Tags » कहानी

 हामिला 


बात पिछले सदी की है। सावन की उस सुबह पूरी दालमंडी में एक बेहद भावपूर्ण आवाज़ गूँज रही थी – “बाबुल मोरा नइहर छूटो ही जाये…”। सुबह और खुशनुमा जान पड़ता था। हालांकि तवायफ़ों का कोई नइहर नहीं होता मगर असिया बाई को जब कभी लखनऊ की याद सताती तो वो अख़्तर पिया की इस ठुमरी में उसे तलाशती थी। उस समय के ठुमरी फनकार अपने उपनामों में पिया लगाते थे और उस परंपरा में चौलक्‍खी वाले वज़ीर मिर्ज़ा फ़र्रूख़ाबादी ‘कदर पिया’ से लेकर महाराज बिंदादीन, सनद पिया तक सभी नामवर हुए हैं। सितार और ठुमरी की जुगलबंदी और सितार के साथ ठुमरी को गाने की रीत भी लखनऊ की है। असिया बाई को लखनऊ से बनारस आये अब तीन साल होने को थे मगर फिर भी कहीं लखनऊ का ज़िक्र छिड़ता तो उसके दिल में एक हल्का-सा दर्द ज़रूर उठता था। ये मीठा दर्द अक्सर उसकी आँखें नम कर देता। वहाँ इन फिरंगियों और नवाबज़ादों की अना की लड़ाई में उसे न घसीटा गया होता और उसके जान पर न बनी होती तो वो लखनऊ छोड़कर आने का तसव्वुर भी न करती कभी। यहाँ आकर उसने अपना नाम भी ‘बानो’ से ‘बाई’ कर लिया था। बनारस ने भी अब उसे अपना लिया था। दालमंडी में उसके कोठे पर शहर के तमाम रईसज़ादों का मजमा लगता था हर शाम। कुछएक की तो बीवियों से भी अच्छी दोस्ती थी उसकी। पूरे शहर में उसके जैसे गौनिहारिन नहीं थी कोई। … 7 more words

कहानी

मेरी कहानी के नायक-नायिका

##AksharonKiAkshara (इस किस्से ने कब छुआ था मालूम है पर याद नहीं है)

हर छोटी कहानी की तरह ये भी एक कहानी है जो पढ़ने के बाद बेशक खत्म हो जाएगी। आखिर किसलिए लिख रहा हूँ इस किस्से को, शायद नहीं पता मुझे…

बात दोस्ती या हम साथी की तरह ही शुरू हुई थी। वो लड़का दुबला पतला सा, सीधे बालों वाला, नेपाल सीमा के पास बने एक गांव से था। जिसकी बनावट वहीं के आवो हवा से हुई थी। इसलिए उसकी आंखे भी नेपालियों की तरह ही छोटी-छोटी बिल्कुल मछली की तरह थी।

बदमाश था, नसमझ भी लगा, लेकिन किसी सहमें हुए बच्चे की तरह हरकतें दे रहा था। हां शौकिया तौर पर उसको कुछ आदतें थी जो मुझे भी लगी। उनके बारे में फिर कभी बात की जाएगी। लेकिन अभी हम सीधे आते उस लड़के से जुड़ी एक कहानी पर…

काम करने का जुनून, कभी पढ़ने का जुनून, कभी पैसे कमाने का जुनून और कभी अकेले रहने की कला…बिना बताए 15 से 20 दिनों तक कॉलेज से गायब रहना….कहता था मुझे किसी से मतलब ही नहीं है।

उसकी जिंदगी में एक लड़की आई थी, वो थी सीनियर लेकिन जो भी हो उसने उस लड़के की जिंदगी को पूरी तरह बदल के रख दिया था। फेयरवेल के आखिरी दिन और या फिर उस लड़की का चले जाने के आखिरी दिन तक वो लड़का उनके साथ रहा। फिर जाने क्या हुआ और उनके बीच में वो बात नहीं रही जो अक्सर उन दोनों में मैने देखी थी। क्या वजह रही होगी, खैर मैने कभी कोशिश भी नहीं की पूछने की….

हर दिन उस लड़के के दिल में सालता रहता है कि कोई उसका नहीं है, किसी ने ईमानदारी से उसको नहीं निभाया..

मुझसे अक्सर झूठ कहकर कहीं भाग जाता था। खैर मेरे लिए सब दोस्तों की तरह ही था वो…

वक्त हो गया था उनके मिलने का हम दोनों एक सड़क किनारे खड़े हुए, एक बस आकर रूकी और उसमें वो लड़का और हमारी सीनियर चली गई। शायद आखिरी मुलाकात थी उनसे, लेकिन याद है इतना कि उन दोनों को फिर कभी साथ नहीं देखा…..

अभी दोनों से मिलकर आया हूँ, एक साथ नहीं मिल पाया, हां अलग अलग ही मुलाकात हो पाई है उनसे….दोनों अब एक दुसरे की बात नहीं करते…मैं ही पूछ लेता हूँ…शायद मुझे ज्यादा जरूरी है…मेरी कहानी के नायक-नायिका हैं दोनों…देखना कब तक चलता है ये सिलसिला…नहीं तो किसी दिन दोनों को एक जगह मिलाकर इस किताब को बंद कर चला जाऊंगा….अभी सिर्फ आनंद आ रहा है दोनों के बारे में सोचते हुए…उनके हंसते- गाते चेहरों को याद कर ….

कहानी

उनकी कहानी उनके साथ रहने दो

मेरे साथ मेरी रवानी है

कल की कल देखेंगे

आज ज़िन्दगी बड़ी मस्तानी है

Short Story : प्रेम की वेदी

सारी रात एक लेखक कुछ सोचता रहता है । कहानी बनानी है ? कहाँ से शुरुआत करूँ । अफसोस हम प्रतिक्रियावादी हो गए हैं । भारत जिसमे आजादी का सपना पलना चाहिए जो लगातार युवाओं की सोच के अधीन होना चाहिए । जर्मनी में जब ये वाद हावी था तो वहां मार्क्स और आइंस्टीन का जन्म हुआ था । जिन्होंने गर्वीले लहजे में यथार्थवादी नजरिये की वकालत की थी । प्रतिक्रिया आ सकती है तुम मार्कसिस्ट हो कम्यूनिसम की वकालत करते हो । सरल शब्दों में कहूँ तो मैंने गांधी को जिया है । एक महीने उनकी सत्य के प्रयोग मेरे कार्यों में एक अलहदा छाप छोड़कर गए हैं ।

आजादी और प्रतिक्रियावादी होना दो अलग धूरी है । समकालीन चलने वाली कहानी बेहद समझ में आती है ।आचार्य चतुरसेन की कहानी अधूरी कहानी जैसे समाज के बन्धन को तोड़ती नज़र आती है पर अफसोस सुनने वाले पात्र जब तक अपनी कुर्सी छोड़ घर की तरफ रुखसत हो जाते है ।

समाज जिसमे निर्मित होती है आपकी मासूम जिंदगी । आते जाते देखा करता था उन्हें । एक लब्ज़ कभी बिगड़ता नहीं था उनके अल्फ़ाज़ों में । कभी बाँहों में हाथ डाले अपनी जवानी की उत्कर्ष भावनाएं प्रकट करने वाले युवक युवती । वक़्त बीता जाता है । मालूम पड़ता है घर का बोझ दोनों की माथो की रेखाओं पर साफ़ नज़र आता है । दोनों अपनी ख़ामोशी को सिर्फ समोसे की कमियों में जरुरत पड़ने पर तोड़ते है ।

अल्हड़पन दोनों के हाल में बेहाल नज़र आता है । एक अधूरा उन्हें पूरा नहीं कर पा रहा है । कभी सलवार सूट में झुकी हुई निगाहे कुछ कहना चाहती है तो कभी ऐनक के पीछे रोती आँखे मोहब्बत का भाव प्रकट कर रही हैं । बात बात पर दोनों लड़ रहे है । लगता है यह प्रतिक्रिया उनकी नियतिवाद को खुली चुनौती दे रही है । धर्म का पर्दा लपटे यह समाज दोनों समझ रहा है पर एक छोटे से सच को साध नहीं पा रहा है ।

सिगरेट का आखिरी कश जुबान से बिन बोले फेफड़ो में दस्तक देकर लेखक को लिखने के उकसा रहा है । ये भावी समाज रांगेय राघव को लूटा हुआ महसूस कर रहा है । देखो एक किसान फिर फंदा बनाकर कर प्रेमचंद्र के अल्फ़ाज़ों में संग्राम करता हुआ प्रेम की वेदी पर अपना बलिदान लिख रहा है ।
##kss

Kss Story

दिशा - कविता मेहरोत्रा

दिशा समझ नहीं पा रही है कि क्या एक लड़की की नियति है सिर्फ खूँटे से बँधे रहना ? उसे तो लगा था कि जमाना बदल गया है, परन्तु लगता है कि विकास टेक्नोलॉजी का हुआ है, इन्सान का नहीं । दिशा अपने माता-पिता की पहली सन्तान है । माता-पिता दोनों ही शिक्षित और उदार । दिशा अमेरिका में पढ़ी और उसे वहीं नौकरी भी मिल गयी । कुछ दिनों बाद उसका विवाह तय हुआ । वह अमेरिका में और उसका भावी पति ऑस्ट्रेलिया में । तय हुआ कि अभी मजबूरी है, नयी नौकरी है, बाद में वे एक ही स्थान पर नौकरी करने का प्रयास करेंगे, ताकि साथ-साथ रह सकें । सारी छुट्टियाँ विवाह के रीति-रिवाजों में समाप्त हो गयीं । एक रात पति के साथ रहकर वह अपनी नौकरी पर लौट गई । विदेश में होने के कारण किसी के पास भी बातचीत का पर्याप्त समय नहीं था । कभी -कभी तो बात ई-मेल पर ही होती थी । 8 more words

जुलाई 2017

अनुत्तरित - पूनम दीक्षित

निवेदिता अभी-अभी काम समेट कर राइटिंग टेबल पर बैठी थी । ए.टी.आई. से शिवानंद डिप्टी कलेक्टर्स के डिपार्टमेन्टल एक्जाम के पेपर का बंडल दे गया था । उसे चेक करना था । तभी घंटी बजी । देखा तो दुलारी, कामवाली बाई खड़ी थी । बड़ा गुस्सा आया कि अब क्या करने आई है । दुलारी अंदर आकर फफक-फफक कर रो पड़ी । उसकी पूरी देह हिचकियों से हिल रही थी । आँखें गुड़हल का फूल । उसे चुप कराया । चाय बना लाई । कहा –“ पी और बता तो हुआ क्या ?” दुलारी सुगठित देह की 25/26 वर्ष की जवान औरत है । साँवली पर तीखे नाक नक्श वाली । खूब बनी-ठनी सँवरी रहती है , हमेशा काजल, बिंदी, पायल झुमका से लैस, पर आज बांध तोड़ उफनती नदी-सा विलाप कर रही है । धीरे-धीरे कुछ शांत हुई । चाय पीते-पीते बोली – “बीबीजी, आदमी ने बहुत मारा है, देखो”- सारे शरीर पर नीले-काले दाग़ उभर आए थे । 11 more words

जुलाई 2017

यह कैसी ढाल - सुषमा हंस

सरिता से मैंने उसकी बेटी के विषय में पूछ लिया कि उसका बारहवीं की परीक्षा का परिणाम कैसा रहा ? अब कौन से कॉलेज में पढ़ रही है ?

जुलाई 2017