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उड़ते पंछी

आसमान में उड़ते पंछी,
जो हवा से लड़ते जाते।
वो गगन के पार जा कर,
मंजिले खुद के बनाते।।

वे जो प्रेरणा के हैं आशा,
नाम उसका हम है लेते।
वे वो उड़ते जोश हैं जो,
पंख फैला दुनिया समेटे।।

सूखी टूटी टहनियों से,
खुद नयी दुनिया सजाते।
डाल पर बैठे स्वर में,
दृढ़ता के गीत गाते।।

वे हैं वो जो रात्रि को भी,
सूर्य बिन सवेरा बनादें।
जीत की वे इक तलब से ,
आशा की फिर लौ जलादें।।

ज़िन्दगी

यह ज़िन्दगी जो भँवर जाल है ,
यह ज़िन्दगी ही मृत्यु काल है।
समय रथ पर जो तू है सवार ,
यह सारी समय की ही चाल है।

घिरी अन्धकार में तेरी वीरता ,
तेरी निष्ठा ही एक मशाल है ।

वो अनजानी सी राह पर निकले ,
सारी दुनिया का बस यही हाल है ।

लकीरों वाली तेरी किस्मत ,
तेरे कर्मों का ही परिणाम है ।

उम्मीद सुखी रूखी सी ही सही ,
तेरे सपनों का बस वही ढाल है ।

एक संदेशा

चल ले कर इक संदेशा किसी गाँव के तट पर
कोई नगरी के किसी द्वार पर आंधी में डट कर
भले कोई हो मुश्किल या हो कोई बाधा
चलते चल तू अपने धुन में उन काटों के पथ पर

ले कर मन में नफरत का भाव ले कर मन में उदासी
क्यूँ मरना लड़ कर मिटना आधी रोटी पर बट कर

रौशन कर दे भटके मन को करदे रौशन अम्बर को
सदियों से हताश बैठे हम जाती धर्म पर कट कर

दिखती है बस भूखे को आधी गीली रोटी
भूख नहीं मिटती भूखे की कोई शब्द को रट कर

प्रेम एकता सद्भाव लेखता उन कोरे कागज़ पर
ले चाला चल लोगों को मानवता के पथ पर

मेरी पहचान

लोग कहते हैं मेरे चेहरे पर मुस्कान बहुत है
इस धुएं में मेरी पहचान बहुत है
निरासा तो काफ़ी है मेरी कश्ती में लेकिन
इस कश्ती को लड़ने के अरमान बहुत है

नाउम्मीद तो हुआ हज़ारों मर्तबा मगर
इस दिल में उम्मीदों के मकान बहुत हैं

टूटे पत्तों से ख़्वाब सजाने वाला मैं
सूखे पत्तों पर मुझे आन बहुत है

दो लफ़्ज़ों में बंटे मेरे अक्षर देखो
इस नाचीज़ का यहाँ नाम बहुत है

मेरी कोशिश हारी कितनी मर्तबा मगर
हर कोशिश पर मुझे गुमान बहुत है

बटवारा

तेरी रेखा कृति देख कर ,
हमने तो यह जाना है ।
अपने मन को लेखकर ,
तुमने मानवता को बाँटा है ।।

क्यों काटी तुम ने ये सरहद
क्यों तुमने धरती है बाँटी
नदियाँ पर्वत सब बाँट दिए
अपने मतलब के भाँती

आँखों में भर कर आँसू
एक बार तो मेघा भी बोली
बाँटी तो फिर भी बाँटी
क्यों बाँटी लड़ने को गोली

रंग दिए इन खेतों को ,
नीली पीली कई रंगों से ।
अम्बर भी देख अब बँट गए ,
उन उड़ते लहराते पतंगों से ।।

संघर्ष

भुजाएँ तेरी वीरता ,
युद्ध की तू सारथि ।
है मृदंग की शोर में ,
रगों रगों में क्रांति।।

दुष्ट प्रवाह निकट है वे ,
संघर्ष तेरी युग से है।
उस बूँद से तू क्या डरे ,
प्रचंड तू तो खुद में है ।।

प्रबल है तेरी दृढ़ता ,
सफलता है पुकारती ।
फिर नयी सी भोर में ,
दिलों दिलों में भारती ।।

पाँव तले ज्वलत है वे ,
कदम तो ये थम से हैं ।
इस युग की तू क्यों सुने ,
बुलंद स्वर तू खुद में है ।।

पंछी

आसमान में उड़ते पंछी ,
तुम हवा से लड़ते जाते ।
तुम गगन के पार जा कर ,
मंजिले खुद के बनाते ।।

तुम वो प्रेरणा की हो आशा ,
नाम जिसका हम है लेते ।
तुम वो उड़ते जोश हो जो ,
पंख फैला दुनिया समेटे ।।

सूखी टूटी टहनियों से ,
खुद नयी दुनिया सजाते ।
डाल पर बैठे स्वर में ,
खुशियों के है गीत गाते ।।

तुम हो वो जो भोर को भी ,
सूर्य संग सवेरा बनाते ।
काली घनी सी रात्रि में तुम ,
आशा की हो लौ जलाते ।।