हूँ। कई बार लोगों को ढकेल-ढकाल कर बोला है कि प्राईम टाईम देखिए, बढिया आता है। झबराहा कुत्ता जैसा झाँव-झाँव नहीं होता है वहाँ। प्राईम टाईम का इंट्रो अच्छा लगता है। उसके बाद का ज्यादा अच्छा नहीं होता क्योंकि गेस्ट महोदय सब एक ही जैसे होते हैं, एजेंडा वाले। नाम के नीचे सीएसडीएस और पता चलता है आम आदमी पार्टी के सदस्य हैं। लेकिन कहते हैं कि वो निष्पक्ष एक्सपर्ट हैं। हम विलिंग संस्पेंशन ऑफ डिसबिलीफ के साथ देखते हैं।

कल (और आज दोबारा) किरण बेदी का इंटरव्यू देखा। जेएनयू के एक पूर्व छात्र ने इस इंटरव्यू को हिटलर के काफ़ी प्रसिद्ध इंटरव्यू से कम्पेयर किया और कहा है कि रवीश भारत के पहले ‘इंटरनेशनल जर्नलिस्ट’ हैं। होंगे, हमें कोई दिक्कत नहीं है।

पंद्रह मिनट में रवीश का एक ही उद्देश्य समझ में आया: किरण बेदी को इरिटेट करना। किरण बेदी घटिया स्पीकर हैं। ना हिंदी में बोल पाती हैं, ना अंग्रेज़ी में। उनका रवैया भी पुलिसिया ही था। लेकिन ये पत्रकार रवीश को क्या हो गया?

‘मुलाठी दे दूँगा’, ‘आप ही पहली महिला आईपीएस हैं?’, ‘गाड़ी आपने ही उठवाई थी?’ आदि सवालों का क्या उद्देश्य था वो समझ में नहीं आया। मैंने वो इंटरव्यू भी देखा था जिसमें मुस्कुराते हुए, नई शादी वाले दुल्हे की तरह रवीश अरविंद केजरीवाल से सवाल कर रहे थे।

पत्रकार क्या सवाल करे, क्या नहीं वो तो वही जाने क्योंकि रवीश ढाई बजे तक तैयारी कर रहे थे इसकी। और प्रश्न ऐसे मानो ज़लील करने आए हों और सारे खोट, सारी बातें बेदी से ही पता चल जानी है। पावर कंपनी आएँगी तो दाम घटेंगे, मुफ़्त में चीजें देना सॉल्यूशन नहीं है, प्राईवेट स्कूलों पर सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुना दिया है, ये सारी बातें आपने ब्लॉग में नहीं लिखीं।

ये सहूलियत की पत्रकारिता है अगर बेदी की राजनीति सहूलियत की राजनीति है। आप किस पार्टी को सपोर्ट करते हैं आप की मर्ज़ी लेकिन लोगों के उन्माद को लेकर प्राईम टाईम मत चलाईए। आप इंटरव्यू नहीं ले रहे थे, आप मज़े ले रहे थे। अगर आँचलिक शब्द का सहारा लूँ तो आप ‘चुटकटवा छौरा’ थे जो च्यूँटी काट कर हँसता है। आप ‘चिटकाना’ चाह रहे थे किरण बेदी को।

आप उनको ग़ुस्सा करने में सफल भी हो गए। आपने लिखा भी कि आप ऐसे सवाल जानबूझ कर पूछना चाह रहे थे। लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आया कि इसका रिज़ल्ट क्या आया?

जिस नेटी घुड़सवार की भर्त्सना करते आप थकते नहीं उसी के दवाब में, या लोकप्रियता के कारण, आपने कल वाला इंटरव्यू दोबारा चलाया जबकि आप बड़े टेंशन में थे कि क्या इतना फ़ुटेज पर्याप्त है!

आपने चुनाव भर के लिए एक दर्शक खो दिया है। चुनाव के बाद वापस आऊँगा देखने। आपकी पत्रकारिता आपके बनाए रास्ते को छोड़कर ‘पत्तरकारिता’ हो जाती है जब भी आम आदमी पार्टी का नाम आता है। अरविंद हो सकता है भारतीय राजनीति को बदल दें, दिल्ली में दोबारा मुख्यमंत्री बन जाएँ। मुझे पता है आप उनपर तब सवाल उठाएँगे, जो कड़े होंगे पर आजकल, सिर्फ किरण बेदी का इंटरव्यू नहीं, आप बिना मेंबरशिप लिए ‘वोटर मेनेजमेंट’ कर रहे हैं।

ऐसा मत कीजिए। लोगों का पत्रकारों से रहा सहा भरोसा भी उठ जाएगा।

बाकी जो है सो त हईए है!

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