Tags » Critics

वेलेंटाईन डे

यक्ष –
आखिर वेलेंटाईन डे के विरोध करने का कारण क्या है ?
युधिष्ठिर –
यह हमारी विदेश नीति है यक्ष | पड़ोसियों से सम्बन्ध अच्छे रहे इसलिए विरोध करके पाकिस्तान को यह मेसेज दिया जाता है कि भाई हम कितने यकसां हैं |

यक्ष –
तो क्या पाकिस्तान में भी इसका विरोध किया जाता है ?
युधिष्ठिर –
हाँ …..लेकिन वहां यह फारेन अफेयर्स के बजाय आंतरिक सुरक्षा पालिसी के तहत होता है |

यक्ष –
वहां यह फारेन पालिसी के तहत क्यों नही होता ?
युधिष्ठिर –
क्योंकि वहां शरीयत का शासन है | वो फारेन पालिसी में शरिया के कानून नही लागू करते | इसलिए टेक्निकली उन्हें इसे सिर्फ इन्टरनल सेक्योरिटी की मिनिस्ट्री में डालने की मजबूरी है |

यक्ष –
और हमारे यहाँ ?
युधिष्ठिर –
हमारे यहाँ ऐसी कोई टेक्निकल दिक्कत नही है | हम इसे किसी भी मिनिस्ट्री में डाल सकते हैं | इंटरनल सेक्योरिटी हो , कल्चर हो , फारेन हो किसी में भी | इसीलिये तो हम एक लिबरल नेशन है और पाकिस्तान कट्टर और रोग स्टेट |

Critics

अमीरों~अदम गोंडवी

ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी,
फिर कहाँ से बीच में मस्जिद औ’ मंदर आ गए।

जिनके चेह्रे पर लिखी थी जेल की ऊँची फ़सील,
रामनामी ओढ़कर संसद के अन्दर आ गए।

देखना, सुनना व सच कहना इन्हें भाता नहीं,
कुर्सियों पर अब वही बापू के बंदर आ गए।

कल तलक जो हाशिए पर भी न आते थे नज़र,
आजकल बाज़ार में उनके कलेण्डर आ गए। – “अदम गोंडवी जी”।

Critics

मैं सपना देखना चाहता हूं

मैं सपना देखना चाहता हूं
एक सूखी नदी पर घिर आई काली घटाओं का
मैं मान लेना चाहता हूं कि
फिर से उग आते हैं घने जंगल
मैं कल्पना करना चाहता हूं
कि मेरे कमरे में एक ऊंचा रोशनदान
फिर से बन जाए
और उसमें एक जोड़ी अंडे
फिर से दे जाए गौरैया
मैं पहुँच जाना चाहता हूं
जुम्मन दरजी के पुराने तख़्त पर
और सोना चाहता हूं
तपती दुपहर में, नीम की छाँव में
मैं भूल जाना चाहता हूं
कि न केवल मेरे कुछ बाल सफ़ेद हो चले हैं
बल्कि कहीं ज्यादा काली हो चली है दुनिया
मैं जानना चाहता हूं वाकई
कि कौन सा जानवर था जो रात को गाँव से
उठा ले जाता था नवजात बच्चे
सपने में ही एक बार सूंघना चाहता हूं
भगत जी की दूधिया हींग
और दोनों हाथों में लैया के लड्डू ले कर
ख्वाब देखता हूं
मूंगफली से भरी जेबों का
मैं अभी भी महसूस करना चाहता हूं
कि दादी और नानी दोनों ने ही
बचा कर गाँठ में बाँध ली होगी
मेरे लिए थोड़ी सी मिठाई
जबकि मेरी जेबें बिलकुल खाली हैं
और हाथ कहीं ज़्यादा
मेरे पास बचपन की जो तसवीरें कभी खींची ही नहीं गयी
वो भी रखी हैं सलामत और भागती
जिन में जयकिशन, अमनप्रीत, शाहनवाज़, रोबिन और सबा दौड़ते हुए गा रहे हैं
पो शम पा…भई पो शम पा…
डाकुओं ने क्या किया…
और फिर न जाने हर बार नारे लगाते ये कौन लोग घुस आते हैं
मेरे कानों में
और हर बार कोई एक तस्वीर जला जाते हैं
मेरे अन्दर अब एक सूखी नदी भी है
जिस में बहा आता हूं इन तस्वीरों की अस्थियां
लेकिन उस पर कोई काली घटा नहीं छाती है
जहां कुछ बची जिंदा तसवीरें छुपाता हूं मैं
वो जगह किस दिन किसी आसमान छूती इमारत
किसी फैक्ट्री
किसी बाँध
किसी हाई वे
किसी खदान
या फ़ार्म हाउस में तब्दील हो जाएगी
मुझे वाकई नहीं पता
हो सके तो उसके पहले ही जला दो सारी तसवीरें
जिंदा तसवीरें जल जाएं तो बेहतर
क़ैद में बहुत तड़पती हैं ये…

BY Mayank Saxena 

Critics

True 

Most people need love and acceptance a lot more than they need advice.—Bob Goff

Turkey News | Journalists

Turkish journalists face espionage and pro-terrorism charges after publishing investigative report
  • Can Dundar and Erdem Gul face the possibility of life imprisonment without parole for publishing a report alleging Turkish officials sent weapons to aid opposition fighters in Syria.
  • 76 more words
News

Garage Band Performance Art

I know… Most cover bands opt for the hits; the better-known songs, and sprinkle a set with a few key B-sides. What makes this trio what they are is having three members. 96 more words

Art

कृष्ण और राधा

कृष्ण और राधा स्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण-
प्रसन्नचित सी राधा…

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई

इससे पहले कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल💬 उठी-

“कैसे हो द्वारकाधीश ??”

जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया

और बोले राधा से …

“मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है ….
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो

सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी…”

बोली राधा –
“मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते

इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे

प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?

कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए ?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ….
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी ?
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ ?

कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता

युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं

कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता

आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालाक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे

आज भी धरती पर जाकर देखो

अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे

आज भी मै मानती हूँ

लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं,
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं

गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर ” राधे राधे” करते है”

Critics