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Paper Towns

To say that I was on the edge of my seat throughout the entire reading of this book is a complete and utter understatement. 

Firstly, I would quickly like to thank Bloomsbury for sending me this copy. 235 more words

Gulzar

गुलज़ार साहेब से एक मुलाकात ख्वाब में

कल रात ख्वाब में गुलज़ार साहेब से सामना हुआ मेरे ज़हन की एक गली में। बातों ही बातों में गुफ्तगु कहां  ले चली पता ही नहीं लगता था ।तभी उनकी  कोई ग़ज़ल कोठे पर गुनगुनाने लगता है।

उनकी ग़ज़ल का चौगा अपना फैलाव लिए कब मुझे लपेटने लगता है पता ही नहीं चलता ।पहले तो वो मज़ा देती है फिर सर्द हवाओं के हिसाब से अपना वजन बढ़ा देती हैं किसी मोटी  रिज़ाई की तरह। फिर  थका देती है। फिर मैं अपने को छुड़ाने की कोशिश करता हूँ पर उसका एक एक शब्द अपनी पकड़ से इतना वाक़िफ़ है की  भीतर कुछ तोड़ता तो है पर कुछ भी बिखरने नहीं देता है। मुझे नींद आने लगती है तभी इससे पहले की नींद का झोंका गर्दन को लटकाए इक झटके से झंझोड़ कर चेतना मुझे उठा देती है।

5 best songs written by Gulzar for films..

Here is a slightly dated article that celebrated Gulzar saab’s birthday last week and lists out some of his best work – 5 best songs written by him for some iconic films, across decades. 108 more words

Urdu Poetry And Texts

Things with you

Some of my things are still lying with you
Some drenched monsoon days,
And a night wrapped in my one of my letters
Extinguish that night, and send these things back to me… 159 more words

Literature

रात पश्मीने की - गुलज़ार

ऐसे आई है तेरी याद अचानक
जैसे पगडंडी कोई पेड़ों से निकले

इक घने माज़ी के जंगल में मिली हो । ।
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जिस्म के खोल के अन्दर ढूंढ़ रहा हूँ और कोई
एक जो मैं हूँ , एक जो कोई और चमकता है

एक मयान में दो तलवारें कैसे रहती है
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जिस्म और ज़ाँ टटोल कर देखें
ये पिटारी भी खोल कर देखें

टूटा फूटा अगर ख़ुदा निकले-!
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तमाम सफ़हे क़िताबों के फड़फड़ाने लगे
हवा धकेल के दरवाज़ा आ गई घर में !

कभी हवा की तरह तुम भी आया जाया करो !!
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आँखो और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं
क्या तुम ने उड़ती देखी है, रेत कभी तन्हाई की
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किस में रखी है सुबह की धड़कन
गुन्चा गुन्चा टटोलती है रात
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गुलों को सुनना ज़रा तुम सदायें भेजी है
गुलों के हाथ बहुत सी दुआयें भेजी है

जो आफ़ताब कभी भी गुरुब होता नहीं
वो दिल है मेरा उसी की शु’आयें भेजी है

तुम्हारी ख़ुश्क सी आँखें भली नहीं लगती
वह सारी यादें जो तुमको रुलायें भेजी है

स्याह रंग , चमकती हुई किनारी है
पहन लो अच्छी लगेंगी घटायें भेजी है

तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते है
सज़ायें भेज दो हम ने खतायें भेजी है

अकेला पत्ता हवा में बहुत बुलंद उड़ा
ज़मी से पाँव उठाओ, हवायें भेजी है

-गुलज़ार [ रात पश्मिने की]

Poetry

Don't call me again and again

I stumbled upon this beautiful Urdu poem by a contemporary sufi poet Baba Gulzar Sabri.

A sufi is a person who strives to harmonize himself with Nature and forces his will to make an absolute surrender to the Will that commands the Nature. 495 more words