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	<title>web-dunia &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "web-dunia"</description>
	<pubDate>Tue, 29 Dec 2009 18:14:18 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[विदुर नीति-अर्थ प्राप्ति के लिए धर्म का पालन करें (arth aur dharm-hindu adhyamik sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/2009/11/29/money-and-religion-hindu-dharm-sandesh/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 06:31:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः। तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।। हिंदी में भ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।<br />
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।</p>
<p><strong>अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।<br />
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक  पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>यह कहना गलत है धर्म के मार्ग पर अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्म-ईमानदारी, सहजता, परमार्थ, और अपने कर्तव्य से प्रतिबद्धता-का परिणाम ही अर्थ की प्राप्ति ही है।  यह अलग बात है कि जल्दी अमीर बनने या आवश्यकता से अधिक धनार्जन के के लिये लोग अपने जीवन में आक्रामक और बेईमानी की प्रवृत्ति अपना लेते हैं।  इस संसार में ऐसे लोग भी है जो बेईमानी से धन कमाकर कथित रूप से प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का आकर्षण समाज के युवाओं को आकर्षित करता है पर उनको यह समझ लेना चाहिये कि बेईमान और भ्रष्ट लोगों को धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की शक्ति की वजह से सामने कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे सभी लोग उनके प्रति घृणा का भाव दिखाने से नहीं चूकते।  फिर भ्रष्ट और बेईमान लोग का धन जिस तरह बर्बाद होता है उसे भी देखना चाहिये। </p>
<p>नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जिस व्यक्ति ने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह इस संसार में व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थितियों की प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह समझ जाते हैं। इस ज्ञान से वह विकृतियों से परे रहने में सफल रहते हैं और प्रकृतियां उनका स्वतः ही मार्ग प्रशस्त करती हैं। अत: जितना हो सके योग साधना तथा अन्य उपायों द्वारा अपनी बुद्धि को शुद्ध रखने का प्रयास करना चाहिए।<br />
<b>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://anant-shabd.blogspot.com</b></p>
<p>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://deepkraj.blogspot.com">2.शब्दलेख सारथि</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
</strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-भक्ति को धंधे की तरह न करें (bhakti ko dhandha n samjhen-hindu sandesh)]]></title>
<link>http://rajraj.wordpress.com/2009/11/29/bhartrihari-niti-shatak-in-hindi/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 06:25:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajraj.wordpress.com/2009/11/29/bhartrihari-niti-shatak-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212; क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि </strong><br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong><br />
<strong>कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।<br />
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।</strong></p>
<p><strong></strong><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong> वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के&#160;लिए &#160;कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें। </p>
<p>वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया। </p>
<p>यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये। भक्त&#160;&#160;करते समय इस बात का विचार नहीं करना चाहिए कि कोई स्वर्ग का टिकट आरक्षित करवा रहे है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
<b>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</p>
<p></b><br />
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</strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना (yogsadhna-hindi lekh)]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/2009/11/29/a-hindi-article-on-yogsadhna/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 06:20:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.wordpress.com/2009/11/29/a-hindi-article-on-yogsadhna/</guid>
<description><![CDATA[अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं। योगा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।<br />
<b>योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</b>योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।<br />
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर।  अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें।  इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायम की विधियां दी गयी हैं।   योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।<br />
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया।  अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं।  कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।<br />
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली  क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं।  धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें  अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी  ढीला छोड़ना जरूरी है।<br />
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं।  इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है।  अगर कुछ आसन कर प्राणायम करें तो बहुत अच्छा रहेगा।  प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की  चलाई जाती है।  अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें।  अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें।  अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें।  इन क्रियायों को आराम से करें।  शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें।  सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है।  योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना।  शेष फिर कभी<br />
<b>लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://anant-shabd.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b></p>
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<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पिटने का व्यापार-हिन्दी व्यंग्य (pitne ka vyapar-hindi vyangya)]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2009/11/29/pitne-ka-vyapar-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 06:04:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2009/11/29/pitne-ka-vyapar-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[एक चीनी ने अपना ऐसा धंधा प्रारंभ किया है जो यकीनन अनोखा है। ऐसा अनोखा धंधा तो कोई दूसरा हो ही नहीं स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>एक चीनी ने अपना ऐसा धंधा प्रारंभ किया है जो यकीनन अनोखा है। ऐसा अनोखा धंधा तो कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। वह यह कि उसने दूसरे घरों में परेशान औरतों को गुस्सा अपने पर उतारने के लिये स्वयं को प्रस्तुत करता है। वह पिटने की फीस लेता है। अगर समाचार को सही माने तो उसका व्यवसाय चल भी रहा है।<br />
वाकई समय के साथ दुनियां बदल रही है और बदल रहे हैं रिश्ते। दूसरा सच यह है कि इस दुनियां में दो ही तत्व खेलते हैं सत्य और माया। इंसान की यह गलतफहमी है कि वह खेल रहा है। पंाच तत्वों से बने हर जीवन में मन बुद्धि और अहंकार की प्रकृत्तियां भी होती है। वही आदमी से कभी खेलती तो कभी खिलवाड़ करती हैं।<br />
यहां एक बात याद रखने वाली है कि संस्कार और संस्कृति के मामले में चीन हमसे पीछे नहीं है-कम से कम उसे अपने से हल्का तो नहीं माना जा सकता। पूर्व में स्थित यह देश अनेक मामलों में संस्कृति और संस्कारों में हमारे जैसा है। हां, पिछले पचास वर्षों से वहां की राजनीतिक व्यवस्था ने उसे वैसे ही भौतिकवादी के जाल में लपेटा है जैसे कि हमारे यहां की अर्थव्यवस्था ने। अगर हमारा देश अध्यात्मिक रूप से संपन्न नहीं होता तो शायद चीनी समाज हमसे अधिक बौद्धिक समाज कहलाता। वहां बुद्ध धर्म की प्रधानता है जिसके प्रवर्तक महात्मा गौतम बुद्ध भारत में ही उत्पन्न हुए थे।<br />
माया का अभिव्यक्त रूप भौतिकतावाद ही है। इसमें केवल आदमी की देह उसकी आवश्यकतायें दिखती हैं और कारों, रेलों, तथा सड़क पर कम वस्त्र पहने युवतियां ही विकास का पर्याय मानी जाती है। विकास का और अधिक आकर्षक रूप माने तो वह यह है कि नारियां अपना घर छोड़कर किसी कार्यालय में नौकरी करते हुए किसी बौस का आदेश मानते हुए दिखें। उससे भी अधिक आकर्षक यह कि नारी स्वयं कार्यालय की बौस बनकर अपने पुरुष मातहतों को आदेश देते हुए नजर आयें। घर का काम न करते हुए बाहर से कमाकर फिर अपने ही घर का बोझ उठाती महिलायें ही उस मायावी विकास का रूप हैं जिसको लेकर आजकल के अनेक बुद्धिजीवी जूझ रहे हैं। बोस हो या मातहत हैं तो सभी गुलाम ही। यह अलग बात है कि किसी गुलाम पर दूसरा गुलाम नहीं होता तो वह सुपर बोस होता है। यह कंपनी प्रणाली ऐसी है जिसमें बड़े मैनेजिंग डाइरेक्टर एक सेठ की तरह व्यवहार करते हैं पर इसके लिये उनको राजकीय समर्थन मिला होता है वरना तो कंपनी के असली स्वामी तो उसके शेयर धारक और ऋणदाता होते हैं। कंपनी पश्चिम का ऐक ऐसा तंत्र हैं जिसमें गुलाम को प्रबंधक निदेशक के रूप में स्वामी बना दिया जाता है। पैसा उसका होता नहीं पर वह दिखता ऐसा है जैसे कि स्वामी हो। इसे हम यूं कह सकते हैं कि गुलामों को स्वामी बनाने का तंत्र हैं कंपनी! जिसमें गुलाम अपनी चालाकी से स्वामी बना रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई स्त्री कंपनी की प्रबंध निदेशक है तो वह अपने धन पर नहीं शेयर धारकों और ऋणदाताओं के कारण है। फिर उसके साथ तमाम तरह के विशेषज्ञ रहते हैं जो अपनी शक्ति से उसे बनाते हैं। कंपनी के प्रबंध निदेशक तो कई जगह मुखौटे होते हैं। ऐसे में यह कहना कठिन है कि किसी स्त्री का शिखर पर पहुंचना अपनी बुद्धि और परिश्रम के कारण है या अपने मातहतों के कारण।<br />
बहरहाल स्त्री का जीवन कठिन होता है। यह सभी जानते हैं कि कोई भी स्त्री अपनी ममता के कारण ही अपनी पति और पुत्र की सेवा करने में जरा भी नहीं झिझकती। पिता अपनी संतान के प्रति मोह को दिखाता नहीं है पर स्त्री की ममता को कोई धीरज का बांध रोक नहीं सकता।<br />
ऐसे में जो कामकाजी औरते हैं उनके लिये दोहरा तनाव होता है। यह तनाव अनेक तरह की बीमारियों का जनक भी होता है।<br />
ऐसे में उन चीनी सज्जन ने जो काम शुरु किया है पता नहीं चल कैसे रहा है? कोई औरत कितनी भी दुःखी क्यों न हो दूसरे को घूंसा मारकर खुश नहीं हो सकती। भारी से भारी तकलीफ में भी वह दूसरे के लिये अपना प्यार ही व्यक्त करती है। अब यह कहना कठिन है कि कथित आधुनिक विकास ने-मायावी विकास का चरम रूप इस समय चीन में दिख रहा है-शायद ऐसी महिलाओं का एक वर्ग बना दिया होगा।<br />
आखिरी बात यह है कि उस व्यक्ति ने अपने घर पर यह नहीं बताया कि उसने दूसरी महिलाओं से पिटने काम शुरु किया है। वजह! अरे, घर पर पत्नी ने मारा तो पैसे थोड़े ही देगी! जब गुस्से में होगी तो एक थप्पड़ मारेगी, पर जिस दिन धंधा मंदा हुआ तो पता लगा कि इस दुःख में अधिक थप्पड़ मार रही है कि पति के कम कमाने के कारण वह बड़ गया। फिलहाल भारत में ऐसे व्यवसाय की सफलता की संभावना नहीं है क्योंकि भारतीय स्त्रियां भले ही मायावी विकास की चपेट में हैं पर सत्य यानि अध्यात्मिक ज्ञान अभी उनका लुप्त नहीं हुआ है। वैसे जब पश्चिम का मायावी विकास कभी इसे खत्म कर देगा इसमें संदेह नहीं है। </p>
<p><b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p><strong>यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://teradipak.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a>पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://deepakraj.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com/">3.अनंत शब्दयोग</a><br />
</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मानवाधिकार-व्यंग्य आलेख (manvadhikar-vyanyga chittan)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/29/manvadhikar-vyangya-chitan/</link>
<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 05:58:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/29/manvadhikar-vyangya-chitan/</guid>
<description><![CDATA[वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो आदमी अपने रिश्तेदार को पानी के लिये भी नहीं पूछता। वैसे यह मानवीय प्रवृत्ति पुराने समय से है कि बिना मतलब के कोई  किसी का काम नहीं करता पर आजकल के समय में कुछ कथित समाज सेवक देखकर यह साफ लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से लाभ लिये बिना काम नहीं कर रहे हैं ।  यही स्थिति मानवाधिकार के लिये काम करने वाले लोगों और उनके संगठनों के बारे में देखी जा सकती है। हम तो सीधी बात कहें कि जब हम किसी को जनकल्याण, मानवाधिकार या किसी अन्य सार्वजनिक अभियान चलाते हुए देखते हैं तो उसके उद्ददेश्य से अधिक इस बात को जानने का प्रयास करते हैं कि वह उसके पीछे कौनसा अपना हित साध कहा है।<br />
आतंकवाद के बारे में कुछ विशेषज्ञों का स्पष्टतः मानना है कि यह एक उद्योग है जिसके सहारे अनेक दो नंबरी व्यवसाय चलते हैं।  आंकड़े इस बात का प्रमाण है कि जहां आतंकवाद दृष्टिगोचर होता है वहीं दो नंबर का व्यापार अधिक रहता है। आतंकवाद को उद्योग इसलिये कहा क्योंकि किसी नवीन वस्तु का निर्माण करने वाला स्थान ही उद्योग कहा जाता है और आतंकवाद में एक इंसान को हैवान बनाने का काम होता है।  इसी आतंकवाद या हिंसा का सहायक व्यापार मानवाधिकार कार्यक्रम लगता है।  नित अखबार और समाचार पत्र पढ़ते हुए कई प्रश्न कुछ लोगों के  दिमाग में घुमड़ते हैं।  इसका जवाब  इधर उधर ढूंढते हैं पर कहीं नहीं मिलता।  जवाब तो तब मिले जब वैसे सवाल कोई उठाये। कहने का तात्पर्य यह है सवाल करने वालों का भी टोटा है।<br />
बहरहाल एक बड़ा उद्योग या व्यवसाय अनेक सहायक व्यवसायों का भी पोषक होता है। मान लीजिये कहीं कपड़े के नये बाजार का निर्माण होता है तो उसके सहारे वहां चाय और नाश्ते की दुकानें खुल जाती हैं।  वजह यह है कि कपड़े का बाजार है पर वहां रहने वाले दुकानदार और आगंतुकों के लिये खाने पीने की व्यवस्था जरूरी है। इस तरह कपड़े का मुख्य स्थान होते हुए भी वहां अन्य सहायक व्यवसाय स्थापित हो जाते हैं। कहीं अगर बुनकरी का काम होता है तो उसके पास ही दर्जी और रंगरेज की दुकानें भी खुल जाती हैं।  यही स्थिति शायद आतंकवाद के उद्योग के साथ है। जहां इसका प्रभाव बढ़ता है वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता अधिक सक्रिय हो जाते हैं।  उनकी यह बात हमें बकवाद लगती है कि वह केवल स्व प्रेरणा की वजह से यह काम कर रहे हैं।  यह ऐसे ही जैसे कपड़े की बाजार के पास कोई चाय की दुकान खोले और कहे कि ‘मैं तो यहां आने वाले व्यापारियों की सेवा करने आया हूं।’<br />
ऐसे अनेक निष्पक्ष विशेषज्ञ हैं जो भले ही साफ न कहते हों पर विश्व भर में फैले आतंकवाद के पीछे काम कर रहे आर्थिक तत्वों का रहस्ययोद्घाटन करते हैं पर वह  समाचार पत्रों में अंदर के कालम में छपते हैं और फिर उन पर कोई अधिक नहीं लिखता क्योंकि विश्व भर में बुद्धिजीवियों को तो जाति, भाषा, धर्म, और क्षेत्र के नाम पर फैल रहे आतंकवाद की सच्चाई पर ध्यान देने की बजाय उसके कथित विषयों पर अनवरत बहस करनी होती है।  अगर वह इस सच को एक बार मान लेंगे कि इसके पीछे दो नंबर का धंधा चलाने वाले किसी न किसी रूप से अपना आर्थिक सहयोग इसलिये देते हैं ताकि प्रशासन का ध्यान बंटे और उनका काम चलते रहे, तो फिर उनके लिये बहस की गुंजायश ही कहां बचेगी? फिर मानवाधिकार कार्यकताओं का काम भी कहां बचेगा, जिसके सहारे अनेक लोग मुफ्त का खाते हैं बल्कि प्रचार माध्यमों को अपने कार्यक्रमों की जगह भरने के लिये अपने शब्द और चेहरा भी प्रस्तुत करते हैं।<br />
शक की पूरी गुंजायश है और यह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में छपी सामग्री पर थोड़ा भी चिंतन करें तो वह पुख्ता भी हो जाता है।  यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मानवाधिकारों का हनन हो रहा है।  ऐसा कोई भी गांव या शहर नहीं है जो इससे मुक्त हो। अलबत्ता घटना केवल उन्हीं जगहों की सामने आती हैं जिनको प्रचार माध्यम इन्हीं मानवाधिकार कार्यकताओं के सहारे प्राप्त करते हैं।<br />
आप जरा ध्यान से अखबार पढ़ें कि भारत के मध्य क्षेत्र में ऐसे अनेक एनकांउटर होते हैं जिनमें किसी कुख्यात अपराधी को मार दिया जाता है।  उस पर उसके परिवार वाले विरोध भी जताते हैं पर वहां कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता या संगठन सक्रिय नहीं होता क्योंकि इसके लिये उनको कोई प्रायोजक नहीं मिलता। प्रायोजक तो वहीं मिलेगा जहां से आय अच्छी होती हो।  सीमावर्ती क्षेत्रों से तस्करी और घुसपैठ को लेकर अनेक संगठन कमाई करते हैं और इसलिये वहां आतंकवादियों की सक्रियता भी रहती है।  इसलिये वहां सुरक्षाबलों से उनकी मुठभेड भी होती है जिसमें लोग मारे जाते हैं। मानवाधिकर कार्यकर्ता वहां एकदम सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता पर कोई आपत्ति नहीं है पर मध्य क्षेत्र में उनकी निष्क्रियता संदेह पैदा करती है।  पूर्वी क्षेत्र को लेकर इस समय हलचल मची हुई है।  हिंसक तत्व वहां की प्राकृत्तिक संपदा का दोहन करने का आरोप लगाते हुए सक्रिय हैं। वह अनेक बार अनेक सामान्य सशस्त्र कर्मियों को मार देते हैं पर इन हिंसक तत्वों में कोई मरता है तो मानवाधिकार कार्यकर्ता उसका नाम लेकर चिल्लाते हैं।  सवाल यह है कि क्या यह मानवाधिकार कार्यकर्ता यह मानते हैं कि सामान्य सुरक्षा अधिकारी या कर्मचारी का तो काम ही मरना है। उसका तो कोई परिवार ही नहीं है।  उसके लिये यह कभी आंसु नहीं बहाते।<br />
कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि अगर कहीं संसाधनों के वितरण को लेकर हिंसा हो रही है तो वह इसलिये नहीं कि आम आदमी तक उसका हिस्सा नहीं पहुंच रहा बल्कि यह कि उसका कुछ हिस्सा हिंसक तत्व स्वयं अपने लिये चाहते हैं।  इसके अलावा यह हिंसक तत्व आर्थिक क्षेत्र की आपसी प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे को निपटाने के काम भी आते हैं<br />
इसके बाद भी एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कुछ लोगों ने तो बड़ी बेशर्मी से खास जाति, भाषा और धर्म के समूह पकड़ कर उनके मानवाधिकारों के हनन का प्रचार कर रखा है।  इसमें भी उनका स्वार्थ दिखाई देता है।  इनमें अगर जातीय या भाषाई समूह हैं तो उनका धरती क्षेत्र ऐसा है जो धन की दृष्टि से उपजाऊ और धार्मिक है तो उसके लिये कहीं किसी संस्था से उनको अप्रत्यक्ष रूप से पैसा मिलता है-उनकी गतिविधियां यही संदेह पैदा करती हैं।  इधर फिर कुछ ऐसे देश अधिक धनवान हैं जो धर्म पर आधारित शासन चलाते हैं और उनके शासनध्यक्षों से कृपा पाने के लिये कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता उनके धर्म की पूरे विश्व में बजा रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यह मानवाधिकार कार्यक्रम चलाने वाले जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र की दृष्टि से बंटे समाज में ऐसे छिद्र ढूंढते हैं जिनको बंद करने का प्रयास सुधारक करते हैं।<br />
अखबार में एक नहीं अनेक ऐसी खबरें छपती हैं जिनमें मानवाधिकार हनन का मामला साफ बनता है पर वहां कार्यकर्ता लापता होते हैं।  कल एक ब्लाग में पढ़ने को मिला जिसमें बताया कि सरकार ने धारा 498-ए के तहत मामले छानबीन के बाद दर्ज करने का आदेश जारी किया है क्योंकि पाया गया कि इसमें फर्जी मामले दर्ज हुए और शिकायत में ढेर सारे नाम थे पर छानबीन के बाद जांच एजेंसियों ने पैसा खाकर कुछ लोगों को छोड़ा। इतना ही नहीं कई में तो शिकायत ही झूठी पायी गयी।  इससे अनेक लोगों को परेशानी हुई। इस तरह के कानून से हमारे भारतीय समाज के कितने लोगों को परेशानी झेलनी पड़ी है इस पर कथित रूप से कोई मानवाधिकार संगठन कभी कुछ नहीं बोला। सरकार ने स्वयं ही यह काम किया।  यह कैसे मान लें कि सरकार समाज का दर्द नहीं जानती। मानवाधिकार कार्यकर्ता तो केवल चिल्लाते हैं पर सरकार अपना काम करती है,यह इसका प्रमाण है<br />
सच तो हम नहीं जानते। अखबार और टीवी के समाचारों के पीछे अपने चिंत्तन के घोड़े दौड़ाते है-हमारे गुरु जी का भी यही संदेश है- तब यही सवाल हमारे दिमाग में आते हैं। दूसरा हमारा फार्मूला यह है कि आज कल कोई भी आदमी बिना स्वार्थ के समाज सेवा नहीं करता। फिर उनके चेहरे भी बताते हैं कि वह कितने निस्वार्थी होंगे।  हम ब्रह्मा तो हैं नहीं कि सब जानते हों। हो सकता है कि हमारी सोच में ही कमी हो। एक आम लेखक के रूप में यही अभिव्यक्ति दिखी, व्यक्त कर दी।<br />
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
</b><br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[भावनाओं का व्यापर-हिन्दी आलेख और व्यंग्य कविताएँ ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/28/sanevenaon-ka-vyapar-hindi-article-and-poem/</link>
<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 06:27:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/28/sanevenaon-ka-vyapar-hindi-article-and-poem/</guid>
<description><![CDATA[जिन हिंन्दी के महानुभावों ने रसों की पहचान दी है वह भी खूब रहे होंगे। अगर वह इन रसों की पहचान नहीं क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>जिन हिंन्दी के महानुभावों ने रसों की पहचान दी है वह भी खूब रहे होंगे। अगर वह इन रसों की पहचान नहीं कराते तो शायद हिन्दी वाले कई ऐसी चीजों को नहीं समझ पाते जिनको बाजार के सौदागर बेचने के लिये सजाते हैं।  वात्सल्य, श्रृंगार, वीभत्स, हास्य, भक्ति, करुण तथा वीर रस की चाश्नी में डुबोकर फिल्में बनायी जाती थीं। फिर टीवी चैनल भी बनने लगे।   अधिकतर धारावाहिक तथा फिल्मों की कथा पटकथा में सभी रसों का समावेश किया जाता है।  मगर अब समाचारों के प्रसारण में भी इन रसों का उपयोग इस तरह होने लगा है कि उनको समझना कठिन है।  कभी कभी तो यह समझ में नहीं आता है कि वीर रस बेचा जा रहा है कि करुणता का भाव पैदा किया जा रहा है या फिर देशभक्ति का प्रदर्शन हो रहा है।<br />
इस देश में आतंकवाद की अनेक घटनायें हो चुकी हैं। पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई पर हमला किया गया था।  सैंकड़ों बेकसूरों की जान गयी।  इससे पहले भी अनेक हमले हो चुके हैं और उनमें हजारों बेकसूर चेतना गंवा चुके हैं।  मगर मुंबई हमले की बरसी मनाने में प्रचार तंत्र जुटा हुआ है। कहते हैं कि मुंबई पर हुआ हमला पूरे देश पर हमला था तब बाकी जगह हुआ हमला किस पर माना जाये? जयपुर, दिल्ली और बनारस भी इस देश में आते हैं। फिर केवल मुंबई हादसे की बरसी क्यो मनायी जा रही है? जवाब सीधा है कि बाकी शहरों में सहानुभूति के नाम पर पैसे खर्च करने वाले अधिक संभवतः न मिलें।   मुंबई में फिल्म बनती है तो टीवी चैनलों के धारावाहिक  का भी निर्माण होता है। क्रिकेट का भी वह बड़ा केंद्र है।  सच तो यह है कि दिल्ली, बनारस और जयपुर किसी के सपनों में नहीं बसते जितना मुंबई। इसलिये उसके नाम पर मुंबई के भावुक लोगों के साथ बाहर के लोग भी पैसे खर्च कर सकते हैं। सो बाजार तैयार है!<br />
वैसे संगठित प्रचार माध्यम-टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकायें-यह सवाल नहीं उठायेंगे कि क्या बाजार का आतंकवाद से किसी तरह का क्या कोई अप्रत्यक्ष संबंध है जो अमेरिका की तर्ज पर यहां भी मोमबतियां जलाने के साथ एस.एम.एस. संदेशों की तैयारी हो रही है। अलबत्ता अंतर्जाल पर अनेक वेबसाईटों और ब्लाग पर इस तरह के सवाल उठने लगे हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि बाजार का अब वैश्वीकरण हो गया है इसलिये उसके लिये देश की कोई सीमा तो हो नहीं सकती पर वह भक्ति रस बेचने के लिये देशभक्ति का शगुफा छोड़ने से बाज नहीं आयेगा। जहां तक संवेदनाओं के मानवीय गुण होने का सवाल है तो क्या बाजार इस बात की गारंटी दे रहा है कि वह मुफ्त में मोमबत्त्यिां बंटवायेगा या एस. एम. एस. करवायेगा। यकीनन नहीं!<br />
एक बाद दूसरी भी है कि इधर मुंबई के हमलावारों के बारे में अनेक जानकारी इन्हीं प्रचार माध्यमों में छपी हैं। योजनाकर्ताओं के मुंबईया फिल्म हस्तियों से संबंधों की बात तो सभी जानते हैं।  इतना ही नहीं उनके भारतीय बैंकों में खातों की भी चर्चा होती है। पहले भी अनेक आतंकवादियों के भारत की कंपनियों में विनिवेश की चर्चा होती रही है।  फिल्मों में भी ऐसे अपराधियों का धन लगने की बात इन्हीं प्रचार माध्यमों में चलती  रही है जो आतंकवाद को प्रायोजित करते  हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि इस देश के पैसे से ही आतंकवादी अपना  तंत्र चला रहे हैं।  एक बात तय रही है कि यह अपराधी या आतंकवादी कहीं पैसा लगाते हैं तो फिर चुप नहीं बैठते होंगे बल्कि उन संगठनों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अपना नियंत्रण रखते होंगे  जिनमें उनका पैसा लगा है। मतलब सीधा है कि बाजार के कारनामों में में उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका हो सकती है पर शायद बाजार के प्रबंधक इसका आभास नहीं कर पाते।  सच तो हम नहीं जानते पर इधर उधर देखी सुनी खबरों से यह आभास किसी को भी हो सकता है। ऐसे में आतंकवाद की घटनाओं में बाजार का रवैया उस हर आम आदमी को सोचने को मजबूर कर सकता है जो फालतु चिंतन में लगे रहते हैं।  वैसे पता नहीं आतंकवादी घटनाओं को लोग सामान्य अपराध शास्त्र से पृथक होकर क्यों देखते हैं क्योंकि उसका एक ही सिद्धांत है कि जड़ (धन), जोरु  (स्त्री) तथा जमीन के लिये ही  अपराध होता है। आतंकवादी घटनाओं के बाद अगर यह देखा जाये कि किसको क्या फायदा हुआ है तो फिर संभव है कि अनेक प्रकार के ऐसे समूहों पर संदेह जाये जिनका ऐसी घटनाओं से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं होता? हालांकि इस विचार से  भाषा, जाति, तथा धर्म तथा क्षेत्र के नाम पर होने वाली  आतंकवादी घटनाओं की विवेचना भी भटक सकती है क्योंकि बाजार में सभी सौदागर ऐसे नहीं कि वह आतंकवाद को धन से प्रश्रय दें अलबत्ता वह लोगों में करुण रस को दोहने इसलिये करते हैं क्योंकि यह उनका काम है? बहरहाल प्रस्तुत है इस पर कुछ काव्यात्मक पंक्तियां-<br />
<b>सज रहा है<br />
देश का बाजार रस से।<br />
कुछ देर आंसु बहाना<br />
दिल में हो या न हो<br />
पर संवेदना बाहर जरूर बरसे।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;<br />
कभी कभी त्यौहार पर<br />
जश्न की होती थी तैयारी।<br />
अब विलाप पर भी सजने लगा है बाजार<br />
सभी ने भर ली है जेब<br />
उसे करुण रस में बहाकर निकालने की<br />
आयी अब सौदागरों की बारी।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
तारीखों में इतने भयंकर मंजर देखे हैं<br />
कि दर्द का कुंआ सूख गया है।<br />
इतना खून बहा देख है इन आंखों ने कि<br />
आंसुओं की नयी धारा  बहाये<br />
वह हिमालय अब नहीं रहा,<br />
देशभक्ति के जज़्बात<br />
हर रोज दिखाओ<br />
यह भी किसने कहा,<br />
जो दुनियां छोड़ गये<br />
उनकी क्या चिंता करना<br />
जिंदा लोगों का भी हो गया रोज मरना<br />
ऐ सौदागरों,<br />
करुण रस में मत डुबोना पूरा यह ज़माना,<br />
इस दिल को तुमने ही आदत डाली है<br />
और अधिक प्यार मांगने की<br />
क्योंकि तुम्हें था अधिक कमाना,<br />
अब हालत यह है इस दिल की<br />
प्यार क्या मांगेगा<br />
नफरत करने से भी रूठ गया है।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://anantraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[लायकी से अधिक मिले तो घमंड आ ही जाता है-विदुर नीति-(yogyata aur ghamand-hindu sandesh)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/28/layiki-aur-ghamand-vidur-nigi/</link>
<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 05:14:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/28/layiki-aur-ghamand-vidur-nigi/</guid>
<description><![CDATA[कौटिल्य महाराज के अनुसार &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;- उच्चेरुच्च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><span style="font-size:small;"><strong>कौटिल्य महाराज के अनुसार </strong></span><br />
<span style="font-size:small;"><strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</strong></span><br />
<strong></strong><strong>उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदन्यायच्छतै महान्।<br />
नवैनींचैस्तरां याति निपातभयशशकया।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने वाला व्यक्ति महान पद् पर तो विराजमान हो जाता है पर उससे नीचे गिरने की भय और आशंका से वह नैतिक आधार पर नीचे से नीचे गिरता जाता है।<br />
<strong>प्रमाणश्चधिकश्यापि महत्सत्वमधष्ठितः।<br />
पदं स दत्ते शिरसि करिणः केसरी यथा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>प्रमाणित योग्यता से अधिक पद की इच्छा करने वाला व्यक्ति भी उस महापद पर विराजमान हो जाता है उसी प्रकार जैसे सिंह हाथी पर अधिष्ठित हो जाता है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>समाज के सभी क्षेत्रों में शिखर पर विराजमान पुरुषों से सामान्य पुरुष बहुत सारी अपेक्षायें करते हैं। वह उनसे अपेक्षा करते हैं कि आपात स्थिति में उनकी सहायता करें। ज्ञानी लोग ऐसी अपेक्षा नहीं करते क्योंकि वह जानते हैं कि शिखर पर आजकल कथित बड़े लोग कोई सत्य या योग्यता की सहायता से नहीं पहुंचते वरन कुछ तो तिकड़म से पहुंचते हैं तो कुछ धन शक्ति का उपयोग करते हुए। ऐसे लोग स्वयं ही इस चिंता से दीन अवस्था में रहते हैं कि पता नहीं कब उनको उस शिखर से नीचे ढकेल दिया जाये। चूंकि उच्च पद पर होते हैं इसलिये समाज कल्याण का ढकोसला करना उनको जरूरी लगता है पर वह इस बात का ध्यान रखते हैं कि उससे समाज का कोई अन्य व्यक्ति ज्ञानी या शक्तिशाली न हो जाये जिससे वह शिखर पर आकर उनको चुनौती दे सके। उच्च पद या शिखर पर बैठे लोग डरे रहते हैं और डर हमेशा क्रूरता को जन्म देता है। यही क्रूरता ऐसे शिखर पुरुषों को निम्न कोटि का बना देती है अतः उनमें दया या परोपकार का भाव ढूंढने का प्रयास नहीं करना चाहिए।<br />
यही हाल उन लोगों का भी है जिनको योग्यता से अधिक सम्मान या पद मिल जाता है। मायावी चक्र में सम्मान और पद के भूखे लोगों से ज्ञानी होने की आशा करना व्यर्थ है। उनको तो बस यही दिखाना है कि वह जिस पद पर हैं वह अपनी योग्यता के दम पर हैं और इसलिये वह बंदरों वाली हरकतें करते हैं। अपनी अयोग्यता और अक्षमता उनको बहुत सताती है इसलिये वह बाहर कभी मूर्खतापूर्ण तो कभी क्रूरता पूर्ण हरकतें कर समाज को यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वह योग्य व्यक्ति हैं। ऐसे लोगों की योग्यता को अगर कोई चुनौती दे तो वह उसे अपने पद की शक्ति दिखाने लगते हैं। अपनी योग्यता से अधिक उपलब्धि पाने वाले ऐसे लोग समाज के विद्वानों, ज्ञानियों और सज्जन पुरुषों को त्रास देकर शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। वह अपने मन में अपनी अयोग्यता और अक्षमता से उपजी कुंठा इसी तरह बाहर निकालते हैं। अतः जितना हो सके ऐसे लोगों से दूर रहा जाये। कहा भी जाता है कि घोड़े के पीछे और राजा के आगे नहीं चलना चाहिये।<br />
आजकल हम जब किसी बड़े पदासीन व्यक्ति को देखते हैं तो यह भी नहीं समझना चाहिए कि वह कोई अधिक योग्य है क्योंकि अनेक ऐसे लोग जो अपनी योग्यता से अधिक का पद पाने&#160;&#160;की कामना कहते हैं वह येनकेन प्रकरेन उस पद पर पहुँच जाते है,या &#160;फिर दूसरे लोग मुखौटे की तरह उनको वहां बिठा देते हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#160; </p>
<blockquote><p>
<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://terahdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चेहरा बदल जाता है, चाल नहीं-व्यंग्य कविता (Face turns, not tricks - satirical hindi poem) ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2009/11/22/chal-aur-chehra-hindi-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 14:33:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2009/11/22/chal-aur-chehra-hindi-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[इंसान के चेहरे बदल जाते हैं नहीं बदलती चाल। खून खराबा करने वाले हाथ बदल जाते हैं वही रहती तलवार और ढ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>इंसान के चेहरे बदल जाते हैं<br />
नहीं बदलती चाल।<br />
खून खराबा  करने वाले<br />
हाथ बदल जाते हैं<br />
वही रहती तलवार और ढाल।</p>
<p>इंसान से ही उगे इंसान<br />
संभालते  उसका खानदान<br />
जमाने को काबू करने का मिला जिनको वरदान,<br />
पांव हमेशा पेट की तरफ ही मुड़ता है,<br />
दौलत से ही  किस्मत का साथ जुड़ता है,<br />
बड़े आदमी करते दिखावा<br />
जमाने का भला करने का<br />
मगर लूटते हैं गरीब का दान,<br />
छोटे आदमी के हिस्से आता है अपमान,<br />
थामे अपनी अगली पीढ़ी का झंडा<br />
लुटेरे लूट रहे जमाने को<br />
लगे हैं कमाने को<br />
अपनी दौलत शौहरत देकर<br />
अपनी औलाद में जिंदा<br />
रहने की ख्वाहिश पाले<br />
मौत की सोच पर लगा ताले<br />
दौड़ जा रहे हैं इज्जतदार लोग,<br />
लिये साथ पाप और रोग<br />
वाह री कुदरत! तेरा कमाल।</b></p>
<p><b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://rajlekh-patrika.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
</b></p>
<blockquote><p>
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</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भूख और बन्दूक-हिंदी लेख (Hunger and gun - Hindi article)]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/2009/11/22/bhookh-aur-banduk-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 14:27:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.wordpress.com/2009/11/22/bhookh-aur-banduk-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[भूखे पेट भजन नहीं होते-यह सच है पर साथ ही यह भी एक तथ्य है कि भूखे पेट गोलियां या तलवार नहीं चलती। द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>भूखे पेट भजन नहीं होते-यह सच है पर साथ ही यह भी एक तथ्य है कि भूखे पेट गोलियां या तलवार नहीं चलती।  देश में कुछ स्थानों-खासतौर से पूर्व क्षेत्र-में व्याप्त हिंसा में अपनी वैचारिक जमीन तलाश रहे कुछ विकासवादी देश के बुद्धिजीवियों को ललकार रहे हैं कि ‘तुम उस इलाके की हकीकत नहीं जानते।’<br />
यह कहना कठिन है कि वह स्वयं उन इलाकों को कितना जानते हैं पर उनके पाठ हिंसा का समर्थन करने वाले बदलाव की जमीन पर लिखे जाते हैं। अपने ढोंग और पाखंड को वह इस तरह पेश करते हैं गोया कि जैसे कि सत्य केवल उनके आसपास ही घूमता हो।  दूसरी समस्या यह है कि उनके सामने खड़े परंपरावादी लेखक कोई ठोस तर्क प्रस्तुत कर उनका प्रतिवाद नहीं करते। बस, सभी हिंसा और अहिंसा के नारे लगाते हुए द्वैरथ करने में व्यस्त है।<br />
इन हिंसा समर्थकों से सवाल करने से पहले हम यह स्वीकार करते हैं कि गरीब, आदिवासी तथा मजदूरों को शोषण सभी जगह होता है।  इसे रुकना चाहिये पर इसका उपाय केवल राजकीय प्रयासों के साथ इसके लिये अमीर और गरीब वर्ग में चेतना लाने का काम भी होना चाहिये।  हमारे अध्यात्मिक ग्रंथ यही संदेश देते हैं कि अमीर आदमी हमेशा ही गरीब की मदद करे। किसी भी काम या उसे करने वाले को छोटा न समझे। सभी को समदर्शिता के भाव से देखें। इस प्रचार के लिये किसी प्रकार की लाल या पीली किताब की आवश्यकता नहीं है। कम से कम विदेशी विचार की तो सोचना भी बेकार है।<br />
अब आते हैं असली बात पर।  वह लोग भूखे हैं, उनका शोषण हो रहा है, और  बरसों से उनके साथ न्याय नहीं हुआ इसलिये उन्होंने हथियार उठा लिये। यह तर्क विकासवादी बड़ी शान से देते हैं।  जरा यह भी बतायें कि जंगलों में अनाज या फलों की खेती होती  है न कि बंदूक और गोलियों की।  वन्य और धन संपदा का  हिस्सा अगर उसके मजदूरों को नहीं मिला तो उन्होंने हथियार कैसे उठा लिये? क्या वह भी पेड़ पर उगते हैं?<br />
अब तर्क देंगे कि-‘सभी नहीं हथियार खरीदते कोई एकाध या कुछ  जागरुक आदमी उनको न्याय दिलाने के लिये खरीद ही लेते हैं।’<br />
वह कितनों को न्याय दिलाने के लिये हथियार खरीद कर चलाते हैं। एक, दो, दस, सौ या हजार लोगों के लिये? एक बंदूक कोई पांच या दस रुपये में नहीं आती। उतनी रकम से तो वह कई भूखे लोगों को खाना खिला सकते हैं।  फिर जंगल में उनको बंदूक इतनी सहज सुलभ कैसे हो जाती है। इन कथित योद्धाओं के पास केवल बंदूक ही नहीं आधुनिक सुख सुविधा के भी ढेर सारे साधन भी होते हैं। कम से कम व गरीब, मजदूर या शोषित नहीं होते बल्कि उनके आर्थिक स्त्रोत ही संदिग्ध होते हैं।<br />
विकासवादियों का तर्क है कि पूर्वी इलाके में खनिज और वन्य संपदा के लिये देश का पूंजीपति वर्ग राज्य की मदद से लूट मचा रहा है उसके खिलाफ स्थानीय लोगों का असंतोष ही हिंसा का कारण है। अगर विकास वादियों का यह तर्क मान लिया जाये तो उनसे यह भी पूछा जाना चाहिये कि क्या हिंसक तत्व वाकई इसलिये संघर्षरत हैं? वह तमाम तरह के वाद सुनायेंगे पर सिवाय झूठ या भ्रम के अलावा उनके पास कुछ नहीं है।  अखबार में एक खबर छपी है जिसे पता नहीं विकासवादियों ने पढ़ा कि नहीं । एक खास और मशहूर आदमी के विरुद्ध आयकर विभाग आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच कर रहा है।  उसमें यह बात सामने आयी है कि उन्होंने पद पर रहते हुए ऐसी कंपनियों में भी निवेश किया जिनका संचालन कथित रूप से इन्हीं पूर्वी क्षेत्र के हिंसक तत्वों के हाथ में प्रत्यक्ष रूप से था।  यानि यह हिंसक संगठन स्वयं भी वहां की संपत्तियों के दोहन में रत हैं। अब इसका यह तर्क भी दिया जा सकता है क्योंकि भूख और गरीबी से लड़ने  के लिये पैसा चाहिये इसलिये यह सब करते हैं।  यह एक महाढोंग जताने वाला तर्क होगा क्योंकि आपने इसके लिये उसी प्रकार के बड़े लोगों से साथ लिया जिन पर आप शोषण का आरोप लगाते हैं।  हम यहां किसी का न नाम लेना चाहते हैं न सुनना क्योंकि हमारा लिखने का मुख्य उद्देश्य केवल बहस में अपनी बात रखना हैं।<br />
इन पंक्तियों के लेखक के इस पाठ का आधार समाचार पत्र, टीवी और अंतर्जाल पर इस संबंध में उपलब्ध जानकारी ही है। एक सामान्य आदमी के पास यही साधन होते हैं जिनसे वह कुछ जान और समझ पाता है। इनसे इतर की गतिविधियों के बारे में तो कोई जानकारी ही समझ सकता है।<br />
इन हिंसक संगठनों ने अनेक जगह बम विस्फोट कर यह सबित करने का प्रयास किया कि वह क्रांतिकारी हैं। उनमें मारे गये पुलिस और सुरक्षा बलों के सामान्य कर्मचारी और अधिकारी।  एक बार में तीस से पचास तक लोगों की इन्होंने जान ली। इनसे पूछिये कि अपनी रोजी रोटी की तलाश में आये सामान्य जनों की जान लेने पर उनके परिवारों का क्या हश्र होता है वह जानते हैं? सच तो यह है कि यह हिंसक संगठन कहीं न कहीं उन्हीं लोगों के शोषक भी हो सकते हैं जिनके भले का यह दावा करते हैं।  जब तक गोलियों और बारुद प्राप्त करने के आर्थिक स्त्रोतों का यह प्रमाणिक रूप से उजागर नहीं करते तब उनकी विचारधारा के आधार पर बहस बेकार है।  इन पर तब यही आरोप भी लगता है कि हिंसक तत्व ही इनको प्रायोजित कर रहे हैं।<br />
भारत में शोषण और अनाचार कहां नहीं है।  यह संगठन केवल उन्हीं जगहों पर एकत्रित होते हैं जहां पर जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रीय आधार पर लोगों को एकजुट करना आसान होता है। यह आसानी वहीं अधिक होती है जहां बाहर से अन्य लोग नहीं पहुंच पाते। जहां लोग बंटे हुए हैं वहां यह संगठन काम नहीं कर पाते अलबत्ता वहां चर्चाएं कर यह अपने वैचारिक आधार का प्रचार अवश्य करते हैं।  बहरहाल चाहे कोई भी कितना दावा कर ले। हिंसा से कोई मार्ग नहीं निकलता। वर्तमान सभ्यता  में अपने विरुद्ध अन्याय, शोषण तथा दगा के खिलाफ गांधी  का अहिंसक आंदोलन ही प्रभावी है।  हिंसा करते हुए बंदूक उठाने का मतलब है कि आप उन्हीं पश्चिम देशों का साथ दे रहे हैं जो इनके निर्यातक हैं और जिनके आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सम्राज्य के खिलाफ युद्ध का दावा करते हैं।   यह वैचारिक बहस केवल दिखावे की और प्रायोजित लगती है। जब तक हथियारों के खरीदने के लिये जुटाये धन के स्त्रोत नहीं बताये जाते।  जहां तक पूर्वी इलाकों को जानने या न जानने की बात है तो शोषण, अन्याय और धोखे की प्रवृत्ति सभी जगह है और उसे कहीं बैठकर समझा जा सकता है। आईये<br />
इस पर इस लेखक की कुछ पंक्तियां<br />
यह सत्य है कि<br />
<b>भूखे पेट भजन नहीं होता।<br />
मगर याद रहे<br />
जिसे दाना अन्न का न मिले<br />
उसमें बंदूक चलाने का भी माद्दा भी नहीं होता।<br />
अरे, हिंसा में वैचारिक आधार ढूंढने वालों!<br />
अगर गोली से<br />
रुक जाता अन्याय, शोषण और गरीबी तो<br />
पहरेदारों का<br />
अमीरों के घर पहरा न होता।<br />
तुम शोर कर रहे हो जिस तरह<br />
सोच रहे सारा जमाना बहरा होता।<br />
कौन करेगा तुम्हारे इस झूठ पर यकीन कि<br />
अन्न और धन नहीं मिलता गरीबों और भूखों को<br />
पर उनको बंदूक और गोली देने के लिये<br />
कोई न कोई मेहरबान जरूर होता।<br />
</b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
<strong>कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://zeedipak.blogspot.com</strong></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
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</div>]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[अश्लीलता और श्लीतता में अंतर-हिंदी  हास्य व्यंग्य कविताएँ]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/22/shlilata-hindi-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 14:20:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/22/shlilata-hindi-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अश्लीलता और श्लीतता में अंतर कितना रह गया है बस छह इंच के कपड़े का। क्यों इतना रोज छोड़ मचता है खत्म क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अश्लीलता और श्लीतता में<br />
अंतर कितना रह गया है<br />
बस छह इंच के कपड़े का।<br />
क्यों इतना रोज छोड़ मचता है<br />
खत्म कर दो हर कायदा<br />
कोई पहने या न पहने<br />
लगा दो एक नारा चौराहे पर<br />
अपनी इज्जत की रक्षा खुद करें<br />
दूसरे में तब देखें<br />
पहले अपनी आंखों में शर्म भरें<br />
नहीं मिलेगा कोई पहरेदार<br />
आपनी आबरू के लिये बनो खुद्दार<br />
और भी जमाने में मुसीबतें हैं<br />
नहीं करेगा कोई कायदा हिफाजत<br />
हल खुद ही करो पहनावे के लफड़ा।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
निर्देशक ने अपनी फिल्म के<br />
कपड़ा निर्देशक से<br />
चर्चा करते हुए कहा<br />
‘भई, यह कम बजट की फिल्म है<br />
इसलिये अधिक पैसे की उम्मीद नहीं करना।<br />
इसमें केवल नायक के कपड़े ही<br />
अधिक बनाने होंगे<br />
नायिका तो पूरी फिल्म में छह इंच के ही<br />
वस्त्र धारण करेगी<br />
कभी कभी एक फुट का भी वेश धरेगी<br />
इसलिये अपने अनुबंध में<br />
कपड़ों की राशि कम से कम भरना।</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<strong>कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<blockquote><p>
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</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हिंसक तत्वों के साथ मानवाधिकारों का प्रश्न-हिंदी लेख (With violent elements of human rights questions - Hindi article)]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/2009/11/22/manvadhikar-hindi-lekh/</link>
<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 14:04:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/2009/11/22/manvadhikar-hindi-lekh/</guid>
<description><![CDATA[वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो आदमी अपने रिश्तेदार को पानी के लिये भी नहीं पूछता। वैसे यह मानवीय प्रवृत्ति पुराने समय से है कि बिना मतलब के कोई किसी का काम नहीं करता पर आजकल के समय में कुछ कथित समाज सेवक देखकर यह साफ लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से लाभ लिये बिना काम नहीं कर रहे हैं । यही स्थिति मानवाधिकार के लिये काम करने वाले लोगों और उनके संगठनों के बारे में देखी जा सकती है। हम तो सीधी बात कहें कि जब हम किसी को जनकल्याण, मानवाधिकार या किसी अन्य सार्वजनिक अभियान चलाते हुए देखते हैं तो उसके उद्ददेश्य से अधिक इस बात को जानने का प्रयास करते हैं कि वह उसके पीछे कौनसा अपना हित साध कहा है।<br />
आतंकवाद के बारे में कुछ विशेषज्ञों का स्पष्टतः मानना है कि यह एक उद्योग है जिसके सहारे अनेक दो नंबरी व्यवसाय चलते हैं। आंकड़े इस बात का प्रमाण है कि जहां आतंकवाद दृष्टिगोचर होता है वहीं दो नंबर का व्यापार अधिक रहता है। आतंकवाद को उद्योग इसलिये कहा क्योंकि किसी नवीन वस्तु का निर्माण करने वाला स्थान ही उद्योग कहा जाता है और आतंकवाद में एक इंसान को हैवान बनाने का काम होता है। इसी आतंकवाद या हिंसा का सहायक व्यापार मानवाधिकार कार्यक्रम लगता है। नित अखबार और समाचार पत्र पढ़ते हुए कई प्रश्न कुछ लोगों के दिमाग में घुमड़ते हैं। इसका जवाब इधर उधर ढूंढते हैं पर कहीं नहीं मिलता। जवाब तो तब मिले जब वैसे सवाल कोई उठाये। कहने का तात्पर्य यह है सवाल करने वालों का भी टोटा है।<br />
बहरहाल एक बड़ा उद्योग या व्यवसाय अनेक सहायक व्यवसायों का भी पोषक होता है। मान लीजिये कहीं कपड़े के नये बाजार का निर्माण होता है तो उसके सहारे वहां चाय और नाश्ते की दुकानें खुल जाती हैं। वजह यह है कि कपड़े का बाजार है पर वहां रहने वाले दुकानदार और आगंतुकों के लिये खाने पीने की व्यवस्था जरूरी है। इस तरह कपड़े का मुख्य स्थान होते हुए भी वहां अन्य सहायक व्यवसाय स्थापित हो जाते हैं। कहीं अगर बुनकरी का काम होता है तो उसके पास ही दर्जी और रंगरेज की दुकानें भी खुल जाती हैं। यही स्थिति शायद आतंकवाद के उद्योग के साथ है। जहां इसका प्रभाव बढ़ता है वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता अधिक सक्रिय हो जाते हैं। उनकी यह बात हमें बकवाद लगती है कि वह केवल स्व प्रेरणा की वजह से यह काम कर रहे हैं। यह ऐसे ही जैसे कपड़े की बाजार के पास कोई चाय की दुकान खोले और कहे कि ‘मैं तो यहां आने वाले व्यापारियों की सेवा करने आया हूं।’<br />
ऐसे अनेक निष्पक्ष विशेषज्ञ हैं जो भले ही साफ न कहते हों पर विश्व भर में फैले आतंकवाद के पीछे काम कर रहे आर्थिक तत्वों का रहस्ययोद्घाटन करते हैं पर वह समाचार पत्रों में अंदर के कालम में छपते हैं और फिर उन पर कोई अधिक नहीं लिखता क्योंकि विश्व भर में बुद्धिजीवियों को तो जाति, भाषा, धर्म, और क्षेत्र के नाम पर फैल रहे आतंकवाद की सच्चाई पर ध्यान देने की बजाय उसके कथित विषयों पर अनवरत बहस करनी होती है। अगर वह इस सच को एक बार मान लेंगे कि इसके पीछे दो नंबर का धंधा चलाने वाले किसी न किसी रूप से अपना आर्थिक सहयोग इसलिये देते हैं ताकि प्रशासन का ध्यान बंटे और उनका काम चलते रहे, तो फिर उनके लिये बहस की गुंजायश ही कहां बचेगी? फिर मानवाधिकार कार्यकताओं का काम भी कहां बचेगा, जिसके सहारे अनेक लोग मुफ्त का खाते हैं बल्कि प्रचार माध्यमों को अपने कार्यक्रमों की जगह भरने के लिये अपने शब्द और चेहरा भी प्रस्तुत करते हैं।<br />
शक की पूरी गुंजायश है और यह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में छपी सामग्री पर थोड़ा भी चिंतन करें तो वह पुख्ता भी हो जाता है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। ऐसा कोई भी गांव या शहर नहीं है जो इससे मुक्त हो। अलबत्ता घटना केवल उन्हीं जगहों की सामने आती हैं जिनको प्रचार माध्यम इन्हीं मानवाधिकार कार्यकताओं के सहारे प्राप्त करते हैं।<br />
आप जरा ध्यान से अखबार पढ़ें कि भारत के मध्य क्षेत्र में ऐसे अनेक एनकांउटर होते हैं जिनमें किसी कुख्यात अपराधी को मार दिया जाता है। उस पर उसके परिवार वाले विरोध भी जताते हैं पर वहां कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता या संगठन सक्रिय नहीं होता क्योंकि इसके लिये उनको कोई प्रायोजक नहीं मिलता। प्रायोजक तो वहीं मिलेगा जहां से आय अच्छी होती हो। सीमावर्ती क्षेत्रों से तस्करी और घुसपैठ को लेकर अनेक संगठन कमाई करते हैं और इसलिये वहां आतंकवादियों की सक्रियता भी रहती है। इसलिये वहां सुरक्षाबलों से उनकी मुठभेड भी होती है जिसमें लोग मारे जाते हैं। मानवाधिकर कार्यकर्ता वहां एकदम सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता पर कोई आपत्ति नहीं है पर मध्य क्षेत्र में उनकी निष्क्रियता संदेह पैदा करती है। पूर्वी क्षेत्र को लेकर इस समय हलचल मची हुई है। हिंसक तत्व वहां की प्राकृत्तिक संपदा का दोहन करने का आरोप लगाते हुए सक्रिय हैं। वह अनेक बार अनेक सामान्य सशस्त्र कर्मियों को मार देते हैं पर इन हिंसक तत्वों में कोई मरता है तो मानवाधिकार कार्यकर्ता उसका नाम लेकर चिल्लाते हैं। सवाल यह है कि क्या यह मानवाधिकार कार्यकर्ता यह मानते हैं कि सामान्य सुरक्षा अधिकारी या कर्मचारी का तो काम ही मरना है। उसका तो कोई परिवार ही नहीं है। उसके लिये यह कभी आंसु नहीं बहाते।<br />
कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि अगर कहीं संसाधनों के वितरण को लेकर हिंसा हो रही है तो वह इसलिये नहीं कि आम आदमी तक उसका हिस्सा नहीं पहुंच रहा बल्कि यह कि उसका कुछ हिस्सा हिंसक तत्व स्वयं अपने लिये चाहते हैं। इसके अलावा यह हिंसक तत्व आर्थिक क्षेत्र की आपसी प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे को निपटाने के काम भी आते हैं<br />
इसके बाद भी एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कुछ लोगों ने तो बड़ी बेशर्मी से खास जाति, भाषा और धर्म के समूह पकड़ कर उनके मानवाधिकारों के हनन का प्रचार कर रखा है। इसमें भी उनका स्वार्थ दिखाई देता है। इनमें अगर जातीय या भाषाई समूह हैं तो उनका धरती क्षेत्र ऐसा है जो धन की दृष्टि से उपजाऊ और धार्मिक है तो उसके लिये कहीं किसी संस्था से उनको अप्रत्यक्ष रूप से पैसा मिलता है-उनकी गतिविधियां यही संदेह पैदा करती हैं। इधर फिर कुछ ऐसे देश अधिक धनवान हैं जो धर्म पर आधारित शासन चलाते हैं और उनके शासनध्यक्षों से कृपा पाने के लिये कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता उनके धर्म की पूरे विश्व में बजा रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यह मानवाधिकार कार्यक्रम चलाने वाले जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र की दृष्टि से बंटे समाज में ऐसे छिद्र ढूंढते हैं जिनको बंद करने का प्रयास सुधारक करते हैं।<br />
अखबार में एक नहीं अनेक ऐसी खबरें छपती हैं जिनमें मानवाधिकार हनन का मामला साफ बनता है पर वहां कार्यकर्ता लापता होते हैं। कल एक ब्लाग में पढ़ने को मिला जिसमें बताया कि सरकार ने धारा 498-ए के तहत मामले छानबीन के बाद दर्ज करने का आदेश जारी किया है क्योंकि पाया गया कि इसमें फर्जी मामले दर्ज हुए और शिकायत में ढेर सारे नाम थे पर छानबीन के बाद जांच एजेंसियों ने पैसा खाकर कुछ लोगों को छोड़ा। इतना ही नहीं कई में तो शिकायत ही झूठी पायी गयी। इससे अनेक लोगों को परेशानी हुई। इस तरह के कानून से हमारे भारतीय समाज के कितने लोगों को परेशानी झेलनी पड़ी है इस पर कथित रूप से कोई मानवाधिकार संगठन कभी कुछ नहीं बोला। सरकार ने स्वयं ही यह काम किया। यह कैसे मान लें कि सरकार समाज का दर्द नहीं जानती। मानवाधिकार कार्यकर्ता तो केवल चिल्लाते हैं पर सरकार अपना काम करती है,यह इसका प्रमाण है<br />
सच तो हम नहीं जानते। अखबार और टीवी के समाचारों के पीछे अपने चिंत्तन के घोड़े दौड़ाते है-हमारे गुरु जी का भी यही संदेश है- तब यही सवाल हमारे दिमाग में आते हैं। दूसरा हमारा फार्मूला यह है कि आज कल कोई भी आदमी बिना स्वार्थ के समाज सेवा नहीं करता। फिर उनके चेहरे भी बताते हैं कि वह कितने निस्वार्थी होंगे। हम ब्रह्मा तो हैं नहीं कि सब जानते हों। हो सकता है कि हमारी सोच में ही कमी हो। एक आम लेखक के रूप में यही अभिव्यक्ति दिखी, व्यक्त कर दी।<br />
<B>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
</B><br />
<STRONG>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <A href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</A> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[नई पीढ़ी को मौक़ा-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/21/nayi-peedhi-ko-mauka-hasya-kavita/</link>
<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 13:43:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/21/nayi-peedhi-ko-mauka-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[अपने विरोधी पर शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा ‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं लोग भी अब उनके च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अपने विरोधी पर<br />
शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा<br />
‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं<br />
लोग भी अब उनके चेहरे से थके हैं<br />
नया चेहरा सामने नहीं आने देते<br />
जहां मौका मिलता वहीं<br />
अपने लिये हाथ फैला लेते हैं।<br />
हमें देखो<br />
अब तो सब छोड़ दिया है<br />
नये चेहरों को जनता से जोड़ दिया है<br />
बेटी को सौंप दिया है<br />
पत्रकारिता का जिम्मा<br />
बेटे को की जनसेवा की विरासत<br />
अब  हमारे घर में<br />
कोई नहीं बचा युवा पीढ़ी में निकम्मा<br />
हम तो करते हैं<br />
महापुरुषों का अनुसरण<br />
जो नयी पीढ़ी को आगे आने का मौका देते हैं।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://anant-shabd.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<b><a href="http://bharatdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</b></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जख्म और मरहम-व्यंग्य कविता (zakhma aur marham-vyangya kavita]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/21/zakhma-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 13:37:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/21/zakhma-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[&nbsp;हमने कहा था ‘जख्म पर मरहम लगा दो’ उन्होंने नमक छिड़क दिया। पीड़ा से हम कराहते रहे उन्होंने कहा ‘]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><div>
<font color="#ff00ff" size="4">&#160;हमने कहा था</p>
<p>‘जख्म पर मरहम लगा दो’</p>
<p>उन्होंने नमक छिड़क दिया। </p>
<p>पीड़ा से हम कराहते रहे</p>
<p>उन्होंने कहा</p>
<p>‘कुछ जोर से कराहो</p>
<p>ताकि हम मरहम लगाकर</p>
<p>जमाने को बता सकें कि</p>
<p>हमने किसी का दर्द कम किया’।</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p>नजारे तो इस दुनियां में बहुत हैं</p>
<p>मगर लोगों को बस दंगल ही भाता ।</p>
<p>अपने मंगल की बजाय</p>
<p>दूसरे के अमंगल पर मजा आता।</p>
<p>जिंदगी खेल है नजरिये का</p>
<p>जैसी नजर </p>
<p>वैसा ही जमाना हो जाता।</p>
<p>तारीफ के लिये कौन करे</p>
<p>इंसानों का भला</p>
<p>शिकायत के लिये </p>
<p>मजबूर करने वालों का नाम</p>
<p>अखबार की सुर्खियों में ही नजर आता।</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</FONT></DIV><b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://anantraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[लोग अपने से बात करते हुए पाठ अंतर्जाल पर पढ़ना चाहते हैं-संपादकीय]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/17/logon-se-apni-bat-hindi-editorial/</link>
<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 15:32:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.wordpress.com/2009/11/17/logon-se-apni-bat-hindi-editorial/</guid>
<description><![CDATA[आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक स]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक संपादक के दिलचस्प संस्मरण जुड़े हुए हैं।  यह ब्लाग जब बनाया तब लेखक का छठा ब्लाग था। उस समय दूसरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर यूनिकोड में न रखकर सामान्य देव फोंट में रचनाएं लिख रहा था। वह किसी के समझ में  नहीं आते थे।  ब्लाग स्पाट के हिंदी ब्लाग से केवल शीर्षक ले रहा था।  इससे हिन्दी ब्लाग लेखक उसे सर्च इंजिन में पकड़ रहे थे पर बाकी पाठ उनकी समझ में नहीं आ रहा था। यूनिकोड में रोमन लिपि में लिखना इस लेखक के लिये कठिन था।  एक ब्लाग लेखिका ने पूछा कि ‘आप कौनसी भाषा में लिख रहे हैं, पढ़ने में नहीं आ रहा।’ उस समय इस ब्लाग पर छोटी क्षणिकायें रोमन लिपि से यूनिकोड में हिन्दी में लिखा इस पर प्रकाशित की गयीं।  कुछ ही मिनटों में किसी अन्य ब्लाग लेखिका ने इस पर अपनी टिप्पणी भी रखी।  इसके बावजूद यह लेखक रोमन लिपि में यूनिकोड हिंदी लिखने को तैयार नहीं था।  बहरहाल लेखिका को इस ब्लाग का पता दिया गया और उसने बताया कि इसमें लिखा समझ में आ रहा है। उसके बाद वह लेखिका फिर नहीं दिखी पर लेखक ने तब यूनिकोड हिन्दी में लिखना प्रारंभ किया तब धीरे धीरे बड़े पाठ भी लिखे। </p>
<p>उसके बाद तो बहुत अनुभव हुए। यह ब्लाग प्रारंभ से ही पाठकों को प्रिय रहा है।  यह ब्लाग तब भी अधिक पाठक जुटा रहा था जब इसे एक जगह हिन्दी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों  का समर्थन नहीं मिलता था। आज भी यहां पाठक सर्वाधिक हैं और एक लाख की संख्या इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी अपनी गति से अंतर्जाल पर बढ़ रही है।  मुख्य बात है विषय सामग्री की।  इस ब्लाग पर अध्यात्मिक रचनाओं के साथ व्यंग, कहानी, कवितायें भी हैं।  हास्य कवितायें अधिक लोकप्रिय हैं पर अध्यात्मिक रचनाओं की तुलना किसी भी अन्य विधा से नहीं की जा सकती।  लोगों  की अध्यात्मिक चिंतन की प्यास इतनी है कि उसकी भरपाई कोई एक लेखक नहीं कर सकता।  इसके बाद आता है हास्य कविताओं का।  यकीनन उनका भाव आदमी को हंसने को मजबूर करता है। हंसी से आदमी का खून बढ़ता है।  दरअसल एक खास बात नज़र आती है वह यह कि यहां लोग समाचार पत्र, पत्रिकाओं तथा किताबों जैसी रचनाओं को अधिक पसंद नहीं करते।   इसके अलावा क्रिकेट, फिल्म, राजनीति तथा साहित्य के विषय में परंपरागत विषय सामग्री, शैली तथा विधाओं से उन पर प्रभाव नहीं पड़ता।  वह अपने से बात करती हुऐ पाठ पढ़ना चाहते हैं।  अंतर्जाल पर लिखने वालों को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि उनको अपनी रचना प्रक्रिया की नयी शैली और विधायें ढूंढनी होंगी।  अगर लोगों को राजनीति, क्रिकेट, फिल्म, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषयों पर परंपरागत ढंग से पढ़ना हो तो उनके लिये अखबार क्या कम है? अखबारों जैसा ही यहां लिखने पर उनकी रुचि कम हो जाती है। हां, यह जरूर है कि अखबार फिर यहां से सामग्री उठाकर छाप देते हैं। कहीं नाम आता है कहीं नहीं।  इस लेखक के गांधीजी तथा ओबामा पर लिखे गये दो पाठों का जिस तरह उपयेाग एक समाचार पत्र के स्तंभकार ने किया वह अप्रसन्न करने वाला था।  एक बात तय रही कि उस स्तंभकार के पास अपना चिंतन कतई नहीं था। उसने इस लेखक के  तीन पाठों से अनेक पैरा लेकर छाप दिये।  नाम से परहेज! उससे यह लिखते हुए शर्म आ रही थी कि ‘अमुक ब्लाग लेखक ने यह लिखा है’।  सच तो यह है कि इस लेखक ने अनेक समसामयिक घटनाओं पर चिंतन और आलेख लिखे पर उनमें किसी का नाम नहीं दिया। उनको संदर्भ रहित लिखा गया इसलिये कोई समाचार पत्र उनका उपयोग नहीं कर सकता  क्योंकि समसामयिक विषयों पर हमारे प्रचार माध्यमों को अपने तयशुदा नायक और खलनायकों पर लिखी सामग्री चाहिये। इसके विपरीत यह लेखक मानता है कि प्रकृत्तियां वही रहती हैं जबकि घटना के नायक और खलनायक बदल जाते हैं। फिर समसामयिक मुद्दों पर क्या लिखना? बीस साल तक उनको बने रहना है इसलिये ऐसे लिखो कि बीस साल बाद भी ताजा लगें-ऐसे में किसी का नाम देकर उसे बदनाम या प्रसिद्ध करने<br />
से अच्छा है कि अपना नाम ही करते रहो।<br />
मुख्य बात यह है कि लोग अपने से बात करते हुऐ पाठ चाहते हैं। उनको फिल्म, राजनीति, क्रिकेट तथा अन्य चमकदार क्षेत्रों के प्रचार माध्यमों द्वारा निर्धारित पात्रों पर लिख कर अंतर्जाल पर प्रभावित नहीं किया जा सकता।  अपनी रचनाओं की भाव भंगिमा ऐसी रखना चाहिये जैसी कि वह पाठक से बात कर रही हों। यह जरूरी नहीं है कि पाठक टिप्पणी रखे और रखे तो लेखक उसका उत्तर दे।  पाठक को लगना चाहिये कि जैसे कि वह अपने मन बात उस पाठ में पढ़ रहा है या वह पाठ पढ़े तो वह उसके मन में चला जाये।  अगर वह परंपरागत लेखन का पाठक होता तो फिर इस अंतर्जाल पर आता ही क्यों?  अपने मन की बात ऐसे रखना अच्छा है जैसे कि सभी को वह अपनी लगे।<br />
इस अवसर पर बस  इतना ही। हां, जिन पाठकों को इस लेखक के समस्त ब्लाग/पत्रिकाओं का संकलन देखना हो वह <a href="http://anant-shabd.blogspot.com">हिन्द केसरी पत्रिका</a> को अपने यहां सुरक्षित कर लें। इस पत्रिका के पाठकों के लिये अब इस पर यह प्रयास भी किया जायेगा कि ऐसे पाठ लिखे जायें जो उनसे बात करते हुए लगें। </p>
<div><strong><font size="5">लेखक संपादक दीपक भारतदीप,ग्वालियर&#160;</font></strong></div>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पैसे से गाडी खरीदी है रास्ता नहीं-व्यंग्य चिंतन ]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2009/11/15/vahan-aur-rasta-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 12:18:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2009/11/15/vahan-aur-rasta-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[अब यह फिल्मों का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि रास्ते पर गाड़ी चलाने वाले लड़के लड़कियां अपने आपको नायक न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अब यह फिल्मों का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि रास्ते पर गाड़ी चलाने वाले लड़के लड़कियां अपने आपको नायक नायिका से कम नहीं समझा करते। फिल्मों में अनेक गीत नायक नायिका को रास्ते पर कार या मोटर साइकिलें चलाते हुए फिल्माये जाते हैं। वह लड़के लड़कियों के दिमाग में इस तरह अंकित रहते हैं कि जब गाड़ी पर उनका पंाव आता है तो वह ऐसे सोचते हैं जैसे कि वह किसी फिल्म का अभिनय कर रहे हैं। उनको शायद पता ही नहीं नायक नायिका के ऐसे गाने वाले दृश्य रास्ते पर पैदल या गाड़ियों चलाते हुए फिल्माये दृश्यों को स्टूडियो में तैयार किया जाता है। वहां उनके आसपास ऐसा आदमी नहीं आ सकता जिसे फिल्म का निदेशक न चाहे।<br />
आम सड़क पर ऐसा नहीं होता। वह निजी सड़क नहीं है और न ही वहां आपके लिये ऐसी कोई सुविधा है।<br />
एक समस्या दूसरी भी है जिसे समझ लें। खराब सड़कों पर कम ही दुर्घटना होती है क्योंकि वहां लोग वाहन पर ही क्या पैदल ही सोचकर धीमी गति से चलते हैं। कभी कभी तो इतनी धीमी गति हो जाती है कि स्कूटर बंद कर ही उस पर बैठकर उसे घसीटा जाता है। अधिकतर दुर्घटनायें साफ सुथरी और डंबरीकृत सड़कों पर ही होती है जहां गाड़ियां तीव्र गति से चलाने में मजा आता है।<br />
जब भी दुर्घटना की खबरें आती हैं ऐसी ही सड़कों से आती हैं। कार या मोटर साइकिल निजी रूप से आकर्षक वाहन हैं पर सड़कें केवल उनके लिये नहीं है। इन पर ट्रक और बसें भी चलती हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि ट्राली के साथ जुड़े ट्रेक्टर भी चलते हैं जिनके कुछ चालक उनको बैलगाड़ी की तरह चलाते हैं। यह ट्राली ऐसे ही जैसे भैंस! पत नहीं कब सड़क पर थोड़ा झटका खाने से उसकी कमर मटक जाये। उसके समानांतर चलते हुए हमेशा चैकस रहना चाहिये।<br />
आखिर यह ख्याल क्यों आया? उस दिन सड़क पर दो लड़के अपनी मोटर साइकिल पर ट्रेक्टर और ट्राली के एकदम समानातंर जा रहे थे। आगे बैठा लड़का अपनी धुन में कुछ ऐसा आया कि दोनो हाथ छोड़कर मोटर साइकिल चलाता रहा। पता नहीं वहां उसके आगे कोई छोटा पत्थर का टुकड़ा या कागज को कोई छोटा ठोस पुलिंदा आ गया जिससे मोटर साइकिल लड़खड़ी गयी। मोटर साइकिल ट्राली की तरफ बढ़ती इससे पहले ही लड़के ने संभाल लिया। यह दृश्य देखकर किसी की भी सांस थम सकती थी। याद रखिये जब वाहन की गति तीव्र होती है तब रास्ते पर पड़ी कोई छोटी ठोस चीज भी उसको विचलित कर सकती है। हवाई जहाज को आकाश में चिड़िया भी विचलित कर देती है-ऐसी अनेक घटनाएं अखबारों में पढ़ी जा सकती हैं।<br />
यह तो केवल एक वाक्या है? यह सड़कें गरीब और अमीर दोनों के लिये बनी है। अपनी कार पर इतना मत इतराओ कि साइकिल छू जाने पर किसी गरीब को मारने लगो। यह सड़क केवल अमीर की नहीं है क्योंकि जिंदगी भी केवल वह नहीं जीते! यह सड़के के्रवल अमीरों की इसलिये भी नहीं है क्योंकि मौत भी केवल गरीब की नहीं होती। एक दिन वह अमीरों को भी लपेटती है। कार या मोटर साइकिल से टकराकर साइकिल सवार गरीब मरेगा तो कार और मोटर साइकिल वाले भी ट्रक, बस और ट्रेक्टर ट्राली से टकराकर बच नहीं सकते। तुम अपने पैसे से वाहन खरीदते हो सड़क नहीं।<br />
नित प्रतिदिन दुर्घटनाऐं और टकराने पर जिस तरह झगड़े होते हैं उससे तो देखकर यही लगता है कि हम लोगों को रास्ते पर चलने की तमीज नहीं है। फिल्मी और धारावाहिक दृश्यों ने हमारी अक्ल का बल्ब फ्यूज कर दिया है।<br />
कभी कभी तो लगता है कि सड़के तो उबड़ खाबड़ ही ठीक हैं क्योंकि लोग वाहनों को चलाते नहीं बल्कि घसीटते ही ठीक रहते हैं जहां उनको गति बढ़ाने का अवसर मिला वहां अपना होश हवास खो देते हैं। इसका मतलब क्या यह समझें कि हम अच्छी सड़कों के लायक नहीं है। याद रखो दुर्घटना के लिये सैकण्ड का हजारवां हिस्सा भी काफी है। इसलिये सड़क पर चलते हुए जल्दबाजी से बचो। इसलिये नहीं कि घर पर तुम्हारा कोई इंतजार कर रहा है बल्कि इसलिये क्योंकि बेमौत किसी को दूसरे क्यों मारना चाहते हो या मरना चाहते हो। न भी मरे तो शरीर का अंग भंग हमेशा ही जीवन का दर्द बन जाता है। हो सकता है कि इसमें लेख में कुछ कटु बातें हों पर क्या करें दर्द की दवा तो कड़वी भी होती है। वैसे भी कहते हैं कि नीम कड़वा है पर स्वास्थ के लिये उसका बहुत महत्व है। इस पर कुछ काव्यात्मक अभिव्यक्ति के रूप में पंक्तियां। </b></p>
<p><span style="font-size:large;">सड़कों पर इतनी तेज मत चलो कि</span><br />
<span style="font-size:large;">जमीन पर आ गिरो</span><br />
<span style="font-size:large;">पांव जमीन पर ही रखो</span><br />
<span style="font-size:large;">हवा में उड़ने की कोशिश मत करो कि</span><br />
<span style="font-size:large;">अपने ही ओढ़े दर्द के जाल में घिरो।</span><br />
<span style="font-size:large;">एक पल ही बहुत है दुर्घटना के लिये</span><br />
<span style="font-size:large;">वाहनों पर बिना अक्ल साथ लिये यूं न फिरो।</span><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
<strong>कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong></p>
<blockquote><p>
<strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।</p>
<p>अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com/">2.अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com/">4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
</strong>
</p></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समन्दर पीने से भी प्यास नहीं बुझेगी (samandar se bhee pyas nahin bujhegee)]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/15/samandar-aur-pyasa-hindi-article-and-poem/</link>
<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 12:13:44 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2009/11/15/samandar-aur-pyasa-hindi-article-and-poem/</guid>
<description><![CDATA[सभी लोग हमेशा दूसरे के सुख देखकर मन में अपने लिये उसकी कमी का विचार करते हुए अपने को दुःख देते हैं। ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सभी लोग हमेशा दूसरे के सुख देखकर मन में अपने लिये उसकी कमी का विचार करते हुए अपने को दुःख देते हैं।  दूसरे का दुःख देकर अपने आपको यह संतोष देते हैं कि वह उसके मुकाबले अधिक सुखी हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि लोग बहिर्मुखी जीवन व्यतीत करते हैं और अपने बारे में उनके चिंतन के आधार बाह्य दृश्यों से प्रभावित होते हैं।  यह प्रवृत्ति असहज भाव को जन्म देती है।  इसके फलस्वरूप लोग अपनी बात ही सही ढंग से सही जगह प्रस्तुत नहीं करते।  अनेक जगह इसी बात को लेकर विवाद पैदा होते हैं कि अमुक ने यह इस तरह कहा तो अमुक ने गलत समझा।  आप अगर देखें तो कुदरत ने सभी को जुबान दी है पर सभी अच्छा नहीं बोलकर नहीं कमाते।  सभी को स्वर दिया है पर सभी गायक नहीं हो जाते।   भाषा ज्ञान सभी को है पर सभी लेखक नहीं हो जाते।  जिनको अपने जीवन के विषयों का सही ज्ञान होता है तथा जो अपने गुण और दुर्गुण को समझते हैं वही आगे चलकर समाज के शिखर पर पहुंचते हैं।  इस संदर्भ में दो कवितायें प्रस्तुत हैं।<br />
<b>सोचता है हर कोई<br />
पर अल्फाजों की शक्ल और<br />
अंदाज-ए-बयां अलग अलग होता है<br />
बोलता है हर कोई<br />
पर अपनी आवाज से हिला देता है<br />
आदमी पूरे जमाने को<br />
कोई बस रोता है।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
पी लोगे सारा समंदर भी<br />
तो तुम्हारी प्यास नहीं जायेगी।<br />
ख्वाहिशों के पहाड़ चढ़ते जाओ<br />
पर कहीं मंजिल नहीं आयेगी।<br />
रुक कर देखो<br />
जरा कुदरत का करिश्मा<br />
इस दुनियां में<br />
हर पल जिंदगी कुछ नया सिखायेगी।<br />
__________________________</b></p>
<p><b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p><strong>यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://teradipak.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a>पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://deepakraj.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://anantraj.blogspot.com/">3.अनंत शब्दयोग</a><br />
</strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ईमानदारी में गज़ब कैसा-हिन्दी हास्य व्यंग्य (imandari men gazab- hindi vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/15/hindi-vyangya-on-imandari/</link>
<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 12:01:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/15/hindi-vyangya-on-imandari/</guid>
<description><![CDATA[सप्ताह में उस दुकान से एक बार तो बेकरी का सामान जरूर खरीदते हैं। ऐसा बरसों से चल रहा है। वह दुकानदार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>सप्ताह में उस दुकान से एक बार तो बेकरी का सामान जरूर खरीदते हैं।  ऐसा बरसों से चल रहा है।  वह दुकानदार अच्छी तरह जान गया है। उसके कुछ पुराने कर्मचारी भी अब देखते ही सामान पूछना शुरु कर देते हैं भले ही दूसरे ग्राहक खड़े हों।  हालांकि उस दुकानदार से हमारी कोई खास आत्मीयता नहीं है, यहां तक कि उसके साथ अभिवादन तक नहीं होता। हम दुकान पर पहुंचते ही सीधे सामान मांगना शुरु कर देते हैं।<br />
उस दिन 145 रुपये का सामान लिया और उसे पांच सौ का नोट दिया।  उस दुकानदार ने उसे अच्छी तरह रौशनी में देखा और फिर उसने अपनी दराज में रखा और बाकी पैसे वापस करने के लिये नोट गिनने लगा। इसी दौरान वह हमसे कहता रहा  कि ‘आजकल नोट नकली आ रहे हैं इसलिये ध्यान से देखना पड़ता है।’ आदि आदि।<br />
हम केवल मुस्कराये। उसने नोट गिनकर हमें दिये। हम उसे बिना गिने ही अपनी जेब में रखने लगे यह सोचकर कि इतना बड़ा सौदा नहीं है कि वह रकम कम  देगा-ज्यादा देगा इस पर तो विचार ही नहीं किया? सामान का पैकेट और रुपये हाथ में लेकर अपने स्कूटर के पास पहुंचे और सामान रखकर नोट पर्स में रखने लगे पर लगा कि कुछ गड़बड़ है। नोट अधिक लग रहे थे। हमने गिने तो उसमें सौ रुपया अधिक था।<br />
हमने बिना कुछ सोचे बिचारे वह नोट उसके पास जाकर बढ़ाया और कहा‘-भई, आपने यह सौ का नोट अधिक दे दिया।’<br />
उसे हैरानी हुई और हमसे नोट अपने हाथ में लेते हुए बोला-‘हो सकता है कि बात करते हुए हमसे नोट गिनने में गलती हो गयी। वैसे आप पहले आदमी हैं जो नोट वापस कर रहे हैं। ऐसे कई बार गलती हमें बाद में याद आती है पर कोई भी आदमी हमें नोट वापस नहीं करता। अपने पास रखकर सभी पचा जाते हैं। आपकी ईमानदारी अच्छी लगी।’<br />
हमने हंसते हुए कहा-‘सच तो यह है कि हम नोट गिन नहीं रहे थे। पता नहीं क्या सोचकर गिने। यकीन करो कि अगर यह एक बार पर्स के हवाले होते तो फिर हमें भी वापस करने की याद नहीं आनी थी। वैसे आपके साथ जिन लोगों ने जानबूझकर ऐसा किया उनको आपका पैसा पच ही गया आप यह कैसे कह सकते हैं?’<br />
वह दुकानदार हमें घूरकर देखने लगा और बोला-‘हां, यह तो नहीं सकता कि वह पचा पाते हैं कि नहीं।’<br />
हमने उससे कहा-‘वह आपका दिया अधिक पैसा रख लेते हैं पर कितनी देर? यह तो माया चलती फिरती है इसलिये वह रुपया आखिर वह फिर कहीं जाना है।  यह हमारी ईमानदारी का प्रमाण नहीं बल्कि डर का प्रमाण है। एक तो यह रुपया अधिक देर हमारे पास वैसे ही नहीं रहेगा। दूसरा पचेगा भी नहीं! इसलिये वापस किया।’<br />
अधिक देर बात करना ठीक नहीं था। हमने सौदा रखा और वहां से चले आये। उसके बाद भी अनेक बार उसकी दुकान पर गये पर कभी इसकी चर्चा नहीं की।<br />
उस दिन दुकान पर पहुंचे तो  उसने हमसे पूछा-‘आपको मैंने बैग दिया है कि नहीं।’<br />
मुझे आश्चर्य हुआ और हमने उससे कहा-‘नहीं, आपने मुझे कोई बैग नहीं दिया।’<br />
उसने अपने पीछे हाथ किया और एक हैंडबैग हमारी तरफ बढ़ाते हुए कहा-‘मैंने पूछने की गुस्ताखी इसलिये की क्योंकि यह केवल कुछ खास ग्राहकों को दिवाली का गिफ्ट दिया था। मुझे याद नहीं आ रहा था कि आपको दिया कि नहीं। हर साल हम कुछ न कुछ ग्राहकों को उपहार देते हैं।<br />
मैंने वह हैंडबैग अपने हाथ में लिया।  उसके यहां के एक कर्मचारी ने मुझसे कहा कि ‘सेठ जी बहुत दिनों से  आपको यह उपहार देने के लिये कह रहे थे, मैं ही भूल जाता था। आज सेठ जी खुद पूछा तब मुझे भी याद आया।’<br />
उस समय भी वहां पर पांच लोग दूसरे खड़े थे पर उसने बिना उनका विचार करते हुए मुझे हैंडबैग दिया।  इतने बरसों से उसने दूसरे खास ग्राहकों को गिफ्ट दिया पर हमें खास नहीं माना। उसके खास तो उसके थोक व्यापारी रहे होंगे। खेरिज ग्राहकों में उसने किसी दूसरे को खास माना होगा यह भी नहीं लगता।  बहरहाल उस सौ रुपये की वापसी ने उसकी नजरों में खास बना दिया।  उसकी नजर में हम ईमानदार हैं पर हमें खुद को नहीं लगता।  वैसे पहले भी कई बार अनेक दुकानदारों को अधिक पैसे हमने वापस लौटाये हैं।  वह लोग कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। किस बात की!  ईमानदारी की! अरे भई, हमने कई बरस पहले एक बार अपनी जिंदगी में अजमाया है। रास्ते से बीस का नोट मिला था उसे रख लिया। मगर उसके एक दिन बाद ही हमारी साइकिल को एक टूसीटर वाले ने टक्कर मारकर तोड़ दिया।  हम बच गये यह गनीमत थी पर उस साइकिल को बनवाने में  सौ रुपये   लग गये।  बस तब से तय कर लिया कि ऐसे पैसे को हाथ भी नहीं लगायेंगे।<br />
यह हमारा डर है जो जबरदस्ती ईमानदार बनाये दे रहा है।  कोई जब यह कहता है तो हम उसे समझाने लग जाते हैं कि ‘भई, ऐसा नहीं है। दरअसल हमारा हाजमा खराब है कि ऐसा पैसा हमें पचता नहीं। यह एक रोग है जिसका इलाज किसी के पास नहीं है।’<br />
पहले शराब पीते थे। अब छोड़ दी। जो अब हमारे सामने पीते हैं और हमें परे देखकर कहते हैं कि‘अच्छा हुआ तुमने छोड़ दी। वाकई क्या गजब की तुम्हारी संकल्प शक्ति है।’<br />
हम उनको समझाते हैं कि‘नहीं यार, इससे हमें उच्च रक्तचाप हो गया था। डाक्टर से कहा छोड़ दो नहीं तो मुश्किल में आ जाओगे यह संकल्प शक्ति नहीं हमारा डर है जो हमें पीने नहीं देता। हम तो उन लोगों के कायल हैं जो शराब पीकर पचा जाते हैं।’<br />
वह पीने वाले कहते हैं कि ‘नहीं यार, तमाम तरह की व्याधियां हमारे शरीर में हैं तुम क्या जानो? मगर क्या करें पीना नहीं छूटता।’<br />
उस दिन पार्क से योग साधना कर वापस आ रहे थे तो एक ऐसे सज्जन हमें मिले जो योग साधना के फायदे हमें सुनाकर उस शिविर में ले गये जिसमें योग साधना सिखाई जा रही थी। इस बात को सात वर्ष होने के आ गये। उन्होंने कुल जमा सात दिन भी वहां हाजिरी नहीं दी पर हमें याद है वह किसी तरह हमें वहां लगे और फिर वह शिविर छोड़ दिया । मगर हम डटे रहे।  वह कहने लगे-‘यार गजब करते हो? अनवरत छह साल से ऊपर हो गया पर तुम्हारा क्रम भंग नहीं हुआ। मान गये तुम्हारे दृढ़ निश्चय को!’<br />
हमने उसको भी समझाया-‘यार, यह बात नहीं है। इसके बिना हम अब चल ही नहीं सकते।  जब किसी दिन किसी मरीज को अस्पताल से देखकर आते हैं उसके अगले दिन ही अपनी योगसाधना की अवधि और आसन  बढ़ा देते हैं क्योंकि हमें डाक्टरों से बहुत डर लगता है। वैसे कभी कभी पौन घंटा घर पर ही करते हैं पर जब किसी की गमी से जाते पर  वहां जब अन्य  लोग बीमारियों का बखान करते हैं तो उनको  उनको सुनकर हमारे अंदर डर का बवंडर खड़ा होता है और हम घर पर ही अधिक समय लगाते हैं या फिर बाहर अपने एक मित्र के यहां करने चले जाते हैं।  इसमें दृढ़ संकल्प जैसी कोई चीज हमें नहीं लगती।’<br />
लोग पता नहीं हमारी बात समझते हैं कि नहीं! क्योंकि वही लोग जब दोबारा मिलते हैं तो फिर वही बात-‘आप तो गजब करते हैं।’<br />
हम कभी नहीं समझ पाते कि इसमें गजब क्या है? हम डरते हैं तो बचने के रास्ते ढूंढते रहते हैं और लोग तो बहादुर हैं ओर फिर उनका हाजमा हमसे बेहतर है। उल्टे हम तो उन लोगों के प्रशंसक हैं जो गलत पैसा हजम कर जाते हैं। शराब पीकर भी मजे में रहते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह कि बिना योग साधना के बहुत से लोग  स्वस्थ होकर विचरण करते हैं उनकी प्रशंसा करना भी हमें अच्छा लगता है। बचपन से सुनते आ रहे हैं कि बुरे काम का बुरा परिणाम होता है।  इसलिये हम उन लोगों को ही योगी मानते हैं जो बुरा काम कर भी अपनी जिंदगी मजे में गुजारते हैं। कम से कम बाहर से तो ऐसा ही लगता है। अंदर की बात वही जाने। बाकी सभी जानते हैं कि हमारे अंदर डर है जिसका कहीं कोई इलाज नहीं है।<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://anantraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भाषा का लफड़ा-हिन्दी हास्य व्यंग्य (bhasha ka lafada-hindi commedy satire]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/15/bhasha-vivad-hindi-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 11:54:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/15/bhasha-vivad-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[शाम के समय दीपक बापू अपने घर से बाहर निकल एक निकट के उद्यान में हवा खाने पहुंचे। अंदर प्रवेश करने से]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>शाम के समय दीपक बापू अपने घर से बाहर निकल एक निकट के उद्यान में हवा खाने पहुंचे। अंदर प्रवेश करने से पहले ही द्वार पर खड़े होकर उन्होंने देखा कि आदमी को  देखा जिसकी पीठ उनकी तरफ थी। उसके बाल कंधे गर्दन तक लटके हुए थे। सिर और शरीर चैड़ा था। उसने चूड़ीदार पायजामा और चमकदार पीला कुर्ता पहने रखा था। दीपक बापू का अनुमान था कि वह आलोचक महाराज ही होंगे इसलिये वह अंदर जायें कि नहीं इस विचार में खड़े हो गये। वह नहीं चाहते थे कि आलोचक महाराज के कटु शब्द वहां घूम रहे अन्य लोगों के सामने सुनकर अपनी भद्द पिटवायें।<br />
इससे पहले वह कोई निर्णय करते उस आदमी ने अपना मुंह फेर कर उनकी तरफ किया।  दीपक बापू की घिग्घी बंध गयी।  वह आलोचक महाराज ही थे। दीपक बापू खीसें निपोड़ते हुए उनके पास पहुंच गये और हाथ जोड़कर बोले-नमस्ते महाराज, यह आप तफरी के लिये आये हैं! अच्छा है, इससे तंदुरस्ती बढ़ती है।’<br />
आलोचक महाराज ने बिना किसी भूमिका बांधे कहा-‘हम तो पहले ही तंदुरस्त हैं। देखो इतनी बड़ी देह के साथ ही  समाज में भी हमारी  इज्जत है! तुम्हारी तरह कीकड़ी कवि नहीं है कि अनजान होकर इधर बाग में टहलने आयें।  हमें पता था कि तुम शाम को यहां आते हो इसलिये ही तुम्हारा इंतजार कर रहे थे।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज, अभी तो हम तफरी के मूड में हैं फिर कभी बात करेंगे।’<br />
आलोचक महाराज बोले-‘वह फंदेबाज तुम्हारा दोस्त है न! उसे जरा समझा देना। अपने किये की माफी मांग ले वरना हम तुम्हारी कविताओं को अखबार में छपना बंद करवा देंगे।’<br />
दीपक बापू ने अपनी टोपी उतारी और सिर पर हाथ फेराने लगे। आलोचक महाराज बोले-डर गये न!’<br />
दीपक बापू बोले-‘नहीं डरे काहे को? हम तो यह सोच रहे हैं कि कहां आपने मुसीबत ले ली।  फंदेबाज हमारे गले में दोस्त की तरह फंसा है वरना हमारा उससे क्या वास्ता? उसकी बेवकूफियों की वजह से हम हास्य कवितायें लिखते हैं वरना तो जोरदार साहित्यकार होते!   आप उससे सुलह कर लीजिये वरना वह आपको परेशान करेगा। वैसे आपका झगड़ा हुआ किस बात पर था?’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘तुम्हारी बात को लेकर।  वह एक कार्यक्रम में पहुंच गया।  वहां हमने तुम्हारा उदाहरण देकर नये कवियों को समझाया कि देखो उस फ्लाप दीपक बापू को! कभी एक विषय पर ढंग से नहीं लिखता। योजनाबद्ध ढंग से नहीं लिखता। बस वह फंदेबाज मंच पर चढ़ आया और हमें लात घूंसे दिखाने लगा।  कुछ बुर्र बुर्र और हुर्र हुर्र बोल रहा था। हमने तो पहचान लिया क्योंकि उस लफंगे को कई बार तुम्हारे साथ साइकिल पर पीछे बैठे जाते देखा है।’<br />
दीपक बापू बोले-‘शर्मनाक! उसने आप जैसे महान आदमी को अपनी गूंगी मातृभाषा में इतनी भद्दी गालियां दी। हम तो यह गालियां अपनी जुबान से भी नहीं निकाल सकते।’<br />
आलोचक महाराज चैंके-‘वह गालियां दे रहा था! उसकी भाषा अपने समझ में नहीं आयी। हमने तो उसे कई बार अपनी भाषा में बोलते देखा है।’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज उसकी मात्ृभाषा गूंगी है।  उसी मेें वह आपको गालियां दे रहा था।<br />
आलोचक महाराज-‘यह कौनसी भाषा है?’<br />
दीपक बापू-‘हमें नहीं मालुम।’<br />
आलोचक महाराज-‘तो तुम्हें मालुम क्या है?’<br />
दीपक बापू-‘यही कि उसकी मातृभाषा गूंगी है। जब वह गुस्से में होता है तब यही भाषा बोलता है।’<br />
आलोचक महाराज बोले-‘उसका मोबाइल नंबर दो।  अभी उसको फोन करता हूं और जो शराब की बोतल के पैसे उसको दिये वापस मांगता हूं। मैंने यह सोचकर उस कार्यक्रम में उससे हंगामा फिक्स किया था कि वह तुम्हारा दोस्त है। इससे तुम्हें भी प्रचार मिल जायेगा  और तुम कहते हो कि दोस्त नहीं है तो अब देखो उसकी क्या हालत करता हूं? हमें गूंगी भाषा में गालियां देता है। देखो तुम अपनी भाषा वाले हो। हमारा साथ देना। उसके खिलाफ बयान अखबार में देना। यह गूंगी भाषा वाला समझता क्या है?<br />
दीपक बापू ने रुमाल आलोचक महाराज की तरफ बढ़ाते हुए कहा-‘लीजिये महाराज, आवेश में आपका पसीना निकल रहा है।  यह आपका हंगामा फिक्स था तो फिर हमेें काहे धमकाने आये।’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘उसने यह शर्त रखी थी कि उसकी तरफ से तुम्हारे प्रति वफादारी का प्रमाण पत्र पेश करूं।  मगर अब मामला भाषा का है। तुम हम एक हो जाते हैं।’<br />
दीपक बापू बोले-‘कतई नहीं महाराज! आपका झगड़ा हुआ है और इसमें हम कतई नहीं पड़ेंगे।  झगड़ा किसी बात पर और नाम जाति, भाषा और धर्म का लेकर लोगों को लड़ाने का प्रयास कम से कम हमारे साथ तो नहीं चलेगा। रहा अखबार में छपने का सवाल तो हम आपके पास नहीं लायेंगे अपनी रचना!<br />
आलोचक महाराज बोले-‘नहीं तुम लाना! पर हम नहीं छपवायेंगे अखबार में। जब लाओगे और नहीं छपेगा तभी तो हमारे गुस्से का पता चलेगा? अपनी भाषा में हमारी जो इज्जत है उसकी परवाह न करने का परिणाम कैसे चलेगा तुमको?’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज हमें पता है! आप हमारी कविताओं के विषय चुराकर दूसरों को सुनाकर उनसे दूसरी रचनायें लिखवाते हो। आपके पास विषय चिंतन तो  है ही नहीं।  एकाध बार साल में कहीं रचना छपवाकर एहसान हम पर करते हैं! नमस्कार हम चलते हैं! वैसे आप इस विषय को यहीं बंद कर दें क्योंकि आपने यह राज उजागर कर ही दिया है कि वह हंगामा फिक्स था!’<br />
दीपक बापू घर वापस चल पड़े। रात हो चली थी। इधर दारु की बोतल के साथ फंदेबाज भी उनको अपने ही घर के बाहर खड़ा मिला। उनको देखते ही बोला-‘आओ दीपक बापू। आज तुम्हारे लिये जोरदार खबर लाया हूं। आज मैंने आलोचक महाराज की क्या धुर उतारी है! तुम देखते तो वाह वाह कर उठते!  इसी खुशी में यह बोतल खरीद कर अपने घर ले जा रहा था। सोचा तुम्हें बताता चलूं।’<br />
दीपक बापू हंसकर बोले-‘हमें पता है! आलोचक महाराज ने गुस्से में बता दिया कि यह हंगामा फिक्स था! अब तुम अपनी सफाई मत देना।’<br />
फंदेबाज बोला-‘उसने ऐसा किया? अभी जाकर उसकी खबर लेता हूं।’<br />
दीपक बापू बोले-‘यह बोतल घर ले जाकर पीओ।  वरना यह भी छिन जायेगी।  वह बहुत गुस्से में हैं। वहां जो तुम बुर्र बुर्र और हुर्र हुर्र बोले रहे थे उसका मतलब उनके समझ में आ गया है।’<br />
फंदेबाज  बोला-‘पर वह तो मैं ऐसे ही कर रहा था1’<br />
दीपक बापू-‘हमने उनसे कह दिया कि वह अपनी मात्ृभाषा गूंगी में आपको गालियां दे रहा था। तुम कहते भी हो कि मेरी मातृभाषा गूंगी है!’<br />
फंदेबाज-‘वह तो इसलिये कि मेरी माताजी गूंगी है। यह कोई अलग से भाषा नहीं है। तुमने यह क्या आग लगाई।’<br />
दीपक बापू बोले-‘लगाई तो तुमने! हमने तो बुझाई।  दोनों ने हमारा नाम लेकर हंगामा किया और हमने दोनों की कराई लड़ाई।’<br />
दीपक बापू अंदर चले गये इधर फंदेबाज बुदबुदाया-‘अब इसका क्या नशा चढ़ेगा! इनको तो पता चल गया  कि यह हंगामा फिक्स था! फिर यह अपनी भाषा और गूंगी भाषा का मुद्दा चिपकाये आये हैं।  वह आलोचक महाराज पूरा खब्ती है। खबरों में छपने के लिये वह कुछ भी कर सकता है।  इससे पहले कि वह कुछ करे उसे समझाये आंऊ कि गूंगी कोई अलग से भाषा नहीं है। इस दीपक बापू का क्या? यह तो हास्य कविता लिखकर फारिग हो लेगा। मेरी शामत आयेगी। यह बोतल भी आलोचक महाराज को वापस कर आता हूं<br />
वह तुरंत वहां से चल पड़ा।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
<b>कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</p></blockquote>
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<item>
<title><![CDATA[किताबों में लिखे शब्द दुनियां नहीं चलाते-व्यंग्य कविता (kitab,shabd aur duniya-vyangya kavita)]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/12/shabda-ke-duniyan-hindi-satire-poem/</link>
<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 15:37:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/12/shabda-ke-duniyan-hindi-satire-poem/</guid>
<description><![CDATA[किताबों में लिखे शब्द कभी दुनियां नहीं चलाते। इंसानी आदतें चलती अपने जज़्बातों के साथ कभी रोना कभी ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>किताबों में लिखे शब्द<br />
कभी दुनियां नहीं चलाते।<br />
इंसानी आदतें चलती<br />
अपने जज़्बातों के साथ<br />
कभी रोना कभी हंसना<br />
कभी उसमें बहना<br />
कोई फरिश्ते आकर नहीं बताते।</p>
<p>ओ किताब हाथ में थमाकर<br />
लोगों को बहलाने वालों!<br />
शब्द दुनियां को सजाते हैं<br />
पर खुद कुछ नहीं बनाते<br />
कभी खुशी और कभी गम<br />
कभी हंसी तो कभी गुस्सा आता<br />
यह कोई करना नहीं सिखाता<br />
मत फैलाओं अपनी  किताबों में<br />
लिखे शब्दों से जमाना सुधारने का वहम<br />
किताबों की कीमत से मतलब हैं तुम्हें<br />
उनके अर्थ जानते हो तुम भी कम<br />
शब्द समर्थ हैं खुद<br />
ढूंढ लेते हैं अपने पढ़ने वालों को<br />
गूंगे, बहरे और लाचारा नहीं है<br />
जो तुम उनका बोझा उठाकर<br />
अपने फरिश्ते होने का अहसास जताते।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
<b>कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
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<p><strong></strong></p>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[मातृभक्त पति पसंद नहीं-हास्य व्यंग्य (matrubhakt pati pasand nahin-hasya vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/12/vandematram-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 15:30:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/12/vandematram-hasya-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[अधिकतर लड़कियां अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती। यह पता अब जाकर इस आधुनिक समा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>अधिकतर लड़कियां  अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती।  यह पता अब जाकर इस आधुनिक समाज को चला है।  सच कहें तो सदियों से पेट में दबी बात अब जुबान में आयी है वरना तो कौन इसे मानता?  आधुनिक संचार माध्यमों में तमाम बुराईयां हो सकती हैं पर उससे ऐसे सच सामने भी आने लगे हैं जिन पर समाज जानबूझकर पर्दा डालता आया है।  अपने घर का सच बताने में हर पुरुष शर्माता है।  चार लोगों के बीच वह यह साबित करता है कि उसका अपने घर पर पूरा नियंत्रण है।  अगर कोई गलती से कह दे कि ‘मेरी घर में नहीं सुनी जाती है तो सुनने वाले उसकी मजाक उड़ायेंगे।<br />
इसके विपरीत चार औरतें आपस में मिलेंगी तो अपने परिवार के दोष गिनाने में नहीं चूकेंगी।  सासें एकत्रित हुईं तो बहुओं और अगर बहुऐं मिली तो सासों की शिकायत करती हैं।<br />
कोई कोई तो कहते भी नहीं झिझकती कि ‘हमारे पति तो अपनी मां के चमचे हैं।’<br />
कोई मां भी कह जाती है कि ‘मेरा लड़का तो जोरु का गुलाम है।<br />
मान लीजिये ऐसे वार्तालाप में कोई पुरुष दूसरे की निंदा सुन रहा हो तो वह भी ऐसा जाल में फंसता है कि चर्चा किये जाने वाले पुरुष को वैसा ही समझ  लेता है।  अगर औरत के साथ पुरुष का रक्त संबंध हुआ तो वह उस पुरुष के बारे में प्रतिकूल टिप्पणी भी कर जाता है-‘कैसा आदमी है? क्या उसे घर चलाने की अक्ल नहीं है, लगता है बाप ने कुछ सिखाया ही नहीं है।’<br />
एक औरत मां, पत्नी, बहिन सास तथा दादी तथा अन्य रिश्तों में पुरुष का साथ निभाती है तो पुरुष भी पुत्र, पति, ससुर  तथा भाई के रूप में निभाता है।  कहने का तात्पर्य यही है कि स्त्री पुरुष के संबंध उसके रिश्तों के अनुसार बनते और बिगड़ते हैं।  जब कहीं स्त्री पुरुष के आपसी रिश्ते बिगड़ते हैं तो रक्त संबंधों के अनुसार हर कोई किसी का पक्ष भी लेता है।  कहते हैं कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य कोई नहीं जानता पर यह फार्मूला पुरुष पर भी समान रूप से लागू है।<br />
सफल पुरुष वही है जो स्त्रियों के आपसी संबंधों में बस हां हु ही कहता रहे।<br />
कई बार पत्नी ताना देती है कि ‘जाओ, अपनी मां की बात सुनो। मेरी सुनते ही कहां हो?’<br />
उसके तत्काल बाद मां की भी ताना मिल सकता है कि ‘जा जोरु के गुलाम! तेरी बात पर अब मेरा भरोसा नहीं रहा।’<br />
एक दिन हम एक सेठजी की दुकान पर खड़े थे।  उनका एक मित्र आया और बोला-‘तुझे कल सामान खरीदने बाहर चलना है कि नहीं। इतनी देर से दुकान पर न बताने आया और न ही नौकर के हाथ से संदेश भेजा।’<br />
सेठजी ने कहा-‘यार, घर पर एक काम है। देखना पड़ेगा कि चल पाऊंगा कि नहीं।’<br />
उस समय फोन की सुविधा ऐसी नहीं थी जैसी आज है।  वह आदमी बोला-‘सीधा कह न! बीबी से पूछे बिना कोई काम नहीं कर सकता।’<br />
सेठजी ने भी सरल भाव से कहा-‘तुम क्या बीबी से बिना पूछे चल रहे हो।  परसों जब मैंने चलने को कहा था तो क्यों नहीं चला? तेरा नौकर बता रहा था कि घर से मना कर दिया है। अब तुम मेरे को अपनी सफाई मत देना।’<br />
वह आदमी हंस कर चला गया। उसके जाने के बाद सेठजी हमसे बोले-‘एक बात कहूं।  बाहर आदमी कितना भी शेर बनता हो पर घर में होते सभी भीगी बिल्ली हैं। यह अलग बात है कि कोई इस बात को मानता है कि नहीं।’<br />
औरत अगर बहु है तो वह चाहती है कि पति अपनी मां यानि उसकी सास से पहले उसकी बात सुने। अगर मां है तो वह चाहती है कि इतने बरसों से जिस लड़के को पाला है वह मेरी बात सुने।’<br />
फिर इस पर बहने और अन्य रिश्ते भी होते हैं।  बहिन सोचती है कि भाई अपनी साली से अधिक हमें तवज्जो दे।  साली है तो वह चाहती है कि जीजाजी हमें अपनी बहिन से अधिक सम्मान दें।<br />
हमारे यहां समाज पुरुष प्रधान इसलिये है क्योंकि अभी भी अधिकतर प्रत्यक्ष आय का भार उस पर है-याद रहे अमेरिकी विशेषज्ञ कहते हैं कि सामान्य भारतीय गृहिणियां अपनी पति से अधिक आय करती हैं यानि वह इतना काम करती हैं कि अगर उनका रुपये में मूल्यांकन हो तो पति से अधिक आय उनकी होना चाहिये। इस प्रत्यक्ष आय के कारण उसका प्रभाव घर पर रहता है पर दूसरी समस्या उसके साथ यह है कि वह हमेशा घर से बाहर ही होता है।  दिन में घर पर क्या हुआ? किसने क्या कहा? उसे पता तब चलता है जब वह शाम को घर वापस आता है।  हर कोई अपने हिसाब से अपनी बात उसे सुनाता है।  ऐसे मेें उसकी थकान और तनाव बढ़ जाता है।  यह घर घर की कहानी है। इस पर हंसने जैसी कोई बात नहीं है।  यदि इन बातों पर आप हंसते हैं तो इसका आशय यह है कि अभी आपका विवाह नहीं हुआ या फिर आप हमसे क्या अपने आपसे अपना सच छिपा रहे हैं।<br />
अब सवाल है कि लड़कियां ही ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है तो फिर उसके जीवन साथी से आप क्या कहेंगे? मां की बात सुन क्योंकि पुरुष तो तू है। इधर दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा के भी कानून बना रखे हैं तब आदमी पर एक दबाव तो रहता ही है। एक अजीब संयोग है कि इस समय वंदेमातरम को लेकर तमाम तरह की चर्चा है ऐसे में ही एक टीवी चैनल से यह संदेश निकला कि ‘लड़कियां ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है।’ इन्हीं लड़कियों में ही भविष्य की मातायें हैं और कभी वंदेमातरम शब्द सुनकर उनको भी खुशी होगी पर अभी उनके लिये इसका क्या मतलब? ऐसे में अगर कोई लड़का अगर पसंद होने और करने  के लिये-आजकल दोनों की मर्जी चलती है- किसी लड़की से मिलने गया और जाते ही बोला दिया ‘वंदेमातरम’, तब वह तो पहली नजर में ही अस्वीकृत कर दिया जायेगा। हमने टीवी चैनल के उस कार्यक्रम के कुछ हिस्से कभी कभी देखे हैं और उसमें लड़कियों की लड़कों की माताओं पर टिप्पणियां भी सुनी है तब यह सोचते हैं कि समाज ने बहुत समय से कई बातें दबा कर रखी हैं जो सामने आ रही हैं।<br />
हमारे एक सेठ जी कहते थे कि सफल पुरुष वही है जो औरतों की विवाद में बस हां हु करता रहे।  जिस आदमी ने सोचा कि मैं कोई फैसला कर शांति करवाऊं वह अपने घर के साथ ही अपने दिल की भी शांति ऐसे दांव पर लगा देगा कि काम पर भी उसका मन नहीं लगेगा।’<br />
बहरहाल स्त्री और पुरुष के आपसी संबंधों के साथ ही स्त्रियों के आपसी रिश्ते भी होते हैं और उनके बीच जब पुरुष फंसता है और बात ऊंच नीच हुई तो पुरुष का ही नाम खराब होता है क्योंकि नाम उसके घर पर ही चलता है।  इस विषय पर एक विद्वान का कथन याद आ रहा है।  जब यह निर्णय किया गया कि स्कूल में प्रवेश के समय पिता के नाम की अनिवार्यता नहीं होगी और मां भी अपना नाम वहां लिखा सकती है।  तब उन विद्वान ने कहा था कि ‘पुरुष का तो बस एक नाम ही था वरना तो घर तो चलाती स्त्रियां ही हैं।  अब वह नाम भी पुरुष के हाथ से गया।’<br />
कहने का तात्पर्य यही है कि इस संसार में किसी रिश्ते को समझना और उस बयान करना ही गलती है।  हालात, समय और स्वार्थ अपने हिसाब से संबंध बदलते रहते हैं।</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://anantraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
<blockquote><p>
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वादा और इंतजार-व्यंग्य कविता (vada aur intzar-hindi vyangya kavita)]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2009/11/11/vada-aur-intjar-vyangya-kavita/</link>
<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 16:20:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2009/11/11/vada-aur-intjar-vyangya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[गिला शिकवा खूब किया दिन भर पूरे जमाने का फिर भी दिल साफ हुआ नहीं। इतने अल्फाज मुफ्त में खर्च किये फि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>गिला शिकवा खूब किया<br />
दिन भर पूरे जमाने का<br />
फिर भी दिल साफ हुआ नहीं।<br />
इतने अल्फाज मुफ्त में खर्च किये<br />
फिर भी चैन न मिला<br />
दिल के गुब्बारों का बोझ कम हुआ नहीं।<br />
इंसान समझता है<br />
पर कुदरत का खेल कोई जुआ नहीं।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
उन्होंने  चमन सजाने का वादा किया<br />
नये फूलों से सजाने का<br />
पता नहीं कब पूरा करेंगे।<br />
अभी तो उजाड़ कर<br />
बना दिया है कचड़े का ढेर<br />
उसे भी हटाने का वादा<br />
करते जा रहै हैं<br />
पता नहीं कब पूरा करेंगे।<br />
इंतजार तो रहेगा<br />
उनके घर का पेट अभी खाली है<br />
पहले उसे जरूर भरेंगे।<br />
तभी शायद कुछ करेंगे।</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior</p>
<p>http://zeedipak.blogspot.com</strong></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<strong>यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आत्मप्रचार की भूख-चिंतन आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/11/atmapracha-ki-bhookh-chintan-lekh/</link>
<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 15:04:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/11/atmapracha-ki-bhookh-chintan-lekh/</guid>
<description><![CDATA[अगर सभी लोग जीवन सहज भाव से व्यतीत करें तो शायद उनके बीच कोई विवाद ही न हो। मगर यह संभव नहीं है क्यो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>अगर सभी लोग जीवन सहज भाव से व्यतीत करें तो शायद उनके बीच कोई विवाद ही न हो। मगर यह संभव नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग बाह्यमुखी होते हैं और उनमें कुछ ऐसे होते हैं जो अपने व्यवसाय के हित के लिये शोर शराबा करते हुए लोगों का ध्यान अपनी ओर बनाये रखते हैं।  आज के आधुनिक युग में इंटरनेट, टीवी, एफ.एम. रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं में विज्ञापनों का भंडार है उनका लक्ष्य केवल एक ही है कि किसी तरह लोगों को उलझाये रखा जाये।  ऐसे में श्रीगीता में वर्णित सहज ज्ञान योग ही वह शक्ति है जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बनाकर दूसरों के जाल में फंसने से बचा सकती है।  यही कारण है कि जितनी उपभोग की प्रवृत्तियां के साथ स्वाभाविक रूप से  योग का प्रचार भी बढ़ रहा है।  दरअसल यही योग भी एक विक्रय योग्य वस्तु बन गया है यही कारण कि विश्व विख्यात योग शिक्षक भी लोगों के केंद्र बिन्दू में आ गये हैं और लोग उनको अपने कार्यक्रमों में देखकर एक सुख की अनुभूति करते हैं।  योग शिक्षक भारतीय धर्म के प्रतीक हैं और उन्होंने एक गैर हिन्दू कार्यक्रम में शामिल होकर यह सािबत भी किया कि<br />
उनके लिये पूरा विश्व एक परिवार है।   यहां योग गुरु को गलत ठहराना ठीक नहीं है पर कुछ सवाल ऐसे हैं उनके जवाब में हम ऐसे विचारों तक पहुंच सकते हैं जिनसे सहजयोग के सिद्धांत का विस्तार हो। </p>
<p>यह विश्व विख्यात योग शिक्षक कहने के लिये भले ही गैर हिन्दूओं के कार्यक्रम में गये हों पर वह सभी इसी देश  के  ही बाशिंदे हैं।  मुख्य बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रम में उनको बुलाकर आयोजक सिद्ध क्या करना चाहते हैं?<br />
अधिक चर्चा से पहले एक बात स्पष्ट करें कि आम भारतीय अपनी रोजमर्रा के संघर्ष में ही व्यस्त है।  किसी भी जाति, धर्म और भाषा समूह के आम आदमी के दिल में झांकिये वहां उसकी निज समस्यायें डेरा डाले बैठे रहती हैं।  इनमें से कुछ लोग टीवी तो कुछ समाचार पत्रों में समाचार पढ़कर ऐसे जातीय, भाषाई और धार्मिक समूहों के सम्मेलनों की जानकारी पढ़ते हैं।  अगर उनका भावनात्मक जुड़ाव होता है तो कुछ देर सोचकर भूल जाते हैं।  आम आदमी में इतना सामथ्र्य नहीं है कि वह ऐसे कार्यक्रमों के लिये धन और समय का अपव्यय करे।   मगर चूंकि उसकी सोच में जातीय, धार्मिक और भाषाई विभाजनों का बोध रहता है इसलिये उसका ध्यान आकर्षित करने  के लिये उनके शिखर पुरुष ऐसी बैठकें कर अपनी शक्ति का बाहरी समाजों के सामने प्रदर्शन करते हैं। हर समूह के शिखर पुरुष ऐसी गतिविधियों से अपनी कथित समाज सेवा का प्रदर्शन करते हैं। </p>
<p>जिन लोगों ने यह कार्यक्रम किया वह एक भारतीय योग शिक्षक को बुलाकर अपने और बाहरी समाज के सामने अपनी शक्ति के प्रदर्शन करने के साथ ही अपनी छबि भी बनाना चाहते थे।  वह जताना चाहते थे कि विश्व भर के प्रचार माध्यमों में छायी एक बड़ी हस्ती उनके कार्यक्रम में आयी।  योग शिक्षक ने उनको क्या सिखाया या वह क्या सीखे यह इसी बात से पता चलता है कि अपने इसी सम्मेलन में एक गीत के विरुद्ध अपना निर्णय सुनाया।   एक गीत से अपने समाज को डराने वाले यह लोग उस योग शिक्षक से क्या सीखे होंगे-यह आसानी से समझा जा सकता है।   1.10  अरब की इस आबादी में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं।  देश के एक प्रतिशत से भी कम लोग हैं जिनके पास धन अपार मात्रा में है।   अगर हम आम और खास आदमी का अंतर देखें तो इतनी दूरी दिखाई देगी जितनी चंद्रमा से इस धरती की।  आम आदमी के संघर्ष पर अधिक क्या लिखें? उसके दर्द का भी व्यापार होने लगा है। अगर हम जातीय, धार्मिक और भाषाई सम्मेलनों को देखें तो उसमें खास लोग और उनके अनुयायी शामिल होते हैं पर वह अपने समाज का सही  प्रतिनिधित्व नहीं करते हालांकि वह लोगा ऐसा  भ्रम वह पैदा करते हैं।  मुश्किल यह है कि यह मान लिया जाता है कि उनके पास ही समाज को नियंत्रित करने की शक्ति है इसलिये बाहरी समाज के शिखर पुरुष उनसे संबंध रखते हैं।  आम आदमी का कोई संगठन नहीं होता तो जो बनाते हैं वह बहुत जल्दी खास बन जाते हैं उनका लक्ष्य भी यही होता है कि आम आदमी को भीड़ में भेड़ की तरह हांके। </p>
<p>योग शिक्षक बाकायदा उस वैचारिक सम्मेलन में गये जिसे गैर हिन्दू धर्मी लोगों का भी कहा जा सकता ह-हालांकि इस युग में यह शब्द ही मूर्खतापूर्ण लगता है पर पढ़ने वालों को अपनी बात समझाने के लिये लिखना ही पड़ता है।   शायद योगाचार्य  यह दिखाने के लिये गये होंगे कि इससे शायद देश में एकता का आधार मजबूत होगा।  उन्होंने यह भी उम्मीद लगायी होगी कि इसमें वह  उस समाज को कोई संद्रेश दे पायेंगे।  उनका यह प्रयास एक सामान्य घटना बनकर रह गया क्योंकि वहां तो समाज के ऐसे शिखर पुरुषों का बाहुल्य था जो कि उनकी उपस्थिति को अपने कार्यक्रम का प्रभाव बढ़ाना चाहते थे।  किसी दूसरे समुदाय के धर्माचार्य का संदेश   ऐसे शिखर पुरुष कभी भी अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली का भाग नहीं बनाते। वह जानते हैं कि ऐसी जरा भी भी कोशिश उनका अपने समूह से नियंत्रण खत्म करेगी।  एक व्यक्ति हाथ से निकला नहीं कि सारा समाज ही हाथ से निकल जायेगा।  आखिर एक गीत से घबड़ाने वाले इतने साहसी हो भी कैसे सकते हैं।<br />
भारतीय योग में केवल योगासन और प्राणायाम ही नहीं आते बल्कि मंत्रोच्चार भी होता है।   मंत्रोच्चार में ऐसे शब्द है जिसमें देवी देवताओं की उपासना होती है-एक गीत से घबड़ाने वाले शिखर पुरुष भला दूसरे समूह के इष्टों का नाम अपने लोगों को कैसे लेने दे सकते हैं? कुल मिलाकर यह एक अर्थहीन प्रयास था।  योगशिक्षक की उपस्थिति से उनकोकोई अंतर नहीं पड़ा पर आयोजकों के शिखर पुरुष एक अंतर्राष्ट्रीय हस्ती के पास बैठकर अपना वजन बढ़ाने में सफल रहे।  </p>
<p>कहने का तात्पर्य यह है कि आम आदमी चाहे किसी भी जाति, भाषा  या धर्म का हो उसके समूह के शिखर पुरुष प्रचार माध्यमों में छाये लोगों को अपने यहां बुलाकर अपना वजन बढ़ाते हैं भले ही वह उनके समुदाय का न हो-प्रचार माध्यमों में अपनी छबि बनाने के अलावा उनका कोई उद्देश्य नहीं होता।  यह किसी एक समूह के साथ नहीं है बल्कि हर समूह में ऐसा हो रहा है।  इसका कारण यह है कि आज की महंगाई, बेकारी, पर्यावरण प्रदूषण तथा सामाजिक कटुता ने आम आदमी को असहज बना दिया है।  इसी असहजता को अधिक बढ़कार सभी समाजों को शिखर पुरुष उसे सांत्वना और साहस देने के नाम पर ऐसे सम्मेलन करते हैं पर उनका लक्ष्य केवल आत्म प्रचार करना होता है। जहां तक आदमी आदमी की जिंदगी का प्रश्न है तो वह कठिन से कठिन होती जा रही है और सभी समूहों  शिखर पुरुषों के केवल अपने सदस्यों की संख्या की चिंता रहती है।<br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सम्मेलन पर झगड़ा-हास्य व्यंग्य (hindi sammelan-hasya vyangya)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/11/hindi-sammelan-hindi-commedy-satire/</link>
<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 14:58:39 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/11/hindi-sammelan-hindi-commedy-satire/</guid>
<description><![CDATA[ब्लागर उस समय सो रहा था कि चेले ने आकर उसके हाथ हिलाकर जगाया। ब्लागर ने आखें खोली तो चेले ने कहा-‘सा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p>ब्लागर उस समय सो रहा था कि चेले ने आकर उसके हाथ हिलाकर जगाया। ब्लागर ने आखें खोली तो चेले ने कहा-‘साहब, बाहर कोई आया है। कह रहा है कि मैं ब्लागर हूं।’<br />
ब्लागर एकदम उठ बैठा और बोला-‘जाकर बोल दे कि गुरुजी घर पर नहीं है।’<br />
चेले ने कहा-’साहब, मैंने कहा था। तब उसने पूछा ‘तुम कौन हो’ तो मैंने बताया कि ‘मैं उनका शिष्य हूं। ब्लाग लिखना सीखने आया हूं’। तब वह बोला ‘तब तो वह यकीनन अंदर है और तुम झूठ बोल रहे हो, क्योंकि उसने सबसे पहले तो तुम्हें पहली शिक्षा यही दी होगी कि आनलाईन भले ही रहो पर ईमेल सैटिंग इस तरह कर दो कि आफलाईन लगो। जाकर उससे कहो कि तुम्हारा पुराना जानपहचान वाला आया है। और हां, यह मत कहना कि ब्लागर दोस्त आया है।’</p>
<p>ब्लागर बोला-‘अच्छा ले आ उसे।’<br />
शिष्य बोला-‘आप&#160;&#160; निकर छोड़कर&#160;पेंट&#160; पहन लो। वरना क्या कहेगा।’<br />
ब्लागर ने कहा-‘ क्या कहेगा ? वह कोई ब्लागर शाह है। खुद भी अपने घर पर इसी तरह तौलिया&#160;पहने &#160;कई बार मिलता है। मैं तो फिर भी आधुनिक&#160;प्रकार&#160;की &#160;नेकर&#160;पहने&#160;रहता&#160;&#160;हूं, जिसे पहनकर लोग सुबह मोर्निंग वाक् पर जाते हैं।’<br />
इधर दूसरे ब्लागर ने अंदर प्रवेश करते ही कहा-‘यह शिष्य कहां से ले आये? और यह ब्लागिंग में सिखाने लायक है क्या? बिचारे से मुफ्त में सेवायें ले रहे हो?’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘अरे, यह तो दोपहर ऐसे ही सीखने आ जाता है। मैं तुम्हारी तरह लोगों से फीस न लेता न सेवायें कराता हूं। बताओ कैसे आना हुआ।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कंप्यूटर की तरफ देखते हुए पूछा-‘यह तुम्हारा कंप्यूटर क्यों बंद है? आज कुछ लिख नहीं रहे। हां, भई लिखने के विषय बचे ही कहां होंगे? यह हास्य कवितायें भी कहां तक चलेंगी? चलो उठो, मैं तुम्हारे लिखने के लिये एक जोरदार समाचार लाया हूं। ब्लागर सम्मेलन का समाचार है इसे छाप देना।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम खुद क्यों नहीं छाप देते। तुम्हें पता है कि ऐसे विषयों पर मैं नहीं लिखता।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘अरे, यार मैं अपने काम में इतना व्यस्त रहता हूं कि घर पर बैठ नहीं पाता। इसलिये कंप्यूटर बेच दिया और इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा दिया। अब अपने एक दोस्त के यहां बैठकर कभी कभी ब्लाग लिख लेता हूं।’<br />
पहले ब्लागर ने घूरकर पूछा-‘ब्लाग लिखता हूं से क्या मतलब? कहो न कि अभद्र टिप्पणियां लिखने के खतरे हैं इसलिये दोस्त के यहां बैठकर करता हूं। तुमने आज तक क्या लिखा है, पता नहीं क्या?’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘क्या बात करते हो? आज इतना बड़ा सम्मेलन कराकर आया हूं। इसकी रिपोर्ट लिखना है।’<br />
पहले ब्लागर ने इंकार किया तो उसका शिष्य बीच में बोल पड़ा-‘गुरुजी! आप मेरे ब्लाग पर लिख दो।’<br />
दूसरा ब्लागर बोला-‘अच्छा तो चेले का ब्लाग भी बना दिया! चलो अच्छा है! तब तो  संभालो यह पैन ड्ाईव और कंप्यूटर खोलो उसमें सेव करो।’<br />
शिष्य ने अपने हाथ में पैन ड्राईव लिया और कंप्यूटर खोला।<br />
पहले ब्लागर ने पूछा-‘यह फोटो कौनसे हैं?<br />
दूसरे ब्लागर ने एक लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा‘-जब तक यह इसके फोटो सेव करे तब तक तुम उसको देखो।<br />
ब्लागर ने फोटो को एक एक कर देखना शुरु किया। एक फोटो देखकर उसने कहा-‘यह फोटो कहीं देखा लगता है। तुम्हारा जब सम्मान हुआ था तब तुमने भाषण किया था। शायद&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.’<br />
दूसरे ब्लागर ने बीच में टोकते हुए कहा-‘शायद क्या? वही है।’<br />
दूसरा फोटो देखकर ब्लागर ने कहा-‘यह चाय के ढाबे का फोटो। अरे यह तो उस दिन का है जब मेरे हाथ से नाम के लिये ही उद्घाटन कराकर मुझसे खुद और अपने चेलों के लिये चाय नाश्ते के पैसे खर्च करवाये थे। मेरा फोटो नहीं है पर तुम्हारे चमचों का&#8230;&#8230;.’’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘अब मैं तुम्हारे इस चेले को भी चमचा कहूं तो तुम्हें बुरा लगेगा न! इतनी समझ तुम में नहीं कि ब्लागिंग कोई आसान नहीं है। जितना यह माध्यम शक्तिशाली है उतना कठिन है। लिखना आसान है, पर ब्लागिंग तकनीकी एक दिन में नहीं सीखी जा सकती। इसके लिये किसी ब्लागर गुरु का होना जरूरी है। सो किसी को तो यह जिम्मा उठाना ही है। तुम्हारी तरह थोड़े ही अपने चेले को घर बुलाकर सेवा कराओ। अरे ब्लागिंग सिखाना भी पुण्य का काम है। तुम तो बस अपनी हास्य कवितायें चिपकाने को ही ब्लागिंेग कहते हो।’<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, यह तो है! यह तीसरा फोटो तो आइस्क्रीम वाले के पास खड़े होकर तुम्हारा और चेलों का आईस्क्रीम खाने का है। यह आईसक्रीम वाला तो उस दिन मेरे सामने रास्ते पर तुमसे पुराना उधार मांग रहा था। तब तुमने मुझे आईसक्रीम खिलाकर दोनों के पैसे दिलवाकर अपनी जान बचाई थी।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘मेरे फोटो वापस करो।’<br />
पहले ब्लागर ने सभी फोटो देखकर उसे वापस करते हुए कहा-‘यार, पर इसमें सभी जगह मंच के फोटो हैं जिसमें तुम्हारे जान पहचान के लोग बैठे हैं। क्या घरपर बैठकर खिंचवायी है या किसी कालिज या स्कूल पहुंच गये थे। सामने बैठे श्रोताओं और दर्शकों का कोई फोटो नहीं दिख रहा।’<br />
दूसरे ब्लागर ने पूछा-‘तुम किसी ब्लागर सम्मेलन में गये हो?’<br />
पहले ब्लागर ने सिर हिलाया-‘नहीं।’<br />
दूसरा ब्लागर-‘तुम्हें मालुम होना चाहिये कि ब्लागर सम्मेलन में सिर्फ ब्लागर की ही फोटो खिंचती हैं। वहां कोई व्यवसायिक फोटोग्राफर तो होता नहीं है। अपने मोबाइल से जितने और जैसे फोटो खींच सकते हैं उतने ही लेते हैं। ज्यादा से क्या करना?<br />
पहला ब्लागर-हां, वह तो ठीक है! ब्लागर सम्मेलन में आम लोग कहां आते हैं। अगर वह हुआ ही न हो तो?<br />
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया-‘लाओ! मेरे फोटो और पैन ड्राइव वापस करो। तुमसे यह काम नहीं बनने का है। तुम तो लिख दोगे ‘ न हुए ब्लागर सम्मेलन की रिपोर्ट’।<br />
पहला ब्लागर ने कहा-‘क्या मुझे पागल समझते हो। हालांकि तुम्हारे कुछ दोस्त कमेंट में लिख जाते हैं ईडियट! मगर वह खुद हैं! मैं तो लिखूंगा ‘छद्म सम्मेलन की रिपोर्ट!’<br />
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया उसने कंप्यूटर में से खुद ही पेनड्राइव निकाल दिया और जाने लगा।<br />
फिर रुका और बोला-‘पर इस ब्लागर मीट पर रिपोर्ट जरूर लिखना। हां, इस ब्लागर सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना। तुम जानते नहीं इंटरनेट लेखकों के सम्मेलन और चर्चाऐं कैसे होती हैं? इंटरनेट पर अपने बायोडाटा से एक आदमी ने अट्ठारह लड़कियों को शादी कर बेवकूफ बनाया। एक आदमी ने ढेर सारे लोगों को करोड़ों का चूना लगाया। इस प्रकार के समाचार पढ़ते हुए तुम्हें हर चीज धोखा लगती है। इसलिये तुम्हें समझाना मुश्किल है। कभी कोई सम्मेलन किया हो तो जानते। इंटरनेट पर कैसे सम्मेलन होते हैं और उनकी रिपोर्ट कैसे बनती है, यह पहले हमसे सीखो। सम्मेलन करो तो जानो।’<br />
पहले ब्लागर ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा-ऐसे सम्मेलन कैसे कराऊं जो होते ही नहीं।’<br />
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘होते हैं, करना हमसे सीख लो।’<br />
वह चला गया तो पहला ब्लागर सामान्य हुआ। उसने शिष्य से कहा-‘अरे, यार कम से कम उसके फोटो तो कंप्यूटर में लेना चाहिये थे।’<br />
शिष्य ने कहा-‘ गुरुजी फोटो तो मैंने फटाफट पेनड्राइव से अपने कंप्यूटर से ले लिये।’<br />
पहला ब्लागर कंप्यूटर पर बैठा और लिखने लगा। शिष्य ने पूछा’क्या लिख रहे हैं।<br />
पहले ब्लागर ने कहा-‘जो उसने कहा था।’<br />
शिष्य ने पूछा-‘यही न कि इस मुलाकात की बात लिख देना।’<br />
ब्लागर ने जवाब दिया‘नहीं! उसने कहा था कि ‘इस सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना’।’’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
<b>नोट-यह व्यंग्य पूरी तरह से काल्पनिक है। किसी घटना या सम्मेलन का इससे कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो यह एक संयोग होगा। इसका लेखक किसी दूसरे ब्लागर से ब्लागर से मिला तक नहीं है। </b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फरिश्ते होने का अहसास जताते-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/2009/11/11/hindi-kavita-on-farishte/</link>
<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 14:53:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.wordpress.com/2009/11/11/hindi-kavita-on-farishte/</guid>
<description><![CDATA[किताबों में लिखे शब्द कभी दुनियां नहीं चलाते। इंसानी आदतें चलती अपने जज़्बातों के साथ कभी रोना कभी ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>किताबों में लिखे शब्द<br />
कभी दुनियां नहीं चलाते।<br />
इंसानी आदतें चलती<br />
अपने जज़्बातों के साथ<br />
कभी रोना कभी हंसना<br />
कभी उसमें बहना<br />
कोई फरिश्ते आकर नहीं बताते।</p>
<p>ओ किताब हाथ में थमाकर<br />
लोगों को बहलाने वालों!<br />
शब्द दुनियां को सजाते हैं<br />
पर खुद कुछ नहीं बनाते<br />
कभी खुशी और कभी गम<br />
कभी हंसी तो कभी गुस्सा आता<br />
यह कोई करना नहीं सिखाता<br />
मत फैलाओं अपनी  किताबों में<br />
लिखे शब्दों से जमाना सुधारने का वहम<br />
किताबों की कीमत से मतलब हैं तुम्हें<br />
उनके अर्थ जानते हो तुम भी कम<br />
शब्द समर्थ हैं खुद<br />
ढूंढ लेते हैं अपने पढ़ने वालों को<br />
गूंगे, बहरे और लाचारा नहीं है<br />
जो तुम उनका बोझा उठाकर<br />
अपने फरिश्ते होने का अहसास जताते।।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
<b>कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</b></p>
<blockquote><p>
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भर्तृहरि नीति शतक-क्षमा करती है कवच की तरह काम]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/10/hindu-adhyatmik-sandesh-kshama-kavach-hai/</link>
<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 04:02:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk.wordpress.com/2009/11/10/hindu-adhyatmik-sandesh-kshama-kavach-hai/</guid>
<description><![CDATA[क्षान्तिश्चत्कवचेन किं किमनिरभिः क्रोधीऽस्ति चेद्दिहिनां ज्ञातिश्चयेदनलेन किं यदि सहृदद्दिव्यौषधं कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><p><b>क्षान्तिश्चत्कवचेन किं किमनिरभिः क्रोधीऽस्ति चेद्दिहिनां ज्ञातिश्चयेदनलेन किं यदि सहृदद्दिव्यौषधं किं फलम्।<br />
किं सर्पैयीदे दुर्जनाः किमु धनैर्विद्याऽनवद्या चदि व्रीडा चेत्किमुभूषणै सुकविता यद्यपि राज्येन किम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</b>यदि क्षमा हो तो किसी कवच की आवश्यकता नहीं है। यदि मन में क्रोध है तो फिर किसी शत्रु की क्या आवश्यकता? यदि मंत्र है तो औषधियो की आवश्यकता नहीं है। यदि अपने दुष्ट की संगत कर ली तो सांप की क्या कर लेगा? विद्या है तो धन की मदद की आवश्यकता नहीं। यदि लज्जा है तो अन्य आभूषण की आवश्यकता नहीं है।<br />
<b>वर्तमान में संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</b> ध्यान दें तो भर्तृहरि महाराज ने पूरा जीवन सहजता से व्यतीत करने वाला दर्शन प्रस्तुत किया है।  अगर आदमी विनम्र हो और दूसरे के अपराधों को क्षमा करे तो उसे कहीं से खतरा नहीं रहता। जैसा कि हम देख रहे हैं कि आजकल अस्त्र शस्त्र रखने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है।  इसका कारण यह है कि लोगों का विश्वास अपने ऊपर से उठ गया है।  अपने छोटे छोटे विवादों के बड़े हमले में परिवर्तित होने का भय उनको रहता है इसलिये ही लोग हथियार रखते हैं।  उनको यह भी विश्वास है कि वह किसी को क्षमा नहीं करते इसलिये उनके क्रोध या हिंसा का शिकार कभी भी उन पर हमला कर सकता है। जिन लोगों में क्षमा का भाव है वह किसी प्रकार की आशंका से रहित होकर जीवन व्यतीत करते हैं।  क्षमा का भाव होता है तो क्रोध का भाव स्वतः ही दूर रहता है।  ऐसे में अन्य कोई शत्रु नहीं होता जिससे आशंकित होकर हम अपनी सुरक्षा करें। </p>
<p>उसी तरह अपनी संगत का भी ध्यान रखना चाहिये। जिनकी सामाजिक छबि खराब है उनसे दूर रहें इसी में अपना हित समझें।  वैसे आजकल तो हो यह रहा है कि लोग दादा और गुंडा टाईप के लोगों से मित्रता करने में अपनी इज्जत समझते हैं मगर सच तो यह है कि ऐसे लोग उसी व्यक्ति को तकलीफ देते हैं जो उनको जानता है।  इसके अलावा अपने दोस्तों से रुतवे के बदल अच्छी खासी कीमत भी वसूल करते हैं भले ही उनका कोई काम नहीं करते हों पर भविष्य में सहयोग का विश्वास दिलाते हैं। देखा यह गया है कि दुष्ट लोगों की संगत हमेशा ही दुःखदायी होती है।<br />
अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रतिदिन योग साधना के साथ अगर मंत्र जाप करें तो फिर आप औषधियों के नाम जानने का भी प्रयास न करें। राह चलते हुए फाईव स्टार टाईप के अस्पताल देखकर भी आपको यह ख्याल नहीं आयेगा कि कभी आपको वहां आना है।<br />
जहां तक हो सके अच्छी बातों का अध्ययन और श्रवण करें ताकि समय पड़ने पर आप अपनी रक्षा कर सकें। याद रखिये जीवन में रक्षा के लिये ज्ञान सेनापति का काम करता है। अगर आपके पास धन अल्प मात्रा में है और ज्ञान अधिक मात्रा में तो निश्चिंत रहिये।<br />
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;<br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://rajlekh.blogspot.com</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
</b><br />
<blockquote>
<strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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</strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
</div>]]></content:encoded>
</item>

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