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साप्ताहिक क्रांति

इस मायूस ठण्ड में भी मेरे कलम की स्याही जम गई है
अलसा के सारे जज़्बात रजाई में जा छुपे हैं

झकझोरती नहीं है स्कूल में एक बच्चे की हत्या
अस्पताल में मरीज़ की मौत के बाद लाखों का बिल
ख़ून नहीं खौलाती देशभक्ति के नाम पर धार्मिक उन्माद की खबरें
बलात्कार, बेरोज़गारी, किसानों की आत्महत्या
लोगों के नसों में दौड़ते खून को भयावह ख़बरों ने जमा दिया है

ना जाने और कितनी “साप्ताहिक क्रांतियाँ ” चाहिए
फिर से उबाल लाने के लिए

अपर्णा त्रिपाठी©

बेटी

वो हर रात लौटती है जब घर

थककर,

चहकते हुए दिन के किस्से सुनाती है

कई बार इतना हंसती है

की दुहरानी पड़ती है बातें समझाने के लिए

शिकायतें साथ वालों की करती है तो माथे पर कई कई बल पड़ जाते हैं

सफ़र में रोज़ ही मिलते हैं उसे जाने कैसे दिलचस्प लोग

दोस्त भी तो कितने हैं उसके

उनकी ज़िंदगी में भी ना जाने क्या क्या होता है

घंटों उनके मसले भी हम ख़ुद ही हल कर लेते हैं


पर मुझे मालूम है

अपने कमरे में जब जाती है

अपनी चहेती बालियों के साथ अपनी वो झूठी मुस्कुराहटें भी सहेज लेती है उस डब्बे में

मैंने देखा है चुपके से

सुबह उसे अपने चेहरे पे चिपकाते


लाचार हूं शरीर से

पर माँ हूँ

उसकी ये सारी चालाकियां बचपन से ही समझ लेती हूं
अपर्णा त्रिपाठी©

अलविदा 2017

इस जाते हुए साल की यात्रा की पूरी तैयारी कर ली है मैंने

एक बड़े से बैग में भर दी हैं सारी यादें

थी भी तो कितनी ज्यादा

साहस

क्या तुममें साहस है,
अपने महिमामंडित आदर्शों की खंडित प्रस्तर प्रतिमाएं पूजने का,

अपने सिद्धांतों के चीथड़ों को अपने पैरों तले रौंदते हुए लक्ष्य पा लेने का,

अपनी नैतिकता की लाचार, अक्षम, पंगु देह को अपने सामने बिठाकर हंसते रहने का,

लुंठित, कुंठित मानसिकता की वासना का नंगा नाच देखने का,
अगर नहीं,

तो आत्मघात कर लो,

क्योंकि ‘देवयुग’ ख़त्म हो गया है।
अपर्णा त्रिपाठी ©

शब्द नाराज़ हैं

शब्द नाराज़ हैं।
शब्द नाराज़ हैं कि वो यक~ब~ यक जकड़ लिए गए हैं पारिभाषिक बेड़ियों में।

पहले शब्द चुने जाते थे,

बुने जाते थे, गुने जाते थे,

शब्द लिखे जाते थे, सँवारे जाते थे

समझे जाते थे, सुने जाते थे।
अब शब्द ख़फ़ा हैं पारिभाषिक जेलों में।
और ये जेल भाषायी नहीं है,

क्षेत्रवादी है, धर्मवादी है, जातिवादी है, लिंगवादी है।

अब,

शब्द खींचे जाते हैं, खरोंचे जाते हैं,

उल्टे जाते हैं, नोचे जाते हैं,

चीखे जाते हैं, बाटे जाते हैं, छीने जाते हैं।
शब्द नाराज़ हैं।।

अपर्णा त्रिपाठी©

एक सिपाही का आत्मकथ्य

आरम्भ से अंत तक हरदम लड़ा हूँ मैं,

फिर भी गुमनाम अंधेरों में पड़ा हूँ मैं,

मेरी लाश को समर क्षेत्र में कोई पहचान भी न सका,