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Songokū and Hanumān

Songokū is the main character of Saiyūki: a Japanese version of a Chinese story Journey to the West published in the 16th century. There is a mythical character by the name Hanumān in India, who has been loved by the people of the country for thousands of years. 271 more words

Japan-India

Will monkeys overtake man?

“Monkeys are trained and employed as harvesters of large coconut plantations in Malaysia and Thailand”.

A statement in Page 4 of Chennai Times dated 25th May under the caption Fact of the matter. 775 more words

एक वानर जो उड़ सकता था

हनुमान अकस्मात् उठ बैठा. उसे यहाँ जानकार कुछ संतोष हुआ की वो आकाश से गिर नही रहा था. वह आसानी से जागने वालों में से नहीं था. कुछ हफ़्तों पहले तक, जब जीवन सामान्य था, उसकी दोपहर की झपकियाँ भी सागर सी गहरी हुआ करती थीं. पर फिर दो वनवासी राजकुमार कहीं से आ गए और रिश्यमुख पर सब कुछ बदल गया.

जबसे वह लंका जाकर लौटा था, कुछ बेचैन सा रहता था. पिछली रात को भी उसकी नींद तब टूट गयी थी जब उसने एक दुस्वप्न में सिंहिका राक्षसी, जिसके साथ उसे लंका के रास्ते पर लड़ना पडा था, को देखा. ऊपर से दूसरी बात यह, की आधी रात को जागने के बाद वह हमेशा स्वयं को खर्राटे मारते वानरों के बीच बैठा एक मूर्ख महसूस करता था.

हनुमान खड़ा हुआ और चारो तरफ सोते वानरों की फैली पूँछों का ख़याल करता हुआ ध्यान से पर्वत के किनारे पर पंहुचा. उसके आगे अथाह सागर छलक रहा था. रात के अँधेरे में रावण की लंका दिख तो नही रही थी पर हनुमान को ज्ञात था की वह द्वीप उसी सीध में कहीं है. उसकी आँखें जैसे जैसे लहरों पर खेलती चन्द्रमा की रुपहली रौशनी की आदी हुईं, वैसे वैसे गत कुछ महीनों के आश्चर्यजनक यादें उसके मन में लौटने लगीं.

सीता की तलाश में भारतवर्ष के अंत तक पहुँचने के बाद उन्हें जटायु के भाई संपाति ने निराशा के घोर अँधेरे से बचाया था. संपाति ने ही हनुमान और उसके मित्रों को सागर पार लंका के विषय में बताया था. तत्पश्चात भल्लुक जाम्बवंत ने हनुमान को उसकी शक्तियां प्रदान की थी.

आज, हफ़्तों बाद, हनुमान को यह स्मृति स्वप्न सी प्रतीत हो रही थी. क्या उसने वास्तव में यह सब कर दिखाया था? क्या वह विशाल शक्ति समुद्र सचमुच हमेशा से उसके अन्दर गोते मारता रहा था? या क्या ये सब मात्र जाम्बवंत के जादू का प्रभाव था?

सच माने तो हनुमान को अब भी स्वयं में कोई बदलाव नहीं दिखता था. वो अब भी वही एक अदना सा वानर था जो वह पहले हुआ करता था. उसके अंतर्मन का एक भाग अब भी मानता था की वानर उड़ते नहीं हैं, समुद्र पार छलांग मारके राक्षसों से लड़ना तो दूर की बात है.

हनुमान ने एक गहरी सांस ली और जलती हुई लंका को याद करके हल्का सा हँस दिया. वह एक कार्य तो उसने अवश्य किया था.

पर्वत के किनारे पर पैर लटका कर बैठ, हनुमान अपने आप को इस नई वास्तविकता से अभ्यस्त कराने का प्रयत्न करने लगा. प्रातःकालीन ठंडक का आभास होना शुरू हो चुका था. समुद्र की दिशा से आया हवा का एक झोंका उसे प्यार से घेरकर उसके कान में कुछ फुसफुसाया.

“प्रणाम पिताश्री,” हनुमान मुस्कुराकर बोला.

वायुदेव, हनुमान के पिता और समस्त पृथ्वी पर चलने वाली हवाओं के मालिक, ने हनुमान के शरीर को सहलाते हुए उसे बताया की वह उससे कितना प्रेम करते हैं. वायु का पुत्र होना कुछ असामान्य सी बात है क्योंकि इस अवस्था में पिता हमेशा आसपास होते हुए भी कभी आसपास नहीं होते. पर हनुमान इस स्थिति का वर्षों पहले आदी हो चुका था.

“मैं उड़ कैसे पाता हूँ पिताश्री?” हनुमान ने पूछा.

उत्तर में वायु ने प्यार से उसके बाल खराब कर दिए.

“मेरा मतलब है,” हनुमान ने फिर पूछा, “बाकी सब वानर क्यों नहीं उड़ पाते? मैं ही क्यों?”

हवा कुछ समय के लिए शांत रही और हनुमान को लगा की उसके पिता फिर कहीं और चले गए. पर फिर वायुदेव ने उससे पूछा की वह ऐसा क्यों सोचता है की सब वानर उड़ नहीं सकते.

हनुमान को एक बार फिर स्वयं के मूर्ख होने का आभास होने लगा. पर उसने खुद को संभाला और फिर पूछा, “क्या जाम्बवंत ने कुछ किया था? किस प्रकार की माया थी यह?”

जवाब में वायुदेव ने हनुमान को अपनी अदृश्य बाहों में उठा लिया. हनुमान कुछ देर तक विचारों और चिंताओं से मुक्त एक बच्चे सा झूलता रहा. फिर वायुदेव ने उसके प्रश्न का उत्तर दिया.

“जाम्बवंत ने तुम्हे बताया की तुम उड़ सकते हो. उन्होंने केवल इतना ही किया. उनके कथन पर विश्वास करने वाले तुम ही थे पुत्र.”

हनुमान ने इस बात पर थोड़ी देर सोचा. आदरणीय जाम्बवंत को वह सचमुच बहुत मानता था. उनके मुँह से निकली किसी बात पर वह अविश्वास कर ही नहीं सकता था.

“तो क्या कोई भी वानर उड़ सकता है?” हनुमान ने पूछा.

“वह उन पर है,” वायुदेव ने कहा और फिर चुप हो गए. वह जा चुके थे और हनुमान ने स्वयं को फिर से ज़मीन पर बैठा पाया.

हनुमान ने मुड़कर अपनी खर्राटे मारती सेना पर एक नज़र डाली. हर सुप्त वानर एक अलग स्वप्न में लिप्त था. फिर उसने मुस्कुराकर अपने आप से कहा, “रावण तो गयो!”

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