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	<title>vyangy &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://en.wordpress.com/tag/vyangy/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "vyangy"</description>
	<pubDate>Tue, 08 Dec 2009 09:43:31 +0000</pubDate>

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<item>
<title><![CDATA[जमीन की जिन्दगी की हकीकत]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/30/jamin-kee-jindgi-kee-hakikat/</link>
<pubDate>Fri, 30 Nov 2007 14:03:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/30/jamin-kee-jindgi-kee-hakikat/</guid>
<description><![CDATA[ख्वाहिशें तो जिंदगी में बहुत होतीं हैं पर सभी नहीं होतीं पूरी जो होतीं भी हैं तो अधूरी पर कोई इसलिए ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>ख्वाहिशें तो जिंदगी में बहुत होतीं हैं<br />
पर सभी नहीं होतीं पूरी<br />
जो होतीं भी हैं तो अधूरी<br />
पर कोई इसलिए जिन्दगी में ठहर नहीं जाता<br />
कहीं रौशनी होती है पर<br />
जहाँ होता हैं अँधेरा<br />
वीरान कभी शहर नहीं हो जाता<br />
कोई रोता है कोई हंसता है<br />
करते सभी जिन्दगी पूरी</p>
<p>सपने तो जागते हुए भी<br />
लोग बहुत देखते हैं<br />
उनके पूरे न होने पर<br />
अपने ही मन को सताते हैं<br />
जो पूरे न हो सकें ऐसे सपने देखकर<br />
पूरा न होने पर बेबसी जताते हैं<br />
अपनी नाकामी की हवा से<br />
अपने ही दिल के चिराग बुझाते हैं<br />
खौफ का माहौल चारों और बनाकर<br />
आदमी ढूंढते हैं चैन<br />
पर वह कैसे मिल सकता है<br />
जब उसकी चाहत भी होती आधी-अधूरी<br />
फिर भी वह जिंदा दिल होते हैं लोग<br />
जो जिन्दगी की जंग में<br />
चलते जाते है<br />
क्या खोया-पाया इससे नहीं रखते वास्ता<br />
अपने दिल के चिराग खुद ही जलाते हैं<br />
तय करते हैं मस्ती से मंजिल की दूरी</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
ख्वाहिशें वही  पूरी हो पातीं हैं<br />
जो हकीकत  की जमीन पर टिक पातीं हैं<br />
कोई ऐसे पंख नहीं बने जो<br />
आदमी के अरमानों को आसमान में<br />
उडा कर सैर कराएँ<br />
जमीन की जिन्दगी की हकीकतें<br />
जमीन से ही जुड़कर जिंदा रह पाती हैं</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कैसा विश्वास जगाते हैं ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/30/kaisa-vishvas-jagate-hain/</link>
<pubDate>Fri, 30 Nov 2007 13:46:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/30/kaisa-vishvas-jagate-hain/</guid>
<description><![CDATA[अपने विश्वास पर बहुत इतराते हैं पर चंद अल्फाज़ ही उन्हें डराते हैं अपनी ही पढी किताब से निकले अल्फाज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अपने विश्वास पर बहुत इतराते हैं<br />
पर चंद अल्फाज़ ही उन्हें डराते हैं<br />
अपनी ही पढी किताब से<br />
निकले अल्फाज़ से वह<br />
जमाने को रौशन करने का<br />
करते हैं दावा<br />
पर दूसरे की किताब में<br />
लिखे शब्द से घबडाते हैं<br />
दुनिया में प्यार का सन्देश फैलाने की<br />
करते हैं बात<br />
पर सर्वशक्तिमान का डर फैलाते हैं<br />
दिल में ही रहता है डर और प्यार<br />
और वह डराकर लोगों के<br />
दिल में  प्यार जगाते हैं<br />
चंद अल्फाजों से जो टूट जाये विश्वास<br />
उसे  ही लोगों के  दिलों में जगाते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल के चिराग जलाते नहीं-hindi shayri ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/29/dil-ke-chirag-jalate-nahin/</link>
<pubDate>Thu, 29 Nov 2007 14:17:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/29/dil-ke-chirag-jalate-nahin/</guid>
<description><![CDATA[जिनका हम करते हैं इन्तजार वह हमसे मिलने आते नहीं जो हमारे लिए बिछाये बैठे हैं पलकें उनके यहां हम जात]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>जिनका हम करते हैं इन्तजार<br />
वह हमसे मिलने आते नहीं<br />
जो हमारे लिए बिछाये बैठे हैं पलकें<br />
उनके यहां हम जाते नहीं<br />
अपने दिल के आगे क्यों हो जाते हैं मजबूर<br />
क्यों होता है हमको अपने पर गरूर<br />
जो आसानी से मिल सकता है<br />
उससे आँखें फेर जाते हैं<br />
जिसे ढूँढने के लिए बरसों<br />
बरबाद हो जाते हैं<br />
उसे कभी पाते नहीं<br />
तकलीफों पर रोते हैं<br />
पर अपनी मुश्किलें<br />
खुद ही बोते हैं<br />
अमन और चैन से लगती हैं बोरियत<br />
और जज्बातों से परे अंधेरी गली में<br />
दिल के चिराग के लिए<br />
रौशनी ढूँढने निकल जाते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<p>दुर्घटनाएं अब अँधेरे में नहीं<br />
तेज रौशनी में ही होतीं है<br />
रास्ते पर चलते वाहनों से<br />
रौशनी की जगह बरसती है आग<br />
आंखों को कर देती हैं अंधा<br />
जागते हुए भी सोती हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
हमें तेज रौशनी चाहिए<br />
इतनी तेज चले जा रहे हैं<br />
उन्हें पता ही नहीं आगे<br />
और अँधेरे आ रहे हैं<br />
दिल के चिराग जलाते नहीं<br />
बाहर रौशनी ढूँढने जा रहे हैं</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[झूठ की सता ही लोगों में इज्जत पाती है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/28/jhuth-ki-sattaa-hee-logon-men-ijjat-pati-hai/</link>
<pubDate>Wed, 28 Nov 2007 12:52:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/28/jhuth-ki-sattaa-hee-logon-men-ijjat-pati-hai/</guid>
<description><![CDATA[अपनी महफिलों में शराब की बोतलें टेबलों पर सजाते हैं बात करते हैं इंसानियत की पर नशे में मदहोश होने क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अपनी महफिलों में शराब की<br />
बोतलें टेबलों पर सजाते हैं<br />
बात करते हैं इंसानियत की<br />
पर नशे में मदहोश होने की<br />
तैयारी में जुट जाते हैं<br />
हर जाम पर ज़माने के<br />
बिगड़ जाने का रोना<br />
चर्चा का  विषय होता है<br />
सोने का महंगा होना<br />
नजर कहीं और दिमाग कहीं<br />
ख्याल कहीं और जुबान कहीं<br />
शराब का हर घूँट<br />
गले के नीचे उतारे जाते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p>आदमी की संवेदना हैं कि<br />
रुई की गठरी<br />
किसी लेखक के लिखे<br />
चंद शब्दों से ही पिचक जाती हैं<br />
लगता हैं कभी-कभी<br />
सच बोलना और लिखना<br />
अब अपराध हो गया है<br />
क्योंकि झूठ और दिखावे की सत्ता ही<br />
अब लोगों में इज्जत पाती है </p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ढूंढ नही पाता अपना वजूद ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/27/dhoondh-naheen-paataa-apna-vajood/</link>
<pubDate>Tue, 27 Nov 2007 12:56:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/27/dhoondh-naheen-paataa-apna-vajood/</guid>
<description><![CDATA[अपनी जरूरतों को पूरा करते हुए कर्ज के पहाड़ पर चढा गया ब्याज की सीढियों पर आसमान की तरह बढ़ता गया अब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अपनी जरूरतों को पूरा करते  हुए<br />
कर्ज के पहाड़ पर चढा गया<br />
ब्याज की सीढियों पर<br />
आसमान की तरह बढ़ता गया<br />
अब वही पहाड़  उसके सिर पर पढा है<br />
उसका सिर सीढियों में तस्वीर की तरह मढा है<br />
आंखों से ढूंढ नहीं पाता अपना वजूद<br />
कानों से सुन नहीं पाता मरदूद<br />
आवाज गयी है ग़मों में डूब<br />
वह खडा  किसी फ़रिश्ते के इन्तजार में<br />
जो भी गुजरा उसके पास से<br />
वह शख्स  उसके सामने से<br />
 देखे बगैर बढ़ता गया<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<p>कहीं लगते हैं कर्ज के मेले<br />
कही दिखते हैं मर्ज दूर करने के ठेले<br />
होर्डिंग पर लिखे आकर्षक नाम<br />
पढ़ने में कितने भी अच्छे लगें<br />
दूर रहना उनसे तू अलबेले<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिसने ढूंढें हैं सहारे ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/26/jisne-dhoondhe-hain-sahare/</link>
<pubDate>Mon, 26 Nov 2007 17:13:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/26/jisne-dhoondhe-hain-sahare/</guid>
<description><![CDATA[आकाश में चमकते सितारे भी नहीं दूर कर पाते दिल का अंधियारा जब होता है वह किसी गम का मारा चन्द्रमा भी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आकाश में चमकते सितारे भी<br />
नहीं दूर कर पाते दिल का अंधियारा<br />
जब होता है वह किसी गम का मारा<br />
चन्द्रमा भी शीतल नहीं कर पाता<br />
जब अपनों में भी वह गैरों जैसे<br />
अहसास की आग में जल जाता<br />
सूर्य की गर्मी भी उसमें ताकत<br />
नहीं पैदा कर पाती<br />
जब आदमी अपने जज्बात से हार जाता<br />
कोई नहीं देता यहाँ मांगने पर सहारा</p>
<p>इसलिए डटे रहो अपनी नीयत पर<br />
चलते रहो अपनी ईमान की राह पर<br />
इन रास्तों की शकल तो कदम कदम पर<br />
बदलती रहेगी<br />
कहीं होगी सपाट तो कहीं पथरीली होगी<br />
अपने पाँव पर चलते जाओ<br />
जीतता वही है जो उधार की बैसाखियाँ नहीं माँगता<br />
जिसने ढूढे हैं सहारे<br />
वह हमेशा ही इस जंग में हारा<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपनी सोच से रास्ते बनते हैं ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/26/apne-soch-se-raste-bante-hain/</link>
<pubDate>Mon, 26 Nov 2007 14:08:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/26/apne-soch-se-raste-bante-hain/</guid>
<description><![CDATA[एक पत्थर को रंग पोतकर अदभुत बताकर दिखाने की कोशिश लोहे को रंग लगाकर चमत्कारी बताने की कोशिश आदमी के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>एक पत्थर को रंग पोतकर अदभुत<br />
बताकर दिखाने की कोशिश<br />
लोहे को रंग लगाकर<br />
चमत्कारी बताने की कोशिश<br />
आदमी के  भटकते मन को<br />
स्वर्ग दिखाने की कोशिश<br />
तब  तक चलती रहेगी<br />
जब  तक अपने को सब खुद नहीं संभालेंगे</p>
<p>ख्वाब ही हकीकत बनते हैं<br />
सपने भी सच निकलते हैं<br />
अपनी सोच से भी रास्ते बनते हैं<br />
कोई और हमें संभाले<br />
अपनी जंग जीत सकते हैं<br />
जब इसके लिए इन्तजार करने के बजाय<br />
खुद को खुद ही संभालेंगे<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भूल-भुलैया में फंस जाते हैं  ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/21/bhool-bhulaiyaa-men-fans-jaate-hain/</link>
<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 15:33:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/21/bhool-bhulaiyaa-men-fans-jaate-hain/</guid>
<description><![CDATA[अपने दिल के नगीने से सजाकर कितने भी तौह्फे दे दो इस ज़माने को कद्रदान कभी होगा नहीं खुश रहते हैं वही ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अपने दिल के नगीने से<br />
सजाकर कितने भी तौह्फे दे दो<br />
इस ज़माने को<br />
कद्रदान कभी होगा नहीं<br />
खुश रहते हैं वही लोग<br />
जो बेचते हैं परछाईयाँ<br />
झूठ बेचते हैं दिखाकर सच्चाईयां<br />
बन जाते हैं उनके महल<br />
ज़माना भी खो  जाता है<br />
भूलभुलैया में कहीं<br />
दावे सभी करते हैं<br />
पर भला  कोई हुआ है  अभी तक<br />
सच्चे आदमी का साथी कहीं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<p>भगवान की पहचान के लिए<br />
शैतान का डर दिखाते हैं<br />
सच को सही बताने के लिए<br />
झूठ का भूत दिखाते हैं<br />
पर जो देते हैं पता<br />
वही नाचते हैं शैतान जैसा<br />
झूठ को बेचते हैं सच की तरह<br />
लोग मानते हैं उनको अपना आदर्श<br />
इसलिए भगवान् से दूर<br />
सच के रस्ते से हटे हुए<br />
भूल-भुलैया में फंस जाते हैं  </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फ्लाप से जोड़  दो फ्लाप ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/21/flap-se-jod-do-flap/</link>
<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 14:58:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/21/flap-se-jod-do-flap/</guid>
<description><![CDATA[क्रिकेट फ्लॉप फिल्म फ्लॉप सपनों के सौदागर कर रहे विलाप क्रिकेट में खेलना ही पर्याप्त नहीं गेंद और बल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>क्रिकेट फ्लॉप<br />
फिल्म फ्लॉप<br />
सपनों के सौदागर कर रहे विलाप<br />
क्रिकेट में खेलना ही पर्याप्त नहीं<br />
गेंद और बल्ले की जंग में<br />
अब मनोरंजन व्याप्त नहीं<br />
खिलाडियों को फिल्म के अभिनेताओं की तरह<br />
रेम्प पर नचवाओ<br />
खिलाडियों को नाचना भी आता  है<br />
लोगों को बताओ<br />
उन्हें लगातार बह्काओ<br />
नहीं आयेगा पीछा खर्च करने अपने आप</p>
<p>खिलाडियों का मैदान में खेलना<br />
अब पर्याप्त नहीं है<br />
जब तक दर्शकों में हीरो की<br />
छबि व्याप्त नहीं है<br />
इसलिए मैदान में लगाओ<br />
किसी हीरो की छाप<br />
फ्लाप होने की तरह बढ़ रहे हीरो<br />
क्रिकेट भी देखते हैं<br />
खिलाडियों को भी रंगीन चश्में से देखते हैं<br />
उनकी फिल्में भी देखते रहो<br />
क्रिकेट को अभी भी सहते रहो<br />
हिट बनाने का यह नया फार्मूला है<br />
फ्लाप से जोड़  दो फ्लाप</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/20/sigret-kaa-dhooaan-chhodte-hue/</link>
<pubDate>Tue, 20 Nov 2007 16:02:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/20/sigret-kaa-dhooaan-chhodte-hue/</guid>
<description><![CDATA[मुख से सिगरेट का धुँआ चहुँ और फैलाते हुए करते हैं शहर में फैले पर्यावरण प्रदूषण की शिकायत शराब के कई]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>मुख से सिगरेट का धुँआ<br />
चहुँ और फैलाते हुए करते हैं<br />
शहर में फैले<br />
पर्यावरण प्रदूषण की शिकायत<br />
शराब के कई जाम पीने के बाद<br />
करते हैं मर्यादा की वकालत<br />
व्यसनों को पालना सहज है<br />
उससे पीछा छुड़ाने में<br />
होती है बहुत मुश्किल<br />
पर नैतिकता की बात कहने में<br />
शब्द खर्च करने हुए क्यों करो किफायत<br />
कहैं दीपक बापू देते हैं<br />
दूसरों को बड़ी आसानी से देते हैं<br />
नैतिकता का उपदेश लोग<br />
जबकि अपने ही आचरण में<br />
होते हैं ढ़ेर सारे खोट<br />
दूसरे को दें निष्काम भाव का संदेश<br />
और दान- धर्म की सलाह<br />
अपने लिए जोड़ रहे हैं नॉट<br />
समाज और जमाने के बिगड़ जाने की<br />
बात तो सभी करते हैं<br />
आदमी को सुधारने की<br />
कोई नहीं करता कवायद<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p>सुबह से शाम तक<br />
छोड़ते हैं सिगरेट का धुआं<br />
अपने दिल में खोदते  मौत का कुआँ<br />
और लोगों को सुनाते हैं<br />
जमाने के खराब होने के किस्से<br />
अपना सीना तानकर कहते हैं<br />
बिगडा जो है प्रकृति का हिसाब<br />
उस पर पढ़ते हैं किताब<br />
पर कभी जानना नहीं चाहते<br />
हवाओं को तबाह करने में<br />
कितने हैं उनके हिस्से</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यहाँ बदलते हैं रिश्ते ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/19/%e0%a4%af%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Mon, 19 Nov 2007 15:09:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/19/%e0%a4%af%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%87/</guid>
<description><![CDATA[जब काम था वह रोज हमारे गरीबखाने पर आये अब उन्हें हमें याद करने की फुरसत भी नहीं मिलती गुजरे पलों की ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p> जब काम था वह रोज<br />
हमारे गरीबखाने पर आये<br />
अब उन्हें हमें याद करने की<br />
फुरसत भी नहीं मिलती<br />
गुजरे पलों की उन्हें कौन याद दिलाये<br />
हम डरते हैं कि<br />
कहीं याद दिलाने पर<br />
उन्हें अपने कमजोर पल न सताने लगें<br />
वह यह सोचकर मिलने से<br />
बहुत घबडाते हैं कि<br />
हम उन्हें अपनी पुरानी असलियत का<br />
कहीं आइना न दिखाने लगें<br />
दूरियां है कि बढती जाएँ<br />
टूटे-बिखरे रिश्तों को फिर जोड़ना<br />
इतना आसान नहीं जितना लगता है<br />
बात पहले यहीं अटकती हैं कि<br />
आगे पहले कब और क्यों आये<br />
अच्छा है मतलब से बने<br />
रिश्तों को भूल ही जाएँ<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<p>इस रंग बदलती दुनिया मैं<br />
बदल जाते हैं रिश्ते भी<br />
अपनों से चलते हैं<br />
संबंध बरसों तक<br />
पराये से लगते हैं वह भी कभी<br />
प्रेम से जो साथ चले<br />
वह अपना है<br />
जहाँ कम होते लगें<br />
छोड़ तो उन्हें तभी </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सबसे अलग हटकर लिख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/19/%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a4%97-%e0%a4%b9%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96/</link>
<pubDate>Mon, 19 Nov 2007 14:55:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/19/%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a4%97-%e0%a4%b9%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96/</guid>
<description><![CDATA[तू लिख समाज में झगडा बढाने के लिए लिख शांति की बात लिखेगा तो तेरी रचना कौन पढेगा जहां द्वंद्व न होता]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>तू लिख<br />
समाज में झगडा<br />
बढाने के लिए लिख<br />
शांति की बात लिखेगा<br />
तो तेरी रचना कौन पढेगा<br />
जहां द्वंद्व न होता वहां होता लिख<br />
जहाँ कत्ल होता हो आदर्श का<br />
उससे मुहँ फेर<br />
बेईमानों के स्वर्ग की<br />
गाथा लिख<br />
ईमान की बात लिखेगा<br />
तो तेरी ख़बर कौन पढेगा</p>
<p>अमीरी पर कस खाली फब्तियां<br />
जहाँ मौका मिले<br />
अमीरों की स्तुति कर<br />
गरीबों का हमदर्द दिख<br />
भले ही कुछ न लिख<br />
गरीबी को सहारा देने की<br />
बात अगर करेगा<br />
तो तेरी संपादकीय कौन पढेगा</p>
<p>रोटी को तरसते लोगों की बात पर<br />
लोगों का दिल भर आता है<br />
तू उनके जज्बातों पर ख़ूब लिख<br />
फोटो से भर दे अपने पृष्ठ<br />
भूख बिकने की चीज है ख़ूब लिख<br />
किसी भूखे को रोटी मिलने पर लिखेगा<br />
तो तेरी बात कौन सुनेगा</p>
<p>पर यह सब लिख कर<br />
एक दिन ही पढे जाओगे<br />
अगले दिन अपना लिखा ही<br />
तुम भूल जाओगे<br />
फिर कौन तुम्हे पढेगा</p>
<p>झगडे से बडी उम्र शांति की होती है<br />
गरीब की भूख से लडाई तो अनंत है<br />
पर जीवन का स्वरूप भी बेअंत है<br />
तुम सबसे अलग हटकर लिखो<br />
सब झगडे पर लिखें<br />
तुम शांति पर लिखो<br />
लोग भूख पर लिखें<br />
तुम भक्ति पर लिखो<br />
सब आतंक पर लिखें<br />
तुम अपनी आस्था पर लिखो<br />
सब बेईमानी पर लिखें<br />
तुम अपने विश्वास पर लिखो<br />
जब लड़ते-लड़ते थक जाएगा ज़माना<br />
मुट्ठी भींचे रहना कठिन है<br />
हाथ कभी तो खोलेंगे ही लोग<br />
तब हर कोई तुम्हारा लिखा पढेगा<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[इससे अच्छा तो बुतों पर यकीन कर लें ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/18/%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Sun, 18 Nov 2007 16:38:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अपने लिए बनाते हैं ऐसे सपनों के महल जो रेत के घर से भी कमजोर बन जाते हैं तेज रोशनी को जब देखते देखते]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अपने लिए बनाते हैं ऐसे<br />
सपनों के महल<br />
जो रेत के घर से भी<br />
कमजोर बन जाते हैं<br />
तेज रोशनी को जब देखते देखते<br />
आंखों को थका देते हैं<br />
फिर अँधेरे में ही रोशनी<br />
तलाशने निकल जाते हैं<br />
इधर-उधर भटकते हुए<br />
अनजान जगहों के नाम<br />
मंजिल के रूप में लिखते हैं<br />
दर्द के सौदागरों के हाथ<br />
पकड़ कर चलने लग जाते हैं<br />
जब दौलत  के अंबार लगे हों तो<br />
गरीबी में सुख आता है नजर<br />
जब हों गरीब होते हैं<br />
तो बीतता समय रोटी की  जंग में<br />
अमीरों का झेलते हैं कहर<br />
नहीं होता  दिल पर काबू<br />
बस इधर से उधर जाते हैं<br />
जिंदा लोगों को बुत समझने  की<br />
गलती करते हैं कदम-कदम पर<br />
इसलिए हमेशा धोखा खाते हैं<br />
इससे अच्छा तो यही होगा कि<br />
बुतों को ही रंग-बिरंगा कर<br />
उनमें अपना यकीन जमा लें<br />
हम कुछ भी कह लें<br />
कम से कम वह बोलने तो नहीं आते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211; </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जब  अपने मन का सच बोलता है]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/11/17/%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%9a-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Sat, 17 Nov 2007 10:06:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जब खामोशी हो चारों तरह तब भी कोई बोलता हैं हम सुनते नही उसकी आवाज हम उसे नहीं देखते पर वह हमें बैठा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>जब खामोशी हो चारों तरह तब भी<br />
कोई बोलता हैं<br />
हम सुनते नही उसकी आवाज<br />
हम उसे नहीं देखते<br />
पर वह हमें बैठा तोलता है<br />
भीड़ में घूमने   की  आदत<br />
हो जाती  है जिनको<br />
उन्हें  अकेलापन डराता है<br />
क्योंकि जिसकी सुनने से कतराते हैं<br />
वही अपने मन में बैठा सच<br />
दबने की  वजह से बोलता है      </p>
<p>दूसरे से अपना सच छिपा लें<br />
पर अपने से कैसे छिपाये<br />
अकेले होते तो बच पाते<br />
भीड़ में रहते हुए<br />
लोगों के बीच में टहलते हुए<br />
महफिलों में अपने घमंड के<br />
नशे में बहकते हुए<br />
सहज होने की कोशिश भी<br />
हो जाती है जब वह<br />
अपने मन का सच बोलता है </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गरीबी अपना वजूद नहीं खोती]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/16/%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%ac%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%a6-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Fri, 16 Nov 2007 15:29:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/16/%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%ac%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%a6-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%80/</guid>
<description><![CDATA[देश में कई लोग अभी भी टाँगे और बैलगाडी चलाते कई जगह हाथ रिक्शा भी खींचे हुए गरीब पसीना बहाते कई लोगो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>देश में कई लोग अभी भी<br />
टाँगे और बैलगाडी चलाते<br />
कई जगह हाथ रिक्शा भी<br />
खींचे हुए गरीब पसीना बहाते<br />
कई लोगों ने उनकी  तस्वीर  कैनवास पर<br />
उतारकर जमाने  भर को दिखाई<br />
और खूब ख्याति पाई<br />
भले  ही गरीब को निजात नहीं दिलाते<br />
पर बडे हमदर्द  कहलाते </p>
<p>कुछ ने लिखे लंबे-लंबे उपन्यास<br />
कोई आयेगा पढ़कर<br />
करेगा तुम्हारी मदद दिलाई आस<br />
लिखने  वालों के नाम पर ढेर सारे<br />
इनाम आ जाते<br />
पर गरीब फिर भी गरीब रह जाते </p>
<p>शायद बनाने वाले ने गरीब<br />
बनाये इसलिए कि<br />
अमीरों के  काम आ सकें<br />
और उनकी गरीबी पर<br />
दिखाई हमदर्दी पर<br />
बुद्धिमान अपना बाजार सजा सकें<br />
इसलिए गरीबी हटाओ के नारे से<br />
गूंजता है धरती और आकाश<br />
 गरीब होता दर-ब-दर<br />
पर वह अपना वजूद नहीं खोती<br />
वहाँ राज्य करती है<br />
जहाँ  गरीब अपना वजूद ढूँढने जाते </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द का भी होता है नकाब-hindi poem ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/12/shabd-kaa-bhee-hota-hai-nakaab-hindi-poe/</link>
<pubDate>Mon, 12 Nov 2007 15:15:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/12/shabd-kaa-bhee-hota-hai-nakaab-hindi-poe/</guid>
<description><![CDATA[अपने चरित्र पर लगे काले दागों से जो लोग घबडाते हैं वही अपना सच छुपाने के लिए शब्दों का नकाब लगाते है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अपने चरित्र पर लगे काले दागों से<br />
जो लोग घबडाते हैं<br />
वही अपना सच छुपाने के लिए<br />
शब्दों का नकाब लगाते हैं<br />
यूं तो शब्द सौन्दर्य की रचना<br />
उनके लिए खेल होता है<br />
पर उनके अर्थों में ढूंढो तो<br />
खोखले भाव सहजता से<br />
सामने आते हैं<br />
शब्दों के नकाब में उनके सच को<br />
पकड़ने के लिए दिल की नहीं<br />
होती है दिमाग की जरूरत<br />
क्योंकि उनके शब्द भावना से नहीं<br />
निज स्वार्थ के लिए रचे जाते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
किसी के ख्यालों में खो जाना<br />
किसी के वादों में बहकना<br />
किसी के इरादों के साथ बह जाना<br />
क्या कहलाता है प्यार<br />
जिसमें कुछ पल का भटकने की<br />
सजा भी मिल सकती है<br />
जिन्दगी में हर कदम पर बारंबार<br />
कोई एक पहचान खोये<br />
दूसरा उस पर थोपे अपना नाम<br />
बराबरी की शर्त पूरी<br />
नहीं करता ऐसा प्यार<br />
एक खेलता है<br />
दूसरा देखता है<br />
वासना में लिपटा बदन मचले<br />
कहलाता नहीं प्यार<br />
दिल में भोगने की चाहत पूरी करना<br />
जिस्म में जलती आग बुझाना तो<br />
सभी चाहते हैं<br />
पर त्याग और यकीन पर खरे उतरें<br />
कुछ पाने की चाह न हो<br />
तभी कहलाता है प्यार<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बस यही संदेश इस पावन पर्व पर सुनाते ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/09/%e0%a4%ac%e0%a4%b8-%e0%a4%af%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%aa/</link>
<pubDate>Fri, 09 Nov 2007 15:54:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/09/%e0%a4%ac%e0%a4%b8-%e0%a4%af%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%87%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%aa/</guid>
<description><![CDATA[नीचे से ऊपर जाते हुए पटाखे धमाके से कानों को कंपाते साथ में नीचे आते प्रदूषण लाते नीचे चलती गाडियाँ ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>नीचे से ऊपर जाते हुए पटाखे<br />
धमाके से कानों  को कंपाते<br />
साथ में नीचे आते प्रदूषण लाते<br />
नीचे चलती गाडियाँ<br />
तेज लाईट से आंखों को अंधा करती<br />
और हार्न से निकला भयानक शोर<br />
रास्ते के दोनों और बिखरी रौशनी<br />
में भी उसके जलते   अँधेरे का अहसास कराते<br />
खुशी में चिराग जलाने के तो<br />
खूब  सुने हैं अफसाने<br />
अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता हो<br />
एकजुट होकर समाज<br />
नही मिलतीं ऐसी  दास्ताने<br />
अंधी दौड़ में शामिल हैं सब लोग<br />
जिनमें अक्ल है ताकत नहीं है<br />
जिनके पास ताकत है तो<br />
नीयत में है अपने लाभ पाने का स्वार्थ<br />
इसलिए चेतना का अलख नहीं जगाते </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
किस-किसको रोईये<br />
आराम बड़ी चीज है<br />
मुहँ ढककर सोईये<br />
यह नीति अच्छी होती<br />
अगर आवाजों से नींद नहीं टूटी होती<br />
चैन होता हमें भी अगर<br />
मिठाई के नाम पर विष को<br />
परोसते नहीं देख पाते<br />
करते समाज सेवा का व्यापार तो<br />
हम ही चेतना का अलख जगाते<br />
बना लेते कोई बड़ा आश्रम<br />
इन आवाजों से दूर रह पाते<br />
चूंकि दर्द है कई लोग का<br />
उनका हमदर्द बन जाते<br />
यह त्यौहार खाने-पीने के ही लिए  नहीं<br />
चिंतन और मनन के लिए भी आते<br />
कुछ सोचो कहाँ जा रहे हो<br />
अपने हाथ से अपने  लिए विष जुटा रहे हो<br />
बस यही सन्देश इस पावन पर्व पर सुनाते<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सब रंग देखो दृष्टा बनकर ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/27/sab-rang-dekho-hashya-kavita/</link>
<pubDate>Sat, 27 Oct 2007 05:29:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/27/sab-rang-dekho-hashya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[नाम है हीरो बहादुरी में जीरो पर्दे पर बडों-बडों की करते छुट्टी लोगों को पिलाते बहादुरी की घुट्टी पर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>नाम है हीरो<br />
बहादुरी में जीरो<br />
पर्दे पर बडों-बडों की करते छुट्टी<br />
लोगों को पिलाते बहादुरी की घुट्टी<br />
पर पर्दे के पीछे  छोटे विलेन भी<br />
अपने मुताबिक उनको  नचवाते<br />
चाहे जहाँ चाहे जैसा<br />
नृत्य और गीत गंवाते<br />
उनके इशारे ऐसे होते की<br />
साइड रोल में आ जाता हीरो<br />
जो पूछो कोई सवाल तो<br />
परदे पर मजबूरों और गरीबों के<br />
लिए जोर से गरजने वाला<br />
मजबूरी जताता है हीरो<br />
देखने वाले रहें भ्रम में<br />
पर पढ़ने वाले जानते हैं<br />
कौन है पर्दे का  कौन है और<br />
कौन है  पर्दे के  पीछे का हीरो<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
छोटे  पर्दे पर भी<br />
नजर आते  है तमाम विरोधाभासी  दृश्य<br />
देखकर  हैरान होता है मन<br />
कोई  हीरो कहता है &#8216;संतुष्ट नहीं  हो जाओ&#8217;<br />
कोई संत कहैं&#8217;संतोष है सबसे बड़ा धन&#8217;<br />
बच्चे ने पूछा अपने दादा से<br />
&#8216;आप ही करो हमारी शंका का निवारण<br />
राम को माने या देखें रावण<br />
जंग में कूदें या ढूंढें अमन&#8217;<br />
दादा ने कहा<br />
&#8216;हीरो तो पैसा लेकर बोलता है<br />
संत सच्चा है तो ग्रंथों से<br />
रहस्य खोलता है<br />
इस रंग बदलती दुनिया में<br />
सब रंग देखो दृष्टा बनकर<br />
तो दिल और दिमाग में रहेगा अमन<br />
नीयत में हो तो जिन्दगी में खिलेगा<br />
सच का चमन </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आर्थिक लाभ का चक्कर ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/24/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%ad-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 24 Oct 2007 16:39:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/24/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%ad-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[दोस्त ने कहा &#8216;रुक जाओ इतनी भी क्या है जल्दी  भला कहाँ तुम्हें जाना है&#8217; उन्होंने जवाब दिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>दोस्त ने कहा<br />
&#8216;रुक जाओ<br />
इतनी भी क्या है जल्दी <br />
भला कहाँ तुम्हें जाना है&#8217;<br />
उन्होंने जवाब दिया<br />
&#8216;यार आज जल्दी<br />
बीमा पालिसी की<br />
किश्त जमा करवाना है<br />
दोस्त ने कहा<br />
&#8216;फ़िर तुम इतनी फिक्र<br />
 क्यों करते हो<br />
तुम्हारे  घर के अन्य सदस्यों को<br />
इसकी फिक्र करना चाहिए<br />
तुम्हारे बाद उनको ही तो<br />
आर्थिक फायदा पाना है&#8217;<br />
उन्होंने जवाब दिया<br />
&#8216;यार, जो मेरे नाम की है<br />
उसकी तो फिक्र सब करते हैं<br />
पर जो उनके  नाम पर है<br />
उसकी फिक्र तो मुझे करनी है<br />
भगवान् करे सब ठीक  रहें<br />
पर कुछ हो गया तो उनका<br />
आर्थिक लाभ तो मुझे ही पाना है.<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सास-बहू का रिश्ता-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/24/sas-bahu-ka-rishta-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Wed, 24 Oct 2007 16:29:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2007/10/24/sas-bahu-ka-rishta-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[सास ने बहू से कहा &#8216;तुम्हें आज मायके जाने की अनुमति पर शाम ढलने से पहले घर लौट आना तेरे ससुर और]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सास ने बहू से कहा<br />
&#8216;तुम्हें आज मायके जाने की अनुमति<br />
पर शाम ढलने से पहले घर लौट आना<br />
तेरे ससुर और पति से तेरे जाने की<br />
ख़बर छुपाये रखूँगी<br />
उनके आने से पहले नहीं आई<br />
तो दोनों नाराज होंगे<br />
पडेगा तुम्हें पछताना<br />
हाँ, मेरे लिए कोई तोहफा<br />
जरूर लाना&#8217;<br />
बहू बिचारी शाम से पहले वापस आयी<br />
साथ में सास के लिए साड़ी भी लाई<br />
पर सास को साड़ी पसंद नही आयी<br />
और जोर से किया चिल्लाना शुरू<br />
&#8216;कैसे कंगाल घर की हैं<br />
इतनी सस्ती साड़ी लाई<br />
ज़रा भी शर्म नहीं आयी<br />
पता नहीं कौनसे मुहूर्त में<br />
इसका रिश्ता अपने बेटे के लिए माना&#8217;</p>
<p>बेटा और पति के घर लौटने तक<br />
उसने मचा रखा कोहराम<br />
नहीं करने दिया बहु को आराम<br />
घर में उनके घुसते उसने<br />
उनको दी शिकायत<br />
बहु को कोसने में नहीं की किफायत<br />
ससुर ने बहु से कहा<br />
&#8216;बेटी नए  जमाने की हो<br />
पर बदला नहीं है ज़माना<br />
तुमने अभी  सास-बहु के<br />
रिश्ते को नहीं जाना<br />
कभी तुम सास को खुश नहीं कर सकती<br />
चाहे लाख जतन कर लो<br />
इसलिए कभी सास के लिए कुछ नहीं लाना<br />
अपने पिता का खर्चा करा कर भी झेलने से<br />
तो अच्छा है मुफ्त में सास के जुर्म सहती जाना&#8217;  </p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[एक ही कंपनी ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/28/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80/</link>
<pubDate>Thu, 27 Sep 2007 14:26:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[हीरो ने कहा निर्देशक और निर्माता से &#8216;आज शूटिंग नहीं करूंगा पैकअप करा दो मेरा मूड है खराब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx?blog=http://deepakbapukahin.wordpress.com"><img src="http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg" alt="blogvani" style="border-width:0;" /></a><a target="_blank" href="http://www.akshargram.com/narad"><img border="1" src="http://i204.photobucket.com/albums/bb146/jitu9968/public/narad.jpg" /></a><!-- Blogvani Link Ends --><br />
<a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"><img border="0" src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" alt="चिट्ठाजगत" /></a><a href="http://www.hindiblogs.com/"><img border="0" src="http://www.filmyblogs.com/hindiblogs.jpg" alt="Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा" /></a></p>
<p>हीरो ने कहा निर्देशक और निर्माता से<br />
&#8216;आज शूटिंग नहीं करूंगा<br />
पैकअप करा दो<br />
मेरा मूड है खराब&#8217;<br />
निर्माता ने अपना मोबाइल<br />
उसकी तरफ बढ़ाया और कहा<br />
&#8216;मैंने नंबर लगा दिया है<br />
पहले इस पर बात कर लो<br />
फिर देना जनाब&#8217;</p>
<p>हीरो ने नंबर देखा और घबडाया<br />
अपने सेक्रेटरी को बुलाया<br />
उसने जब मामला समझा<br />
तब उसने भी अपना मोबाइल<br />
निर्माता की तरफ बढाया<br />
और <span>कहा<br />
&#8216;</span>उस बिचारे को क्या धमकाते हो<br />
मुझ से बात करो<br />
आप इस नंबर पर बात करो पहले जनाब &#8216;</p>
<p>निर्माता का सेक्रेटरी भी वहीं खड़ा<br />
उसने भी नंबर देखा और खुश होकर बोला<br />
&#8216;अरे काहेका झगडा आप और हम एक ही<br />
कंपनी का मोबाइल इस्तेमाल करते हैं<br />
फिर क्यों झगडा करते हैं साहब&#8217;</p>
<p>हीरो ने कुछ सुना कुछ समझा<br />
और बोला<br />
&#8216;बात एक कंपनी ही की है<br />
यह सुनकर मैं खुश हुआ<br />
अब तो शूटिंग शुरू करो जनाब&#8217;<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -विद्यालय ने बोर्ड बदला ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/09/26/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a1-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%be/</link>
<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 16:23:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[विद्यालय के प्रबंधन ने छात्रो की भर्ती बढाने के लिए अपने प्रचार के पर्चों में शिक्षा के अलावा अन्य ग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>विद्यालय के प्रबंधन ने<br />
छात्रो की भर्ती बढाने के लिए<br />
अपने प्रचार के पर्चों में<br />
शिक्षा के अलावा अन्य गतिविधियों में<br />
संगीत, गायन, नृत्य और अभिनय में<br />
इस तरह प्रशिक्षण देने का<br />
दावा किया गया  कि<br />
बच्चा इंडियन आइडियल प्रतियोगिता में<br />
नंबर वन पर आ जाये<br />
ट्वंटी ओवर में विश्व कप मे देश जीता<br />
मिटा कर लिखा गया अन्य गतिविधियों में<br />
यहाँ ट्वंटी ओवर क्रिकेट सिखाने की<br />
विशेष सुविधा उपलब्ध है<br />
जिसमे सिक्स लगाने का<br />
जमकर अभ्यास कराया जाता है<br />
जिससे खिलाड़ी सिक्स सिक्सर<br />
लगाने वाला बन जाये<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रचार और बाजार ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/27/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 14:36:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2007/09/27/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0/</guid>
<description><![CDATA[उपभोक्ता और निर्माता की मर्जी पर नहीं चलता बाजार करता है काम एक तंत्र जिसे कहते हैं प्रचार सामान खरी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>उपभोक्ता और निर्माता की<br />
मर्जी पर नहीं चलता बाजार<br />
करता है काम एक तंत्र<br />
जिसे कहते हैं प्रचार<br />
सामान खरीदने वाले<br />
कही रेडियो पर सुना हो<br />
कही टीवी पर देखा को<br />
कही पत्र-पत्रिका में पढा हो तब<br />
बनाते अपने विचार का आधार<br />
कभी कौन बनेगा करोड़पति<br />
कभी इंडियन आइडियल<br />
तो कभी चाहिए क्रिकेट का हीरो<br />
उत्पाद बेचने के लिए<br />
आजकल जरूरी है यह सब<br />
नहीं तो सिमट जाता है जीरो<br />
पर पूरा व्यापार</p>
<p>कहै दीपक बापू<br />
आदमी की देह से ज्यादा<br />
उसकी अक्ल पर काबू पाने के लिए<br />
चल रही है विज्ञापन की जंग<br />
जिसमें पैसे के अलावा कोई<br />
किसी का साथी नही<br />
कोई किसी के संग<br />
साथ अपने अक्ल लेकर जाओ बाजार<br />
ठगी से बच नही सकते<br />
सस्ती चीज कही से ले नहीं सकते<br />
किसी चीज की गारंटी भी नहीं उपचार<br />
किसी चीज को खरीद कर ठग जाओ<br />
तो भूल जाओ<br />
मत करो पछतावे का विचार</p>
</div>]]></content:encoded>
</item>

</channel>
</rss>
