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Sky thought 12 November 2015: North Node into Virgo South Node into Pisces

After 18 months traversing the Libra/Aries axis, the north and south nodes move into Virgo and Pisces respectively today for an 18 month stay.

For an explanation of the nodes and what they mean see here  231 more words

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36 गुण मिलने के बाद भी क्यों होते हैं ...डाइवोर्स

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36 के 36 गुण मिलने पर जोड़ी कुछ ही समय बाद कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रही होती है। मगर क्या सचमुच कुंडली में मिलने वाले 36 गुण इस बात की पुष्टि करते हैं कि अमुक जोड़ी की बनेगी या नहीं।
माता पिता द्वारा तय किया गए विवाह में दो अंजान व्यक्ति शादी के बाद खुद को जीवनसाथी के अनुरूप ढालने की कोशिश में लग जाते हैं मगर क्या किसी इंसान की प्रकृति बदली जा सकता है और अगर उसे बदला गया, तो वह नेचुरल न रहकर आर्टिफिशियल हो जाएगा। अक्सर जोड़े की शिकायत होती है कि हमारी आदतें नहीं मिलतीं। कुंडलियां मिलने के बाद भी यही होता है। वैदिक तरीके से कुंडली मिलान जन्म नक्षत्र के आधार पर किया जाता है। इस विधि में वर व वधु के जन्म नक्षत्र की एक सारणी से मिलान करके परिणाम निकाला जाता है। इस गुण मिलान में 36 में से 36 32 और 30 गुण मिलने वालों में भी तलाक की नौबत आ जाती है और कई बार 18 से कम गुण मिलने के बाद भी पति-पत्नी सुखी शादीशुदा जीवन बिताते हैं। दार्शनिक दृष्टि से गुण मिलान से अधिक महत्वपूर्ण है वर एवं वधु की कुंडली का पहला भाव व लग्नेश, दूसरा भाव व सूखेश, पंचम भाव व पंचमेश, सप्तम भाव व सप्तमेश, अष्टम भाव व अष्टमेश तथा बरहवा भाव व द्वादशेश की विशेष रूप से जांच करना।

जन्म कुंडली के पहले भाव व लग्नेश से व्यक्ति की मानसिकता और उसका स्वभाव देखा जाता है। अगर किसी व्यक्ति का लग्नेश एक दूसरे मे मेल नहीं खाता तो उनके सोचने समझने के तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। जन्मकुंडली के दूसरे भाव व सूखेश से व्यक्ति की पसंद और न पसंद देखी जाती है तथा उसके जीवन में भौतिकवादिता का असर और अहमियत देखी जाती है। पंचम भाव और पंचमेश से प्रेम, आकर्षण, उन्नति एवं संतान के बारे में पता लगाया जा सकता है। पंचम भाव से व्यक्ति का व्यवहार प्रेम के प्रति कैसा है तथा वह रोमांस को जीवन में कितनी अहमियत देता है यह देखा जाता है। पंचम भाव से कैरियर भी देखा जाता है वर तथा वधु की वृद्धि का स्तर लगभग समान होना चाहिए। पंचम भाव से व्यक्ति का संतान पक्ष व धार्मिक प्रवृति भी देखी जाती है। धार्मिक प्रवृति का विश्लेषण भी सफल विवाह के लिए आवश्यक होता है। अगर पति या पत्नी में से एक धर्मी व दूसरा नास्तिक हो तो जीवन जीना कठिन हो जाता है।

जन्मकुंडली के सातवें भाव व सप्तमेश से पति-पत्नी के बीच पारस्परिक रिश्ता देखा जाता है तथा एक दूसरे की सहनशक्ति और एक दूसरे के प्रति प्रेम देखा जाता है। अष्टम भाव और अष्टमेश से कामक्रीड़ा, प्रणय सुख और व्यक्ति की आयु देखी जाती है। इस भाव का कलियुग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान है। इस भाव के न मिलने से व्यक्ति चरमसुख से वंचित रहकर तलाक लेने की सोचता है। बारहवें भाव व द्वादशेश का भी व्यक्ति का काम व्यवहार और उसकी भौतिक पसंद देखी जाती है। इस भाव के न मिलने से व्यक्ति विवाहेतर संबंध में चला जाता है। इसके अलावा नवमांश कुंडली से व्यक्ति का शादीशुदा जीवन तथा शादी का टिकाव देखा जाता है। नवमांश वर्ग कुंडली से जीवनसाथी कैसे निभेगी और जीवनसाथी से कितना सुख मिलेगा यह देखा जाता है। सप्तमांश वर्ग कुंडली से व्यक्ति की शादीशुदा जीवन की भागीदारी और शादी के टीके रहने का विचार तथा संतति सुख का विचार किया जाता है।

इन सभी तत्वों का तात्पर्य यह है कि कुण्डली मिलान या गुण मिलान से अधिक महत्वपूर्ण है वर एवं वधु के ग्रहों की प्रवृति का विश्लेषण करना। दांपत्य सुख का संबंध पति-पत्नि दोनों से होता है। एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नहीं तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नहीं मिल पाता।

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संतान प्राप्ति के उपाय Totke For Baby Child

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वास्तु शास्त्र में कुछ ऐसे प्रमुख दोष बताये गए है जिनके कारण संतान की प्राप्ति नहीं होती या वंश वृद्धि रुक जाती है | इस समस्या के पीछे की वास्तविकता..क्या है इसका शास्त्रीय और ज्योतिषीय आधार क्या है ये आप अपनी जन्म कुंडली के द्वारा जानकारी प्राप्त कर सकते है … इसके लिए आप हरिवंश पुराण का पाठ या संतान गोपाल मंत्र का जाप करे 7 more words

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