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Rishikesh,Uttrakhand,India.

Ahh… Rishikesh, where we danced and camped around a bonfire in 9° Celsius and did white water rafting in Ganga. Can’t ever forget, made memories for life.

NorthIndiaDiaries

We All Need Good News; This Gangetic Dolphins-Comeback is One Such

As many as 110 Gangetic dolphins have been sighted by officials while mapping the River Ganges along a 90-km stretch between Kaushambi and Handia in the northern Indian state of Uttar Pradesh, according to… 151 more words

News

Varanasi, India (Mayhem, stench, burning bodies, and puppies. I loved it)

I had pre-arranged for someone to pick me up from the Varanasi train station and I’m grateful for that as it was complete mayhem when I arrived. 1,561 more words

Travel

Join Me on a Buddhist Tour of India!

I’m excited to be offering this tour of India in November 2017, Ancient Roots, Living Branches: Discovering Buddhist India. Dates are November 5 – 19. 156 more words

Buddhism

TIGER! TIGER!

KOLKATA | INDIA

India. It’s true. All of it.

I have a book at home called Death in the Long Grass. Growing up I’ve always had a morbid fascination with monsters, and tales of real life man eaters (the animal kind, not the Lindsey Lohan kind).

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खुले में शौच

सन 1987 में मैने अपने बाबा का दाह संस्कार किया था। गांव में लगभग दो सप्ताह रहा उनके क्रिया-कर्म सम्पादित करने के लिये। दस दिन तक अछूत था मैं। अपना भोजन नहीं बनाता था। घर में एक बुआ जी बना देती थीं और भोजन की पत्तल मेरी तरफ़ सरका देती थीं। अगर रोटी अतिरिक्त देनी होती थी तो पत्तल में रखने की बजाय ऊपर से टपका देती थी। मुझे खराब नहीं लगा था वह सब। कर्मकाण्ड निभाने का कौतूहल था। सर्दियों का मौसम था। सभी प्रयोग अच्छे लग रहे थे।

एक तख्ते पर पुआल बिछा कर मेरा बिस्तर बनाया गया था। आनन्द आता था उसपर सोना। आसपास और भी लोग रहते थे। पर काफी समय अकेले सोचने में व्यतीत होता था। विशेषकर रात में। भोर में ही मैं शौच के लिये तालाब के समीप जाता था। घर से लगभग एक किलोमीटर दूर। खुले में शौच का वह मेरा अन्तिम अनुभव था। मेरे पास लोटा नहीं होता था। एक दो बार मिट्टी की घरिया में पानी ले कर गया। पर वह असुविधाजनक था। फिर गड़ही/तालाब के पानी का प्रयोग करने लगा। मिट्टी से ही हाथ रगड़ कर धोता। यह सब कर्म सुबह की पहली किरण दिखने के पहले ही पूरा कर लेता था। मुझे यह याद नहीं आता कि मेरे पास कोई टार्च थी। अंजोरिया पाख था। चांद की रोशनी में काम चल जा रहा था।

खुले में शौच का वह अनुभव कुल मिला कर खराब नहीं था मेरे लिये। इसके पहले बचपन की स्मृतियों में केवल वह अच्छी तरह याद है, जब मटर के खेत में नेकर की डोरी बहुत यत्न करने पर भी नहीं खुली थी और किसी तरह सरका कर नेकर उतारा था। निपटान के बाद टिश्यू पेपर का काम किसी ढेले या खेत में सुविधाजनक रूप से मिलने वाली पत्तियों से लिया जाना तो रुटीन था। उसके बाद नेकर आधा पहने गड़ही तक जा कर धोना भी सामान्य प्रक्रिया थी। जब तक लोटा ले कर खेत में जाने की उम्र आती, मैं शहरी बन चुका था।

अब, रिटायरमेंट के बाद गांव की लगभग 95% आबादी को खुले में शौच करते पाता हूं। तीन दशक बाद भी गांव शौच के मामले में बदले नहीं। उल्टे, आबादी बढ़ने के कारण बदतर हो गये हैं।

बरसात के मौसम में लोग खेत में नहीं जा पाते तो सड़क के किनारे और रेल लाइन के आसपास की जगह विष्ठा से भर देते हैं। सड़क पर चलना या साइकल चलाना बहुत अप्रिय अनुभव हो जाता है।

गंगा किनारे गांव है कोलाहलपुर। पूरा गांव चमार जाति के लोगों का है। अम्बेडकर ग्राम घोषित कर उसमें सरकार ने हर घर में एक शौचालय बना दिया है। पर शायद ही कोई व्यक्ति उन शौचालयों का बतौर शैचालय प्रयोग करता हो। महिलायें भी शौच के लिये गंगा किनारे जाती हैं।

यहां पास के गांव – भगवानपुर में एक बाभन जवान ने मुझे बताया कि सूरत में फैक्टरी में काम करता था वह। गांव वापस चला आया – “उहां, हगई बरे भी संडास के बहरे लाइन लगाये पड़त रहा। इहां जब मन आवइ, चलि द लोटा लई क खेते (वहां शौच के लिये भी शौचालय के बाहर लाइन लगानी पड़ती थी। यहां जब मन आये चल दो लोटा ले कर खेत में।” मुझे अजीब लगा कि हगने की फ्रीडम के लिये भी रिवर्स-माइग्रेशन होता है; शहर से गांव में।

दो दिन पहले एक एन.जी.ओ. पास के प्राइमरी स्कूल में लोगों को बुला कर भाषण दे रहा था खुले में शौच के खिलाफ़। उसने खुले में शौच को स्त्रियों की इज्जत-आबरू से जोड़ा। उस पर औरतों में कसमसाहट शुरू हुई। फिर विरोध। और लोग उठ कर जाने लगे। जाने वाले आदमी नहीं, औरतें ही थीं। बड़ा ही जटिल है ग्रामीणों को किसी बात को, किसी विचार को समझाना। और थोड़ा बहुत समझ भी आये तो अपेक्षा यही रहती है कि सरकार शौचालय बना कर दे। जहां बना कर दिये भी हैं – कोलाहलपुर में – वहां उसकी साफ़सफ़ाई खुद नहीं करना चाहते लोग। फलत: गंगा (जिसे मां कहते हैं लोग) का किनारा शौच से पाटने को बुरा नहीं समझते वे।

खुले में शौच और स्वच्छता पर लोगों की आदतें बदलना आसान काम नहीं।

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