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Kashmir needs hugs, neither abuse nor bullets: PM Modi in Independence Day speech

Prime Minister Narendra Modi urged a more conciliatory approach towards troubled Kashmir on Tuesday, saying problems can be solved by “embracing” the people rather than resorting to abuse or bullets. 557 more words

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Bomb blast kills 15 in southwestern Pakistan

QUETTA, Pakistan — Pakistan’s army says “terrorists” have targeted a military truck with a bomb killing eight soldiers and seven civilians in the southwestern city of QuettaPakistan’s army says “terrorists” have targeted a military truck with a bomb killing eight soldiers and seven civilians in the southwestern city of Quetta. 104 more words

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Happy Independence Day- Balochistan: India stands with you

Today is Independence Day in Balochistan. The Baloch people say that they got independence on August 11 1947 from the British. However in 1948 Pakistan annexed the provide.

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Vicky Nanjappa

जाधव ‘जासूसी’ मामले पर भारतीय और पाकिस्तानी मीडिया – भाग २

इस भाग में हम पांचो अखबारों के सम्पादकीय में जाधव के मुद्दे को किस तरह से देखा गया, इसका विश्लेषण करेंगे। टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दू और इंडियन  एक्सप्रेस प्रत्येक ने एक संपादकीय  प्रकाशित किया वही पाकिस्तानी समाचार पत्र डॉन और एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने  अप्रैल 11 और 17, 2017 के बीच दो संपादकीय प्रकाशित किये।

 मुद्दे हिंदू टाइम्स ऑफ इंडिया इंडियन एक्सप्रेस डॉन एक्सप्रेस ट्रिब्यून ट्रायल प्रक्रिया की पारदर्शिता हाँ हाँ हाँ सैन्य अदालत हाँ हाँ जाधव दोषी हैं हाँ हाँ जाधव दोषी नहीं है हाँ हाँ जासूस बनाम जासूस हाँ हाँ हाँ हाँ राजनैयिक पहुँच हाँ हाँ हाँ सरताज अजीज  का बयान हाँ हाँ जर्मन राजदूत का बयान हाँ आतंकवाद पर पाकिस्तान की विफलता हाँ हाँ भारत का पाकिस्तान में हस्तक्षेप हाँ हाँ परमाणु क्षमता हाँ हाँ अपनी सरकार की विदेश नीति की विफलता हाँ हाँ

डॉन की संपादकीय (अप्रैल 12) ने भारत की बलूचिस्तान में हस्तक्षेप और ‘एक परमाणु हथियारों से लैस प्रतिद्वंदी’  पाकिस्तान में अनाधिकृत प्रवेश के लिए आलोचना की। आश्चर्य की बात है कि डॉन ने इस संदर्भ में पाकिस्तान के परमाणु क्षमता का उल्लेख किया है। उसने भारत के स्पष्टीकरण  अविश्वसनीय बतलाया, जासूस को लेकर होने वाली प्रतिस्पर्धा की संभावना पर प्रकाश डाला, और दो देशों के बीच तनाव कम करने के लिए किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप या  अन्य किसी की मध्यस्थता का सुझाव दिया।

हालाँकि जिस तरह से डॉन ने उजैर बलूच  के मामले में प्रश्न उठाये है उस तरह जाधव के मामले की प्रक्रियात्मक निष्पक्षता को लेेकर  प्रश्नचिंह नहीं लगाये । बलूच कराची का कुख्यात गैंगस्टर है जो कि 2016 में पाकिस्तान के अर्धसैनिक बल द्वारा “कराची के बाहर” से पकड़ा गया था  ।  इस साल अप्रैल में उसे जासूसी के आरोप में पुलिस हिरासत से सेना को ट्रायल के लिए  सुपुर्द कर दिया गया था। 2016 में प्रकाशित डॉन की संपादकीय  ने बलूच की गिरफ्तारी  पर प्रश्न उठाते हुए कहा था कि “अधिकारियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कैसे उन्होंने बलूच को कराची के बाहर गिरफ्तार किया जबकि उसे आखिरी बार संयुक्त अरब अमीरात में देख गया था”।  हालाँकि जाधव के मामले में  डॉन  ने न तो स्वयं कोई जाँच की और न ही जाधव की गिरफ्तारी के समय और जगह के बारे में कोई सवाल उठाए।  यह बताना इसलिए जरुरी है क्योंकि भारत ने दावा किया है कि जाधव ईरान में व्यापार कर रहा था और उसका वहाँ से अपहरण किया गया है।

डॉन के हाल ही के संपादकीय (14 अप्रैल) ने बलूच के खिलाफ लगे सभी आरोपो को सार्वजनिक किए जाने मांग की है और सुझाव दिया है कि “सरकार द्वारा ईरान के साथ पाकिस्तान के संबंधों पर स्पष्टीकरण देना चाहिए क्योंकि ईरान भारत नहीं है; ईरान एक दोस्ताना देश है जिसके साथ संबंधों पर ध्यान दिया जाना चाहिए “।

पिछले वर्ष जाधव की गिरफ्तारी सार्वजनिक किये जाने के बाद एक संपादकीय में  डॉन ने कहा था कि ” यहां न केवल भारत गंभीर सवालों के जवाब देने की जरूरत है बल्कि ईरान जिसने जासूस को पनाह दी को भी अपने स्तर पर मामले पर स्पष्टीकरण देने  की जरुरत है ” और यह सुझाव दिया कि ” बात को पेशेवर, विधिवत् और समझदारी के साथ नियंत्रित किया जाना चाहिए, अन्यथा भारत विरोधी भावना को भड़काने का खतरा बड़ेगा और चरमपंथी तत्वों के लिए स्थान मजबूत होगा”(27 अप्रैल 2016)। लेकिन, एक साल बाद डॉन पूरी तरह से अपने स्वयं के विचार भूल गया ।

इंडियन एक्सप्रेस  ने कराची में आपराधिक नेटवर्क पर आधारित एक डोजियर की प्रति के आधार पर बलूच पर प्रवीण स्वामी की रिपोर्ट प्रकाशित की जिसके अनुसार जाधव के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इस डोजियर में बलूच  को जाधव के साथ सहयोग और विदेशी एजेंटों के लिए लेकिन मुख्य रूप से ईरान, न कि  भारत, (अप्रैल 14) को  गुप्त जानकारी प्रदान करने के लिए दोषी ठहराया गया था।

एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की पहली प्रेस वार्ता के बाद 15 अप्रैल को प्रकाशित अपने  पहले  संपादकीय में  भारत की राजनैयिक पँहुच के लिए आवेदन करने के लिए आलोचना की: “एक ऐसा व्यक्ति जो अपने स्वयं के देशवासियों द्वारा शुरू में अस्वीकार कर दिया गया था, जाधव अचानक कुछ हद तक सेलेब्रिटी बन गए हैं। वरना क्यों भारत राजनैयिक पहुँच के लिए 13 अनुरोध करता, अगर वहाँ जाधव और उसके संचालकों के बीच कोई संबंध नहीं था” ।

दूसरी तरफ, इसने पाकिस्तानी अधिकारी के गायब होने में भारत को जिम्मेदार ठहराया  ताकि वह जाधव मामले में लाभ उठा सके “कानूनी और कूटनीतिक उपायों पर भरोसा करने के बजाय नई दिल्ली हमेशा की तरह कुछ छिपे तरीको से काम कर रही  है”। ताज्जुब यह है कि एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने पहले भारत के राजनैयिक पहुंच  के प्रयास के लिए आलोचना की और फिर गैर-राजनयिक साधनों पर भरोसा करने के लिए भी निंदा की ।

एक अन्य संपादकीय (16 अप्रैल) में एक्सप्रेस ट्रिब्यून  ने जाधव के मुकदमे की निष्पक्षता पर सवाल उठाने के लिए और “दो परमाणु शक्तियों” के  बीच दो प्रमुख द्विपक्षीय बैठकों स्थगित करने के लिए भारत की आलोचना की। डॉन की तरह, एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने भी पाकिस्तान की परमाणु क्षमता को  जताया। हालाँकि दोनों डॉन और एक्सप्रेस ट्रिब्यून जाधव को राजनैयिक पहुंच पर पाकिस्तान की सरकार के इंकार  पर सवाल उठाने में नाकाम रहे।

  हिन्दू, 12 अप्रैल, पृष्ठ 9

हिन्दू के संपादकीय (अप्रैल 12) ने एक अपारदर्शी ट्रायल के आधार पर दी गयी सजा से  द्विपक्षीय तनाव  में तेजी से वृद्धि की आशंका व्यक्त की । साथ में इसने भारत की वर्तमान विदेश नीति की वांछित परिणाम लाने में अप्रभावी रहने के लिए आलोचना की । इसने एक कार्टून के जरिये  पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंधो के प्रति उसके दृष्टिकोण की आलोचना भी की । बाद में, डॉन के एक और  संपादकीय  में कि प्रधानमंत्री नवाज की विदेश नीति की अक्षमता पर प्रश्न उठाया जोकि  ” भारत सरकार या फिर वहां के सुरक्षा ढांचे के कट्टर तत्व” को समझाने में असफल रहे है (अप्रैल 13)।

इंडियन एक्सप्रेस (अप्रैल 12) ने पाकिस्तान के लोकतंत्र कानून द्वारा शासित होने के दावे पर सवाल उठाया। इसने जाधव को सजा देने की बेकरारी और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैरकानूनी करार दिए आतंकवादी  हाफिज़ सईद और मसूद  अजहर के खिलाफ कार्रवाई करने अनिच्छा   पर प्रश्न उठाया। इसने पाकिस्तान के सैन्य अदालत के सम्बन्ध में भयावह आकड़े प्रस्तुत किये : “सन 2015 जब से पाकिस्तान की सैन्य अदालत को आम नागरिको को आतंकवाद के आरोप में सजा देने की अनुमति मिली है तब से एक बंद दरवाजे के अन्दर किये गए ट्रायल के जरिये कम से कम 161 को मौत की सज़ा मिल चुकी है, जिसमे से कुछ मामले  बच्चों  के भी है। ” (मौत की सज़ा पर आकड़ो के लिए देखे डॉन , 6 मार्च 2017)।

टाइम्स ऑफ इंडिया  ने भी इसं तथ्यों को रिपोर्ट किया ” फरवरी 2015 से इन अदालतों ने  274  लोगो को सजा सुनाई है,  जिसमे 161 को  मौत की सजा सुनाई गयी है । और इनमें से 144 अभियुक्तों ने अपने अपराध को स्वीकार भी कर लिया था। इतना ही नहीं इनके ट्रायल की जानकारी किसी को भी नहीं होती है और वादी को आगे अपील करने का अधिकार भी नहीं होता है जो कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई का एक महत्वपूर्ण घटक है “(अप्रैल 11) । हिन्दू ने  भी पाकिस्तान की सैन्य अदालत के आंकड़ों पर रिपोर्ट दी (11 अप्रैल)।

टाइम्स ऑफ इंडिया के  संपादकीय ने  जाधव के लिए पाकिस्तानी सैन्य अदालत द्वारा दी गयी  मौत की सजा को ” न्याय-व्यवस्था का मजाक ” बताया और इस सजा को  “आतंकवाद का पोषण करने के लिए इस्लामाबाद पर नई दिल्ली के कूटनीतिक दबाव का मुकाबला करने के लिए” पाकिस्तान की एकचाल बताया  (अप्रैल 12)। इसने गुंटर मुलैक का बयान  भी उदृत किया।  टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने  कार्टून  में पाकिस्तान की सैन्य अदालत का चित्रण एक कंगारू के रूप में किया जो अपनी थैली में असली आतंकवादियो को सुरक्षित रखे हुए है।

टाइम्स ऑफ इंडिया,  अप्रैल 12

    सम्पादकीय पृष्ठ  पृष्ठ 14

 निष्कर्ष

जाहिर है दोनों देशों में  मीडिया  ने उनके संबंधित सरकारों द्वारा परिभाषित  “राष्ट्रीय हितों”  को सर्वोपरि रखा और कुलभूषण जाधव के मामले की सही तरीके से जांच नहीं की। इसका पाकिस्तानी लोगों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। सैन्य अदालत में खुद का कबूलनामा ही  एकमात्र आधार है जिस पर आश्रित होकर पाकिस्तान के मीडिया ने जाधव को दोषी ठहरा दिया।

पाकिस्तानी समाचार पत्रो ने एक भारतीय के मामले में कानून के पालन और मौत की सज़ा जैसे मुद्दों पर अपने स्वयं के सिद्धांतो को नजरअंदाज कर दिया। इस तरह का  चयनात्मक दृष्टिकोण अंततः पाकिस्तान  के उदारवादी विचारधारा को प्रभावित करेगा जिसे इन अखबारों ने विगत वर्षो में आगे लाने की कोशिश की है।

(अंकिता पांडेय एक  स्वतंत्र शोधकर्ता  है। यह द हूट में छपे लेख का हिंदी अनुवाद है। भाग १ के लिए यहाँ क्लिक करें)

जाधव ‘जासूसी’ मामले पर भारतीय और पाकिस्तानी मीडिया – भाग १

भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को कथित जासूसी के आरोप में अचानक से पाकिस्तानी सैन्य अदालत द्वारा सुनाई गयी मौत की सजा ने हर किसी को आश्चर्य में डाल दिया। पाकिस्तान ने दावा किया कि जाधव  को आतंकवाद और भारत की  खुफिया एजेंसी, द रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ), के लिए जासूसी करने के आरोप में बलूचिस्तान से गिरफ्तार किया गया है। वही भारत ने कहा है कि जाधव  एक सेवानिवृत्त भारतीय नौसेना अधिकारी है लेकिन  उनका कोई भी सम्बन्ध रॉ से नहीं है और उसने पाकिस्तान में दी गयी इस सजा के फैसले पर आपत्ति उठाई है।

यह लेख जाधव को सजा दिए जाने के सम्बन्ध में 11 अप्रैल और 17 अप्रैल, 2017  के बीच तीन भारतीय समाचार पत्र – द टाइम्स ऑफ इंडिया , द हिंदू  और द इंडियन एक्सप्रेस  – और दो पाकिस्तानी समाचार पत्र – डॉन और द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में छपी खबरों और सम्पादकीय का दो भागों में विश्लेषण करता है  ।

प्रथम भाग में हम इन पांच अखबारों में जाधव की कवरेज का छह शीर्षकों के तहत विश्लेषण करेंगे। दूसरे और अंतिम भाग में सम्पादकीय का विश्लेषण करेंगे।

मुख्य बिन्दु 

1। पाकिस्तानी समाचार पत्रों ने इस मुद्दे पर बिना किसी जांच के पाकिस्तानी सेना की कहानी को स्वीकार कर लिया । यहाँ तक कि उनकी सेना द्वारा जाँच से जुड़ा कोई भी विवरण देने से पहले ही जाधव को दोषी मान लिया गया।

2। मामले पर चर्चा करते हुए पाकिस्तानी समाचार पत्रो ने पाकिस्तान की परमाणु क्षमता पर भी जोर डाला ।

3। एक्सप्रेस ट्रिब्यून की तुलना में डॉन ने भारतीयो की राय को अधिक स्थान दिया है। हालांकि  डॉन ने भारतीय मीडिया से कुछ राय को, चुनिंदा तरीके से, जो कि पाकिस्तान के दावे को समर्थन देते है को उद्धृत किया है ।

4। जाधव के सम्बन्ध में डॉन में छपी खबरों और संपादकीय  के बीच मतभेद पाया गया  हैं। उदाहरण के लिए ट्रायल प्रक्रिया से जुडी कमियों को जहाँ डॉन में रिपोर्ट किया गया वही सम्पादकीय में इन तथ्यो को अनदेखा कर दिया गया।

5। डॉन ने उजैर बलूच और जाधव, दोनों पर समान आरोप लगे हुए है, के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए । डॉन ने एक सैन्य अदालत में जाधव के ट्रायल पर कोई सवाल खड़ा नहीं किया। हालांकि, डॉन ने बलूच के केस को सिविल अदालत से एक सैन्य अदालत में स्थानांतरण करने के फैसले की आलोचना की।

6। भारतीय समाचार पत्रों ने भारत सरकार के इस दावे पर कि जाधव जासूस नहीं है को समर्थन दिया, साथ में पाकिस्तान के दावों में तथ्यात्मक विसंगतियों पर प्रकाश डाला और ट्रायल प्रक्रिया की आलोचना की। दूसरी ओर, पाकिस्तानी अखबार पूरी तरह से जाधव की भारतीय पहचान पर केंद्रित रहे और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर अपनी सरकार का बचाव करते रहे।

7। भारतीय समाचार पत्रो ने राजनैयिक संबंध, 1963 के वियना प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 36 का हवाला दिया और जाधव से मिलने के लिए भारत के निवेदनों को ठुकराने के लिए पाकिस्तान की आलोचना की। वही पाकिस्तान के समाचार पत्रों ने द्विपक्षीय समझौते, 2008 का हवाला देते हुए अपनी सरकार के रुख का समर्थन किया।

8। भारतीय अखबारों ने कहा कि पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी के लापता होने के बाद ही अचानक से सजा की घोषणा हुई है वही पाकिस्तान अख़बारों ने कि पाक अधिकारी के लापता होने के मामले को जाधव से जुड़ा हुआ पाया और आशंका व्यक्त की भारत इसे सौदेबाजी के रूप में इस्तेमाल कर सकता है ।

9। सीमा के दोनों तरफ ही मीडिया ने जाधव के मामले की ठीक तरह से जाँच नहीं की और अपनी-अपनी सरकारों द्वारा परिभाषित “राष्ट्रीय हित” का समर्थन करते रहे।

1. भारत की प्रतिक्रिया

भारत सरकार ने इस  सजा को एक “पूर्वनियोजित हत्या” कहा है। ” एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने रिपोर्ट किया कि “पाकिस्तान में बहुमत से लोगो ने इस मौत की सजा का समर्थन किया है वही  भारत ने त्वरित प्रतिक्रिया दी है और अपना रोष प्रकट किया है” (अप्रैल 11)। डॉन की रिपोर्ट के अनुसार (अप्रैल 15) “कई भारतीय समूहों कि आम तौर पर पाकिस्तान के साथ संबंधों में सुधार के लिए अग्रसर रहते है उन्होंने भी पाकिस्तान दवारा दी गयी सजा की निंदा की है।” भारतीय समाचार पत्रों ने जाधव की सजा के ऊपर पाकिस्तान में हुई प्रतिक्रियाओं को रिपोर्ट नहीं किया।

2. पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक सरकार और सेना के बीच की खाई

सजा सुनाने के एक दिन बाद इंडियन एक्सप्रेस के प्रथम प्रष्ठ पर  प्रवीण स्वामी  की रिपोर्ट में यह कहा गया  कि “पाकिस्तानी सेना प्रमुख जावेद बाजवा की अनुमति के साथ आखिरी समय में किये गए इस सैन्य ट्रायल की खबर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी नहीं थी”( अप्रैल 11)।

इंडियन एक्सप्रेस  के सम्पादकीय ने भी पाकिस्तान के अन्दर आम जनता और सेना के बीच के मतभेद का जिक्र किया (अप्रैल 12) । टाइम्स ऑफ इंडिया ने पूर्व जर्मन राजनयिक गुंटेर मुलैक को यह कह कर उद्धृत किया कि पाकिस्तान की सेना ने जाधव मामले का उपयोग “पठानकोट हमले में पाकिस्तान के नागरिकों के शामिल होने की जांच करने में पाकिस्तान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के प्रयास को कमजोर करने के लिए” कर रही थी (अप्रैल 12)  । टाइम्स ऑफ इंडिया  ने भी 15 अप्रैल को  पाकिस्तान की लोकतान्त्रिक सरकार और उसकी सेना के बीच की खाई का जिक्र किया।

द हिन्दू के संपादकीय ने बताया कि ट्रायल, सजा और उसकी पुष्टि इतने गोपनीय तरीके से की गयी कि इस खबर ने पाकिस्तान में ही लोगो को आश्चर्य में डाल दिया (अप्रैल 12)। केसी सिंह की राय में (हिंदू, अप्रैल 17) ” जिस समय  प्रधानमंत्री शरीफ पनामा पत्रों के आरोप में अदालत के फैसले का इंतजार कर रहे है यह कदम पाकिस्तान की सेना का पाकिस्तान की लोकतान्त्रिक सरकार के साथ सेना के बीच फिर से संतुलन लाने के लिए ही उठाया गया है”।

जहाँ भारतीय समाचार पत्रों पाकिस्तान की लोकतान्त्रिक सरकार और उसकी सेना के बीच की खाई को उजागर किया, डॉन ने इस निर्णय के बाद मीडिया  में इस्लामाबाद की सरकार द्वारा साधी गयी  चुप्पी को केवल चिन्हित ही किया(अप्रैल 11)। एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने इस मुद्दे पर कोई भी टिप्पणी नहीं की।

3. जाधव को राजनैयिक पहुँच की अस्वीकृति

टाइम्स ऑफ इंडिया  ने बताया कि  भारत की पिछले 13 महीने मे जाधव के लिये राजनैयिक पहुंच की 13 अनुरोधो को पाकिस्तान द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया था और ट्रायल प्रकिया के बारे में भारत को सूचित भी नहीं किया गया (अप्रैल 11) । इंडियन एक्सप्रेस ने वह सभी तारीखे जब भारत ने राजनैयिक पहुंच के लिए आवेदन किया था उन्हें रिपोर्ट किया (अप्रैल 11) । एक्सप्रेस ट्रिब्यून और डॉन  ने भारत के इस दावे को रिपोर्ट किया किया भारत को जाधव की ट्रायल प्रक्रिया की कोई भी सूचना नहीं दी गयी थी ( अप्रैल 11)।

भारतीय समाचार पत्रों ने कांसुलर संबंध, 1963 के वियना प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 36 का हवाला दिया और जाधव से मिलने के लिए भारत के निवेदनों को ठुकराने के लिए पाकिस्तान की आलोचना की। वही पाकिस्तान के समाचार पत्रों ने जाधव को राजनैयिक पहुँच अस्वीकार करने के लिए अपनी सरकार का बचाव किया और द्विपक्षीय समझौते, 2008 का हवाला देते हुए अपनी सरकार के रुख का समर्थन किया।। डॉन ने कहा कि द्विपक्षीय समझौता, 2008 जासूसी के आरोप में गिरफ्तार लोगो पर लागू नहीं होता है (अप्रैल 11)। बाद में  एक्सप्रेस ट्रिब्यून और डॉन दोनों पाक पाकिस्तानी विदेश कार्यालय के प्रवक्ता  का वक्तव्य छापा जिसमे उन्होंने कहा  कि “2008 में हस्ताक्षर किए समझौते के तहत, दोनों देशों को अधिकार है की वे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर अपने विवेक से निर्णय कर सकते है की वह दूसरे देश की मांग को स्वीकार करे अथवा नहीं” (द एक्सप्रेस ट्रिब्यून , अप्रैल 14)।

एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने अपने संपादकीय में भारत राजनैयिक पहुँच के लिए आवेदन करने पर सवाल उठाया  और तर्क दिया  कि “आखिर क्यों राजनैयिक पहुँच के लिए भारत द्वारा 13 अनुरोध किये गये अगर वहाँ जाधव और उसके संचालकों के बीच कोई संबंध नहीं था ” (अप्रैल 15)।

जहाँ दोनों  पाकिस्तानी अखबारों ने वियना प्रोटोकॉल के आधार पर भारत की आपत्ति का उल्लेख किया,  उनमे से किसीने भी यह जानने का प्रयास नहीं किया कि आखिर पाकिस्तान वियना प्रोटोकॉल  के बजाय 2008 के समझौते को क्यों तवज्जो दे रहा  है। इसी तरह भारतीय समाचार पत्रों ने भी वियना प्रोटोकॉल के लिए दी गयी वरीयता को लेकर स्पष्टीकरण नहीं दिया है।

4. जाधव काट्रायल

द हिन्दू के संपादकीय ने बताया कि ट्रायल, सजा और उसकी पुष्टि इतने गोपनीय तरीके से की गयी कि इस खबर ने पाकिस्तान में ही लोगो को आश्चर्य में डाल दिया (अप्रैल 12)। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पाकिस्तान की सैन्य अदालत को एक गुप्त अदालत की संज्ञा दे दी और इंडियन एक्सप्रेस ने भी रिपोर्ट किया कि “नई दिल्ली को भी रविवार की शाम तक सूचित नहीं किया गया था” (अप्रैल 11) ।

हालाँकि, डॉन ने भी यह उल्लेख किया कि “आधिकारिक घोषणा में इस बात का कही भी जिक्र नहीं होता है की ट्रायल कब शरू हुआ, कब तक चला और कब फैसला सुनाया गया । इसमें केवल इस बात का उल्लेख है कि इस सजा की पुष्टि सोमवार को सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के द्वारा हुई है”(अप्रैल 11)  । इसका मतलब यह है कि ट्रायल प्रक्रिया के बारे में कुछ भी नहीं पता होने पर भी डॉन को इस निर्णय की पारदर्शिता पर यकीन था!

बाद में,  डॉन  ने पूर्व भारतीय राजनयिक  एम.के.भद्रकुमार  के लेख को पाकिस्तान सरकार के इस दावे कि सुनवाई की प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय नियमो के अनुसार हुई को मजबूत करने हेतु छापा (अप्रैल 12) ।  लेकिन डॉन ने यह नहीं पूछा कि किस आधार पर एक विदेशी नागरिक को  कोर्ट मार्शल किया गया, एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा   टी.सी.ए. राघवन , पूर्व भारतीय उच्चायुक्त इस्लामाबाद, द्वारा उठाया गया (हिंदू, 13 अप्रैल)।

दोनों पाकिस्तानी अखबारों ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजीज के संवाददाता सम्मेलन को कवर किया। एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने दावा किया कि अजीज ने भारत के सभी दावों को बेबुनियाद सिद्ध कर दिया (अप्रैल 15)। डॉन ने जरुर यह कहा कि अजीज ने कोई भी प्रश्न नहीं लिया  । हालांकि, दोनों ने इस बात की अनदेखी कर दी कि कुछ ही महीने पहले दिसंबर 2016 अजीज  में सीनेट को बताया था कि सेवानिवृत्त भारतीय नौसेना अधिकारी के खिलाफ पाकिस्तान के डोजियर में “मात्र बयान” ही है और कोई निर्णायक सबूत नहीं है।

5. क्या जाधव एक जासूस था?

डॉन ने कहा कि ” जाधव के ईरान में उसके कथित व्यापार से जुड़े सभी आधिकारिक दस्तावेज उसके जासूस होने की तरफ इशारा करते है” (अप्रैल 12), लेकिन क्यों एक भारतीय खुफिया एजेंट भारतीय पासपोर्ट लेकर जाएगा इस बुनियादी सवाल की तरफ ध्यान नहीं दिया।

भारतीय समाचार पत्रों ने पाकिस्तान के जाधव के जासूस होने के दावे  के खिलाफ तर्क प्रस्तुत किये। इंडियन एक्सप्रेस  ने आनंद  अरनी, एक पूर्व रॉ अधिकारी,  की राय छापी जिसमे उन्होंने जाधव के रॉ से जुड़े होने पर इंकार किया और साथ में यह भी जोड़ा कि “सेवानिवृत्त अधिकारी कभी संपत्ति  नहीं बनाते है और रॉ कभी किसी को  भारतीय पासपोर्ट के साथ एक गुप्त मिशन पर नहीं भेज सकती है”( अप्रैल 11)।

इसके साथ ही इस्लामाबाद में ईरान के राजदूत मेहंदी होनारदूस्त के बयान पर भी प्रकाश डाला गया, जिसमे उन्होंने पाकिस्तान के आरोपों को “एक सौ प्रतिशत झूठे” बताते हुए खारिज कर दिया था (11 अप्रैल) । प्रवीण स्वामी   द्वारा  प्रस्तुत की गयी एक अन्य जांच रिपोर्ट में जाधव के रॉ से संपर्क करने के असफल प्रयास और दो अवैध भारतीय पासपोर्ट का इस्तेमाल करने को रेखांकित किया, लेकिन यह भी बताया कि पाकिस्तान के पास ऐसा  कोई सबूत नहीं है जिससे साबित किया जा सके कि जाधव एक भारतीय खुफिया एजेंट  है (अप्रैल 12)।

हिन्दू  ने जाधव पर ईरान की चुप्पी पर प्रकाश डाला और यह तर्क दिया कि  ईरान की तरफ से जाधव के संबध में जाँच संबंधी प्रक्रिया में अपेछित समर्थन की कमी की मुख्य वजह खाड़ी देशों के साथ दिल्ली की बढ़ते संबंधों पर उसकी अप्रसन्नता  हो सकती है ( अप्रैल 17)।

भारतीय समाचार पत्रों ने  पाकिस्तान में रहे पूर्व जर्मन राजदूत गुंटर मुलैक के बयान की याद दिलाई जिसमे उन्होंने कहा था कि जाधव को ईरान में तालिबान द्वारा पकड़ा गया था और पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी को उनके द्वारा बेच दिया गया था (टाइम्स ऑफ इंडिया, अप्रैल 1 1 और अप्रैल 12 ; इंडियन एक्सप्रेस , अप्रैल 11 )।

टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकीय  ने एक जासूस द्वारा भारतीय पासपोर्ट के उपयोग पर, जिससे उसका देश दोषी ठहरा दिया जाये, पर संदेह  व्यक्त किया (अप्रैल 12) । टाइम्स ऑफ इंडिया  ने मुलैक को उद्धृत  किया, जिनके अनुसार (अप्रैल 12) ” पठानकोट हमले में पाकिस्तान के नागरिकों के शामिल होने की जांच करने के पाकिस्तान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के प्रयास को कमजोर करने के लिए ही पाकिस्तान की सेना ने जाधव के माध्यम से प्रतिक्रिया व्यक्त की  है।”

इस सम्बन्ध में एक्सप्रेस ट्रिब्यून  ने पाकिस्तान के विदेश मत्रालय के प्रवक्ता का तर्क छापा “जर्मन राजदूत के इस बयान पर उन्होंने स्वयं बाद में स्पष्टीकरण दिया है की उनका तर्क ‘सुनी सुनाई बातों’ पर आधारित था ‘ (अप्रैल 14)। हालाँकि अख़बार ने मुलैक के इस स्पष्टीकरण के स्रोत का उल्लेख नहीं किया है। पर  टाइम्स ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर छपी एक खबर में एक प्रश्न  के जवाब में मुलैक ने यह स्पष्ट किया: ” विश्वसनीय सूत्र, जिनकी जानकारी मै नहीं दे सकता हूँ, उनके आधार पर मैंने यह असत्यापित तर्क दिया है जोकि शायद सच न हो “। इस स्पष्टीकरण से हम यह नहीं कह सकते है कि यह मात्र केवल सुनी सुनाई अफवाह है।

6. भारतीय जासूस बनाम पाकिस्तानी जासूस

टाइम्स ऑफ इंडिया  ने सोशल मीडिया में जाधव की सजा से पाकिस्तान की सेना के एक सेवानिवृत्त अधिकारी के हाल ही में नेपाल से लापता हुए जाने की घटना को जोड़े जाने की खबरों को रिपोर्ट किया(अप्रैल 11)। टाइम्स ऑफ इंडिया  ने भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी के एक  स्रोत को उदृत किया जिसके अनुसार  कि अपहरण की कहानी मनगढंत भी हो सकती है (अप्रैल 12) ।

हिंदू के संपादकीय  ने कहा कि “मौत की सजा की घोषणा जासूस बनाम जासूस के संदर्भ में देखा जा रही है” (अप्रैल 12)।  एक समाचार में उन्होंने एक भारतीय अधिकारी की राय को उल्लेखित किया  “घोषणा करने के समय का चयन महत्वपूर्ण है। उन्हें लगता है कि उनका लापता अधिकारी भारत की हिरासत में है और जाधव को मौत की सजा की घोषणा पहले करके वे भारत की चाल का जवाब दे रहे  है,  अब भारत कोई भी कदम लेता है तो वह इसे प्रतिशोध के रूप में प्रस्तुत करेंगे “(अप्रैल 12) ।

पाकिस्तान द्वारा अचानक की गयी कार्रवाई के सन्दर्भ में,  इंडियन एक्सप्रेस  के संपादकीय ने आशंका जताई कि ”जनता- सेना के बीच की खाई और एक पाकिस्तानी अधिकारी के कथित अपहरण के खिलाफ जवाबी कार्रवाई इस त्वरित घोषणा के कारण हो सकते है” लेकिन साथ में यह भी जोड़ा की इस तर्क के पीछे सबूतों को अभाव  है (अप्रैल 12)। इंडियन एक्सप्रेस ने यह भी बताया कि गायब हुआ पाकिस्तान का अधिकारी उसी टीम का हिस्सा था जिसने जाधव को हिरासत में लिया था (अप्रैल 12)।

डॉन के  संपादकीय  ने पाकिस्तानी अधिकारी के लापता होने को  जाधव की सजा के साथ जोड़ते हुए दो देशों के मध्य जासूसों के लेकर प्रतिस्पर्धा की आशंका जताई और जोर देकर कहा कि दोनों देशों के प्रतिनिधियों  को इस मुद्दे का समाधान करने  की जरुरत है (अप्रैल 13)। एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने पाकिस्तान के अधिकारी के गायब होने के लिए  भारत की आलोचना की  और अपने संपादकीय में  दावा किया कि गायब हुआ अधिकारी जाधव की गिरफ्तारी से काफी समय पूर्व ही  सेवानिवृत्त हो गया था। देखा जाये तो भारत सरकार भी यही कह रही है, कि जाधव  अपने अपहरण  से पहले  ही नेवी से सेवानिवृत हो चुके थे (अप्रैल 15)।  एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने दोनों देशों के मध्य जासूसों की अदलाबदली/प्रतिस्पर्धा पर एक कार्टून प्रकाशित किया।

 
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून, अप्रैल 14 , संपादकीय पृष्ठ

(अंकिता पांडेय एक  स्वतंत्र शोधकर्ता  है। यह द हूट में छपे लेख का हिंदी अनुवाद है। भाग २ के लिए क्लिक करें)