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Rebel with a Cause

Aakash, a Lawyer by my profession and a Cyclist by Passion. Its been 4 years since he has been cycling, and it has helped him in all the phases that he has been through. 378 more words

Biking Diaries

अब मैं वो औरत नहीं

कृति त्रिपाठी

 

जिस शरीर से निकले

उसी पर गालियाँ बना दी,

ज़ेवर का स्वांग रचकर

मेरे हाथों में बेडियां पहना दी।

सर से लेकर पैर तक

लगती हूँ तुम्हारी जायदाद,

मांग में सिन्दूर,

गले में मंगलसूत्र,

हाथ में चूड़ियां,

आँखों का काजल,

साडी का आँचल,

सब सुनाते हैं तुम्हारे दास होने की दास्तान।

और तुम तो वैसे ही हो जैसे आए थे,

क्यों नहीं तुम पहनते पैरों में पायल?

क्यों नहीं तुम माथे पर बिंदी लगाते?

क्यों अपने शादीशुदा होने का अस्तित्व छुपाते?

कैसे डालोगे पैरों में घुंघरू

तुम मालिक जो ठहरे,

जो सोचता है कि औरत उसके पैर कि जूती है,

तो लो ये जूती अब तुम्हारे पैरों को नकारती है।

डाल कर तो देखो

पैर कस जाएंगे,

अब तुम्हारी गुलामी का नाच हम नहीं दिखलायेंगे।

जिस जिस्म पर तुम वार करते हो,

वो कभी तुम्हारा घर था।

जिस घर की दीवारों की कैद से,

मैंने तुम्हें इस संसार में पहुँचाया,

तुम्हें लगा कि तुम मुझे उनमे कैद कर डालोगे?

मानते हो कि औरत के भगवान् हो,

जन्म तो मैंने वैसे इन्सान को दिया था,

लेकिन फिलहाल तुम हैवान हो।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो निकाह के नाम पर तुम्हारी गुलाम बन जाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो शाम को तुम्हारे लिए रोटी पकाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो रात को तुम्हारे पैर दबाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो तुम्हारे फरेब को सच मान जाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो तुम्हारी भद्दी गालियाँ सुन जाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो वंश के नाम पर बेटी गिराएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो दहेज़ के नाम पर खुद को जलवाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो पति परमेश्वर की चिता पर जिंदा लेट जाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो तुम्हारी घिनौनी तानाशाही के तले दब जाएगी।

मैं वो औरत हूँ

जो पित्र सत्ता के इस भरे बाज़ार में,

हैवानों को नीलाम कर जाएगी।

F for Fan #AtoZChallenge

The story has been published as part of my book available on Amazon

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