Tags » Farmers Suicide

The TRP Centric Media

  As technology has developed leaps and bounds, need for immediacies have become the need of the hour. Are the media genuinely reporting what ever information or event that has happened or has it become a TRP centric news? 391 more words

Current Affairs

The Suicide....(poem)

In a small village of a country,

There lived a peasant with his family..

In a small hut with thatched roof,

He had a cow and a dog that woof… 328 more words

Poem

Indian Agriculture - Contemporary Issues

Agriculture, with its allied sectors, is unquestionably the largest livelihood provider in India, more so in the vast rural areas. It also contributes a significant figure to the Gross Domestic Product (GDP) of India. 737 more words

Mains-2018 (English)

भारत में ऋण माफी

 

एक ऋण माफी उस व्यक्ति या पार्टी की ओर से वास्तविक या संभावित देयता का माफ करना है जिसने उस व्यक्ति या पार्टी की स्वैच्छिक कार्रवाई के माध्यम से ऋण लिया है ।

GS-3 (Mains)

​"आखिरी खत हलधर का"

जीना मैं भी चाहता हूँ

अपने आँगन में खेलते हुए

उन बच्चों के लिए

अपनी मुनिया के लिए

किसी का नाना तो किसी का बाबू

ताऊ काका बनना चाहता हूँ मैं

लालची बिलकुल नहीं हूँ मैं

अपने खून पसीने की बनी दो रोटी

खा के चैन की नींद सोना चाहता हूँ मैं

थाल में सूखी रोटी हो तो क्या

पहला निवाला गाय के नाम निकाल

चौके पर बैठ सबकी फरमाइश सुनते हुये

रूखा सूखा ही खाना चाहता हूँ मैं

पर ये जो रोज रोज साहूकार के चट्टे बट्टे आते हैं

खरी खोटी सुनाकर डराते धमकाते हैं

जमीन छीन लेंगे ये कह कर जाते हैं

कलेजा काँप उठता है फिर तो मेरा

क्या बचा था बापू के मरने के बाद

जमीन ही तो बापू की निशानी है

सोचा था अबकी चैत में बैल लाऊँगा

आषाढ़ में मुनिया का ब्याह रचाऊँगा

बैसाख की फसल बेच मैं भी इठलाऊँगा

लेकिन ये सरकार ये बिचौलिए सब लूट गये

बैल क्या उसका पगहा लेने की भी औकात न बची

आखिर कौन जिम्मेदार है मेरी इस हालत का

मैं तो नहीं हूँ ये मुझे पता है

छोड़ो रहने भी दो क्या करूँगा जिंदा रहकर

जिंदा रहा तो मैं भी खाता रहूँगा

मर गया तो सरकार तरस खायेगी मेरे ऊपर

दे देगी भला कुछ दो चार हजार

नन्हे मुन्हे बच्चे तो खायेंगे

जब चिता जलेगी मेरी

नेता राजनीति की रोटी सेंकने तो आयेंगे

कुछ दिन तक होगा देश में हो हल्ला

फिर सब शांत हो जायेंगे

सोचो इतना सबकुछ होगा मेरे मरने के बाद

हो सकता है कर्ज भी हो जाये मेरे भाइयों का माफ

मत रोको मुझे अब न जीना है

चलाओ गोली ये हलधर का सीना है

————————————————————————
अमित विक्रम त्रिपाठी

Hindi Poems

भारत के किसान का संघर्ष

ये एक ऐसी महिला की कहानी है, जो मुझे पंजाब के मालवा बेल्ट के एक बहादुरपुर गाँव में मिली|पंजाब वैसे तो हरित क्रांति के लिए जाना जाता है, लेकिन पंजाब की एक हकीकत यह भी है कि वहाँ का किसान आज बेबस और लाचार है| बढ़ते कर्ज के कारण वे सिर्फ आत्महत्या का ही विकल्प अपना रहा है|मैं कई किसानो से मिली, उनके दुःख सुन कर मुझे मेरे दुःख छोटे लगने लगे| ऐसे भी किसान परिवार मिले जहाँ सिर्फ महिलाएँ ही घर चला रही थी क्योंकि घर के सभी पुरषों ने ज़हर खा कर अपनी जिंदगी को अलविदा कह दिया था| अगर अन्न देने वाले की ही थाली खली हो तो यह देश कैसे आगे बढ़ सकता हैं? मैंने इन वर्षो में जितने भी  लेख किसानो की आत्महत्या पर पढ़े है, उनकी गंभीरता मैंने इन किसान परिवारों से मिलने के बाद जानी|

जिन महिला की मैं बात करने जा रही हूँ, वह वृद्ध थी और अपने दो पोतो के साथ रहती थी|पति पहले ही गुज़र गए, बेटे ने खेती के लिए लिया लाखो का कर्ज नहीं चूका पाने के कारण आत्महत्या कर ली और बहुँ कैंसर की शिकार हो गई|
जब  मैं  उनके घर पहुंची तो देखा कि घर के इतने सारे लोग तो दीवार पर लगे फोटो फ्रेम  में अपनी जगह बना चुके थे| इसके आगे में कुछ सोच पाती, तभी वह महिला आवाज़ देती हुई अंदर आई|मुझे पंजाबी तो इतनी नहीं  बोलनी आती लेकिन सब के बीच रहकर, दुःख-सुख की बातें करते करते थोड़ा बोलने भी लग गई और समझने भी|मैंने उनसे उनका नाम पूछा, तो सबसे पहले मुस्कुराते हुए वह बोली , “पहले बैठ जाईये, क्या लेंगी चाय या पानी?”|फिर आखिर में बोली, “मेरा नाम सुखदेव कौर है”|मैंने चाय के लिए नहीं कहा पर इतना प्यार देखते हुए पानी ले आने को ज़रूर कहा| इतने में वो पानी ले आई और मुझे चारपाई पर बिठा कर खुद नीचे ज़मीन पर बैठ गई|मैंने कहा,”अगर आप जमीन पर बैंठेंगी , तो में भी आप के साथ आकर बैठूँगी”|फिर हुआ यह कि, हँसते हुए वह मेरे साथ आ कर बैठी और अपने कर्ज की समस्याएँ बताने लगी|खेती के कारण उन्होंने अपने पुरे परिवार को खोया, इतना कर्ज़ ब्याज के कारण बढ़ता जा रहा था और जो खेती की ज़मीन ठेके पर थी उसकी आमदनी से सिर्फ अनाज का खर्चा ,बच्चो की स्कूल फीस और ब्याज ही भरा जाता था क्योंकि कुछ और बचता ही नहीं था|

इतना सुनने के बाद मुझ से रहा नहीं गया और मैंने उन्हें ज़ोर से गले लगा लिया| एहसास ऐसा था, जैसे जब कभी मैं अपनी माँ को जोर से गले लगा लेती हूँ| जब जाने का वक़्त आया ,अलविदा कहना मुझे रास नहीं आया और मैंने एक संकल्प लिया कि मैं वापस इसी गांव में, सुखदेव कौर से मिलने ज़रूर आऊंगी|उनकी आँखों में जो मैंने नरमी देखि शायद वो ही एक चीज़ है जो मुझे मेरे कर्तव्य की ओर खींचती हैं| आज भी ऐसा लगता हैं, कि जब जाऊँगी तो वो अपने घर के दरवाज़े पर ही खड़ी हुई मिलेंगी| ऐसी परिश्रम भरी है भारत के किसानो की जिंदगी के आप और मैं अपने जीवन में कितनी भी मेहनत कर ले लेकिन उनके खून पसीने की लागत से हुई फसल की मेहनत से तुलना नहीं कि जा सकती|

यह कहानी उन किसानो को दर्शाती है, जो हम सबके परिवारों का ख्याल रखते है, लेकिन उनके खुद के परिवार गुम हो जाते हैं|यह कहानी संघर्ष की है, एक समय की रोटी की है| यह कहानी ज़िन्दगी की लड़ाई कि है, जिसके बारे में  सरकारों ने सोचना बंद कर दिया है| इसका हल, सिर्फ कर्ज माफ़ी से नहीं बल्कि एक दूसरी हरित क्रांति से ही संभव है| सिंचाई कि व्यवस्था , सही मात्रा एवं दाम में  किसानो को खाद्य-पदार्थ उपलब्ध करायें जाएँ और किसान मंडी में सही दाम में खेती की उपज को बेच पाए|इन सभी बातो को ध्यान में रखा जाए तो हमारे किसान परिवार भी खुश रह पाएंगे और कर्ज़ के अँधेरे से भी उन्हें निकाला जा सकेगा|

“न जाने कितनी जाने गई लेकिन किसी ने कुछ न कहा, मुझे  लगता है शायद लोगो को तुम्हारे फटे कपड़े , टूटी चप्पल और गरीबी पसंद नहीं|”   – गार्गी बोस

But "suicide was the last option"

Farmers are the engine of our country’s Growth.From the era of Indus valley civilization,the indian fertile plains has remained a key contributer in development of civilization. 539 more words

Samadhan Special