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Beda Gelombang

Aku hanya menyukai bahunya
Tidak berani berharap lebih dari itu
Tidak berani meminta lebih dari itu

Tatap matanya jelas bukan untukku
Asa hatinya jelas bukanlah daku… 45 more words

Sajak

खीज

मेरा पांचवां पोस्ट – मेरी मम्मी ( सासु जी) ने एक बार मुझसे कहा था ” बहु और बेटी में बहुत अंतर होता है” उनका विचार निरपेक्ष है, क्योंकि उनकी बेटियां नहीं हैं लेकिन बेटियों का सुख उन्हें उनकी बहुओं ने ही दिया है। बेटी से बहु तक के हिंदी और अंग्रेजी के सफर को वो मुझसे बेहतर समझती हैं। आपका सच चाहे कुछ भी हो, मेरे लिए तो उनका सच सत्यवचन है। स्त्री और पुरुष के बीच के अंतर के समान बहु और बेटी के बीच के अंतर को कोई कभी नहीं मिटा सकता। ये आत्मा का भेद नहीं समय का भेद है। कई बहुएं समय के इस भेद को पार कर के सास के समीप एक सखी की भांति खड़ी हो जाती हैं। लेकिन उस स्वाभाविक मिलन के पहले कई हंसी, मज़ाक, क्लेश, द्वेष और मातृत्व प्रेम की कहानियां बनती हैं , उनमे से है आज की ये कहानी। मैं काल्पनिक कहूँ तो आप मानेंगे नहीं, क्योंकि ऐसा सबके साथ होता है। इसलिये केवल ये समझिये की पूरी और खीज की असफलता मेरी है और पात्र सारे काल्पनिक। मेरी ये कहानी, मेरी सासु माँ के लिए और मेरे स्वयं के लिए। ईश्वर हम सबको ऐसी सास दे जो अपनी बहू के गुणों का गुणगान अपनी सखियों से करे।

खीज…..

बहु ने कढाई में लाल मिर्च और जीरे का बघार लगाया और चावल के आटे का घोल डाल के खीज के पकने का इंतज़ार करने लगी। पूरी काण्ड के बाद उसने अपने सासरे के सारे पकवान सीखने की ठान ली थी। लेकिन उसे क्या पता था, खीज कोई इंस्टेंट मैग्गी नूडल थोडी थी, वो तो एक बहु की धैर्य क्षमता का मापदंड थी। मइके से लाये उसके संस्कारों का सिटीफिकेट थी। सास ससुर के आने में अभी समय था लेकिन नाश्ते के बाद सब चाय तो लेंगे ही, इसलिए बहु ने दूसरे स्टोव पे चाय भी उबलने के लिए रख दी। कुछ ही देर में सास ससुर भी आ गए। सासु माँ ने स्टोव देखके खीज के कहा ” भई आज तो नाश्ते में टाइम  लगेगा” बहु को कुछ समझ नहीं आया,” मम्मी खीज तो बस तैयार है, मैं प्लेट में लगा देती हूँ” बहु ने कहा।

“बहु, खीज के चेहरे को देख के लगता है, की अभी अगले एक घंटे में भी इसका रंग नहीं आनेवाला। “बहु को कुछ समझ नहीं आया। आये भी कैसे, खीज कोई उसके मइके में बनती थी क्या? लेकिन फिर भी उसने कोशिश तो की, मगर उससे क्या फर्क पड़ता है। नई बहू, वो भी दुसरे समाज की, उसपर जॉब वाली, गृहस्थ संस्कार की कचहरी में कठघरे पर खड़े करने के लिए केवल ये तीन गण ही काफी थे। खैर, सास ससुर ने ब्रेड बटर लगा के खा तो लिया लेकिन अनसुनी बातों में कई बातें हो गयीं। आखिरकार खीज एक घंटे में तैयार हुई और ठीक दो दिन बाद कानपुर से काकी सास ने उसकी खीज की असफलता का सर्टिफिकेट फ़ोन पे दे दिया “क्यों री बहुरिया, तुम्हारे घर में खीज नहीं बनता था क्या” घर ही घर के बीच इस अदृश्य संचार निगम से वो अबतक परिचित हो चुकी थी। उसे आज भी याद है जब पहली बार सास ससुर उसके घर आये थे और उसे पूरी का आटा लगाना था। ……माँ तो हमेशा सबके लिए एक सा आटा लगाती थीं। अब रोटी और पूरी के आटे में भी कोई फर्क होता है भला। आटे की लुगदी के संस्मरण को दिमाग में चिपकाये उसने अपनी सासु माँ से पूछा था “मम्मी, ये पूरी का आटा कैसे गूंथते हैं? रोटी जैसा ही होता है न?

अरे ये क्या पूछ लिया पगली, उसके मन से आवाज़ आयी थी। सासु माँ ने कुछ नहीं कहा, वो कहती भी क्या ?आखिर वो भी तो नई नई सास बनी थीं, लेकिन उनके हैरान चेहरे को देख के बहु इतना ज़रूर समझ गयी थी की उसने अपने पैरों पे कुल्हाड़ी नहीं बल्कि पिछली दिवाली की बची हुई लड़ी जला के छोड़ दी थी। और ये लड़ी रह रह के फूटने लगी। एक दिन अचानक कानपूर से काकी सास का फ़ोन आया था। वैसे तो वो जले पे नमक छिड़कने, लोगों के बीच आग लगाने और दरार पड़े रिश्तों में हथोड़े मारने जैसा काम मे महिर थीं, लेकिन जीवन रुपी इस चित्रपट के नाटकीय अंको में तालियां बजाना और चुटकियां लेना वो अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझती थीं। और जब से उनके यहाँ एसटीडी फ्री हुआ था तबसे उनका आधिकारिक क्षेत्र कानपूर से फैल के मुम्बई तक पहुँच गया था।

ट्रिंग ट्रिंग ” …. कैसी हो बहुरिया, हम तो आज पूरी बना रहे थे न, तो तुम्हारी याद आगई, हमें भी कहाँ आता था पूरी का आटा गूंथना …”

बहु के कान सुन्न! यहाँ तो नेटवर्क एयरटेल से भी तगड़ा निकला। उस दिन तो बहु को लगा की रोड पे बैठा सब्जीवाला, उसके ऑफिस के दोस्त, शायद अमरीका में ओबामा जी को भी पता चल गया हो की उसे पूरी का आटा गूंथना नहीं आता। मम्मी ने मुझसे खुद क्यों नहीं कहा, उसने सोचा लेकिन रिश्तों की अस्पष्टता उसके लिए अब सपष्ट हो चुकी थी।

खैर, इन्टरनेट सर्वज्ञानी है, उसने दो तीन महीने में अपने सासरे के सारे पकवान सीख लिए। और मौका मिलते ही रिश्तदारों के लिए दाल बाटी, पुलाओ, और रायते बनाके तारीफ़ भी बटोर लीं। अब तक तो उसने मठरी, रोटी और पराठों के आटे के साथ साथ पास्ता, नूडल, और पिज़्ज़ा के आटों में भी पीएचडी कर ली थी।

एक दिन उसने बासी रोटी के टुकड़े करके उनका पोहा बनाया, सासु माँ ने अचम्बे से उस पोहे को देखा। खाते खाते अचानक उनकी आँख भरी आई और बहू की तरफ प्यार से निहारते हुए उन्होंने एक बच्चे के भांति कहा” ऐसा पोहा तो हमारी अम्मा बनाती थीं।” ऐसा भी प्यार होता है सास का। सास ने आँखों ही आँखों से बहु की कई बलइयाँ ले लीं थीं। बहु में गुण तो हैं, उन्होंने सोचा, लेकिन कुछ कहा नहीं, ज़्यादा प्रेम व्यक्त करतीं तो बहु सर न चढ़ जाती!

वैसे खीज बनाने की विधि उसे कहीं नहीं मिली। शायद किसी और नाम से हो! उसने कई और नाम ढूंढे लेकिन खीज तो अपने नाम सी है, खिजा के ही छोड़ती है। अम्मा से, देवरानी से, सासु माँ से और ससुर जी के हाथ से भी बनती देखने के बाद भी आज उससे खीज न बन पायी थी। लेकिन पूछने की गलती वो अब कैसे कर सकती थी।

दरअसल खीज एक बडा ही सरल व्यंजन है, लेकिन इसके बनाने की विधि बहुत कठिन। इसके बनाने के कई तरीके होंगे लेकिन जिस प्रकार सिलबट्टे में पिसी हरीमिर्च धनिया की चटनी, मिक्सी में पिसी गयी चटनी की तुलना में कई अंक सर्वोपरि होती है। मानो सिलबट्टे और हाथ के स्पर्श ने चटनी में सौंधापन घोल दिया हो। उसी प्रकार स्वाद के माँपदण्ड में कई मिनटों तक घोटके बनाई और कूकर में बनाई गयी खीज में बहुत अंतर होता है। धीमी आंच में पकते आटे के घोल को आप जितना घोटेंगे, खीज में उतना स्वाद बढ़ेगा। खीज बनाने का ये एक आदर्श तरीका है।  कारण सरल है,घोंटते हुए चावल में एक कसैलापन आ जाता है, कुछ चीन और जापान के राइस केक की तरह। और पकाने वाले की ऊर्जा शक्ति से इस खीज में स्वाद कई गुना बढ़ता है। लेकिन कई बहुएं इसे कूकर में सीटी देके बनाती हैं और सास नन्द को अपने आलस्य का एक नया प्रमाण दे देती हैं। इसलिए उसने ये खीज फिर अपनी देवरानी के संरक्षण में बनायी…. और जैसे उसके कान में किसी ने गर्म तेल डाल दिया हो। पूरी काण्ड की तीसरी वर्षगाँठ के समारोह के लिए बधाई सी देते हुए उसकी देवरानी ने उससे पूछा ” भाभी आपको पूरी का आटा गूंथना नहीं आता क्या?”

धन्यवाद।

Are You Suffering From The Bad Bahu Syndrome?

To my English speaking friends: I am asking if you are suffering from the bad daughter in law syndrome.

Oh, so you believe in gender equality? 342 more words