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Poem / कविता (KAVYA)

I am a poem,

A short one…

No matter how much you read me,

You won’t understand me…

Open your heart,

And,

Look into my heart… 37 more words

Poems

एक कतरा चाँद का!

एक कतरा चाँद का था, एक फाहा बादलों का
खोल गुड़िया की पिटारी, फिर नए सपने चुने
सरदी की सांझें गुलाबी, जेठ की कुछ दोपहर से
जलते बुझते, खट्टे मीठे, फिर नए रिश्ते बुने

कुछ छलकती आँखों वाली, कुछ हँसी की बातों की
जोड़ शब्दों के सिरे, फिर लिखी कोई कहानी
लेन देन, झुठे सच्चे की, कहीं निभायी दुनियादारी
कहीं बंधन तोड़ सारे, बाँधा एक रिश्ता रूहानी

यूं ही रूकते, चलते, थकते, नापी दूरी इस जगत की
हाथ छुटे, साथ छुटे, कुछ रहे साथी सफर के
कहीं पलकें भींगी दो पल, कहीं रो कर रात काटी
कहीं मुस्कानों, खुशी में, बीते ये पहिये पहर के

हर कहीं से थोड़ा थोड़ा, ढेर सारा स्नेह जोड़ा
ना गिला शिकवा किसी से, सबने कुछ ना कुछ सिखाया
वक्त के पहिये रूके कब, छांव धूप दोनों पाई
दुख ने जो दस्तक कभी दी, सुख भी तो बेबाक आया!

By Shweta Sharma. JNV Jojawar

For Navodayans

तुम

उसके दबे पाँव पायल की छनक
मेरे हर खट्टी मीठी बात पे गूँज उठी |
मधुर एक सागर की लहर बनके
मेरे दिल के कागज़ पे गज़ल बन गयी |
छम छम एक राग वो, कभी मधुर, कभी नटखट
वो मेरे जिंदगी की हसीन तकदीर बन लिखी |
कुछ इस तरह तुम्हारे रंगों से उल्फ़त हो गया
की कभी आप, कभी तुम, तो कभी हम हो गये |

-Roshni Rajshekhar Nair

Pages From My Diary

Aksar


This poem is about people who are engrossed in their routine life and do not have time to meet their friends and loved ones.
#Aksar… 93 more words

Life

ऐसी तोह ना थी मै||

ऐसी तोह ना थी मै…

थोड़ी सी पगली थी,

पर बहुत अपनी सी थी…

खुद की उम्मीदो पर खुब उतरने वाली,

एक बच्ची थी मै…

रात दिन एक कर,

सपनो को साकार करने वाली,

खुब लड़ने झगड़ने वाली,

एक बच्ची थी मै…

प्यार भी करना आता था,

और…

जोखिम भी उठाना आता था…

लक्ष्य से दूर रहकर भी,

लक्ष्य के करीब रहना आता था…

नासमझ थी,

पर दिल साफ था…

आज भी दिल साफ है,

पर लोगो को साफ दिल की आदात क्हा रही?

Poems

स्वरूप

 

मैं जब भी देखूँ दर्पण में,

कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।

ये स्वरूप मेरा है या रूप तेरा,

मैं सोच रही मन ही मन में।।

चादर की सफेदी में अपने,

है लगा मुझे भी तू ढकने।

एक परत चढ़ी मेरे तन में,

कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।।

है धुआँ धुआँ फैला नभ में,

आंधी है खड़ी सागर तट पे।

न नियंत्रण है अब किसी कण में,

कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।।

आकृतियों से सज्जित प्रांगण है,

विकृतियाँ भी मनभावन हैं।

परिवर्तन है अंतर्मन में,

कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।।

कविताएं