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	<title>shabda &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/shabda/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "shabda"</description>
	<pubDate>Tue, 08 Dec 2009 10:05:14 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[अश्लीलता और श्लीतता में अंतर-हिंदी  हास्य व्यंग्य कविताएँ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/22/shlilata-hindi-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 14:20:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/22/shlilata-hindi-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अश्लीलता और श्लीतता में अंतर कितना रह गया है बस छह इंच के कपड़े का। क्यों इतना रोज छोड़ मचता है खत्म क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अश्लीलता और श्लीतता में<br />
अंतर कितना रह गया है<br />
बस छह इंच के कपड़े का।<br />
क्यों इतना रोज छोड़ मचता है<br />
खत्म कर दो हर कायदा<br />
कोई पहने या न पहने<br />
लगा दो एक नारा चौराहे पर<br />
अपनी इज्जत की रक्षा खुद करें<br />
दूसरे में तब देखें<br />
पहले अपनी आंखों में शर्म भरें<br />
नहीं मिलेगा कोई पहरेदार<br />
आपनी आबरू के लिये बनो खुद्दार<br />
और भी जमाने में मुसीबतें हैं<br />
नहीं करेगा कोई कायदा हिफाजत<br />
हल खुद ही करो पहनावे के लफड़ा।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
निर्देशक ने अपनी फिल्म के<br />
कपड़ा निर्देशक से<br />
चर्चा करते हुए कहा<br />
‘भई, यह कम बजट की फिल्म है<br />
इसलिये अधिक पैसे की उम्मीद नहीं करना।<br />
इसमें केवल नायक के कपड़े ही<br />
अधिक बनाने होंगे<br />
नायिका तो पूरी फिल्म में छह इंच के ही<br />
वस्त्र धारण करेगी<br />
कभी कभी एक फुट का भी वेश धरेगी<br />
इसलिये अपने अनुबंध में<br />
कपड़ों की राशि कम से कम भरना।</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<strong>कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<blockquote><p>
<strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com/">2.अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com/">4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
</strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ऐसे ही अफसाने-हिंदी व्यंग्य कविता (bade log-hindi vyangya kavita)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/18/aise-hee-afsaane-hindi-poem/</link>
<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 09:08:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/18/aise-hee-afsaane-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[जब बहता था दरिया में पानी तब भला कौन वादा करता था उसे लाने का। कहीं बांध बनाये कहीं रास्ता बदला पानी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><span style="font-size:large;">जब बहता था दरिया में पानी</span><br />
<span style="font-size:large;">तब भला कौन वादा करता था उसे लाने का।</span><br />
<span style="font-size:large;">कहीं बांध बनाये</span><br />
<span style="font-size:large;">कहीं रास्ता बदला</span><br />
<span style="font-size:large;">पानी को बनाकर बेचने की शय</span><br />
<span style="font-size:large;">जिन्होंने बिगाड़ दी प्रकृति की लय</span><br />
<span style="font-size:large;">अब वही करते हैं सभी जगह दावा</span><br />
<span style="font-size:large;">पानी का दरिया बहाने का।</span><br />
<span style="font-size:large;">छोटे ईमान के लोग</span><br />
<span style="font-size:large;">बड़े बन जाते हैं इस जमाने में</span><br />
<span style="font-size:large;">लेकर सहारा ऐसे ही अफसाने का।</span><br />
<span style="font-size:large;">&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</span></p>
<p><strong>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong><br />
<strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नापसंद लेखक, पसंदीदा आशिक-हिन्दी हास्य कविता (rejected writer-hindi hasya kavita)]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/06/pasand-aur-napasand-hindi-comdey-satire/</link>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 14:36:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/10/06/pasand-aur-napasand-hindi-comdey-satire/</guid>
<description><![CDATA[आशिक ने अपनी माशुका को इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए अपने ब्लाग पर पसंद नापसंद का स्तंभ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आशिक ने अपनी माशुका को<br />
इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए<br />
अपने ब्लाग पर<br />
पसंद नापसंद का स्तंभ<br />
एक तरफ लगाया।<br />
पहले खुद ही पसंद पर किल्क कर<br />
पाठ को ऊपर चढ़ाता था<br />
पर हर पाठक मूंह फेर जाता था<br />
नापसंद के विकल्प को उसने लगाया।<br />
अपने पाठों पर फिर तो<br />
फिकरों की बरसात होती पाया<br />
पसंद से कोई नहीं पूछता था<br />
पहले जिन पाठों को<br />
नापसंद ने उनको भी ऊंचा पहुंचाया।<br />
उसने अपने ब्लाग का दर्शन<br />
अपनी माशुका को भी कराया।<br />
देखते ही वह बिफरी<br />
और बोली<br />
‘‘यह क्या बकवाद लिखते हो<br />
कवि कम फूहड़ अधिक दिखते हो<br />
शर्म आयेगी अगर अब<br />
मैंने यह ब्लाग अपनी सहेलियों को दिखाया।<br />
हटा दो यह सब<br />
नहीं तो भूल जाना अपने इश्क को<br />
दुबारा अगर इसे लगाया।’’</p>
<p>सुनकर आशिक बोला<br />
‘‘अरे, अपने कीबोर्ड पर<br />
घिसते घिसते जन्म गंवाया<br />
पर कभी इतना हिट नहीं पाया।<br />
खुद ही पसंद बटन पर<br />
उंगली पीट पीट कर<br />
अपने पाठ किसी तरह  चमकाये<br />
पर पाठक उसे देखने भी नहीं आये।<br />
इस नपसंद ने बिना कुछ किये<br />
इतने सारे पाठक जुटाये।<br />
तुम इस जमाने को नहीं जानती<br />
आज की जनता गुलाम है<br />
खास लोगों के चेहरे देखने<br />
और उनका लिखा पढ़ने के लिये<br />
आम आदमी को वह कुछ नहीं मानती<br />
आम कवि जब चमकता है<br />
दूसरा उसे देखकर बहकता है<br />
पसंद के नाम सभी मूंह फुलाते<br />
कोई नापसंद हो उस पर मुस्कराते<br />
पहरे में रहते बड़े बड़े लोग<br />
इसलिये कोई कुछ नहीं कर पाता<br />
अपने जैसा मिल जाये कोई कवि<br />
उस अपनी कुंठा हर कोई उतार जाता<br />
हिट देखकर सभी ने अनदेखा किया<br />
नापसंद देखकर उनको भी मजा आया।<br />
ज्यादा हिट मिलें इसलिये ही<br />
यह नापसंद चिपकाया।<br />
अरे, हमें क्या<br />
इंटरनेट पर हिट मिलने चाहिये<br />
नायक को मिलता है सब<br />
पर खलनायक भी नहीं होता खाली<br />
यह देखना चाहिये<br />
मैं पसंद से जो ना पा सका<br />
नापसंद से पाया।’’</p>
<p>इधर माशुका ने सोचा<br />
‘मुझे क्या करना<br />
आजकल तो करती हैं<br />
लड़कियां बदमाशों से इश्क<br />
मैंने नहीं लिया यह रिस्क<br />
इसे नापसंद देखकर<br />
दूसरी लड़कियां डोरे नहीं डालेंगी<br />
क्या हुआ यह नापसंद लेखक<br />
मेरा पसंदीदा आशिक है<br />
इसमें कुछ बुरा भी समझ में नहीं आया।’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-patrika.com/">‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong>
</p></blockquote>
<p>हिंदी </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-कर्मकांड निभाने से कोई लाभ नहीं होता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/05/29/karmkand-aur-labh-adhyatm-sandesh/</link>
<pubDate>Fri, 29 May 2009 03:56:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/05/29/karmkand-aur-labh-adhyatm-sandesh/</guid>
<description><![CDATA[राजा भर्तृहरि कहते हैं कि किं वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तरैः स्वर्गग्रामकुटीनिवाफल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>राजा भर्तृहरि कहते हैं कि </strong><br />
<strong>किं वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तरैः<br />
स्वर्गग्रामकुटीनिवाफलदैः कर्मक्रियाविर्भमैः।<br />
मुक्तवैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानल्र<br />
स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणगव्त्तयः</strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> वेद, स्मृतियों और पुराणों को पढ़ने, बृहद शस्त्रों के श्लोक रटने, किसी स्वर्ग जैसे ग्राम में  फल देने वाले कर्मकांड एक तरह से पाखंड हैं उनके निर्वहन से क्या लाभ? संसार में दुःखों का भार हटाने और परमात्मा का दिव्य पद पाने के लिये केवल उसका स्मरण करना ही पर्याप्त है।  उसके अलावा सभी कुछ व्यापार है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>अपने मन को शांति देन का इकलौता मार्ग एकांत में परमात्मा की हृदय से भक्ति करना ही है।  चाहे कितने भी द्रव्य से संपन्न होने वाले यज्ञ कर लें और अनेक ग्रंथ पढ़कर उसकी सामग्री पढ़कर दूसरों का सुनाने से कोई लाभ नहीं हैं। हम अपनी शांति प्राप्त करने के लिये सत्संगों और आश्रमों में पाखंडी गुरूओं के पास जाते हैं।  इनमें कई कथित साधुओं और संतों ने पंच सितारे  होटलों की सुविधाओं वाले आश्रम बना लिये हैं जहां रहने का दाम तो दान के नाम वसूल किया जाता है। ऐसे संत और साधु  कर्मकांडों में लिप्त होने का ही संदेश देते हैं। अधिकतर साधु संत सकाम भक्ति के उपासक हैं।  वह अपने पैर पुजवाते हैं। कहते तो वह भी भगवान का स्मरण करने को हैं पर साथ में अपनी किताबें और मंत्र पकड़ाते हैं। उनके बताये रास्ते से सच्चे मन से भक्ति नहीं होती बल्कि शांति खरीदने के लिये हम उनको पैसे देकर अपने घर आते हैं। परंतु मन की शांति कहीं बाजार में मिलने वाली वस्तु तो है नहीं और फिर हमारा मन अशांत होकर भटकने लगता है। </p>
<p>ईश्वर की भक्ति से ही मन को शांति मिलती है और उसके लिये यह आवश्यक है कि मन को कुछ पल सांसरिक मार्ग से हटाया जाये और उसका एक ही उपाय है कि एकांत में बैठकर उसका ध्यान करें।  बाकी तो अपने देश में धर्म के नाम पर व्यापार है और जितने भी कर्मकांड हैं वह तो केवल व्यापार के लिये हैं और उनसे काल्पनिक स्वर्ग पाने का विचार ही बेकार है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कोयल भी खरीद कर सुर देने आती है-व्यंग्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/05/20/koyal-kharid-kar-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Wed, 20 May 2009 16:00:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/05/20/koyal-kharid-kar-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[खूबसूरत चेहरे यूं ही नहीं हो जाते मशहूर. सौन्दर्य सामग्री से चमक आती है आवाज खराब हो तो कोयल भी खरीद]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>खूबसूरत चेहरे<br />
यूं ही नहीं हो जाते मशहूर.<br />
सौन्दर्य सामग्री से चमक आती है<br />
आवाज खराब हो तो<br />
कोयल भी खरीद कर सुर देने आती है<br />
देखने वाले क्या<br />
पहचाने सौन्दर्य और आवाज़<br />
सुरक्षा की दीवार कर देती उनको दूर.<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
अपनी  अदाओं के जलवे दिखाने<br />
तमाम वादों और उम्मीदों का दावा<br />
अपने नाम लिखाने<br />
ढेर सारे अदाकार<br />
चौराहों पर आते.<br />
लोग देखते हैं आँखों से<br />
सुनते हैं कानों से<br />
अक्ल के दरवाजे बंद कर<br />
भीड़ की तरह जुट  जाते.<br />
दिन के उजाले में  बेचते हैं अंधे जज़्बात<br />
वह सौदागर रात को गुम हो जाते हैं.<br />
मगर नाम उनके फिर भी<br />
जमाने में छा जाते.<br />
बरसों तक लुटते हैं लोग<br />
कहीं पैसा तो कहीं यकीन  खो दिया<br />
पर क्या करें लोग<br />
रोटी के टुकड़े और पानी को तरसते<br />
साथ में कमजोर याददाश्त   का<br />
बोझ भी उठाते.</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p><strong>लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि शतकः बुढ़ापे में भले काम की आदत नहीं पड़ सकती]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/04/26/budhape-men-bhali-adat-niti-shatak/</link>
<pubDate>Sun, 26 Apr 2009 00:38:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/04/26/budhape-men-bhali-adat-niti-shatak/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211; यावत्स्वस्थमिदं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<strong>यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावच्च दूरे जरा यावच्चेंिद्रयशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।<br />
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् संदीप्ते भवने तु कुपखननं प्रत्युद्यम कीदृशः</strong><br />
<strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> जब शरीर स्वस्थ है, वृद्धावस्था परे है, इंद्रियां सही ढंग से काम कर रही हैं और आयु भी ढलान पर नहीं  है विद्वान और ज्ञानी लोग तभी तक अपनी भलाई का  काम प्रारंभ कर देते  हैं। घर में आग लगने पर कुंआ खोदने का प्रयास करने से कोई लाभ नहीं होता।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>भर्तृहरि महाराज का यहां आशय यह है कि जब तक हम शारीरिक रूप से सक्षम हैं तभी तक ही अपने मोक्ष के लिये कार्य कर सकते हैं।  इसके लिये आवश्यक है कि प्रारंभ से ही  मन, वचन, और शरीर से हम भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा रखें।  कुछ लोग यह कहते हैं कि अभी तो हम सक्षम हैं इसलिये भगवान की भक्ति क्यों करें? जब रिटायर हो जायेंग्रे या बुढ़ापा आ जायेगा तभी भगवान की भक्ति करेंगे। सच बात तो यह है कि भगवान की भक्ति या साधना की आदत बचपन से ही न पड़े तो पचपन में भी नहीं पड़ सकती।  कुछ लोग अपने बच्चों को इसलिये अध्यात्मिक चर्चाओंे में जाने के लिये प्रेरित नहीं करते कि कहीं वह इस संसार से विरक्त होकर उन्हें छोड़ न जाये जबकि यह  उनका भ्रम होता है।  सच बात तो यह है कि भारतीय अध्यात्म ज्ञान किसी भी आदमी को जीवन से सन्यास होने के लिये नहीं बल्कि मन से सन्यासी होने की प्रेरित करता है।  सांसरिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए उसके फल की कामना से परे रहना कोई दैहिक सन्यास नहीं होता।  </p>
<p>हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तो यह कहता है कि आदमी अपने स्वभाव वश अपने नित्यप्रति के कर्तव्य तो वैसे ही करता है पर भगवान की भक्ति और साधना के लिये उसे स्वयं को प्रवृत्त करने के लिये प्रयास करना होता है। एक तो उसमें मन नहीं लगता फिर उससे मिलने वाली मन की शांति का पैमाना धन के रूप में दृश्यव्य नहीं होता इसलिये भगवान की भक्ति और साधना में मन लगाना कोई आसान काम नहीं रह जाता। बुढ़ापे आने पर जब इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं तब मोह और बढ़ जाता है ऐसे में भक्ति और साधना की आदत डालना संभव नहीं है।  सच बात तो यह है कि योगसाधना, ध्यान, मंत्रजाप और भक्ति में अपना ध्यान युवावस्था में ही लगाया जाये तो फिर बुढ़ापे में भी बुढ़ापे जैसा भाव नहीं रहता।  अगर युवावस्था में ही यह आदत नहीं डाली तो बुढ़ापे में तो नयी आदत डालना संभव ही नहीं है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajdpk.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका</a><br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[‘विषाद' का प्रतिकार ‘सहजता’ से ही संभव -आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/04/21/tenshan-and-easines-hindi-article/</link>
<pubDate>Tue, 21 Apr 2009 15:57:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/04/21/tenshan-and-easines-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[वह एक ब्लाग पर टिप्पणी थी। उसमें कोई ऐसी बात नहीं कही गयी जिस पर बावेला मचायें। टिप्पणीकार की नीयत प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वह एक ब्लाग पर टिप्पणी थी। उसमें कोई ऐसी बात नहीं कही गयी जिस पर बावेला मचायें। टिप्पणीकार की नीयत पर भी कोई संदेह नहीं था। वह भारतीय समाज में एकता के लिये प्रतिबद्ध दिख रहा था इसमें संदेह नहीं है। कभी कभी लगता है कि यह वही ब्लाग लेखक हो सकता है जिसके पाठ से प्रभावित होकर इस लेखक ने लिखना प्रारंभ किया था।  अपने ही धर्म के प्रवर्तक के एक अंग्रेजी  कार्टून के विरोध में कुछ लोगों ने प्रदर्शन किया था और उसने उसी पर ही ईमानदारी से एक बढ़िया व्यंग्य लिखा था। उसने अपने धर्म के ठेकेदारों पर कटाक्षा किया था। शायद वही ऐसा ब्लागर हो सकता है। दावे से यह कहना कठिन है कि यह वही ब्लाग लेखक है पर उसकी नेकनीयती पर संदेह करना अपने आपको धोखा देना है।  उसने एक ब्लाग पर टिप्पणी की थी।<br />
उसकी टिप्पणियों के बाकी अंशों से कोई मतलब नहीं है पर उसके श्रीगीता के प्रति किये गये उद्गार से इस लेखक को असहमति-याद रखें कि विरोध नहीं- थी।  उसने दूसरे ब्लाग लेखक के पाठ पर टिप्पणी की थी। उस पाठ में एक धार्मिक पुस्तक को लेकर चर्चा थी। उस पाठ मेंे कुछ कतिपय लोगों द्वारा एक धार्मिक पुस्तक की व्याख्या अपने स्वार्थ से करने की आलोचना थी और उस ब्लाग लेखक ने उसी पर अपनी सदाशयता  से टिप्पणी की थी।<br />
उसने अपनी टिप्पणी में दो अन्य धर्मों की पुस्तकों के साथ श्रीगीता का भी उल्लेख करते हुए लिखा था कि यह सभी धार्मिक पुस्तकों इसलिये लिखी गयी क्योंकि उस समय लोगों के पास समय था। इन पुस्तकों का अधिक महत्व नहीं है।<br />
उसकी इस टिप्पणी से लेखक के अधरों पर बरबस ही मुस्कान आ गयी।  उस भावुक ब्लागर ने भले ही सदायशता से टिप्पणी की पर कहीं न कहीं उसका अज्ञान श्रीगीता के प्रति साफ दिख रहा था।  अगर वह श्रीगीता के अलावा किसी अन्य धर्म ग्रंथ की बात करता तो शायद उसे समझा जा सकता था।<br />
हम यहां धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की विचारधाराओं से हटकर विचार करें तो लगेगा कि इस देश में लोगों की आदत हो गयी है कि केवल नारों के आधार पर ही बहस और टिप्पणियां करते हैं। वह टिप्पणीकार भी उस बुद्धिजीवी समाज से है जो केवल चर्चा करने के लिये चर्चा करता है। यहां हमें किसी बुद्धिजीवी का समाज देखकर उस पर टिप्पणी नहीं करना क्योंकि श्रीगीता को मानने वाला इंसान अगर समदर्शी नहीं हुआ तो उसका ज्ञान व्यर्थ होगा।  हां, श्रीगीता के प्रति उसका जो भाव है वह देश के बुद्धिजीवी समाज का ही प्रतीक है और इस बात को कोई मतलब नहीं है कि उनमें कौन श्रीगीता का मानता है और कौन नहीं।<br />
बाकी धर्मों की पुस्तकों पर यह लेखक टिप्पणी नहीं करता क्योंकि  उनको इसने पढ़ा नहीं है पर श्रीगीता के बारे में यह कहना पड़ता है कि लाख सिर पटक लो। पढ़ो या नहीं।  पढ़ो तो समझो, नहीं समझो तो अपनी मर्जी के मालिक हो। इस दुनियां में झगड़े चलते रहे हैं और चलते रहेंगे। मगर श्रीगीता में जीवन और सृष्टि के संबंध में जो ज्ञान और विज्ञान का रहस्य उद्घाटित किया गया है वह कभी बदल नहीं सकता।  सच बात तो यह है कि श्रीगीता को मानने का दावा करने वाले ही उसके बारे में उतना ही जानते हैं जिससे दूसरे को बता कर अपने ज्ञानी होने का प्रभाव जमा सकें। श्रीगीता की पुस्तक और उसके संदेश आश्रमों के दरवाजे या दीवारों पर प्रकाशित करने से अगर उसके स्वामियों को आ जाता तो वह उनको बनाते ही नहीं। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता के ज्ञान का केवल अपने भक्तों में प्रचार करने की आज्ञा दी है मगर उसे सरेराह सुनाकर कथित धर्म के ठेकेदार इसी बात का प्रमाण देते हैं कि उनके पास केवल संदेश नारों के रूप में है धारण किये हुए ज्ञान की तरह नहीं।<br />
एक मजे की बात दूसरी भी है। अगर अन्य धर्मग्रंथों के साथ श्रीगीता का नाम लेकर हल्की प्रतिकूल बात कहने को लोग यह मान लेते हैं कि चलो उसने हमारी श्रीगीता की अकेले आलोचना नहीं की। ऐसे में दो बातें प्रमाणित होती हैं-<br />
1. लोग श्रीगीता के समर्थक हैं पर उसके ज्ञान से अनजान है इसलिये चुनौती नहीं दे पाते।<br />
2. दूसरा यह कि पूरा समूह ही ऐसा हो गया है कि ‘चलो हमारे थप्पड़ मारा तो क्या हुआ पड़ौसी को भी तो मारा’।<br />
दूसरा कारण पूरे समाज को इंगित कर दिया गया है वरना उस टिप्पणीकर्ता ब्लाग लेखक का ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था-यह उसकी सदाशयता को देखकर कही जा सकती है।<br />
विश्व भर में तनाव बढ़ता जा रहा है। विभिन्न धर्मों के नाम पर लिखी गयी बृहद पुस्तकों को पढ़ना सामान्य आदमी के लिये कठिन है इसलिये वह उनके पढ़ने वाले कथित ज्ञानियों के दरवाजे पर हाजिरी लगाता है और वह उसे सर्वशक्तिमान की पहचान और स्वर्ग का पता देने के बहाने अपने हित दो तरह से साधते हैं।<br />
1.अपने लिये दान दक्षिणा जुटाते हैं<br />
2.अपनी छबि सिद्ध की बनाकर लोगों के अपना नाम करना चाहते हैं।<br />
हमारे देश में तो इतनी धार्मिक पुस्तकें हैं कि कोई भी अच्छा खासा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि उसने सब कुछ पढ़ लिया।  अब आप कहेंगे कि तब क्या किया जाये?<br />
सारी धार्मिक पुस्तकों का सार श्रीगीता में है। उसे एक बार पढ़ लें तो फिर अन्य ज्ञान की पुस्तकें पढ़ने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। हां, मनोरंजन की पुस्तकें पढ़ सकते हैं, कार्यक्रम देख सकते हैं पर उनमें लिप्त नहीं होना-यही संदेश श्रीगीता से निकलता है।<br />
आखिर बात यह है कि आजकल जब बीमार आदमी डाक्टर के पास जाता है तो वह कहता है कि ‘तुम्हारी बीमारी की जड़ तनाव है!’<br />
बीमार उसके हाथ से लिखा पर्चा हाथ में लेता है तो डाक्टर कहता है कि‘यह दवायें समयानुसार लेना। हा, पर ठीक तब ही हो पाओगे जब तनाव मुक्त रहोगे। ‘टैंशन मत पालो। हमेशा रिलैक्स रहो तभी इजीनैस फील कर पाओगे।’<br />
श्रीगीता का पहला अध्याय ही ‘विषाद योग’ है और फिर सहज योग की स्थापना करते हुए अन्य अध्याय हैं। ‘विषाद’ का प्रतिकार ‘सहजता’ से करने के लिये कोई अन्य धर्मपुस्तक है क्या? अगर है तो क्या वह इतनी छोटी और संक्षिप्त संदेशों से सुसज्जित है  जिसे आम आदमी पढ़ सके क्योंकि आजकल लोगों के फुरसत ही कहां है? दूसरी बात यह कि  श्रीगीता फुरसत में नहीं लिखी गयी। उसके संदेश इसलिये भी संक्षिप्त हैं क्योंकि उसके कुछ ही देर बाद महाभारत का युद्ध शुरु होने वाला था और भगवान श्रीकृष्ण में ही इतना सामथर््य था जो संक्षिप्त ढंग से प्रभावी बात कह सकें। कोई बात विस्तार से कहकर उसे उलझाने का न तो उनका इरादा हो सकता था न वक्त ही था।<br />
बात से बात निकलती है।  उस टिप्पणीकर्ता ब्लाग लेखक की सदाशयता के प्रति कोई संदेह नहीं होते हुए भी इस लेखक द्वारा ऐसा लिखना इसलिये जरूरी लगा क्योंकि आमतौर से ऐसी बातें होती हैं तब लोगों को समझाना ही पड़ता है कि ‘श्रीगीता’ में सारे संसार के सत्य का उद्घाटित करने वाला ज्ञान और विज्ञान है। हो सकता है कि अन्य धर्म ग्रंथों में भी हो पर श्रीगीता में उनका सार भी है। यह आलेख अपनी बात दूसरे पर लादने के लिये नहीं लिखा गया बल्कि अपनी कहने के लिये लिखा गया है और ऐसी हल्की टिप्पणियोें या अन्य प्रतिकूल वक्तव्यों से कभी विचलित होकर उग्र नहीं होना चाहिये श्रीगीता यही संदेश देती है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चीजें बेच सके बाज़ार में वही है असली इश्क -हास्य व्यंग्य कविताएँ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/04/02/for-sele-love-in-the-market-hindi-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Thu, 02 Apr 2009 16:18:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/04/02/for-sele-love-in-the-market-hindi-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[उनके कान खुले हैं पर सुनते हैं कि नहीं कैसे बताएं क्योंकि उनको सुनाया कई बार है दर्द अपना पर कभी ऐसा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>उनके कान खुले हैं<br />
पर सुनते हैं कि नहीं कैसे बताएं<br />
क्योंकि उनको सुनाया कई बार है दर्द  अपना<br />
पर कभी ऐसा  नहीं हुआ कि वह कोई दवा लाएं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
इश्क तो असल अब वही है<br />
जिसके नाम पर कोई  उत्पाद<br />
बाज़ार में बिकता है<br />
औरत हो या मर्द<br />
असल में  जज्बातों  खरीददार होता है  बाज़ार में<br />
भले ही माशूक और आशिक के तौर पर दिखता  है<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
शब्द बिके  नहीं बाज़ार में<br />
तो पढ़े भी नहीं जाते<br />
बिकने लायक लिखें तो<br />
समझने लायक नहीं रह जाते<br />
शब्दों के सौदागरों बनते हैं हमदर्द<br />
पर दिल में उनके जज़्बात कभी<br />
पहुँच नहीं पाते<br />
नहीं बनी कोई ऐसी तराजू<br />
जिसमें शब्दों को तौल पाते<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आंखों से परे का आकर्षण-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/11/16/aakhon-se-pare-ka-akrshan-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 16 Nov 2008 15:01:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/11/16/aakhon-se-pare-ka-akrshan-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[पता नहीं कब कैसे इस देश में यह परंपरा शुरू हुई कि बाहर से जब तक आदमी प्रमाण पत्र नहीं मिले उसे घर मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>पता नहीं कब कैसे इस देश में यह परंपरा शुरू हुई कि बाहर से जब तक आदमी प्रमाण पत्र नहीं मिले उसे घर में भी सम्मान नहीं मिलता। यहाँ कुछ लोकोक्तियाँ  प्रचलित हैं जैसे-घर का ज्ञानी बैल सामान ,दूसरे गाँव का सिद्ध, और अपने घर में तो हर आदमी शेर होता है,आदि आदि। यह अपने देश के लोगों की मूल प्रवृतियों का परिचायक है। कितना भी अच्छा करो पर जब तक विदेश से कोई प्रमाणपत्र न मिले तब तक यहाँ किसी को सम्मानीय नहीं माना जा सकता।<br />
हालांकि लोगों  को समझाने के लिए यह भी कहा गया है कि दूर के ढोल सुहानी-यानी परे लगने वाली सभी शये आकर्षक लगती  हैं। आजकल तो कई शहरों में कचडे के रंग बिरंगे डिब्बे भी दिखते हैं। दूर से देखने पर ऐसे  दिखते हैं कि वहां कोई खानपान की दुकान होगी। पास जाने पर पता लगता है कि वह तो कचडे का डिब्बा है। बहरहाल  यह लोगों की आदत हो  गयी है कि कहीं भी जाकर अपने लिए ढोल बजवा लो तभी यहाँ आपको सम्मान मिलेगा। अपने देश के लोगों की आदत देखकर तो यही लगता है कि अगर दक्षिण  अफ्रीका में महात्मा गांधी जी अगर अंग्रेजों को खिलाफ विजय दर्ज नहीं की होती तो शायद ही इसे देश के लोग उनका लोहा मानते हुए उनके अनुयायी बनते। उनका जीवन सदैव  संघर्षमय रहा। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने संघर्ष अपनी आत्मा की आवाज पर शुरू किया था। उनकी कथनी और करनी में कभी कोई अंतर नहीं रहा पर लोगों ने उनसे कुछ और नहीं सीखा सिवाय इसके कि यहाँ लोकप्रिय होने के लिए विदेश में नाम कमाओ चाहे जिस तरह। उन्होंने अपने आन्दोलन के दौरान जो श्रम किया वह किसी के बूते  का नहीं है-खासतौर से इस सुविधाभोगी युग में तो कतई नहीं। पर हाँ उन जितना तो नहीं पर उनकी तरह नाम कमाने की ललक कई महानुभावों  में है।<br />
लोगों की मानसिकता शायद इसी तरह की है कि वह दूसरे देशों या समाजों से सम्मानित होने पर ही लोहा मानते हैं। यही  कारण है कि अधिकतर लब्ध प्रतिष्ठत लोग अपने लिए विदेश से कोई न कोई प्रमाण पत्र  जुटाते हैं। इसके अलावा जिन महानुभावों को लगता है कि यहाँ नाम करने के लिए मेहनत करने की जगह सीधे विदेश से कोई सम्मान प्राप्त कर लो और वह सफल भी होते हैं। वैसे तो पहले विदेशी यहाँ सौ फीसदी विश्वसनीय माने जाते थे पर जब से फिक्सिंग वगैरह की बात चली है तो ऐसा भी लगता है कि विदेशी भी जरूर अपने लोगों को यहाँ प्रतिष्ठत करने के लिए कोई पुरस्कार दे सकते हैं। कुछ लोग अब जाकर ऐसे संशय उठाते हैं कि क्योंकि कुछ प्रतिभाशाली लोगों का यहाँ नाम इसलिए हुआ है कि वह विदेश से सम्मानित हैं। इनमें कुछ लेखक और चित्रकार हैं जो पहले विदेश में सम्मानित हुए तब यहाँ ऐसे चर्चित हुए कि प्रचार माध्यम उनकी बातें प्रकाशित ऐसे करते हैं जैसे कि वह ब्रह्म वाक्य हो।<br />
अमेरिका की अनेक पत्रिकाएँ अपने यहाँ विश्व के प्रभावशाली,सैक्सी,धनी, विद्वान तथा अन्य अनेक तरह की सूचियां छपते हैं जिसमें स्त्री पुरुष दोनों के नाम होते हैं। इसमें अगर किसी भारतीय का नाम होता है तो अपने प्रचार मध्य उछाले लगते हैं। दूसरे से लेकर दसवें तक हो तो भी उछालते हैं और पहले पर हो तो कहना ही क्या? लगता है कि भारत की वजह से उन्होंने तमाम तरह की श्रेणियां भी बना दीं हैं। किसी की आँखें सेक्सी तो किसी की टांगें तो किसी की आवाज को सेक्सी घोषित कर देते हैं। अनेक लोग समाज सेवा और अपने प्रभाव की कारण भी चर्चित होते हैं।<br />
इनमें जो नाम होते हैं उनमें कई लोगों का नाम चचित भी नहीं होता क्योंकि  जन सामान्य  उनका  कोई सीधे सरोकार नहीं होता पर जो उनके &#8216;प्रभाव क्षेत्र&#8217; में होते हैं वह आम आदमी का ही नही बल्कि समाज और देश का भविष्य तय करते हैं। कई लोगों को गलतफ़हमी होती है कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशो के राज प्रमुख दुनिया से सबसे ताक़तवर और प्रभावशाली लोग हैं उन्हें ऎसी रिपोर्ट बडे ध्यान से पढ़ना चाहिए। आखिर वह अपने राष्ट्र प्रमुखों को प्रभावशाली क्यों नहीं मानते जबकि विश्व में उनको सबसे ताक़तवर माना जाता है। आजकल भारत पर उनको अधिक ही मेहरबानी हैं और यहाँ के अभिनेता और अभिनेत्रियों के नाम भी इन आलीशानों की सूची में शामिल करते हैं।  </p>
<p>हमारे देश में अगर आप किसी व्यक्ति से प्रभावशाली लोगों के बारे में सवाल करेंगे तो वह अपने विचार के अनुसार अलग-अलग तरह के प्रभाव के रुप बताएंगे। हाँ यहाँ उन लोगों को जरूर प्रभावशाली  माना जाता है जो घरेलू हितों के लिए सार्वजनिक काम में पहुँच बनाकर करा लाते हैं। आम आदमी की दृष्टि में प्रभाव का सीधा अर्थ है &#8216;पहुंच&#8217;।  लोगों के निजी  और  सार्वजानिक  कामों में कठिनाई और लंबी प्रक्रिया के चलते इस देश में उसी व्यक्ति को प्रभावशाली माना जाता रहा है जो अपनी पहुँच का उपयोग कर उसे करा ले आये।  इस कारण   दलाल टाईप के लोग भी &#8216;प्रभावशाली &#8216; जैसी छबि बना लेते हैं। अब जैसे-जैसे निजीकरण बढ़ रहा है वैसे ही उन लोगों की भी पूछ परख बढ़ रही है जो धनाढ्य लोगों के मूंह  लगे हैं, क्योंकि वह भी अपने यहाँ लोगों को नौकरी पर लगवाने और निकलवाने की ताक़त रखने लगे हैं। हर जगह तथाकथित रुप से प्रभावशाली लोगों का जमावड़ा है और तय बात है कि वहाँ चाटुकारिता भी है। इसके बावजूद उनको सम्मानीय नहीं माना जाता क्यों कि इसके लिए उनके पास विदेश से प्रमाण पत्र के रूप में कोई सम्मान नहीं होता। </p>
<p>प्रभावशीलता  और चाटुकारिता का चोली दामन का साथ है। सही मायने में वही व्यक्ति प्रभावशाली है जिसे आसपास चाटुकारों का जमावड़ा है-क्योंकि यही लोगों वह काम करके लाते हैं जो प्रभावी व्यक्ति स्वयं नहीं कर सकता है। वैसे भी हमारे देश में बचपन से ही अपने छोटे और बड़े  होने का अहसास इस तरह भर दिया जाता है कि आदमी उम्र भर इसके साथ जीता है और इसी कारण तो कई लोग इसलिये प्रभावशाली बन जाते हैं क्योंकि वह लोगों के ऐसे छोटे-मोटे कुछ  पैसे लेकर करवा देते हैं जो वह स्वयं ही करा सकते हैं-जिसे दलाल या एजेंट काम भी कहा जाता है और लोग उनका इसलिये भी डरकर सम्मान करते हैं कि पता नहीं कब इस आदमी में काम पड़ जाये।  मजे की बात यह है कि घर का आदमी ही बाहर का मुश्किल काम कराकर लाये तो उसे &#8220;पहुँच&#8221; वाला नहीं माना जाता जब तक बाहर सम्मानित न हो जाए।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
 लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com">4.अनंत शब्दयोग</a><br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हवाई मुद्दों का सौदा-लघु कथा]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/09/short-story/</link>
<pubDate>Sat, 09 Aug 2008 13:00:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/09/short-story/</guid>
<description><![CDATA[कुछ माफिया लोग अपने हाथ में शराब,अफीम और तस्करी का सामान लिये हुए थे कुछ लोग अपने हाथ में जमीन के अस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>कुछ माफिया लोग अपने हाथ में शराब,अफीम और तस्करी का सामान लिये हुए थे कुछ लोग अपने हाथ में जमीन के असली और नकली कागज पकड़े हुए थे। यह ऐसे लेनदेन का काम करते थे जिसे दो नंबर का कहा जाता है पर लेबल उस पर एक नंबर का ही होता है। इनको शराब,अफीम और भूमाफिया भी कहा जाता है यह नाम इनको मीडिया वालों ने सम्मान के रूप में दिया है ताकि कोई इनको अपराधी न कहे। </p>
<p>हुआ यू कि एक दिन यह सब  माफिया अपने हाथ में हमेशा की तरह अपने व्यवसाय के अनुसार सारे सामान लिये बाजार में जा रहा था तो देखा कि कोई कलम कागज लिये तो कोई कैमरा लिये अपने भागता हुआ उनके पीछे आ रहा है। सबके माथे की पट्टी पर हुआ था ‘मीडिया’। उनकेा आते देखकर माफिया के सरदार ने कहा-‘भागो,यह मीडिया वाले आ रहे हैं। हम जिन इलैक्ट्रोनिक सामान की तस्करी कर लाते थे उससे यह मीडिया बहुत पावरफुल हो गया है। यह हमारा स्टिंग आपरेशन करने वाला है सो भागो।’<br />
तब उनमें से एक बोला-‘आने दो। हम उनके सरदार से बात कर लेते हैं। अरे, इस जमाने में और भी मामले में हैं। हमें दिखाकर इनको क्या मिलेगा?’</p>
<p>तब तक मीडिया वाले भी वहां पहुंच गये और लगे फोटो खींचने और साक्षात्कार लेने-‘आपको यह धंधा करते हुए कैसा लग रहा है?’<br />
‘क्या आपको कोई पकड़ता नहीं है।’<br />
आपके धंधे के मूल मंत्र क्या हैं?’<br />
एक माफिया ने मीडिया के सरदार से कहा-‘यार, तुम आज हमारी बदौलत ही इतने पावरफुल हुए हो। अगर हमारी भद्द पिटी तो तुम्हारा भी बुरा हाल होगा।’<br />
मीडिया सरदार ने कहा-‘पर अब बताओ हम करें क्या? दिखाने और छापने के लिये कुछ सनसनीखेज तो चाहिए।’<br />
माफिया सरदार ने कहा-‘यार, इसका मतलब तुम हमें ही निपटा दोगे। समाज ने अगर हमसे डरना बंद कर दिया तो सबसे पहले तुम्हारा ही पता कटेगा। तुम लोग भी कोई दूध को धुले नहीं हो।’<br />
मीडिया सरदार ने कहा-‘अब तुम्हीं बताओ। हम अपना काम कैसे चलायें। सनसनी खबरें कब तक और कहां से लायें।<br />
समझदार माफिया ने कहा-‘चलो अभी मास्टर माइंड के यहां चलते हैं। वह कोई न कोई रास्ता निकाल देगा। वह हवा में तीर चलाने की कला में माहिर है।’</p>
<p>दोनों मास्टर माइंड के पास पहुंचे। उसने कहा-‘मेरे को माल देते जाओ। माफिया वाले अपना काम करते रहें और मीडिया वालों को भी मुद्दे ढूंढने के लिये कहीं अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं है। उनके घर पर रोज नये मुद्दे पहुंच जायेंगे, पर उस पर बहस अधिक करना पर मूल विषय पर कभी नहीं जाना क्योंकि वह केवल हवाई मुद्दे होंगें।</p>
<p>मीडिया और माफिया दोनों के सरदारों ने उत्सुकता से पूछा ? कैसे?’<br />
मास्टर माइंड ने कहा-‘यह जमीन खाली पड़ी है। इस पर किसी मकान बनाने का प्रस्ताव पहले उछालेंगे और फिर बहस करवायेंगे। इस पर तुम्हारा समय अच्छा निकल जायेगा। बस यह कहने की कोशिश बिल्कुल मत करना कि इस इमारत बनी तो नहीं बनी तो क्या फर्क पड़ना है क्योंकि इससे विषय बिल्कुल खत्म हो जायेगा। यह देखो पेड़ से पता गिर गया है इसका सीधा प्रसारण करना और पर्यावरण पर भारी संकट घोषित करना। ऐसे दिखाना जैसे कि पूरा पेड़ गिर गया है।  किसी ऐसे विद्वान को मत बुलाना जो कहे कि ऐसे तो पते रोज गिरते हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कहीं मंदिर का मामला होगा तो कहीं दहेज का सब जगह अपनी टांग ऐसे फंसाना जैसे वह राष्ट्रीय मामला हो।’</p>
<p>मीडिया के सरदार ने कहा-‘यह तो हम ही कर लेंगे। फिर तुम्हारी क्या जरूरत है?’<br />
 माफिया वाले हमें ही ऐसे मुद्दे बनाने के लिये किराये पर लें तो क्या फर्क पड़ता है।’<br />
मास्टर माइंड हंस पड़ा-‘लोगों को कहां से लाओगे? यह काम तो हम ही कर सकते हैं। यह भीड़ को भेड़ की तरह हांकने वाले सरदार भी हैं जो अपनी ताकत रखते हैं वह हमारी  सलाह ही मानते  हैं भले ही तुम दोनोे की कृपा पर वह भी चलते हैं। जिंदा सांप से अधिक मरे हुए सांप को जीवंत मुद्दा बनाना  इतना आसान नहीं है। इसलिये तुम्हें हमेशा ऐसे हवाई मुद्दों के लिये हम पर निर्भर रहना पड़ेगा।’<br />
इस तरह तीनों के बीच हवाई मुद्दों को बनाये रखने का फैसला हुआ।</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">&#8216;दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मस्तराम के नाम से असत् साहित्य की  लोकप्रियता से हिंदी को लाभ नहीं-आलेख]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/07/article/</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 15:24:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/07/article/</guid>
<description><![CDATA[मस्तराम कोई भी हो सकता है। यह किसी का नाम भी हो सकता है और कई लोग अपने अल्हड़ स्वभाव के कारण इसी नाम]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>मस्तराम कोई भी हो सकता है। यह किसी का नाम भी हो सकता है और कई लोग अपने अल्हड़ स्वभाव के कारण इसी नाम से पुकारे जाते हैं। अंतर्जाल पर मस्तराम के नाम से कई लोग लिख रहे हैं यह अलग बात है हर कोई अपने साथ अपना नाम या अपना तख्ल्लुस जोड़ देता है।<br />
मैंने एक बार अपने एक ब्लाग में नाम के साथ ही मस्तराम भी जोड़ दिया। वह मेरा एक फालतू ब्लाग था और गूगल के इंडिक टूल मिलने से पहले उस पर लिखकर वहां से कापी कर दूसरे ब्लाग पर पोस्ट करता था। इस दौरान ब्लाग लेखक मित्रों ने विकिपीडिया का हिंदी टूल दिया। उससे कुछ दिन लिखा तो कंप्यूटर खराब हो गया क्योंकि वह पहले ही वाइरस ग्रस्त था। बाद में जब उसका हिंदी टूल लोड किया तो वह अधिक हिंदीमय हो गया था और इसलिये फिर अपने ब्लाग पर ही लिखने लगा। गूगल का इंडिक टूल आने के बाद उसकी जरूरत नहीं रही इसलिये मेरे कम से कम चार फालतू ब्लाग ऐसे ही रह गये।  इनमे एक पर उठाकर मस्तराम लिखा और उस पर अपनी रचनाओं पर लेबल लगाने लगा साथ ही कुछ इधर उधर से पोस्ट रखने लगा। </p>
<p>हैरानी की बात यह रही वह मस्तराम नाम धारी ब्लागों में वह हिट पाने लगा। इसी बीच मैंने एक ब्लाग पर मस्तराम के बारे में पढ़ा। पता लगा कि मस्तराम ‘आवारा’ के नाम से  हिंदी फोरमों पर जो दो पंजीकृत ब्लाग हैं का नाम भी उनमें शुमार है और उन्होंने इस संबंध में विवाद उठा जो बाद में शांत हो गया। तब मेरी दिलचस्पी इसमें जागी। इसके बाद मैंने अपने मस्तराम के नामधारी ब्लाग की जांच की तो पाया कि चिट्ठाजगत ने उनको अपने यहां रख कर दिखाना शुरू किया। उनमें मेरा वास्तविक नाम था इसलिये चिट्ठाजगत वालों को यह पता था कि यह किसके ब्लाग हैं। उन्होनें मेरे ब्लाग स्पाट के एक और वर्डप्रेस के दो ब्लाग इस तरह मुझसे पूछे  बिना रख लिये। चूंकि मैं उनको प्रयोग पर जारी रखे हुए हूं और उन पर कोई नयी पोस्ट नहीं रखता पर जो भी रखता हूं वह चिट्ठाजगत, नारद और हिंदी ब्लाग पर चला जाता है। इसलिये मैंने उनके नाम से मस्तराम हटा लिया पर उसके बाद अन्य ब्लाग पर लिखा। आज पता लगा कि वह भी चिट्ठाजगत वालों ने ले लिया। </p>
<p>मस्तराम अंतर्जाल पर बिना किसी सहायता के हिट पाने का एक उपाय है पर लोग उस पर कोई साहित्य पढ़ने नहीं आते। ऐसा लगता है कि गूगल से जुड़े या अन्य पुराने ब्लाग लेखकों ने अंतर्जाल पर हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिये मस्तराम के नाम से लिखना शुरू किया। गूगल के तो विज्ञापनों में ही इतनी गंदी गालियां लिखी हुईं हैं कि उन्हें यहां कोई लिखना ही नहीं चाहेगा। एक ब्लाग लेखक ने यौन साहित्य लिखा उसमेंं कुछ अश्लील नहीं था पर उसके अनुसार  उसके ब्लाग पर व्यस्क सामग्री की चेतावनी आ रही है और किसी ने गूगल को इसकी शिकायत की है उसका यह परिणाम है। मैंने उसे समझाया कि उसकी ब्लाग स्पाट की सैटिंग में गड़बड़ी है वह उसे चेक कर ले। मैंने अपने ब्लागस्पाट के एक ब्लाग पर वह कर देखा था जिससे वह चेतावनी अपने आप आने लगती है। मैंने उसे यह भी लिखा कि उसका ब्लाग क्या किसी का भी ब्लाग गूगल केवल इस कारण बैन नहीं कर सकता क्योंकि उसके विज्ञापनों के शीर्षकों में ऐसी गालियां हैं कि उन्हें कोई सामान्य हिंदी ब्लागर अपने अंदर पाठ में भी नहीं लिख सकता। </p>
<p>मस्तराम कोई असली नाम नहीं हैं और कई छद्म नाम के लोग इस पर लिख रहे हैं। हिंदी का कोई फोरम कभी भी उनको अपने यहां नहीं लिंक देता क्योंकि उनको अपनी श्वेत छबि बनाये रखने के लिये उससे दूर रहना ही श्रेयस्कर लगता है। चूंकि मेरे वह ब्लाग अन्य ब्लाग की तरह सामान्य पाठों हैं इसलिये उनको चिट्ठाजगत वाले लिंक देते हैं। संदेह के घेरे में वह इसलिये हैं कि वह मस्तराम शब्द डालकर ही वहां जाते हैं क्योंकि उन ब्लाग पर जितने भी हिट आये वह इसी शब्द से आये। हिंदी फोरमों पर दिख रहे हिंदी ब्लाग पर कभी कभार मस्तराम के नाम से लिखे जा रहे  ऐसे वैसे साहित्य पर चर्चा होती है पर कोई यह नहीं कहता कि हम भी वहां जाते हैं। सच तो यह है कि कई ब्लाग लेखक वह तांक झांक करते हैं नहीं तो मेरे ब्लाग उनके दृष्टिपथ में कैसे आते। </p>
<p>मस्तराम ‘आवारा’ से मैंने जिज्ञासावश एक पूछा था कि उनके ब्लाग पर कितने व्यूज आते हैं। बहुत दिन बाद उन्होंने अपने जवाब में बताया कि प्रतिदिन दोनों ब्लाग पर चालीस से पचास व्यूज आते हैं। जिस दिन पोस्ट नयी होती है उस दिन चारों फोरमों से भी जमकर व्यूज आते हैं। उससे एक बात तो लगी कि मस्तराम वाकई अपने आप में हिट दिलवाने वाला नाम है।  वह ब्लाग चेक किये तो उनका पता ही मस्तराम से शूरू है जबकि मैंने जी वगैरह लगाकर पता बनाया है। इसके बावजूद उस पर इतने हिट तो आ ही जाते हैं जो अन्य सामान्य ब्लाग पर नहीं आते। एक बार ख्याल आया था कि मैं भी ऐसा पता बनाऊं पर <a href="http://deepkraj.blogspot.com">शब्दलेख सारथी</a> और <a href="http://terahdeep.blogspot.com">अंतर्जाल पत्रिका</a> के व्यूज देखकर मन नहीं माना। वह दोनों ही अध्यात्म के दम पर 20 से 25 व्यूज कभी पचास व्यूज तब भी जुटा लेते हैं जब कोई उन पर पाठ नहीं होता।  फिर वर्डप्रेस पर मस्तराम की श्रेणी में भी मेरे पास व्यूज आते हैं। इससे एक बात पता लगती है कि मस्तराम नामधारी ब्लाग जमकर हिट ले रहे हैं पर जैसे जैसे हिंदी पर लिखा बढ़ता जायेगा सामान्य जन की रुचि बढ़ेगी और अंततःसत्साहित्य ही हिंदी का सारथी बनेग और उसकी ध्वजपताका अंतर्जाल पर फहरायेगा।  मस्तराम आवारा से एक बात और पता लगी कि उन ब्लाग पर  टिप्पणियां तभी आती हैं जब वह फोरमों पर होती है। तब मैंने सोचा कि जब मस्तराम शब्द से ही उसके ब्लाग खुल रहा है तो ब्लाग लेखक इतने तो समझदार हैं कि वह वहां टिप्पणियां नहीं लगायेंगे क्योंकि उससे पता लग जायेगा कि वह मस्तराम के इलाके में गये थे।<br />
वैसे हमारे इलाके में मस्तराम का इतना नाम प्रचलित नहीं है पर उस दिन एक आदमी ने बताया कि उसका नाम ऐसी वैसी रचनाओं के लिये खूब जाना जाता है। यही कारण है कि छद्म नाम से ऐसी वैसी रचनायें लिखने वाले वहां अपनी रचनाएं लिख रहे हैं और कुछ भले लोग भी हैं जो इस बात से बेखबर होकर ठीकठाक भी प्रस्तुति के साथ जुड़े हैं। ऐसा लिखने वालों के पुराने ब्लाग लेखकों होने का संदेह इसलिये भी जाता है कि तकनीकी और विज्ञापन की दृष्टि से वह जितना सुसज्तित हैं वह ज्ञान उन्हीं में संभव है। संभवतः हिंदी में लिखे गये वह पहले ब्लाग भी हो सकते हैं क्योंकि मैंने कई पर पांच वर्ष से अधिक पुरानी तारीखें देखीं हैं। मैं वहां अपने पाठकों के आने के मार्ग देखता हुआ वहां जाता हूं और इस दौरान वहां लिख पढ़ता हूं तो सोचता हूं चाहे कितने भी उन पर हिट हों हिंदी भाषा के समृद्धि करने का उनमें सामथर््य नहीं हैं।  बहरहाल अब मैं अपने नाम से मस्तराम नहीं हटाऊंगा क्योंकि यह मेरे प्रयोग का हिस्सा है। चिट्ठाजगत वाले हर ब्लाग अपने यहां ले जायेंगे तो मैं किस किसका नाम बदलूंगा। कहीं अगर मस्तराम दीपक भारतदीप पर दृष्टिपथ में आ जाये तो बाद वाला ही नाम पढ़ें क्योंकि पहला नाम तो प्रयोग के लिये है। अगर उनको हटाने से  तो मेरे प्रयोग प्रभावित होंगे। बहरहाल अंतर्जाल पर अनेक तरह के नये मसले सामने आते हैं जो केवल यहीं दिख सकते हैं और कहीं नहीं।  </p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">&#8216;दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले प्रेमपत्र से दूसरा भाया-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/02/a-hindi-poem-3/</link>
<pubDate>Sat, 02 Aug 2008 13:21:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/08/02/a-hindi-poem-3/</guid>
<description><![CDATA[लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिये पहले प्रेमपत्र में लिखी कविता और अपना नाम लिखा प्रेमी लड़की ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिये<br />
पहले प्रेमपत्र में लिखी कविता और<br />
अपना नाम लिखा प्रेमी<br />
लड़की के लिये प्रिया का संबोधन लगाया<br />
लड़की ने  पत्र बिना  उत्तर के वापस लौटाया<br />
दूसरे में उसने लिखी शायरी<br />
अपने नाम के साथ आशिक शब्द लगाया<br />
लड़की को आशुका बताया<br />
वहां से प्यार की मंजूरी का पैगाम पाया</p>
<p>पहली मुलाकात में<br />
आशिक ने माशुका से इसका कारण पूछा<br />
तो उसने बताया<br />
‘कविता शब्द से बोरियत लगती है<br />
शायरी में वजन कुछ ज्यादा है<br />
कवियों की कविता तो कोई पढ़ता नहीं<br />
शायरी के फैन सबसे ज्यादा हैं<br />
फिल्मों में शायरों को ही हीरो बनाते हैं<br />
शायरियों को ही बढि़या बताते हैं<br />
कवियों और कवियों का मजाक बनाते हैं<br />
वैसे तो मुझे कविता और शायरी<br />
दोनों की की समझ नहीं है<br />
पर फिल्मों की रीति ही जमाने में हर कहीं है<br />
पहले पत्र में तुम्हारा काव्य संदेश, प्रेमी और<br />
प्रिया शब्द में पुरानापन लगा<br />
दूसरे पत्र में प्यार और शायरी का पैगाम<br />
तुम्हारा आशिक होना और<br />
मुझे माशुका कहने में नयापन जगा<br />
तुम कवि नहीं शायर हो इससे मेरा दिल खुश हुआ<br />
इसलिये मुझे  दूसरा प्रेम पत्र भाया<br />
मैंने भी तुम्हें मंजूरी का पैगाम भिजवाया<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://deepakraj.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[25 हजार पाठकों की संख्या पार कर चुका यह ब्लाग-संपादकीय]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/10/25-%e0%a4%b9%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 14:54:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/10/25-%e0%a4%b9%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[आज मेरा यह ब्लाग/पत्रिका पच्चीस हजार की पाठक संख्या पार कर गया। यह दूसरा ब्लाग/पत्रिका है जो इस संख्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज मेरा यह ब्लाग/पत्रिका पच्चीस हजार की पाठक संख्या पार कर गया। यह दूसरा ब्लाग/पत्रिका है जो इस संख्या के पार पहुंचा है। शायद कुछ लोगों को यह अजीब लगता होगा कि मैं  अपने किसी पाठ की पाठक संख्या एक हजार पार होने पर लिखता हूं तो कभी किसी ब्लाग के दस हजार पार होने की बात कर समय नष्ट करता हूं। यह लोगों को शायद आत्मप्रवंचना<br />
भी लग सकती है, पर चाणक्य का कथन है कि कभी कभी अपने गुणों को प्रकट करने का उद्यम भी करना चाहिए। </p>
<p>वैसे मेरे शायद बीस ब्लाग/पत्रिकाएं होंगी पर मैं 12 उन ब्लाग को ही आधिकारिक मानता हूं जिनके पंजीकरण के लिये मैंने हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने के लिये फोरमों को स्वयंं ईमेल किये। मेरे अन्य ब्लाग/पत्रिकाओं को भी कुछ फोरम अपने यहां दिखा रहे हैं पर मैं उन पर कभी नयी पोस्ट नहीं रखता। यह अलग बात है कि शीर्षक बदलकर रखे गये पाठों पर वहां भी पाठक आते है। </p>
<p>इस ब्लाग के पच्चीस हजार पाठक संख्या पार करने पर मुझे प्रसन्नता हुई है-यह मेरे एक अति सामान्य लेखक होने का प्रमाण है। तकनीकी रूप से मुझे ब्लाग का कोई ज्ञान नहीं था। जब यह ब्लाग बनाये तब पता भी नहीं था कि इसे ब्लाग कहते हैं। मैंने तो इसे अपनी पत्रिका की तरह उपयोग करने का विचार किया। कुल मिलाकर आज के स्वरूप की कल्पना तक मैंने नहीं की। जो सीखा यहीं अपने ब्लाग लेखक मित्रों  से ही सीखा। तकनीकी रूप से ब्लाग लेखकों की बातें कभी समझ में नहीं आयी पर सीखने में हुई गलतियों से ही मैं सीखा। इसका एक उदाहरण हाल ही का है। श्री अनुनाद सिंह ने कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला टूल अपने ब्लाग पर दिखाया। मैं उसे हड़बड़ी में 28 मार्च को उठाकर लाया और जब वह सफल रहा तो एक पोस्ट लिख डाली। वहां यूनिकोड से कृतिदेव को बदलने वाले टूल पर दृष्टि ही नहीं गयी। कुछ दिन से पत्र पत्रिकाओं से आग्रह आते हैं कि आप कुछ लिखकर कर दो। मैं सोचता था कि  यूनिकोड में पड़ी रचनाओं में बहुत सारा फेरबदल कर ही पत्र-पत्रिकाओं में इनका प्रकाशन सही हो पायेगा, पर करना आता नहीं था क्योंकि अगर मैं उनको अपने विंडो पर लाता तो वहां शब्द कूड़ा  दिखाई देते थे। संयोगवश एक मित्र को काम करने के लिये उसके कंप्यूटर पर कृतिदेव से यूनिकोड में बदलने वाला  टूल  स्थापित  करना चाहता था   पर जब मैं उसे लोड करता तो यूनिकोड से कृतिदेव में बदलने वाले टूल को लोड करता। वह तो वैसे काम नहीं कर सकता था। वहां से निराश घर आकर भी वही गलती करता रहा था। मैने श्री अनुनाद सिंह को ईमेल किया। फिर दोबारा उनके ब्लाग में गया और ध्यान से देखा तो पाया कि यह तो वह यूनिकोड से कृतिदेव में बदलने वाला टूल है जिसकी मुझे बहुत जरूरत है। तब मैंने अपने यहां उसको स्थापित  कर ब्लाग से एक पाठ उठाकर वहां आजमाया। वहां से अपने विंडो पर जाकर पेस्ट किया तो पता लगा कि पूरी सामग्री कृतिदेव में आ गयी थी और मैं उसमें अब संशोधन कर सकता था। यह अभी तीन दिल पहले की बात है। अपनी मूर्खता पर मैं हंस भी नहीं सकता था। मैंने तत्काल श्री अनुनाद सिंह को इसकी जानकारी दी ताकि वह परेशान न हों। </p>
<p>इधर लोग शिकायत कर रहे हैं कि बहुत लंबी पोस्ट लिख रहे हो, पर इसमें मैं कुछ नहींं कर सकता क्योंकि अपनी पूरी बात कहे बिना मुझे अपना आलेख समाप्त करना ठीक नहीं लगता। फिर मैं तो अपने शीर्षक में ही लिख देता हूं कि वह आलेख है या कविता। आलेख का मतलब मेरे लिये होंगे कम से कम 1200 शब्द! मैंने सवा साल तक अपने मौलिक स्वरूप के विपरीत लिखा पर अब सहज भाव से लिखता हूं। इसलिये बाद में भी उसमें जोड़ता हूं जबकि पहले रोमन लिपि में यूनिकोड में हिंदी टाईप में ऐसा करने की सोचता भी नहीं थां<br />
इसी ब्लाग के संबंध में एक और रोचक बात है। हुआ यूं कि एक ब्लाग ने एक वेबसाइट  का उल्लेख अपने पाठ में किया जिसमें सभी ब्लाग के रेट का आंकलन किया जा सकता है-वहां ऐसा कोई साफ्टवेयर था। मैंने उसमें अपने सभी ब्लाग का मूल्य आंका। यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग था हालांकि अन्य ब्लाग लेखको के ब्लाग   के मुकाबले इसकी कीमत कम थी। इस पर एक पाठ लिखते हुए मैंने अपने सभी ब्लाग की कीमत उल्लेख की जो कुल योग में उस समय अनेक महंगे ब्लाग से अधिक थी। मेरे एक मित्र ने अपनी टिप्पणी में मुझसे कहा कि यह एक साफ्टवेयर है जिसका कोई अधिक महत्व नहीं है क्योंकि श्रेष्ठता के पैमाने तो और भी बहुत हैं। फिर यह साफ्टवेयर किस प्रकार तैयार किया गया है यह भी पता नहीं है पर हां, इससे हम यह तो देख सकते हैं कि हमारे ब्लाग की स्थिति क्या है?’<br />
अपने मित्र की आखिरी पंक्तियां मुझे बहुत ज्ञानवद्र्धक लगी। तब मैंने सोचा कि यह अगर मेरा महंगा ब्लाग है तो क्यों न इसी पर अधिक काम किया जाये। इसके बाद शब्द पत्रिका का नंबर आता था तब मैंने इन दोनों ब्लाग पर अधिक लिखने का विचार किया। यही कारण है कि यह दोनो ब्लाग पिछले चार महीने में मेरे मुख्य ब्लाग दीपक बापू कहिन से आगे निकल गये हैं। दीपक बापू कहिन भी अभी इस दौड़ मैं है पर अभी उसे पच्चीस हजार का आंकड़ा पार करने में शायद  बीस से पच्चीस दिन और लग सकते हैं।  अन्य ब्लाग बनाये थे उन पर शुरू में मैंने कृतिदेव में ही अपनी रचनायें रखीं थी पर यह पहला ब्लाग था जिस पर मैंने रोमन लिपि में अंग्रेजी में यूनिकोड मेंं कवितायें प्रकाशित की  थी-वह भी ब्लागस्पाट के ब्लाग पर टूल पर टाईप करने के बाद कापी कर यहां रखी थी। इसी  कारण पहली प्रोत्साहित करने वाली सकारात्मक  टिप्पणी भी इस पर  आयी थी। उससे पहले आने वाली अन्य ब्लाग पर आई टिप्पणियों में  मेरा ब्लाग पढ़ने में न आने की शिकायत लिये हुए थीं। यह संयोग ही है कि कृतिदेव से यूनिकोड में परिवर्तित करने वाले टूल से  लिखा  पहला पाठ भी यहीं आया। </p>
<p>हाथी को गुड़ का पहाड़ भी मिल जाये तो उसे परवाह नहीं होती पर चूहे को हल्दी की गांठ मिल जाये तो वह कहता है कि ‘मैं भी पंसारी, मैं भी पंसारी’-ऐसा व्यंग्य करने वाले कह सकते हैं पर जैसा मेरे मन में आता है वैसा ही लिखता हूं। मैं कभी आत्ममुग्ध नहीं होता इसलिये आत्मप्रचार का दुर्गुण भी मुझमें नहीं है। जो कहता हूं कर दिखाता हूं, जो नहीं कर सकता उसे स्वीकार कर लेता हूं। मैं कभी बड़ा ब्लाग लेखक या हिंदी भाषा का लेखक नहीं बन सकता यह मैंने प्रारंभ से ही स्वीकार किया है पर मेरी मौलिक रचनाओं का कथ्य चर्चा में रहेगा क्योंकि वह मेरे पसीने से सिंचित वृक्ष की तरह हैं। सत्य से परे मन के विचरण को मैं जिस तरह दृष्टा की तरह देखता हूं सरस्वती की कृपा के बिना वह संभव नहीं है शायद यही कारण है कि मेरे मित्र अधिक हैं। यही मित्र मुझे अपने प्यार और स्नेह भरे  शब्दों से और शक्तिशाली बना देते हैं। उनका सद्भाव मेरे लिये ऐसा पुरस्कार होता है जिसमें उत्तरोत्तर वृद्धि होती है।<br />
पच्चीस हजार की संख्या पार करने पर यह पाठ इसलिये लिख रहा हूं क्योंकि मुझे लग रहा है कि कुछ लोग विश्लेषणों में दिलचस्पी लेते हैं। शायद इसमें उनके लिये कुछ हो। वह मुझे महत्वहीन कहकर नकार सकते हैं, वह मेरे लिखे में दस मीन मेख निकाल सकते हैं पर मेरे पसीने से निकला सत्य के निकट लिखे गये पाठों की अनदेखी नहीं कर सकते । पच्चीस हजार का आंकड़ा पार करता हुआ यह ब्लाग मुझे एक ही संदेश देता है कि तुम तो बेपरवाह होकर लिखो और बाकी फैसले का काम अपने ब्लाग लेखक मित्रों और आम पाठकों के लिये छोड़ दो-जिन दिनों ब्लाग बनाने के लिये जूझ रहा था तब एक पत्रिका में एक लेख पर नजर पड़ी थी। उसमें भी यही संदेश था। अगर ब्लाग बना लिया है तो उस पर नियमित लिखो। इसलिये इन दोनों ब्लाग-शब्द पत्रिका और हिंदी पत्रिका-पर कभी कुछ ऐसा हल्का पाठ आ जाये तो उसे अनदेखा कर दें-मैं देर से सीखता और समझता हूं पर एक बार कोई बात दिमाग में घुस जाये तो फिर उस मार्ग से हटता भी नहीं हूं। अपनी कमियां मुझे साफ दिखाईं देतीं है पर उनसे मैं कुंठित हुए बिना अपने परिश्रम के सहारे अपने मार्ग पर बढ़ता हूं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
<strong>दीपक भारतदीप  </strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपने रास्ते स्वयं ही बनाओ-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/09/bot-his-own-way-hindi-poetry/</link>
<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 14:35:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/07/09/bot-his-own-way-hindi-poetry/</guid>
<description><![CDATA[एक दाढ़ी वाला बाबा आया और सर्वशक्तिमान का नाम लेकर अपने इर्दगिर्द भीड़ जुटाई फिर एक प्रेत की तस्वीर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>एक दाढ़ी वाला बाबा आया और<br />
सर्वशक्तिमान का नाम लेकर<br />
अपने इर्दगिर्द भीड़ जुटाई<br />
फिर एक प्रेत की तस्वीर  लोगों को  दिखाई<br />
और बोला<br />
‘यह बहुत खूंखार है<br />
इससे बचने के लिये<br />
तुम्हें मेरे बताये शब्द बोलने होंगे<br />
किसी भी तरह नहीं वह तोलने होंगे<br />
यह तुम्हें खा जायेगा<br />
पर मेरी झाड़फूंक से भाग जायेगा<br />
सब अपना सिर झुकाओ<br />
मेरे आसरे अपना जीवन बिताओ<br />
चंद रुपये जुटाकर<br />
यहां मेरे लिये एक जगह बनाओ’</p>
<p>वह जम गया वहीं और<br />
सर्वशक्तिमान के नाम पर व्यापार करने लगा<br />
समय करता था जो काम<br />
लिख जाता था उस पर उसका नाम<br />
ईमानदार बना रहा भले ही लोगों को ठगने लगा </p>
<p>उसके पास फिर एक और बाबा आया<br />
उसने भी अपना जाल बिछाया<br />
पर उसने किसी दूसरे प्रेत भय लोगों को दिखाया<br />
अपने लिये शानदार आशियाना बनाया<br />
चल रहा है सदियों से<br />
आदमी के जज्बातों का व्यापार<br />
प्रेत कभी धरती पर नहीं हुआ करते<br />
वह न पैदा हुए न मरते<br />
पर उनको हटाने के लिये<br />
पूरी दुनियां में नारों की तख्तियां लटकी है<br />
जहां इंसानों की अक्ल अटकी है</p>
<p>ओ! अक्लमंद इंसानों<br />
क्यों नहीं अपने सोच खुद बनाते<br />
क्यों फैसले लेने<br />
बहुरुपियों की दरबार जाते<br />
वाद और नारों तक ही सिमटा है जिनका दायरा<br />
भला क्या वह तुम्हें रास्ता दिखा पायेंगे<br />
तुम अपने रास्ते स्वयं ही बनाओ<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब सम्मान मिल जाये तभी कविताओं पर नाराज होना-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/06/19/samman-aur-narazi/</link>
<pubDate>Thu, 19 Jun 2008 16:49:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/06/19/samman-aur-narazi/</guid>
<description><![CDATA[अगर आप मुझसे पूछें कि ब्लाग क्यों लिखते हो?’ तो मेरा सीधा जवाब यही होगा कि मेरे पास मनोरंजन के अलावा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अगर आप मुझसे पूछें कि ब्लाग क्यों लिखते हो?’ तो मेरा सीधा जवाब यही होगा कि मेरे पास मनोरंजन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं है। जब भारत की क्र्रिकेट टीम पिछले साल विश्व कप में भाग लेने वेस्ट इंडीज गयी थी तो मैंने उसके छोटी टीमों से मैच न देखने का निर्णय केवल ब्लाग बनाने की वजह से लिया था। यह एक बहुत बड़ी कुर्बानी थी। उस समय मैंने सोचा कि ब्लाग पर मैच दर मैच जीतती जा रही बीसीसीआई की टीम पर लिख कर ब्लाग लिखने का मजा भी लेंगे पर ऐसा हुआ नहीं। हमने जिस दिन हमने ब्लाग पर पहली पोस्ट रखी उसी दिन हमारी पत्नी ने टीवी देखकर बताया कि अपनी टीम हार गयी है।  ब्लाग अभी संकट में ही लग रहा था और ऐसे में हमारे पास दुखी होने के अलावा कोई चारा नहीं था। </p>
<p>बहरहाल इधर क्रिकेट अपने मस्तिष्क से विदा हो रहा था और ब्लाग अपनी जगह बना रहा था। ब्लाग जब पढ़ने लायक बना तो हम संकट में पड़ गये कि इसके लिये पाठक कहां से लायें? नारद पर आने के बाद यह समस्या दूर हुई तो ब्लाग एक नशे की तरह चला आया। हमारा एक और नशा था दुनियां भर के समाचार सुनने का। टीवी चैनलों पर खबरें सुनते और उस पर अपना टिप्पणी जैसा  लिखने का प्रयास करते। इधर क्रिकेट फ्लाप हुआ तो सारे चैनल उसे बचाने में लग गये। हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई। दिक्कत यह आयी कि समाचार चैनलों से समाचार गायब होते चले गये और वही फिल्म और क्रिकेट सितारे वहां भी दिखाई देने लगे जिनको देखते हुए पहले ही बोर हो चुके थे। हालत यह होगयी कि टीवी चैनलों पर होने वाली प्रतियोगितायें भी समाचार चैनलों पर प्रमुख खबर बनने लगी। </p>
<p>जिन लोगों को समाचार सुनने का नशा होता है उनको कोई और बात रास नहीं आती। कोई समाचार सुना और फिर अपने सामने मौजूद व्यक्ति को जबरन अपनी टिप्पणी सुनाकर ही उनको चैन मिलता है। हम उससे अलग लिखकर अपना मन हल्का करते है। समाचार चैनलों के प्रबंधकों के लिये वही अब खबर होती है जो सनसनी फैलाने वाली हो जबकि यह आवश्यक नहीं है। समाचार सुनने वाले कहीं का भी पढ़ेंगे और सुनेंगे और सनसनी से उनको मतलब नहीं होता। देश हो या विदेश कहीं का भी समाचार हो उससे सुनने वाले लोगों को एक सुकून मिलता है। हम अपने परिवार के बुजुर्गों की तरह ही समाचार सुनने के नशे के आदी थे।  अब उनसे निराशा होने लगी तो क्या करता? अब मेरा सौभाग्य है कि मुझे यह ब्लाग लिखने का अवसर मिल गया और इसे मैंने अपनी पत्रिका बना डाला। जो मुझे पढ़ते हैं वह अपने भाग्य का फैसला स्वयं करें क्योंकि हो सकता है कि कुछ लोग बड़ी उम्मीद से मेरी पत्रिका को खोलते हों और कविता पढ़कर गुस्सा हो जाते हों। हां, याद आया क्रिकेट पर लिखी गयी एक हास्य कविता पर एक पाठक बहुत नाराज भी हुआ था। उस हास्य कविता को छहः सो लोग पढ़ चुके हैं और जब वह मुझे प्रतिकूल टिप्पणी याद आती है तो सोचता हूं कि उसे हटा दूं पर इतनी मेहनत से लिखी गयी कविता को नष्ट करना आसान नहीं है। </p>
<p>मेरी मुश्किल यह है कि जब मैं घर आता हूं तो घड़ी आधे घंटे पर-यानि साढ़े-केंद्रित होती है और जो भी चैनल खोलता हूंु उसमें आधा घंटा क्रिकेट और फिल्म पर लग जाता है। इतना सब्र मेरे पास नहीं है। तब तक तो मैं दो कवितायें लिखकर पोस्ट कर सकता हूं-यह अलग बात है कि अपने ब्लाग फोरमों पर दिखने के कारण संकोच होता है कि भाई लोग यहां भी आम पाठकों जैसी प्रतिकूल टिप्पणियां न करने लगें।  फिर समाचारों का प्रस्तुतीकरण इतना निष्प्रभावी होता है कि लगता है कि समाचार नहीं सुनाये जा रहे बल्कि आय के रूप में भुनाये जा रहे हैं। </p>
<p>अभी हाल ही में एक समाचार की बानगी देखें। समाचार चैनल घोषणा करता है कि ‘कातिल अब केवल तीन मिनट दूर‘। हमें बहुत उत्सुकता हुई। यह घोषणा समाचार शुरू होने के पंद्रह मिनट पहले ही हो रही थी। हमने सभी चैनल बदलकर देखा कि क्या इस प्रसिद्ध हो चुके हत्याकांड में कोई नयी जानकारी है क्या? सभी चैनल उस समय मनोरंजन के समाचार देने में व्यस्त थे। आखिर वह समय भी आया जब उस चैनल ने अपने समाचार शुरू किये। सब कुछ घिसापिटा मामला। जब यह पंक्तियां लिख रहा हूं तब तक असली अपराधी का पता ही नहीं है। उन तीन मिनटों के चक्कर में पैंतालीस मिनट बेकार गये। अगर समाचार चैनलों की माने तो भारतीय क्रिकेट और फिल्म आधी दुनियां है और शेष हिस्से में बाकी सब है।<br />
मेरी कवितायें वही लोग सराह सकते हैं जो मेरी तरह से ऐसे निराश हों कि उनको दिल बहलाने का कोई और ठिकाना नहीं मिलता हो।  वैसे जिस व्यक्ति ने मेरी क्रिकेट पर लिखी गयी हास्य कविता पर गुस्सा जताया था वह भी कहीं ऐसे ही त्रस्त रहा होगा वरना मेरी कविता पढ़ता ही क्यों? यह चैनल वाले जबरन अपने कार्यक्रम थोप रहे हैं और उसका भुगतान हम किसी न किसी रूप में करते ही है-चाहे वह डिस्क कनेक्शन का किराया हो या विज्ञापन वाली चीजें खरीदने के लिये दिया गया मूल्य जिसमें विज्ञापन का खर्चा भी शामिल होता है। उस पर लोग अपनी झल्लाहट निकाल नहीं सकते। हां, एक अनाम लेखक जिसका ब्लाग उपलब्ध है उसे तो कोसा ही जा सकता है-मन में आये तो सारा गुस्सा ही उस पर उतार दो।<br />
जैसे समाचार चैनल अपनी खबरें कम करते गये मैं ब्लाग@पत्रिकाओं पर अपनी कवितायें बढ़ाता गया। व्यंग्यकार होने की वजह से गुस्से को हास्य में बदलने का थोड़ा अभ्यास है इसलिये हास्य कविता लिखने में मजा आता है। सत्य यह है कि मैैने ब्लाग@पत्रिका लिखने से पहले बहुत लिखा है पर वह इतना नहीं है जितना यहां लिखा है। मैं कभी अपने जीवन में हास्य कविता लिखूंगा यह तो सोचा भी नहीं था पर प्रचार और प्रकाशन माध्यमों से उपजी निराशा ने मुझसे वह करवा लिया जिसकी संभावना कभी मुझे भी नहीं लगी थी।<br />
एक लेखक के पास अपने विचार होते हैं पर उनको जागृत करने के लिये बाहरी प्रेरणा मिलना भी जरूरी है। अभी तक मुझे यह प्रेरणा नवीनतम विषय के रूप में प्रचार और प्रकाशन माध्यमों से मिलती थी। अब भी पूरा अखबार चाट जाता हूं, टीवी देख लेता हूं पर मुझे अपने लिखने लायक कुछ नहीं मिलता। अरे, बड़ी कविता क्या, क्षणिका लिखने तक की सामग्री नहीं मिलती। अब लिखने की ललक लगी हो तो क्या करें? ऐसे में ब्लाग पढ़ते हुए अपने लिखने के लिये विषय जुटाता हूं। एक बात की तसल्ली है कि लिखने लायक खूब सामग्री मिल जाती है। लोगों के पाठ पढ़कर ही अपने लिये कविताओं और आलेखों की सामग्री जुटा रहा हूं। ऐसा नहीं है कि मै इसे छिपाता हूं। ब्लाग लेखकों के ब्लाग पर अपनी कविता भी लिख कर आता हूं कि मैं इसे अपने ब्लाग पर रखने वाला हूं। मतलब यह कि ब्लाग लेखक इतने व्यापक विषयों पर लिख रहे हैं। शायद यही कारण है कि कई व्यवसायिक संगठनों और उन पर आश्रितों को परेशानी है। क्योंकि स्वतंत्र लेखन का मतलब है कि व्यवस्था के किसी तंत्र का शासन नहीं स्वीकार करना और यही यथास्थितिवादियों के लिये चिंता की बात है। </p>
<p>कल को कहीं मुझे सम्मान मिल गया तो बरसों पुराने बुद्धिजीवी क्या करेंगे? वैसे यकीन करिये कि कई ऐसे लेखक सम्मानित हो चुके हैं जिनकी कोई रचना मैंने नहीं पढ़ी।  समस्या दूसरी भी आने वाली है। नाम होगा कि बदनाम होंगे यह एक अलग विचार का विषय है पर ऐसा भी हो सकता है कि सम्मान वगैरह देकर कोई लोग प्रचार पाना चाहें ऐसे में उन लोगों का क्या होगा जो अपनी रचनााओं का बोझ उठायें बरसों से इस कतार में खड़े हैं।<br />
मुद्दे की बात यह है कि हास्य कवितायें लिखना मेरी मजबूरी है। अब कहीं कोई मेरे पढ़ने लायक कोई हास्य या व्यंग्य प्रस्तुत नहीं कर रहा तो सोचता हूं कि चलो अपना ही लिखकर आनंद ले लो। हां, याद आया कि अब इस हिंदी ब्लाग जगत में  भी बहुत सारे अच्छे व्यंग्य पढ़ने को मिल रहे हैं। ऐसे में मुझे चिढ़ आ जाती है कि मैं क्यों वैसा नहीं लिख पा रहा। इसलिये भी हास्य व्यंग्य जबरन लिखने का प्रयास करता हूं। सोचने की बात है कि दिन में दो व्यंग्य पढ़ लिये तो फिर मैं क्या करुं? मेरे दिमाग में फिर कीड़ा कुलबुलाने लगता है कि कुछ लिखो। </p>
<p>ऐसे में मेरी हास्य कविताओं से नाखुश लोगों को सलाह है कि वह झेल जायें तो कितना अच्छा है? मैं भी कितना झेल रहा हूं यह बता दिया। अगर सारी व्यवस्था मेरे हिसाब से ठीक हो जाये तो ही वह मेरी हास्य कविताओं से बच सकते हैं।  अगर टीवी चैनलों पर समाचार ठीकठाक आते हों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में ढंग का पढ़ने को मिल जाये तो मैं क्यों अपने विषयों के दूसरे ब्लाग लेखकों के पाठों की खाक छानता फिरुं? एक बात और हिंदी भाषा में जितने भी मशहूर उपन्यास और कहानियां संकलन हैं मैं पढ़ चुका हूं। मेरा पसंदीदा उपन्यास है अन्नपूर्णादेवी का ‘स्वर्णलता’।<br />
एक बात और अपनी हास्य कविताओं के पाठकों की संख्या देखने में भी मुझे संकोच होता है क्योंकि मुझे स्वयं भी अटपटा लगता है। हां गद्य रचनाओं में अवश्य दिलचस्पी लेता हूं।  जब मैं इतना एडजस्ट करता हूं तो पाठक मुझे इतना भी नहीं कर सकते।  क्या वह यह जानकर संतुष्ट नहीं होंगे कि मुझे इन हास्य कविताओं की वजह से कोई सम्मान नहीं मिलने वाला। जब मिल जाये तभी आपत्ति उठायें तो ठीक रहेगा। अभी तो भाई में भी आम आदमी की तरह घूमता हूं।  अभी पिछली एक रेल यात्रा में सामान्य टिकिट लेकर आरक्षण वाली बोगी में चढ़ गया और उसकी वजह से जो मुझे झेलना पड़ा। उसकी व्यथा में जब लिखूंगा तो आंखोंपानी आ जायेगा। उस पर मैंने कोई हास्य कविता नहीं लिखी क्या यही कम है। शेष फिर कभी</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिनकी चर्चा सरेआम हो गयी-कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/06/09/hindi-poem-3/</link>
<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 15:23:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/06/09/hindi-poem-3/</guid>
<description><![CDATA[14 बरस की वह लड़की रात को बिस्तर पर सोई थी सुबह एक लाश हो गयी सवाल उठते हैं ढेर सारे मिलता नहीं कोई ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong> 14 बरस की वह लड़की<br />
रात को बिस्तर पर सोई थी<br />
सुबह एक लाश हो गयी<br />
सवाल उठते हैं ढेर सारे<br />
मिलता नहीं कोई जवाब<br />
पिता पर लगा है आरोप<br />
पर मां क्यों खामोश हो गयी</p>
<p>एक पुरुष के अत्याचार  की शिकार बच्ची<br />
हैरान है परेशान है<br />
एक बच्ची आती है उसके जिस्म में<br />
अपने जीवन की सांस ढूंढती हुई<br />
पर नानी इंतजार में थी शायद<br />
भले ही अनैतिक होगा<br />
लड़का हुआ तो अपना ही होगा<br />
पर कोख से बाहर निकलते ही<br />
नानी ने मचाया बवाल<br />
बच्ची का गला घोंट दिया<br />
जन्म लेते ही जननी ने<br />
जेल ही उसकी आरामगाह हो गयी </p>
<p>हजारों खबरे हैं ऐसीं हैं<br />
तब सोचता हूं क्यों लाचार हो जाती है औरत<br />
क्यों औरत को ही बेबस बनाती औरत<br />
आदमी के अनाचारों के हजारों किस्से हैं<br />
पर औरत खुद भी क्यों बदनाम हो गयी</p>
<p>मां की ममता<br />
बहिन का स्नेह<br />
पत्नी का प्रेम<br />
आदमी की होता है मन की पूंजी<br />
कितने बदनसीब होते हैं<br />
जो इससे वंचित हो जाते हैं<br />
और फिर कहानी में जगह पाते हैं<br />
जिनकी चर्चा सरेआम हो गयी<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उनका नाम ही दरियादिल हो जाता-कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/09/%e0%a4%89%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Fri, 09 May 2008 16:16:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/09/%e0%a4%89%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[अपने दिल का बयां कभी कभी दूसरे के अल्फाजों में नजर आता है वह दिल को छू जाता है इसलिए कहते हैं दर्द औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अपने दिल का बयां कभी कभी</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">दूसरे के अल्फाजों में नजर आता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">वह दिल को छू जाता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">इसलिए कहते हैं </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">दर्द और खुशी दोनो ही</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">बांट लिया करो दोस्तों से<br />
 <br />
जश्न का मौका हो तो </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">मजा हो जाता दुगुना </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">गम आधा रह जाता है </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">खोये रहोगे अपने ही दिल में </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">तो रोशनी कहीं से नहीं आयेगी</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">जो सुनोगे किसी और की आवाज </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">तभी कोई मिलेगा आसरा </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">वरना कहते हैं कि </span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ पाता है</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">अपने लिये तो जिंदा हैं सब</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">बांटकर खाते हैं जो लोगों से मिलकर</span></h3>
<h3 style="padding-left:60px;text-align:left;"><span style="color:#003300;">उनका नाम ही दरियादिल हो जाता है<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
</span></h3>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दर्द की बजाय  लिखना  पसंद है संघर्ष पर]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/06/%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Tue, 06 May 2008 15:18:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/06/%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</guid>
<description><![CDATA[अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ यह कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि मै किसी उच्च मध्यम परिवार से ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अंतर्र्जाल पर मैं लिखता हूं इसका अर्थ यह कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि मै किसी उच्च मध्यम परिवार से हूं। सत्य तो यह है कि मेरा जन्म निम्न मध्यम वर्ग में हुआ और बोर्ड की परीक्षा के बाद भी मैंने मजदूरी की और ठेला चलाया। जिस दुकान पर मैं नौकरी  करता था वह थोक की दुकान थी और सामान दूसरी दुकान पर पहुंचाने  के लिये मुझे कई बार ठेला चलाना पड़ता था। यह बात मैने अपने पिताजी से भी छिपाई थी। कई बार मेरे पैरों में कीलें घुसकर खून निकाल चुकीं हैं। अपने उस नौकरी के दौरान भी दोपहर जब मैं घर पर आता था तो लिखता था-उसमें कोई पीड़ा नहीं बल्कि जीवन के प्रति आशावाद होता था। आज नहीं तो कल मेरा होगा-यह विश्वास मेरे जीवन की अनमोल पूंजी रहा है।  </p>
<p>मैं आजकल आपने काम पर स्कूटर पर जाता हूं पर मेरा साइकिल से अभी भी नाता हैं। मेरा काम भी अब शारीरिक श्रम करने का नहीं है पर फिर मैं उसमें कोई अपनी तरफ से नहीं रखता। शारीरिक श्रम करने वाले  को बेचारा या गरीब कहना शायद  कुछ लोगों को सहज लगता है पर मुझे नहीं। इसलिये जो लोग गरीब के दर्द पर कहानियां या कविताएं लिखकर वाह’-वाह जुटाते हैं उनमें मेरी रुचि नहीं रही। इस देश में परिश्रम करने वालों की कमी नहीं है पर वह भी ऐसे दर्द भरी रचनाओं को पसंद नहीं करते। हां, एसी कमरों तथा होटलों के भोजन करने वालों को एकांत में बैठकर उनके हृदय में ऐसी संवेदनशील रचनाएं दर्द का रस पैदा करतीं हैं तो वह खुश हो जाते हैं।  दर्द भी एक रस है और जिनके पास सब कुछ है पर दर्द नहीं है वह इस रस से वंचित रहते हैं और इसी कारण उनको गरीबों के दर्द पर बनीं फिल्में और रचनाएं पसंद आती हैं। हमारे देश के कुछ विख्यात फिल्मकार और लेखक इसी दर्द के सहारे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुके हैं पर उनको यहां कोई पूछता भी नहीं था। हां, जब उनको इस देश से बाहर ख्याति मिली तो यहां भी उनको पुरस्कारों प्रदान किये गये पर आम आदमी भावनात्मक रूप से कभी उनसे नहीं जुड़ा।</p>
<p>मैने एक मजदूर के रूप में देखा है मुझे रोटी या सहानुभूति की नहीं सम्मान और प्यार की आवश्यकता  होती है और ऐसे में और लोगों की बात क्या करें  अपने भी पीछे हट जाते हैं।  अपने जीवन में हर चीज अपने परिश्रम से बनाते हुए मैंने एक बात देखी है कि गरीब और मजदूर के दर्द और भावनाओं पर कुछ लोग व्यापार करते हैं। भले ही उनको पैसा अधिक नहीं मिलता पर सम्मान और नाम उन्होंने खूब कमाया। किसी गरीब मजदूर के बीमार होने पर उस पर कुछ असली तो कुछ नकली कथा लिखकर लोगों को दर्द का रस बेचा।<br />
मैं अपनी कविताओं और कविताओं के हमेशा संघर्ष के भाव इसलिये स्थापित कर पाता हूं क्योंकि मेरा यह अनुभव रहा है कि परिश्रम करने से आत्मविश्वास बढ़ता है। इस देश में गरीब और मजदूर के कल्याण के नारे लगाने वाले बुद्धिजीवियों का लंबे समय तक वर्चस्व रहा है और उन्होंने शैक्षणिक तथा सामाजिक संस्थानों इस तरह घुसपैठ कर ली कि उनके ढांचे से बने समाज में लोग आज भी दर्द  के रस में प्रफुल्लित  होना चाहते हैं-उनमें आत्मविश्वास की कमी है क्योंकि वह परिश्रम नहीं करते और इसलिये दर्द का रस उनमे पैदा ही नहीं होता। जिनके पास धन की कमी है उन्हें जीवित रहने के लिये संघर्ष करना पड़ता है और बीमारी और अन्य सामाजिक संकटों में भी उसे कोई संवेदना न तो कोई देता है न वह चाहता है। वह थोड़ा सम्मान और प्रेम चाहता है और वह कोई नहीं देता। </p>
<p>मेरी पत्नी कई बार ठेला वालों से सामान खरीदते समय मोलभाव करती है तो मैं उसे मना करते हुए कहता हूं कि-‘यह मेहनत कर रहा है तो समाज पर उसे उपकार ही समझो क्योंकि अगर वह ऐसा न करता तो पेट पालने के लिये अपराध भी कर सकता है।’</p>
<p>यह मेरे अंदर मौजूद कोई दर्द नहीं है बल्कि यह अपने जीवन संघर्ष के अनुभव से मिला  एक यथार्थ है। अपने जीवन के संघर्ष में मैंने इस बात का अनुभव किया है कि अधिकतर लोग परिश्रम इसलिये करते हैं कि उनका सम्मान किसी के पैरो के तले कुचला न जाये। मैं यह दावा भी नहीं करता कि मैं परिश्रम करने वालों के प्रति मै बहुत संवेदनशील  हैं क्योंकि इसका अर्थ यह है कि उनके श्रम को कम कर  देखना।<br />
मै आजकल इतना शारीरिक श्रम नहीं करता। जब मैं जमकर शारीरिक श्रम करता था तब भी मै हास्य व्यंग्य लिखता था और जब भी कभी पसीना नहा जाता  हूं तब भी मुझे वैसा ही लिखने में मजा आता है। इसलिये जिन लेखकों को यह भ्रम हो कि वह दर्द पर लिखकर लोकप्रियता अर्जित करेंगे उन्हें इस भ्रम का निवारण कर लेना चाहिए। इस देश के परिश्रम करने वाला भी वैसा ही अच्छा पढ़ना चाहता है जैसा कभी कभी कुर्सियों पर काम करने वाले लोग-जो दर्द की फिल्म देखकर या रचना पढ़कर उसके रस से प्रफुल्लित  हो जाते है-कभी पढ़ने को इच्छुक होते हैं। इसलिये मुझे दर्द की बजाय संघर्ष पर लिखना पसंद है। </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अच्छा हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/05/04/%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 10:08:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[श्रीमतीजी ने रात को पूछा-‘‘क्या खाना खाओगे?’’ हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>श्रीमतीजी ने रात को पूछा-‘‘क्या खाना खाओगे?’’<br />
हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले आओ तो उसके साथ एक छोटा टोस्ट खाकर सो जायेंगे। वैसे तुमने यह पूछा क्यों?’<br />
कहने लगीं-‘तुम अभी कुछ खाने पर लिख रहे थे। मैने देखा तो सोचा कि शायद तुम्हें भूख लग जाये। जब रात को खाना नहीं खाते तो उस पर लिखते क्यों हो?’<br />
मैने कहा-‘अपने लिये तो लिखते नहीं है जो यह सोचें। पढ़ने वाले तो रात को खाते होंगे न! फिर कितनी गंभीर बात है कि अपने देश के लोगों पर अधिक खाने का आरोप लग रहा है तो यह समझाना जरूरी है कि ऐसी कोई बात नहीं है।’<br />
हमारी श्रीमती जी बोली-‘‘लगाने वाला भी तुम जैसा कोई आदमी रहा होगा। सारी दुनियां से कहते हो कि एक समय खाना खाता हूं पर तुम रात को घर आते ही चाय के साथ  दो से चार बिस्कुट  खाते हो और रात को दूध के कप के साथ एक दो टोस्ट उदरस्थ कर जाते हो। यह खाना नहीं तो और क्या है? और लोगों से कहते हो कि एक समय खाता हूं।’</p>
<p>हमने कहा-‘‘तो क्या लोगों का बताता फिरूं कि मैं यह खाता हूं और वह खाता हूं। यह तो तय बात है कि रात को हमारे घर पर खाना नहीं बनता।’’</p>
<p>हमारी श्रीमती जी चुप हो गयीं। सुबह ही एक सज्जन आये और बोले-‘‘देखो यार, अपने देश के  बाहर के लोग क्या कह रहे हैं  भारत के लोग अधिक खाते हैं इसलिये दुनियां में खाद्यान्न का संकट है। अब बताओ, इस देश के लोग गरीब थे तो झंडे और डंडे लेकर इस देश पर विचाराधाराओं के साथ हमला करते थे। सरकारीकरण खत्म करो उदारीकरण चलो। अब कह रहे हैं कि अधिक खाते हैं। अब क्या रोटी भी पेट भरकर  नहीं खायें?’</p>
<p>हमने कहा-‘‘भरपेट तो खाना नहीं चाहिए। जरूरत से एक रोटी कम खाना चाहिए।<br />
वह सज्जन बोले-‘‘यार तुम जैसा तो कोई हो नहीं सकता कि एक समय खाना खाये।’<br />
हमने कहा-‘‘हम आजकल शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं इसलिये कम खाते हैं।<br />
हमारी श्रीमती उनसे परिचित थीं और उनसे बोलीं-‘‘कहां एक समय खाते हैं? रात को आते ही चाय के साथ बिस्किट और रात को दूध के कप के साथ टोस्ट जरूर खाते हैं। वह क्या खाने से कम है?’</p>
<p>हमने सोचा झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है और हमने कहा-‘हम कम कहते हैं कि नहीं लेते?’<br />
वह सज्जन बोले-‘यह तो हम भी करते है पर फिर भी खाना खाते हैं। खाने के बाद दूध का ग्लास जरूर लेते हैं। हा, उसके साथ टोस्ट वगैरह नहीं लेते। भाभीजी, आप क्या समझ रही हो कि केवल आप लोग ही दूध पीते हैं। खाने के बाद हम दूध न पियें तो नींद ही नहीं आये।’<br />
हमने कहा-‘पर आप खाने को लेकर इतने परेशान क्यों हो रहे हैं? आपके लड़के की शादी में आयेंगे तो जरूर हम भी जमकर खायेंगे जैसे दूसरे। ऐसी कोई कसम नहीं खा रखी कि रात को कभी नहीं खायेंगे। हां, जबसे योग साधना शूरू की है तब से रात को खाने की चिंता से मुक्त हो गये हैं पर आपको कभी यह नहीं कहेंगे कि रात का भोजन लेना छोड़ दें। कहने वाला कुछ भी कहता रहे।’</p>
<p>वह बोले-‘मुद्दे की बात यह है कि क्या वाकई हम बहुत खाते हैं?’<br />
हमने कहा-‘‘अधिक मत सोचो? पहले ही तुम मधुमेह की शिकायत करते हो  और उसमें फायदा उन कंपनियों का ही होगा जो बाहर की हैं क्योंकि उनकी गोलियों से ही तुम खाना पचा पाते हो। हो सकता है कि योग साधना के प्रचार से  अब स्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही हो और उन पर ‘अधिक खाने’ के शगूफे से तनाव बढ़ाकर फिर उनको बीमार बनाया जाये यही इसके पीछे यही चाल हो सकती है।<br />
वह सज्जन बोले-‘‘पर तुमने यह अभी तक नहीं बताया कि क्या हम भारतीय अधिक खाते हैं?’<br />
हमने कहा-‘‘इस देश में एक सौ पांच करोड़ लोग रहते हैं। कहीं लोग गेंहूं अधिक खाते हैं तो कही चावल तो कहीं कुछ और। किसी के पास कोई पैमाना नहीं है। घर में चार एक आयु वर्ग के चार सदस्य होते हैं पर उनके खाने की मात्रा अलग-अलग होती है। अब कैसे कहें कि इस देश के लोग अधिक खाते हैं या कम।’<br />
वह सज्जल बोले-‘हम तो पिछले दस साल से देख रहे हैं कि अपने घर में जितना गेंहूं आता है उससे अधिक कभी लेते नहीं है। बल्कि बाहर के खाने से उसकी खपत कम होती जा रही है। छोटे बच्चे तो तमाम तरह की चिप्स वगैरह खाकर पेट भरते हैं, पीजा, बर्गर और पैट्रीज खाकर पेट भरेंगे तो फिर घर में कहां खायेंगे?’<br />
हमने कहा-‘फिर बाहर खाने से दूसरे लोगों को खाते दिखते हैं। पैसे की आवाजाही सड़क पर होने से बाहर के लोगों को दिख रही हैं इसलिये ऐसी बातें कर रहे हैं। उनको बाजार में खाने के स्थानों पर लोगों की भीड़ और पैसे का बहाव देखकर ऐसा  लगता है कि यह देश बहुत खाता है।’<br />
वह सज्जन चिंता में पड़े रहे तो आखिर हमारी श्रीमती जी ने कहा-‘भाई साहब, इतनी चिंता में आप पड़े क्यों हैं? इस देश के लोग खाते हैं तो किसी से छीनकर थोड़े ही खाते हैं। किसी के खाने में नजर तो नहीं डालते। किसी को सुखी देखकर उससे छीनते तो नहीं हैं? किसी के घर पर जाकर लूटपाट तो नहीं करते। आप यह बताईये हम आपके घर रात के खाने पर कब आयें? आप तो भाभीजी और बच्चों को लेकर कभी खाने पर लेकर  आते ही नहीं।’<br />
 <br />
वह सज्जन बोले-‘आप कमाल कर रही हो? इतनी बहस हो गयी खाने पर और आप फिर खाने की बात  लेकर बैठ गयीं। कभी आयेंगे चाय पीने पर आप खाने के जबरदस्ती करतीं हैं इसीलिये नहीं हम परिवार सहित आपके घर नहीं आते। हां, आप एक बार खाने पर आयें तो फिर सोचेंगे।’<br />
फिर हमने बातचीत का विषय बदला और वह चले गये तो श्रीमतीजी ने कहा-‘‘पर यह कहा किसने है कि भारत के लोग खाते अधिक हैं?’</p>
<p>हमने कहा-‘‘हमें पता है पर तुम जानने की कोशिश कर अपनी चिंता क्यों बढ़ा रही हो। अधिक चिंता शरीर को हानि पहुंचाती है।’<br />
वह बाहर जाते हुए बोलीं-हां यह तो बात है। वैसे आज अखबार में ऐसा कोई ऐसा शीर्षक तो देखा था पर खबर पूरी नहीं पढ़ी। अच्छा हुआ नहीं पढ़ी। बिना मतलब की खबर पढ़ने से क्या फायदा?’</p>
<blockquote><p><strong>The comic satire on </strong><a href="http://rajdpk1.wordpress.com"><strong>http://rajdpk1.wordpress.com</strong></a><strong> to be read in English</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[ब्लोग लिखते हुए उठने लगते हैं कई संशय-आलेख ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/04/02/blog-likhte-hue-uthte-hain-kaee-savaal/</link>
<pubDate>Wed, 02 Apr 2008 15:26:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मैं यह पोस्ट पहले भी लिखना चाहता था पर रोमन लिपि में हिंदी लिखना इतना कठिन लगता कि मेरी मनस्थिति ही ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>     मैं यह पोस्ट पहले भी लिखना चाहता था पर रोमन लिपि में हिंदी लिखना इतना कठिन लगता कि मेरी मनस्थिति ही नहीं बन पायी। अभी तक लिखते हुए मैं यह समझ नहीं पाता कि आखिर मैं कहां खड़ा हूं। कई तरह के संशय मेरे में आते हैं। संशय का कारण यह है कि मेरे ब्लागस्पाट और वर्डप्रेस दोनो पर ही बहुत सारे ब्लाग है और इन पर अपने विचारानुसार मैं लिखता हूं। जब वर्डप्रेस के ब्लागों पर पाठको की संख्या देखता हूं तो ऐसा लगता है कि वाकई लोग मुझे बहुत पढ़ते हैं पर जब ब्लागस्पाट के ब्लाग की पाठक संख्या देखता हूं तो लगता है कि मैं तो घनघोर फ्लॉप  श्रेणी का ब्लागर हूं। वर्डप्रेस के ब्लाग पर भले ही कोई पोस्ट न डालूं पर वह चलते दिखते हैं जबकि ब्लागस्पाट के ब्लाग तभी चलते दिखते हैं जब उन पर कोई पोस्ट लिखता हूं। नहीं लिखता तो  वहां सभी ब्लाग  पर लोग इतने नहीं आते जितना वर्डप्रेस पर आते हैं।</p>
<p>ब्लागर मित्रों के कहने पर मैने स्टेट काउंटर लगाया था। मैं दावे से उसके प्रदर्शन पर कुछ नहीं कह सकता। वह वर्डप्रेस के ब्लाग के उतने पाठक नहीं दिखाता जितने डेशबोर्ड पर होते है।  ऐसे में किसे सच माना जाये? क्या यह काउंटर कम संख्या दिखाता है? अगर इस काउंटर को सही माना जाये तो मुझे लिखना अब बंद कर देना चाहिये। क्या कहीं से ऐसे भी पाठक आते हैं जिनकी पकड़ यह काउंटर नहीं करता। </p>
<p>कई और संशय भी हैं। ब्लागस्पाट पर उसी दिन कमेंट आती है जिस दिन लिखी जाती है पर वर्डप्रेस पर बहुत बाद में भी कमेंट आते हैं।  क्या कोई ऐसे सहदय सज्जन भी हैं जो मुझे लिखने के लिये प्रेरित कर रहे हैं? इस सोच के पीछे कारण यह भी है कि मुझे ऐसा लगता है कि ब्लागरों में कुछ मुझे बहुत चाहते हैं और वह छद्म नाम से मेरे को कमेंट देते हैं। ऐसा लगता है कि ब्लाग पर लिखने वालों की संख्या कम होते देख कुछ ब्लागर छद्म नाम से ब्लाग बनाकर नियमित रूप से लिखने वाले ब्लागरों को प्रोत्साहित करने के लिये न केवल छद्म नाम के ब्लाग बना रहे हैं बल्कि नयापन पैदा करने के लिये कमेंट भी लगा रहे हैं।  </p>
<p>कभी-कभी तो हंस पड़ता हूं क्योंकि कमेंट ऐसे होते हैं। कल ही एक सज्जन ने अपना और अपनी दोस्त को नाम देकर विवाह करने के संबंध में सलाह मांगी है। मैं जवाब देता पर मुझे लगा कि वह छद्म नाम से कोई वरिष्ठ ब्लागर भी हो सकता है जो मेरा मन लगाये रखना चाहता है। एक अन्य सज्जन हैं उन्होंने मुझे कई कमेंट दिये और फिर एक दिन मैंने देखा कि वह  अपना नाम सर्च में डालकर मेरे ब्लाग पर आ रहे हैं। मैने भी उनका नाम सर्च में डालकर देखा तो पाया कि मेरे सहित दो अन्य ब्लागरों के ब्लाग भी उनके नाम पर चढ़ चुके हैं।  मुझे ऐसा लगा कि मैं ब्लागर लिखने वाला क्लर्क हूं और वह कमेंट लिखने वाले अधिकारी। एक तरह से देखा जाये तो आप कोई पोस्ट नहीं लिखें पर कमेंट लिखते रहें तो वह पोस्ट  आपके नाम पर चढ़ जायेगी। इसका मतलब यह है कि जो ब्लागर पोस्ट कम और कमेंट अधिक लिख रहे हैं, उनको तो अफसर ही कहा जायेगा। आप प्राइवेट संस्थान में जाईये या सरकारी संस्थान में अफसर लिखते कम हैं हस्ताक्षर अधिक करते हैं।  मुझे लगता है कि वह सज्जन कहीं किसी संस्थान में अधिकारी रहे होंगे जो उन्होंने यह तरीका अख्तियार किया होगा कि कमेंट लिखते जाओं फिर लोगों को अपने नाम सर्च इंजिन में डालकर बताओ देखो मेरा नाम अंतर्जाल पर दिख रहा है और यह देखो धुरंधर ब्लागर मेरे अंडर में हैं।<br />
एक बात है कि वह सज्जन अपनी कमेंट कोई ऐसी वैसी नही लगाते बल्कि उसके लिये उतनी मेहनत करते हैं जितनी पोस्ट लिखने में होती है। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है यह जिक्र तो मैने यह बताने के लिये किया कि किस तरह नये अनुभव हो रहे हैं। इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि मैं उनसे बहुत प्रभावित हूं। बस कभी कभी ऐसा लगता है कि कोई मित्र ब्लागर है जो इस तरह अपना और मेरा मन भी लगा रहा है। वह पिछले कई दिनों के अपने नाम को सर्च इंजिन में डालकर मेरे ब्लाग पर आते हैं और बराबर कमेंट गंभीरता पूर्वक लिखते हैं और इसलिये बहुत सतर्कता से लिख रहा हूं। वैसे अब सभी  पोस्ट कृतिदेव में लिख रहा हूं इसलिये बेफिक्र होकर लिख रहा हूं क्योंकि अब  सहज भाव से लिख सकता हूं और कहीं एक भी शब्द लड़खड़ाने वाला नहीं है। अभी तक उन्होंने जो कमेंट दी और मेरे लिखे पर कई सवाल उठाये वह मैने शूरू में ही यूनिकोड में लिखे थे-यह बात मैने उनको बता दी थी। इा बीच  यह अच्छा ही हुआ कि कृतिदेव को यूनिकोड में परिवर्तित करने वाला टूल आ गया तो अब इतनी चिंता नहीं हो रही। वरना उनकी वजह से लिखना कम करने वाला था। </p>
<p>ऐसे कई संशय मेरे मन में उठते हैं पर इसका निराकरण मैं नहीं कर पाता क्यांकि मुझे  लगता है कि अभी मुझे बहुत कुछ समझना भी होगा।<br />
यह पाना अब भी कठिन है की हम अपने ब्लोग को लेकर कहाँ खडे हैं? हिट हैं कि फ्लॉप? </p>
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