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	<title>ramdhari-singh-dinkar &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "ramdhari-singh-dinkar"</description>
	<pubDate>Wed, 19 Jun 2013 20:05:42 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[समर शेष है]]></title>
<link>http://gauravshri23.wordpress.com/2011/10/17/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b7-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Sun, 16 Oct 2011 19:06:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>Gaurav</dc:creator>
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<description><![CDATA[ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो? किसने कहा, और मत]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो<br />
किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो?<br />
किसने कहा, और मत बेधो हृदय वह्नि के शर से<br />
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?</p>
<p>कुंकुम? लेपूँ किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?<br />
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।</p>
<p>फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतराने वाले!<br />
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!<br />
सकल देश में हालाहल है दिल्ली में हाला है,<br />
दिल्ली में रौशनी शेष भारत में अंधियाला है।</p>
<p>मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,<br />
ज्यों का त्यों है खड़ा आज भी मरघट सा संसार।</p>
<p>वह संसार जहाँ पर पहुँची अब तक नहीं किरण है,<br />
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर-वरण है।<br />
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्तस्तल हिलता है,<br />
माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।</p>
<p>पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज,<br />
सात वर्ष हो गए राह में अटका कहाँ स्वराज?</p>
<p>अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?<br />
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?<br />
सबके भाग्य दबा रक्खे हैं किसने अपने कर में ?<br />
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में?</p>
<p>समर शेष है यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा,<br />
और नहीं तो तुझ पर पापिनि! महावज्र टूटेगा।</p>
<p>समर शेष है इस स्वराज को सत्य बनाना होगा।<br />
जिसका है यह न्यास, उसे सत्वर पहुँचाना होगा।<br />
धारा के मग में अनेक पर्वत जो खड़े हुए हैं,<br />
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अड़े हुए हैं,</p>
<p>कह दो उनसे झुके अगर तो जग में यश पाएँगे,<br />
अड़े रहे तो ऐरावत पत्तों -से बह जाएँगे।</p>
<p>समर शेष है जनगंगा को खुल कर लहराने दो,<br />
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो।<br />
पथरीली, ऊँची ज़मीन है? तो उसको तोडेंग़े।<br />
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे।</p>
<p>समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर,<br />
खंड-खंड हो गिरे विषमता की काली जंज़ीर।</p>
<p>समर शेष है, अभी मनुज-भक्षी हुँकार रहे हैं।<br />
गाँधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं।<br />
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,<br />
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है।</p>
<p>समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल<br />
विचरें अभय देश में गांधी और जवाहर लाल।</p>
<p>तिमिरपुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्कांड रचें ना!<br />
सावधान, हो खड़ी देश भर में गांधी की सेना।<br />
बलि देकर भी बली! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे<br />
मंदिर औ&#8217; मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे!</p>
<p>समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,<br />
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।<br />
-रामधारी सिंह दिनकर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वसुधा का नेता कौन हुआ?]]></title>
<link>http://gauravshri23.wordpress.com/2011/09/29/%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86/</link>
<pubDate>Thu, 29 Sep 2011 09:00:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>Gaurav</dc:creator>
<guid>http://gauravshri23.wordpress.com/2011/09/29/%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86/</guid>
<description><![CDATA[सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, शूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सच है, विपत्ति जब आती है,<br />
कायर को ही दहलाती है,<br />
शूरमा नहीं विचलित होते,<br />
क्षण एक नहीं धीरज खोते,<br />
विघ्नों को गले लगाते हैं,<br />
काँटों में राह बनाते हैं।</p>
<p>मुख से न कभी उफ कहते हैं,<br />
संकट का चरण न गहते हैं,<br />
जो आ पड़ता सब सहते हैं,<br />
उद्योग-निरत नित रहते हैं,<br />
शूलों का मूल नसाने को,<br />
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।</p>
<p>है कौन विघ्न ऐसा जग में,<br />
टिक सके वीर नर के मग में<br />
खम ठोंक ठेलता है जब नर,<br />
पर्वत के जाते पाँव उखड़।<br />
मानव जब जोर लगाता है,<br />
पत्थर पानी बन जाता है।</p>
<p>गुण बड़े एक से एक प्रखर,<br />
हैं छिपे मानवों के भीतर,<br />
मेंहदी में जैसे लाली हो,<br />
वर्तिका-बीच उजियाली हो।<br />
बत्ती जो नहीं जलाता है<br />
रोशनी नहीं वह पाता है।</p>
<p>पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,<br />
झरती रस की धारा अखण्ड,<br />
मेंहदी जब सहती है प्रहार,<br />
बनती ललनाओं का सिंगार।<br />
जब फूल पिरोये जाते हैं,<br />
हम उनको गले लगाते हैं।</p>
<p>वसुधा का नेता कौन हुआ?<br />
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?<br />
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?<br />
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?<br />
जिसने न कभी आराम किया,<br />
विघ्नों में रहकर नाम किया।</p>
<p>जब विघ्न सामने आते हैं,<br />
सोते से हमें जगाते हैं,<br />
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,<br />
तन को झँझोरते हैं पल-पल।<br />
सत्पथ की ओर लगाकर ही,<br />
जाते हैं हमें जगाकर ही।</p>
<p>वाटिका और वन एक नहीं,<br />
आराम और रण एक नहीं।<br />
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,<br />
पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।<br />
वन में प्रसून तो खिलते हैं,<br />
बागों में शाल न मिलते हैं।</p>
<p>कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,<br />
छाया देता केवल अम्बर,<br />
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,<br />
लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।<br />
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,<br />
वे ही शूरमा निकलते हैं।</p>
<p>बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,<br />
मेरे किशोर! मेरे ताजा!<br />
जीवन का रस छन जाने दे,<br />
तन को पत्थर बन जाने दे।<br />
तू स्वयं तेज भयकारी है,<br />
क्या कर सकती चिनगारी है?<br />
- रामधारी सिंह दिनकर </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[परिचय]]></title>
<link>http://gauravshri23.wordpress.com/2011/09/17/parichay/</link>
<pubDate>Sat, 17 Sep 2011 16:33:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>Gaurav</dc:creator>
<guid>http://gauravshri23.wordpress.com/2011/09/17/parichay/</guid>
<description><![CDATA[सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं<br />
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं<br />
बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं<br />
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं</p>
<p>समाना चाहता है, जो बीन उर में<br />
विकल उस शुन्य की झनंकार हूँ मैं<br />
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में<br />
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं</p>
<p>जिसे निशि खोजती तारे जलाकर<br />
उसीका कर रहा अभिसार हूँ मैं<br />
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन<br />
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं</p>
<p>कली की पंखडीं पर ओस-कण में<br />
रंगीले स्वपन का संसार हूँ मैं<br />
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं<br />
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं</p>
<p>मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से<br />
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं<br />
रुंदन अनमोल धन कवि का, इसी से<br />
पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं</p>
<p>मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का<br />
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं<br />
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी<br />
समा जिस्में चुका सौ बार हूँ मैं</p>
<p>न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से<br />
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं<br />
पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले<br />
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं</p>
<p>सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा<br />
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं<br />
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का<br />
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं</p>
<p>दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का<br />
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं<br />
सजग संसार, तू निज को सम्हाले<br />
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं</p>
<p>बंधा तुफान हूँ, चलना मना है<br />
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं<br />
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी<br />
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं ।।<br />
-रामधारी सिंह दिनकर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Ramdhari Singh 'Dinkar']]></title>
<link>http://leadbihar.wordpress.com/2011/06/09/ramdhari-singh-dinkar/</link>
<pubDate>Thu, 09 Jun 2011 05:30:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>Abhishek Kumar</dc:creator>
<guid>http://leadbihar.wordpress.com/2011/06/09/ramdhari-singh-dinkar/</guid>
<description><![CDATA[Ramdhari Singh &#8216;Dinkar&#8217; (September 23, 1908– April 24, 1974) was born in a poor Bhumihar]]></description>
<content:encoded><![CDATA[Ramdhari Singh &#8216;Dinkar&#8217; (September 23, 1908– April 24, 1974) was born in a poor Bhumihar]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पुरुरवा का प्रेम-प्रस्ताव (Pururava’s Love-Proposal)]]></title>
<link>http://sanchayita.wordpress.com/2010/09/16/0002/</link>
<pubDate>Thu, 16 Sep 2010 17:08:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>swapnilkumar</dc:creator>
<guid>http://sanchayita.wordpress.com/2010/09/16/0002/</guid>
<description><![CDATA[]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sanchayita.files.wordpress.com/2010/09/pururava-ka-prem-prastaav_11.png"><img class="alignnone size-large wp-image-49" title="Pururava ka prem-prastaav" src="http://sanchayita.files.wordpress.com/2010/09/pururava-ka-prem-prastaav_11.png?w=1024&#038;h=620" alt="" width="1024" height="620" /></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाँद और कवि]]></title>
<link>http://gauravshri23.wordpress.com/2010/09/07/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Tue, 07 Sep 2010 09:43:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>Gaurav</dc:creator>
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<description><![CDATA[रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,<br />
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!<br />
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,<br />
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।</p>
<p>जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?<br />
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते<br />
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी<br />
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।</p>
<p>आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का<br />
आज बनता और कल फिर फूट जाता है<br />
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?<br />
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।</p>
<p>मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,<br />
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?<br />
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?<br />
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?</p>
<p>मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,<br />
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,<br />
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,<br />
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।</p>
<p>मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी<br />
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,<br />
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,<br />
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।</p>
<p>स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-<br />
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,<br />
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,<br />
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।</p>
<p>       -Ramdhari Singh &#8216;Dinkar&#8217;. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लोहे के मर्द]]></title>
<link>http://gauravshri23.wordpress.com/2010/09/07/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Tue, 07 Sep 2010 09:36:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>Gaurav</dc:creator>
<guid>http://gauravshri23.wordpress.com/2010/09/07/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6/</guid>
<description><![CDATA[पुरुष वीर बलवान, देश की शान, हमारे नौजवान घायल होकर आये हैं। कहते हैं, ये पुष्प, दीप, अक्षत क्यों ला]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पुरुष वीर बलवान,<br />
देश की शान,<br />
हमारे नौजवान<br />
घायल होकर आये हैं।</p>
<p>कहते हैं, ये पुष्प, दीप,<br />
अक्षत क्यों लाये हो?</p>
<p>हमें कामना नहीं सुयश-विस्तार की,<br />
फूलों के हारों की, जय-जयकार की।</p>
<p>तड़प रही घायल स्वदेश की शान है।<br />
सीमा पर संकट में हिन्दुस्तान है।</p>
<p>ले जाओ आरती, पुष्प, पल्लव हरे,<br />
ले जाओ ये थाल मोदकों ले भरे।</p>
<p>तिलक चढ़ा मत और हृदय में हूक दो,<br />
दे सकते हो तो गोली-बन्दूक दो।<br />
         -Ramdhari Singh &#8216;Dinkar&#8217;. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लोहे के मर्द]]></title>
<link>http://yaaaadein.wordpress.com/2009/11/01/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Sun, 01 Nov 2009 08:58:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>ygolecha</dc:creator>
<guid>http://yaaaadein.wordpress.com/2009/11/01/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6/</guid>
<description><![CDATA[पुरुष वीर बलवान,देश की शान,हमारे नौजवान घायल होकर आये हैं। कहते हैं, ये पुष्प, दीप, अक्षत क्यों लाये]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;">पुरुष वीर बलवान,<br />देश की शान,<br />हमारे नौजवान<br />   घायल होकर आये हैं।</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">कहते हैं, ये पुष्प, दीप,<br />      अक्षत क्यों लाये हो?</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">हमें कामना नहीं सुयश-विस्तार की,<br />फूलों के हारों की, जय-जयकार की। </p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">तड़प रही घायल स्वदेश की शान है।<br />सीमा पर संकट में हिन्दुस्तान है।</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">ले जाओ आरती, पुष्प, पल्लव हरे,<br />ले जाओ ये थाल मोदकों ले भरे।</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">तिलक चढ़ा मत और हृदय में हूक दो,<br />दे सकते हो तो गोली-बन्दूक दो। </p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">–</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाँद और कवि]]></title>
<link>http://yaaaadein.wordpress.com/2009/11/01/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Sun, 01 Nov 2009 08:52:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>ygolecha</dc:creator>
<guid>http://yaaaadein.wordpress.com/2009/11/01/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf/</guid>
<description><![CDATA[रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;">रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,<br /> आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!<br /> उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,<br /> और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">  जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?<br /> मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते<br /> और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी<br /> चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">  आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का<br /> आज बनता और कल फिर फूट जाता है<br /> किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?<br /> बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">  मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,<br /> देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?<br /> स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?<br /> आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">  मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,<br /> आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,<br /> और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,<br /> इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">  मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी<br /> कल्पना की जीभ में भी धार होती है,<br /> बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,<br /> स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-<br /> रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,<br /> रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,<br /> स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।</p>
<div style="text-align:center;"> </div>
<p style="text-align:center;">–</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बालिका से वधु]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%a7%e0%a5%81/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:57:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
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<description><![CDATA[माथे में सेंदूर पर छोटी दो बिंदी चमचम-सी, पपनी पर आँसू की बूँदें मोती-सी, शबनम-सी। लदी हुई कलियों मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>माथे में सेंदूर पर छोटी दो बिंदी चमचम-सी,<br />
पपनी पर आँसू की बूँदें मोती-सी, शबनम-सी।<br />
लदी हुई कलियों में मादक टहनी एक नरम-सी,<br />
यौवन की विनती-सी भोली, गुमसुम खड़ी शरम-सी।</p>
<p>पीला चीर, कोर में जिसकी चकमक गोटा-जाली,<br />
चली पिया के गांव उमर के सोलह फूलोंवाली।<br />
पी चुपके आनंद, उदासी भरे सजल चितवन में,<br />
आँसू में भींगी माया चुपचाप खड़ी आंगन में।</p>
<p>आँखों में दे आँख हेरती हैं उसको जब सखियाँ,<br />
मुस्की आ जाती मुख पर, हँस देती रोती अँखियाँ।<br />
पर, समेट लेती शरमाकर बिखरी-सी मुस्कान,<br />
मिट्टी उकसाने लगती है अपराधिनी-समान।</p>
<p>भींग रहा मीठी उमंग से दिल का कोना-कोना,<br />
भीतर-भीतर हँसी देख लो, बाहर-बाहर रोना।<br />
तू वह, जो झुरमुट पर आयी हँसती कनक-कली-सी,<br />
तू वह, जो फूटी शराब की निर्झरिणी पतली-सी।</p>
<p>तू वह, रचकर जिसे प्रकृति ने अपना किया सिंगार,<br />
तू वह जो धूसर में आयी सुबज रंग की धार।<br />
मां की ढीठ दुलार! पिता की ओ लजवंती भोली,<br />
ले जायेगी हिय की मणि को अभी पिया की डोली।</p>
<p>कहो, कौन होगी इस घर तब शीतल उजियारी?<br />
किसे देख हँस-हँस कर फूलेगी सरसों की क्यारी?<br />
वृक्ष रीझ कर किसे करेंगे पहला फल अर्पण-सा?<br />
झुकते किसको देख पोखरा चमकेगा दर्पण-सा?</p>
<p>किसके बाल ओज भर देंगे खुलकर मंद पवन में?<br />
पड़ जायेगी जान देखकर किसको चंद्र-किरन में?<br />
महँ-महँ कर मंजरी गले से मिल किसको चूमेगी?<br />
कौन खेत में खड़ी फ़सल की देवी-सी झूमेगी?</p>
<p>बनी फिरेगी कौन बोलती प्रतिमा हरियाली की?<br />
कौन रूह होगी इस धरती फल-फूलों वाली की?<br />
हँसकर हृदय पहन लेता जब कठिन प्रेम-ज़ंजीर,<br />
खुलकर तब बजते न सुहागिन, पाँवों के मंजीर।</p>
<p>घड़ी गिनी जाती तब निशिदिन उँगली की पोरों पर,<br />
प्रिय की याद झूलती है साँसों के हिंडोरों पर।<br />
पलती है दिल का रस पीकर सबसे प्यारी पीर,<br />
बनती है बिगड़ती रहती पुतली में तस्वीर।</p>
<p>पड़ जाता चस्का जब मोहक प्रेम-सुधा पीने का,<br />
सारा स्वाद बदल जाता है दुनिया में जीने का।<br />
मंगलमय हो पंथ सुहागिन, यह मेरा वरदान;<br />
हरसिंगार की टहनी-से फूलें तेरे अरमान।</p>
<p>जगे हृदय को शीतल करनेवाली मीठी पीर,<br />
निज को डुबो सके निज में, मन हो इतना गंभीर।<br />
छाया करती रहे सदा तुझको सुहाग की छाँह,<br />
सुख-दुख में ग्रीवा के नीचे हो प्रियतम की बाँह।</p>
<p>पल-पल मंगल-लग्न, ज़िंदगी के दिन-दिन त्यौहार,<br />
उर का प्रेम फूटकर हो आँचल में उजली धार।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आग की भीख]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%86%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%96/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:56:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
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<description><![CDATA[धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा। कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,<br />
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा।<br />
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,<br />
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है?<br />
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,<br />
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।<br />
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ।<br />
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।</p>
<p>बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,<br />
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?<br />
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?<br />
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?<br />
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,<br />
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।<br />
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।<br />
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।</p>
<p>आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,<br />
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,<br />
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,<br />
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!<br />
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,<br />
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।<br />
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।<br />
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।</p>
<p>मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,<br />
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।<br />
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,<br />
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,<br />
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,<br />
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।<br />
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।<br />
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।</p>
<p>आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,<br />
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।<br />
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,<br />
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।<br />
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,<br />
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।<br />
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।<br />
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।</p>
<p>ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,<br />
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।<br />
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,<br />
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।<br />
हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,<br />
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।<br />
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।<br />
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शक्ति और क्षमा]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%ae%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:55:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
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<description><![CDATA[क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ कब हारा ? क्षमाशील]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल<br />
सबका लिया सहारा<br />
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे<br />
कहो, कहाँ कब हारा ?</p>
<p>क्षमाशील हो रिपु-समक्ष<br />
तुम हुये विनीत जितना ही<br />
दुष्ट कौरवों ने तुमको<br />
कायर समझा उतना ही।</p>
<p>अत्याचार सहन करने का<br />
कुफल यही होता है<br />
पौरुष का आतंक मनुज<br />
कोमल होकर खोता है।</p>
<p>क्षमा शोभती उस भुजंग को<br />
जिसके पास गरल हो<br />
उसको क्या जो दंतहीन<br />
विषरहित, विनीत, सरल हो ।</p>
<p>तीन दिवस तक पंथ मांगते<br />
रघुपति सिन्धु किनारे,<br />
बैठे पढ़ते रहे छन्द<br />
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।</p>
<p>उत्तर में जब एक नाद भी<br />
उठा नहीं सागर से<br />
उठी अधीर धधक पौरुष की<br />
आग राम के शर से ।</p>
<p>सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि<br />
करता आ गिरा शरण में<br />
चरण पूज दासता ग्रहण की<br />
बँधा मूढ़ बन्धन में।</p>
<p>सच पूछो , तो शर में ही<br />
बसती है दीप्ति विनय की<br />
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का<br />
जिसमें शक्ति विजय की ।</p>
<p>सहनशीलता, क्षमा, दया को<br />
तभी पूजता जग है<br />
बल का दर्प चमकता उसके<br />
पीछे जब जगमग है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समर शेष है]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b7-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:53:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
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<description><![CDATA[वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है देख जहाँ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है<br />
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है<br />
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है<br />
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है</p>
<p>पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज<br />
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?</p>
<p>अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?<br />
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?<br />
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?<br />
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में</p>
<p>समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा<br />
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा</p>
<p>समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा<br />
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा<br />
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं<br />
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं</p>
<p>कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे<br />
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे</p>
<p>समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो<br />
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो<br />
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे<br />
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे</p>
<p>समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर<br />
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर</p>
<p>समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं<br />
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं<br />
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है<br />
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है</p>
<p>समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल<br />
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल</p>
<p>तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना<br />
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना<br />
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे<br />
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे</p>
<p>समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध<br />
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लोहे के मर्द]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:51:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
<guid>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6/</guid>
<description><![CDATA[पुरुष वीर बलवान, देश की शान, हमारे नौजवान घायल होकर आये हैं। कहते हैं, ये पुष्प, दीप, अक्षत क्यों ला]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पुरुष वीर बलवान,<br />
देश की शान,<br />
हमारे नौजवान<br />
घायल होकर आये हैं।</p>
<p>कहते हैं, ये पुष्प, दीप,<br />
अक्षत क्यों लाये हो?</p>
<p>हमें कामना नहीं सुयश-विस्तार की,<br />
फूलों के हारों की, जय-जयकार की।</p>
<p>तड़प रही घायल स्वदेश की शान है।<br />
सीमा पर संकट में हिन्दुस्तान है।</p>
<p>ले जाओ आरती, पुष्प, पल्लव हरे,<br />
ले जाओ ये थाल मोदकों ले भरे।</p>
<p>तिलक चढ़ा मत और हृदय में हूक दो,<br />
दे सकते हो तो गोली-बन्दूक दो।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ चाँद और कवि]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:50:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
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<description><![CDATA[रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,<br />
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!<br />
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,<br />
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।</p>
<p>जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?<br />
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते<br />
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी<br />
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।</p>
<p>आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का<br />
आज बनता और कल फिर फूट जाता है<br />
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?<br />
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।</p>
<p>मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,<br />
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?<br />
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?<br />
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?</p>
<p>मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,<br />
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,<br />
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,<br />
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।</p>
<p>मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी<br />
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,<br />
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,<br />
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।</p>
<p>स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-<br />
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,<br />
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,<br />
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रात यों कहने लगा मुझसे]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a4%b8%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:48:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
<guid>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a4%b8%e0%a5%87/</guid>
<description><![CDATA[रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव है । उ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद</p>
<p>रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,<br />
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।<br />
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,<br />
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।</p>
<p>जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?<br />
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।<br />
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी<br />
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।</p>
<p>आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का<br />
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।<br />
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो<br />
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।</p>
<p>मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,<br />
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?<br />
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,<br />
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?</p>
<p>मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,<br />
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।<br />
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,<br />
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।</p>
<p>मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी<br />
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।<br />
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,<br />
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।</p>
<p>स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे<br />
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।<br />
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,<br />
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ परिचय]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:46:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
<guid>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%af/</guid>
<description><![CDATA[सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं<br />
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं<br />
बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं<br />
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं</p>
<p>समाना चाहता है, जो बीन उर में<br />
विकल उस शुन्य की झनंकार हूँ मैं<br />
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में<br />
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं</p>
<p>जिसे निशि खोजती तारे जलाकर<br />
उसीका कर रहा अभिसार हूँ मैं<br />
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन<br />
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं</p>
<p>कली की पंखडीं पर ओस-कण में<br />
रंगीले स्वपन का संसार हूँ मैं<br />
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं<br />
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं</p>
<p>मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से<br />
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं<br />
रुंदन अनमोल धन कवि का, इसी से<br />
पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं</p>
<p>मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का<br />
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं<br />
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी<br />
समा जिस्में चुका सौ बार हूँ मैं</p>
<p>न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से<br />
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं<br />
पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले<br />
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं</p>
<p>सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा<br />
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं<br />
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का<br />
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं</p>
<p>दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का<br />
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं<br />
सजग संसार, तू निज को सम्हाले<br />
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं</p>
<p>बंधा तुफान हूँ, चलना मना है<br />
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं<br />
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी<br />
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं ।।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कलम, आज उनकी जय बोल]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%ae-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%89%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%af-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:44:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
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<description><![CDATA[जो अगणित लघु दीप हमारे तुफानों में एक किनारे जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल कलम,]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जो अगणित लघु दीप हमारे<br />
तुफानों में एक किनारे<br />
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन<br />
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल<br />
कलम, आज उनकी जय बोल</p>
<p>पीकर जिनकी लाल शिखाएं<br />
उगल रही लपट दिशाएं<br />
जिनके सिंहनाद से सहमी<br />
धरती रही अभी तक डोल<br />
कलम, आज उनकी जय बोल</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[विजयी के सदृश जियो रे !]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a4%af%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a5%83%e0%a4%b6-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:42:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
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<description><![CDATA[विजयी के सदृश जियो रे वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो चट्टानों की छाती से दूध निकालो है रुकी जहाँ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विजयी के सदृश जियो रे</p>
<p>वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो<br />
चट्टानों की छाती से दूध निकालो<br />
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो<br />
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो</p>
<p>चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे<br />
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे</p>
<p>जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है<br />
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है<br />
सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है<br />
ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है</p>
<p>अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे<br />
गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे</p>
<p>जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है<br />
भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है<br />
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है<br />
वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है</p>
<p>उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है<br />
तलवार प्रेम से और तेज होती है</p>
<p>छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये<br />
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये<br />
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है<br />
मरता है जो एक ही बार मरता है</p>
<p>तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे<br />
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे</p>
<p>स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है<br />
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है</p>
<p>वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे<br />
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे</p>
<p>जब कभी अहम पर नियति चोट देती है<br />
कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है<br />
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है<br />
वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है</p>
<p>चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे<br />
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे</p>
<p>उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है<br />
सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है<br />
विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है<br />
जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है</p>
<p>सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा<br />
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किसको नमन करूँ मैं भारत?]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%81-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:40:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
<guid>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%81-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4/</guid>
<description><![CDATA[किसको नमन करूँ मैं भारत? तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ? मेरे प्यारे देश ! देह या मन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>किसको नमन करूँ मैं भारत?</p>
<p>तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?<br />
मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?<br />
किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ?</p>
<p>भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?<br />
नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?<br />
भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है<br />
मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है<br />
जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?</p>
<p>भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है<br />
एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है<br />
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है<br />
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है<br />
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !</p>
<p>खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से<br />
पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से<br />
तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है<br />
दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है<br />
मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं !</p>
<p>दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं<br />
मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं<br />
घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन<br />
खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन<br />
आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं !</p>
<p>उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है<br />
धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है<br />
तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है<br />
किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है<br />
मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं !</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रामधारी सिंह ‘दिनकर’]]></title>
<link>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e2%80%98%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%b0%e2%80%99/</link>
<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 09:37:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>Sandesh Dixit</dc:creator>
<guid>http://getpoetry.wordpress.com/2009/01/17/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e2%80%98%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%b0%e2%80%99/</guid>
<description><![CDATA[रामधारी सिंह दिनकर का जन्म २३ सितम्बर १९०८ बिहार के सिमरिया गाँव में एक गरीब ब्राह्मिन परिवार में हु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://getpoetry.files.wordpress.com/2008/08/ram1.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-227" src="http://getpoetry.files.wordpress.com/2008/08/ram1.jpg?w=107&#038;h=137" alt="" width="107" height="137" /></a></p>
<p>रामधारी सिंह दिनकर का जन्म २३ सितम्बर १९०८ बिहार के सिमरिया गाँव में एक गरीब ब्राह्मिन परिवार में हुआ था . उन्होंने संस्कृत ,बंगाली ,मैथिलि ,उर्दू और अंग्रेजी साहित्य का अध्धयन किया . दिनकर , इकबाल ,रविंद्रनाथ टैगोर ,कीट्स और मिल्टन जैसे कवियों से बहुत प्रभाभित थे .रामधारी सिंह शुरुआत में भारत के आजादी आन्दोलन से जुडे . उसी समय से उन्होंने क्रन्तिकारी कविताओ की रचना करना शुरू किया था .तदापि बाद में उन्होंने गाँधी के अहिंसात्मक विचारो का अनुसरण शुरू किया यदपि उनका मानना था की स्वयं रक्षा के लिए बदला भी जरुरी है .<br />
रामधारी सिंह दिनकर की प्रथम कविता प्राणभंग १९२९ में प्रकाशित हुई .उनकी कुछ प्रमुख रचनाये इस ब्लॉग पर भी उपलब्ध है.दिनकर जी को उनकी रचना ‘उर्वशी’ १९७२ में ज्ञानपीठ पुरुस्कार से नवाजा गया .१९५९ में पदं भूषण और १९५९ में साहित्य अकेडमी पुरुस्कार भी उन्हें उनकी उत्कर्ष रचनायों के लिए दिया गया .हिंदी साहित्य में उनके कार्य के कारण उन्हें ‘राष्ट्र कवी ‘ की उपाधि दी गयी .२४ अप्रैल १९७४ को भारतीय साहित्य के एक अध्याय समाप्त हो गया !</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Rashmirathi]]></title>
<link>http://audiopoetry.wordpress.com/2006/03/24/rashmirathi/</link>
<pubDate>Fri, 24 Mar 2006 15:29:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>blackmamba</dc:creator>
<guid>http://audiopoetry.wordpress.com/2006/03/24/rashmirathi/</guid>
<description><![CDATA[Ramdhari Singh &#8216;Dinkar&#8217; Listen (to Manas Baveja read) Part 1 Part 2 Part 3 The text can]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>Ramdhari Singh &#8216;Dinkar&#8217;</p>
<p>Listen (to Manas Baveja read)</p>
<p><a href="http://www.archive.org/download/audio_poetry_39_2006/RashmirathiPart1_64kb.mp3" target="blank">Part 1</a><br />
<a href="http://www.archive.org/download/audio_poetry_39_2006/RashmirathiPart2_64kb.mp3" target="blank">Part 2</a><br />
<a href="http://www.archive.org/download/audio_poetry_39_2006/RashmirathiPart3_64kb.mp3" target="blank">Part 3</a></p>
<p>The text can be found <a href="http://ia300239.us.archive.org/0/items/audio_poetry_39_2006/RashmiRathi-Cantos-3.pdf" target="blank">here</a>( in pdf, 6 MB)[1] and some more cantos <a href="http://ia300239.us.archive.org/0/items/audio_poetry_39_2006/RashmirathiSaptamSarga.pdf" target="blank">here</a> (in pdf)[2].</p>
<p>Rashmirathi (The Sun Charioteer[3]) describes the events that lead to the war in Kurukshetra. It starts with Lord Krishna&#8217;s failed attempt at negotiating peace with the Kauravs. This failure leads Krishna to Karn, Kunti&#8217;s firstborn, the one she abandons as a child. He tries to woo Karn away from his friend Duryodhan. Karn strongly refuses to leave his friend and goes on to explain why he could not, would not, do that.</p>
<p>Mahabharat is high drama and controlled chaos at its very best, an intricate spider web. There are so many side stories, all of which link into each other, they help build and are built upon one another. Every one of these stories is more convoluted and complicated than the other. Hear one story and boom! you are trapped.</p>
<p>Growing up in India, there were stories from the Mahabharat in school, the television, comic books, school plays, films, in every language under the sun. But the voice of a great storyteller can make the same stories magically and tantalizingly new. And, Dinkar is among the best and most vibrant storytellers.</p>
<p>Then, there is this one poem from my 8th or 9th grade hindi textbook &#8211; Krishn ki Chetavani (which I discover now, with great glee, was in fact a snippet from Rashmirathi.) This is when Lord Krishna goes to the Kaurava court to try and negotiate peace. Things don&#8217;t turn out as planned (well, they never do in this epic). And he storms out of the court predicting a war like no other, the crazy violence, the bloodshed and the unfathomable destruction. Dinkar&#8217;s lines remain etched in my memory to this day.</p>
<p>The other cantos are new to me. Heard them for the first time, when I recieved these recordings from Manas and Sanket. The dialogue between Karn and Krishna, is simply spectacular.</p>
<p>Reciting hindi poetry is a fine art. One must do it with just the right amount of fire and anger, while maintaining a pace that tickles the mind, teases it to keep up and then, not forget to tell the story. So here, the first hindi poem on our blog :) Enjoy!</p>
<p>Wiki on Dinkar <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ramdhari_Singh_%27Dinkar%27">here</a>.</p>
<p>[1] These are scanned images of the text Manas reads from and failed attempts at finding them online.</p>
<p>[2] Originally from <a href="http://www.atgig.com/jaya/Writings.html">here</a>, and has been archived on our blog, as the downloads seem to be flaky.</p>
<p>[3] Yes, it has been translated! The<a href="http://www.amazon.com/gp/product/B0006YJZJ2/ref=nosim/103-5770814-1481403?dev-t=D2Y5TUCCVJ7DGE&#38;n=283155"> English translation</a> is equally hard to come by though. :(</p>
<p>[blackmamba]</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाँद और कवि]]></title>
<link>http://hindipoetry.wordpress.com/2005/10/25/chaand-aur-kavi/</link>
<pubDate>Tue, 25 Oct 2005 11:52:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>Jaya</dc:creator>
<guid>http://hindipoetry.wordpress.com/2005/10/25/chaand-aur-kavi/</guid>
<description><![CDATA[रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,<br />  आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!<br />  उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,<br />  और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।</p>
<p>  जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?<br />  मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते<br />  और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी<br />  चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।</p>
<p>  आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का<br />  आज बनता और कल फिर फूट जाता है<br />  किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?<br />  बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।</p>
<p>  मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,<br />  देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?<br />  स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?<br />  आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?</p>
<p>  मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,<br />  आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,<br />  और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,<br />  इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।</p>
<p>  मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी<br />  कल्पना की जीभ में भी धार होती है,<br />  बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,<br />  स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।</p>
<p>स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-<br />  रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,<br />  रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,<br />  स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।</p>
<p>&#8211;</p>
<p>Other Information
<p>Credit: Taken from <a href="http://kaavyaalaya.org/" title="काव्यालय">Kaavyaalaya</a> (Only minor corrections have been made by me) </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लोहे के मर्द]]></title>
<link>http://hindipoetry.wordpress.com/2005/10/16/lohe-ke-mard/</link>
<pubDate>Sun, 16 Oct 2005 13:24:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>Jaya</dc:creator>
<guid>http://hindipoetry.wordpress.com/2005/10/16/lohe-ke-mard/</guid>
<description><![CDATA[पुरुष वीर बलवान,देश की शान,हमारे नौजवान घायल होकर आये हैं। कहते हैं, ये पुष्प, दीप, अक्षत क्यों लाये]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>पुरुष वीर बलवान,<br />देश की शान,<br />हमारे नौजवान<br />    घायल होकर आये हैं।</p>
<p>कहते हैं, ये पुष्प, दीप,<br />       अक्षत क्यों लाये हो?</p>
<p>हमें कामना नहीं सुयश-विस्तार की,<br />फूलों के हारों की, जय-जयकार की। </p>
<p>तड़प रही घायल स्वदेश की शान है।<br />सीमा पर संकट में हिन्दुस्तान है।</p>
<p>ले जाओ आरती, पुष्प, पल्लव हरे,<br />ले जाओ ये थाल मोदकों ले भरे।</p>
<p>तिलक चढ़ा मत और हृदय में हूक दो,<br />दे सकते हो तो गोली-बन्दूक दो। </p>
<p>&#8211;</p>
<p>Other Information</p>
<p>Written: November 1, 1962<br /> Collection: Parshuram Kee Prateeksha (Published: 1963) </p>
]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
