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Gunjaaish

तू साथ है तो ज़िन्दगी की ख्वाइश है
वरना ये महफिल तो एक नुमाइश है

कैसे इशारों इशारों में होतीं हैं गुफ्तगू
हमारी मोहब्ब्त की ये बस पैमाइश है

एक आलिंगन एक चुम्बन एक गज़ल
वस्ले शब् में सिर्फ इतनी फरमाइश है

नशीली ये नज़र है या नशा होंठों का
तेरे हुस्न में अजब एक आशनाइश है

इस कदर खफा है यह ज़िन्दगी हमसे
यह भी हमारी मोहब्ब्ते-आज़माइश है

सोचा नहीं के इतना बदलेगा ‘मिलन’
तुझे मनाने में ही इश्क-ऐ-गुंजाइश है !!

मिलन “मोनी”

Poetry

ગઝલ - ચિનુ મોદી ‘ઈર્શાદ’

ક્ષર દેહ છોડી અ-ક્ષર દેહસ્વરુપ થયેલા શબ્દસ્થ શ્રી ચિનુ મોદીને
હ્રદયપૂર્વક શ્રધ્ધાંજલિ!🌸

છે ધધખતું પણ ઉપરથી શાંત, હોં,
વૃદ્ધ બનતાં પ્રાપ્ત આ એકાંત, હોં.

કંઈક એ જોઈ ગયો છે ત્યારથી,
ચિત્ત-ચક્ષુ બેય સરખાં શાંત, હોં.

જેમ જળમાં અન્નનો દાણો ફૂલે,
વૃત્તિનું આવું હતું વૃત્તાંત, હોં.

માપસરની વેદના ખપતી નથી,
એ વધે અનહદ તો છે વેદાંત, હોં.

કેટલાં કીધાં જતન ‘ઈર્શાદ’ તેં ?
છેક છેલ્લે તોય છે, દેહાંત, હોં.

– ચિનુ મોદી ( 1939-2017)

Poetry

Yaad Aai Hai Mujhe

वस्लो-फुर्कत की हर रात याद आई है मुझे
याद किया है तो हर बात याद आई है मुझे

ज़रा ज़रा सी बात पे रात दिन उदास रहना
मेरी दिल्लगी इसही मुकाम पे लाई है मुझे

दिल खोल के हर बात मैं कह रहा हूँ उनसे
आज क़यामत सी ही मयकशी छाई है मुझे

मैं जुदा भी हो जाऊं इस ज़िन्दगी से मगर
कोई शय मोहब्ब्त से ना छीन पाई है मुझे

झोंके तेज़ हवाओं के’मिलन’ तो ठीक लगें
कभी नफरतों की आंधियाँ ना भाई है मुझे !!

मिलन “मोनी”

Poetry

Ghazal Rati - anwar shaoor

जो कुछ कहो क़ुबूल है तक़रार क्या करूं,

शर्मिंदा अब तुम्हें सर-ए-बाज़ार क्या करूं,

मालूम है की प्यार खुला आसमान है,
छूटते नहीं हैं ये दर-ओ-दीवार क्या करूं, … 14 more words

Ghazal

Kabhi Kabhi

चाहते हैं कहना मगर कहते नहीं हैं कभी कभी
मुनासिब आशार ही मिलते नहीं हैं कभी कभी

कोशिस बहुत जान लगाके करते तो हैं लेकिन
ठहरे हुए फैसले भी बनते नहीं हैं कभी कभी

कितने सितारे मिलाके बनाते हैं जीवन साथी
हमराही भी साथ में चलते नहीं हैं कभी कभी

एक अच्छी उपजाऊ ज़मीं होने के भी बावजूद
दरख़्त कोई तंदरुस्त उगते नहीं हैं कभी कभी

घड़-घडाते बिजली चमकाते निकलते हैं मगर
कालेघने बादल भी बरसते नहीं हैं कभी कभी

मैं सो जाऊं’मिलन’ मेरी आँखों से देख लेना
जागे में ख्वाब सुहाने आते नहीं हैं कभी कभी !!

मिलन “मोनी”

Poetry

इश्क़ का आगाज़

मेरे इश्क़ का आगाज़ ही अंजाम से हुआ,

सुबह तक न चला फ़साना शुरू जो शाम से हुआ,

अब तलक घूम फिर कर मुझ तक आ जाता है,

जहां कहीं भी जिक्र तेरे नाम से हुआ,
कागज़ कलम दवात को जगह तेरी दी,

अलफ़ाज़ और जज़्बात को वजह तेरी दी,

देख कहा लेकर आ गया है मुझे किस्सा तेरा,

किसी शाम को शुरू तेरे नाम पे जो एक जाम से हुआ,
सुकून मिला कुछ पल तो कभी इज़तीरार रहा,

तेरे पास भी बेकरार था दूर भी बेकरार रहा,

नीम हाकिम जादू टोना सबको आज़मा के देख लिया,

जाने क्यों न फ़ारिग़ मै इश्क़ के काम से हुआ।

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