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How Long Could You Last?

There are some basic needs we all share, regardless of age or circumstances. If any of those basic needs are uncertain, we quickly begin to panic. 428 more words

Financial Management

Food for thought - Headmaster's blog - Tuesday 5 June 2018

Food for thought

In my previous blog, I wrote about the importance of teaching our children to think. All too sadly, some schools in our country are struggling with even more basic needs – that of ensuring children have enough to eat for without proper nourishment learning can’t take place effectively. 609 more words

Ballard School

Instincts and Basic Needs

   Have you noticed how our mood shifts when we’re hungry? That’s because one of our basic needs is not satisfied and this tries to take over our mind so we can focus on finding food. 177 more words

Pointless Overthinking

Power Struggles of a Different Kind

For those of you who are first year teachers, I know that you will understand my lack of a posting on this site for what has been an embarrassingly long time.  625 more words

Education

Basic Needs: food, & C.C. mo-re not-s (notes)

for The Fictional VolunTier Project

by Goura Fotadar

Date typed up: 51218

tag[s]: murder investigations, and alternative identities, basic needs and unjust homicides, gay  straight basic needs? 276 more words

Jonathan Davis (Korn) Premieres New Song “Basic Needs"

Korn‘s Jonathan Davis has premiered a new song titled “Basic Needs.” This track is from his new solo album “Black Labyrinth,” which will be released on May 25.

News

आयुष्मान भारत योजना की राह कितनी कठिन?

भारत ने आजादी के बाद आर्थिक, राजनैतिक, शिक्षा, खेल-कूद आदि जैसे क्षेत्रों में कई उपलब्धियों को अर्जित किया है। आज हम विश्व की सबसे तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं। किंतु, जब बात देश की स्वास्थ्य सम्बन्धित सेवाओं की आती है तो हमारा सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता है।

ध्यान रहे कि एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में नागरिकों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी राज्यव्यवस्था की होती है। जिस राष्ट्र के नागरिक स्वस्थ्य होंगे, सिर्फ वही राष्ट्र प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है। इसीलिए स्वास्थ्य सेवाओं की आधारभूत संरचना का ढांचा सशक्त होना नितांत आवश्यक है।

किन्तु, वर्तमान समय में देश में जन-स्वास्थ्य के प्रति सरकारों की सम्वेदनशीलता को यदि यथार्थ की कसौटी पर तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो हमें निराशा ही हाथ लगती है।

पूर्ववर्ती सरकारों की उदासीनता का अन्दाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश के 57 फीसदी जिलों में मेडिकल कॉलेज नहीं हैं, जबकि स्वास्थ्य एवं प्रशिक्षण केंद्रों की संख्या मात्र 49 है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति एक हजार नागरिकों पर 2.5 चिकित्सक होने चाहिए, जबकि हमारे देश में करीब 1.8 हैं, उसी तरह बिस्तरों की संख्या 3.5 होनी चाहिए जबकि इसकी उपलब्धता 1.5 से भी कम है।

जबकि, निम्न आय वाले देशों में व्यक्तिगत खर्च औसतन 40 प्रतिशत होता है, वहीं हमारे यहाँ 60 प्रतिशत होता है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति यह है कि करीब 30 फीसदी ग्रामीणों को इलाज के लिए 30 किलोमीटर से भी अधिक दूरी तय करना पड़ता है।

गौर करने वाली बात है कि हम आजादी के बाद से स्वास्थ्य उपकेंद्रों, प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों, और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च करते आ रहे हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव की वजह से महज 28 फीसदी जरूरतमन्द ही इन केंद्रों पर आते हैं। बाकी निजी अस्पतालों की शरण में जाते हैं।

देश में सरकारी अस्पतालों में आवश्यक सुविधाओं की घोर कमी और निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होने की कारण समाज के गरीब और पिछड़े वर्ग के नागरिक जरूरी सेवाओं का लाभ उठाने में असमर्थ हैं। लिहाज़ा वे अकाल मौत के मुंह मे समा जाते हैं, या कई गम्भीर बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं।

यह एक विरोधाभास ही है कि देश मे प्रति वर्ष छः करोड़ से अधिक लोग सस्ती और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा के अभाव में गरीबी के चंगुल में फंस जाते हैं… अंततः इन सब कटु सत्यों का परिणाम यह है कि हम मानव विकास सूचकांक में लगातार फ़िसड्डी साबित हुए हैं।

ऐसी विकट स्थिति में नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना तमाम निराशा और आशंकाओं के बीच उम्मीद की एक नई किरण जगाती है।

इस योजना के तहत स्वास्थ्य देख-रेख प्रणाली एवं नागरिकों के बीच की दूरी को कम करने के लिए डेढ़ लाख आरोग्य केंद्रों की स्थापना की जाएगी। इन केंद्रों पर आवश्यक दवाइयाँ और सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध होगी। जबकि, इस योजना के दूसरे घटक के अनुसार, देश के 10 करोड़ से अधिक गरीब और कमजोर परिवारों को प्रति वर्ष हर परिवार को द्वितीय एवं तृतीय स्तर की बीमारियों का इलाज करवाने के लिए 5 लाख रुपये तक का बीमा कवर दिया जाएगा।

किन्तु, इस योजना की राहें काफी कठिन हैं, क्योंकि 2008 से चल रही राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना पर इंडिया स्पेंड के आठ मई 2017 के रिपोर्ट के अनुसार गरीबी रेखा के नीचे के 40 प्रतिशत लोगों तक अभी भी यह योजना नहीं पहुंच पाई है। केरल और चंडीगढ़ देश के उन राज्यों में हैं जहां सबसे ज्यादा लाभार्थियों तक इस योजना का लाभ पहुंचा है। वहीं आसाम और बिहार में क्रमशः 50 और 60 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों तक ही यह लाभ पहुंच पाया है। लाभ लेने के लिए उपयुक्त 35 प्रतिशत लोग तो इसके बारे में जानते ही नहीं थे।

और लाभ लेने के जिन उपायों को अायुष्मान भारत योजना में शामिल किया गया है उससे यह समझा जा सकता है कि सरकार ने पिछली असफलताओं को गंभीरता से नहीं लिया है। पिछली योजनाओं में एक शिकायत देखने को मिली कि स्वास्थ्य संबंधी लागत तो साल दर साल बढ़ रहे हैं लेकिन सरकारी भुगतान स्थिर ही है। निजी अस्पतालें बीपीएल के इन लाभार्थियों को इन योजनाओं के तहत स्वास्थ्य लाभ देने में आनाकानी करते हैं क्योंकि सरकार की ओर से होने वाले भुगतान में देरी होती है।

कुछ आलोचकों का कहना है कि इस योजना का मूल उद्देश्य निजी क्षेत्रों को लाभ पहुँचाने का इंतजाम है।
बेशक, इस योजना में सरकारी अस्पतालों की मूलभूत अवसंरचना को सुधारने पर कम और निजीकरण करने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया गया है, और ये बात जगजाहिर है कि निजी क्षेत्रों का एकमात्र उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है।

किन्तु, इस संदर्भ में मेरा मानना है कि निजी-सार्वजनिक क्षेत्रों की भागीदारी से स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को सुधारा जा सकता है। शर्त यह है कि निजी क्षेत्रों के आकांक्षाओं को नियंत्रित करने के लिए कठोर नियामक व्यवस्था को स्थापित किया जाए।

दूसरी तरफ हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि लगभग शिथिल पड़ चुकी किसी भी तन्त्र को रातों-रात नहीं बदला जा सकता है… यह वक्त, दूरगामी सोच, और कर्त्तव्यनिष्ठा की माँग करता है।

अंततः हम यह विश्वास करते हैं कि आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से संवर्धित उत्पादकता कल्याण में वृद्धि, श्रम की हानि व् गरीबी कम करने के अतिरिक्त रोजगार सृजन करने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।

ध्यातव्य है कि इस योजना ने सरकार की भूमिका सेवा प्रदाता से बदलकर धन प्रदान करने की हो गई है। सेवा और आर्थिक मदद देने की अलग-अलग व्यवस्था होने से खर्च बढ़ेगा, किन्तु इससे व्यवस्थाओं की जवाबदेही भी बढ़ेगी।

मसलन, सरकार को इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर विशेष ध्यान देना होगा, क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा इस तरह की योजनाओं को पहले भी चलाया जा चुका है।

लेकिन नागरिकों में जागरूकता की कमी और व्यवस्था में बैठे लोगों की खोखली नैतिकता और उत्तदायित्व की कमी की वजह से कोई सकारात्मक प्रभाव नजर नहीं आया।

Ayushman Bharat Yojna