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'सफाई की सफाई, खुश्बू की खुश्बू'

 ‘सफाई की सफाई, खुश्बू की खुश्बू’

िकसी अौर को बताया नहीं

बात ही कुछ ऐसी है

मगर अापसे कैसी शर्म

दरसल दीदी को परसों से दस्तें लग गई

वो तो कुछ बोली नहीं

मां ने खांसते हुए मुझसे कहा

काम से लौट के सीधा घर अाअो

अौर दीदी को अस्पताल ले के जाअो

मैंने ठीक वैसा ही िकया।

 

डेढ़ घंटा वेिटंग के बाद हमारी चांस अाई

दीदी को बहुत प्यार करता है ये लाचार भाई

डाक साहब ने तुरंत जांच पडताल की

अौर एक ही सेकंड में पर्ची भर दी

कहा िचंता की बात नहीं है

खाने-पीने में कुछ गडबड अा गया होगा

फ्रूट्स खाया करो

हफ्ते भर की दवा िलखी है

एक टाइम सुबह कुछ खाने कि बाद

एक टाइम रात के खाने के बाद

फीस बाहर रिसेप्शन पे देदो

मैं गरीब फीस तो चुकाई

दवा दो ही दिन की ला पाया

दीदी ने डकारते हए कहा,

कभी देखा है मुझे फ्रूट्स खाते हुए?

अब फल तो खरीद नहीं पाया

मैंने दीदी का झूठ खरीद िलया

 

सुबह-सुबह उठ कर मैंने अक्ल को दौडाया

अौर एक कनस्तर ज्यादा पानी भर लाया

लगता है पानी की हर बूंद काम अाई

डिब्बा हाथ में िलये

दीदी ने िदन भर दौड लगाई

िफर जा के कल शाम दीदी ने कहा,

िक अब तबियत कुछ ठीक है।

चलो भगवान का शुक्र है

मैंने िदन बर का पसीना धोते हुए सोचा

पर काश मैंने ज़रा पानी गर छोडा होता।

 

िफर अाज सुबह लगभग चार बजे

खट-पट की अावाज़ में उठा

दीदी कुछ बोली नहीं

शर्म अौर जल्दबाजी में उनकी

अािखरी पानी का िडब्बा छूटा

छूटा तो छूटा

साला घटिया प्लास्टिक

एक बार में फूटा

अब मैं क्या करता

दीदी साडी उठा नाले की अोर भागी

अौर नाला डेढ़ िकलोमीटर दूर

रास्ते में ही पेटीकोट भर िदया होगा

िफर शर्म के मारे चली होगी

चुप-चाप अौर लाचार

नाले तक अौर वापस

जब लौटी तो िकसी को कुछ नहीं बोली

अौर सीधा गुसलखानें में जा पर्दा लगा िदया

मैंने तो बदबू से वािकया जाना

िफर भी अब क्या कर पाता

मैंने सोचा साढे छह बजे तो बंगले पे जाएगी

िफर कोई प्रोबलम नहीं

मेडम से नजरें बचा वहीं िनबट अाएगी

 

उफ्फ

 

बेरोज़गार हूं पर िहन्दी सािहत्य में बी ए किया है

इस दुविधा में भी काव्य नजर अाया

अब तक सिर्फ भूिमका थी

कविता अब कहता हूं

 

यहां हगने को संडास,

गांड धोने को पानी हो ना हो

उनके बगीचे में िसंचाई रोज़ होगी

रोज़ िखलेंगे गुलाब

अौर सजाए जाएंगे

डायिनंग टेबल मे रखे फ्लावर वास में

अौर चढाए जाएंगे

ड्राइंग रूम में लटके गांधी पर

ये कविता नहीं कर पाता

अगर उस रात उनकी पार्टी में बैरा ना होता

शराब पी रहे थे वो

िफर हंसे अौर बगल वाले सेठ को ताली दी

िफर एक भद्दा सा इशारा िकया

अौर कहा िक ना जाने ये अंग्रेज कागज कैसे रगड लेते हैं

अपने तो जब तक पानी ना लगे मन नहीं भरता

अगर पोंछना ही है

तो गुलाब से पोंछो

सफाई की सफाई,

खुश्बू की खुश्बू।

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1982-83

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