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Khabar Keejiye

जुबान लम्बी अपनी अगर कीजिये
बातें कुछ सोच समझ कर कीजिये !

नज़र आयेगा इसका नतीजा कभी,
इम्तेहान की घडी है सबर कीजिये !

आपको हुस्न की बख्शी हैं जितनीं,
इनायतें कुछ हमारी नज़र कीजिये !

मिटाना है दुश्मन का लश्कर कभी,
तब मजबूत अपना जिगर कीजिये !

मंजिल मिलेगी तुम्हें खुदबखुद ही,
साथ दुआओं के अब सफर कीजिये !

हर तरफ लार टपकाते नहीं घूमिये
मिला जितना उसमें बसर कीजिये !

है प्यार कितना आपको ‘मिलन’ से
निगाहों से दिल को खबर कीजिये !!

मिलन “मोनी”
१५/६/२०१७

Poetry

Chandidas and Rami

Ghazals are one of  the purest form of expression I have experienced in my life till now. The metaphor clad meters chalk out the palpable  feelings of lovers howsoever hyperbolic and exorbitant they may seem. 219 more words

Daily Musings

Nahi Chaahiye

सहानुभूति का बोझ उठाना नहीं चाहिए
किसीको अपना दर्द बताना नहीं चाहिए

तंजों में नमक लेकर मिलते हैं दुश्मन
ज़ख्मेदिल सबको दिखाना नहीं चाहिए

भरोसा शूलों का नहीं कब फूलों में मिलें
गुलाब राहों पे भी बिछाना नहीं चाहिए

धुंधला जायेगी तुम्हारी नजर रोते रोते
आंसुओं को बेसबब बहाना नहीं चाहिए

रास्ते के लिए सामान संभालना पडेगा
प्यार में सभी कुछ लुटाना नहीं चाहिए

चार दिनों के बाद अँधेरी रात हो जायगी
दाव चांदनी पे कोई लगाना नहीं चाहिए

आत्मा तक भटक जाती है ‘मिलन’यहाँ
ज्योतिषी को हाथ दिखाना नहीं चाहिए !!

मिलन “मोनी”

Poetry

Milte Hain

इस शहर में अब शमशान मिलते हैं
कहीं कहीं पर ज़िंदा इंसान मिलते हैं

कुछ तो सांस ले रही है ये ज़िन्दगी
अभी भी चलने के निशान मिलते है

हकीकतन ये बहुत दूर दूर हैं लेकिन
देखने में तो ज़मीं आसमां मिलते हैं

इन घरों में कोई रिश्ता नहीं पनपता
हर कमरे यहाँ पे सूनसान मिलते हैं

पहचानते हैं लोग शहर का हर कोना
पर रास्ते सारे ही अन्जान मिलते हैं

इस क़दर बढ़ गए हैं हादसे ‘मिलन’
चेहरे सब के सब ही हैरान मिलते हैं !!

मिलन “मोनी”

Poetry

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ - निदा फ़ाज़ली

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ

होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ

साहिल की गिली रेत पर बच्चों के खेल-सा
हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ

फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह
हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ

धुँधली सी एक याद किसी क़ब्र का दिया
और मेरे आस-पास चमकता हुआ सा कुछ
– निदा फ़ाज़ली

Poetry

Kamaal Karti Hai

नज़र तुम्हारी क्या क्या कमाल करती है
ज़िन्दगी जाने क्या क्या सवाल करती है

ये हुस्न की शम्मा जब कहीं पे जलती है
कितने परवानों की जान हलाल करती है

जाने अन्जानें कुछ भी कहती है वह फिर
अपनी कही हुई बात पर मलाल करती है

बयार कभी बारिष तो कभी आंधी तूफ़ान
चलती हवा भी क्या क्या बबाल करती है

लहरा लहरा कभी रुखसारों पे बिखरती है
रात जुल्फें तेरी क्या क्या जवाल करती है

उबटन कभी लाली कभी काजल औ बिंदी
हसीना रूप का क्या क्या ख़याल करतीं हैं

अदाएं तुम्हारी हो गयी कातिलाना’मिलन’
हरएक अंगडाई मेरा जीना मुहाल करती है !!

मिलन “मोनी” ६/५/२०१७

Poetry