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	<title>pryas &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "pryas"</description>
	<pubDate>Wed, 02 Dec 2009 01:00:32 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[दो घड़ी धर्म की]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/11/20/do_ghadi_karm_ki/</link>
<pubDate>Fri, 20 Nov 2009 11:26:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक नगर में एक धनवान सेठ रहता था। अपने व्यापार के सिलसिले में उसका बाहर आना-जाना लगा रहता था। एक बार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><span style="color:#0000ff;"><strong>एक नगर में एक धनवान सेठ रहता था।</strong> अपने व्यापार के सिलसिले में उसका बाहर आना-जाना लगा रहता था। एक बार वह परदेस से लौट रहा था। साथ में धन था, इसलिए तीन-चार पहरेदार भी साथ ले लिए। लेकिन जब वह अपने नगर के नजदीक पहुंचा, तो सोचा कि अब क्या डर। इन पहरेदारों को यदि घर ले जाऊंगा तो भोजन कराना पड़ेगा। अच्छा होगा, यहीं से विदा कर दूं। उसने पहरेदारों को वापस भेज दिया।</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;"><strong>दुर्भाग्य देखिए</strong> कि वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा कि अचानक डाकुओं ने उसे घेर लिया। डाकुओं को देखकर सेठ का कलेजा हाथ में आ गया। सोचने लगा, ऐसा अंदेशा होता तो पहरेदारों को क्यों छोड़ता? आज तो बिना मौत मरना पड़ेगा। डाकू सेठ से उसका माल-असबाब छीनने लगे। तभी उन डाकुओं में से दो को सेठ ने पहचान लिया। वे दोनों कभी सेठ की दुकान पर काम कर चुके थे। उनका नाम लेकर सेठ बोला, अरे! तुम फलां-फलां हो क्या? अपना नाम सुन कर उन दोनों ने भी सेठ को ध्यानपूर्वक देखा। उन्होंने भी सेठ को पहचान लिया। उन्हें लगा, इनके यहां पहले नौकरी की थी, इनका नमक खाया है। इनको लूटना ठीक नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#0000ff;"><strong>उन्होंने अपने बाकी साथियों से कहा</strong>, भाई इन्हें मत लूटो, ये हमारे पुराने सेठ जी हैं। यह सुनकर डाकुओं ने सेठ को लूटना बंद कर दिया। दोनों डाकुओं ने कहा, सेठ जी, अब आप आराम से घर जाइए, आप पर कोई हाथ नहीं डालेगा। सेठ सुरक्षित घर पहुंच गया। लेकिन मन ही मन सोचने लगा, दो लोगों की पहचान से साठ डाकुओं का खतरा टल गया। धन भी बच गया, जान भी बच गई। इस रात और दिन में भी साठ घड़ी होती हैं, अगर दो घड़ी भी अच्छे काम किए जाएं, तो अठावन घड़ियों का दुष्प्रभाव दूर हो सकता है। इसलिए अठावन घड़ी कर्म की और दो घड़ी धर्म की। इस कहावत को ध्यान में रखते हुए <strong>अब मैं हर रोज दो घड़ी भले का काम अवश्य करूंगा।</strong></span></p>
<p><em><span style="color:#c0c0c0;">प्रस्तुति : ज्ञानचंद जैन<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</span></em></p>
<p><em><span style="color:#c0c0c0;">dhanwan seth, daku, athawan ghadi karm ki aur do ghadi dharm ki, धनवान सेठ, डाकू, अठावन घड़ी कर्म की और दो घड़ी धर्म कीम, अठावन घड़ी कर्म की, दो घड़ी धर्म की, <a href="http://pryas.wordpress.com/">नरेश का ब्लौग</a>,<a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/"> पुरानी कहानीयां</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">पुरानी कहानीयों का ब्लौग</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/">प्रयास का ब्लौग</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">भारत की कहानियाँ</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">भारत की पौराणिक कथाएं</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/">यह भी खूब रही</a>, हिन्दी ब्लौग, bharat ki kahaniyan, bharat ki puranik kahaniyan, hindi blog, <a href="http://pryas.wordpress.com/">naresh ka blog</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/www.linkedin.com/pub/naresh-kumar/4/21/7b5">naresh seo</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/">pryas blog</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">purani kahani</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">purani kahaniyon ka blog</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">puranik kathaein</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/">yah bhi khoob rahi</a></span></em></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[धनतेरस की कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/10/15/dhanteres-ki-kahani/</link>
<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 07:33:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[भारत त्यौहारों का देश है। विभिन्न त्यौहारों पर अलग-अलग पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. इसी प्रकार धनतेरस ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#C12283"><strong>भारत त्यौहारों का देश है।</strong> विभिन्न त्यौहारों पर अलग-अलग पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. इसी प्रकार धनतेरस पर भी यमराज की एक कथा बहुत प्रचलित है। कथा कुछ इस प्रकार है।</p>
<p><strong>पुराने जमाने में एक राजा हुए थे राजा हिम। </strong>उनके यहां एक पुत्र हुआ, तो उसकी जन्म-कुंडली बनाई गई। ज्योतिषियों ने कहा कि राजकुमार अपनी शादी के चौथे दिन सांप के काटने से मर जाएगा। इस पर राजा चिंतित रहने लगे। जब राजकुमार की उम्र 16 साल की हुई, तो उसकी शादी एक सुंदर, सुशील और समझदार राजकुमारी से कर दी गई। राजकुमारी मां लक्ष्मी की बड़ी भक्त थीं। राजकुमारी को भी अपने पति पर आने वाली विपत्ति के विषय में पता चल गया। </p>
<p><strong>राजकुमारी काफी दृढ़ इच्छाशक्ति वाली थीं।</strong> उसने चौथे दिन का इंतजार पूरी तैयारी के साथ किया। जिस रास्ते से सांप के आने की आशंका थी, वहां सोने-चांदी के सिक्के और हीरे-जवाहरात आदि बिछा दिए गए। पूरे घर को रोशनी से जगमगा दिया गया। कोई भी कोना खाली नहीं छोड़ा गया यानी सांप के आने के लिए कमरे में कोई रास्ता अंधेरा नहीं छोड़ा गया। इतना ही नहीं, राजकुमारी ने अपने पति को जगाए रखने के लिए उसे पहले कहानी सुनाई और फिर गीत गाने लगी। </p>
<p><strong>इसी दौरान जब मृत्यु के देवता यमराज ने</strong> सांप का रूप धारण करके कमरे में प्रवेश करने की कोशिश की, तो रोशनी की वजह से उनकी आंखें चुंधिया गईं। इस कारण सांप दूसरा रास्ता खोजने लगा और रेंगते हुए उस जगह पहुंच गया, जहां सोने तथा चांदी के सिक्के रखे हुए थे। डसने का मौका न मिलता देख, विषधर भी वहीं कुंडली लगाकर बैठ गया और राजकुमारी के गाने सुनने लगा। इसी बीच सूर्य देव ने दस्तक दी, यानी सुबह हो गई। यम देवता वापस जा चुके थे। इस तरह राजकुमारी ने अपनी पति को मौत के पंजे में पहुंचने से पहले ही छुड़ा लिया। यह घटना जिस दिन घटी थी, वह धनतेरस का दिन था, इसलिए इस दिन को &#8216;यमदीपदान&#8217; भी कहते हैं। भक्तजन इसी कारण धनतेरस की पूरी रात रोशनी करते हैं।</font></p>
<p><font color="#E0FFFF">धनतेरस की कहानी, भारत के त्यौहार, भारत की पौराणिक कथाएं, राजा हिम, सोने-चांदी, धन तेरस, दिवाली धनतेरस, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">पुरानी कहानीयां</a>, भारत की कहानियाँ, दिवाली मुबारक, दिपावली मुबारक, यमदीपदान, यमदीपन की कथा, मां लक्ष्मी, नरेश का ब्लौग, हिन्दी ब्लौग, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">पुरानी कहानीयों का ब्लौग</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>,<a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास का ब्लौग</a>, dhanteres ki kahani, bharat ke tyohaar, bharat ki puranik kahaniyan, puranik kathaein, raja him, sona chandi, dhan teres, diwali dhanters, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">purani kahani</a>, bharat ki kahaniyan, diwali mubarak, dipawali mubarak, yamdipdaan, yamdipdaan ki katha, maan laxmi, <a href="http://pryas.wordpress.com">naresh ka blog</a>, hindi blog, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">purani kahaniyon ka blog</a>, <a href="http://www.linkedin.com/pub/naresh-kumar/4/21/7b5">naresh seo</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas blog</a>, pryas</font></p>
</div>]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[भक्त और भगवान]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/10/12/bhaktaurbhagwan/</link>
<pubDate>Mon, 12 Oct 2009 05:20:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[तीनों लोकों में राधा की स्तुति से देवर्षि नारद खीझ गए थे। उनकी शिकायत थी कि वह तो कृष्ण से अथाह प्रे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#151B54"><strong>तीनों लोकों में</strong> राधा की स्तुति से देवर्षि नारद खीझ गए थे। उनकी शिकायत थी कि वह तो कृष्ण से अथाह प्रेम करते हैं फिर उनका नाम कोई क्यों नहीं लेता, हर भक्त &#8216;राधे-राधे&#8217; क्यों करता रहता है। वह अपनी यह व्यथा लेकर श्रीकृष्ण के पास पहुंचे। </p>
<p><strong>नारदजी ने देखा</strong> कि श्रीकृष्ण भयंकर सिर दर्द से कराह रहे हैं। देवर्षि के हृदय में भी टीस उठी। उन्होंने पूछा, &#8216;भगवन! क्या इस सिर दर्द का कोई उपचार है। मेरे हृदय के रक्त से यह दर्द शांत हो जाए तो मैं अपना रक्त दान कर सकता हूं।&#8217; श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, &#8216;नारदजी, मुझे किसी के रक्त की आवश्यकता नहीं है। मेरा कोई भक्त अपना चरणामृत यानी अपने पांव धोकर पिला दे, तो मेरा दर्द शांत हो सकता है।&#8217; </p>
<p><strong>नारद ने मन में सोचा</strong>, &#8216;भक्त का चरणामृत, वह भी भगवान के श्रीमुख में। ऐसा करने वाला तो घोर नरक का भागी बनेगा। भला यह सब जानते हुए नरक का भागी बनने को कौन तैयार हो?&#8217; श्रीकृष्ण ने नारद से कहा कि वह रुक्मिणी के पास जाकर सारा हाल सुनाएं तो संभवत: रुक्मिणी इसके लिए तैयार हो जाएं। नारदजी रुक्मिणी के पास गए। उन्होंने रुक्मिणी को सारा वृत्तांत सुनाया तो रुक्मिणी बोलीं, &#8216;नहीं, नहीं! देवर्षि, मैं यह पाप नहीं कर सकती।&#8217; </p>
<p><strong>नारद ने लौटकर</strong> रुक्मिणी की बात श्रीकृष्ण के पास रख दी। अब श्रीकृष्ण ने उन्हें राधा के पास भेजा। राधा ने जैसे ही सुना, तत्काल एक पात्र में जल लाकर उसमें अपने दोनों पैर डुबोए। फिर वह नारद से बोली, &#8216;देवर्षि, इसे तत्काल श्रीकृष्ण के पास ले जाइए। मैं जानती हूं कि भगवान को अपने पांव धोकर पिलाने से मुझे रौरव नामक नरक में भी ठौर नहीं मिलेगा। पर अपने प्रियतम के सुख के लिए मैं अनंत युगों तक नरक की यातना भोगने को तैयार हूं।&#8217; अब देवर्षि समझ गए कि तीनों लोकों में राधा के प्रेम के स्तुतिगान क्यों हो रहे हैं। उन्होंने भी अपनी वीणा उठाई और राधा की स्तुति गाने लगे।</font></p>
<p><em>संकलन: बेला गर्ग<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
<p>भक्त, भगवान, भक्त और भगवान, देवर्षि नारद, श्रीकृष्ण, रुक्मिणी, नरक की यातना, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">पुरानी कहानीयां</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/">बेताल पच्चीसी</a>, सिंहासन बत्तीसी, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, bhakt, bhagwan, bhakt aur bhagwan, devrishi narad, sri krishna, rukmini, narak ki yatna, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">purani kahaniyan</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/">betal pachisi</a>, singhasan batisi, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, <a href="http://www.linkedin.com/pub/naresh-kumar/4/21/7b5">naresh seo</a>, <a href="http://www.linkedin.com/pub/naresh-kumar/4/21/7b5">naresh delhi</a></p>
</div>]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[ईश्वर का स्थान]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/09/16/ishwar_ka_sthan/</link>
<pubDate>Wed, 16 Sep 2009 05:44:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/09/16/ishwar_ka_sthan/</guid>
<description><![CDATA[एक बार ब्रह्माजी दुविधा में पड़ गए। लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="##0000FF"><strong>एक</strong> बार ब्रह्माजी दुविधा में पड़ गए। लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यावहारिक मुश्किलें आ रही थीं। कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो ब्रह्माजी के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता। ब्रहाजी इससे दुखी हो गए थे। अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले, &#8216;देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता है, जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।&#8217; </p>
<p><strong>ब्रह्माजी </strong>के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। गणेश जी बोले, &#8216;आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं।&#8217; ब्रह्माजी ने कहा, &#8216;यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में है। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा।&#8217; इंद्रदेव ने सलाह दी कि वह किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले &#8216;आप अंतरिक्ष में चले जाइए।&#8217; </p>
<p><strong>ब्रह्माजी </strong>ने कहा, &#8216;एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा।&#8217; ब्रह्माजीनिराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे, &#8216;क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं।&#8217; अंत में सूर्य देव बोले, &#8216;आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं। मनुष्य इस स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा।&#8217; ब्रह्माजी को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया। वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ब्रह्माजीको ऊपर ,नीचे, दाएं, बाएं, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहे। मनुष्य अपने भीतर बैठे हुए देवता को नहीं देख पा रहा है। </font></p>
<p><em>संकलन-विजय कुमार सिहं<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
<p><font color="#808080"><a href="http://pryas.wordpress.com/2009/09/16/ishwar_ka_sthan">ईश्वर का स्थान</a>, ब्रह्माजी, हिमालय पर्वत, सूर्यदेव, इंद्रदेव, गणेश जी, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/09/16/ishwar_ka_sthan">ishwar ka sthan</a>, brahma ji, himalaya, suryadev, indradev, ganesh ji, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">naresh ka blog</a>, <a href="http://www.linkedin.com/pub/naresh-kumar/4/21/7b5">naresh seo</a>, <a href="http://www.linkedin.com/pub/naresh-kumar/4/21/7b5">seo naresh</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">नरेश का ब्लौग </a><a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">पुरानी कहानीयाँ</a>, विक्रम बेताल, सिंहासन बत्तीसी, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">purani kahaniya</a>, vikram betal, singhasan battissi</font></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[भक्ति और संपत्ति]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/09/07/bhakti_aur_sampatti/</link>
<pubDate>Mon, 07 Sep 2009 02:02:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक बार काशी के निकट के एक इलाके के नवाब ने गुरु नानक से पूछा, &#8216;आपके प्रवचन का महत्व ज्यादा है ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>एक</strong> बार काशी के निकट के एक इलाके के नवाब ने गुरु नानक से पूछा, &#8216;आपके <strong>प्रवचन का महत्व ज्यादा है या हमारी दौलत का?</strong>&#8216; नानक ने कहा, &#8216;इसका जवाब उचित समय पर दूंगा।&#8217; कुछ समय बाद नानक ने नवाब को काशी के अस्सी घाट पर एक सौ स्वर्ण मुद्राएं लेकर आने को कहा। नानक वहां प्रवचन कर रहे थे। नवाब ने स्वर्ण मुद्राओं से भरा थाल नानक के पास रख दिया और पीछे बैठ कर प्रवचन सुनने लगा। वहां एक थाल पहले से रखा हुआ था। प्रवचन समाप्त होने के बाद नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं मुट्ठी में लेकर कई बार खनखनाया। भीड़ को पता चल गया कि स्वर्ण मुद्राएं नवाब की तरफ से नानक को भेंट की गई हैं।</p>
<p><strong>थोड़ी</strong> देर बाद अचानक नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं उठा कर गंगा में फेंकना शुरू कर दिया। यह देख कर वहां अफरातफरी मच गई। कई लोग स्वर्ण मुदाएं लेने के लिए गंगा में कूद गए। भगदड़ में कई लोग घायल हो गए। मारपीट की नौबत आ गई। नवाब को समझ में नहीं आया कि आखिर नानक ने यह सब क्यों किया। तभी नानक ने जोर से कहा, &#8216;भाइयों, असली स्वर्ण मुद्राएं मेरे पास हैं। गंगा में फेंकी गई मुदाएं नकली हैं। आप लोग शांति से बैठ जाइए।&#8217; जब सब लोग बैठ गए तो नवाब ने पूछा, &#8216;आप ने यह तमाशा क्यों किया? धन के लालच में तो लोग एक दूसरे की जान भी ले सकते हैं।&#8217; नानक ने कहा, &#8216;मैंने जो कुछ किया वह आपके प्रश्न का उत्तर था। आप ने देख लिया कि प्रवचन सुनते समय लोग सब कुछ भूल कर भक्ति में डूब जाते हैं। लेकिन <strong>माया लोगों को सर्वनाश की ओर ले जाती है। प्रवचन लोगों में शांति और सद्भावना का संदेश देता है मगर दौलत तो विखंडन का रास्ता है।</strong>&#8216; नवाब को अपनी गलती का अहसास हो गया।</p>
<p><em>संकलन: सुरेश सिंह<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
<p>गुरू नानक, नवाब, स्वर्ण मुद्राएं, शांति, सद्भावना, दौलत, <a href="http://pryas.wordpress.com">नरेश का ब्लौग</a>, नरेश, guru nanak, nawab, swarn mudra, shanti, daulat, <a href="http://pryas.wordpress.com">naresh ka blog</a>, naresh, naresh seo, pryas, yah bhi khoob rahi, प्रयास, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास का ब्लौग</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वफादार खजांची]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/08/25/wafadar_khanajanchi/</link>
<pubDate>Tue, 25 Aug 2009 10:34:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/08/25/wafadar_khanajanchi/</guid>
<description><![CDATA[दिल्ली के एक बादशाह अपनी प्रजा के सुख-दुख का बड़ा ख्याल रखते थे। वह हर समय आम आदमी के विकास की बात स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#254117"><strong>दिल्ली </strong>के एक बादशाह अपनी प्रजा के सुख-दुख का बड़ा ख्याल रखते थे। वह हर समय आम आदमी के विकास की बात सोचते रहते थे। एक रात वह टहल रहे थे, तभी अचानक उनकी नजर शाही खजाने की तरफ गई। उन्होंने थोड़ा और आगे बढ़कर देखा तो पाया कि खजाने की बत्तियां जली हुई हैं। बत्ती जलती देखकर बादशाह खजाने की तरफ बढ़ चले। वहां जाने पर उन्होंने देखा कि खजांची कुछ हिसाब-किताब कर रहे हैं। उन्होंने खजांची से पूछा, &#8216;क्या बात है? आज सोना नहीं है? आधी रात हो गई और तुम अब तक यहीं पर बैठे-बैठे हिसाब-किताब कर रहे हो।&#8217; बादशाह की बात पर खजांची बोला, &#8216;जहांपनाह, हिसाब कुछ बढ़ गया है इसलिए मैं दोबारा गिनती कर रहा हूं और यह पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं कि आखिर किसका अतिरिक्त धन हमारे खजाने में आ गया है।&#8217; </p>
<p><strong>बादशाह </strong>खजांची की इस बात पर बोले, &#8216;ठीक है, किसी का पैसा खजाने में आ गया होगा। लेकिन यह काम तो तुम कल सुबह भी कर सकते हो। अभी तो बहुत रात हो गई है। काम बंद करो और अपने घर जाकर आराम करो।&#8217; इस पर खजांची ने जवाब दिया, &#8216;आप ठीक कह रहे हैं। यह काम मैं कल भी कर सकता हूं। मगर जिसके पैसे हमारे पास आ गए हैं वह आदमी तो बेहद परेशान हो रहा होगा फिर वह मन ही मन बद्दुआ भी दे रहा होगा। मैं नहीं चाहता कि उसकी बद्दुआ हुकूमत को लगे। इसलिए मैं अभी हिसाब साफ करना चाहता हूं ताकि उस शख्स को सुबह होते ही पैसे लौटा सकूं। मैं नहीं चाहता कि कोई यह समझे कि यहां किसी भी मामले में कार्रवाई देर से होती है।&#8217; बादशाह खजांची की बात सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, &#8216;जिस राज्य में तुम जैसा वफादार व ईमानदार खजांची हो उसे तरक्की की ओर जाने से कोई नहीं रोक सकता।&#8217; बादशाह खजांची की पीठ थपथपाकर लौट गए।</font></p>
<p><em>संकलन: रेनू सैनी<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
<p><font color="#EBDDE2"><a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास ब्लौग</a>, वफादार खजांची, जहांपनाह, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">naresh blog</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">naresh hindi blog</a>, naresh ka blog, हिन्दी चिट्ठा, हिन्दी ब्लौग, बेताल पच्चीसी, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">पुरानी कहानीयाँ</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">नरेश ब्लौग</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">नरेश का ब्लौग</a> <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">purani kahaniyan</a></font></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सेवक का बड़प्पन]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/08/17/sewak_ka_baddappan/</link>
<pubDate>Mon, 17 Aug 2009 06:50:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/08/17/sewak_ka_baddappan/</guid>
<description><![CDATA[मेवाड़ के महाराणा अपने एक नौकर को हमेशा अपने साथ रखते थे, चाहे युद्ध का मैदान हो, मंदिर हो या शिकार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#250517"><strong>मेवाड़ </strong>के महाराणा अपने एक नौकर को हमेशा अपने साथ रखते थे, चाहे युद्ध का मैदान हो, मंदिर हो या शिकार पर जाना हो। एक बार वह अपने <strong>इष्टदेव एकलिंग जी</strong> के दर्शन करने गए। उन्होंने हमेशा की तरह उस नौकर को भी साथ ले लिया। दर्शन कर वे तालाब के किनारे घूमने निकल गए। उन्हें एक पेड़ पर ढेर सारे पके आम दिखाई दिए। उन्होंने एक आम लेकर चार फांकें बनाईं। एक फांक नौकर को देते हुए कहा, <strong>&#8216;बताओ, इसका कैसा स्वाद है?</strong>&#8216; आम खाकर नौकर ने कहा &#8216;महाराज! बहुत मीठा है। ऐसा मीठा आम तो मैंने कभी खाया ही नहीं। कृपया एक और देने की कृपा करें।&#8217; </p>
<p><strong>महाराणा </strong>ने एक फांक और दे दी। नौकर ने उसे भी पहले की तरह मजे लेकर खाया और कहा, &#8216;वाह! क्या स्वाद है! मजा आ गया। मेहरबानी करके एक और दे दीजिए।&#8217; <strong>महाराणा को हैरत हुई। </strong>उन्हें उसके व्यवहार में थोड़ी अस्वाभाविकता नजर आई। लेकिन वह उनका प्रिय सेवक था जिससे वह काफी स्नेह करते थे। इसलिए उसकी इस मांग को पूरा करने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ। उन्होंने तीसरी फांक भी दे दी। उसे खाते ही नौकर बोला, &#8216;यह तो बिल्कुल अमृत फल है। यह भी दे दीजिए।&#8217; उसने अंतिम फांक भी मांग ली। लेकिन इस बार महाराणा को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा, &#8216;तुम्हें शर्म नहीं आती। तुम्हें सब कुछ पहले मिलता है तब भी तुम इतनी हिम्मत कर रहे हो मेरे सामने?&#8217; </p>
<p><strong>यह</strong> कहते हुए महाराणा ने वह फांक अपने मुंह में रख ली लेकिन तुरंत उगल दिया। वह बोले, &#8216;इतना खट्टा आम खाकर भी तुम कहते रहे कि यह मीठा है, अमृत तुल्य है, क्या स्वाद है। क्यों कहा ऐसा?&#8217; नौकर बोला, &#8216;महाराज! जीवन भर आप मीठे आम देते रहे हैं। आज खट्टा आम आ गया तो कैसे कहूं कि यह खट्टा है, ऐसा कहना, मेरी कृतघ्नता नहीं होती?&#8217; महाराणा ने उसे गले से लगा लिया और उसे पुरस्कृत किया।</font></p>
<p><em>संकलन : बेला गर्ग<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संगीत और संगीतकार]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/08/04/sangeet_aur_sangeetkar/</link>
<pubDate>Tue, 04 Aug 2009 04:40:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/08/04/sangeet_aur_sangeetkar/</guid>
<description><![CDATA[उस्ताद अलाउद्दीन खां के पास दूर-दूर से लोग संगीत सीखने और विचार-विमर्श के लिए आते थे। उनमें अमीर भी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#151B54"><br />
<strong>उस्ताद</strong> अलाउद्दीन खां के पास दूर-दूर से लोग संगीत सीखने और विचार-विमर्श के लिए आते थे। उनमें अमीर भी होते और गरीब भी। वह सभी को समान भाव से शिक्षा देते थे। एक बार वह अपने बगीचे में अत्यंत साधारण कपड़े पहने हुए काम कर रहे थे। हाथ-पांव मिट्टी से सने थे। उसी समय एक व्यक्ति बढि़या सूट-बूट पहने आया और खां साहब से बोला, &#8216;ऐ माली, उस्ताद कहां हैं। मुझे उनसे मिलना है।&#8217; खां साहब ने पूछा, &#8216;क्या काम है?&#8217; उस व्यक्ति ने कहा, &#8216;मुझे उनसे संगीत सीखना है।&#8217; खां साहब ने कहा, &#8216;वह अभी आराम कर रहे हैं।&#8217; </p>
<p><strong>उस </strong>व्यक्ति ने कहा, &#8216;जाकर उस्ताद से कहो कि कोई बड़ा आदमी आया है। जल्दी जा।&#8217; खां साहब बोले, &#8216;आप इतना गुस्सा क्यों होते हैं हुजूर। अभी जाता हूं।&#8217; वह चले गए। वह पिछले दरवाजे से घर में गए थे और थोड़ी देर में अगले दरवाजे से बाहर निकल रहे थे कि तभी एक कार आकर रुकी। उसमें रामपुर के राजा और कुछ लोग थे। वे लोग दरवाजे पर पहुंचे ही थे कि खां साहब बाहर आ गए।</p>
<p><strong>राजा </strong>ने खां साहब के पैर छुए। यह देख कर उस व्यक्ति को समझ में आ गया कि यही उस्ताद अलाउद्दीन खां हैं। वह परेशान हो गया। उसने खां साहब से कहा, &#8216;हुजूर, मुझे आप को पहचानने में भूल हुई। मुझे माफ कर दें।&#8217; खां साहब ने कहा, &#8216;तुमसे कोई भूल नहीं हुई है। जिनके पास दो पैसे आ जाते हैं वे गरीबों को इसी निगाह से देखते है। जहां तक रही संगीत सीखने की बात तो मैं तुम्हें संगीत सिखा नहीं सकता क्योंकि जिस आदमी के दिल में गरीबों के लिए कोई दर्द नहीं है, उसमें संगीत कभी जन्म नहीं ले सकता।&#8217; उस व्यक्ति ने खां साहब को प्रलोभन भी दिया पर उन्होंने साफ इनकार करते हुए कहा, &#8216;संगीत रुपये-पैसे से नहीं खरीदा जाता। घमंड छोड़कर कड़ी मेहनत से ही उसे हासिल किया जा सकता है।&#8217;</font></p>
<p><em>संकलन: सुरेश सिंह<br />
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
<p>&#8212;-<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गंगा का उद्गम – 3]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/07/16/ganga_ka_udgam-3/</link>
<pubDate>Thu, 16 Jul 2009 02:11:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/07/16/ganga_ka_udgam-3/</guid>
<description><![CDATA[अब तक आपने पढा - अलका और उर्वशी भगीरथ के तप को नहीं तोड पायीं। दोनों हारीं और लौट गई। उनके लौटते ही ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong><a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/15/ganga_ka_udgam_2/">अब तक आपने पढा </a>- </strong></p>
<blockquote><p><strong>अलका और उर्वशी भगीरथ के तप को नहीं तोड पायीं। दोनों हारीं और लौट गई। उनके लौटते ही ब्रह्मा पसीज गये। वह सामने आये और बोले, “बेटा, वर मांगो! वर मांगो!”</strong></p></blockquote>
<p><strong>अब आगे पढिये &#8211; </strong></p>
<p><font color="#151B54"><strong>भागीरथ </strong>ने ब्रह्माजी को प्रणाम किया और बोले, &#8220;यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो गंगाजी को धरती पर भेजिये।&#8221;</p>
<p><strong>भागीरथ </strong>की बात सुनकर ब्रह्माजी ने क्षणभर सोचा, फिर बोले, &#8220;ऐसा ही होगा, भगीरथ।&#8221;</p>
<p><strong>ब्रह्माजी </strong>के मुंह से यह वचन निकले कि उनके हाथ का कमण्डल बड़े जोर से कांपने लगा। ऐसा लगता था जैसे कि वह फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जायगा।</p>
<p><strong>थोड़ी </strong>देर बाद उसमें से एक स्वर सुनाई दिया, &#8220;ब्रह्मा, ये तुमने क्या किया? तुमने भागीरथ को क्या वर दे डाला?&#8221;</p>
<p><strong>ब्रह्मा </strong>बोले, &#8220;मैंने ठीक ही किया है, गंगा!&#8221;</p>
<p><strong>गंगा </strong>चौंकीं। बोलीं, &#8220;तुम मुझे धरती पर भेजना चाहते हो और कहते हो कि तुमने ठीक ही किया है!&#8221;</p>
<p><strong>&#8220;हां, देवी!&#8221; </strong>ब्रह्मा ने कहा।</p>
<p><strong>&#8220;कैसे?&#8221;</strong> गंगा ने पूछा।</p>
<p><strong>ब्रह्मा </strong>ने बताया, &#8220;देवी, आप संसार का दु:ख दूर करने के लिए पैदा हुई हैं। आप अभी मेरे कमण्डल में बैठी हैं। अपना काम नहीं कर रही हैं।&#8221;</p>
<p><strong>गंगा </strong>ने कहा, &#8220;ब्रह्मा, धरती पर पापी रहते है, पाखंडी रहते हैं, पतित रहते हैं। तुम मुझे उन सबके बीच भेजना चाहते हो! बताओ, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?&#8221;</p>
<p><strong>ब्रह्मा </strong>बोले, &#8220;देवी, आप बुरे को भला बनाने के लिए बनी हैं। पापी को उबारने के लिए बनी हैं। पाखंड मिटाने के लिए बनी हैं। पतित को तारने के लिए बनी हैं। कमजोरों को सहारा देने के लिए बनी हैं और नीचों को उठाने के लिए बनी हैं।&#8221;</p>
<p><strong>गंगा </strong>ने कहा, &#8220;ब्रह्मा!&#8221;</p>
<p><strong>ब्रह्मा </strong>बोले, &#8220;देवी, बुरों की भलाई करने के लिए तुमकों बुरों के बीच रहना होगा। पापियों को उबारने के लिए पापियों के बीच रहना होगा। पाखंड को मिटाने के लिए पाखंड के बीच रहना होगा। पतितों को तारने के लिए पतितों के बीच रहना होगा। कमजोरों को सहारा देने के लिए कमजोरों के बीच रहना होगा और नीचों को उठाने के लिए नीचों के बीच निवास करना होगा। तुम अपने धरम को पहचानो, अपने करम को जानो।&#8221;</p>
<p><strong>गंगा </strong>थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं, &#8220;ब्रह्मा, तुमने मेरी आंखें खोल दी हैं। मैं धरती पर जाने को तैयार हूं। पर धरती पर मुझे संभालेगा कौन?&#8221;</p>
<p><strong>ब्रह्मा </strong>ने भगीरथ की ओर देखा।</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>ने उनसे पूछा, &#8220;आप ही बताइये।&#8221;</p>
<p><strong>ब्रह्मा </strong>बोले, &#8220;तुम भगवान शिव को प्रसन्न करो। यदि वह तैयार हो गये तो गंगा को संभाल लेंगे और गंगा धरती पर उतर आयंगी।&#8221;</p>
<p><strong>ब्रह्मा </strong>उपाय बताकर चले गये। भगीरथ अब शिव को रिझाने के लिए तप करने लगे।</p>
<p><strong>भगवान </strong>शिव को कौन नहीं जानता? गांव-गांव में उनके शिवाले हैं, वह भोले बाबा हैं। उनके हाथ में त्रिशूल है, सिर पर जटा है, माथे पर चांद है। गले में सांप हैं। शरीर पर भभूत है। वह शंकर हैं। महादेव हैं। औढर-दानी है। वह सदा देते रहते है। और सोचते रहते हैं कि लोग और मांगें तो और दें। भगीरथ ने बड़े भक्ति भाव वे विनती की। हिमालय के कैलास पर निवास करने वाले शंकर रीझ गये। भगीरथ के सामने आये और अपना डमरु खड़-खड़ाकर बोले, &#8220;मांग बेटा, क्या मांगता है?&#8221;</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>बोले, &#8220;भगवान, शंकर की जय हो! गंगा मैया धरती पर उतरना चाहती हैं, भगवन! कहती हैं&#8230;..&#8221;</p>
<p><strong>शिव </strong>ने भगीरथ को आगे नहीं बोलने दिया। वह बोले, &#8220;भगीरथ, तुमने बहुत बड़ा काम किया है। मैं सब बातें जानता हूं। तुम गंगा से विनती करो कि वह धरती पर उतरें। मैं उनको अपने माथे पर धारण करुंगा।&#8221;</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>ने आंखें ऊपर उठाई, हाथ जोड़े और गंगाजी से कहने लगे, &#8220;मां, धरती पर आइये। मां, धरती पर आइये। भगवान शिव आपको संभाल लेंगे।&#8221;</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>गंगाजी की विनती में लगे और उधर भगवान शिव गंगा को संभालने की तैयार करने लगे।</p>
<p><strong>गंगा </strong>ने ऊपर से देखा कि धरती पर शिव खड़े हैं। देखने में वह छोटे से लगते हैं। बहुत छोटे से। वह मुस्कराई। यह शिव और मुझे संभालेंगे? मेरे वेग को संभालेंगे? मेरे तेज को संभालेंगे? इनका इतना साहस? मैं इनको बता दूंगी कि गंगा को संभालना सरल काम नहीं है।</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>ने विनती की। शिव होशियार हुए और गंगा आकाश से टूट पड़ीं। गंगा उतरीं तो आकाश सफेदी से भर गया। पानी की फहारों से भर गया। रंग-बिरंग बादलों से भर गया। गंगा उतरीं तो आकाश में शोर हुआ। घनघोर हुआ, ऐसा कि लाखों-करोड़ों बादल एक साथ आ गये हों, लाखों-करोड़ों तूफान एक साथ गरज उठे हों। गंगा उतरीं तो ऐसी उतरीं कि जैसे आकाश से तारा गिरा हो, अंगारा गिरा हो, बिजली गिरी हो। उनकी कड़क से आसमान कांपने लगा। दिशाएं थरथराने लगी। पहाड़ हिलने लगे और धरती डगमगाने लगी। गंगा उतरीं तो देवता डर गये। काम थम गये। सबने नाक-कान बंद कर लिये और दांतों तले उंगली दबा ली। गंगा उतरीं तो भगीरथ की आंखें बंद हो गई। वह शांत रहे। भगवान का नाम जपते रहे। थोड़ी देर में धरती का हिलना बंद हो गया। कड़क शांत हो गई और आकाश की सफेदी गायब हो गई।</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>ने भोले भगवान की जटाओं में गंगाजी के लहराने का सुर सुना। भगीरथ को ज्ञान हुआ कि गंगाजी शिव की जटा में फंस गई हैं। वह उमड़ती हैं। उसमें से निकलने की राह खोजती हैं, पर राह मिलती नहीं है। गंगाजी घुमड़-घुमड़कर रह जाती हैं। बाहर नहीं निकल पातीं।</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>समझ गये। वह जान गये कि गंगाजी भोले बाबा की जटा में कैद हो गई है। भगीरथ ने भोले बाबा को देखा। वह शांत खड़े थे। भगीरथ ने उनके आगे घुटने टेके और हाथ जोड़कर बैठ गये और बोले, &#8220;हे कैलाश के वासी, आपकी जय हो! आपकी जय हो! आप मेरी विनती मानिये और गंगाजी को छोड़ दीजिये!&#8221;</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>ने बहुत विनती की तो शिव शंकर रीझ गये। उनकी आंखें चमक उठीं। हाथ से जटा को झटका दिया तो पानी की एक बूंद धरती पर गिर पड़ी।</p>
<p><strong>बूंद </strong>धरती पर शिलाओं के बीच गिरी, फूली और धारा बन गई। वह उमड़ी और बह निकली। उसमें से कलकल का स्वर निकलने लगा। उसकी लहरें उमंग-उमंगकर किनारों को छूने लगीं। गंगा धरती पर आ गई। भगीरथ ने जोर से कहा, &#8220;गंगामाई की जय!&#8221;</p>
<p><strong>गंगामाई </strong>ने कहा, &#8220;भगीरथ, रथ पर बैठो और मेरे आगे-आगे चलो।&#8221;</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>रथ पर बैठे। आगे-आगे उनका रथ चला, पीछे-पीछे गंगाजी बहती हुई चलीं। वे हिमालय की शिलाओं में होकर आगे बढ़े। घने वनों को पार किया और मैदान में उतर आये। ऋषिकेश पहुंचे और हरिद्वार आये। आगे बढ़े तो गढ़मुक्तेश्वर पहुंचे।</p>
<p><strong>आगे </strong>चलकर गंगाजी ने पूछा, &#8220;क्यों भगीरथ, क्या मुझे तुम्हारी राजधानी के दरवाजे पर भी चलना होगा?&#8221;</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>ने हाथ जोड़कर कहा, &#8220;नहीं माता, हम आपको जगत की भलाई के लिए धरती पर लाये हैं। अपनी राजधानी की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं।&#8221;</p>
<p><strong>गंगा </strong>बहुत खुश हुई। बोलीं, &#8220;भगीरथ, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। आज से मैं अपना नाम भी भागीरथी रखे लेती हूं।&#8221;</p>
<p><strong>भगीरथ </strong>ने गंगामाई की जय बोली और वह आगे बढ़े। सोरो, इलाहाबाद, बनारस, पटना होते हुए कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे। साठ हजार राख की ढेरियां उनके पवित्र जल में डूब गई। वह आगे बढ़ीं तो उनको सागर दिखाई दिया। सागर को देखते ही खिलखिलाकर हंस पड़ीं और बोलीं, &#8220;बेटा भगीरथ, अब तुम लौट जाओ। मैं यहीं सागर में विश्राम करुंगी।&#8221;</p>
<p><strong>तबसे </strong>गंगा आकाश से हिमालय पर उतरती हैं। सत्रह सौ मील धरती सींचती हुई सागर में विश्राम करने चली जाती हैं। वह कभी थकमती नहीं, अटकती नहीं। वह तारती हैं, उबारती हैं और भलाई करती हैं। यही उनका काम है। वह इसमें सदा लगी रहती हैं।</font></p>
<p><strong>समाप्त!</strong></p>
<p>पिछले अंक<br />
<a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/14/ganga_ka_udgam/"><strong>गंगा का उद्गम</strong></a><br />
<a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/15/ganga_ka_udgam_2/"><strong>गंगा का उद्गम &#8211; 2</strong></a></p>
<p>आभार: विकिसोर्स</p>
<p>गंगा का उद्गम, भगवान राम, राजा सगर, अश्वमेध यज्ञ, राजा इंद्र, राख की ढेरियां, गंगा नदी, गंगा, भागीरीथी, ganga ka udgam, bhagwan ram, raja sagar, ashwmegh yagya, raja indra, raakh ki dheriyan, ganga river, ganga nadi, ganga, bhagirithi, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गंगा का उद्गम - 2]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/07/15/ganga_ka_udgam_2/</link>
<pubDate>Wed, 15 Jul 2009 02:12:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/07/15/ganga_ka_udgam_2/</guid>
<description><![CDATA[अब तक आपने पढा भगवान राम के कुल में एक राजा थे राजा सगर. राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया. राजा इंद्र न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/14/ganga_ka_udgam/">अब तक आपने पढा</a></p>
<blockquote><p><strong> भगवान राम के कुल में एक राजा थे राजा सगर. राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया. राजा इंद्र ने घोड़े को चुरा लिया और कपिल मुनि की गुफा में जाकर बांध दिया। राजा ने अपने साठ हजार बेटों से घोड़े का पता लगाने को भेजा। ढुंढते-ढुंढते वो कपिल मुनि की गुफा में पहुँचे. वहाँ उन्होंने घोडा बंधा देखा. उन्होंने मुनि को पकडना चाहा तो वो सब मुनि कि तेज से राख के ढेर हो गये.</strong></p></blockquote>
<p><strong>अब आगे पढिये -</strong></p>
<p><font color="#307D7E"><strong>साठ</strong> हजार राजकुमारों को गये बहुत दिन हो गये। उनकी कोई खबर न मिली। राजा सगर की चिंता बढ़ने लगी। तभी एक दूत ने आकर बताया कि बंगाल से कुछ मछुवे आये हैं, उनसे मैंने अभी-अभी सुना है कि उन्होंने राजकुमारों को एक गुफा में घुसते देखा और वे अभी तक उस गुफा से निकलकर नहीं आये।</p>
<p><strong>सगर</strong> सोच में पड़ गये। हो न हो, राजकुमार किसी बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं। उनको विपत से उबारने का उपाय करना चाहिए। राजा ने ऊंच-नीच सोची, आगा-पीछा सोचा और अपने पोते अंशुमान को बुलाया।</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>के आने पर सगर ने उसका माथा चूमकर उसे छाती से लगा लिया और पिर कहा, &#8220;बेटा, तुम्हारे साठ हजार चाचा बंगाल में सागर के किनारे एक गुफा में घुसते हुए देखे गये हैं, पर उसमें से निकलते हुए उनको अभी तक किसी ने नहीं देखा है।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>का चेहरा खिल उठा। वह बोला, &#8221; बस! यही समाचार है। यदि आप आज्ञा दें तो मैं जाऊं और पता लगाऊं।&#8221;</p>
<p><strong>सगर </strong>बोले, &#8220;जा, अपने चाचाओं का पता लगा।&#8221;</p>
<p><strong>जब </strong>अंशुमान जाने लगा तो बूढ़े राजा सगर ने उसे फिर छाती से लगाया, उसका माथा चूमा और आशीष देकर उसे विदा किया।</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>इधर-उधर नहीं घूमा। उसने पता लगाया और उसी गुफा के दरवाजे पर पहुंचा। गुफा के दरवाजे पर वह ठिठक गया। उसने कुल के देवता सूर्य को प्रणाम किया और गुफा के भीतर पैर रखा। अंधेरे से उजाले में पहुंचा तो अचानक रुककर खड़ा हो गया। उसने जो देखा, वह अदभुत था। दूर-दूर तक राख की ढेरियां फैली हुई थीं। ऐसी कि किसी ने सजाकर फैलद दी हों। इतनी ढेरियां किसने लगाई? क्यों लगाई? वह उन ढेरियों को बचाता आग बढ़ा। थोड़ा ही आगे गया था कि एक गम्भीर आवाज उसे सुनाई दी, &#8220;आओ, बेटा अंशुमान, यह घोड़ा बहुत दिनों से तुम्हारी राह देख रहा है।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>चौंका। उसने एक दुबले-पतले ऋषि हैं, जो एक घोड़े के निकट खड़े है। इनको मेरा नाम कैसे मालूम हो गया? यह जरुर बहुत पहुंचे हुए हैं। अंशुमान रुका। उसने धरती पर सिर टेककर ऋषि को नमस्कार किया</p>
<p>&#8220;<strong>आओ </strong>बेटा, अंशमान, यह घोड़ा तुम्हारी राह देख रहा है।&#8221;</p>
<p><strong>ऋषि </strong>बोले, &#8220;बेटा अंशुमान, तुम भले कामों में लगो। आओ मैं कपिल मुनि तुमको आशीष देता हूं।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>ने उन महान कपिल को बारंबार प्रणाम किया।</p>
<p><strong>कपिल </strong>बोले, &#8220;जो होना था, वह हो गया।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>ने हाथ जोड़कर पूछा, &#8220;क्या हो गया, ऋषिवर?&#8221;</p>
<p><strong>ऋषि </strong>ने राख की ढेरियों की ओर इशारा करके कहा, &#8220;ये साठ हजार ढेरियां तुम्हारे चाचाओं की हैं, अंशुमान!&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>के मुंह से चीख निकल गई। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली।</p>
<p><strong>ऋषि </strong>ने समझाया, &#8220;धीरज धरो बेटा, मैंने जब आंखें खोलीं तो तुम्हारी चाचाओं को फूस की तरह जलते पाया। उनका अहंकार उभर आया था। वे समझदारी से दूर हट गये थे। उन्होंने सोच-विचार छोड़ दिया था। वे अधर्म पर थे। अधर्म बुरी चीज है। पता नहीं, कब भड़क पड़े। उनका अधर्म भड़का और वे जल गये। मैं देखता रह गया। कुछ न कर सका।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>ने कहा, &#8220;ऋषिवर!&#8221;</p>
<p><strong>कपिल </strong>बोले, &#8220;बेटा, दुखी मत होओ। घोड़े को ले जाओ और अपने बाबा को धीरज बंधाओ। महाप्रतापी राजा सगर से कहना कि आत्मा अमर है। देह के जल जाने से उसका कुछ नहीं बिगड़ता।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>ने कपिल के सामने सिर झुकाया और कहा, &#8220;ऋषिवर! मैं आपकी आज्ञा का पालन करुंगा। पर मेरे चाचाओं की मौत आग में जलने से हुई है। यह अकाल मौत है। उनको शांति कैसे मिलेगी?&#8221;</p>
<p><strong>कपिल </strong>ने कुछ देर सोचा और बोले, &#8220;बेटा, शांति का उपाय तो है, पर काम बहुत कठिन है।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>ने सिर झुकाकर कहा, &#8220;ऋषिवर! सूर्यवंशी कामों की कठिनता से नहीं डरते।&#8221;</p>
<p><strong>कपिल </strong>बोले, &#8220;गंगाजी धरती पर आयें और उनका जल इन राख की ढेरियों को छुए तो तुम्हारे चाचा तर जायंगे।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>ने पूछा, &#8221; गंगाजी कौन हैं और कहां रहती है?&#8221;</p>
<p><strong>कपिल </strong>ने बताया, &#8220;गंगाजी विष्णु के पैरों के नखों से निकली हैं और ब्रह्मा के कमण्डल में रहती हैं।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>ने पूछा, &#8221; गंगाजी को धरती पर लाने के लिए मुझे क्या करना होगा?&#8221;</p>
<p><strong>ऋषि </strong>ने कहा, &#8221; तुमको ब्रह्मा की विनती करनी होगी। जब ब्रह्मा तप पर रीझ जायंगे तो प्रसन्न होकर गंगाजी को धरती पर भेज देंगे। उससे तुम्हारे चाचाओं का ही भला नहीं होगा, और भी करोंड़ों आदमी तरह-तरह के लाभ उठा सकेंगे।&#8221;</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>ने हाथ उठाकर वचन दिया कि जबतक गंगाजी को धरती पर नहीं उतार लेंगे, तब तक मेरे वंश के लोग चैन नहीं लेंगे।</p>
<p><strong>कपिल </strong>मुनि ने अपना आशीष दिया।</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>सूरज के वंश के थे। इसी कुल के सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र को छोटे बड़े सब जानते हैं। अंशुमान ने ब्रह्माजी की विनती की। बहुत कड़ा तप किया। तप में अपना शरीर घुला दिया। अपनी जान दे दी, पर ब्रह्माजी प्रसन्न नहीं हुए।</p>
<p><strong>अंशुमान </strong>के बेटे हुए राजा दिलीप। दिलीप ने पिता के वचन को अपना वचन समझा। वह भी तप करने में जुट गये। बड़ा भारी तप किया। ऐसा तप किया कि ऋषि और मुनि चकित हो गये। उनके सामने सिर झुका दिया। पर ब्रह्मा उनके तप पर भी नही रीझे।</p>
<p><strong>दिलीप </strong>के बेटे थे भगीरथ। भगीरथ के सामने बाबा का वचन था, पिता का तप था। उन्होंने मन को चारों ओर से समेटा और तप में लगा दिया। वह थे और था उनका तप।</p>
<p><strong>सभी </strong>देवताओं को खबर लगी। देवों ने सोचा, &#8220;गंगाजी हमारी हैं। जब वह उतरकर धरती पर चली जायेंगी तो हमें कौन पूछेगा?&#8221;</p>
<p><strong>देवताओं </strong>ने सलाह की। ऊंच-नीच सोची और फिर उर्वशी तथा अलका को बुलाया गया। उनसे कहा गया कि जाओ, राजा भगीरथ के पास जाओ और ऐसा यतन करो कि वह अपने तप से डगमगा जाय। अपनी राह से विचलित हो जाय और छोटे-मोटे सुखों के चंगुल में फंस जाय।</p>
<p><strong>अलका </strong>और उर्वशी को देखा। उर्वशी ने भगीरथ को देखा। एक सादा सा आदमी अपनी धुन में डूबा हुआ था।</p>
<p><strong>उन </strong>दोनों ने अपनी माया फैलाई। भगीरथ के चारों ओर बसंत बनाया। चिड़ियां चहकने लगीं। कलियां चटकने लगी। मंद पवन बहने लगा। लताएं झूमने लगीं। कुंजे मुस्कराने लगीं। दोनों अप्सराएं नाचीं। माया बखेरी। मोहिनी फैलाई और चाहा कि भगीरथ के मन को मोड़ दें। तप को तोड़ दें।</p>
<p><strong>पर </strong>वह नहीं हुआ।</p>
<p><strong>जब </strong>उर्वशी का लुभावबढ़ा तो भगीरथ के तप का तेज बढ़ा। दोनों हारीं और लौट गई।</p>
<p><strong>उनके </strong>लौटते ही ब्रह्मा पसीज गये। वह सामने आये और बोले, &#8220;बेटा, वर मांगा! वर मांग!&#8221;</font></p>
<p><em><strong>क्रमश:</strong></em></p>
<p>गंगा का उद्गम, भगवान राम, राजा सगर, अश्वमेध यज्ञ, राजा इंद्र, राख की ढेरियां, गंगा नदी, गंगा, भागीरीथी, ganga ka udgam, bhagwan ram, raja sagar, ashwmegh yagya, raja indra, raakh ki dheriyan, ganga river, ganga nadi, ganga, bhagirithi, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a></p>
<p>आभार: <a href="http://wikisource.org">विकिसोर्स</a></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गंगा का उद्गम]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/07/14/ganga_ka_udgam/</link>
<pubDate>Tue, 14 Jul 2009 05:15:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[भगवान राम के कुल में राजा हुए हैं, सगर, राम से बहुत पहले। वह बड़े वीर थे। बड़े साहसी थे। उनका दबदबा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#342D7E"><strong>भगवान राम के कुल में राजा हुए हैं</strong>, सगर, राम से बहुत पहले। वह बड़े वीर थे। बड़े साहसी थे। उनका दबदबा चारों ओर फैला हुआ था। राज जब बहुत दूर-दूर तक फैल गया तो राजा ने यज्ञ किया।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>पुराने</strong> समय में अश्वमेध यज्ञ का रिवाज था। इस यज्ञ में होता यह था कि एक घोड़ा पूजा करके छोड़ दिया जाता। घोड़ा जिधर मरजी हो, जाता। उसके पीछे राजा की सेना रहती। अगर किसी ने उस घोड़े को पकड लिया तो सेना उसे छुड़ा लेती। जब घोड़ा चारों ओर घूमकर वापस आ जाता तो यज्ञ किया जाता और वह राजा चक्रवर्ती माना जाता।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>राजा</strong> सगर इसी प्रकार का यज्ञ कर रहे थे। भारतवर्ष के सारे राजा सगर को चक्रवर्ती मानते थे, पर देवों के राजा इंद्र को सगर की बढ़ती देखकर बड़ी जलन होती थी। जब उसे मालूम हुआ कि सगर अश्वमेध यज्ञ करने जा रहे हैं तो वह चुपके से सगर के पूजा करके छोड़े हुए घोड़े को चुरा ले गया और बहुत दूर कपिल मुनि की गुफा में जाकर बांध दिया।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>दूसरे </strong>दिन जब घोड़े को छोड़ने की घड़ी पास आई तो पता चला कि अश्वशाला में घोड़ा नहीं है। सबके चेहरे उतर गये। यज्ञ-भूमि में शोक छा गया।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>पहरेदारों </strong>ने खोजा, सिपाहियों ने खोजा, उनके अफसरों ने खोजा, पास खोजा और दूर खोजा पर घोड़ा न मिला तो महाराज के पास समाचार पहुंचा। महाराज ने सुना और सोच में पड़ गये। रातोंरात घोड़े को इतनी दूर निकाल ले जाना मामूली चोर का काम नहीं हो सकता था।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>राजा </strong>सगर की बड़ी रानी का एक बेटा था। उनका नाम था असमंजस। असमंजस बालकों को दुखी करता था और उनको मार डालता था। सगर ने लोगों की की पुकार सुनी और अपने बेटे असमंजस को देश से निकाल दिया। असमंजस का पुत्र था अंशुमान।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>राजा </strong>सगर की छोटी रानियों के बहुत से बेटे थे। कहा जाता है कि ये साठ हजार थे। सगर के ये पुत्र बहुत बलवान थे, बहुत चतुर थे और तरह-तरह की विद्याओं को जानने वाले थे। जो चाहते थे, कर सकते थे।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>जब </strong>सिपाही घोड़े का पता लगाकार हार गये तो महाराज ने अपने साठ हजार पुत्रों को बुलाया और कहा, &#8220;पुत्रो चोर ने सूर्यवंश का अपमान किया है। तुम सब जाओ और घोड़े का पता लगाओ।&#8221;</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>राजकुमारों </strong>ने घोड़े को खोजना शुरु किया। उसे झोंपड़ियों में खोजा, महलों में खोजा, खेड़ों में खोजा, नगलों में खोजा, गांवों और कस्बों में खोजा, नगरों और राजधानियों में खोजा। साधुओं के आश्रमों में गये, तपोवनों में गये और योगियों की गुफाओं में पहुंचे। पर्वतों के बरफीले सफेद शिखरों पर पहुंचे और नीचे उतर आये। वन-वन घूमे, पर यज्ञ का घोड़ाउनको कहीं नहीं दिखाई दिया।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>खोजते-खोजते </strong>वे धरती के छोर तक जा पहुंचे। अब आगे समुद्र था। पर राजकुमार घबराये नहीं। वे पानी में उतर गये। डुबकी लगाकर वे किनारे गुफाओं में देख आये। तैरकर वे दूर-दूर वे दूर-दूर तक की खबर ले आये। जहां उनको गुफा का संदेह हुआ वहां खोद-खोदकर देखा। पर घोड़ा वहां भी नहीं मिला। चूंकि सगर के पुत्रों ने समुद्र की इतनी खोजबीन की, इसलिए समुद्र &#8216;सागर&#8217; भी कहलाने लगा।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>घोड़ा </strong>नहीं मिला, फिर भी राजकुमार हारे नहीं। खोजने की धुन में लगे रहे। वे बंगाल के किनारे सागर से निकले और फिर थल पर खोजना शुरु किया।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>वे</strong> आगे बढ़ रहे थे कि हवा चल पड़ी। एक लता हिली और वे ठिठक गये। लता के पीछे कुछ था, जिसने उनको रोक लिया। लता हटाई। एक शिला दिखाई पड़ी। शिला को परखा गया। मालूम हुआ कि उसे किसी ने ने वहां जमा दिया है। शिला हटाई जाने लगी। देखते-देखते शिला के पीछे एक गुफा का मुंह निकल आया। राजकुमार गुफा में घुस गये। थोड़ी दूर अंधेरे में चले और पिर उजाले में आ पहुंचे। यहां जो देखा तो चकित हो गये।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>उन्होंने </strong>देखा कि एक बहुत पुराना पेड़ है। उसके नीचे एक दुबला-पतला ऋषि बैठा है। वह अपनी समाधि में लीन मालूम होता है। ऋषि के पीछे कुछ दूर पर एक और पेड़ है। उसके तने से एक घोड़ा बंधा है। कुछ राजकुमार दोड़कर घोड़े के पास गये। घोड़ा पहचान लिया गया। यह वही घोड़ा था। घोड़े को पाया, ऋषि को देखा, तो उनका क्रोध भड़क उठा।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>राजकुमारों </strong>ने बहुत शोर मचाया। उनमें से एक ऋषि को खींच लेने के लिए आगे बढ़ गया। उसने अपना हाथ बढ़ाया। उसका हाथ ऋषि के शरीर पर पड़ा कि ऋषि की देह कांपी और वह समाधि से जागे।</font></p>
<p><font color="#342D7E"><strong>उनकी </strong>आंखें खुलीं। उनकी आंखों में तेज भरा था। वह तेज राजकुमारों के ऊपर पड़ा तो गजब हो गया। महाबलवान राजकुमार भकभकाकर जल उठे। जब ऋषि की आंखें पूरी तरह से खुलीं तो उन्होंने अपने सामने बहुत सी राख की ढेरियां पड़ी पाई। ये राख की ढेरियां साठ हजार थी।</font></p>
<p><em><strong>क्रमश:</strong></em></p>
<p>गंगा का उद्गम, भगवान राम, राजा सगर, अश्वमेध यज्ञ, राजा इंद्र, राख की ढेरियां, गंगा नदी, गंगा, भागीरीथी, ganga ka udgam, bhagwan ram, raja sagar, ashwmegh yagya, raja indra, raakh ki dheriyan, ganga river, ganga nadi, ganga, bhagirithi, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a></p>
<p><strong>आभार</strong>: <em>विकिसोर्स</em></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[सेवा का संकल्प]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/07/10/sewa-ka-sanklap/</link>
<pubDate>Fri, 10 Jul 2009 09:22:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[यह घटना उस समय की है जब इटली अपने एक पड़ोसी देश के साथ युद्ध लड़ रहा था। एक युवक एक पहाड़ी की चोटी प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="blue"><strong>यह घटना उस समय की है</strong> जब <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Italy">इटली </a>अपने एक पड़ोसी देश के साथ युद्ध लड़ रहा था। एक युवक एक पहाड़ी की चोटी पर बैठा हुआ दूरबीन से युद्ध का दृश्य देख रहा था। युद्ध में कुछ सैनिक मर चुके थे और कुछ अपने जीवन की अंतिम घड़ियां गिन रहे थे। सैनिकों की दयनीय दशा देखकर वह युवक अत्यंत द्रवित हो गया और उसकी आंखों से आंसू बह निकले। दरअसल वह युवक सम्राट नेपोलियन से मिलने पैरिस गया था, किंतु जब उसे पता चला कि सम्राट मोर्चे पर गए हुए हैं तो वह उनसे मिलने मोर्चे की ओर ही चल पड़ा था। किंतु मोर्चे का दृश्य देख कर वह सम्राट से मिलने की बात बिल्कुल ही भूल बैठा। तभी उसे सूचना मिली कि घायल सैनिक गिरजाघर में हैं तो वह तुरंत उनकी सहायता के लिए वहां जा पहुंचा और उनकी सेवा में लग गया। इस बीच युद्ध समाप्त हो गया।</font></p>
<p><font color="green">अब उसके मन में यही बात कौंध रही थी कि कुछ भी हो, घायलों की सेवा के लिए एक ऐसा दल होना चाहिए जो तुरंत मौके पर पहुंच कर उनकी सहायता कर उन्हें नया जीवन प्रदान करे। उसने इस विचार को अंजाम देने के लिए घायलों की सेवा करने वालों का एक ऐसा दल तैयार किया। इसके बाद उसने अपने अथक प्रयासों से इस दल को एक अंतरराष्ट्रीय संस्था के रूप में मान्यता दिलवा दी।</font></p>
<p><font color="blue">अब वर्तमान में जब कहीं युद्ध छिड़ता है तो उस संस्था के सदस्य तुरंत घायल सैनिकों की सेवा में जुट जाते हैं। वे सदस्य तटस्थ माने जाते हैं और एक विशेष प्रकार की पोशाक पहनते हैं जिस पर एक विशेष चिह्न बना रहता है। उस संस्था का नाम <a href="http://www.icrc.org/eng">रेडक्रॉस </a>है, जिसका संस्थापक यही युवक था। इस युवक का नाम जीन हेनरी दूना था जो जिनेवा के एक मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुआ था। प्रत्येक वर्ष जीन हेनरी के जन्मदिन 8 मई को रेडक्रॉस दिवस मनाया जाता है।</font></p>
<p><em>नवभारत टाइम्स में प्रकाशित</em></p>
<p>सेवा का संकल्प, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास का ब्लौग</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, <a href="http://www.icrc.org/eng">रैडक्रॉस</a>, जीन हेनरी, sewa ka sanklap, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas ka blog</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, jean henry, <a href="http://www.icrc.org/eng">International Committee of the Red Cross</a></p>
</div>]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - पच्चीसवीं और अन्तिम कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/07/05/betal_pachisi_antim_kahani/</link>
<pubDate>Sun, 05 Jul 2009 03:14:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/07/05/betal_pachisi_antim_kahani/</guid>
<description><![CDATA[राजा मुर्दे को लेकर योगी के पास आया। योगी राजा को और मुर्दे को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। बोला, &#8220;]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#25383C"><strong>राजा मुर्दे को लेकर योगी के पास आया। </strong>योगी राजा को और मुर्दे को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। बोला, &#8220;हे राजन्! तुमने यह कठिन काम करके मेरे साथ बड़ा उपकार किया है। तुम सचमुच सारे राजाओं में श्रेष्ठ हो।&#8221;</font></p>
<p><font color="#151B54">इतना कहकर उसने मुर्दे को उसके कंधे से उतार लिया और उसे स्नान कराकर फूलों की मालाओं से सजाकर रख दिया। फिर मंत्र-बल से बेताल का आवाहन करके उसकी पूजा की। पूजा के बाद उसने राजा से कहा, &#8220;हे राजन्! तुम शीश झुकाकर इसे प्रणाम करो।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7D053F">राजा को बेताल की बात याद आ गयी। उसने कहा, &#8220;मैं राजा हूँ, मैंने कभी किसी को सिर नहीं झुकाया। आप पहले सिर झुकाकर बता दीजिए।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7F38EC">योगी ने जैसे ही सिर झुकाया, राजा ने तलवार से उसका सिर काट दिया। बेताल बड़ा खुश हुआ। बोला, &#8220;राजन्, यह योगी विद्याधरों का स्वामी बनना चाहता था। अब तुम बनोगे। मैंने तुम्हें बहुत हैरान किया है। तुम जो चाहो सो माँग लो।&#8221;</font></p>
<p><font color="#B93B8F">राजा ने कहा, &#8220;अगर आप मुझसे खुश हैं तो मेरी प्रार्थना है कि आपने जो चौबीस कहानियाँ सुनायीं, वे, और पच्चीसवीं यह, सारे संसार में प्रसिद्ध हो जायें और लोग इन्हें आदर से पढ़े।&#8221;</font></p>
<p><font color="#307D7E">बेताल ने कहा, &#8220;ऐसा ही होगा। ये कथाएँ ‘<a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/">बेताल-पच्चीसी</a>’ के नाम से मशहूर होंगी और जो इन्हें पढ़ेंगे, उनके पाप दूर हो जायेंगे।&#8221;</font></p>
<p><font color="#254117">यह कहकर बेताल चला गया। उसके जाने के बाद शिवाजी ने प्रकट होकर कहा, &#8220;राजन्, तुमने अच्छा किया, जो इस दुष्ट साधु को मार डाला। अब तुम जल्दी ही सातों द्वीपों और पाताल-सहित सारी पृथ्वी पर राज्य स्थापित करोगे।&#8221;</font></p>
<p><font color="#A0C544">इसके बाद शिवाजी अन्तर्धान हो गये। काम पूरे करके राजा श्मशान से नगर में आ गया। कुछ ही दिनों में वह सारी पृथ्वी का राजा बन गया और बहुत समय तक आनन्द से राज्य करते हुए अन्त में भगवान में समा गया।</font></p>
<p>आभार: <a href="http://wikisource.org">विकिसोर्स</a></p>
<p><a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/">बेताल पच्चीसी</a> की सभी कहानीयाँ <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/">यहाँ</a> पढी जा सकती हैं</p>
<p><font color="#FFF8C6">बेताल पच्चीसी पच्चीसवी कहानी, बेताल पच्चीसी, पच्चीसवी कहानी, नरेश, प्रयास, नरेश का ब्लौग, यह भी खूब रही, राजा विक्रमाद्वित्य, हिन्दी चिट्ठा, हिन्दी ब्लौग, hindi blog, naresh blog, hindi chittha, naresh delhi, pryas, naresh seo, yah bhi khoob rahi, vikram aur baital, vikram baital, betal pachis  pachisvi kahani, betal pachisi, मैं राजा हूँ, main raja hoon</font></p>
</div>]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - चौबीसवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/07/04/chaubisvi_kahani/</link>
<pubDate>Sat, 04 Jul 2009 02:36:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/07/04/chaubisvi_kahani/</guid>
<description><![CDATA[रिश्ता क्या हुआ? किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा राज करता था। उसकी पत्नी का नाम चडवती था। वह मालव द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="Light Blue"><strong>रिश्ता क्या हुआ?</strong></font></p>
<p><font color="#800080"><strong>किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा राज करता था।</strong> उसकी पत्नी का नाम चडवती था। वह मालव देश के राजा की लड़की थी। उसके लावण्यवती नाम की एक कन्या थी। जब वह विवाह के योग्य हुई तो राजा के भाई-बन्धुओं ने उसका राज्य छीन लिया और उसे देश-निकाला दे दिया। राजा रानी और कन्या को साथ लेकर मालव देश को चल दिया। रात को वे एक वन में ठहरे। पहले दिन चलकर भीलों की नगरी में पहुँचे। राजा ने रानी और बेटी से कहा कि तुम लोग वन में छिप जाओ, नहीं तो भील तुम्हें परेशान करेंगे। वे दोनों वन में चली गयीं। इसके बाद भीलों ने राजा पर हमला किया। राजा ने मुकाबला किया, पर अन्त में वह मारा गया। भील चले गये।</font></p>
<p><font color="red">उसके जाने पर रानी और बेटी जंगल से निकलकर आयीं और राजा को मरा देखकर बड़ी दु:खी हुईं। वे दोनों शोक करती हुईं एक तालाब के किनारे पहुँची। उसी समय वहाँ चंडसिंह नाम का साहूकार अपने लड़के के साथ, घोड़े पर चढ़कर, शिकार खेलने के लिए उधर आया। दो स्त्रियों के पैरों के निशान देखकर साहूकार अपने बेटे से बोला, &#8220;अगर ये स्त्रियाँ मिल जों तो जायें जिससे चाहो, विवाह कर लेना।&#8221;</font></p>
<p><font color="#FF00FF">लड़के ने कहा, &#8220;छोटे पैर वाली छोटी उम्र की होगी, उससे मैं विवाह कर लूँगा। आप बड़ी से कर लें।&#8221;</font></p>
<p><font color="#800000">साहूकार विवाह नहीं करना चाहता था, पर बेटे के बहुत कहने पर राजी हो गया।</font></p>
<p><font color="#800080">थोड़ा आगे बढ़ते ही उन्हें दोनों स्त्रियां दिखाई दीं। साहूकार ने पूछा, &#8220;तुम कौन हो?&#8221;</font></p>
<p><font color="red">रानी ने सारा हाल कह सुनाया। साहूकार उन्हें अपने घर ले गया। संयोग से रानी के पैर छोटे थे, पुत्री के पैर बड़े। इसलिए साहूकार ने पुत्री से विवाह किया, लड़के ने रानी से हुई और इस तरह पुत्री सास बनी और माँ बेटे की बहू। उन दोनों के आगे चलकर कई सन्तानें हुईं।</font></p>
<p><font color="#6A287E">इतना कहकर बेताल बोला, &#8220;राजन्! बताइए, माँ-बेटी के जो बच्चे हुए, उनका आपस में क्या रिश्ता हुआ?&#8221;</font></p>
<p><font color="#8D38C9">यह सवाल सुनकर राजा बड़े चक्कर में पड़ा। उसने बहुत सोचा, पर जवाब न सूझ पड़ा। इसलिए वह चुपचाप चलता रहा।</font></p>
<p><font color="#25587E">बेताल यह देखकर बोला, &#8220;राजन्, कोई बात नहीं है। मैं तुम्हारे धीरज और पराक्रम से खुश हूँ। मैं अब इस मुर्दे से निकला जाता हूँ। तुम इसे योगी के पास ले जाओ। जब वह तुम्हें इस मुर्दे को सिर झुकाकर प्रणाम करने को कहे तो तुम कह देना कि पहले आप करके दिखाओ। जब वह सिर झुकाकर बतावे तो तुम उसका सिर काट लेना। उसका बलिदान करके तुम सारी पृथ्वी के राजा बन जाओगे। सिर नहीं काटा तो वह तुम्हारी बलि देकर सिद्धि प्राप्त करेगा।&#8221;</font></p>
<p><font color="Maroon">इतना कहकर बेताल चला गया और राजा मुर्दे को लेकर योगी के पास आया।</font></p>
<p>आभार: <a href="http://wikisource.org">विकिसोर्स</a></p>
<p><font color="#FDEEF4"><a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/04/chaubisvi_kahani/">बेताल पच्चीसी चौबीसवीं कहानी</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/">बेताल पच्चीसी</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/04/chaubisvi_kahani/">चौबीसवीं कहानी</a>, मांडलिक नाम का राजा, लावण्यवती नाम की कन्या, भाई-बन्धुओं, घोड़े पर चढ़कर, मैं विवाह कर लूँगा, तुम कौन हो, माँ-बेटी, बेताल चला गया, नरेश, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">नरेश का ब्लौग</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, राजा विक्रमाद्वित्य, हिन्दी चिट्ठा, हिन्दी ब्लौग, hindi blog, naresh blog, hindi chittha, naresh delhi, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, naresh seo, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, vikram aur baital, vikram baital, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/04/chaubisvi_kahani/">betal pachisi chaubisvi kahani</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/">betal pachisi</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/04/chaubisvi_kahani/">chaubisvi kahani</a>, mandlik naam kaa raja, laavnyavati naam kanya, bhai-bandhu, ghode par chadhkar, main vivah kar loonga, tum kaun ho, betal chala gaya</font></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - तेईसवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/07/03/teisvi_kahani/</link>
<pubDate>Fri, 03 Jul 2009 05:11:34 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[योगी पहले रोया क्यों फिर हँसा क्यों? कलिंग देश में शोभावती नाम का एक नगर है। उसमें राजा प्रद्युम्न र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="red"><strong>योगी पहले रोया क्यों फिर हँसा क्यों?</strong></font></p>
<p><font color="#FF0080"><strong>कलिंग देश में शोभावती नाम का एक नगर है।</strong> उसमें राजा प्रद्युम्न राज करता था। उसी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था, जिसके देवसोम नाम का बड़ा ही योग्य पुत्र था। जब देवसोम सोलह बरस का हुआ और सारी विद्याएँ सीख चुका तो एक दिन दुर्भाग्य से वह मर गया। बूढ़े माँ-बाप बड़े दु:खी हुए। चारों ओर शोक छा गया। जब लोग उसे लेकर श्मशान में पहुँचे तो रोने-पीटने की आवाज़ सुनकर एक योगी अपनी कुटिया में से निकलकर आया। पहले तो वह खूब ज़ोर से रोया, फिर खूब हँसा, फिर योग-बल से अपना शरीर छोड़ कर उस लड़के के शरीर में घुस गया। लड़का उठ खड़ा हुआ। उसे जीता देखकर सब बड़े खुश हुए।</font></p>
<p><font color="#0000FF">वह लड़का वही तपस्या करने लगा।</font></p>
<p><font color="#4E387E">इतना कहकर बेताल बोला, &#8220;राजन्, यह बताओ कि यह योगी पहले क्यों तो रोया, फिर क्यों हँसा?&#8221;</font></p>
<p><font color="#41627E"><strong>राजा ने कहा, &#8220;इसमें क्या बात है! वह रोया इसलिए कि जिस शरीर को उसके माँ-बाप ने पाला-पोसा और जिससे उसने बहुत-सी शिक्षाएँ प्राप्त कीं, उसे छोड़ रहा था। हँसा इसलिए कि वह नये शरीर में प्रवेश करके और अधिक सिद्धियाँ प्राप्त कर सकेगा।&#8221;</strong></font></p>
<p><font color="#800517">राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा जाकर उसे लाया तो रास्ते में बेताल ने कहा, &#8220;हे राजन्, मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि बिना जरा-सा भी हैरान हुए तुम मेरे सवालों का जवाब देते रहे हो और बार-बार आने-जाने की परेशानी उठाते रहे हो। आज मैं तुमसे एक बहुत भारी सवाल करूँगा। सोचकर उत्तर देना।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7E354D">इसके बाद बेताल ने यह कहानी सुनायी।</font></p>
<p>आभार: <a href="http://wikisoruce.org"><strong>विकिसोर्स</strong></a></p>
<p><font color="#EBDDE2"><a href="http://pryas.wordpress.com">नरेश का ब्लौग</a>, बेताल, बेताल पच्चीसी, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, राजा विक्रमाद्वित्य, हिन्दी चिट्ठा, हिन्दी ब्लौग, hindi blog, hindi chittha, naresh blog, naresh delhi, naresh hindi blog, <a href="http://pryas.wordpress.com">naresh ka blog</a>, naresh sem, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, raja vikramaditiya, vikram aur baital, vikram baital, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, बेताल पच्चीसी – तेईसवीं कहानी, कलिंग देश, राजा प्रद्युम्न, ज़ोर से रोया, kaling desh, raja prdhuman, jor se roya</font></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - इक्कीसवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/07/01/ikkisvi_kahani/</link>
<pubDate>Wed, 01 Jul 2009 08:41:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[विराग में अंधा कौन? विशाला नाम की नगरी में पदमनाभ नाम का राजा राज करता था। उसी नगर में अर्थदत्त नाम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="blue"><strong>विराग में अंधा कौन?</strong></font></p>
<p><font color="#8D38C9"><strong>विशाला नाम की नगरी में पदमनाभ नाम का राजा राज करता था</strong>। उसी नगर में अर्थदत्त नाम का एक साहूकार रहता था। अर्थदत्त के अनंगमंजरी नाम की एक सुन्दर कन्या थी। उसका विवाह साहूकार ने एक धनी साहूकार के पुत्र मणिवर्मा के साथ कर दिया। मणिवर्मा पत्नी को बहुत चाहता था, पर पत्नी उसे प्यार नहीं करती थी। एक बार मणिवर्मा कहीं गया। पीछे अनंगमंजरी की राजपुरोहित के लड़के कमलाकर पर निगाह पड़ी तो वह उसे चाहने लगी। पुरोहित का लड़का भी लड़की को चाहने लगा। अनंगमंजरी ने महल के बाग़ मे जाकर चंडीदेवी को प्रणाम कर कहा, &#8220;यदि मुझे इस जन्म में कमलाकर पति के रूप में न मिले तो अगले जन्म में मिले।&#8221;</font></p>
<p><font color="#C12283">यह कहकर वह अशोक के पेड़ से दुपट्टे की फाँसी बनाकर मरने को तैयार हो गयी। तभी उसकी सखी आ गयी और उसे यह वचन देकर ले गयी कि कमलाकर से मिला देगी। दासी सबेरे कमलाकर के यहाँ गयी और दोनों के बगीचे में मिलने का प्रबन्ध कर आयी। कमलाकर आया और उसने अनंगमंजरी को देखा। वह बेताब होकर मिलने के लिए दौड़ा। मारे खुशी के अनंगमंजरी के हृदय की गति रुक गयी और वह मर गयी। उसे मरा देखकर कमलाकर का भी दिल फट गया और वह भी मर गया। उसी समय मणिवर्मा आ गया और अपनी स्त्री को पराये आदमी के साथ मरा देखकर बड़ा दु:खी हुआ। वह स्त्री को इतना चाहता था कि उसका वियोग न सहने से उसके भी प्राण निकल गये। चारों ओर हाहाकार मच गया। चंडीदेवी प्रकट हुई और उसने सबको जीवित कर दिया।</font></p>
<p><font color="#8D38C9">इतना कहकर बेताल बोला, &#8220;राजन्, यह बताओ कि इन तीनों में सबसे ज्यादा विराग में अंधा कौन था?&#8221;</font></p>
<p><font color="#C12283"><strong>राजा ने कहा, &#8220;मेरे विचार में मणिवर्मा था, क्योकि वह अपनी पत्नी को पराये आदमी को प्यार करते देखकर भी शोक से मर गया। अनंगमंजरी और कमलाकर तो अचानक मिलने की खुशी से मरे। उसमें अचरज की कोई बात नहीं थी।&#8221;</strong></font></p>
<p><font color="#8D38C9">राजा का यह जवाब सुनकरव बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा को वापस जाकर उसे लाना पड़ा। रास्ते में बेताल ने फिर एक कहानी कही।</font></p>
<p>आभार: <a href="http://wikisource.org">विकिसोर्स</a></p>
<p>ऋषि-कन्या, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/01/ikkisvi_kahani">जीवों को मारकर पाप कमाते हो</a>, नरेश, बेताल, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/">बेताल पच्चीसी</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, राजा विक्रमाद्वित्य, हिन्दी चिट्ठा, हिन्दी ब्लौग, hindi blog, hindi chittha, naresh, naresh blog, naresh delhi, naresh hindi blog, naresh ka blog, naresh sem, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, raja vikramaditiya, vikram aur baital, vikram baital, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/07/01/ikkisvi_kahani/">बेताल पच्चीसी &#8211; इक्कीसवीं कहानी</a></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - बीसवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/06/30/beesvi_kahani/</link>
<pubDate>Tue, 30 Jun 2009 08:05:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/06/30/beesvi_kahani/</guid>
<description><![CDATA[वह बालक क्यों हँसा? चित्रकूट नगर में एक राजा रहता था। एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गया। घूमते-घूमत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>वह बालक क्यों हँसा?</strong></p>
<p><font color="green"><strong>चित्रकूट नगर में एक राजा रहता था।</strong> एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गया। घूमते-घूमते वह रास्ता भूल गया और अकेला रह गया। थक कर वह एक पेड़ की छाया में लेटा कि उसे एक ऋषि-कन्या दिखाई दी। उसे देखकर राजा उस पर मोहित हो गया। थोड़ी देर में ऋषि स्वयं आ गये। ऋषि ने पूछा, &#8220;तुम यहाँ कैसे आये हो?&#8221; राजा ने कहा, &#8220;मैं शिकार खेलने आया हूँ। ऋषि बोले, &#8220;बेटा, तुम क्यों जीवों को मारकर पाप कमाते हो?&#8221;</font></p>
<p><font color="red">राजा ने वादा किया कि मैं अब कभी शिकार नहीं खेलूँगा। खुश होकर ऋषि ने कहा, &#8220;तुम्हें जो माँगना हो, माँग लो।&#8221;</font></p>
<p><font color="green">राजा ने ऋषि-कन्या माँगी और ऋषि ने खुश होकर दोनों का विवाह कर दिया। राजा जब उसे लेकर चला तो रास्ते में एक भयंकर राक्षस मिला। बोला, &#8220;मैं तुम्हारी रानी को खाऊँगा। अगर चाहते हो कि वह बच जाय तो सात दिन के भीतर एक ऐसे ब्राह्मण-पुत्र का बलिदान करो, जो अपनी इच्छा से अपने को दे और उसके माता-पिता उसे मारते समय उसके हाथ-पैर पकड़ें।&#8221; डर के मारे राजा ने उसकी बात मान ली। वह अपने नगर को लौटा और अपने दीवान को सब हाल कह सुनाया। दीवान ने कहा, &#8220;आप परेशान न हों, मैं उपाय करता हूँ।&#8221;</font></p>
<p><font color="red">इसके बाद दीवान ने सात बरस के बालक की सोने की मूर्ति बनवायी और उसे कीमती गहने पहनाकर नगर-नगर और गाँव-गाँव घुमवाया। यह कहलवा दिया कि जो कोई सात बरस का ब्राह्मण का बालक अपने को बलिदान के लिए देगा और बलिदान के समय उसके माँ-बाप उसके हाथ-पैर पकड़ेंगे, उसी को यह मूर्ति और सौ गाँव मिलेंगे।</font></p>
<p><font color="green">यह ख़बर सुनकर एक ब्राह्मण-बालक राजी हो गया, उसने माँ-बाप से कहा, &#8220;आपको बहुत-से पुत्र मिल जायेंगे। मेरे शरीर से राजा की भलाई होगी और आपकी गरीबी मिट जायेगी।&#8221;</font></p>
<p><font color="red">माँ-बाप ने मना किया, पर बालक ने हठ करके उन्हें राजी कर लिया।</font></p>
<p><font color="green">माँ-बाप बालक को लेकर राजा के पास गये। राजा उन्हें लेकर राक्षस के पास गया। राक्षस के सामने माँ-बाप ने बालक के हाथ-पैर पकड़े और राजा उसे तलवार से मारने को हुआ। उसी समय बालक बड़े ज़ोर से हँस पड़ा।</font></p>
<p><font color="red"><strong>इतना कहकर बेताल बोला, &#8220;हे राजन्, यह बताओ कि वह बालक क्यों हँसा?</strong>&#8220;</font></p>
<p><font color="green">राजा ने फौरन उत्तर दिया, &#8220;इसलिए कि डर के समय हर आदमी रक्षा के लिए अपने माँ-बाप को पुकारता है। माता-पिता न हों तो पीड़ितों की मदद राजा करता है। राजा न कर सके तो आदमी देवता को याद करता है। पर यहाँ तो कोई भी बालक के साथ न था। माँ-बाप हाथ पकड़े हुए थे, राजा तलवार लिये खड़ा था और राक्षस भक्षक हो रहा था। ब्राह्मण का लड़का परोपकार के लिए अपना शरीर दे रहा था। इसी हर्ष से और अचरज से वह हँसा।&#8221;</font></p>
<p><font color="red">इतना सुनकर बेताल अन्तर्धान हो गया और राजा लौटकर फिर उसे ले आया। रास्ते में बेताल ने फिर कहानी शुरू कर दी।</font></p>
<p>आभार: <a href="http://wikisource.org">विकिसोर्स</a></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - उन्नीसवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/06/29/unnisvi_kahani/</link>
<pubDate>Mon, 29 Jun 2009 09:01:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/06/29/unnisvi_kahani/</guid>
<description><![CDATA[पिण्ड किसको देना चाहिए? वक्रोलक नामक नगर में सूर्यप्रभ नाम का राजा राज करता था। उसके कोई सन्तान न थी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#4E387E"><strong>पिण्ड किसको देना चाहिए?</strong></font></p>
<p><font color="# 4C7D7E"><strong>वक्रोलक नामक नगर में सूर्यप्रभ नाम का राजा राज करता था। </strong>उसके कोई सन्तान न थी। उसी समय में एक दूसरी नगरी में धनपाल नाम का एक साहूकार रहता था। उसकी स्त्री का नाम हिरण्यवती था और उसके धनवती नाम की एक पुत्री थी। जब धनवती बड़ी हुई तो धनपाल मर गया और उसके नाते-रिश्तेदारों ने उसका धन ले लिया। हिरण्यवती अपनी लड़की को लेकर रात के समय नगर छोड़कर चल दी। रास्ते में उसे एक चोर सूली पर लटकता हुआ मिला। वह मरा नहीं था। उसने हिरण्यवती को देखकर अपना परिचय दिया और कहा, &#8220;मैं तुम्हें एक हज़ार अशर्फियाँ दूँगा। तुम अपनी लड़की का ब्याह मेरे साथ कर दो।&#8221;</font></p>
<p><font color="#15317E">हिरण्यवती ने कहा, &#8220;तुम तो मरने वाले हो।&#8221;</font></p>
<p><font color="#8D38C9">चोर बोला, &#8220;मेरे कोई पुत्र नहीं है और निपूते की परलोक में सदगति नहीं होती। अगर मेरी आज्ञा से और किसी से भी इसके पुत्र पैदा हो जायेगा तो मुझे सदगति मिल जायेगी।&#8221;</font></p>
<p><font color="#F6358A">हिरण्यवती ने लोभ के वश होकर उसकी बात मान ली और धनवती का ब्याह उसके साथ कर दिया। चोर बोला, &#8220;इस बड़ के पेड़ के नीचे अशर्फियाँ गड़ी हैं, सो ले लेना और मेरे प्राण निकलने पर मेरा क्रिया-कर्म करके तुम अपनी बेटी के साथ अपने नगर में चली जाना।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7D0552">इतना कहकर चोर मर गया। हिरण्यवती ने ज़मीन खोदकर अशर्फियाँ निकालीं, चोर का क्रिया-कर्म किया और अपने नगर में लौट आयी।</font></p>
<p><font color="#461B7E">उसी नगर में वसुदत्त नाम का एक गुरु था, जिसके मनस्वामी नाम का शिष्य था। वह शिष्य एक वेश्या से प्रेम करता था। वेश्या उससे पाँच सौ अशर्फियाँ माँगती थी। वह कहाँ से लाकर देता! संयोग से धनवती ने मनस्वामी को देखा और वह उसे चाहने लगी। उसने अपनी दासी को उसके पास भेजा। मनस्वामी ने कहा कि मुझे पाँच सौ अशर्फियाँ मिल जायें तो मैं एक रात धनवती के साथ रह सकता हूँ।</font></p>
<p><font color="#566D7E">हिरण्यवती राजी हो गयी। उसने मनस्वामी को पाँच सौ अशर्फियाँ दे दीं। बाद में धनवती के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसी रात शिवाजी ने सपने में उन्हें दर्शन देकर कहा, &#8220;तुम इस बालक को हजार अशर्फियों के साथ राजा के महल के दरवाज़े पर रख आओ।&#8221;</font></p>
<p><font color="#254117">माँ-बेटी ने ऐसा ही किया। उधर शिवाजी ने राजा को सपने में दर्शन देकर कहा, &#8220;तुम्हारे द्वार पर किसी ने धन के साथ लड़का रख दिया है, उसे ग्रहण करो।&#8221;</font></p>
<p><font color="#827839">राजा ने अपने नौकरों को भेजकर बालक और अशर्फियों को मँगा लिया। बालक का नाम उसने चन्द्रप्रभ रखा। जब वह लड़का बड़ा हुआ तो उसे गद्दी सौंपकर राजा काशी चला गया और कुछ दिन बाद मर गया।</font></p>
<p><font color="#7E2217">पिता के ऋण से उऋण होने के लिए चन्द्रप्रभ तीर्थ करने निकला। जब वह घूमते हुए गयाकूप पहुँचा और पिण्डदान किया तो उसमें से तीन हाथ एक साथ निकले। चन्द्रप्रभ ने चकित होकर ब्राह्मणों से पूछा कि किसको पिण्ड दूँ? उन्होंने कहा, &#8220;लोहे की कीलवाला चोर का हाथ है, पवित्रीवाला ब्राह्मण का है और अंगूठीवाला राजा का। आप तय करो कि किसको देना है?&#8221;</font></p>
<p><font color="#7D2252"><strong>इतना कहकर बेताल बोला, &#8220;राजन्, तुम बताओ कि उसे किसको पिण्ड देना चाहिए?&#8221;</strong></font></p>
<p><font color="#817339">राजा ने कहा, &#8220;चोर को; क्योंकि उसी का वह पुत्र था। मनस्वामी उसका पिता इसलिए नहीं हो सकता कि वह तो एक रात के लिए पैसे से ख़रीदा हुआ था। राजा भी उसका पिता नहीं हो सकता, क्योंकि उसे बालक को पालने के लिए धन मिल गया था। इसलिए चोर ही पिण्ड का अधिकारी है।&#8221;</font></p>
<p><font color="#B93B8F">इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा को वहाँ जाकर उसे लाना पड़ा। रास्ते में फिर उसने एक कहानी सुनाई।</font></p>
<p><strong>आभार:</strong> <a href="http://wikisource.org">विकिसोर्स</a></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - सत्रहवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/06/26/satravi_kahani/</link>
<pubDate>Fri, 26 Jun 2009 05:47:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/06/26/satravi_kahani/</guid>
<description><![CDATA[कौन अधिक साहसी? चन्द्रशेखर नगर में रत्नदत्त नाम का एक सेठ रहता था। उसके एक लड़की थी। उसका नाम था उन्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="red"><strong>कौन अधिक साहसी?</strong></font></p>
<p><font color="blue"><strong>चन्द्रशेखर नगर में रत्नदत्त नाम का एक सेठ रहता था। </strong>उसके एक लड़की थी। उसका नाम था उन्मादिनी। जब वह बड़ी हुई तो रत्नदत्त ने राजा के पास जाकर कहा कि आप चाहें तो उससे ब्याह कर लीजिए। राजा ने तीन दासियों को लड़की को देख आने को कहा। उन्होंने उन्मादिनी को देखा तो उसके रुप पर मुग्ध हो गयीं, लेकिन उन्होंने यह सोचकर कि राजा उसके वश में हो जायेगा, आकर कह दिया कि वह तो कुलक्षिणी है राजा ने सेठ से इन्कार कर दिया।</font></p>
<p><font color="green">इसके बाद सेठ ने राजा के सेनापति बलभद्र से उसका विवाह कर दिया। वे दोनों अच्छी तरह से रहने लगे।</font></p>
<p><font color="red">एक दिन राजा की सवारी उस रास्ते से निकली। उस समय उन्मादिनी अपने कोठे पर खड़ी थी। राजा की उस पर निगाह पड़ी तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने पता लगाया। मालूम हुआ कि वह सेठ की लड़की है। राजा ने सोचा कि हो-न-हो, जिन दासियों को मैंने देखने भेजा था, उन्होंने छल किया है। राजा ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने आकर सारी बात सच-सच कह दी। इतने में सेनापति वहाँ आ गया। उसे राजा की बैचेनी मालूम हुई। उसने कहा, &#8220;स्वामी उन्मादिनी को आप ले लीजिए।&#8221; राजा ने गुस्सा होकर कहा, &#8220;क्या मैं अधर्मी हूँ, जो पराई स्त्री को ले लूँ?&#8221;</font></p>
<p><font color="blue">राजा को इतनी व्याकुलता हुई कि वह कुछ दिन में मर गया। सेनापति ने अपने गुरु को सब हाल सुनाकर पूछा कि अब मैं क्या करूँ? गुरु ने कहा, &#8220;सेवक का धर्म है कि स्वामी के लिए जान दे दे।&#8221;</font></p>
<p><font color="green">राजा की चिता तैयार हुई। सेनापति वहाँ गया और उसमें कूद पड़ा। जब उन्मादिनी को यह बात मालूम हुई तो वह पति के साथ जल जाना धर्म समझकर चिता के पास पहुँची और उसमें जाकर भस्म हो गयी।</font></p>
<p><font color="red">इतना कहकर बेताल ने पूछा, &#8220;राजन्, बताओ, सेनापति और राजा में कौन अधिक साहसी था?&#8221;</font></p>
<p><font color="blue">राजा ने कहा, &#8220;राजा अधिक साहसी था; क्योंकि उसने राजधर्म पर दृढ़ रहने के लिए उन्मादिनी को उसके पति के कहने पर भी स्वीकार नहीं किया और अपने प्राणों को त्याग दिया। सेनापति कुलीन सेवक था। अपने स्वामी की भलाई में उसका प्राण देना अचरज की बात नहीं। असली काम तो राजा ने किया कि प्राण छोड़कर भी राजधर्म नहीं छोड़ा।&#8221;</font></p>
<p><font color="green">राजा का यह उत्तर सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा उसे पुन: पकड़कर लाया और तब उसने यह कहानी सुनायी।</font></p>
<p>आभार: <a href="http://www.wikisource.org">विकिसोर्स</a></p>
<p><font color="gray">सेठ रत्नदत्त, उन्मादिनी, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/26/satravi_kahani/">बेताल पच्चीसी &#8211; सत्रहवीं कहानी</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/">बेताल पच्चीसी</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, सिंहासन बत्तीसी, विक्रम बैताल, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">पुरानी कहानीयाँ</a>, भारत की कहानीयाँ, राजा की कहानीयाँ,pryas, yah bhi khoob rahi, singhasan batisi, vikram baital, purani kahaniya, bharat ki kahaniya, raja ki kahaniya, seth ratandutt, unmadini, betal pachisi</font></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - सोलहवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/06/25/solvi_kahani/</link>
<pubDate>Thu, 25 Jun 2009 04:58:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/06/25/solvi_kahani/</guid>
<description><![CDATA[हिमाचल पर्वत पर गंधर्वों का एक नगर था, जिसमें जीमूतकेतु नामक राजा राज करता था। उसके एक लड़का था, जिस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#4E387E"><strong>हिमाचल पर्वत पर गंधर्वों का एक नगर था, जिसमें जीमूतकेतु नामक राजा राज करता था। </strong>उसके एक लड़का था, जिसका नाम जीमूतवाहन था। बाप-बेटे दोनों भले थे। धर्म-कर्म मे लगे रहते थे। इससे प्रजा के लोग बहुत स्वच्छन्द हो गये और एक दिन उन्होंने राजा के महल को घेर लिया। राजकुमार ने यह देखा तो पिता से कहा कि आप चिन्ता न करें। मैं सबको मार भगाऊँगा। राजा बोला, &#8220;नहीं, ऐसा मत करो। युधिष्ठिर भी महाभारत करके पछताये थे।&#8221;</font></p>
<p><font color="#151B8D">इसके बाद राजा अपने गोत्र के लोगों को राज्य सौंप राजकुमार के साथ मलयाचल पर जाकर मढ़ी बनाकर रहने लगा। वहाँ जीमूतवाहन की एक ऋषि के बेटे से दोस्ती हो गयी। एक दिन दोनों पर्वत पर भवानी के मन्दिर में गये तो दैवयोग से उन्हें मलयकेतु राजा की पुत्री मिली। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गये। जब कन्या के पिता को मालूम हुआ तो उसने अपनी बेटी उसे ब्याह दी।</font></p>
<p><font color="#25587E">एक रोज़ की बात है कि जीमूतवाहन को पहाड़ पर एक सफ़ेद ढेर दिखाई दिया। पूछा तो मालूम हुआ कि पाताल से बहुत-से नाग आते हैं, जिन्हें गरुड़ खा लेता है। यह ढेर उन्हीं की हड्डियों का है। उसे देखकर जीमूतवाहन आगे बढ़ गया। कुछ दूर जाने पर उसे किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। पास गया तो देखा कि एक बुढ़िया रो रही है। कारण पूछा तो उसने बताया कि आज उसके बेटे शंखचूड़ नाग की बारी है। उसे गरुड़ आकर खा जायेगा। जीमूतवाहन ने कहा, &#8220;माँ, तुम चिन्ता न करो, मैं उसकी जगह चला जाऊँगा।&#8221; बुढ़िया ने बहुत समझाया, पर वह न माना।</font></p>
<p><font color="#7D053F">इसके बाद गरुड़ आया और उसे चोंच में पकड़कर उड़ा ले गया। संयोग से राजकुमार का बाजूबंद गिर पड़ा, जिस पर राजा का नाम खुदा था। उस पर खून लगा था। राजकुमारी ने उसे देखा। वह मूर्च्छित हो गयी। होश आने पर उसने राजा और रानी को सब हाल सुनाया। वे बड़े दु:खी हुए और जीमूतवाहन को खोजने निकले। तभी उन्हें शंखचूड़ मिला। उसने गरुड़ को पुकार कर कहा, &#8220;हे गरुड़! तू इसे छोड़ दे। बारी तो मेरी थी।&#8221;</font></p>
<p><font color="#6A287E">गरुड़ ने राजकुमार से पूछा, &#8220;तू अपनी जान क्यों दे रहा है?&#8221; उसने कहा, &#8220;उत्तम पुरुष को हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7E354D">यह सुनकर गरुड़ बहुत खुश हुआ उसने राजकुमार से वर माँगने को कहा। जीमूतवाहन ने अनुरोध किया कि सब साँपों को जिला दो। गरुड़ ने ऐसा ही किया। फिर उसने कहा, &#8220;तुझे अपना राज्य भी मिल जायेगा।&#8221;</font></p>
<p><font color="#307D7E">इसके बाद वे लोग अपने नगर को लौट आये। लोगों ने राजा को फिर गद्दी पर बिठा दिया। इतना कहकर बेताल बोला, &#8220;हे राजन् यह बताओ, इसमें सबसे बड़ा काम किसने किया?&#8221;</font></p>
<p><font color="#254117">राजा ने कहा &#8220;शंखचूड़ ने?&#8221;</font></p>
<p><font color="#7E2217">बेताल ने पूछा, &#8220;कैसे?&#8221;</font></p>
<p><font color="#7D2252"><strong>राजा बोला, &#8220;जीमूतवाहन जाति का क्षत्रीय था। प्राण देने का उसे अभ्यास था। लेकिन बड़ा काम तो शंखचूड़ ने किया, जो अभ्यास न होते हुए भी जीमूतवाहन को बचाने के लिए अपनी जान देने को तैयार हो गया।&#8221;</strong></font></p>
<p><font color="#FF0000">इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा उसे लाया तो उसने फिर एक कहानी सुनायी।</font></p>
<p>अभार: <a href="http://wikisource.org/">विकीसोर्स</a></p>
<p><font color="#FAF8CC">जीमूतवाहन , <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/25/solvi_kahani/">जीमूतकेतु राजा</a>, गंधर्वों का नगर , <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, सिंहासन बत्तीसी, विक्रम बैताल, पुरानी कहानीयाँ, भारत की कहानीयाँ, राजा की कहानीयाँ,<a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, singhasan batisi, vikram baital, purani kahaniya, bharat ki kahaniya, raja ki kahaniya, jeemootvahan, jeemootketu raja</font></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - पंद्रहवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/06/23/pandravi_kahani/</link>
<pubDate>Tue, 23 Jun 2009 08:49:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/06/23/pandravi_kahani/</guid>
<description><![CDATA[किस की पत्नी? नेपाल देश में शिवपुरी नामक नगर मे यशकेतु नामक राजा राज करता था। उसके चन्द्रप्रभा नाम क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#800517"><strong>किस की पत्नी?</strong></font></p>
<p><font color="#B93B8F"><strong>नेपाल देश में शिवपुरी नामक नगर मे यशकेतु नामक राजा राज करता था। </strong>उसके चन्द्रप्रभा नाम की रानी और शशिप्रभा नाम की लड़की थी।</font></p>
<p><font color="#387C44">जब राजकुमारी बड़ी हुई तो एक दिन वसन्त उत्सव देखने बाग़ में गयी। वहाँ एक ब्राह्मण का लड़का आया हुआ था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और प्रेम करने लगे। इसी बीच एक पागल हाथी वहाँ दौड़ता हुआ आया। ब्राह्मण का लड़का राजकुमारी को उठाकर दूर ले गया और हाथी से बचा दिया। शशिप्रभा महल में चली गयी; पर ब्राह्मण के लड़के के लिए व्याकुल रहने लगी।</font></p>
<p><font color="#827839">उधर ब्राह्मण के लड़के की भी बुरी दशा थी। वह एक सिद्धगुरू के पास पहुँचा और अपनी इच्छा बतायी। उसने एक योग-गुटिका अपने मुँह में रखकर ब्राह्मण का रूप बना लिया और एक गुटिका ब्राह्मण के लड़के के मुँह में रखकर उसे सुन्दर लड़की बना दिया। राजा के पास जाकर कहा, &#8220;मेरा एक ही बेटा है। उसके लिए मैं इस लड़की को लाया था; पर लड़का न जाने कहाँ चला गया। आप इसे यहाँ रख ले। मैं लड़के को ढूँढ़ने जाता हूँ। मिल जाने पर इसे ले जाऊँगा।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7D2252">सिद्धगुरु चला गया और लड़की के भेस में ब्राह्मण का लड़का राजकुमार के पास रहने लगा। धीरे-धीरे दोनों में बड़ा प्रेम हो गया। एक दिन राजकुमारी ने कहा, &#8220;मेरा दिल बड़ा दुखी रहता है। एक ब्राह्मण के लड़के ने पागल हाथी से मरे प्राण बचाये थे। मेरा मन उसी में रमा है।&#8221;</font></p>
<p><font color="#C11B17">इतना सुनकर उसने गुटिका मुँह से निकाल ली और ब्राह्मण-कुमार बन गया। राजकुमार उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुई। तबसे वह रात को रोज़ गुटिका निकालकर लड़का बन जाता, दिन में लड़की बना रहता। दोनों ने चुपचाप विवाह कर लिया।</font></p>
<p><font color="#571B7e">कुछ दिन बाद राजा के साले की कन्या मृगांकदत्ता का विवाह दीवान के बेटे के साथ होना तय हुआ। राजकुमारी अपने कन्या-रूपधार ब्राह्मणकुमार के साथ वहाँ गयी। संयोग से दीवान का पुत्र उस बनावटी कन्या पर रीझ गया। विवाह होने पर वह मृगांकदत्ता को घर तो ले गया; लेकिन उसका हृदय उस कन्या के लिए व्याकुल रहने लगा उसकी यह दशा देखकर दीवान बहुत हैरान हुआ। उसने राजा को समाचार भेजा। राजा आया। उसके सामने सवाल था कि धरोहर के रूप में रखी हुई कन्या को वह कैसे दे दे? दूसरी ओर यह मुश्किल कि न दे तो दीवान का लड़का मर जाये।</font></p>
<p><font color="#7D1B7E">बहुत सोच-विचार के बाद राजा ने दोनों का विवाह कर दिया। बनावटी कन्या ने यह शर्त रखी कि चूँकि वह दूसरे के लिए लायी गयी थी, इसलिए उसका यह पति छ: महीने तक यात्रा करेगा, तब वह उससे बात करेगी। दीवान के लड़के ने यह शर्त मान ली।</font></p>
<p><font color="#842DCE">विवाह के बाद वह उसे मृगांकदत्ता के पास छोड़ तीर्थ-यात्रा चला गया। उसके जाने पर दोनों आनन्द से रहने लगे। ब्राह्मणकुमार रात में आदमी बन जाता और दिन में कन्या बना रहता।</font></p>
<p><font color="#842DCE">जब छ: महीने बीतने को आये तो वह एक दिन मृगांकदत्ता को लेकर भाग गया।</font></p>
<p><font color="#6A287E">उधर सिद्धगुरु एक दिन अपने मित्र शशि को युवा पुत्र बनाकर राजा के पास लाया और उस कन्या को माँगा। शाप के डर के मारे राजा ने कहा, &#8220;वह कन्या तो जाने कहाँ चली गयी। आप मेरी कन्या से इसका विवाह कर दें।&#8221;</font></p>
<p><font color="#800517">वह राजी हो गया और राजकुमारी का विवाह शशि के साथ कर दिया। घर आने पर ब्राह्मणकुमार ने कहा, &#8220;यह राजकुमारी मेरी स्त्री है। मैंने इससे गंधर्व-रीति से विवाह किया है।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7D0541">शशि ने कहा, &#8220;यह मेरी स्त्री है, क्योंकि मैंने सबके सामने विधि-पूर्वक ब्याह किया है।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7D0552">बेताल ने पूछा, &#8220;शशि दोनों में से किस की पत्नी है?&#8221;</font></p>
<p><font color="#CA226B"><strong>राजा ने कहा, &#8220;मेरी राय में वह शशि की पत्नी है, क्योंकि राजा ने सबके सामने विधिपूर्वक विवाह किया था। ब्राह्मणकुमार ने तो चोरी से ब्याह किया था। चोरी की चीज़ पर चोर का अधिकार नहीं होता।&#8221;</strong><br />
इतना सुनना था कि बेताल गायब हो गया और राजा को जाकर फिर उसे लाना पड़ा। रास्ते में बेताल ने फिर एक कहानी सुनायी।</font><br />
===========================================================<br />
</font>रानी चन्द्रप्रभा, राजकुमारी शशिप्रभा, राजकुमारी मृगांकदत्ता, ब्राह्मणकुमार, वसन्त उत्सव, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, सिंहासन बत्तीसी, विक्रम बैताल, पुरानी कहानीयाँ, भारत की कहानीयाँ, राजा की कहानीयाँ, rani chandraprabha, rajkumari shashiprabha, rajkumari mragankdutta, vasant utsav, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, singhasan batisi, vikram baital, purani kahaniya, bharat ki kahaniya, raja ki kahaniya</font><br />
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आभार: <a href="http://wikisource.org/">विकिसोर्स</a></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - चौदहवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/06/21/chaudvi_kahani/</link>
<pubDate>Sun, 21 Jun 2009 15:16:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/06/21/chaudvi_kahani/</guid>
<description><![CDATA[चोर क्यों रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर गया?&#8221; अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा राज करता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#151B8D"><strong>चोर क्यों रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर गया?&#8221;</strong></font></p>
<p><font color="#25587E"><strong>अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा राज करता था। </strong>उसके राज्य में रत्नदत्त नाम का एक साहूकार था, जिसके रत्नवती नाम की एक लड़की थी। वह सुन्दर थी। वह पुरुष के भेस में रहा करती थी और किसी से भी ब्याह नहीं करना चाहती थी। उसका पिता बड़ा दु:खी था।</font></p>
<p><font color="#8D38C9">इसी बीच नगर में खूब चोरियाँ होने लगी। प्रजा दु:खी हो गयी। कोशिश करने पर भी जब चोर पकड़ में न आया तो राजा स्वयं उसे पकड़ने के लिए निकला। एक दिन रात को जब राजा भेष बदलकर घूम रहा था तो उसे परकोटे के पास एक आदमी दिखाई दिया। राजा चुपचाप उसके पीछे चल दिया। चोर ने कहा, &#8220;तब तो तुम मेरे साथी हो। आओ, मेरे घर चलो।&#8221;</font></p>
<p><font color="#F6358A">दोनो घर पहुँचे। उसे बिठलाकर चोर किसी काम के लिए चला गया। इसी बीच उसकी दासी आयी और बोली, &#8220;तुम यहाँ क्यों आये हो? चोर तुम्हें मार डालेगा। भाग जाओ।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7D053F">राजा ने ऐसा ही किया। फिर उसने फौज लेकर चोर का घर घेर लिया। जब चोर ने ये देखा तो वह लड़ने के लिए तैयार हो गया। दोनों में खूब लड़ाई हुई। अन्त में चोर हार गया। राजा उसे पकड़कर राजधानी में लाया और से सूली पर लटकाने का हुक्म दे दिया।</font></p>
<p><font color="#B048B5">संयोग से रत्नवती ने उसे देखा तो वह उस पर मोहित हो गयी। पिता से बोली, &#8220;मैं इसके साथ ब्याह करूँगी, नहीं तो मर जाऊँगी।</font></p>
<p><font color="#6A287E">पर राजा ने उसकी बात न मानी और चोर सूली पर लटका दिया। सूली पर लटकने से पहले चोर पहले तो बहुत रोया, फिर खूब हँसा। रत्नवती वहाँ पहुँच गयी और चोर के सिर को लेकर सती होने को चिता में बैठ गयी। उसी समय देवी ने आकाशवाणी की, &#8220;मैं तेरी पतिभक्ति से प्रसन्न हूँ। जो चाहे सो माँग।&#8221;</font></p>
<p><font color="#461B7E">रत्नवती ने कहा, &#8220;मेरे पिता के कोई पुत्र नहीं है। सो वर दीजिए, कि उनसे सौ पुत्र हों।&#8221;</font></p>
<p><font color="#7E587E">देवी प्रकट होकर बोलीं, &#8220;यही होगा। और कुछ माँगो।&#8221;</font></p>
<p><font color="#B93B8F">वह बोली, &#8220;मेरे पति जीवित हो जायें।&#8221;</font></p>
<p><font color="#307D7E">देवी ने उसे जीवित कर दिया। दोनों का विवाह हो गया। राजा को जब यह मालूम हुआ तो उन्होंने चोर को अपना सेनापति बना लिया।</font></p>
<p><font color="#736AFF"><strong>इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने पूछा, ‘हे राजन्, यह बताओ कि सूली पर लटकने से पहले चोर क्यों तो ज़ोर-ज़ोर से रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर गया?&#8221;</strong></font></p>
<p><font color="#254117">राजा ने कहा, &#8220;रोया तो इसलिए कि वह राजा रत्नदत्त का कुछ भी भला न कर सकेगा। हँसा इसलिए कि रत्नवती बड़े-बड़े राजाओं और धनिकों को छोड़कर उस पर मुग्ध होकर मरने को तैयार हो गयी। स्त्री के मन की गति को कोई नहीं समझ सकता।&#8221;</font></p>
<p><font color="#347C17">इतना सुनकर बेताल गायब हो गया और पेड़ पर जा लटका। राजा फिर वहाँ गया और उसे लेकर चला तो रास्ते में उसने यह कथा कही।</font></p>
<p>आभार: <a href="http://wikisource.org/">विकिसोर्स</a></p>
<p><font color="#FAF8CC"><a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/21/chaudhvi_kahani/">वीरकेतु नाम का राजा</a>,<a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi/"> बैताल पच्चीसी</a>, विक्रम और बैताल, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">पुरानी कहानीयाँ</a>, भारत की कहानीयाँ, हितोपदेश, <a href="http://pryas.wordpress.com">नरेश का ब्लौग</a>, प्रयास का ब्लौग, प्रयास, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, चोर क्यों रोया, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/21/chaudhvi_kahani/">रत्नदत्त नाम का साहूकार </a><a href="http://pryas.wordpress.com">pryas</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, veerketu naam ka raja, baital pachisi, vikram aur baital</font></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - तेरहवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/06/19/tehrvi_kahani/</link>
<pubDate>Fri, 19 Jun 2009 04:35:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/06/19/tehrvi_kahani/</guid>
<description><![CDATA[साँप, बाज, और ब्राह्मणी, इन तीनों में अपराधी कौन? बनारस में देवस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#C11B17"><strong>साँप, बाज, और ब्राह्मणी, इन तीनों में अपराधी कौन?</strong></font></p>
<p><font color="#307D7E"><strong>बनारस में देवस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था।</strong> उसके हरिदास नाम का पुत्र था। हरिदास की बड़ी सुन्दर पत्नी थी। नाम था लावण्यवती। एक दिन वे महल के ऊपर छत पर सो रहे थे कि आधी रात के समय एक गंधर्व-कुमार आकाश में घूमता हुआ उधर से निकला। वह लावण्यवती के रूप पर मुग्ध होकर उसे उड़ाकर ले गया। जागने पर हरिदास ने देखा कि उसकी स्त्री नही है तो उसे बड़ा दुख हुआ और वह मरने के लिए तैयार हो गया। लोगों के समझाने पर वह मान तो गया; लेकिन यह सोचकर कि तीरथ करने से शायद पाप दूर हो जाय और स्त्री मिल जाय, वह घर से निकल पड़ा।</font></p>
<p><font color="#7D2252">चलते-चलते वह किसी गाँव में एक ब्राह्मण के घर पहुँचा। उसे भूखा देख ब्राह्मणी ने उसे कटोरा भरकर खीर दे दी और तालाब के किनारे बैठकर खाने को कहा। हरिदास खीर लेकर एक पेड़ के नीचे आया और कटोरा वहाँ रखकर तालाब मे हाथ-मुँह धोने गया। इसी बीच एक बाज किसी साँप को लेकर उसी पेड़ पर आ बैठा ओर जब वह उसे खाने लगा तो साँप के मुँह से ज़हर टपककर कटोरे में गिर गया। हरिदास को कुछ पता नहीं था। वह उस खीर को खा गया। ज़हर का असर होने पर वह तड़पने लगा और दौड़ा-दौड़ा ब्राह्मणी के पास आकर बोला, &#8220;तूने मुझे जहर दे दिया है।&#8221; इतना कहने के बाद हरिदास मर गया।</font></p>
<p><font color="#7F462C">पति ने यह देखा तो ब्राह्मणी को ब्रह्मघातिनी कहकर घर से निकाल दिया।</font></p>
<blockquote><p><font color="#7E2217"><strong>इतना कहकर बेताल बोला, &#8220;राजन्! बताओ कि साँप, बाज, और ब्राह्मणी, इन तीनों में अपराधी कौन है?&#8221;</strong></font></p></blockquote>
<p><font color="#B93B8F"><strong>राजा ने कहा, &#8220;कोई नहीं। साँप तो इसलिए नहीं क्योंकि वह शत्रु के वश में था। बाज इसलिए नहीं कि वह भूखा था। जो उसे मिल गया, उसी को वह खाने लगा। ब्राह्मणी इसलिए नहीं कि उसने अपना धर्म समझकर उसे खीर दी थी और अच्छी दी थी। जो इन तीनों में से किसी को दोषी कहेगा, वह स्वयं दोषी होगा। इसलिए अपराधी ब्राह्मणी का पति था जिसने बिना विचारे ब्राह्मणी को घर से निकाल दिया।&#8221;</strong></font></p>
<p><font color="#461B7E">इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा को वहाँ जाकर उसे लाना पड़ा। बेताल ने चलते-चलते नयी कहानी सनायी।</font></p>
<p><em>आभार: <a href="http://wikisource.org">विकिसोर्स</a></em></p>
<p><em><a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/19/tehrvi_kahani/">गंधर्व-कुमार</a>, ब्राह्मण के घर, बैताल पच्चीसी, विक्रम और बैताल, <a href="http://pryas.wordpress.com/purani_kahaniyan/">पुरानी कहानीयाँ</a>, भारत की कहानीयाँ, हितोपदेश, नरेश का ब्लौग, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास का ब्लौग</a>, प्रयास, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a></em></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बेताल पच्चीसी - बारहवीं कहानी]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/06/18/baarvi_kahani/</link>
<pubDate>Thu, 18 Jun 2009 04:36:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
<guid>http://pryas.wordpress.com/2009/06/18/baarvi_kahani/</guid>
<description><![CDATA[किसी ज़माने में अंगदेश मे यशकेतु नाम का राजा था। उसके दीर्घदर्शी नाम का बड़ा ही चतुर दीवान था। राजा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><font color="#7D2252"><strong>किसी ज़माने में अंगदेश मे यशकेतु नाम का राजा था। </strong>उसके दीर्घदर्शी नाम का बड़ा ही चतुर दीवान था। राजा बड़ा विलासी था। राज्य का सारा बोझ दीवान पर डालकर वह भोग में पड़ गया। दीवान को बहुत दु:ख हुआ। उसने देखा कि राजा के साथ सब जगह उसकी निन्दा होती है। इसलिए वह तीरथ का बहाना करके चल पड़ा। चलते-चलते रास्ते में उसे एक शिव-मन्दिर मिला। उसी समय निछिदत्त नाम का एक सौदागर वहाँ आया और दीवान के पूछने पर उसने बताया कि वह सुवर्णद्वीप में व्यापार करने जा रहा है। दीवान भी उसके साथ हो लिया।</font></p>
<p><font color="#7E2217">दोनों जहाज़ पर चढ़कर सुवर्णद्वीप पहुँचे और वहाँ व्यापार करके धन कमाकर लौटे। रास्ते में समुद्र में एक दीवान को एक कृल्पवृक्ष दिखाई दिया। उसकी मोटी-मोटी शाखाओं पर रत्नों से जुड़ा एक पलंग बिछा था। उस पर एक रूपवती कन्या बैठी वीणा बजा रही थी। थोड़ी देर बाद वह ग़ायब हो गयी। पेड़ भी नहीं रहा। दीवान बड़ा चकित हुआ।</font></p>
<p><font color="#AF7817">दीवान ने अपने नगर में लौटकर सारा हाल कह सुनाया। इस बीच इतने दिनों तक राज्य को चला कर राजा सुधर गया था और उसने विलासिता छोड़ दी थी। दीवान की कहानी सुनकर राजा उस सुन्दरी को पाने के लिए बेचैन हो उठा और राज्य का सारा काम दीवान पर सौंपकर तपस्वी का भेष बनाकर वहीं पहुँचा। पहुँचने पर उसे वही कल्पवृक्ष और वीणा बजाती कन्या दिखाई दी। उसने राजा से पूछा, &#8220;तुम कौन हो?&#8221; राजा ने अपना परिचय दे दिया। कन्या बोली, &#8220;मैं राजा मृगांकसेन की कन्या हूँ। मृगांकवती मेरा नाम है। मेरे पिता मुझे छोड़कर न जाने कहाँ चले गये।&#8221;</font></p>
<p><font color="#254117">राजा ने उसके साथ विवाह कर लिया। कन्या ने यह शर्त रखी कि वह हर महीने के शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष की चतुर्दशी और अष्टमी को कहीं जाया करेगी और राजा उसे रोकेगा नहीं। राजा ने यह शर्त मान ली।</font></p>
<p><font color="#736AFF">इसके बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी आयी तो राजा से पूछकर मृगांकवती वहाँ से चली। राजा भी चुपचाप पीछे-पीछे चल दिया। अचानक राजा ने देखा कि एक राक्षस निकला और उसने मृगांकवती को निगल लिया। राजा को बड़ा गुस्सा आया और उसने राक्षस का सिर काट डाला। मृगांकवती उसके पेट से जीवित निकल आयी।</font></p>
<p><font color="#7E354D">राजा ने उससे पूछा कि यह क्या माजरा है तो उसने कहा, &#8220;महाराज, मेरे पिता मेरे बिना भोजन नहीं करते थे। मैं अष्टमी और चतुदर्शी के दिन शिव पूजा यहाँ करने आती थी। एक दिन पूजा में मुझे बहुत देर हो गयी। पिता को भूखा रहना पड़ा। देर से जब मैं घर लौटी तो उन्होंने गुस्से में मुझे शाप दे दिया कि अष्टमी और चतुर्दशी के दिन जब मैं पूजन के लिए आया करूँगी तो एक राक्षस मुझे निगल जाया करेगा और मैं उसका पेट चीरकर निकला करूँगी। जब मैंने उनसे शाप छुड़ाने के लिए बहुत अनुनय की तो वह बोले, &#8220;जब अंगदेश का राजा तेरा पति बनेगा और तुझे राक्षस से निगली जाते देखेगा तो वह राक्षस को मार देगा। तब तेरे शाप का अन्त होगा।&#8221;</font></p>
<p><font color="#461B7E">इसके बाद राजा उसे लेकर नगर में आया। दीवान ने यह देखा तो उसका हृदय फट गया। और वह मर गया।</font></p>
<p><font color="#7D053F">इतना कहकर बेताल ने पूछा, &#8220;हे राजन्! यह बताओ कि स्वामी की इतनी खुशी के समय दीवान का हृदय फट गया?&#8221;</font></p>
<p><font color="#F6358A"><strong>राजा ने कहा, &#8220;इसलिए कि उसने सोचा कि राजा फिर स्त्री के चक्कर में पड़ गया और राज्य की दुर्दशा होगी।&#8221;</strong></font></p>
<p><font color="#8D38C9">राजा का इतना कहना था कि बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा ने वहाँ जाकर फिर उसे साथ लिया तो रास्ते में बेताल ने यह कहानी सुनायी।</font></p>
<p><em><strong>आभार:</strong> <a href="http://wikisource.org/">विकिसोर्स</a></em><br />
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<font color="#A9A9A9"><em>यशकेतु नाम का राजा, रूपवती कन्या, मृगांकसेन की कन्या, अंगदेश का राजा, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi">बैताल पच्चीसी</a>, विक्रम और बैताल, <a href="http://pryas.wordpress.com">प्रयास</a>, हिन्दी ब्लौग, नरेश का ब्लौग, <a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a>, प्रयास का ब्लौग yashketu raja, roopvati kanya, mrangaksen ke kanya, angdesh ka raja, <a href="http://pryas.wordpress.com/2009/06/04/betal_pachissi">baital pachisi</a>, vikram aur baital, pryas, hindi blog, naresh ka blog, <a href="http://pryas.wordpress.com">yah bhi khoob rahi</a>, <a href="http://pryas.wordpress.com">pryas ka blog</em></a></font></p>
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<title><![CDATA[ब्लौग से 50,000 बनाए!!!]]></title>
<link>http://pryas.wordpress.com/2009/05/20/blog_visit_50000/</link>
<pubDate>Wed, 20 May 2009 11:34:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>pryas</dc:creator>
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<description><![CDATA[आज मेरा ब्लौग पढने वालों की संख्या 50,000 पार कर गयी है. मेरे ब्लौग पर आने वालों तथा सभी ब्लौगर बंधु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज मेरा ब्लौग पढने वालों की संख्या <strong>50,000 </strong>पार कर गयी है.</p>
<p>मेरे ब्लौग पर आने वालों तथा सभी ब्लौगर बंधुओं ने जिस प्रकार मेरा उत्साह बढाया उसके लिये आप सभी का हार्दिक धन्यवाद.</p>
<p>इस ब्लौग पर मैंने बहुत सी हास्य कवीतायें, शिक्षाप्रद कहानीयां व मेरी अपनी <a href="http://hi.wordpress.com/tag/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be/">रचनाएं</a> हैं. </p>
<p>मेरी सबसे ज्यादा पढी जाने वाली पोस्ट:</p>
<p><a href="http://pryas.wordpress.com/2008/03/14/bhagwan/">क्या वाकई भगवान हमें देख रहा है</a><br />
 2,989 views</p>
<p><a href="http://pryas.wordpress.com/2007/08/10/hasya_kavita/">वेद प्रकाश जी की एक “डबल हास्य” कविता</a><br />
1,988 views</p>
<p><a href="http://pryas.wordpress.com/2007/11/16/beerbal_ka_janam/">बीरबल का जन्म</a><br />
 1,833 views</p>
<p><strong>Blog Stats Summary Tables</strong></p>
<p>Total views: 50,000</p>
<p>Busiest day: 331 — Friday, August 22, 2008</p>
<p>Views today: 84</p>
<p>Totals<br />
Posts: 200</p>
<p>Comments: 776</p>
<p>Categories: 14</p>
<p>Tags: 607</p>
<p><a href="http://pryas.wordpress.com">यह भी खूब रही</a></p>
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