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Footprints on Zero Line - Gulzar

The Partition of 1947 has influenced the works of an entire generation of writers, and continues to do so. Gulzar witnessed the horrors of Partition first-hand and it is a theme that he has gone back to again and again in his writings. 77 more words

Urdu Poetry And Texts

Why I love poetry + 3 poems I will never stop reading

To recall the exact moment when I fell utterly and irrevocably in love with poetry is quite similar to trying to find a trunk full of treasure with a Cartoon Network inspired treasure map. 852 more words

Opinions

ਗੁਲਜ਼ਾਰਨਾਮਾ

ਸੰਪੂਰਨ ਸਿੰਘ ਕਾਲਰਾ ਆਪਣੀ ਕਲਮ ਨਾਲ ਸਰਗਰਮ ਹੁੰਦਾ ਗੁਲਜ਼ਾਰ ਦੀਨਵੀ ਦੇ ਨਾਮ ਨਾਲ ਆਉਂਦੇ ਹਨ।ਫਿਰ ਉਹ ਦੀਨਵੀ ਤੱਖ਼ਲਸ ਵੀ ਤਿਆਗ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਸਿਰਫ ਗੁਲਜ਼ਾਰ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।ਇੱਕਲਾ ਗੁਲਜ਼ਾਰ ਆਪਣੇ ਆਪ ‘ਚ ਪੂਰੀ ਬਹਾਰ ਹੀ ਤਾਂ ਹੈ।ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਜੇਹਲਮ ਦੇ ਦੀਨਾ ਤੋਂ ਪੈਦਾਇਸ਼ ਲਈ ਗੁਲਜ਼ਾਰ ਵੀ ਉਹਨਾਂ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ‘ਚੋਂ ਹਨ ਜੋ ਵੰਡ ਦੇ ਸੰਤਾਪ ਨੂੰ ਕਲੇਜੇ ਸੰਭਾਲੀ ਆਏ ਹਨ।ਇਹ ਦਰਦ ਕੋਈ ਆਮ ਦਰਦ ਨਹੀਂ ਹੈ।ਇਸ ਦਰਦ ‘ਚੋਂ ਬੰਦਾ ਆਪਣੇ ਅੱਜ ‘ਚ ਹੋਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਪੂਰਾ ਉਸ ਦੌਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ ਜੋ ਉਹ ਲਹਿੰਦੇ ਪੰਜਾਬ ‘ਚ ਛੱਡ ਆਇਆ ਹੈ।

Cinema

Bhala Bura Bura Bhala Hai

This article is written by Peevesie’s Mom, a fellow enthusiast of Hindi movie music and a contributor to this blog. This article is meant to be posted in atulsongaday.me. 1,323 more words

Yearwise Breakup Of Songs

नज़्म : शायर और शतरंज

कल सारी रात

जब बीमार था मैं,

मेरा शायर, मेरे ही पास पड़ा लेटा रहा.

कितना ही कहा उसको चले जाने को,

और ये भी,

Rohit Joshi

Amen- कुछ और नज़्में

Amen

Give everything away—
Ideas, breath, vision, thoughts.
Peel off words from the lips,
and sounds from the tongue.
Wipe off
the lines from the palms. 92 more words

Poetry

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है...

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है…

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है…
आस्मान बुझता ही नहीं,
और दरिया रौशन रहता है
इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक पे तारों का
जैसे रात में ‘प्लेन’ से रौशन शहर दिखाई देते हैं!

पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के
पेड़ों के झुरमुट में
कोड़ा जमाल शाही, “आई जुमेरात आई…. पीछे देखे शामत आई…”
दौड़-दौड़ के खेलता है!

कंघी रखके दाँतों में
आवाज़ किया करती है हवा
कुछ फटी-फटी… झीनी-झीनी…
बालिग़ होते लड़कों की तरह!

इतना ऊँचा-ऊँचा बोलते हैं दो झरने आपस में
जैसे एक देहात के दोस्त अचानक मिलकर वादी में
गाँव भर का पूछते हों…
नज़म भी आधी आँखें खोल के सोती है
रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है!!
– गुलज़ार
‘पन्द्रह पाँच पचहत्तर’ से

Poetry