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Dil Pe Leta Hai

वो मेरी हर इम्दाद दिल पे लेता है
वो बेबफा हर बफा दिल पे लेता है

पानी में बह जाये सारी फसल तब
किसान वो बरसात दिल पे लेता है

बाल सफ़ेद एक ही दिखे जवानी में
हर शख्स वो अपने दिल पे लेता है

दिल की बात मैं दिल से कहता हूँ
बस वही बात मेरी दिल पे लेता है

लहूँ एक है मगर दुश्मनी मोल ली
बात ये हिन्दुस्तान दिल पे लेता है

आयने से निकल कर वो ‘मिलन’
तारीफे-हुस्न अपने दिल पे लेता है !!

मिलन “मोनी”

Poetry

बेकल उत्साही । Bekal Utsahi

ये दुनिया तुझसे मिलने का वसीला काट जाती है
ये बिल्ली जाने कब से मेरा रस्ता काट जाती है

पहुँच जाती हैं दुश्मन तक हमारी ख़ुफ़िया बातें भी
बताओ कौन सी कैंची लिफ़ाफ़ा काट जाती है

अजब है आजकल की दोस्ती भी, दोस्ती ऐसी
जहाँ कुछ फ़ायदा देखा तो पत्ता काट जाती है

तेरी वादी से हर इक साल बर्फ़ीली हवा आकर
हमारे साथ गर्मी का महीना काट जाती है

किसी कुटिया को जब “बेकल”महल का रूप देता हूँ
शंहशाही की ज़िद्द मेरा अंगूठा काट जाती है

Ghazal

Ghazal Queen: Iqbal Bano

I read an amazing article this morning. It is an exposition on the ghazal, its dominant status in the world of serious Pakistani music and its sublime ability to express the deepest feelings of both the human and divine heart. 297 more words

Poem 36: Grandfather Clock

(The poetic form selected for this month is the Burns stanza. However, even though I liked what I’d written it was a bit “hard-hitting” and I decided that some readers would get offended – so I wrote something modelled on the… 211 more words

Creative

एक ग़ज़ल

दिन का चेहरा देखिए जैसे दहकती रात है !
है खुशी बेचैन गोया गम कहीं पर पास है !!
तन्हा लड़ता एक दिन उस घर सा तू हो जाएगा
जिसमें कोई है नहीं चूल्‍हे में लेकिन आग है !!
कुछ तो अब्बा की भी सुनते खुद कहेगा देखना
दिल की जो सुनते हैं उनके काम की यह बात है !!
क्या कहूँ बच्चों को अब मैं किसलिए बेज़ार हूँ
आज भी सपने में माँ दिखती है पर नाराज़ है !!

Hindi

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,
हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर,
जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा

तू बेवफ़ा तू मेहरबाँ हम और तुझ से बद-गुमाँ,
हम ने तो पूछा था ज़रा ये वक्त क्यूँ ठहरा तेरा

हम पर ये सख़्ती की नज़र हम हैं फ़क़ीर-ए-रहगुज़र,
रस्ता कभी रोका तेरा दामन कभी थामा तेरा

दो अश्क जाने किस लिए, पलकों पे आ कर टिक गए,
अल्ताफ़ की बारिश तेरी अक्राम का दरिया तेरा

हाँ हाँ, तेरी सूरत हँसी, लेकिन तू ऐसा भी नहीं,
इस शख़्स के अश‍आर से, शोहरा हुआ क्या-क्या तेरा

बेशक, उसी का दोष है, कहता नहीं ख़ामोश है,
तू आप कर ऐसी दवा बीमार हो अच्छा तेरा

बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,
आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा

Ghazal

"Tonight" - Agha Shahid Ali

Pale hands I loved beside the Shalimar
—Laurence Hope

Where are you now? Who lies beneath your spell tonight?
Whom else from rapture’s road will you expel tonight? 238 more words

Poems