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choti si baat

” जला के आज दिल अपना हमने रोशन उनके दिल का चिराग कर दिया ,
और भर के झोली रोशनी से अँधेरे की, आज फिर उन्हें हमने आज़ाद कर दिया। ” -बिक्रम कपूर

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choti si baat

“थोड़ी तो करदी तूने ,बस थोड़ी और करवानी बाकी है ,
मेरी किस्मत की दीवार की ओ रब्बा, थोड़ी मरमत करवानी बाकी है। ”   -बिक्रम कपूर

Bikram

" आज का इंसान "

” रहने लगा है इंसान अब परेशान ,
वो भी परेशानी से पहले।
और रोता है हर बात पर,  वो भी बात होने से पहले।
अकड़ता है वो, करता है में में…..
पर कोई पूछे उससे क्या था तू “में” बनने से पहले। ”
—– बिक्रम कपूर

Bikram

"kuch khat" ( कुछ खत )

” लिखे मेरे उन खतों को कभी डाकिया न मिल सका,

लिखी थी बातें कुछ अनकही, उन बातो को पड़ने वाला न मिल सका।

अपनी खामोशियों को जुबां दे कर उन खतों को लिखना सीखा था ,
पन्नो पर ही लिख लिख कर ही मेने बातों को कहना सीखा था।

मिल जाते अगर वो खत तुम्हे तो आज में शायर न होता।,
पड़ लिख कर में भी बड़ा डॉक्टर या lawyer होता।

उन खतों को आज भी मेने संभाल कर ही रखा है,
आता है आज भी डाकिया घर पर,
डरपोक दिल ने आज भी उन्हें तकिये में छुपा रखा है।

डर इस बात का नहीं की, ले गया जो डाकिया उन खताओं को, तो दिल मेरे फिर टूट जायेगा,
बस सोचता है मन यही ,कि celotape से चिपका दिल मेरा ओर कितना सेह पायगा। “

Bikram

मन करता है.

” उड़ते हुए परिंदो की उड़ान देख कर,अब हमे भी उड़ने का मन्न करता है.
कश्ती हमारी ज़िदगी की अब तक लहरों से झूज रही है ,
अब साहिलों पे रुकने का हमे भी मन्न करता है।

सुरों की सरगम सुनते सुनते २७ साल बीत गए ,
अब किसी सरगम की धुन बन्नने का हमे भी मन  करता है।

हम तो जीते आये है हसाते हुए सब को ,
अब यार हमे भी हसने का थोड़ा मन  करता है। “—— बिक्रम कपूर

Bikram

कविता 'विस्थापन' पुस्तक : गाहे बगाहे

विस्थापन की पीड़ा को समझना हो तो इस कविता को जरुर सुनें !

तुषार उप्रेती

मेरी दुनिया के पूर्वज

ओ मेरी दुनिया के पूर्वजों

क्यों तुमने सिखाया था हमें

गुस्से को थूकना

तुम्हारी इसी गलती ने

नपुंसक कर दी है सारी आबादी

आज भी हम

अपने पर हुए अत्याचारों को

नियति के हाथों सौंप

थूक देते हैं खुद पर,खुद के गुस्से पर

जिसे निकलना चाहिए था बाहर

अब तुम्हारी यह देन

कुछ इस तरह हावी है सबपर

की उनकी चीखें

बस उनकी दर्द की अनुभूति है

न की क्रांति का संदेश

तुम्हारी यह पुरुस्कार

जो मानवता के लिए अमूल्य था

अब उसे तोड़-मरोड़ कर

एक ऐसी व्यवस्था बना दी गयी है

जिसमे हर एक जीवन बस इंधन है.

ओ मेरे पूज्य पूर्वज

तुम्हारे सीख,जो अब मेरे संस्कार है,

तुम्हारे ज्ञान,जो अब मेरी सीख है,

तुम्हारे पथ,जिसने मुझे इंसान बनाये रखा,

अतुलनीय है,

पर आज तुम्हे और तुम्हारे इस सीख को

चुनौती प्रदान करता हूँ

अब मेरे शरीर के हर एक जख्म का

हिसाब देना होगा उन्हें

अब हमारे हाल को नियति दोषी नहीं होगा

अब गुस्से को थूका नहीं

बल्कि नपुंसकता की धुंध से

निकालकर आवाज़ दी जाएगी

अब हमारी चीखें दर्द की संवेदना नहीं

सिंह की दहाड़ होगी

जो हिरन को नहीं,पिंजरे वालों को थर्रा देगा।

तब तुम मत पूछना हमें

की झुठला दी मैंने तुम्हारे कुछ उसूल

क्यूंकि तुममे से ही कुछ एक ने

सुखदेव,भगत सिंह,राजगुरु बनकर

मुझे लड़ना भी सिखाया था.

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