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Garam chai.

चाय.

( अक्सर चाय पीते समय कुछ खट्टे तो कुछ मीठे नए-पुराने पल याद आजाते है। )


” दो चुस्किया चाय की हमे भरने दो ज़रा,

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मिट्टी की महक

मिट्टी की महक

माटी पर पड़ी जब बारिश की पहली बूँदें
सौंधी सी खुशबू दे गई कनक सी बूँदें
तृप्त धरा का रूप सौन्दर्य बना मधुकर
नन्हा अंकुर हुआ निहाल हर्षित-तरंगित
भीना – भीना सा सौरभ उसमें समाया
बचपन अपने शिशु का स्मरण हो आया
कितने अमूल्य पल हैं वह वात्सल्य के
एक धरोवर हैं वे क्षण कोमल यादों के
आज तरुण रूप है वह मासूम लड़कपन
भाता है उसे अब भी माटी का सौंधापन
माटी के घड़े का जल ललचाता है उसे
मानता नहीं शिशु रूप में खाता था माटी
आज तपती धरती पर आईं पीयूष की बूँदें
जैसे पुष्प-पल्लव पर पड़ी हो रेणु की बूँदें
अनीता सिंह २० जून २०१२

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एक ही अभिलाषा

एक ही अभिलाषा
मर्यादा बने पहचान तुम्हारी
मैं बनूँ संग- संगिनी
बन जाओ तुम रामचन्द्र
मैं बन जाऊँ सिया प्यारी

पर एक वचन है मेरा
वनवास कभी न देना ||

छाँव बने शीतलता तुम्हारी
डाली बन मैं झुक जाऊँ
बन जाओ तुम हर्षित उपवन
मैं बन जाऊँ फूलों की क्यारी
पर एक वचन है मेरा
पतझड़ कभी न देना ||

सागर सी गहराई तुम्हारी
शांत नदी सी मैं बह जाऊँ
बन जाओ तुम जलधर मेघा
मैं बन पपीहा व्याकुल

पर एक वचन है मेरा
पतझड़ कभी न देना ||
अनीता सिंह ५ मई २०१४

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इन्द्रधनुष

इन्द्रधनुष
प्रकृति के रंगो का मालिक
कितना विहंगम होता है न
सात रंगों से सजा अर्धवृत सा
क्षितिज पर शान से फैला
जैसे मिला रहा हो

नील ग्रह के दो ध्रुवों को प्रणय सूत्र में
वह बस रश्मियों के सफलता का जश्न है.

सूर्य से निकल कर कुछ रश्मियाँ
लाखों मील निर्वात तैर
पृथ्वी पर आती है
और अपने तेज़ से
जल को सहलाती है
घंटो बस यूँ ही एकटक
जल को देखती,सहलाती
तब तोड़ पाती है उसके अणुओ को
काम तो अधूरा है अभी भी

फिर हवाओं को गर्म कर
मदद करती है अणुओ को
की उठ ऊपर बन सके बादल
और फिर छुप उनके पीछे
जमा जाती है कुछ स्वर्णिम बुँदे
फिर चुम उन्हें चारों तरफ
गुज़र जाती है होकर उनसे
और तब टूटता है उसकी सादगी
सात लुभावने रंगो में।

कुछ समय लगता है
रश्मिाओं के इन्द्रधनुष बनने में
उनमे से कुछ खो जाती है अनंत आकाश में
कुछ ख़त्म हो जाती है ब्लैकहोल में फंस कर
पर उनके तेज़ पर कोई  प्रश्न नहीं
कहाँ मिलता है कुछ भी यहाँ
संयम,परिश्रम के बिना।

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मन समझाता मन को

मन समझाता मन को

मन स्वयं को अक्सर यही कहता
क्या सोचता हर दम तू शून्य सा

खुद से ही खुद में खोया रहता हमेशा
खुद ही खुद उत्तर दे देता खुद को

चिन्तन न कर ज़्यादा मान मेरा कहना
शांत रह नदी सा हिलोर न भर ज़्यादा

स्वयं ही स्वयं की पहचान कर तू अपनी
गहरी एकाग्रता ,उद्देश्य और तेरा जुनून

गम्भीरता , श्रवणशीलता और गहराई
एक दिन तुझे देंगे तेरी नई पहचान

जानेंगे मन तेरा और कोमलता उसकी
बस धीर धर और चिन्तन कर मन अपना
अनीता सिंह ७.११.२०१४

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बिछुड़ी स्मृतियाँ

बिछुड़ी स्मृतियाँ

बिछुड़ी यादों का वह मधुर झौंका
आज शीतल हवा फिर से ले आई
कह गई कही-अनकही सी बातें
मानो कह रही हो मन की सी

आज खिड़की से दिखा मनभावन
लहराता तिरंगा लहर-लहर मन से
देख यादों की तरंग जागी मन में
भूत अचानक से जागा वर्तमान में

यादों की मधुर ध्वनि चहचाहट सी
दोस्तों का सौरभ कलरव पक्षी सा
बच्चों का भागकर आना और मिलना
चुपके से बचपन का गले मिल जाना

वो कहना कहाँ थे तुम अब तक ?
क्यों गए छोड़कर हमको तुम ?
वो द्वारपाल का सम्मानित अभिवादन
वो कहना – आते रहो मैडम जी

इमारतें भी मुस्काई संजीव सी
मानो कह रही हो मन की सी
मधुर यादों की मधुर-मधुर अनुभूति
आज शीतल हवा फिर से ले आई   अनीता सिंह ७.१२.२०१४

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आत्म-अवलोकन

आत्म-अवलोकन

विचारा मैंने एक दिन अचानक
करूँ मैं आत्मा का अवलोकन
दिल की धड़कने तेज हुई
मस्तिक अचानक शून्य हुआ

सोच अचानक धरासायी हुई
सत्य हँसा, असत्य भी मुस्काया
कबीर की साखी याद आई
बुरा जो देखन में चला ….

अनीता सिंह २७.८.२०१४

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