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Urban sprawl

We decided to go live outside Almora for a week last diwali. Childhood stories had primed me to expect long walks along forested hills. Even though I knew that things would have changed since, the reality was like being hit on the nose by a fish. 182 more words

India

Munsiyari 2: Chaos, Tumble and Grit

Day 1: Delhi to Ganai Gangoli :- The overnight ride and the mid-day ordeal.

Preparations done, I got a call from Iqbal. He inquired if I was all set. 7,673 more words

Munsiyari

Munsiyari: The First Ride (continued)

                                                    PART II

Respectfully, I passed the cows and post-pass, had an amusing bit-episode; calling them names. Star-cast included: Gang of Cows, Gabbar the motorcycle and yours truly. 1,617 more words

Munsiyari

स्कूल की सैर

सुबह के ६ बजे हैं. मोबाइल फ़ोन पर अलार्म की ट्रिंग ट्रिंग  मुझे सपनों की दुनिया के बाहर लाती है. बिस्तर पर से उठकर खिड़की के परदे हटा कर मैं बाहर झांकती हूँ. दूर दूर तक सिर्फ  बहुमंज़िली इमारतों  से बना कंक्रीट का जंगल  दिखाई देता  हैं और नीचे हाईवे पर भागती  कारों के हॉर्न की कर्कश ध्वनि कानों के परदे चीरती है।  इस नीरस दृश्य को देख कर बचपन के दिन याद आ  जाते हैं जब हम सुबह सुबह स्कूल की सैर पर निकल जाते थे।  अब आप सोचेंगे कि भला कोई स्कूल की भी सैर करता है? लेकिन दोस्तों इसमें आश्चर्य की कोई बात  नहीं. असल में हमारे स्कूल का रास्ता किसी सैर से कम नहीं था जिसपर हमने कई यादगार कारनामे किये .

मेरा बचपन हिमालय की गोद में बसे अल्मोड़ा नाम के एक पर्वतीय शहर  में बीता। हमारा घर शहर सीमा से दूर ग्रामीण इलाके में आता  था . इस कारण  वहां ज़्यादा विकास नहीं हुआ था। शहर के कोलाहल से दूर चीड़  के जंगलों के बीच इक्के दुक्के मकान बने थे . दिन ढलने के बाद शायद ही कोई घर से  निकलता था क्यूंकि वो समय जंगली जानवरों, खास कर कुक्कुर बाघ,  की इवनिंग वॉक का होता था. अगर कभी बाजार से आते हुए पापा को देर हो जाती थी तो मेरी छोटी बहन रोने लगती थी की पापा को शेर खा जाएगा. ७ बजे  के बाद शहर में एक सन्नाटा सा छा  जाता था। कुछ सुनाई देता तो बस झिंगुरों की आवाज़..कभी  दूर एक सियार का चिल्लाना या फिर पेड़ों से टकराती हवा की आवाज़।

जहाँ रात  का आलम थोड़ा डरावना  था वहीँ सुबह एक ख़ुशी की किरण लेके आती थी।  दूर बर्फीले पहाड़ों के पीछे से सूर्य देवता दर्शन देते थे और सूरज की किरणें  पड़ते ही सोई हुई  कलियाँ अपनी पंखुड़ियाँ खोलके लहराने  लगती थी।  कानों में पहला स्वर खिड़की पे बैठी गौरैया का होता था . आज बहुत दुःख होता है की मोबाइल टॉवरों के कारण  इन प्यारी सी चिड़ियों की जनसंख्या बहुत  कम हो गयी है. शहरों में तो उस आवाज़ को सुनने  के लिए तरस ही जाते हैं।  खैर सुबह उठके इन सुन्दर नज़ारों का लुत्फ़ लेके हम स्कूल जाने की तयारी करते थे।  अक्सर बच्चे स्कूल न जाने के कई बहाने बनाते हैं लेकिन मैं और मेरी बहन हमेशा स्कूल जाने के लिए आतुर रहते   थे।  झटपट नाश्ता कर हम अपना बस्ता सँभालते और फिर स्कूल के लिए चल देते थे।  इस तरह शुरू  होती हमारी स्कूल की सैर.

हमारा स्कूल एक आर्मी स्कूल था और शहर के कैंटोनमेंट में स्थित  था. किसी और शहर के कैंटोनमेंट  की तरह अल्मोड़ा का कैंटोनमेंट भी मुख्य शहर से थोड़ा अलग और बाकी  जगहों के मुकाबले ज़्यादा सुन्दर और साफ़ सुथरा था. हम लोग घर से एक छोटी सी पगडण्डी पे चलते हुए स्कूल के लिए निकलते थे . रास्ते में एक दो और मित्र हमारे साथ मिल  जाते थे। हम बच्चों की टोली गप्पे मारते हुए आगे चलती थी।  कभी स्कूल के होमवर्क की चर्चा करते  तो कभी रात को देखे तहक़ीक़ात के एपिसोड की या फिर कभी आने वाली परीक्षा की ।   लेकिन एक मौसम जब  ये बातचीत कम और शैतानियाँ बढ़  जाती थी वो था बारिश का मौसम.

बरसात के मौसम में स्कूल का रास्ता और भी सुन्दर हो जाता था. बारिश में धुलकर चीड़ और देवदार की पत्तियां और भी गहरी हरी हो जाती थी जैसे कोई नया पेंट किया हो. उनमें से छनकर आती पहाड़ की तेज़ धूप  आँखों को चौंधिया  देती थी.  उन्ही पेड़ों के नीचे अलग अलग रंगों के जंगली फूल उगा करते थे।  आज वही फूल जब मैं अपने शहरी मित्रों को नर्सरी से गमलों में लगा कर  खरीदते हुए देखती हूँ तो सोचती हूँ की मेरा बचपन कितना भाग्यशाली था. पेड़ों  की ही शाखों के बीच  मकड़ी के बुने जालों पर रात हुई बारिश  की बूंदें अटक जाती और उन  पर  जब सूरज चमकता था तो ऐसा लगता था कि जैसे  अगणित हीरे मोती हो. वास्तव में ये सुंदरता किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थी.  अलग अलग रंगों के पक्षी , तितलियाँ और कीड़े मकौड़े भी इस सुंदरता में चार चाँद लगते थे ।  ऐसे ही  सड़क के किनारे उगते अलग अलग प्रकार के पौधे, झाड़, कुकुरमुत्ते हमें बहुत आकर्षित करते थे।  देखा जाये तो ये रास्ता किसी बोटैनिकल गार्डन से कम नहीं था. अक्सर हम लोगों में रेस होती थी कि ज़्यादा  जंगली फूल कौन  इकट्ठे करेगा.  हालाँकि अक्सर ऐसा करते  हुए हमारी जुराबों  में काँटे चिपक जाते थे और जिनको हटाने के चक्कर में जुराबें फट  भी जाती थी. तीन जोड़ी जुराब बर्बाद होने पर  मम्मी  की फटकार पड़ी  तो हमने  दूसरा उपाय सोचा ।अब   हम जुराब उतार कर फूल इकट्ठे करते थे। बाद में   हम वो फूल अपने पसंदीदा अध्यापकों देते थे और उनकी ख़ुशी देख कर लगता कि  कोई मेडल मिल गया।  बचपन में हम कितनी छोटी छोटी चीज़ों से खुश  हो जाते हैं। पगडण्डी जहाँ कैंटोनमेंट की रोड से मिलती थी वहां अक्सर आर्मी के सिपाही सुबह की दौड़ पे जाते हुए दिखते थे . जहाँ कभी कभी दूर से आर्मी के बैंड  की आवाज़ कानों में पड़ती थी वहीं कभी डोली दाना की पहाड़ी में शूटिंग प्रैक्टिस में गोलियों की आवाज़ गूंजती थी.  रस्ते में सर्किट हाउस भी पड़ता था जहाँ कभी कभी कुछ नेतागण  या अफसरों की गाड़ियों का आना जाना लगा रहता था . सर्किट हाउस के ठीक सामने एक लैटर बॉक्स था जिसमें मेरी दोस्त की छोटी बहन, जो बहुत चंचल थी,  रोज़ कभी पत्थर, कभी  केले के छिलके तो कभी और कोई कूड़ा करकट डाल देती थी। बेचारे पोस्ट मैन अंकल कितने परेशान  होंगे यह सोचकर उनपे बड़ी दया आती थी. चलते चलते  बातों बातों में   सामने हिमालय  की बर्फ से ढकी चोटियां दिखने लगती  थी.   इसी नैसर्गिक सौंदर्य का आनंद उठाते हुए हम स्कूल  पहुँचते थे।

स्कूल के प्रांगण में एक कैनोपी थी जिसमें बैठके हम शहर की ओर से आने वाले अपने अन्य मित्रों का   इंतेज़ार   करते थे।  कैनोपी  हमारा पसंदीदा क्रीडाक्षेत्र था।  कभी  हम उसके के खम्बों   को पकड़ कर कार्नर-कार्नर  खेल खेलते  तो कभी विष  अमृत ।   इसी दौरान असेंबली की घंटी  बजती और  हमारी सुबह की सैर  समाप्त  होती।  लाइन लगा  कर हम  सुबह की प्रार्थना  और राष्ट्र गान गाकर स्कूल के  नए  दिन का  आरम्भ करते । यह तो था एक आम दिन का विवरण लेकिन असली मज़ा उस दिन आता था जिस दिन झमा-झम बारिश होती थी.

पहाड़ की बारिश का एक अलग ही आनंद होता है. आमतौर पर  पहाड़ों में गंदगी कम ही  होती है इसलिए शहरों की तरह वहां कूड़ा करकट भी ज़्यादा इकठ्ठा नहीं होता. बचपन में अक्सर जब तेज़ बारिश होती थी तो लगता था शायद स्कूल में रेनी डे घोषित हो जाये लेकिन वह घोषणा सुनने के लिए भी  हम स्कूल जाते ज़रूर थे।  तेज़ बारिश के आगे हमारी छतरी किसी काम की नहीं होती थी . बस्ते और बस्ते में रखी किताबों को बचाने  का अकेला  तरीका  रेन कोट ही था लेकिन बेचारा रेनकोट हमारे जूतों की पानी से रक्षा नहीं कर पाता था।  पहाड़ी रस्ते में ऊपर से पानी झरने की तरह बहता  हुआ आता और  हम उसी झरने में से निकल कर स्कूल का रास्ता पार करते थे।  पानी इतने वेग से आता था की हमारे  जूतों में पूरा पानी घुस जाता. फच फच..  छप छप करते हुए हम स्कूल पहुँचते तो देखते की हमारा जैसा ही हाल बाकी  बच्चों का भी है. लेकिन शहर से आने वाले कई बच्चे कीचड का भी शिकार होते थे जिस कारण उनकी यूनिफार्म गन्दी हो जाती थी.

बारिश के दिन स्कूल असेंबली खुले प्रांगण की जगह बंद बरामदे में होती थी. प्रार्थना करके हम लोग अपनी अपनी कक्षाओं की तरफनिकलते . हर कक्षा के बाहर  छतरियों का तांता लगा होता. अंदर जाकर हम गीली जुराबों को अपने  डेस्क पर सूखने के लिए डाल देते. ऐसे में कई बार  कक्षा में बहुत बदबू भर जाती थी, और आमतौर पर असली अपराधी  होते लड़कों के जूते! बारिश के चलते कभी कभी  बिजली विभाग पावर कट कर देता तो कक्षाओं में  अँधेरा छा जाता . बस इसी के लिए हम साल भर बारिश का बेसब्री से इंतेज़ार  करते थे  क्योंकि जब क्लास में बैठ कर भी पढाई न करनी पड़े इससे ज़्यादा मज़ेदार बात क्या हो सकती है?  जैसे ही  क्लास में कोई टीचर आती हम उनसे बहाने बनाते की इतने अँधेरे में पढाई नहीं हो पाएगी.  ऐसे में हम अंताक्षरी खेलने की भी मांग करते . कुछ टीचर उन सभी मांगों को अनसुना करके पाठ पढाना शुरू कर देते  लेकिन कुछ टीचर ऐसे भी थे जो सब जानते हुए भी हमको उस एक दिन मस्ती करने देते. क्लास में अंताक्षरी खेलकर जो मज़ा आता वो किसी भी रेनी  डे की छुट्टी  से बेहतर था।  गाने गाते हुए अक्सर हम भूल जाते की हम स्कूल में बैठे हैं और इतने ज़ोर से गाते की किसी न किसी क्लास से कोई टीचर हमको डांटने आ जाता।  बस फिर क्या- अंताक्षरी बंद और हमारे मुँह भी. होठों पे ऊँगली रख कर हमको चुपचाप बैठने का निर्देश मिल जाता . बाहर बिजली  कड़कने और बादल के गरजने से क्लास की शान्ति फिर भंग हो जाती।   ऐसे मौसम में आम तौर पर  हमको जल्दी छुट्टी  मिल जाती।  एक बार ऐसे ही दिन हमको जल्दी छुट्टी मिल गयी लेकिन स्कूल से निकलते ही अचानक बहुत तेज़ बारिश शुरू हो गयी. हम लोग किसी तरह थोड़ा आगे बढे लेकिन सर्किट हाउस तक आते आते बारिश बेकाबू हो गयी. खुद को बचाने के लिए हमने सर्किट हाउस के बरामदे में शरण ली. लेकिन बारिश तिरछी पड़ने लगी और बरामदे  में भी पानी भर गया . सर्किट हाउस के चौकीदार को हम पर दया आई और उसने वहां के कमरे हम चार बच्चों के लिए खोल दिए। हमने बंदरों की तरह पूरे सर्किट हाउस में खूब धमाचौकड़ी मचाई।   हमको विश्वास नहीं हो रहा था की जिस कमरे में  राज्यपाल रह कर गए हम उसी  बेड  पर उछल रहे  थे . आज जब उस दिन के बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि शायद यह खतरनाक साबित  हो सकता था . आज के ज़माने में ऐसे किसी आदमी पर विश्वास नहीं किया  जा सकता।

इसी तरह  के बहुत से चटपटे और रोमांचक कारनामे हमने  अपने स्कूल के उस रास्ते पर आते जाते किये. उस सैर का अलग ही आनंद  था !   सोचती हूँ कि अगली बार जब अल्मोड़ा जाऊं  तो  आप सबको भी साथ ले चलूँ। क़हिये चलेंगे क्या स्कूल की  सैर पर?

Childhood

Munsiyari: The First Ride

Prelude: After many attempts to organize this trip and an impromptu test-ride to Rishikesh with Abbas, I embarked on a journey which is still yet to end. 3,533 more words

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