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Being Kind to Myself—Through Yoga

A Year of Being Kind blog – Thursday, December 11, 2014

Being Kind to Myself—Through Yoga

It has been a busy week. Rushing to and fro, getting ready, hustle bustle. 374 more words

Are You Judging Yourself? Find Self Acceptance

Self Acceptance by a Coach

In a world full opposites we seem to have trouble finding our own self acceptance. I was in the last couple of minutes with a coaching call and my client said she realized why she spent her life comparing herself to others. 321 more words

Self Esteem

Monotheism and Spirituality are two different things

My Master says Buddha himself was not a Buddhist, nor was Christ a Christian, and so on. This needs to be reflected upon well by all. 129 more words

Spiritual Perspective

Destiny is no third party! 

Destiny is no third party! It is the steam of our own unconsumed and unworked out past in the form of subtle and intense thought waves of unrequited desires returning to us again to get solidified and shaped up as we had once wished them to be in the deep layers of our  astral, mental, and super mental selves and as has been best possible in a sea of a plethora of similar aspiring minds swimming in the ocean of divine creation! 108 more words

Spiritual Perspective

मूर्तिपूजा क्या है?

मालिक ने स्पष्ट कहा है कि “सिर्फ मूर्तिओं की उपासना ही मूर्तिपूजा नहीं है. यदि कोई व्यक्ति अपनी आदतों का गुलाम है तो वो भी मूर्तिपूजक ही है”. उन्होंने यहाँ तक कहा है कि “उन चीज़ों के अस्तित्व में विश्वास जो वस्तुतः अस्तित्व में नहीं है, भी मूर्तिपूजा है. यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार, बच्चों, इत्यादि से (आसक्त होकर) प्यार करता है तो वह भी मूर्तिपूजा ही है. सारांशतः, किसी भी भौतिक वस्तु में आसक्ति मूर्तिपूजा है”.

इसका दूसरा पहलू ये भी है कि यदि किसी मूर्ति अथवा प्रतीक की भी पूजा सार्वभौम, ब्रह्मस्वरुप अकायिक अमूर्त ईश्वर को ध्यान में रख के की जाए तो वो मूर्तिपूजा नहीं है. यदि आप अपने पिता की अनुपस्थिति में उनकी तस्वीर को देखकर उन्हें याद कर रहें हैं तो वस्तुतः आप अपने पिता को याद कर रहे है न कि उनकी तस्वीर की उपासना. इसके विपरीत यदि पिता प्रत्यक्ष हों और हम उनकी अवहेलना कर सिर्फ उनकी तस्वीर को अपनी श्रद्धा का विषय बनाएं तो वह एक अत्यंत मूढ़ किस्म की मूर्तिपूजा होगी. हमारा जीवन ऐसे उदाहरणों से भरा है जहां वृद्ध माता-पिता जब जीवित होते हैं तो उनकी कोई कद्र नहीं होती और जब स्वर्ग सिधार जाते हैं तब हम रो-रो कर सारी दुनिया को ये बताते हैं कि देखो हमें उनसे कितना प्यार था. हम सुन्दर फ्रेमों में उनकी उनकी तस्वीरों को मढ़वाते हैं और बड़ी बड़ी मालाओं से उन्हें अभिनंदित करते हैं.

मूर्तिपूजा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य यह है कि इसकी शुरुआत वैसे लोगों की आध्यात्मिक मदद के लिए की गई जिनके लिए किसी कारणवश ईश्वर के अमूर्त रूप पर प्रत्यक्षतः ध्यान करना संभव नहीं था. जैसे कुछ लता-गुल्मों को प्रारम्भ में बढ़ने के लिए सहारों की ज़रूरत होती है वैसे ही अमूर्त पर सीधे ध्यान न कर पाने वालों को मूर्तियों का सहारा दिया गया जिन्हें समय समय पर कोई सक्षम एवं समर्थ संत या फ़कीर आध्यात्मिक सत्व से चार्ज कर देते थे जैसे आज के ज़माने में हम सेल को चार्ज कर देते हैं. कालांतर में सब कुछ विद्रूप हो गया और अमूर्त एवं सार्वभौम ईश्वर तो गौण हो गया, प्रतीक एवं संकेत मुख्य हो गए.

पूजा, अर्चना, एवं इबादत के सारे स्थल और उनसे जुड़ी सारी कवायद तब तक सिर्फ प्रतीक ही हैं जब तक हमारी नज़र सम्पूर्ण सृष्टि के मालिक पे नहीं है. हमारे प्रियतम की पहनी चूड़ियाँ भले ही टूटी क्यूँ न हों, यदि उनसे हमें हमारे प्रियतम की याद आती है , तो वे हमारे लिए प्रियतम स्वरुप ही हैं.

© राज़ नवादवी

भोपाल, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी; बुधवार २८/०८/२०१३

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