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The Law of the Jungle

The Jungle Book! The classic jungle story by Rudyard Kipling. This has amused generations together. I was able to catch up this movie recently. And I liked it, it is gripping, 3D makes it much more immersing. 585 more words

Books

तुम पुकार लो.. तुम्हारा इंतज़ार है..

दिल की गहराईयों से आती आवाज़ और हरदम बे-क़रारी बढ़ाने वाला इंतज़ार। फिर भी ये उम्मीद बनी है कि वो पुकारेंगे हमें.. कभी न कभी, किसी न किसी मोड़ पर। दोस्तों शायद ही आप में से कोई साहब होंगे जिन्होंने इस गीत को सुना न हो और शिद्दत से महसूस न किया हो। क्या कमाल का गीत है ये, जिसमें गायक और संगीतकार हेमंत कुमार अपने शिखर पर नज़र आते हैं। उनकी गूंजती आवाज़ सुनकर लगता है कि जैसे कोई प्यासी रूह अपने जज़्बात बयां करने को तड़प रही हैं और तलाश रही हैं एक अपनी ही तरह की एक और रूह जो उसकी बेचैनी को समझ सकें, उसे अपना सकें। 6 more words

Ijaazat

 समांतर जीवन वाचल्यानंतर अपर्णा नी, आम्ही सर्वांनी गुलजारांचा ‘इजाजत’ सिनेमा पाहावा असे सुचवले.

Gulzar’s Ijaazat lambasted the concept of live-in relationships. In the film, Naseeruddin Shah loved Anuradha Patel but married Rekha. 167 more words

वे बीज हैं, पर बोरों में पड़े हैं

हाल ही में हिन्दी सिनेमा. या यूं कहें कि भारतीय सिनेमा के दो दिग्गज पटना के किसी मंच पर साथ-साथ थे – सुप्रसिद्ध गीतकार एवं निर्देशक गुलज़ार और सिनेमा से लेकर टेलिविज़न तक का सफर तय करनेवाले सफल निर्देशक-फिल्मकार श्याम बेनेगल। अवसर था बिहार की राजधानी पटना में एक नए सांस्कृतिक केन्द्र के शिलांयास का। इन दोनों के साथ ही विद्यमान थे जाने-माने कथक नर्तक बिरजू महाराज और रंगमंच के प्रति पूर्ण समर्पित संजना कपूर। हां, उनके साथ पटना के ही कलाकार सुबोध गुप्ता भी थे। वैसे मैं जानता हूं कि इनमें से किसी का भी पूरा परिचय मेरे विशेषणों में नहीं आ पाया है।

बहरहाल, इन सबसे प्रतिष्ठत मंच पर चर्चा चल रही थी, कला क्यों? इस चर्चा को संचालित कर रही थीं लेखिका एवं गायिका विद्या शाह। बेनेगल का मानना था कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में कला का अपना स्थान है। उससे कटकर तो वह हो ही नहीं सकता। और इसीलिए कला सभी की पहुंच में होनी चाहिए। उसे ऐसा बनाना चाहिए कि वह सभी की जिन्दगी में बनी रहे। सुबोध को भारत में समकालीन कला दीर्घा के अभाव को लेकर शिकायत थी। वह चाहते हैं कि सरकार इस ओर पहल करे। जबकि संजना कपूर का मानना इससे अलग था। उनकी मान्यता है कि कला के लिए सभी को आगे आने की जरूरत है, सिर्फ सरकार को ही नहीं। बहरहाल, जो बात होनी थी कला की जरूरत पर, पर बिखर गई कला के लिए संसाधनों की जरूरत पर। कलाकृतियों की नीलामी करके संसाधन जुटाने में सक्षम सुबोध जब अर्थ का रोना रोएं, वह भी अर्थशिला के मंच पर, तो आश्चर्य होता है।

संयोग से मैं इन दिनों अंग्रेजी की एक पुस्तक का अनुवाद कर रहा हूं। पुस्तक है दि बोस ब्रदर्स। इसमें सुभाष चन्द्र बोस के कुछ बेतरतीब विचार संकलित हैं। उसमें कला के संबंध में उनके विचार भी हैं। मैं ज्यों का त्यों उन्हें रख दे रहा हूं – बंगाल को आज वास्तविक राष्ट्रीय आन्दोलन की जरूररत है। राष्ट्रीय से मेरा आशय राजनैतिक से नहीं है। राजनैतिक अभियान तो यहां चलाए ही जा रहे हैं। इससे मेरा अभिप्राय अंधराष्ट्रभक्ति से भी नहीं है क्योंकि यह भारतीय चरित्र से मेल ही नहीं खाता। राष्ट्रीय आन्दोलन से मेरा अभिप्राय एक ऐसे अभियान से है जो हमारे सामाजिक तथा सामूहिक जीवन के हरेक पहलू से जुड़ा हो। हमें अपने सामाजिक जीवन में पुनरुत्थान याकि नवजागरण की जरूरत है। हमारी रचनात्मकता हमारे काव्य, संगीत, साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला एवं इतिहास के क्षेत्रों में तो दिखनी ही चाहिए, हमारी सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक जिन्दगी भी उससे अछूती नहीं रहनी चाहिए। … संस्कृति के क्षेत्र में हमें ऐसे खरे कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, इतिहासकार, दार्शनिक एवं अर्थशास्त्री चाहिए जो वैज्ञानिक अनुसंधान की भावना से ओतप्रोत हों और वास्तविक रचनात्मक कौशल के धनी हों।

मैं यह सोचने को विवश हूं कि जिस मंच पर गुलज़ार जैसा सक्षम शायर बैठा हो, जो मंच श्याम बेनेगल जैसे श्रेष्ठ फिल्मकार से प्रतिष्ठित हो, जहां गरीबी से अमीरी तक का सफर तय करनेवाला सुबोध गुप्ता बैठा हो, उस मंच से यदि कला की कंगाली की बात हो तो वाकई मजा नहीं आता। देश ने, समाज ने इन सभी को बहुत कुछ दिया है, अब बारी है कि वे अपनी झोली खोलकर समाज को उसका प्राप्य दें। मैं मानता हूं कि सुभाष जिस खरे कालाकार की बात कर रहे थे, उसके बीज इन सभी में हैं, पर फल देने के लिए बीज को खुद अपना अस्तित्व खत्म करना पड़ता है। तभी उसमें से जड़ें निकलती हैं, तभी उसमें से तने निकलते हैं और तभी उसमें फल लगते हैं। बीज यदि बीज ही बना रहे तो वह एकाकी रह जाता है, जबकि अपने अस्तित्व को त्यागने के बाद वह अनेकानेक बीजों का उत्स बन जाता है। पता नहीं मुझे क्यों लगा कि जिन्हें हम वटवृक्ष मानने लगते हैं, वे महज बीज हैं, जिसमें संभावना तो है, पर वह अपना अस्तित्व खोने को तैयार नहीं है और इस कारण किसी एक पक्षी की पूरी खुराक भी नहीं बन पाए हैं।

Arthshila

Aa Jao, Ya Bula Lo .. Read by Ashish Mishra

Ashish’s promising voice not only well compliments a superb treat of words from Gulzar in remembrance of Pancham.. its captivating tone delivers the play of a melancholy yearning for the bond that stood larger than a lifetime.  129 more words

Gustaakhiyaan

Jeena Yahaan .. Read By Aanchal Unnati

After much deliberation on the title of the post, I kept it simple. There can be no another way to introduce a story penned by the master of all story-tellers. 61 more words

Gustaakhiyaan

Oopar waala neeche dekhe neeche waala oopar

This article is written by Peevesie’s mom, a fellow enthusiast of Hindi movie music and a contributor to this blog. This article is meant to be posted in atulsongaday.me. 1,128 more words

Yearwise Breakup Of Songs