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Humein kya laga !!

Jo likh di sacchai dil ki toh..
Unhein na paak laga
Jo utaar diye ashk maine toh
Unhein dikhawa laga
Jo aankhon mein rakh liya toh… 66 more words

-Hindi Poems

मेरे हृदय से निकली आवाज़

मै थी छ्त के किनारे पर बैठी हुई,
अचानक मेरी आत्मा ने मन की आवाज़ छुई,
तब मैने अपने दिल के भीतर की गहराई मे जाना चाहा,
अपनी अन्तर्धन आवाज़ को सुनना चाहा,
परन्तु मेरा दिल अभी भी कुछ और बोल रहा था,
मुझसे कुछ कहना चाहा रहा था,
तब मैने सोचा उसकी भी सुनू,
अपने लिए कोई नयी राह चुनू।

समझ नही पा रही थी अन्दर चलती भावनाओ को,
डर था, डर था मुझे, उन्हे मै ना देती खो।

मेरे अवचेतन मन ने अपनी मेघावी से उत्तर दिया,
मन कुछ सोचता है , दीमाग कुछ सोचता है,
हर जिज्ञासु प्रश्न का उत्तर खोजता है,
आज के लोग दीमाग की सुनते रह जाते है,
अपने भीतर की आवाज़ को दबाते ही रह जाते है।

नवयुग पूर्णतः दीमाग पर आश्रित है,
और मन व्यक्ति के मनोवेगो से मिश्रित है।

ना जाने कब जानेगा मनुष्य अपनी अन्तर्मन की आत्मा को,
ना जाने कब जानेगा मनुष्य अपनी अन्तर्मन की आत्मा को,
जिस से वो सदैव से परिहार करता आ रहा है,
अपने मूल्य विचारो को व्यर्थ मे बहा रहा है।

कहते तो हम सब है यह मुहावरा ,
लेना चाहिए हमे इसका सहारा,

“सुनो सबकी करो मन की “

Consciousness

... मैं तो चलता गया |...

सब कुछ सवारते हुए |
खुद को सँभालते हुए |
मैं तो चलता गया |
पर मैं न रहा |

राहों में मुश्किलों को झेलते |
आँखों से आंसूं पीते |
होठों पे मुस्कराहट बनाये हुए |
मैं तो चलता गया |
पर मैं न रहा |

कभी सुख को देख के |
कभी दुःख को झेल के |
अपने आप को भूल के |
मैं तो चलता गया |
पर मैं न रहा |

आवाज़ों के बाज़ारों में |
शोर के भवसागर में |
मेरी ख़ामोशी शांत हो गयी |
बोलूं तो बोलू क्या |
मेरी आवाज़ भी मुझसे नाराज़ हो गयी |
दुनिया की परछाई में |
खुद की परछाई भूल गया |
परन्तु …
मैं तो चलता गया |
पर मैं न रहा |

एक राह पकड़ी ऐसी |
जिस पर इंसान ने कदम ही न रखे थे |
उस अंजानी और अजनबी राह में |
मंज़िल तलाश लिया |
औरो की क्या बात करे |
खुद को ही अपना शागिर्द बना लिया |
अकेले ही रहकर |
अकेलेपन को मार डाला |
पर …
मैं तो चलता गया |
पर मैं “मैं” न रहा |

अँधेरा आया और गया |
पर सवेरा नहीं हुआ |
आने और जाने का चक्र चलता रहेगा |
मैं था , मैं हूँ |
राह कठिन है बहुत |
अंगारों पर चलना होगा |
मुश्किलों को मारने के लिए |
खुद से जीतना होगा |
सवेरा लाने के लिए |
खुद को सूरज की तरह जलना होगा |
डगर मुश्किल है नामुमकिन नहीं |
इसलिए …
मैं तो चलूँगा |
और चलता रहूँगा | 

 – Ashish kumar

Hindi Poems

Hindi writers join hands please!

I have been hunting high and low in wordpress for about a fortnight now, looking for Hindi bloggers who write using Hindi fonts, or use English alphabet to write in Hindi, any of the two but honestly too little show up and then they are as irregular as they can be. 76 more words

Sharmishtha Basu

sharmishtha basu reblogged this on Indy Cafe.

मैं ऐसी ही थी!

Life changes… and you’d never know…when?

जबसे होश संभाला मैंने, हर पल को भरपूर जीया।
कितनी खूबसूरत होती है ज़िन्दगी, अपने यारों को बयां किया।
बस एक बार मिलती है… बेपनाह जी लो…
काम अधूरे सारे, इस पल में पूरे कर लो,
दिल की चमक को आँखों में जोश भरने दिया।

उन लम्हों में इस ख़्याल ने भी करवट ली…
जो आज मिल रही हैं खुशियां…
कल सिक्के का दूसरा पहलू भी देखना होगा।
आज में ख़ुद को खो कर मैंने बरसों को रंगीन किया।
उस जीने में भी क्या नशा था…
जिसने सौ जन्मों का सुकून दिया।
हर दिन ऐसे मुस्कुराया जैसे,
सबने मेरे मन की हर ख्वाहिश को बिन कहे ही पूरा किया।

Life