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Good news

After a two-day delay, Edwina underwent surgery on Thursday. When we headed back to pre-op, the doctor who would perform the surgery gave us good news: The biopsy he’d sent off the week before had come back negative. 153 more words

Edwina

An unfortunate delay

Early yesterday morning, I headed to Princeton Hospital to meet Edwina, who was scheduled to have surgery to remove the uterine fibroids that have been causing her great pain for more than a year. 578 more words

Survivorship

Guest author: Judy Martin - Meeting the neighbours

Hi Everyone, I am Judy from Edwina’s Episodes and I am thrilled and delighted to be writing a guest post here on Sue’s blog.

One of the many things I love about blogging is the community that we belong to.  1,136 more words

Photography

"Am I gonna believe all them bad things?"

Last night, I re-watched The Help, one of my favorite movies about the treatment of Black maids in Jackson, Mississippi during the early 1960s–and the fiery truth-telling words some of those maids with the help of a brave journalist hurled back into the white community. 506 more words

Edwina

Back at the Coop with Edwina

On Thursday, I met Edwina for her doctor’s appointment at Cooper Green, this time with her primary care physician Dr. Hamby. While Edwina hasn’t been feeling well in recent months–during which she’s taken several trips to the emergency room, some in ambulances–she looked happy and healthy. 194 more words

Survivorship

पंडितजी के रौशनदान से लटकता प्रचारक- Rakesh Kayasth

प्रिय प्रचारक,

तुम हो राष्ट्र तारक। करते हो देश की बड़ी भलाई, लेकिन एक बात अब तक समझ नहीं आई।

इतिहास के कूड़ेदान में क्यों भटक रहे हो। बावन साल हो गये नेहरू को गये, लेकिन अब भी तुम तीनमूर्ति का रौशनदान पकड़े लटक रहे हो! माना हर बेडरूम में झांकना तुम्हारा अधिकार है। लेकिन आखिर एक मरे हुए आदमी से तुम्हे क्यों इस कदर प्यार है?

बावन साल में वक्त कहां से कहां पहुंच गया। कांग्रेस इस देश से गुल हो गई, तुम्हारी चड्डी हाफ से फुल हो गई। माना कि नेहरू… ने कभी एडविना के लिए सिगरेट सुलगाई थी। लेकिन उस सिगरेट को बुझे तो आधी सदी से ज्यादा हो गये, तुम अब तक क्यों सुलग रहे हो?

निजी रिश्तों को लेकर तुम बहुत जिज्ञासु हो। तुम्हे लेकर मेरी भी कुछ जिज्ञासाएं हैं। प्रधानमंत्री जी तो मन की बात सुनाते हैं, लेकिन तुम अपने मन की आंखों से इतना सबकुछ कैसे देख पाते हो। बिना किसी स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम के एक मरे हुए आदमी की अलग-अलग मुद्राओं में इतनी तस्वीरे कैसे बनाते हो?

आखिर कौन सी ऐसी कुंठा है, जो तुम्हे एक मरे हुए आदमी के रौशनदान से इस तरह लटके रहने को मजबूर करती हैं? क्या यह गुरुजी को पंडितजी से उचित मान ना मिलने की पीड़ा है?

कहीं दर्द इस बात का तो नहीं कि पूर्वज बेचारे तो कुंवारे मर गये और जिंदगी के सारे मजे वह कश्मीरी पंडित अकेले लूट गया।लेकिन वो तो गुजरी बात हो गई, उसपर कैसा शोक करना।

ये मामला कुछ ऐसा है कि दादाजी को किसी कन्या ने घास ने डाली तो बदला लेने को बेताब पोते ने किसी पड़ोसी बुजुर्ग के मुंह पर कालिख मल दिया। मुझे अंदाज़ा है कि मेरी बातें तुम्हे बहुत बुरी लग रही होंगी क्योंकि तुम्हे चरित्र निर्माण की शिक्षा मिली हुई है। लेकिन क्या तुमने कभी अपने सबसे महान नेता का चरित्र पढ़ने की जहमत उठाई है जो उनके एक और महान वरिष्ठ सहकर्मी मधोक जी लिख गये हैं।

तुम्हे उन कथाओं में फोटोशॉप की अनंत संभावनाएं नज़र आएंगी। जानना चाहोगे कि पूरा देश कभी उन महान `प्रेरक प्रसंगों’ की चर्चा क्यों नहीं करता, जिस तरह तुम पंडितजी की करते हो, क्योंकि यह देश मूलत: सभ्य सुसंस्कृत और शालीन लोगो का देश है। बुरा मत मानना भइया, निजी जिंदगियों में ताक-झांक करना तुम्हारे अपने संस्कारों का हिस्सा है।

अपनी पार्टी कवर करने वाले किसी भी जानकार पत्रकार से पूछ लो पता चल जाएगा कि परिवार के कोटे से पार्टी के महासचिव बने जोशीजी की करियर डुबोने के लिए उनकी कथित सेक्स सीडी किसने बनवाई और किसने बंटवाई।

उमा और गोविंद के नितांत निजी संबंधों के किस्से किसने उछाले और उन्हे असह्य मानसिक प्रताड़ना किन लोगो ने दी।

नैतिकता की सारी ठेकेदारियां तुम्हारे पास हैं, लेकिन तुमने तो अपनो तक को नहीं बख्शा गैरो की क्या बात करें। व्यक्ति कितना बड़ा योगी क्यों ना हो बावन साल से लटके-लटके उसके हाथ ज़रूर दुखेंगे। इसलिए मेरा आग्रह है, नीचे उतर आओ भइया।

देखो देश का माहौल कितना अच्छा है। पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक हो गया। कालधन भी खत्म हो गया। इसलिए कह रहा हूं अब उतर भी जाओ नीचे। कम से कम आकर अपने नोट तो बदलवा लो। आगे तुम्हारी मर्जी फिर से लटकना ही चाहो तो लटक जाना, मैं रोकने वाला कौन होता हूं।

The Feminist