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प्रेस विज्ञप्ति: 15 जनवरी 2018, महाकाली लोक संगठन: घाट से पंचेश्वर ‘जन संवाद’ यात्रा   बातचीत में पंचेश्वर बांध प्रभावित ग्रामीणों ने उठाये परियोजना पर सवाल

उत्तरायणी के उत्सव पर 13 और 14 जनवरी को महाकाली लोक संगठन के सदस्यों ने घाट से पंचेश्वर एक जन संवाद पद यात्रा की। यात्रा के दौरान चम्पावत जिले के भेट्टा, मेतकोर, चमगाड़, नैत्र, सलान, तल्ली नैत्र,बशखुनी, पंथ्यूड़ा आदि गांव के निवासियों से उनकी समस्याओं को लेकर चर्चा हूई। गौर करने की बात है की इस इलाके में पड़ने वाले गांव आज भी कई मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं और इन गांव का जनजीवन खेती और जंगल पर ही आधारित है। संवाद के दौरान ग्रामीणों ने बताया की पंचेश्वर बांध निर्माण की बात वो कई दशकों से सुन रहे हैं  और इसी के चलते इस इलाके में आज तक सड़क, पुल, स्वास्थ्य केन्द्र जैसी सुविधायें नहीं पहूंच पायी। लोगों को अब तक बांध से जूड़ी हुई कानूनी प्रक्रिया के बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी गयी है और ना ही वे जनसुनवाई की कार्यवाही से अवगत थे। अधिकतर लोग इस बात को दोहरा रहे थे कि स्थानीय नेताओं व अधिकारियों ने  पुनर्वास नीति में उन्हें जमीन के बदले जमीन, जंगल के बदले जंगल और मंदिर के बदले मंदिर दिलाने का आश्वासन दिया है। लेकिन लोगों को यह जानकारी नहीं थी की अक्टूबर 2017 में बनी सामाजिक आंकलन रिपोर्ट में दी गयी पूनर्वास नीति के अनुसार जमीन के बदले केवल मुआवजे का प्रावधान है जिसमें कुल अधिग्रहित होने वाली भूमि का 80% भूमि का सक्रिल रेट बहुत कम है। जैसे सलान गांव में 1 नाली भूमि का मुआवजा (सक्रिल रेट का चार गुना) 36 हजार रुपये के आस-पास है। संवाद के दौरान लोगों ने बताया की जो लोग गांव में ही रह कर जीवनयापन कर रहे हैं उन्हें जमीन के बदले मुआवजा मंजूर नहीं है।

यात्रा के दौरान जिन-जिन महिलाओं से संवाद हुआ उन सभी महिलाओं ने एक ही बात कही “जो सम्पत्ति, परिवेश, जंगल हमारे पास यहां हैं वैसा हमें कहीं दूसरी जगह मिलना सभंव नहीं है। यहां हम किसी भी तरह मेहनत करके खा रहे हैं बाहर नयी जगह में जाकर रोजगार के लिये भटकना पड़ेगा”।

मेतकोर गांव के प्रह्लाद सिंह, वन पंचायत के सरपंच ने पंचेश्वर बांध परियोजना के सिलसिले में सवाल उठाया कि “आज तक सरकार ने हमें पुछा नहीं। तो अब हमारे बारे में क्यूं सोचेगी”? साथ ही बताया कि जंगल के लिये सरकारी अधिकारी एन ओ सी मांगने आए थे लेकिन उन्होंनेवन अधिकार अधिनियम,2006 के प्रावधानों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी। ह्ल्दू, सल्ला, सेल, तड़ेमिया, निशनी के लोगों ने भी यह ही बात बतायी।

पंचेश्वर मंदिर में उत्तरायणी के मेले के लिये आये आस-पास स्थित गांव के लोगों व तीर्थयात्रियों ने अपनी आस्था व सांस्कृतिक धरोहर प्रस्तावित पंचेश्वर बांध में डूब जाने पर गहन चिन्ता व्यक्त कर परियोजना का विरोध जताया। यात्रा में शामिल सदस्य हरेन्द्र अवस्थी, महेन्द्र रावत, मांशी और सुमित महर मौजूद थे। महाकाली लोक संगठन जो स्थानीय जनप्रतिनिधियों व सामाजिक और पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं का समूह है, पिछले 6 माह से प्रभावित समुदायों से लगातार सम्पर्क कर बांध से जुड़े सवाल उठा रहा है। संगठन के सदस्यों ने बताया कि, “हमारा उद्देश्य है कि जनता के मूद्दे सामने आयें और आम लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया व अपने कानूनी अधिकारों से अवगत करायें”। आम चर्चा में बांध निर्माण से जुड़े खतरों और नकारात्मक प्रभावों को “बांध विरोधी” बताकर दबा दिया जाता है हमारा उद्देश्य है कि जनता के सामने यह पक्ष भी उजागर हो ताकि वह फायदा नुकसान आंकने में सक्षम हों। हमारी मुख्य मांग यह है कि प्रभावित जनता की सुनवाई न्यायपूर्ण और पूर्ण जानकारी के साथ की जाये और हमारी दूसरी मांग यह है कि अनुसुचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकार अधिनियम) अधिनियम, 2006 को पारदर्शिता के साथ प्रभावित इलाके में लागू किया जाये| जब तक कानून लागू नहीं हो जाता तब तक एन ओ सी की प्रक्रिया को रोका जाए।

जारीकर्ता: महाकाली लोक संगठन

Press Release

प्रेस विज्ञप्ति: 13 जनवरी 2018: पंचेश्वर बाँध हेतु वन भूमि पाने के लिए प्रशासन कर रही है लोगों को गुमराह। प्रस्ताव में झूठ लिखवा रही है कि वन अधिकार कानून में स्थानीय ग्रामीणों के हक़ नहीं

पंचेश्वर बाँध हेतु जल्द से जल्द वन भूमि लेने के लिए पिथोरागढ़ जिला प्रशासन स्थानीय प्रभावित जनता को गुमराह करते जा रहा है। गौरतलब है की परियोजना की वन हस्तांतरण की प्रक्रिया बिना प्रभावित ग्राम सभा की noc के नहीं हो सकती। यह noc अनुसूचित जनजाति एवं परंपरागत वन वासी (वन अधिकारों को मान्यता) कानून या वन अधिकार कानून २००६ के तहत अनिवार्य है। परन्तु अधिकतर जनता इस कानून के प्रावधानों और इस में उनके अधिकारों से वाकिफ नहीं है। और इधर प्रशासनिक अधिकारी ग्राम प्रधानों से यह प्रस्ताव पारित करवा रहें हैं की वह इस कानून के अंतर्गत “आच्छादित” नहीं हैं – मतलब की इस कानून के प्रावधान उनके लिए नहीं हैं जो की सरासर गलत है। जैसे की प्रशासन ने मूनाकोट ब्लाक और कनालीछिना ब्लाक के प्रभावित ग्राम सभा के प्रधानों से प्रस्ताव पारित करवायें हैं।

अनुसूचित जनजाति एवं परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों को मान्यता) कानून या वन अधिकार कानून २००६ की धारा 2(ण) के तहत उत्तराखंड की अधिकतर जनता “परंपरागत वन निवासी” (OTFDs) की श्रेणी में आती हैं। यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर पूरे देश में लागू होता है। उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्य जहां के कुल भौगोलिक क्षेत्र के दो तिहाई भाग में जंगल हैं और लोग अपनी आजीविका के लिये इन पर पीढियों से आश्रित रहे हैं- पशुओं के लिये चारा, खाना बनाने के लिये जलाऊ लकड़ी, खेती के उपकरण, घर निर्माण के लिये लकड़ी, भोजन के लिये सब्जियां, बिमारी के इलाजे के लिये जड़ी-बूटी अन्य। “वन निवासी” शब्दों के आधार पर यह भ्रान्ति फैलाई जा रही है कि इस क्षेत्र में वन निवासी नहीं हैं परन्तु कानून के अनुसार ये जरुरी नहीं है की अन्य परम्परागत वन निवासी वनों के अन्दर ही निवास कर रहे हों यदि कोई समुदाय/सदस्य अपनी जीविका की वास्तविक आवश्यकताओं के लिये वनों पर निर्भर हैं तो वह समुदाय/सदस्य वन निवासी हैं।

केन्द्र सरकार इस कानून के अन्तर्गत आने वाले अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी समुदायों के वन अधिकारों को मान्यता प्रदान करती है और उनमें निहित करती है। धारा 4(5) के तहत ऐसे समुदायों की उपयोग में आने वाली वन भूमि से इनको तब तक बेदखल नहीं किया जा सकता जब तक की अधिकारों की मान्यता व सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती,कानून के इसी प्रावधान के बल पर पिथौरागढ़ जिले के मूनाकोट ब्लाक के मजिरकांडा, झूलाघाट व कानड़ी गांव के ग्रामीणों ने दिनांक 7 जनवरी 2018 को वन भूमि में पेड़ों के छपान का कार्य रुकवाया और एस डी एम व जिला ग्राम विकास अधिकारी को वन अधिकार कानून को लागू करने के लिये मांग पत्र भी सौंपा। परन्तु उत्तराखंड में तो सरकार ने अब तक इस कानून में अधिकारों को स्थापित करने की प्रक्रिया लागू नहीं की. ऐसे में जनता अपने वन अधिकारों और संवैधानिक हकों से वंचित हो रही है और उनको पता तक नहीं. पंचेश्वर बांध के लिये वन भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया से प्रभावित लोगों के हक-हकूक, वन्यजीवों, वन व जैवविविधता पर विपरित असर पड़ेगा। यह कानून लोगों को पूरी तरह सश्कत बनाता है और शक्ति देता है की वह वन हस्तांतरण के लिये की जा रही कार्यवाही की प्रक्रिया को रोक सकते हैं। महाकाली लोक संगठन के सदस्यों ने कहा की यदि प्रशासन द्वारा ग्राम सभा से गैर कानूनी रूप से प्रस्ताव लेने की प्रक्रिया बंद नहीं की तो उन पर कार्यवाही हो सकती है. साथा ही संगठन जनजातिय मंत्रालय, भारत सरकार और वन अधिकार अधिनियम की राज्य नोडल एजेंसी के अध्यक्ष, जनजातीय कल्याण विभाग को भी प्रशासन द्वारा वन अधिकार अधिनियम के उल्लंघन को लेकर पत्र भेज रहे हैं।

जारीकर्ता: महाकाली लोक संगठन, पिथौरागढ़

Press Release

प्रस्तावित पंचेश्वर परियोजना और हमारे वन अधिकार

प्रिय साथियों, ग्राम प्रधान/ वन पंचायत सरपंच, महिला मण्डल व विभिन्न जन संगठन के प्रतिनिधि

जैसे की आप जानते होंगे कि प्रस्तावित पंचेश्वर परियोजना के लिये 9100 हेक्टेयर भूमि का उपयोग होगा जिसमें से 4687 हेक्टेयर वन भूमि (वन पंचायत,

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