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Tumhaare Paas!

ज़रा देखो आसपास
मैं हूँ तुम्हारे पास,
हाथों को छू कर निकलता
मैं वो लम्हा हूँ तुम्हारे पास!

एहसासों को अपने तुम्हारी पलकों पर रख कर
खामोशियाँ निगाहों से निगाहों में भर कर,
बहती हुई लहरों में तुम्हारे कदमों से लिपट कर
बरसती हुई बूँदों में तुम्हारे लबों पर नमी रख कर
मैं हूँ तुम्हारे पास!

कई सारे मिसरों से जुड़ कर बनता
तुम्हारी लटों को सहलाती उंगलियों से सरकता,
शायरों की शायरी में तुम्हें रख कर
दूर कहीं मद्धम सी रोशनी में तुमसे मिलता,
तुम्हारे ही ख़्याल का एक टुकड़ा हूँ मैं तुम्हारे पास!

सिलसिले वक़्त के इस कदर जुड़े
अन्जाने कदम इक मोड़ रुके,
ज़िन्दगी के साहिल पर एक ही कश्ती में
एक हो कर दो दिल हर्षाते चले,
दास्ताँ में तुम अकेली नहीं हो
एहसासों के कारवाँ में तुम्हारा हाथ थामे हूँ मैं तुम्हारे पास!

यूँही हर चाहत बयाँ नहीं होती
लफ्ज़ों में तुम्हारी इबादत अब पूरी नहीं होती,
इक आदत है मेरे ज़हन में बसी
बिन तुम्हारे अब खुद से मोहब्बत नहीं होती,
तुम्हारी हर उम्मीद को इन पलकों पर रख कर
तुम्हारे अक्स में कहीं ना कहीं हमेशा हूँ मैं तुम्हारे पास!

छुपा रखी है तुमने मुस्कुराहट
दबा रखी है हर हसरत,
इंतज़ार है तुम्हें उस पल का
मैं जानता हूँ तुम्हारी ये चाहत,
मगर इक पल को ये निगाहें मीच कर
ज़रा देखो आसपास
मैं हूँ तुम्हारे पास,
हाथों को छू कर निकलता
मैं वो लम्हा हूँ तुम्हारे पास,
मैं हूँ तुम्हारे पास!

– साहिल
(18th May, 2018 – Friday)

“I think the notion of dreaming in a time where we are told that it is foolish, futile or not useful is one of the most revolutionary things we can do.

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