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कोशिश - The Film by Gulzar

कहते हैं प्यार की मिठास उर्दू बोली मैं ही होती हैं, शायद ही ” ढाई अक्षर प्रेम के ” आगे कभी कोई जाने की कोशिश की हो। कोशिश से याद आया…

कोशिश – गुलजार जी के बनाई गई सबसे बड़ी फिल्मों में से एक। जटिल मानव भावनाएं, अभिव्यक्ति, और क्रियाओं की परिभाषा पर विचार से ऊपर हैं वो फिल्म। कोशिश, एक ऐसी फिल्म हैं जो आपकी आँखों से आँसू की आखिरी बूंद निकालने की शक्ति रखती है। वह फिल्म एक साधारण कहानी बताती है और बताती जाती है। और इससे पहले कि आप इसका एहसास करें, कहानी आपको इस तरह का एक भावस्मरणीय छाप देता हैं कि आप सुंदरता या आश्चर्य के बारे में सोचते ही रह जाते हैं। यह जीवन हर किसी के लिए मोहब्बत की दास्तान जरूर देती है।

कभी कभी ख़ामोशी भी बहंत कुछ कह जाती हैं और कभी तो प्यार की पर्यायवाची बन जाती हैं, कुछ रंग प्यार के ऐसे भी है।

Sweet Memory

जब "बिमल दा" ने कहा ज़िन्दगी "गुलज़ार" है। कल्लोल मुख़र्जी

“कल से यह कारख़ाने में काम करना छोड़ो और मेरे असिस्टेंट बन जाओ” जब गुलज़ार साहब ने यह वाक्य बिमल दा के मुँह से सुना तब शायद उन्हें जन्नत की प्राप्ति सा महसूस हुआ होगा। युवा गुलज़ार को जैसे उनकी मंज़िल दिख गई हो। गुलज़ार के नज़्मों को जैसे कोई पता मिल गया हो।

“अमृत कुम्भ की खोल” उपन्यास पर बिमल दा फ़िल्म बना रहे थे। अब गुलज़ार भी काफ़ी ख़ासा हो गए थे उनके, तो स्क्रिप्ट की ज़िम्मेदारी भी गुलज़ार के कंधों पर आ चुकी थी।

“गुलज़ार, यह जो मरीज़ बलराम अपना रोग छुड़ाने और सौ साल की उम्र के लिए कुंभ आता है उसे स्टेशन उतरते ही भीड़ कुचलने से मत मारो। आगे कहीं मारो। बहुत जल्दी मरता दिख रहा है।”

“जी दा” बिमल दा को सिगरेट का एक अलग जुनून था दिन भर धुआँ उड़ाते रहते थे और मना करने पर कान बंद कर लेते।

“आप यह फ़िल्म क्यूँ बनाना चाहते है बिमल दा?”

“मुझे भी सौ साल जीना है शायद इसलिए?”

“मतलब आप भी इन सब पर विश्वास रखते है? मगर फ़िल्म में तो..”

“सौ साल जीवित रहने से मेरा यह मतलब नहीं था।”

“बिमल दा को कैन्सर है, यह बात अभी उन्हें पता नहीं।” घटक बिमल दा के मैनेजर ने गुलज़ार को यह बात बताई तो गुलज़ार शायद रो पढ़े होंगे। उनके लिए बिमल दा एक पिता मूर्त थे।

“शायद अब यह फ़िल्म नहीं बन पाएगी।”

“गुलज़ार, सुनो इस साल कुंभ है हमें बलराम वाला सीन शूट करना है।” साल 1964 का था और कुंभ की शुरुआत 31 दिसम्बर और जोग स्नान 8 जनवरी को था। गुलज़ार अपने आँसुओं को अपने अंदर दबाए बिमल दा के साथ स्क्रिप्ट पर विचार करने लगे।

“गुलज़ार पता है, बलराम का किरदार मैं कुछ अपने सा देखता हूँ।” जैसे बलराम की मौत कुंब थी वैसे ही बिमल दा की शायद उनकी सिगरेट।

कुछ देर की शांत के बाद बिमल दा बोले, “ऐसा करो, बलराम को तुम तीसरे दिन मरते दिखाओ।”

दिन बीतते गए और बलराम के मौत का दिन पीछे जाता रहा। शायद बिमल दा को उनकी बीमारी का पता चल चुका था। तबियत बिगड़ती जा रही थी मगर बिमल दा का फ़िल्म को लेकर जोश और बढ़ता जा रहा था।

“मैंने अंत खोज लिया है। बलराम जोग स्नान के दिन सुबह सुबह जब सूरज की पहली किरण घाट पर पड़ेगी तब मरेगा।” गुलज़ार ने सब भूलकर ख़ुशी के साथ कहा।

“एक्सेलेंट।” यह सुनते बिमल दा किसी बच्चे की तरह ख़ुशी से उछाल पढ़े।

मगर फ़िल्म शूट नहीं हुई। सब इंतज़ार में रह गए और बिमल दा का इंतज़ार ख़त्म हो गया। आख़री बार उन्हें घटक दा ने रात को सिगरेट पीते हुए देखे और मना करने पर बिमल दा बोले, “परहेज़ कर भी क्या ही हुआ जो ना परहेज़ कर होगा?”

फिर वो बिस्तर से नहीं उठे। दिन था 8 जनवरी 1965. जोग स्नान का दिन। शायद गुलज़ार ने दो लाशें एक साथ देखी एक बिमल दा की और एक उनके किरदार बलराम की।

– कल्लोल मुख़र्जी

Story

जब सूख गया गुलज़ार के अल्फ़ाज़ों का तालाब। कल्लोल मुखर्जी

बात साल चौरानवे की एक दोपहर की है। गुलज़ार अपनी कुर्सी में बैठ अखबार पढ़ रहे थे कि उन्हें एक पत्र प्राप्त हुआ। पत्र पर नाम देखकर उनके चेहरें के भाव थोड़े बदल गए। इस नाम से उन्हें पहले भी पत्र मिल चुका था। उन्हें शायद यह भी पता था कि अंदर क्या लिखा है मगर फिर भी उन्होंने उस पत्र को खोला और जो सोचा था वही लिखा पाया। हाँलांकि उन्होंने उन पत्रों पर किये गए दावों को कई बार ठुखराया था मगर सामने वाले के शब्द बदलते ही नहीं थे।

अब उन्होंने पत्रों का जवाब देना बंद कर दिया। सामने से भी पत्र आने बंद हो गए।

एक साल बीत गया। एक दिन मशहूर फिल्मकार साई परांपये का संवाद प्राप्त हुआ। पूछने लगे, “तुम तकसीम के वक़्त कहाँ थे?”, “तकसीम के वक़्त तुम्हारे पिता कहाँ और तुम किसके साथ थे?” इस पर गुलज़ार ने जवाब दिया, “मैं अपने वालदैन के साथ देल्ही में था।” गुलज़ार ने इन अचानक पूछे जाने वाले सवालों का कारण पूछा तो जवाब मिला, “कोई इक़बाल सिंह है जो तुमसे मिलने चाहते है। कहते है तुम उसके छोटे भाई हो।”

फ़ोन कट गया। गुलज़ार चुप थे। गुलज़ार को लगा था जो पत्र उन्हें सरहद पार से किसी हरभजन सिंह, जो उन्हें अपना पिता बताते थे, से प्राप्त होता था वो थम गया मगर वे गलत थे। पत्र ने अब मुलाकार का रूप ले लिया था।

कुछ दिन बाद उन्हें मुम्बई के एक मशहूर अभिनेता, अमोल पालेकर का फ़ोन आया। उन्होंने भी वही सवाल पूँछे जो सई ने पूँछे थे मगर इस बार गुलज़ार ने कारण नहीं जाना बल्कि मुलाकात को राज़ी हो गए। गुलज़ार सोच में थे कि बंटवारे के वक़्त वे 11 साल के थे, इतने भी छोटे नहीं थे कि सब भूल जाए।

करीब ही देल्ही फिल्म फेस्टिवसल था और गुलज़ार वहाँ जाने वाले थे। हरभजन सिंह, उसकी पत्नी और बड़ा बेटा इक़बाल भी उस वक़्त देल्ही में थे। मुलाकात का समय, जगह और दिन जल्द ही तय हो गया।

मुलाकात का दिन आ गया। सई और अमोल पालेकर भी उस मुलाकात का हिस्सा हुए। उन्हीने हरभजन सिंह के पैर छूएं और चुप चाप जाकर सोफ़े पर बैठ गए। पहली बार गुलज़ार के अल्फ़ाज़ों का तालाब सूख सा गया था।

“वो दहशत भरी रात थी। गाँव का सरदार अफ़्सल मुसलमान था और हमारा बेहद करीबी था। उसने हमें आश्वाशन दिया था कि हमें कुछ नहीं होने देगा मगर सच कहूँ तो हमारी रूह कांप चुकी थी। हम भाग निकले। अपना घर, कारोबार, सामान, सब छोड़कर एक महफूज़ जगह की तलाश में निकल पड़े। कुछ दिन ऐसे ही चलते रहे, कहीं रुके, कहीं खाना खाया। हर तरफ खून खराब था। एक रात हम सो रहे थे कि एक दम हड़कंप सा मच गया। सुनने में आया मुसलामानों का एक बड़ा जत्था मियांवाली आ रहा था। भगदड़ मच गई। भगदड़ में ना जाने मेरी बेटी सत्या और मेरा छोटा बेटा सम्पूरन कहाँ गायब हो गए। हमने कश्मीर के रिफ्यूजी कैंप में भरसर उन दोनों को ढूंढने की कोशिश की मगर कुछ हाँथ नहीं लगा।”

“…अभी कुछ साल पहले अफ़्सल की मौत की चिट्ठी मिली तब ही सत्या का पता भी चला। सत्या ने बताया कि उस रात भगदड़ में वो कब दूसरे रास्ते चली गई उसे पता नहीं। तीन दिन तक वो हमें ढूंढती और तड़पती। उसकी तड़पन एक मुसलमान परिवार से देखा नहीं गया और उसे शरण दे दी। वक़्त बीत गया और धीरे धीरे उस मुसलमान परिवार के मालिक ने दूसरा निकाह रचाया और सत्या को अपनी बेगम बना लिया। वो उनकी हो गई और नाम सत्या से दिलशाद हो गया है।अब वो ख़ुशी से अपना जीवन बिताती है।”

“बेटा पुन्नी तू मान क्यों नहीं लेता जिस तरह सत्या ही दिलशाद है वैसे सम्पूरन ही गुलज़ार है। तू ही मेरा छोटा लड़का है।” अचानक ही हरभजन सिंह की पत्नी चिल्ला उठी और रोने लगी। गुलज़ार अब भी शांत थे।

“बेटा सम्पूरन, मैं यह नहीं कहता कि तुम इसे सच मानो और यह भी नहीं कहता कि गुलज़ार से हमारे सम्पूरन हो जाओ बस तुमसे एक बार मिलने की इच्छा थी, जो अब पूरी हो गई है।”

उस दिन गुलज़ार ना कुछ बोल पाये, ना हँस पाये और ना ही रो पाये। शब्दों का अकाल पड़ गया। जल्द ही खाना लग गया। सब मिलकर खाना खाये और मुलाकात का नाउम्मीद ही ख़त्म हो गई।

उस मुलाक़ात के बाद 7-8 साल तक कोई संवाद प्राप्त नहीं हुआ। गुलज़ार ने भी किसी संवाद की कोशिश नहीं की। फिर 1993 की एक सुबह गुलज़ार को इक़बाल सिंह (हरभजन सिंह के पुत्र) का पत्र प्राप्त हुआ, लिखा था हरभजन सिंह का इंतेक़ाल हो गया है। गुलज़ार के अल्फ़ाज़ों का तालाब फिर सूख गया। उन्हें लगा जैसे उनके दारजी ख़त्म हो गए।

“मैं रहता इस तरफ हूँ यार की दीवार के लेकिन,
मेरा साया अभी दीवार के उस पार गिरता है।”

“”बड़ी कच्ची सी सरहद अपने जिस्मों जां की है।।””

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तकसीम के वक़्त ना जाने ऐसे कितने ही परिवार बिछड़े और कितने ही खो गए। किसका बच्चा कौन अपनाया, कौन हिन्दू से मुसलमान बना और कौन मुसलमान से हिन्दू बना, कुछ हिसाब नहीं। हिसाब है तो इंसानियत का। इंसानियत ने ही एक बिछड़े को जीवन दिया, एक बिछड़े को अपनाया। धार्मिक बनने से पहले इंसान बने। जय हिंद।

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