Reviewed By :- SABA KHAN

अपनी अन्तःप्रेरणा के चलते जब कोई अपने भीतर गहरे में पक रहे किसी कथानक को एक छोटे अफ़साने या एक उपन्यास के रूप में लिखता है और सकुचाते हुवे उसे पाठकों के मध्य समर्पण भाव से  भेजता है यह जानने के लिए की उसका लेखन किस हद तक फलित हुआ है, किस हद तक वो लेखक अपने पाठकों को खुद से जोड़ पाने में कामयाब रहा है, ये सब बातें एक तरफा तौर पर पाठकों की पसंद नापसंद के पैमानों पर मुनहसर है I ये पैमाने भी परम्परागत खांचों में ही रचे बसे हो सकते हैं या फिर किसी हद तक लेखक के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण अपनाकर उसका उत्साहवर्धन करने वाले हो सकते हैं I किसी भी विधा में सर्वप्रथम लेखन क्षेत्र में अपना प्रयास करने वाले लेखक से किसी भी स्तर पर बहुत ज्यादा उम्मीदें बाँध लेना उस लेखक के साथ एक तरह की ज्यादती है और ये उम्मीद तो और भी ज्यादा बेमानी है जब उसी विधा के किसी स्थापित लेखक से उसकी तुलना करते हुवे उसके लेखन को परख की कसौटी पर परखा जाए I देशी विदेशी सभी प्रकार के साहित्य में ऐसे कई महान लेखक हुवे हैं जिन्होंने बहुत आगे जाकर अपनी वर्तमान उपलब्धियों का आंकलन करते हुवे जब अपने पूर्व लेखन का निरीक्षण किया है तो उसे खारिज किये जाने लायक तक आँक दिया है I आज लेखन में नित नए नए नवोदित लेखकों के आगमन से जहाँ एक ओर पाठकों के सामने ये सवाल खड़ा हो जाता है की क्या पढ़ें क्या न पढ़े, इसे पढ़ें या उसे पढ़ें वहां इस बात की जरूरत बड़ी शिद्दत से पैदा हो जाती है की अगर किसी पाठक को किसी नवोदित लेखक में ‘बतौर लेखक कोई भी तत्व’ पढ़ते समय नजर आता है तो पाठक को उस नवोदित लेखक को प्रोत्साहित करना चाहिए और नवोदित होने के खाते में कुछ नापसंदगी जैसा भाव तिरोहित किया जा सकता है I यहाँ पर उस नवोदित लेखक को भी आत्ममुग्धता जैसी स्थिति से बचते हुवे संभलकर आगे बढ़ना वाजिब है I… 108 more words